डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.6, no.8, August 2016, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Aug 22, 2016

ये वृक्ष गाज़ा पट्टी हैं, जहाँ पक्षी हैं शरणार्थी...



जैव-विवधिता के इन अति संवेदनशील जगहों के प्रति कितने संवेदनशील हैं वन्य-जीव प्रेमी ?
इन्दौर रेलवे स्टेशन के बाहर पेड़ो पर सुबह और शाम चीलों तथा सुग्गों( तोता) का विशाल जमघट लगा होता है। इन्हे देखकर आप शायद किसी शरणार्थी शिविर के बारे में सोच सकते है। एक पेड़ पर इनकी संख्या,,घनत्व के लिहाज से गाजा पट्टी से तुलना करने पर विवश करता है।
मानवीय हलचल वाले क्षेत्र में इतनी संख्या में इन्हे देखना,,, आश्चर्य में डाल देता है। हो सकता है ज्यादातर पक्षी प्रेमी अंग्रेजो ने इस बात का ख्याल नही रखा होगा की,,आज जहाँ पटरी बिछाने जा रहे हैं,,,वो इनके इलाके हैं ।ये स्टेशन बनने तथा अन्य विकास से भविष्य में अपने ही इलाके में शरणार्थी बन सकते हैं।
ये सिर्फ पेड़ नही है,,,बल्कि एक शरणार्थी शिविर है,,,अगर गलती से कभी कट गए,,तो हम सोच नही सकते कितना दु:खद परिणाम,,इन परिंदो के साथ होगा। अवास विनाश( Habitat loss) का कितना व्यापक प्रभाव इन परिंदो के वंश पर पड़ेगा,,,हम कतई सोच नही सकते। विकास के नाम पर इन पेड़ो के कटाई के बाद विस्थापन का कितना मार इन पक्षियों को झेलना पड़ेगा,,,कल्पना करना मुश्किल है।
जंगल में ऊँचे पेड़ो पर अनेकों शिकारी पक्षी का नजर आना आम बात है। फाल्गुन में पलाश( टेशु/ ढाक) के पेड़ पर छोटे पक्षियों का मजमा आम बात है,,,इसी तरह सीमर के पेड़ पर फूल आने के बाद वह हर वर्ग के परिंदो के लिए क्लब बन जाता है। परन्तु स्टेशन के चिल्लम- पौं से दुर यह सामान्य लगता है।
ब्रज( मथुरा- आगरा एंव आस-पास) में भी इतने मोर किसी एक पेड़ या घर पर नजर नही आते हैं,,,जबकि वहाँ मोर घरेलू पक्षी के जैसा है। कौआ,,मैना से ज्यादा मोर नजर आता है।
इन पेड़ो का महत्व तो आखिरी उम्मीद,,,आवास के जैसा हो चला है। इन्हे तो अब विरासत वृक्ष ( Heritage tree) घोषित कर देना चाहिए,,इनके महत्व के कारण ।
अरावली में थोड़ा सा भी उत्खन्न होता है,,,कहीं कुदाल- फावड़ा चलता है तो दिल्ली- NCR के हरित सिपाही( पर्यावरण प्रेमी) तन जाते हैं,,, अखबारों में खबरें आने लगती है । हरित न्यायालय का डंडा भूमाफिया,,,ठेकेदारों,,,, निर्माणकर्ताओं पर चलने लगता है। जबकि वहाँ पक्षियों से भी छोटे जीवों ,,,कीटों,,,चूहों,,, तितलियों,,तथा अन्य सरीसृपों एंव झाड़ियों का वास्ता होता है। एक तरह के कार्बन सिंक एंव जैवविविधता हावी होता है।
इंदौर रेलवे प्रशासन को रेलवे के हरित अभियान के तहत या अपने दरियादिली के नाते इन वृक्षों के समीप ही,,उसी प्रजाती के नए वृक्ष लगा दें,,,ताकि भविष्य में इनकी बढती संख्या के बोझ को उठा सके। स्टेशन पर हरियाली भी बढेगा,,, मुसाफिरों के लिए भी भीषण गर्मी में आश्रय होगा,,, वैश्विक तापन के निवारण में भी एक छोटा कदम होगा।



