International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Feb 28, 2011

दुधवा लाइव पत्रिका का लेखक जो बन गया देशद्रोही !



एक सरकार के अपराधी का खुला बयान जो बार बार प्रकाशित होता रहा दुधवा लाइव पर...

....अरूणेश आदिवासी हाजिर हो

कोर्ट मुहर्रिर की इस पुकार को सुनते ही ४ पुलिस वाले मुझे न्यायाधीश के केबिन मे सम्मान पूर्वक धकियाते हुये ले चले सम्मान पूर्वक इसलिये कि सारे विश्व की मीडिया मेरे केस पर ध्यान दे रही थी । धकियाते हुये इसलिये कि मै उन पुलिसियो की नजर मे उनके हमवर्दी भाईयो का कातिल था ।  अंदर पहुचते ही जज  सवाल किया  यह तो ब्राह्मण है फ़िर आदिवासी क्यो कहा जा रहा है सरकारी वकील ने कहा  मुकदमा सुनने के बाद आप समझ जायेंगे । इसके बाद आरोपो की सूची पढ़ी गयी  आरोप लगे राष्ट्रद्रोह के और न जाने क्या क्या तमाम आरोप  और दलीले सुनने के बाद जज ने विदेशो से आये प्रतिनिधियो को देखा जो न्याय की सत्यता परखने आये थे इसके बाद जज ने कक्ष मे सरकारी वकील को बुलाया ।


बूढ़े जज ने मेरी जवानी पर तरस खाते हुये आफ़ द रिकार्ड सरकारी वकील से कहा आरोप तो कोई साबित नही होते । जवाब मिला  माननीय  अपराधी शातिर है इसने बहुत  कम सबूत छोड़े थे  मै हूं कि केस खड़ा कर दिया वरना ये तो पाक साफ़ निकल जाता । जज बोले ये कोई बात नही हुई  सबूत कहां है फ़िर इसने हिंसा तो कोई नही की । वकील ने कहा  यह लेख लिख कर आदिवासियो को उन पर हुये अत्याचार और शोषण  समझाता है उनके जंगलो के राष्ट्रीयकरण और उनको इमारती लकड़ी के बागानो मे बदलने की सच्चाई बताता है । यह जानकर आदिवासी सरकार विरोधी होकर नक्सलवादियो के साथ  पुलिस पर हमला करते हैं ।  हिंसा भड़काने का आरोप तो निश्चित साबित होता है हुजूर । इस पर जज ने कहा देश मे अभिव्यक्ती का अधिकार सभी को है और फ़िर यह झूठ भी तो नही कहता है । अब मुझे तुम नक्सली साहित्य मिलने की कहानी नही बताना वो तो तुम्हारा बस चले तो मेरे पास से भी जप्ती दिखा दोगे ।  नही मै इस बेगुनाह को सजा नही दे सकता यह कह कर जज ने अपनी कलम नीचे रख दी ।


असहाय जज को सरकारी वकील ने करूणामयी आंखो से देखकर कहा  माननीय आपको विचलित होने की जरूरत नही है । अपराधी सिस्टम के विरुद्ध है ब्राह्मण कुल मे जन्म लेने के बाद भी दिन भर आदिवासी आदिवासी भजता रहता है। हमने इससे कहा कि लेख लिखो लेकिन केवल यह पांच लाईने लिखना छोड़ दो पर यह नही माना । इसे अच्छी शिक्षा मिली थी आराम से सरकारी नौकरी कर सकता था  ठेकेदारी या दलाली  कर के भी यह सिस्टम का फ़ायदा उठा सकता था यहां तक कि सरकार ने इसके उद्योग मे किसी भी अफ़सर को जाने से मना कर दिया था कि यह खूब पैसा कमाये और चुपचाप बैठे पर यह आदतन अपराधी है बाज नही आता और लिखना बंद नही करता पर अब यह नही बचेगा । मैं आपको एक संशोधित दोहा सुनाता हूं इससे आपको समझ मे आ जायेगा ।

सुनु मनुष्य कहउँ पन रोपी । बिमुख सिस्टम त्राता नहिं कोपी ॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिं न राखि सिस्टम कर द्रोही ॥


आप इसे आज छोड़ देंगे लेकिन सिस्टम नही छोड़ेगा सच्चे/झूठे सबूत जुटा कर देर सवेर इसे काल कॊठरी मे जाना ही है और नही तो इसकी सुपारी भी दी जा सकती  है । इसलिये हे न्याय शिरोमणी इसे सजा दीजिये । लेकिन जज के कंधे झुके हुये थे उसने कहा नही इसके छोटे छोटे बच्चे हैं मै यह पाप नही कर सकता । अगर जज होने पर मुझे बेगुनाह परिवारो को तकलीफ़ देनी पड़े तो इससे तो अच्छा मैं कोई और काम करके जीवन यापन कर लूंगा । मै अपने ही देशवासी  के साथ अन्याय नही कर सकता ।


अवसाद और शोक से ग्रस्त जज को देखकर वकील ने कहा हे न्यायप्रिय लो मैं तुम्हे दिव्यद्रुष्टी प्रदान करता हूं । देखो मुझे मैं स्वयं सिस्टम हुं । मैं ही घूस खाकर शरीफ़ बना फ़िरता  प्रधानमंत्री भी हू और और फ़ाईल सरकाने वाला चपरासी भी मैं ही   । चापलूसी कर बना राष्ट्रपति भी मैं हूं और मै ही सिस्टम से बाहर जाकर आरोप लगाने पर माफ़ी मांगता नेता प्रतिपक्ष हूं । मैं ही जमीने बेचता कलेक्टर भी हूं और मैं ही जमीने नापता  पटवारी भी ।मै ही घटिया  निर्माण करवाने वाला अभिंयंता भी हूं और मै ही करने वाला ठेकेदार भी । मैं ही सड़क पर खड़ा पैसा खाता हवलदार भी हूं और  स्विस बैंको मे पैसा जमा कराता सेनाध्यक्ष भी । मै ही पेड न्यूज छापते अखबार का मलिक  हूं  और  आफ़िस आफ़िस घूम कर चंदा मांगता पत्रकार भी मैं ही हूं । मैं ही घूस खाने वाला राजा भी हुं और खिलाने वाली प्रजा भी । भ्रष्टाचार करता अधिकारी भी मै हूं और उसकी जांच करने वाला अफ़सर भी मैं हूं । लोकतंत्र , तानाशाही हो या कम्युनिस्म काम मै ही करता हूं । जो मेरी सीमा मे रहता है उसका कॊई  बाल भी बांका नही कर सकता । इस कलिकाल मे मै ही राम हूं और मै ही महादेव भी मैं ही हूं  इसलिये प्रिय सुनो



सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं जजः ।

अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षिष्यामी मा शुचः ।


भगवान सिस्टम के उस दिव्य रूप को देख और दिव्य वाणी कॊ सुन भय जनित श्रद्धा से युक्त जज ने तुरंत मुझे आजीवन कारावास की सजा सुना दी ।


सजा सुनते ही मैं बेहोश होकर  गिर गया आंखे खुली तो देखा बिस्तर के नीचे पड़ा था सामने पत्नी का चेहरा था एक दम अष्टमी की दुर्गा की तरह कपाल खप्पर लिये बोल रही थी दिन मे तो चैन से जीने नही देते रात मे भी आदिवासी जज भगवान वकील बड़बड़ा रहें हैं है जरूर किसी आदिवासी लड़की से टांका फ़िट हो गया है हे भगवान इस आदमी से शादी कर के मेरी जिंदगी झटक गयी है । हालांकि मैं आपसे सहमत हूं कि ऐसा लेखन ठीक नही पर क्या करूं राष्ट्रगान सुनते ही बिना लिखे रुका नही जाता ।



 अरूणेश दवे (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। इनका मशहूर ब्लाग अष्टावक्र है।) 

क्या आप रैबीज का खतरनाक वायरस पहनना चाहोगे !

 एक महिला वैज्ञानिक जो बनाती है खतरनाक जीवाणुओं और विषाणुओं के आकार के जेवर
सू्क्ष्म-जीवों की रचनाओं की तरह निर्मित कर्ण-फ़ूल, और गले के हार
 जानलेवा वायरस पर बने आभूषण
एक महिला जो बनाती है आभूषण न दिखाई देने वाले जीवों के आकार-प्रकार पर, जो रत्नों, महंगी धातुओं, पर उकेरती है, वे रचनायें जिन्हे प्रकृति ने करोड़ों वर्ष के दौरान निर्मित किया, यह एक तरह का विकास है, मानव सभ्यता में...जो प्रवाहित हो रहा है हमारी पीढियों में...प्रकृति बोध की यह सुन्दर कहानी सुनिए.....

विज्ञान में सुन्दरता खोजने वाली यह महिला वैज्ञानिक ने ऐसे शानदार आभूषणों का निर्माण किया जो अदभुत हैं, चांदी के बने हुए ये जेवर सूक्ष्मदर्शी द्वारा उन जीवाणुओं, और विषाणुओं की शक्ल व सूरत पर आधारित हैं, जो धरती पर मनुष्य के जीवन को तहस-नहस करने की क्षमता रखते हैं। 

विज्ञान-तकनीकी विषयों को चाहने वाले शौकीन लोग इन आभूषणों को खूब पसन्द कर रहे हैं। आर्कटिडा द्वारा बनाया गया रैबीज वायरस वाला कर्णफ़ूल व लटकन विशुद्ध आक्सडाइज्ड चाँदी का बना हुआ है, गाढ़े रक्त के रंग वाला यह रैबीज वायरस गले व कानों की सुन्दरता को बढ़ाता है। ये पेन्डेन्ट १६ इंच की चांदी की चेन से संबद्ध होता है, पेन्डेन्ट का आकार २ इंच हैं।


आर्क्टिडा केवल सूक्ष्म जीवों की जटिल व अदभुत सरंचनाओं को धातुओं व रत्नों द्वारा ही रूप नही देती है, बल्कि
प्रकृति की उन तमाम चीजों को जेवर की शक्ल दे रही है, जो उन्हे आकर्षित करती है, फ़ूल, पत्तिया, लतायें, पत्थरो व वृक्षों पर अपने आप उभर आई आकृतियों को रत्न-जड़ित आभूषण का रूप देकर मानव के प्रकृति प्रेम को उभारने और उसे सम्मोहित कर देने वाली सुन्दरता का निर्माण करती है। 

अदभुत है उनकी यह रचनात्मकता, मनुष्य को सदैव प्रकृति के दृष्यों ने आकर्षित किया, मानव ने प्रकृति की घटनाओं से सीखा, उनकी नकल की, जैसे कभी कर्ण्फ़ूल के रूप में किसी सुन्दर पुष्प को धारण करना, गले व सिर पर सुन्दर लता, या पुष्प को गूथ कर माला बनाकर पहनना...

ऐसा हम प्रकृति से आकर्षित होकर बरबस ऐसा करते आये, धातुओं, रत्नों आदि की खोज के पश्चात हमने अपनी उन इच्छाओं को यानि प्रकृति के उन जीवन्त चित्रों, पुष्प आदि को धातुओं व रत्नों के के माध्यम से रूप देना प्रारम्भ किया, यह एक जैव-विकास की प्रक्रिया कीतरह हमारे ज्ञान के विकास का दौर था जो पीढी दर पीढ प्रवाहित होता आ रहा है, आज हमने ऐसे यन्त्रों का विकास किया जो सूक्ष्म जीवों को देखने में 


हमारी मदद करते है, नतीजतन उन सूक्ष्म आकृतियों को आर्क्टिडा जैसे व्यक्तियों को वैसे ही आकर्षित कर डाला जैसे आज से हज़ारों वर्ष पूर्व हमारे किसी पूर्वज को किस सुन्दर पु्ष्प को बालों, या कान में पहनने के लिए आकर्षित किया होगा।

 
 
 अलेसिया आर्कटिडा Alecia Arctida  (एक गृहणी, माँ, वैज्ञानिक (मालीक्युलर बायोलाजिस्ट), और खाली समय में एक शिल्पकार है, प्रकृति की सुन्दर रचनाओं को कीमती धातुओं, समुन्द्री मूंगों, रत्नों आदि के माध्यम से आभूषणों की शक्ल देती हैं, साथ ही फ़ोटोग्राफ़ी में अभिरूचि, रचनात्मकता से सरोबार एक महिला जो सदैव कुछ नया कर गुजरने की चाह में रहती हैं। स्टॉकहोम स्वीडन में निवास, इनका ब्लाग देखे। इनकी आनलाइन दुकान से खरीददारी करने के लिए यहां Etsy Shop क्लिक करे)
Photo courtesy: http://arctida.blogspot.com/




कृष्ण कुमार मिश्र (लखीमपुर खीरी में निवास, प्रकृति की पाठशाला से कुछ कुछ निकालकर दुधवा लाइव पर अवतरित करते रहना, फ़ोटोग्राफ़ी, बर्ड वाचिंग, और भ्रमण पंसदीदा शौक है, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं )

Feb 27, 2011

देवदार के वृक्षों पर मड़राते देवदूत और सुन्दर परियां......

खूबसूरत पहाड़ी परियां
रेड बिल्ड ब्ल्यू मैगपाई (Red-billed Blue Magpie-Urocissa erythrorhyncha)

ये खूबसूरत नज़ारे थे इन परिन्दों के जिनका जिक्र किए बिना नही रह सका, नतीजतन आप सब के समक्ष प्रस्तुत है यह छोटा सा वर्णन उन देवदूतों और परियों का जिन्हे देवदार के वनों में उड़ते देखा था, हमने जब हम लौट रहे थे देवभूमि से सपाट धरती की ओर....ये तकरीबन ६-७ की तादाद में थे।

रेड बिल्ड ब्ल्यू मैगपाई एक खूबसूरत हिमालय की चिड़िया, जिसे मैने अपनी रानीखेत-कौशानी की अधूरी यात्रा के दौरान देखा, नैनीताल से काठगोदाम आते हुए इस पक्षी को पहाड़ियों के मध्य देवदार के वृक्षों पर इधर-उधर उड़ते देखा तो सहसा ब्रेक पर पैरों ने अपना कसाव तेज कर दिया, और हम थोड़ा लुढ़कने के बाद ठहर गये, सड़क के किनारे तमाम पल हमने इस खूबसूरत परिन्दे के साथ बिताये, जो कभी देवदार के इस वृक्ष से उस वृक्ष पर उड़ान भर रहे थे, कभी -कभी तो सड़क के किनारे खड़े एक पेड़ पर आ जाते जो मुझसे बहुत नज़दीक था, इन खूबसूरत घाटियों में पवित्र पेड़ों पर उड़ान भरते ये लंबी पूंछ वाले परिन्दे किसी देवदूत से कम नही लग रहे थे, मानों रंग-बिरंगी पोशाक में उड़ती परियां....! अदभुत नज़ारे जिन्होंने मन को उड़ान भरने पर मज़बूर कर दिया।

थोड़ा सा तस्किरा इन परिन्दों का
रेड बिल्ड ब्ल्यू मैगपाई
"उत्तरी एंव पूर्वी भारत, चीन एंव दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाती हैं। यह कौयें के परिवार से संबधित हैं नतीजतन यह अन्य पक्षियों के मुकाबले काफ़ी अक्लमंद होते हैं। ये चमकीले रंगों वाली चिड़िया जिसकी सुन्दर लम्बी एक जोड़ी नीले व सफ़ेद रंग की पूंछ जिसकी लम्बाई १७ इंच तक हो सकती है। ये अपना घर पहाड़ों के वनों में बनाती हैं। इनकी खूबसूरत पूंछ का अहम रोल होता है इनके प्रजनन के समय जब जोड़े बनाते वक्त एक दूसरे को आकर्षित करने में यह लम्बी पूंछ महत्व पूर्ण भूमिका रखती है।

इनका आहार छोटे कीड़े, स्तनधारी जीव, सर्प, छिपकलियां (सरीसृप) एंव घोघा (मोलस्का) इत्यादि है, प्राय: ये पक्षी छोटे समूहों में पहाड़ो की वादियों में जंगलों के ऊपरी हिस्से में चक्कर लगाते मिल जायेगे, जैसे कोई लड़ाकू विमान गहरी घाटियों में ग्लाइडिंग कर रहा हों। दरसल वृक्षों के ऊपरी हिस्से में मौजूद कीटों को आहार के रूप में प्राप्त करने का यह एक सामहिक उड़ान होती है। एक सामूहिक भोज ! ये अन्य पक्षियों के घोसलों से अण्डे चुरा कर खाने में भी माहिर होते हैं। यह अपना भोजन जमीन पर पड़े फ़लों, व पुराने सड़े वृक्षों से भ प्राप्त करते हैं।

इनका प्रजनन काल मार्च - मई है, यह अपने घोसले वृक्षों की शाखाओ में बुनते है, सथानीयखर-पतवार व पत्तियों आदि से, मादा रेड बिल्ड ब्ल्यू मैगपाई तीन से छ: अण्डे देती है।


नर व मादा लगभग एक ही आकार प्रकार व रंग रूप के होते हैं, सिर से गले तक काला रंग, शरीर पर बैंगनी-नीले रंग के पंख, तथा पंखों के किनारे सफ़ेद रंग के, जोड़ीदार पूंछ का छोर सफ़ेद रंग का होता है। इनकी चोच लाल रंग की, पैर गुलाब-लाल रंग के, आंखे काली, ये सूरत और सीरत है इस खूबसूरत पहाड़ी चिड़िया की।



कृष्ण कुमार मिश्र (लखीमपुर खीरी में निवास, प्रकृति की पाठशाला से कुछ कुछ निकालकर दुधवा लाइव पर अवतरित करते रहना, फ़ोटोग्राफ़ी, बर्ड वाचिंग, और भ्रमण पंसदीदा शौक है, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं )

Feb 26, 2011

कितना जरूरी है राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून




देश के लोगों को कुपोषित होने से बचाने के लिए जरूरी है राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून यह बात प्रयास एवं सामुदायिक वैज्ञानिक डॉ. नरेन्द्र गुप्ता ने 25 फरवरी 2011 को  होटल ऋतुराज वाटिका में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पर चर्चा एवं सुझाव हेतु आयोजित बैठक के दौरान कही। डॉ. गुप्ता ने खाद्य सुरक्षा पर विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि राष्ट्र की आर्थिक विकास दर में बढोत्तरी के बाद भी देश में पोषण कि स्थिति गम्भीर बनी हुई है।

 देश  में आधे से अधिक 6 वर्ष से कम आयु के बच्चे जरूरी वजन से कम के है जो उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास को प्रभावित करता है। इसी प्रकार आधे से अधिक महिलाएं एवं बच्चे रक्तातलपता से ग्रसित है। इसकी पृष्ठभूमि में देश के अधिकत्तर नागरिकों को जरूरी पोषण की अनुपलब्धता मुख्य कारण है। इस भीषण समस्या के निराकरण के लिए नागरिक संगठन निरन्तर सरकार से मांग करते रहे हैं कि सरकार सबके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से बच्चों, गर्भवती, धात्री महिलाएं, असहाय बुजुर्ग, विकलांग इत्यादि को सस्ता अनाज एवं अन्य खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाये। केन्द्र सरकार ने इस हेतु राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून बनाने के लिए पहल की है। इस संदर्भ में श्रीमती सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने एक प्रस्ताव भी बनाया है।

कार्यक्रम समन्वयक रितेष लढ्ढा ने प्रोजेक्टर के माध्यम से कानून का मसौदा पर विस्तृत जानकारी दी गई। डॉ. एस. एन. व्यास ने कहा कि कानून के जरिये बातचीत कर हम अन्न को ब्रम्ह  मानकर उसकी बात करें। इसके साथ ही उन्होने कहा कि खाद्य पर भरे पेट लोगों का चिन्तन है। इस पर चर्चा बारिकी से होनी चाहिए । महाराणा प्रताप राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य जे.पी. वर्मा ने कहा कि समाजवादी सरकार 1990 के बाद भूमण्डलीकरण और उदारवादी धारा में चल पडे है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी उसी के क्रम में था। कानून निर्माण में सुझाव मांगने की प्रक्रिया में कई बार विद्वान लोगों को व्यस्त कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सभी लोगों को समान रूप से रोजगार उपलब्ध करवाये जाये जिसके कि प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए खाद्यान्न की व्यवस्था आसानी से कर सके। खाद्यान्न का वितरण किस प्रकार से हो पर विभिन्न संगठनों एवं प्रबुद्ध नागरिकों ने अपने-अपने सुझाव दिये

 डॉ. भगवत सिंह तंवर ने जरूरतमंद लोगों के टिफिन व्यवस्था के माध्यम से भोजन मुहैया कराने का सुझाव दिया तो समाजषास्त्री डॉ. एच.एम कोठारी ने कहा कि वितरण टिफिन, नगद पैसा और खाद्य अलग-अलग रूप से योजना अन्तर्गत किया जा सकता है किन्तु मध्यस्ता कम हो। वस्तुओं का स्थानीय स्तर पर सुनियोजित वितरण व्यवस्था हो। समाजसेवी राधेष्याम चाष्टा ने खाद्यान्न में शुद्धता की बात करते हुए कहा कि खाद्यान्न से सभी प्राणियों को जीवन दान मिलता है इसकी शुद्धता बेहद संवेदनशील विषय है। खाद्यान्न की शुद्धता परखने के लिए ईमानदार अधिकारियों को ही जिम्मा देना चाहिए जिससे कि मिलावट करने वालो पर अंकुश लगेगा। स्पिकमैके से जेपी भटनागर ने कहा कि अपने घर से लगाकर षादी समारोह एवं विभिन्न पार्टियों में भोजन का एक कण भी व्यर्थ नही होने देना चाहिएं। इसी प्रकार प्रो. आर.एस मंत्री, अभय कुमार विराणी, हिन्दी व्याख्याता अमृत लाल चंगेरिया, वरिष्ठ नागरिक मंच से आर.सी डाड, कालिका ज्ञान केन्द्र निदेशक अखिलेश श्रीवास्तव, प्रयास निदेशक एवं समाजसेवी खेमराज चौधरी  एवं युनीसेफ के चित्तौडगढ समन्वयक कुमार विक्रम आदि ने सुदृढ खाद्य व्यवस्था के लिए अपने-अपने सुझाव एवं विचार व्यक्त किये। 

कार्यक्रम के अन्त में समाज सेवी डॉ. के. सी. शर्मा  ने सरकार को पोषण की स्थिति सुधारने के लिए खाद्यान्न वितरण व्यवस्था के कई पहलुओं पर विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि प्रत्येक वास्तविक एवं पात्र व्यक्ति को खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध करवानी चाहिए और कहा कि सरकार द्वारा संचालित विभिन्न खाद्यान्न योजनाओं को सामुदायिक निगरानी द्वारा गुणवतापूर्ण बेहतर किया जा सकता है।

इस संगोष्ठी में वरिष्ठ नागरिक मंच, नेहरू युवा केन्द्र, स्पिकमैके, प्रतिरोध संस्थान, अरावली जल एवं पर्यावरण संस्थान एवं प्रयास सहित कई स्वयंसेवी संगठनों के पदाधिकारियों सहित जिले के कई प्रबुद्ध वरिष्ठ विद्वानों एवं गणमान्य नागरिको ने भाग लिया।

माणिक जी संस्कृतिकर्मी हैं, ''अपनी माटी'' वेब पत्रिका के संपादक, कुम्भा नगर, चित्तौड़गढ़ राजस्थान में निवास, इनसे manikspicmacay@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)


खीरी जनपद के जंगलों में बेधड़क जारी है बाघों और तेन्दुओं का शिकार

सृष्टि कन्जर्वेशन एण्ड वेलफेयर सोसाइटी ने शिकारियों और भ्रष्ट प्रशासन के विरूद्ध छेड़ी मुहिम
"खीरी में एक और तेन्दुए की मौत"

दुधवा लाइव डेस्क* जंगल के समीपवर्ती खेतों के किनारे लगाए जाने वाले करंटयुक्त बिजली के तारों में फंसकर २० फ़रवरी को भीरा परिक्षेत्र (छैराती कम्पार्टमेन्ट-दक्षिण खीरी वन प्रभाग) में तेंदुआ मारने की कोई पहली घटना नहीं है......!।
इससे पूर्व लगभग बीस साल पीछे परसपुर परिक्षेत्र में बिजली के करंट से एक बाघिन मरी थी। तब से लेकर अब तक वन विभाग द्वारा ऐसे कोई सार्थक उपाय नहीं किए जा सके हैं जिससे खेतों में लगाए जाने वाले करंट वाले बिजली के तारों में फंसकर कोई वन पशु न मर सके। यह स्थिति वन विभाग की अर्कमण्यता की पोल भी खोलती है।