आज जहाँ ये पेड़ है वहाँ न पटरी है,,न रेलवे भवन,,,बल्कि आस- पास छोटी गाड़ियाँ,,अाटो खड़े नजर आते हैं,,, इसलिए किसी विकास परियोजना को भी बाधित नही कर सकता है।
अब समय इंदौर के निवासियों के लिए है की वो इन नन्हें जीवों के लिए क्या कर सकते है। वर्षो से देखते होगें,,गुजर जाते होगें,, कुछ समय के लिए रोमांच, फिर अपनी राह। पक्षियों का कोई नागरिक समाज( Civil society) और दवाब समूह( Pressure Group) नही हो सकता जो पक्षीहित याचिका( जनहित याचिका) दायर करे या अदालत में अर्ज दाखिल करे,,और,,रेल प्रशासन को इस तरह संवेदनशील कर सके।
बिना आपके साकारात्मक दखल के बेहतर परिणाम का उम्मीद संभव नही है। पक्षियों के पास दाव पर लगाने के लिए कुछ भी नही है,,,सिवाय बेदखली है। इसी इंदौर रेलवे स्टेशन पर मध्य- प्रदेश शासन वन विभाग द्वार प्लेटफार्म न०-1पर मुसाफिरों से अपील किया गया है कि " वन प्राणियों की सुरक्षा करें और इनाम पाए" वहाँ गुप्त सूचना देने और उसके नाम की गोपनीयता तक का बात कहा गया है।
पेड़ जरूर नागरिक क्षेत्र( Civil area) में है,,,पर पक्षियों का क्या उड़कर जंगल के तरफ भी जा सकते हैं,,,वापस उसी पेड़ पर आशियाना। अगर यह पेड़ वन में होता और इनके जीवन को खतरा होता,,,,कोई माँस ,,चमड़ा या अन्य उद्देश्य के लिए पकड़ता तो क्या वन विभाग के अधिकारी नही कार्यवाई करते।
सलमान खान पर जिन चिंकारा के शिकार का आरोप है,,वो भी वन में नही बल्कि मानवीय रिहायशी क्षेत्र में रहते हैं। पर वे उन कानून में आते हैं,,जिनमें दंड का प्रावधान है।
वन जीव अधिनियम- 1972 के प्रावधान में भी,,तोता का उल्लेख है ,,चील तो बाहर होगा नही। शायद बहुत से लोग इस बात से अंजान होगें की भारत में तोता को भी घर में पाल नही सकते हैं,,पिंजरे में डाल नही सकते हैं,,,यह भी कानूनन अपराध है।
निश्चित रूप से यह क्षेत्राधिकार के अतिक्रमण का मामला लग सकता है । राज्य सरकार( वन विभाग) ,, केन्द्र सरकार( रेल मंत्रालय) के समन्वय और पर्यावरण प्रेमी के स्नेहक की भूमिका से शीघ्रता से इनके भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है।
ऐसा दृश्य मालवा में सिर्फ इंदौर का ही नही है,,बल्कि उज्जैन तथा कई अन्य जगहों, पर भी है। वास्तव में देश के कई रेलवे स्टेशनों पर हम इन स्थितिओं से दो चार होते हैं।
यह केवल संयोग है की,,,सारे फोटो इन्दौर रेलवे स्टेशन से जुड़े है। खाली दिमाग शैतान का होता है,,,अब मानना मुश्किल हो रहा है,,, क्योंकि सारे फोटो खाली समय में लिया गया है,,,रेल के इंतजार में ।
अब अगर इन पर हम कोई पहल न करें तो। जब जब पेड़ कटेगें,, स्टेशन के पास बैठे पक्षी यही गाते नजर आ सकते हैं।