मालूम हो कि नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन की पलिया रेंज के तहत परसपुर परिक्षेत्र में दो फरवरी 1992 को एक बाघिन का शव पाया गया था, यह बाघिन खेत के किनारे लगाए गए करंटयुक्त बिजली के तारों में फंसकर मरी थी। यद्यपि इस घटना के बाद वन विभाग द्वारा यह प्रयास किए गए थे कि जंगल के समीपवर्ती खेतों के किनारे लोग बिजली के तार न लगा सके। किन्तु समय व्यतीत होने के साथ ही प्रयास भी गायब हो गए। जबकि समस्या ज्यों कि त्यों बनी रही क्योंकि जंगल के वनपशु फसलों को नुकसान न पहुंचाने पाए इसीलिए लोग अभी भी खेतों के किनारे बिजली के तारों को लगाने से परहेज नहीं करते है। यह स्थिति क्यों है इसका भी प्रमुख कारण है कि जंगल में नर्म व मुलायम चारा की कमी के कारण वनपशु जंगल की खुली सीमा को लांघकर समीपवर्ती खेतों में आ जाते हैं। यह वनपशु फसल को नुकसान न पहुंचा सकें इसकी रोकथाम के लिए गरीब किसान तो अपने खेतों के किनारे रस्सी आदि बांधने के साथ ही बांस आदि लगा देते हैं किन्तु उच्च वर्ग के किसान अथवा फार्मर जिनके खेतों में ट्यूबवेल हैं और वह बिजली के मोटरों से पानी निकालकर खेतों की सिंचाई करते हैं वह फसलों की सुरक्षा के लिए बिजली तार खेतों के किनारे लगा देते हैं और उन तारों में निकटवर्ती विद्युतपोल अथवा ट्यूबवेल के पंप हाउस से उसमें करंट दौड़ा देते हैं परिणाम यह होता है कि इन तारों की चपेट में आने से तमाम वनपशु असमय काल के गाल में समा जाते हैं। जिनकी किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होती है वह भी इसीलिए क्योंकि इसमें अधिकांश सुअर, हिरन, चीतल, पाढ़ा आदि वनपशु ही अपनी जान गंवाते हैं जो मरने के बाद मांसाहारियों के लिए आसान शिकार भी होते हैं। किन्तु जब कोई लुप्तप्राय प्राणी यानी बाघ या तेंदुआ तारों की चपेट में आकर मरता है तब इस बात का भी खुलाशा हो जाता है कि खेतों में बिजली वाले तारों के लगाने का सिलसिला निर्वाध रूप से जारी है।

उल्लेखनीय है कि विगत साल नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन की परसपुर परिक्षेत्र में करंटयुक्त बिजली के तारों में फंसकर बाघ मारा गया था। इसके बाद 26 दिसम्बर 2010 को दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल किशनपुर वनपशु विहार के जंगल से सटे कटैया ग्राम के पास बिजली के तारों में फंसकर एक तेंदुआ मर गया था। अपने बचाव में लोगों ने तेंदुआ के शव को दूसरी जगह पहुंचाकर असलियत पर पर्दा डालने का प्रयास किया जिसमें यूं सफल भी हुए क्योंकि पार्क प्रशासन ने तथाकथित अभियुक्तों को पकड़कर जेल भेजकर अपनी पीठ थपथपा ली लेकिन यह पता लगाने का प्रयास नहीं किया कि आखिर तेंदुआ कहां पर बिजली के तारों की चपेट में आया? इस घटना को लोग भूल भी नहीं पाए थे कि बीती 20 फरवरी को साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन की भीरा वनरेंज क्षेत्र में एक मादा तेंदुआ बिजली के तारों में फंसकर असमय काल कवलित हो गई। अपने बचाव में एक बार फिर से तेंदुआ के शव को लोगों ने दूसरी जगह पहुंचा दिया ताकि यह पता न लग पाए कि मादा तेंदुआ कहां पर बिजली के तारों में फंसी थी। लगभग बीस साल के बाद भी वन विभाग कोई ऐसी पुख्ता व्यवस्था नहीं कर पाया है कि जिससे वनपशु जंगल के बाहर आकर समीपवर्ती खेतों में न जा सकें? यह स्वयं में एक विचारणीय प्रश्न है ही साथ में यह स्थिति वन विभाग की अकर्मण्यता को भी उजागर करती है।

सृष्टि कनजरवेशन एण्ड वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अनूप गुप्ता, महामंत्री डीपी मिश्र आदि पदाधिकारियों समेत क्षेत्र के वन्यजीव प्रेमियों ने जंगल के किनारे खेतों में करंटयुक्त बिजली के तार लगाने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही किए जाने तथा वनपशु जंगल के बाहर न आ सके इसकी रोकथाम के लिए जंगल के किनारे सुरक्षा खाई बनाए जाने की मांग वन विभाग के उच्चाधिकारियों से की है।

टांगिया : ये कैसी आजादी, ये कैसा लोकतंत्र

गोला रेंज के वनटांगियों ने नही देखा कभी बैलेट पेपर
-१७५ लोगों के कुनबे में १ ही हैं मिडिल पास
(खीरी) गोला-टांगिया गांव से। देश को आजादी मिले ६३ साल हो गए, लेकिन गोला रेंज के जंगल में बसे टांगिया गांव को अभी तक लोकतंत्र में वोट डालने का हक तक हासिल नहीं हुआ। ३७ परिवारों के इस कुनबे में अपने हांथो से लाखो पेड़ो का वृक्षारोपण किया, आज वही जंगल इनके लिए कैदगाह बन गये है।
गोला वन बैरियर से इस गांव की दूरी महज आठ किमी है, लेकिन बस्ती तक जाने के लिए महज दो पहिया वाहन का ही रास्ता बना हुआ है। यह इनकी बदनसीबी ही है कि अगर गांव में कोई बीमार हो जाये या किसी के घर में नन्ही किलकारी गूंजने वाली हो तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए जनाजे की तरह चारपाई पर चार कांधो की जरूरत पड़ती है। इस गांव का नाम भी बदकिस्मती से टांगिया ही पड़ गया है, पड़ोस में एक कटैला फार्म भी मिली जुली पहचान है। कुनबे के मुखिया रामलखन बताते है कि उनके पिता जोखू भी उन ५०० लोगों में से एक थे, जो ६० के दशक में गोरखपुर से भीरा रेंज में वृक्षारोपण के लिए आये थे। १९७२ में कुछ लोगों का भीरा रेंज से गोला रेंज में ट्रांसफर कर दिया गया था। सबसे पहले यह लोग पश्चिमी बीट में केतवार पुल के किनारे लाये गये, यहां वृक्षारोपण हुआ,पांच साल बाद कलंजरपुर उसके बाद सिकंदरपुर में हजारों पौधो का रोपण किया। पिछले १७ साल से यह लोग पूर्वी बीट में वृक्षारोपण करने के बाद इस स्थान पर रह रहे है। 


खुद की पहचान है सबसे बड़ा सवाल ?
-इस कुनबे के लोगो के पास पहचान के नाम पर सरकारी चिट तक नहीं है। १७ साल से एक जगह पर रह रहे इनके नाम न तो किसी वोटर लिस्ट में शामिल हैं और न ही इनके पास पहचान पत्र है। सरकार की योजनायें इस गांव के लिए पोस्टर के सिवा कुछ नही है। राशनकार्ड,जाबकार्ड पर देश के हर नागरिक का हक है, लेकिन यहां के बाशिंदो को सरकार ने कभी इस लायक भी नहीं समझा। कक्षा आठ तक पढ़े रमाकांत सबसे पढ़े लिखे बाशिंदे है। अब गांव के ६ से १४ साल के लगभग ४० बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकार ने कोई इंतजाम नही किया। रमाकांत बताते है कि जब वनविभाग की वह लोग चाकरी करते थे, तब विभाग ने पढ़ाने का कुछ इंतजाम जरूर किया था। बीच में विधायक अरविंद गिरि के प्रयास से एक केंद्र चलाया गया, जो डेढ़ साल बाद बंद भी हो गया। 

अब्दुल सलीम खान (लेखक युवा पत्रकार है, वन्य-जीवन के सरंक्षण में विशेष अभिरूचि, जमीनी मसायल पर तीक्ष्ण लेखन, खीरी जनपद के गुलरिया (बिजुआ) गाँव में निवास, इनसे salimreporter.lmp@)gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)



Feb 18, 2011

टूटते पहाड़ व ग्रेनाइट का खनन ही बुन्देलखण्ड की त्रासदी


ग्रेनाइट खनन से बढ़ता प्रदूषण 

पर्यावरण प्रदूषण और बीमार होते लोग 
1.    30 लाख 50 हजार पत्थर रोजाना पहाड़ों से निकाला जाता है।
2.    30 से 40 टन विस्फोटक का प्रतिदिन उपयोग।
3.    इस उद्योग में लगी 1500 ड्रिलिंग मशीनें।
4.    500 जे0सी0बी0 मशीनें कर रही खुदाई।
5.    20 हजार ट्रक एवं डम्फर।
6.    2000 बड़े जनरेटर।
7.    50 क्रेन मशीन पत्थरों को उठाने में मशगूल।
8.    15 हजार ट्रक व ट्रैक्टर भाड़ा और ओवरलोडिंग हफ्ता वसूली।
9.    14 हजार दो पहिया- चार पहिया वाहनों की दौड़।
10.    6 करोड़ तिरासी लाख, पांच सौ ली0 डीजल की खपत।
11.    10 हेक्टेयर जमीन कृषि योग्य प्रतिदिन बंजर।
12.    सैकड़ों टी0वी0 के मरीज होते हैं तैयार।

बुन्देलखण्ड का पठार प्रीकेम्बियन युग का है। पत्थर ज्वालामुखी पर्तदार और रवेदार चट्टानों से बना है। इसमें नीस और ग्रेनाइट की अधिकता पायी जाती है। इस पठार की समु्रद तल से ऊंचाई 150 मीटर उत्तर में और दक्षिण में 400 मीटर है। छोटी पहाड़ियों में भी इसका क्षेत्र है, इसका ढाल दक्षिण से उत्तर और उत्तर पूर्व की और है। बुन्देलखण्ड का पठार मध्यप्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर, दतिया, ग्वालियर तथा शिवपुरी जिलो में विस्तृत है। सिद्धबाबा पहाड़ी (1722 मीटर) इस प्रदेश की सबसे ऊंची पर्वत छोटी है। बुन्देलखण्ड की भौगोलिक बनावट के अनुरूप गुलाबी, लाल और भूरे रंग के ग्रेनाइट के बड़ाबीज वाला किस्मों के लिये विन्ध्य क्षेत्र के जनपद झांसी, ललितपुर, महोबा, चित्रकूट- बांदा, दतिया, पन्ना और सागर जिले प्रमुखतः हैं। भारी ब्लाकों व काले ग्रेनाइट सागर और पन्ना के कुछ हिस्सों में पाये जाते हैं इसकी एक किस्म को झांसी रेड कहा जाता है। छतरपुर में खनन के अन्तर्गत पाये जाने वाले पत्थर को फार्च्यून लाल बुलाया जाता है। सफेद, चमड़ा, क्रीम, लाल बलुआ पत्थर अलग-अलग पहाड़ियों की परतों में मिलते हैं। न्यूनतम परत बलुवा पत्थर एक उत्कृष्ट निर्माण सामग्री के लिये आसानी से तराषा जा सकता है। इसके अतिरिक्त बड़े भंडार, हल्के रंग का पत्थर झांसी, ललितपुर, महोबा, टीकमगढ़ तथा छतरपुर के कुछ हिस्सों मंे मिलता है। इस सामग्री भण्डार का उपयोग पूरे देष में 80 प्रतिशत सजावटी समान के लिये होता है। ललितपुर में पाया जाना वाला कम ग्रेड व लौह अयस्क (राक फास्फेट) के रूप से विख्यात है।

अप्राकृतिक खननः- हाल ही के अध्ययन व सर्वेक्षण से जो तथ्य प्रकट हुये हैं वे चौकने वाले ही नहीं वरन् यह भी सिद्ध करते हैं कि भविष्य ये बुन्देलखण्ड की त्रासदी में वे अति सहयोगी होंगे। जहां पहाड़ों के खनन में  मकानों की अनदेखी की जा रही है। वहीं खनन माफिया साढ़े 37 लाख घन मी0 पत्थर रोजाना पहाड़ों से निकालते हैं। इसके लिये वह एक इंच होल में विस्फोटक के बजाय छः इंच बड़े होल में बारूद भरकर विस्फोट करते हैं। जब यह विस्फोट होते हैं तो आस-पास 15-20 किमी की परिधि में बसने वाले वन क्षेत्रों के वन्य जीव इन धमाके की दहषत से भागने लगते हैं व कुछ की श्रवण क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। इसके अतिरिक्त विस्फोट से स्थानीय जमीनों में जो दरारें पड़ती हैं उससे ऊपरी सतह का पानी नीचे चला जाता है और भूगर्भ जल बाधित होता है। इस सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड ग्रेनाइट करोबार जो कि यहां कुटीर उद्योग के नाम से चल रहा है में 1500 ड्रिलिंग मशीनें, पांच सैकड़ा जे0सी0बी0, 20 हजार डंफर, 2000 बड़े जनरेटर, 50 क्रेन मशीन और हजारों चार पहिया ट्रैक्टर प्रतिदिन 6 करोड़, 83 लाख, पांच सौ ली0 डीजल की खपत करके और ओवरलोडिंग करते हैं। इन विस्फोटों से रोजाना 30-40 टन बारूद का धुआं यहां के वायुमंडल में घुलकर बड़ी मात्रा में सड़क राहगीरों व खदानों के मजदूरों को हृदय रक्तचाप, टी0वी0, श्वास-दमा का रोगी बना देता हैं। इसके साथ-साथ 22 क्रेसर  मषीनों के प्रदूषण से प्रतिदिन औसतन 2 लोग की आकस्मिक मृत्यु, 2 से तीन लोग अपाहिज व 6 व्यक्ति टी0वी0 के षिकार होते हैं। 


गौरतलब है कि इस उद्योग से प्रतिदिन 10 हेक्टेयर भूमि (उपजाऊ) बंजर होती हैं 29 क्रेसर मषीनों को उ0प्र0 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा अनापति प्रमाण पत्र जारी किया गया है लेकिन इन खनन मालिकों की खदानों में पत्थर तोड़ने के समय चलाया जाने वाला फव्वारा कभी नहीं चलता जो कि डस्ट को चारों तरफ फैलने से रोकने के लिये होता है ताकि प्रदूषण कम हो। अवैध रूप से लाखों रूपयों की विद्युत चोरी इनके द्वारा प्रतिदिन की जाती है इसके बाद भी यह उद्योग बहुत तेजी से बुन्देलखण्ड में पैर पसार रहा है क्योंकि सर्वाधिक राजस्व इस उद्योेग से मिलता है। विन्ध्याचल पवर्त माला और कबरई (महोबा), मोचीपुरा, पचपहरा का ग्रेनाइट सर्वाधिक रूप से खनिज कीमतों में सर्वोत्तम माना जाता है प्राकृतिक संसाधनों के इस व्यापार से निकट समय में ही यदि निजात नहीं मिलती है तो बुन्देलखण्ड की त्रासदी में यह उद्योग बहुत बड़ी भूमिका के साथ दर्ज होने वाला काला अध्याय साबित होगा।


आशीष दीक्षित "सागर" (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं) 

Feb 12, 2011

दुधवा में घमासान !

दुधवा नेशनल पार्क में वन-रक्षकों ने उप-निदेशक के खिलाफ़ खोला मोर्चा-

सरंक्षित क्षेत्र में शाखू के वृक्षों के कटान में प्रथम दृष्टया वन रक्षकों की ही संलिप्तता पाई गयी !
 तीन वन-रक्षकों के विरूद्ध कार्यवाही
 वन-रक्षक संघ के दबाव के चलते डी डी द्वारा कार्यवाही वापस
दुधवा लाइव डेस्क* (पलियाकलां-खीरी) दुधवा नेशनल पार्क की लोकप्रियता घटी या बढ़ी है यह अलग बात है परन्तु दुधवा टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक की लोकप्रियता के ग्राफ में जबरदस्त गिरावट आने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन् 2005 में एफडी के खिलाफ खोले गए मोर्चा में जहां पार्क के कर्मचारी उपनिदेशक के पक्ष में लामबंद होकर अंदोलन करने को तैयार हो गए थे। वहीं आज पार्क कर्मचारी इसी दुधवा मुख्यालय में उपनिदेशक के खिलाफ मोर्चा खोलकर प्रदर्शन किया।

उल्लेखीय है कि दुधवा टाइगर रिजर्व के निर्वतमान उपनिदेशक पीपी सिंह ने सन् 2005 में तत्कालीन एफडी महेन्द्र सिंह की हिटलर-शाही के खिलाफ मोर्चा खोलकर अपना त्यागपत्र भी दे दिया था तब दुधवा पार्क के समस्त कर्मचारी ही नहीं वरन् नगर के विभिन्न संगठनों के तमाम लोगों ने यहां मुख्यालय पर एफडी के खिलाफ प्रदर्शन करके विरोध जताया था। आधा दशक से ऊपर का समय व्यतीत हो गया है इस बात का। इस बीच दुधवा नेशनल पार्क की ख्याति फैली और उसकी लोकप्रियता में कितना इजाफा हुआ यह अलग का विषय है किन्तु इसी दुधवा नेशनल पार्क के कर्मचारी जो उपनिदेशक के साथ जीने मरने को तैयार रहते थे वही कर्मचारी उपनिदेशक के खिलाफ हो गए हैं यह स्थिति कोई एक दिन में नहीं बनी होगी उपनिदेशक की कार्यशैली से कर्मचारियों में पनपा गुस्सा इस बात को भी जाहिर करता है कि उनकी लोकप्रियता में जबरदस्त गिरावट आई है। अगर ऐसा नहीं होता तो पार्क के कर्मचारी यहां के मुख्यालय पर आज उपनिदेशक के खिलाफ मोर्चा खोलकर प्रदर्शन नहीं करते? प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों की हुई सभा में वक्ताओं ने तमाम गंभीर आरोप उपनिदेशक पर लगाए साथ ही उनके खिलाफ भी कर्यवाही किए जाने की मांग भी कर डाली। हालांकि कर्मचारियों के बीच आकर मंच से उपनिदेशक ने यह कहा कि उन्होंने आजतक टीए का भुगतान नहीं लिया है बताकर यह संदेश देने का पूरा प्रयास किया कि वह पूरी ईमानदारी से कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि घर में मुखिया के निर्णय का भी विरोध होता है लेकिन ईमानदारी से काम करें। हाथ पैर में कोढ़ होगा तो काटना ही पड़ेगा। जंगल के रक्षक है तो भक्षक न बने बेईमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी भले ही तबादला कर दिया जाए यहां से चला जाऊंगा। यद्यपि उनके द्वारा दिए गए आश्वासन पर कर्मचारियों के उत्पीड़न के मुद्दे को लेकर डीडी और कर्मचारियों के मध्य होने वाला टकराव टल गया है। लेकिन यह बात स्पष्ट हो गई है कि कहीं न कहीं नेतृत्व में कुछ ऐसी कमी जरूर हुयी है जिससे कर्मचारियों का गुस्सा लावा बनकर फूट पड़ा।

दुधवा के उप-निदेशक की कार्य शैली का विरोध

दुधवा टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक की कार्यशैली के विरोध में यहां दुधवा मुख्यालय पर वनरक्षक संघ के तत्वाधान में हुए प्रदर्शन में पार्क के ही नहीं वरन् अन्य डिवीजनों के कर्मचारी शामिल हुए। ऐसी स्थिति में भारत-नेपाल सीमावर्ती जंगल के साथ ही पार्क की अन्य रेंजों के परिक्षेत्र में स्वच्छंद विचरण करने वाल वन्यजीवों की सुरक्षा पूरे दिन लगभग भगवान के भरोसे यूं रही कि इनके रखवाले कर्मचारी यहां आ गए थे। इसे वन की रखवाली पर विपरीत असर पड़ सकता था। यह स्थिति प्राकृतिक नहीं वरन् उपनिदेशक द्वारा पैदा की गई कृत्रिम परिस्थितियों से उत्पन्न हुई। अगर वह गौरीफंटा कटान मामले के आरोपी वनरक्षकों के खिलाफ दूरदर्शिता से नियमानुसार कार्यवाही करते तो शायद यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती और न ही कर्मचारी आंदोलन करते और न ही उन्हें कर्मचारियों के बीच आकर अपनी सफाई देनी पड़ती।

दुधवा के उप-निदेशक व वन-रक्षक संघ के मध्य नोक-झोक-

भारत-नेपाल सीमावर्ती दुधवा नेशनल पार्क की गौरीफंटा रेंज के जंगल में अवैध वन कटान के मामले में तीन वनरक्षकों को विगत दिवस दुधवा के उपनिदेशक ने आदेश देकर जेल रवाना कर दिया था। यद्यापि जिला मुख्यालय पर यूनियन नेताओं से हुई नोंकझोंक के बाद कर्मचारियों की वापसी तो हो गई थी। किन्तु उपनिदेशक संजय पाठक के अडियल रवैये के खिलाफत करते हुये वनरक्षक संघ वन विभाग शाखा दुधवा टाइगर रिजर्व द्वारा आंदोलन करने की घोषणा की गई थी। इसके तहत यहां दुधवा पार्क मुख्यालय पर डीडी कार्यालय के सामने जुटे आक्रोशित कर्मचारियों ने प्रदर्शन करके तीखा विरोध जताया। तत्पश्चात कर्मचारियों की हुई सभा को संबोधित करते हुए विभिन्न कर्मचारी यूनियन के नेताओं समेत वक्ताओं ने उपनिदेशक द्वारा किए गए आरोपी कर्मचारियों के नाजायज उत्पीड़न का तीखा विरोध दर्ज कराते हुए डीडी पर तमाम गंभीर आरोप लगाए साथ ही उन के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग भी कर डाली। इस दौरान उपनिदेशक के बुलावे पर कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहे सहायक वन कर्मचारी संघ के अध्यक्ष पियूष मोहन श्रीवास्तव, वनरक्षक संघ अध्यक्ष महेन्द्र नाथ मिश्र, फेडरेशन आफ फारेस्ट एसोशिएशन के अध्यक्ष पतिराज सिंह, मुकुल वर्मा, अशोक सिंह, रविकांत वर्मा, अनिल त्रिपाठी, नरेन्द्र सिंह, विजय सिंह आदि ने कार्यालय में जाकर उपनिदेशक से वार्ता की। लगभग एक घंटा तक चली वार्ता के दौरान डीडी ने अपनी सफाई दी साथ ही कर्मचारी हितों के लिए किए गए कार्यो की दुहाई देते हुए आरोपी वनरक्षकों के खिलाफ जांच कराने के बाद ही कार्यवाही किए जाने का आश्वासन दिया। इस पर आपसी सहमति बन जाने के बाद कर्मचारियों की सभा के मंच पर आकर उपनिदेशक संजय पाठक ने कहा कि दुधवा के जंगल की 159 कर्मचारी सुरक्षा कर रहे हैं। जिसके चलते दुधवा नेशनल पार्क की पहचान विश्व के मानचित्र पर है। इस छवि को खराब न करें मुखिया होने के नाते यही हमारा अनुरोध है। उन्होंने कहा कि सर्विस में आज तक टीए नहीं लिया है जबकि यहां के कर्मचारियों का बकाया 18-18 माह का वेतन दिलाया साथ ही दैनिक कर्मचारियों से घूस के रूप में लिया जाने वाला पांच प्रतिशत का कमीशन भी बंद करा दिया है पांच साल का बकाया भत्ता दिलवाने का प्रयास चल रहा है। अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को नकारते हुए कहा कि आपकी अदालत में हूं जो फैसला लेना है वह स्वयं फैसला करें। किन्तु हमारा कहना है कि जंगल के रक्षक है तो भक्षक न बने और रक्षक के दायित्व में मान सम्मान न खोएं। उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि आरोपी वनरक्षकों का निलंबन अदेश स्थगित रहेगा और पूरे प्रकरण की जांच कराने के बाद कार्यवाही की जाएगी। इस आश्वासन पर कर्मचारियों ने आंदोलन समाप्त कर दिया है। इस आश्वासन पर कर्मचारियों ने आंदोलन समाप्त कर दिया है। सभा का संचालन महेन्द्र नाथ मिश्र ने किया। इस अवसर पर वनरक्षक संघ लखीमपुर अध्यक्ष अशोक शुक्ला, मंत्री रविकांत वर्मा, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष महेश कुमार, दैनिक श्रमिक संघ अध्यक्ष संतोष मिश्र, फेडरेशन आफ फारेस्ट एसोसिएशन अध्यक्ष पतिराज सिंह, मंत्री विजय कुमार, उपाध्यक्ष रामकुमार, संरक्षक ज्वाला प्रसाद, वनरक्षक संघ के महामंत्री राकेश शुक्ला सहित दुधवा पार्क कर्मचारियों के साथ ही नार्थ एवं साउथ फारेस्ट डिवीजन के वन कर्मचारी उपस्थित रहे।

Feb 10, 2011

ये कैसा समर है, जानवर और आदमी के मध्य !

फोटो: ©सीजर सेनगुप्त
आखिर बाघों की आमद हमारे घरों की ओर क्यों?