परदेशिओं से न अँखियां मिलना,,,,परदेशिओं को है एक दिन जाना।
सच ही कहा है पंक्षी इनको ,,रात को ठहरे तो उड़ जाए दिन को

आज यहाँ तो कल वहाँ है ठिकाना ।

प्यार से अपने ये नही होते,,,ये पत्थर है,,ये नही रोते।

इनके लिए न आँसू बहाना।


गौतम कुमार सिंह "ललित विजय" ( लेखक दक्षिण एशिया के मसायल के शोधार्थी है, भूगोल, रसायन व् पत्रकारिता जैसे विषयों से गहरा नाता, वन्य जीवन का अध्ययन व् यायावरी  इनके प्रमुख शौक हैं, फिलवक्त भारतीय सिविल सर्विसेज की तैयारी, दिल्ली में निवास, इनसे gautam_chemistry@rediffmail.com पर संपर्क कर सकते हैं 

Aug 17, 2016

गोमती किनारे लगाए गए फलदार प्रजातियों के पौधे पवित्र भोज का किया गया आयोजन


वन्य जीवन के कल्याण के लिए पशुपतिनाथ का किया रुद्राभिषेक 
वन्य जीव सरंक्षण व् प्रकृति के सभी जीव जंतु व् वनस्पतियों के कल्याण के लिए की गयी पशुपतिनाथ की आराधना 


श्रावण मास के अंतिम पखवाड़े में आदिगंगा गोमती के किनारे स्थित जंगली नाथ स्थल में प्राचीन महाभारत कालीन शिवलिंग का रुद्राभिषेक हुआ, साथ ही संतों व दर्शनार्थियों को पवित्र भोज भी कराया गया, कार्यक्रम का आयोजन वन्यजीव विशेषग्य एवं दुधवा लाइव जर्नल के संस्थापक कृष्ण कुमार मिश्र ने किया, जिसमें जनपद के तमाम शिक्षक, पर्यावरण प्रेमियों ने हिस्सेदारी की. 

शिव अर्थात पशुपतिनाथ की पूजा का आशय यह रहा की जीवों का कल्याण हो, प्रकृति में मनुष्य ही नहीं बल्कि जंतु और वनस्पतियाँ सुरक्षित व् सरंक्षित हों, आदिदेव शिव पशुओं के देवता के रूप में सिंधुघाटी सभ्यता में पूजे जाते रहे है, इस आयोजन में पृथ्वी तत्व, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश इन पंचतत्वों से निर्मित सभी जीवात्माओं की शान्ति व् सरंक्षण की भावना से रूद्र भगवान् का रुद्राभिषेक किया गया, इसके उपरान्त दाता जी के गोमती किनारे स्थित साईं आश्रम में विभिन्न प्रजातियों के पौधे रोपें गए, जिनमें महुआ, अशोक, बेलपत्र, गोल्डमोहर व् अलमांडा जैसी पुष्पों वाले पौधे लगाए गए.




"कृष्ण कुमार मिश्र ने बताया की खीरी जनपद में गोमती के किनारे नष्ट हो चुकी भव्य नदी घाटी सभ्यता रही हैं, जिसके अन्वेषण की आवश्यकता है, इसके प्रमाण यहाँ अभी भी मौजूद है, साथ ही नदी के किनारे के जंगलों में शैव सम्प्रदाय का महान अस्तित्व रहा है और यही कारण है की सदानीरा गोमती तट पर शिवलिंग जगह जगह स्थापित हैं आदिकाल से, जंगल नष्ट होने से नदी के अस्तित्व पर भी संकट आया है, और लोग बाग़ नदी के मुहानों को कृषि भूमि में तब्दील कर चुके हैं, फिर भी यह नदी के किनारों पर मौजूद कुछ जंगली क्षेत्रों के बचे रहने से यहाँ पक्षी और अन्य वन्य जीवों की अच्छी तादाद है, तथा कभी कभी बाघ व् तेंदुएं भी गोमती के तटों से गुजरते हुए अपने वनक्षेत्र बदलते रहते हैं, ईश्वर से यही कामना है की पशुपति नाथ धरती के सभी जीवों का कल्याण करें, और प्रकृति में वे  सदा रचते बसते रहें".