बिल्ली प्रजाति का अतिबलशाली ‘बाघ’ जन्म से हिंसक और खूंखार होता है, लेकिन मानवभक्षी नहीं होता है। इंसानों से डरने वाले वनराज बाघ को मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं। जब कभी बाहुल्य क्षेत्रफल में जंगल थे तब मानव और वन्यजीव दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में सुरक्षित रहे, समय बदला और आबादी बढ़ी फिर किया जाने लगा वनों का अंधाधुन्ध विनाश। जिसका परिणाम यह निकला कि जंगलों का दायरा सिमटने लगा, वन्यजीव बाहर भागे और उसके बाद शुरू हुआ न खत्म होने वाला मानव और वन्यपशुओं के बीच का संघर्ष। इसी का परिणाम है कि पिछले तीन सालों में यूपी के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से निकले बाघों के द्वारा खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद तक दो दर्जन के आसपास मानव मारे जा चुके हैं। इसमें दो बाघों को गोली मारी गयी। जबकि एक बाघ को पकड़कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेजा जा चुका है। इसके अतिरिक्त उत्तरांचल में भी जंगल से बाहर आकर मानवभक्षी बनने वाले दो बाघों को बीते एक पखवारे में गोली मारी जा चुकी है। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो, उसमें से बाहर निकले बाध चारों तरफ अपना आतंक फैलाए हैं और वेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाध और मानव के बीच संधर्ष क्यो बढ़ रहा है? और बाध जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है।

वैसे भी पूरे विश्व में वैसे भी बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय बन क्षेत्र के बाहर आने वाले बाघों को गोली का निशाना बनाया जाता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जव भारत की घरा से बाघ विलुप्त हो जाएगें।

उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व परिक्षेत्र में शामिल किशनपुर वनपशु विहार, पीलीभीत और शाहजहांपुर के जंगल आपस में सटे हैं। गांवों की बस्तियां और कृषि भूमि जंगल के समीप हैं। इसी प्रकार दुधवा नेशनल पार्क तथा कतरनिया वन्यजीव प्रभाग का वनक्षेत्र भारत-नेपाल की  अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटा है साथ ही आसपास जंगल के किनारे तमाम गांव वसे हैं। जिससे सीमा पर नेपाली नागरिको के साथ ही भारतीय क्षेत्र में मानव आबादी का दबाव जंगलों पर बढ़ता ही जा रहा है। इसके चलते विभिन्न परितंत्रों के बीच एक ऐसा त्रिकोण बनता है जहां ग्रामवासियों और वनपशुओं को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जाना ही है। भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बनने वाला त्रिकोण परिक्षेत्र दुर्घटना जोन बन जाता है। सन् 2007 में किशनुपर परिक्षेत्र में आबाद गावों में आधा दर्जन मानव हत्याएं करने वाली बाघिन को मृत्यु दण्ड देकर गोली मार दी गयी थी। इसके बाद नवंबर 2008 में पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ खीरी, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी होते हुए सूबे की राजधानी लखनऊ की सीमा तक पहुंच गया था। इस दौरान बाघ द्वारा एक दर्जन ग्रामीणों का शिकार किया गया। बाद में इस आतंकी बाघ को नरभक्षी घोषित करके फैजाबाद के पास गोली मारकर मौत दे दी गयी थी।

सन् 2009 के माह जनवरी में किशनपुर एवं नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन के क्षेत्र में जंगल से बाहर आये बाघ ने चार मानव हत्याएं करने के साथ ही कई पालतू पशुओं का शिकार भी किया। इस पर हुई काफी मशक्कत के बाद बाघ को पिंजरें में कैद कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेज दिया गया था। सन् 2010 पीलीभीत के जंगल से निकले बाघ द्वारा खीरी, शाहजहांपुर में द्वारा आठ ग्रामीण मौत के घाट उतारे गए थे। इस पर वन विभाग ने प्रयास करके बाघ को पिंजरे में कैद करके लखनउ प्राणि उद्यान में भेज दिया था। उत्तर प्रदेश में ही नहीं वरन उत्तरांचल में भी बाघ जंगल से बाहर भाग रहे हैं। 2011 के माह जनवरी व फरवरी के वीते एक पखवारे के भीतर उत्तरांचल के जिम कार्वेट पार्क के ग्रामीण सीमाई क्षेत्रों में दो बाघों को मानवभक्षी घोषित करके गोली मारी जा चुकी है। इसके अतिरिक्त चीन में बाघ के अंगों की बढती मांग के कारण पैसों के लालच में भी भारत के वनक्षेत्रों में बाघों का अवैध शिकार किया जा रहा है। अवैध शिकार के कारण ही राजस्थान के सारिस्का नेशनल पार्क और मध्य प्रदेश के रणथम्भौर नेशनल पार्क से बाघ गायब हो चुके हैं। देश में संकटापन्न दशा से गुजर रहे बाघों की दुनिया को एक तरफ जहां शिकरी समेट रहे हैं वहीं दूसरी तरफ वनक्षेत्रों से बाहर आने वाले बाघों को आतंकी या मानवभक्षी घोषित करके मौत के घाट उतार देना न समस्या का समाधान है और न ही यह बाघों के हित में है।

जन्म से खूंखार होने के बाद भी विशेषज्ञों की राय में बाघ इंसान पर डर के कारण हमला नहीं करता यही कारण है कि वह इंसानों से दूर रहकर घने जंगलों में छुप कर रहता है। मानव पर हमला करने के लिए परिस्थितियां बिवश करती हैं। विश्वविख्यात बाघ विशेषज्ञ जिम कार्बेट का भी कहना था कि बाघ बूढ़ा होकर लाचार हो जाये अथवा जख्मी होने से उसके दांत, पंजा, नाखून टूट गये हो या फिर प्राकृतिक या मानवजनित उसके विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तभी बाघ मानव पर अटैक करता है। उनका यह भी मानना था कि जन्म से खंूखार होने के बाद भी बाघ मानव पर एक अदृश्य डर के कारण हमला नहीं करता और यह भी कोई जरूरी नहीं है कि नरभक्षी बाघ के बच्चे भी नरभक्षी हो जायें।

बाघ अथवा वन्यजीव जंगल से क्यों निकलते हैं इसके लिए प्राकृतिक एवं मानवजनित कई कारण हैं। इनमें छोटे-मोटे स्वार्थो के कारण न केवल जंगल काटे गए बल्कि जंगली जानवरों का भरपूर शिकार किया गया। आज भी नेशनल पार्क का आरक्षित वनक्षेत्र हो या संरक्षित जंगल हो उनमें लगातार अवैध शिकार जारी है। यही कारण है कि वन्यजीवों की तमाम प्रजातियां संकटापन्न होकर विलुप्त होने की कगार पर हैं। इस बात का अभी अंदेशा भर जताया जा सकता है कि इस इलाके में बाघों की संख्या बढ़ने पर उनके लिए भोजन का संकट आया हो। असमान्य व्यवहार आसपास के लोगों के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। मगर इससे भी बड़ा खतरा इस बात का है कि कहीं मनुष्यों और जंगली जानवर के बीच अपने को जिन्दा रखने के लिए खाने की जद्दोजेहाद नए सिरे से किसी परिस्थितिकीय असंतुलन को न पैदा कर दे। जब तक भरपूर मात्रा में जंगल रहे तब तक वन्यजीव गांव या शहर की ओर रूख नहीं करते थे। लेकिन मनुष्य ने जब उनके ठिकानों पर हमला बोल दिया तो वे मजबूर होकर इधर-उधर भटकने को मजबूर हो गए हैं। इधर प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर  चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारिययों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए। परिणाम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आते हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे-पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में गन्ने के खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। इसको रोकने के लिए अब जरूरी हो गया है कि वन्यजीवोंके अवैध शिकार पर सख्ती से रोक लगाई जाये तथा चारागाहों को पुराना स्वरूप दिया जाए ताकि वन्यजीव चारे के लिए जंगल के बाहर न आयें। इसके अतिरिक्त बाघों के प्राकृतिक वासस्थलों में मानव की बढ़ती घुसपैठ को रोका जाये साथ ही ऐसे भी कारगर प्रयास किये जायें जिससे मानव एवं वन्यजीव एक दूसरे को प्रभावित किये बिना रह सकें। ऐसा न किए जाने की स्थिति में परिणाम घातक ही निकलते रहेंगे, जिसमें मानव की अपेक्षा सर्वाधिक नुकसान बाघों के हिस्से में ही आएगा।


 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वन्य-जीव सरंक्षण पर लेखन, अमर उजाला में कई वर्षों तक पत्रकारिता, मौजूदा वक्त में एक प्रतिष्ठित अखबार में पत्रकारिता, आप पलिया से ब्लैक टाइगर नाम का अखबार भी निकाल रहे हैं, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। )

लखीमपुर खीरी में गुलदार की खाल बरामद

दुधवा लाइव डेस्क (लखीमपुर-खीरी) लखीमपुर शहर के मेला मैदान स्थित लकड़ी मण्डी में एक तेन्दुए (गुलदार)/Leopard की खाल बरामद हुई, विशेषज्ञों द्वारा यह बताया जा रहा है, कि यह खाल लगभग एक महीने पुरानी है। फ़िलहाल खीरी वन-विभाग ने उस लकड़ी व्यवसाई को हिरासत में ले लिया है, जिसकी दुकान के नज़दीक यह खाल बरामद हुई।

खीरी जनपद में तेन्दुओं की घटती सख्या, के बावजूद इस तरह की मुसलसल शिकार की घटनायें  कहीं तराई में इस प्रजाति के विलुप्ति का कारण न बन जाए।



दुधवा नेशनल पार्क का एक यात्रा संस्मरण

 भारतीय बाघ: फ़ोटो ©सतपाल सिंह
दुधवा नेशनल पार्क में वो खुशनुमा पल 
दुधवा में बाघों की तादाद बढ़ी
तराई के घनों जंगलों में भी खूब दर्शन दे रहे हैं वनराज

 दुधवा नेशनल पार्क के जनक बिली अर्जुन सिंह जिनको शायद कौन नही जानता ? कुछ दिन पहले ही मैंने उनके बारे में पढ़ा तो ऐसा लगा कि बिली अर्जुन सिंह जिन्होने अपना सारा जीवन वन व वन्य जीवों के संरक्षण में समर्पित कर दिया। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिला के जंगल के एक हिस्से को संरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिलाने का कार्य बिली अर्जुन सिंह ने किया जिसे आज दुनिया दुधवा नेशनल पार्क के नाम से जानती है। ऐसी महान शख्सियत के बारे में पढ़कर आज मैं बहुत प्रभावित हुआ। बिली और जंगल के बारे में पढ़कर मुझे भी जंगल में जाने की रूचि हुई.. ।
दुधवा जंगल: फ़ोटो ©सतपाल सिंह

दुधवा जंगल की यात्रा का प्रस्ताव मिला तो बिली अर्जुन सिंह और उनके इस जंगल को देखने का मैने निश्चय किया। हमने शाम को पूरी तैयारी कर ली क्योंकि अगली सुबह जल्दी हमें निकलना था। हम चार दोस्त सतपाल सिह,रमाकान्त कुशवाहा , हरमनदीप सिंह और मैं । हम मोहम्मदी से अपनी गाड़ी  से सुबह के ३.३० बजे निकले। मैने  गाड़ी को ठीक तीन घण्टे बाद ६.३० बजे दुधवा नेशनल पार्क में पहुंचा दिया। ठंड बहुत थी और सर्द हवा की वो ठन्डी सुबह ने हमको हिला दिया था। जल्दी से सतपाल (जो वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर है  सौभाग्य से हमारे साथ था।) ने  हमे चलने के लिए कहा। हम उस समय कैंटीन में बैठे चाय का आर्डर देने वाले थे, कि सतपाल ने हमें तुरन्त चलने के लिए कहा पर हमने कहा पहले चाय पी लेते हैं, लेकिन सतपाल ने हमें चाय आकर पीने की सलाह दी उसने हमें बताया कि अगर चाय अभी पियगे तो शायद कुछ छूट सकता है। उसकी वह बात मुझे उस समय समझ में नही आयी पर जब हमारी गाड़ी  जंगल के लिए निकली  कुछ ही समय बीता बीता था कि हमें जंगल में टाइगर से साक्षात्कार हो गया, ऐसा हमने सोचा न था कि इतनी जल्दी १० मिनट के अन्दर टाइगर के दर्शन हो जायेंगे। हमारी गाड़ी रूट नं० १ पर चल रही थी और गाइड  हमें जंगल के बारे में कुछ पुरानी बाते बता रहा था, कि अचानक उसने हमें एक तरफ इशारा करके गाड़ी धीमी करने के लिए कहा, हमने देखा कि एक टाइगर  रोड क्रास करने जा रहा था, वह हमारी गाड़ी देखकर झाड़ी के पास बैठ गया। हम थोड़ा और करीब गये यह नजारा मेरे के लिए नया था। जिस्म में ठण्ड का अहसास कम होने लगा था। इतना रोचक और हैरतगंज नजारा पहले कभी नही देखा था। मुझे तो यकीन नही हो रहा था कि जंगल का शेर हमारे सामने बैठा है। फिर क्या था सतपाल ने अपने कैमरे से कई अदभुत दृष्य कैमरे में उतार लिये। कुछ क्षण बाद दूसरी गाड़ी आती देख टाइगर हमारी आंखो से ओझल हो गया। दूसरी गाड़ी में सवार पर्यटक हमसे पूछने लगे कि क्या था। हमने उन्हें बताया कि टाइगर था। यह सुनकर वह सब बगैर देखे ही खुश हो गये क्योंकि जंगल में लोग सबसे ज्यादा टाइगर को ही देखने आते है। ऐसा मेरा मानना था। हमने दोबारा गाड़ी को रूट नं० १ पर दौड़ा दिया। उस दिन  मैंने बहुत से वन जीव देखे जैसे स्पाटेड डियर  झुण्ड, दलदली (स्वाम्प डियर) हिरन बहुत से नये पक्षी और मगरमच्छ को भी देखा।  फ़िर हम सब वापस आकर कैंटीन में बातें कर रहे थे।
चीतल: फ़ोटो ©सतपाल सिंह
  हमें पता लगा कि आज की सुबह में दुधवा में सिर्फ हम लोगों को ही टाइगर के दर्शन हुए हैं।  कैंटीन में बैठे दूसरे पर्यटकों ने हमसे पूछा कि हमें टाइगर के दर्शन कैसे और कब हुए। हमनें उन्हें वह सारा वाकया बताया। यह सब सुनकर उनकी आंखो में चमक थी।  
...शाम के वक्त सुबह के अपेक्षा ज्यादा पर्यटक थे हम सब जंगल में सलूकापुर , सोनारीपुर, बाकेंताल और एस०डी० सिंह रोड घूमें। शाम को हम कुछ ज्यादा नही देख सके पर हमने कोशिश बहुत की कि हम दोबारा टाइगर को देखे पर शाम के वक्त की गाड़ियों का शोर अधिक होने के कारण शायद हम कामयाब नही हो सके। हम शाम को फ़िर दुधवा कैंपस  आ गये। हमने पता लगाया कि शायद किसी और पर्यटक को टाइगर दिखा हो पर ऐसा नही था। मैं बहुत खुश था, क्योंकि उस दिन सिर्फ हम लोग ही लकी पर्सन थे, जिन्हें टाइगर के दर्शन हुए। जंगल में एक दिन कैसे कट गया पता ही नही चला। ना घर की याद आयी न  अपने व्यवसाय की। शाम के ६.३० बज चुके था।  वह रात बहुत सर्द थी पर हमें टाइगर का गर्म कर देने वाला  नज़ारा याद था। 
फ़ोटो © सतपाल सिंह

 दुधवा में दूसरा दिन

गैंण्डा: फ़ोटो © सतपाल सिंह

 आज हम सब हाथी पर बैठकर गैण्डे को देखने के लिए निकले, कुछ समय बीतने के बाद हम आपस में कल की बाते कर ही रहे थे, कि हमें महावत जगरूप ने चुप होने के लिए कहा और एक तरफ इशारा किया और धीरे से कहा वह देखो टाइगर बैठे है। कानों में टाइगर नाम की आवाज सुनकर ही कान खड़े हो गये,नजारा ही ऐसा था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नही कर सकता था एक नही दो टाइगर हमारे ठीक सामने करीब ५० से ५५ फ़ीट की दूरी पर बैठे थे। सतपाल ने फोटो खींचना शुरु किया। हमने महावत को टाइगर के और करीब हाथी ले जाने को कहा जहां दोनो टाइगर बैठे थे। अब हम उनसे २० से २५ फ़ीट की दूरी पर थे। 

काफ़ी तस्वीरें खिंच जाने के बाद, अब हमें महावत ने वहां से चलने के लिए कहा क्योंकि यह अदभुत दृष्य दूसरे पर्यटको को भी देखने को मिले। हम वापस आगे बढ़े ही थे की हमें कुछ पर्यटक  मिले हमनें उन्हें बताया कि हमें वहां टाइगर देखने को मिले हैं। उन्होंने हमें साथ में चल के बताने के लिए कहा और हम तीनों हाथी लेकर एक बार फिर उसी जगह पर आ गये। ठीक उसी अवस्था में वह टाइगर अभी भी वहीं बैठे थे, मानो हमारा ही इंतजार कर रहे हों पर इस बार हमारे साथ दूसरें पर्यटक के बच्चे यह नजारा देखकर डर गये। वह सब आपस में बाते करने लगे। महावत ने उन्हें चुप होकर देखने के लिए कहा। थोड़ा शोर होने से अब टाइगर की नजर हम पर थी। तीनों हाथियों में से एक हथिनी टाइगर को देखकर उसकी ओर बडी और चिगाड़ने लगी इस पर टाइगर भी नाराज होकर जबाव में दहाड़ने लगा। हथिनी के साथ दूसरे हाथी भी टाइगर को देखकर चिंघाड़ने लगे। ऐसा दिल दहला देने वाले  दृष्य के कुछ हिस्से हमने कैमरे में कैद किये। जंगल में हाथी की चिगाड़ने और शेर के दहाड़ने से जंगल में आवाजें गूंज रही थी। दोनो टाइगर अब झाड़ियों के पीछे होते चले गये थे। आधे मिनट का यह दृष्य सच में दिल दहला देने वाला था। फिर हम सबने वहां से निकल जाने के बाद कुछ दूरी पर  गैण्डों को देखा। कुछ समय बाद हम सब  वापस आ गये। जंगल का दृष्य अदभुत था।  आज मैने सोचा की जंगल की लाइफ उन वन्य जीवों के लिए बहुत अच्छी है।  जिन्हें देखकर हम इंसान सुखद एहसास करते हैं।
फ़ोटो © सतपाल सिंह
आओं हम सब इन वन्य जीवों की रक्षा का संकल्प लें।
धन्यवाद!


हरभजन सिंह (लेखक पेशे से इलेक्ट्रानिक्स के व्यवसायी हैं, जिला खीरी के मोहम्मदी में निवास, वन्य जीवन के प्रति अभिरूचि, थियेटर व फ़िल्मों से जुड़ाव, बालीबुड़ में कई वर्षों का कार्यानुभव, इनसे मोबाइल 09580506763 पर सम्पर्क कर सकते हैं।  )

 (सभी चित्र  साभार सतपाल सिंह  वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र, इनसे satpalsinghwlcn@gmail.com पर सम्पर्क  कर सकते हैं )

Feb 9, 2011

यहाँ तो निगेहबान ही चोर निकले..!

©dudhwalive.com
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में काटे गये शाखू के पेड़...
अफ़सर और कर्मचारियों की मिलीभगत हुई उजागर
दुधवा के तीन फ़ारेस्ट गार्ड भेजे गये जेल
भारत-नेपाल सीमा से सटे दुधवा नेशनल पार्क के जंगल पर हमेशा नेपाली वल माफियाओं का ही दबाव बना रहत था। लेकिन जंगल से पेड़ कटवाने में पार्क कर्मचारियों की संलिप्तता उजागर होने के प्रथम दृष्टया सबूत मिलने पर पार्क की गौरीफंटा रेंज के वन फारेस्ट गार्डो को वन अधिनियम के साथ ही वाइल्ड लाइफ एक्ट के तहत जेल भेजा गया है।

जनकारी के अनुसार भारत-नेपाल सीमा से सटे दुधवा टाइगर रिजर्व की गौरीफंटा रेंज की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगे कीरतपुर बीट नंबर तीन के जंगल में साखू के पेड़ों का अवैध कटान किए जाने की सूचना पर दुधवा के डीडी संजय पाठक ने मौके का निरीक्षण करके जांच पड़ताल की। 

इस दौरान साखू पेड़ की लकड़ी के आठ लट्ठा बरामद हुए। इसके बाद की गईछानबीन एवं पूछताछ के दौरान प्रथम दृष्टया मामला सही पाया गया, जिसपर गौरीफंटा रेंज में तैनात फारेस्ट गार्ड रामदास, राकेश कुमार, राम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया था। अवैध कटान के संगीन मामले में पार्क अधिकारियों की संलिप्तता उजागर होने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सीमा पर अवैध कटान निर्वाध गति से जारी है। 

हालांकि डीडी ने संबंधित रेंजर को दफ्तर में जमकर फटकार लगाई और चेतावनी भी दी है। बताया गया कि गिरफ्तार हुए तीनों फारेस्ट गार्डो को वन अधिनियम तथा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में अभियोग पंजीकृत करके जेल भेज दिया गया है। बरामद लकड़ी की अनुमानित कीमत लगभग एक लाख रूपए बताई गई है।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (पलिया-खीरी)

Feb 8, 2011

इनके नसीब में एक इंडिया मार्का हैंड पम्प भी नही !

सड़क बिजली छोडि़ए, सरकारी नल भी नही है मयस्सर
-टांगिया गांव तक नही पहुंचती योजनाएं


टांगिया-बिजुआ। हर गांव तक सड़क और हर घर को बिजली। शासन के यह दावे यहां फेल हैं, टांगिया गांव में न तो सड़क पह़ुंची है, और न ही बिजली की रोशनी। शासन की योजनाएं इनके दरवाजे से पहले दम तोड़ देतीं है। टांगिया में ईंट सीमेंट के मकान बनाने की इजाजत महकमा नही देता, इसलिए भगवान को भी खुले आसमान के नीचे ठिकाना मिला है।





खीरी के बेशकीमती जंगलो को आबाद करने वाले टांगिया समुदाय के लिए सरकारी योजनाएं किसी ख्वाब से कम नही, जिस समुदाय को अपने वुजूद के लिए अदालती लड़ाई लडऩी पड़े उसके हालात के अंदाजा लगाना सहज ही है। गांव की आबादी पल्हनापुर ग्रामसभा में महज वोटों की खातिर दर्ज है। जंगल के अन्दर बसे होने से इस गांव पर वन विभाग की पाबन्दियां लागू है। गांव तक पहुंचने के लिए  खड़ंजा भी नही लगाया जा सकता। बिजली की लाइन तो गांव के लिए महज खवाब से ज्यादा कुछ नही। मोबाइल चार्ज करने के लिए भी ६ किमी रोज जाना होता है। सरकारी योजनाओं में सबसे सहज उपलब्ध होने वाला एक भी सरकारी हैण्ड पम्प तक पूरे गांव में नही हैं।






भगवान भी कर रहे ठिकाने का इन्तजार
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 गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन के बावजूद पक्के आवास नही बन सकते। यहां इन्सान तो क्या भगवान को भी पक्की छत का ठिकाना नसीब नही होता । एक भारी भरकम बरगद के पेंड़ के नीचे खुले में रखी भगवान शंकर की मूरत भी इन वन टांगियों के साथ मौसम के तेवर बर्दाश्त करती है।




डनलप है चौपहिया वाहन, बाइक बनती है एम्बुलेन्स
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इस गांव में लगभग १२ डनलप है, वही इनके चौपहिया वाहन हैं, अगर गाहे-बगाहे रात को बाहर जाने की जरूरत पड़ जाये तो इस डनलप से ही जंगल से बाहर आते है।इ गांव में तीन बाइक हैं, वही इनके लिए एम्बुलेन्स का काम करती है, अगर कोई अचानक बीमार पड़ जाये तो अस्पताल तक पहुचानें के लिए बाइक का ही सहारा है, वजह है कि जंगल के भीतर गांव बसे होने से जीप-कार तो क्या ट्रैक्टर तक ले जाने पर पाबन्दी है।





अब्दुल सलीम खान (लेखक युवा पत्रकार है, वन्य-जीवन के सरंक्षण में विशेष अभिरूचि, जमीनी मसायल पर तीक्ष्ण लेखन, खीरी जनपद के गुलरिया (बिजुआ) गाँव में निवास, इनसे salimreporter.lmp@)gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Feb 6, 2011