वन्य-जीव और पर्यावरण के सरंक्षण व् संवर्धन के लिए किए गए इस पवित्र आयोजन में, बिजुआ ब्लाक के शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रभाकर शर्मा, राममिलन मिश्रा, प्राथमिक शिक्षक संघ पसगवा के अध्यक्ष पवन मिश्र, हरेराम, संजय शुक्ला, व्यवसाई राकेश गिरी, राजेश गिरी, संजय गिरी, उदय प्रताप सिंह, विमल यादव, मदन मिश्रा गोला  "गौरैया सरंक्षक", एडवोकेट रहीस अहमद मोहम्मदी, युवा कांग्रेस विधानसभा कस्ता अध्यक्ष राजीव मिश्रा  तथा तमाम संतों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की.

डेस्क- दुधवा लाइव डॉट कॉम 

Aug 8, 2016

गंगा सफाई पर मनमोहन से कम सीरियस हैं मोदी ! : गंगा सफाई के बजट में कटौती के बाद बचा पैसा भी खर्च नहीं कर पा रही ‘मोदी सरकार'


(लखनऊ) लगभग सवा दो साल पहले भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार  बनाए गए नरेन्द्र मोदी ने उत्तरप्रदेश की बनारस लोकसभा सीट से नामांकन भरने के पहले सार्वजनिक रूप से कहा था “पहले मुझे लगा था मैं यहां या, फिर मुझे पार्टी ने यहां भेजा है, लेकिन अब मुझे लगता है कि मैं मां गंगा कीगोद में लौटा हूं”. तब मोदी  ने सार्वजनिक रूप से भावुक होते हुए कहा था “न तो मैं आया हूं और न ही मुझे भेजा गया है.दरअसल, मुझे तो मां गंगा ने यहां बुलाया है.यहां आकर मैं वैसी ही अनुभूति कर रहा हूं, जैसे एक बालक अपनी मां की गोद में करता है. मोदी ने उस समय यह भी कहा था कि वे गंगा को साबरमती से भी बेहतर बनाएंगे. पर अब लखनऊ के सिटी मोंटेसरी स्कूल की राजाजीपुरम शाखा की कक्षा 10 की छात्रा और ‘आरटीआई गर्ल’ के नाम से विख्यात 14 वर्षीय ऐश्वर्या पाराशर की एक आरटीआई पर भारत सरकार के जल संसाधन,नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा दिए गए जबाब को देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी चुनाव से पूर्व गंगा नदी की सफाई पर किये गए अपने बड़े बड़े वादों को शायद भूल गए हैं और गंगा नदी की साफ-सफाई के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की बहुप्रचारित नमामि गंगे योजना महज फाइलों, सरकारी विज्ञापनों, राजनैतिक आयोजनों और राजनैतिक बयानबाजी तक ही सिमट कर रह गयी है.



दरअसल ऐश्वर्या ने बीते 09 मई को प्रधानमंत्री कार्यालय में एक आरटीआई अर्जी देकर नमामि गंगे योजना पर केंद्र सरकार द्वारा किये गए खर्चों, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित बैठकों और गंगा के प्रदूषण  को रोकने के सम्बन्ध में 7 बिन्दुओं पर जानकारी चाही थी. प्रधानमंत्री कार्यालय के अवर सचिव और केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी सुब्रतो हाजरा ने बीते 6 जून को ऐश्वर्या को सूचित किया कि नमामि गंगे योजना से सम्बंधित कोई भी जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं है और ऐश्वर्या की अर्जी अधिनियम की धारा 6(3) के अंतर्गत भारत सरकार के जल संसाधन,नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग को अंतरित कर दी. जल संसाधन,नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के अवर सचिव एवं जनसूचना अधिकारी के. के. सपरा ने बीते 4 जुलाई के पत्र के माध्यम से ऐश्वर्या को जो सूचना दी है वह अत्यधिक चौंकाने वाली है और नमामि गंगे
योजना के क्रियान्वयन को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वास्तव में गंभीर होने पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा रही है.