बुन्देलखण्ड का आदिवासी और उसकी बदहाली पर एक खुला चिठ्ठा

चार सौ दलित आदिवासियो की बदहाली एवं पलायन 

"क्या वें अब जंगल और जंगल जीवों के मध्य समन्वय स्थापित कर सकते हैं ? "क्या बाघ की तरह उन्हे पिछले कई शताब्दियों से उनके घरों को उजाड़ा नही जा रहा है, ...अब बाघ के रिहैबलीटेन, उसके हक की लड़ाई के साथ साथ आदिवासियों का रिहैबलीटेशन, हक, अधिकार आदि की बात करते ये लोग आखिर ये क्यों नही समझते कि हमने ही उन्हे और उनके  बुनियादी  जरूरतो, आवासों को बरबाद किया है शनै: शनै:...... कहाँ गये वो जंगल-जंगलियां जो हमारा पोषण करते थे, हमें आसरा देते थे, आदिवासी अब एक मसला बन चुका है, आदिवासियों की इस कथित संघर्ष-गाथा ने तमाम समाजसेवियों की खेप पैदा कर दी, सरकारों और आदिवासियों की मध्य की यह लड़ाई लड़ रहे है कुछ मझौले...जिन्हे नही पता असल मामला क्या है, इन्हे पांच सितारा होटल नही चाहिए और न ही मेट्रों, ये न तो दिल्ली की बाजारों में बोझा ढों सकते है, और न ही शहरी कचरों का कचरा बीन सकते है, इन्हे राशन की दुकानों की लाइन भी बेमानी लगेगी...इन्हे चाहिए आसमानी छत, हरियाली का बिछौना, कन्द-मूल-फ़ल और वह सब जो इन्हे आज तक जंगलों में रखता आया...इन्हे प्लांटेशन नही असल जंगल चाहिए जो इनकी जरूरत पूरी कर सकते थे..क्या हम इन्हे इनका बुनियादी हक दे सकते है, इस मसले पर हमें एक विवरण भेजा है बुन्देलखण्ड से प्रवास संस्था के प्रमुख आशीष दीक्षित सागर ने.....संपादक  दुधवा लाइव"

विगत 24.03.10 को स्वयं सेवी संगठन प्रवास सोसाइटी व बुंदेलखंड गण परिषद का समूह नरैनी विधान सभा क्षेत्र के अंर्तगत समाहित ग्राम पंचायत कुरहूं, डढवामानपुर के ग्राम (गोबरी, आलमगंज, चौधरी का पुरवा, करमाडाढी, कालीडाढी, बजरंगपुर, गुबरामपुर, ऊधौ का पुरवा आदि) में अध्ययन, सर्वेक्षण हेतु गया था । एक ओर जहां राज्य व केन्द्र सरकारों के मार्फत विकास नीति, योजनाओं का बखान आकडों  में दर्ज किया जा रहा है साथ ही समाज के कमजोर, दलित व उपेक्षित वर्गो का सर्वजन हित ही आम नागरिक को जन चर्चाओं में बताया जाता है वहीं दूसरा पहलू यह है कि बुंदेलखंड में लोकतंत्र की सीधी भ्रूण हत्या नरैनी विकास खंड के बीहडों मे बसे आदिवासी परिवारो के बीच हो रही है। इनका परिदृष्य, गांव की पगडंडी, तंगहाली की एक-एक मार्मिक पीड़ा और संवेदना अंतिम पंक्ति में जीवन यापन कर रहे है इन कुनबों के बीच सहज ही देखी जा सकती है।
    विचारणीय बिंदु यह है कि अनुसूचित जनजाति के लिये सरकार ने बहुउपयोगी , समाज कल्याणकारी विचारशील आख्या के साथ कार्यक्रम चलाये है एवं नरैनी चित्रकूट क्षेत्र में तमाम स्वयं सेवी संगठन सरकारी , विदेशी सहयोग से परियोजनाये संचालित कर रहे है लेकिन पिछले 62 सालों में उनका ध्यान इन सर्वहारा आदिवासी परिवारों के समुचित विकास की तरफ क्यों नही गया एक प्रश्न चिंह है ? क्या हम सिर्फ शहर, ग्राम कस्बों की चौपालो मे संगोष्ठीयां और वर्कशाप करने के बाद अपना कर्तव्य बोध भूल जाते है, यह भी सोचने की आवश्यकता है। आज भी इन परिवारों के बच्चे-बच्चियां बुनयादी तालीम , मिड-डे मील , सर्वशिक्षा अभियान, संपूर्ण स्वच्छता अभियान एवं समेकित बाल विकास परियोजना जैसी मूल भूत विकास कार्यक्रमों से अछूते है तथा इनके बडे बुजुर्ग भी विधवा, वृद्धा पेंषन से वंचित है। इन गांवों की महिलाओं को आज तक जननी सुरक्षा योजना, आंगनबाडी केन्दो का लाभ नही मिला है यथा स्थिति के मुताबिक गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले परिवारो के पास लाल कार्ड भी नही है। उदाहरण स्वरूप ग्राम गोबरी डढवामानपुर के निवासी जो कि मवेसी आदिवाशी है उनमें से महिला सुन्दी, तिरसिया, राजाबाई (विधवा), फूलकली, बीटोल, फूलरानी, बूटी, प्रेमा, चंन्द्रकली , सुंधी , केसिया, संती, मुन्नी , लक्ष्मनिया, चुनिया, केषकली , कल्ली एवं पुरूष वर्ग में सुराज, हीरालाल, चैतराम, रामगरीब, बुंधी, संतोष , छोटे लाल, राजा, मुस्तरीक, के स्पष्ट बयान है, कि आसपास की बस्ती के 16 परिवारो और 4 मजरों के 400 परिवारो में पिछले कई वर्षों के बाद भी सरकारी स्कीमें उनका विकास नही कर सकी ।



इनके बीच से मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना भी धराशाही है, उनका कहना है कि पूरे गांव में मात्र दो लोगो के पास ही जाब कार्ड है। जाब कार्ड धारक संतोष ने बताया कि पिछले एक वर्ष पूर्व उसने फतेहगंज जाकर 5 खंती (गडढे) खुदाई की थी जिसकी मजदूरी 500 रू0 होती है लेकिन ग्राम पंचायत के प्रधान कल्लू कोरी ने मजदूरी निकालने के बाद जाब कार्ड में कई दिवस के कार्यो के साथ चढा दी मगर उसे मजदूरी नही दी। इस गांव में प्राथमिक विद्यालय तो है लेकिन उसमे पढाने वाले अध्यापक बच्चों की मिड-डे मील योजना के साथ गायब है। गांव की किसी भी महिला को प्रसव कराने के लिये प्रशिक्षित दाई या आंगनबाडी केन्द्रो की सहायता उपलब्ध नही हुयी ये आज भी परंपरागत तरीके से अपनी बस्ती की बुजुर्ग दाई से प्रसव कराती है। गांव में बीहड़ से होकर निकलने वाली जर्जर सडके जल जमीन जंगल से उपेक्षित भयावह भूख की चितकारे बच्चो के चेहरों में और उनके शरीर पर कुपोषण की रेखायें खीच देती है। 

0 से 10 वर्ष का प्रत्येक बच्चा स्कर्वी रोग,एनिमिया से पीडित है। शायद ही कोई महिला ऐसी नजर आये जिसके शरीर में पूरे कपडे हो।

बुजुर्गो की धंसी हुयी आंखे, दस्युओं का रौब , दबंग वर्दी का खौफ एवं वन विभाग कर्मियों की बदनियत निगाहे उनके कपड़ो में हुये छेद के उस पार निकल जाती हैं । पूरी बस्ती में एक मात्र  सरकारी हैंड पंप है जो बिगड जाने के बाद फिर कब बनेगा यह कोई नही जानता। आस पास के मजरो में बसे हुये परिवार चारो तरफ से घिरी हुयी पहाड़ी को पार करने के बाद म0प्र0 के इलाके में एक पोखर से पानी भरने जाते है वह भी जनवरी माह तक भरी रहती है शेष दिनों में वे और उनके मवेशी जो आये दिन जंगली जानवरो, अफसरों, दस्युओं की दावत का जरिया है पानी की वीभत्स गर्जना से आहत होते है। पूरी बस्ती में सर्वाधिक पढा लिखा 27 वर्ष का बेकार युवा रामगरीब है जो कक्षा 6 पास है।

 गांव के बुजुर्ग व्यक्ति और महिलाओं विधवा राजाबाई, सुन्दी, सुराज, तिरसिया बडे बेबाक शब्दो मे कहते है कि साहब बदमास आवत है तौ खाना मांगत है, हम का करी।

 पुलिस आवत है और कहत है कि लाऊ तुम्हार जन्म कुंडली बना दे, जलाऊ लकडी बेचत है तौ वन दरोगा और सिपाही उल्टा सीध बात करत है।

जिस दिन ये भूखे परिवार जंगल से लकडियां काटकर फतेहगंज, बदौसा, अतर्रा में लकडियां न बेचे तो इनके घरों का चूल्हा नही जलता, उनकी राख बडी खामोशी से मिट्टी के फटे हाल चूल्हे में भूख से सो जाती है और बच्चों को तम्बाकू रगड़ कर सिर्फ इस लिये चुसा दी जाती है ताकि वो खाना न मागें और सो जाये।

 प्राचीन मन्दिर
विशेषत: गोबरी ग्राम के बाहरी हिस्से में ही 10वी 12वी शताब्दी का अति प्राचीन राष्ट्रीय महत्व प्राप्त बौद्ध स्पूत मंदिर (गर्भ गृह) भी है जिसका बाहय आवरण, मंदिर की मूर्तिया पूरी तरह खजुराहो, सूर्य मंदिर के समकालीन प्रतीत होती है मुख्य द्वार पर लगा हुआ जीर्ण शीर्ण सरकारी बोर्ड पुरातत्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958 (24वा एक्ट) इसे अंतर्राष्ट्रीय स्मारक घोषित करता है किंतु मंदिर की खंडित मूर्तियां वर्तमान  में डकैतो के छिपने की पनाह है। वन विभाग, जिला प्रशासन, पुरातत्व विभाग पूरी तरह से इस अवस्था का जिम्मेवार है और इन आदिवासी परिवारों के साथ ऐतिहासिक मंदिर की संस्कृति को भी संरक्षण प्रदान हो ताकि पलायन होते परिवार, खत्म होते जंगल और पानी को अवषेष होने से बचाया जा सके, इस बौद्ध मंदिर को पर्यटन स्थल में परिवर्तित किया जाये।

बड़ी बात नही कि समाजिक तिरस्कार, भुखमरी से जूझते यह परिवार निकट भविष्य मे झारखंड, उडीसा में उपजी नक्सलवाद की समस्या से ग्रसित होने के लिये बाध्य न हो।

आशीष दीक्षित "सागर" (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं) 

यहाँ कैसे हासिल हों इन्हें तालीम का कानूनी हक ?


यहां कैसा लागू हो शिक्षा का कानूनी अधिकार!
- टांगिया गांव में न स्कूल है, न टीचर
- दिन फसलो को बचाने में गुजारते हैं बच्चे अपना वक्त

टांगिया-बिजुआ। दुधवा के संस्थापक विली अर्जन सिंह ने जंगल के बाघो के बचाने के बाबत कहा करते थे कि बाघ अगर वोट देते तो उनकी भी सुनी जाती। लेकिन टांगिया समुदाय के लोग इन्सान है, और वोट भी देते हैं , फिर क्यों खामोश है इनकी आवाज। ६० के दशक में जब टांगिया खीरी लाये गये तो वह निरक्षर थे, तब से इनकी एक पीढ़ी गुजर गयी, अगर कुछ युवाओं को छोड़ दें तो दूसरी पीढ़ी अशिक्षा का कलंक लिए जिन्दा है, अब तीसरी पीढ़ी भी तैयार हो रही है, लेकिन शिक्षा उनके लिए जरूरी नही बन सकी। ये हालात तब हैं जब देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो चुका हो। लेकिन टांगिया गांव के  लिए ये अधिनियम सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गये हैं। इस गांव में ६-१४ वर्ष के ८० बच्चे हैं, जिन्हें आज भी किसी अध्यापक का इन्तजार है। जंगल के भीतर स्कूल बनाने में वन महकमा अडग़ां है। शिक्षा विभाग ने अनौपाचारिक केन्द्र के जरिए इन बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था, लेकिन अब केन्द्र भी ठप है। ऐसे में इन बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिया जाना वाकई बड़ा सवाल बन गया है। 


पल्हनापुर वन टांगिया गांव के बच्चों के लिए स्कूल और किताबें किसी ख्वाब के माफिक  है। ६-१४ वर्ष के लगभग ८० बच्चे शिक्षा अधिनियम के तहत शिक्षित होने के हकदार हैं। टांगिया गांव से ६ किमी दूर पल्हनापुर के प्राथमिक विद्यालय में कुछ बच्चों के नाम जरूर पंजीकृत हैं। लेकिन ६ वर्ष के इन नौनिहालों के लिए ६ किमी जंगल का सफर तय करना आसान नहीं है। लेकिन फिर भी कुछ बड़े बच्चे जान जोखिम में डाल स्कूल का सफर तय करते हैं।
टांगिया विकास समिति के अध्यक्ष रामचंद्र बताते हैं कि वन महकमे ने वर्षो पहले गांव के बच्चों को शिक्षित करने के लिए एक केन्द्र खोला था। जिसे बाद में बंद कर दिया गया। वहीं हाल ही में शिक्षा विभाग की तरफ से चलाया जा रहा अनौपचारिक केन्द्र भी बंद है। 



खेतो की रखवाली में कटता है बच्चों का वक्त
जब उम्र पढ़ाई की है, तब इन्हे स्कूल नही नसीब है, इस गांव के बच्चों का दिन स्कूल के बजाय अपने खेतों की रखवाली में जाता है, गांव खेत सब जंगल में है, इसलिए खेतो में बंदरो का जमावड़ा रहता है, ये मासूम सवेरे से शाम खेतो में पड़ी फूस की झोपडिय़ों में गुजारते हैं।


पूरे कुनबे में नही हुआ कोई ग्रेजुएट
इसे विडम्बना नही तो और क्या कहेंगे ,टांगिया बिरादरी के ४०७ लोगों के इस कुनबे में कोई स्नातक नहीं है। गांव के तीन लोग प्राइवेट तौर पर स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं।


अब्दुल सलीम खान (लेखक युवा पत्रकार है, वन्य-जीवन के सरंक्षण में विशेष अभिरूचि, जमीनी मसायल पर तीक्ष्ण लेखन, खीरी जनपद के गुलरिया गाँव में निवास, इनसे salimreporter.lmp@)gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Feb 5, 2011

बुन्देलण्ड में काले हिरणों पर मड़राता काला साया



 बुन्देलखण्ड में तबाह किए जा रहे जंगलों व नदियों से नष्ट होती जैव-विविधता 
...आंकड़ों के खेल में सरकारें बनी तमाशबीन ....
  बांदा, हमीरपुर व चित्रकूट जनपदों में ही बचे है काले हिरन-


 "काले हिरन यानी ब्लैक बक (Antilope cervicapra) शिकार के चलते विलुप्ति की कगार पर है, प्रवास संस्था के निदेशक आशीष दीक्षित "सागर" द्वारा एक पहल जिसमें ब्लैक बक की मौजूदा संख्या, उसके हालात जिनमें यह प्रजाति अपने को जवित रखने के लिए संघर्षरत है, का अध्ययन किया गया, बांदा जनपद, तहसील तिनवारी के गाँव गुखरई में अप्रैल २०१० में आशीष दीक्षित द्वारा काले हिरनों के लगभग ३०-३५ की संख्या वाले पाँच झुण्ड देखे गये, तकरीबन १५० काले हिरन, जबकि सरकारी आंकड़े काले हिरन की वास्तविक संख्या से बहुत कम बता  रहे है। तिनवारी तहसील के पचनेही, लामा, बेंदाघाट व गुखरई गाँवों में अभी भी काले हिरनों की मौजूदगी है, किन्तु अन्धाधुंध शिकार के चलते, व इन्हे ग्रामीणों द्वारा पालतू बनायें जाने के कारण इनका प्रजनन प्रभावित हो रहा है, जो इसकी तादाद को कम करने में महत्वपूर्ण कारण हैं। फ़िलवक्त इन्हे कोई सरकारी इमदाद नही मिल रही है, बावजूद इसके कि ये वाइल्ड लाइफ़ एक्ट १९७२ के तहत संरक्षित प्रजाति के अन्तर्गत आते हैं।" .. इस खूबसूरत प्रजाति की कथा-व्यथा  पर प्रस्तुत है आशीष दीक्षित सागर की एक रिपोर्ट-
 
वैश्विक भूमण्डलीकरण व जलवायु परिवर्तन से मचा हुआ चौतरफा हल्ला कोपेनहैगन से लेकर बुन्देलखण्ड की सरजमीन तक आ पहुंचा लेकिन हाल फिलहाल दूर दूर तक इससे उबरने के आसार दिखाई नहीं पड़ते हैं। वो भी ऐसे हालात में जबकि बेतरतीब पहाड़ों का खनन व उनमें प्रवास करने वाले वन्य जीव जन्तुओं का विस्थापन और घटते हुए वन क्षेत्र से भूगर्भ जलस्तर एवं पर्यावरण अपनी यथा स्थिति से तबाही की एक नई इबारत की तरफ लगातार बढ़ता चला जा रहा है। जन सूचना अधिकार 2005 से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करें तो हालात बड़े नाजुक व संवेदनशील हैं, मगर क्या करें जब प्रशासन में बैठे बिचौलिये और सरकारें संवेदनहीन हो चुकी हैं, ऐसे में नक्कारखाने में ढोल पीटना खुद के सर फोड़ने जैसा है। गौरतलब है कि बुन्देलखण्ड के छः जनपदों में क्रमश: प्रभागीय वनाधिकारियों से जो तथ्य हासिल हुये हैं- वे पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग के लिये किस हद तक जिम्मेवार हैं, यह बानगी है इन आंकड़ों की पेशगी। 

जनपद बांदा-वन, पर्यावरण एंव जैव-विविधता- एक नज़र

    जनपद बांदा में ही कुल वन क्षेत्र 1.21 प्रतिशत शेष है जबकि राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार किसी भी भू-भाग में 33 प्रतिशत वन क्षेत्र अनिवार्य रखा गया है। वहीं यहां 1995 से लेकर 2009 तक कुल 17 व्यक्तियों को वन्य जीव हिंसा अधिनियम के तहत जीवों पर हत्या के लिये दण्डित किया गया है। इनमें से 6 अपराधियों पर औपचारिक अर्थदण्ड की कार्यवाही करते हुए 10 व्यक्तियों का मामला अभी भी माननीय न्यायालय में विचाराधीन है, और 1 व्यक्ति बतौर मुल्जिम 2009 से फरार है। यहां विलुप्त होने वाले जीवों में चील, गिद्द, गौरेया व तेंदुआ है, इसके साथ-साथ दुर्लभ प्रजाति के काले हिरन जो कि बुन्देलखण्ड के सातों जनपद में सिर्फ बांदा, हमीरपुर व चित्रकूट में ही पाये जाते हैं की संख्या जनपद बांदा  में 59 है। जनपद चित्रकूट में 21.8 प्रतिशत वन क्षेत्र है। यहां पायी जाने वाली अति महत्वपूर्ण वन औषधियां गुलमार, मरोड़फली, कोरैया, मुसली, वन प्याज, सालम पंजा, अर्जुन, हर्रा, बहेड़ा, आंवला और निर्गुड़ी हैं। वर्ष 2009 की गणना के मुताबिक यहां काले व अन्य हिरनों की कुल संख्या 1409 है। यहां का रानीपुर वन्य जीवन विहार 263.2283 वर्ग किमी0 के बीहड़ व जंगली परिक्षेत्र में फैला है जिसे कैमूर वन्य जीव प्रभाग मिर्जापुर की देखरेख में रखा गया है।



जनपद महोबा- वन, पर्यावरण एंव जैव-विविधता- एक नज़र

    जनपद महोबा में 5.45 प्रतिशत वन क्षेत्र है और यहां तेंदुआ, भेड़िया, बाज विलुप्त होने की कगार पर हैं। जनसूचना के अनुसार जनपद महोबा में काला हिरन नहीं पाया जाता है, तथा महत्वपूर्ण वन्य औषधियां सफेद मूसली, सतावर, ब्राम्ही, गुड़मार, हरसिंगार, पिपली यहां की मुख्य वन्य औषधि हैं जो कि अब विलुप्त होने की स्थिति में हैं। महोबा सहित पूरे बुन्देलखण्ड में वर्ष 2008-09 में विशेष वृक्षारोपण अभियान कार्यक्रम मनरेगा के तहत 10 करोड़ पौधे लगाये गये थे। इस जनपद के विभिन्न विभागों द्वारा 70.7 लाख पौध रोपण कार्य किया गया है। जिसमें कि 59.56 लाख पौध जीवित है। इस वृक्षारोपण में शीषम, कंजी, सिरस, चिलबिल, बांस, सागौन आदि के वृक्ष रोपित किये गये हैं। इसके साथ ही जनपद झांसी में 70.50 लाख का लक्ष्य रखा गया था। जिसके सापेक्ष 71.61 लाख वृक्षारोपण किया गया और वर्तमान में 65.744 लाख पौध जीवित है जो कि कुल पौधरोपण का 91.81 प्रतिशत है। ऐसा प्रभागीय वनाधिकारी डॉ0 आर0के0 सिंह का कहना है, कि महत्वपूर्ण तथ्य यह है, कि बुन्देलखण्ड के अधिकतर जनपदों ने इस तथ्य को छुपाया है कि उनके यहां कितने प्रतिशत पौधरोपण हुआ और कितना जीवित है। यह पूर्णतः सच है कि 10 करोड़ पौधे भी आकाल और पानी की लड़ाई लड़ने वाले बुन्देलखण्ड में जंगलो को आबाद नहीं कर सकी हैं। 

जनपद हमीरपुर- वन, पर्यावरण एंव जैव-विविधता- एक नज़र


जनपद हमीरपुर में कुल 3.6 प्रतिशत ही वन क्षेत्र शेष हैं यहां भालू, चिंकारा, चीतल, तेंदुआ, बाज, भेड़िया, गिद्ध जैसे वन्य जीव आज शिकारियों के कारण विलुप्त होने की कगार पर हैं। दुर्लभ प्रजाति का काला हिरन यहां के मौदहा कस्बे के कुनेहटा के जंगलों में ही पाया जाता है जिनकी संख्या सिर्फ 56 रह गयी है। जनपद जालौन में 5.6 प्रतिशत वन क्षेत्र है और यहां पर काले हिरन नहीं पाये जाते हैं। इस वन प्रभाग नें 1990 से लेकर 2010 तक वन्य जीव हिंसा में दण्डित किये गये सभी आरोपियों की अनुसूचि को जनसूचना में शायद इसलिये उजागर नहीं किया ताकि विलुप्त होते जंगल और जीवों की फेहरिस्त में अपराधियों का नाम दर्ज न हो। 

जनपद झांसी- वन, पर्यावरण एंव जैव-विविधता- एक नज़र 
प्राकृतिक स्रोतों का दोहन व पर्यावरण का प्रदूषण यहां फ़सलों को कर रहा है चौपट...


जनपद झांसी से मिली जानकारी के अनुसार कुल क्षेत्रफल 5024 वर्ग किमी0 है। अर्थात 502400 हेक्टेयर जिसका 33 प्रतिषत (165792) क्षेत्रफल 33420.385 हेक्टयेर अर्थात यहां पर कुल 6.66 प्रतिशत वन क्षेत्र शेष है इस प्रकार 26.34 प्रतिशत हेक्टेयर वन क्षेत्र शेष होना बाकी है। आंकड़ों की दौड़ कुछ भी बयान करती हो लेकिन यह एक जमीनी हकीकत है कि जनपद बांदा व महोबा के प्रभागीय वनाधिकारियों ने यह तो मान ही लिया है कि गिरते हुए जलस्तर, बढ़ते हुए तापमान, घटते हुए वन के साथ दुर्लभ प्रजाति के वन जीवों का विलुप्त होना और पहाड़ों के खनन से उनका विस्थापन पर्यावरण के लिये आसन्न भयावह स्थिति के सूचक हैं। हमारे वातावरण में विभिन्न औद्योगिक निर्माण इकाईयों, प्रदूषित जीवन शैली से बढ़ रहे उपकरण व वस्तुओं के प्रयोग से उत्पन्न होने वाला अपशिष्ट अवयवों के निरन्तर घुलने से पारिस्थिकीय तंत्र बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। ग्रीन हाउस गैसे का निरन्तर उत्सर्जन व तापमान में वृद्धि भविष्य में मानव रहित वन्य जीवन के अस्तित्व की कठिन समस्या के रूप में प्रकट होकर जलवायु परिवर्तन का एक मात्र कारण बनेगा प्रभागीय वन अधिकारी बांदा, नुरूल हुदा का मानना है कि प्राकृतिक छेड़छाड़ से बायोडायवरसिटी, (जैविक विविधता) असन्तुलित होकर मानव अस्मिता पर प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा कर देगी। इसका ताजा-तरीन उद्धरण है, कि इस वर्ष बुन्देलखण्ड के समस्त सातों जनपद में पिछली अधिक वर्षा के बाद भी खेतों में उपज के फलस्वरूप पैदा हुआ अनाज बीज की लागत के अनुरूप न होकर बहुत ही पतला और स्वादहीन है। एक दो नहीं ऐसे सैकड़ों किसान इस बात की गवाही देते नजर आते हैं कि कहीं न कहीं प्रकृति की बनावट से खिलवाड़ और वातावरण में मनुष्य का अधिक हस्तक्षेप आज उसकी ही असमाधानहीन समस्या का विकराल रूप ले चुका है। जिसके स्थायी समाधान ढूढ पाना सम्भवतः आने वाली पीढ़ी के लिये अतिष्योक्ति पूर्ण कार्य होगा।

‘‘जंगल को जिन्दा रहने दो, नदियों को कल कल बहने दो’’

आशीष दीक्षित "सागर" (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं) 
 

विविधा

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