ऐश्वर्या को दी गयी सूचना  के अनुसार सरकार बनाने के बाद से अब तक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने गंगा की साफ-सफाई के लिए निर्धारित बजटीय आबंटन में कटौती तो की ही है साथ ही साथ सरकार आबंटित बजट की धनराशि को खर्च करने में भी विफल रही है.


सपरा ने ऐश्वर्या को बताया है कि वित्तीय वर्ष 2014-15 में गंगा सफाई के राष्ट्रीय अभियान के लिए 2137 करोड़ रुपयों का बजटीय आवंटन निर्धारित किया गया था जिसमें 84 करोड़ की कटौती कर संशोधित आबंटन 2053 करोड़ किया गया किन्तु सरकार इस वित्तीय वर्ष में महज 326 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाई तो वहीं वित्तीय वर्ष 2015-16 में इस अभियान के लिए 2750 करोड़ रुपयों का बजटीय आवंटन निर्धारित था जिसमें 1100 करोड़ की भारीभरकम कटौती कर संशोधित आबंटन 1650 करोड़ किया गया किन्तु सरकार इस वित्तीय वर्ष में भी 1632 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाई. इस प्रकार केंद्र सरकार वितीय वर्ष 2014-15 में आबंटित धनराशि में से 1727 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाई और वितीय वर्ष 2015-16 में भी 1100 करोड़ की भारीभरकम कटौती के बाद किये गए संशोधित बजटीय आबंटन में से भी 18 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाई है.


ऐश्वर्या को देने के लिए 20 जून को तैयार की गई इस सूचना के अनुसार वित्तीय वर्ष 2016-17 में गंगा सफाई के राष्ट्रीय अभियान के लिए 2500 करोड़ रुपयों का बजटीय आवंटन निर्धारित किया गया है पर इस आबंटन के
सापेक्ष संशोधित आबंटन या बास्तविक खर्चों की कोई भी सूचना केंद्र सरकार के पास नहीं है.


ऐश्वर्या ने एक विशेष बातचीत में कहा कि हालाँकि माँ गंगा के आशीर्वाद ने नरेंद्र मोदी को न केवल बनारस से लोकसभा में पंहुचाया अपितु उनकी पार्टी को आशातीत सफलता का आशीर्वाद देते हुए मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पंहुचाया पर लगता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद हमारे प्रधानमंत्री गंगा मां से किये अपने वायदों को भूल गए हैं. गंगा साफ-सफाई पर बजटीय आबंटन के सापेक्ष वित्तीय वर्ष 2014-15 में  महज 15% खर्च और वित्तीय वर्ष 2015-16 में भी मात्र 59% खर्च पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए ऐश्वर्या ने वित्तीय वर्ष 2016-17 में गंगा सफाई के राष्ट्रीय अभियान के लिए महज 2500 करोड़ रुपयों का बजटीय आवंटन निर्धारित किये जाने को गंगा साफ-सफाई पर अगले 5 वर्षों में 20000 करोड़ रुपये खर्च करने की मोदी सरकार की बीते साल 13 मई में की गयी घोषणा के आधार पर नाकाफी बताया.


ऐश्वर्या कहती हैं कि गंगा सफाई पर हुई बैठकों की सूचना के लिए मुझे वेबसाइट को देखने का निर्देश दिया गया था. ऐश्वर्या के अनुसार जब उन्होंने वेबसाइट को देखा तो उनको पता चला कि साल 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के गठन से अब तक इसकी 6 बैठकें हुईं हैं जिनमें से 3 बैठक क्रमशः दिनांक 05-10-2009, 01-11-2010 और 17-04-2012 को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुईं और 3
बैठक क्रमशः दिनांक 27-10-2014, 26-03-2015 और 04-07-2016 को वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में. ऐश्वर्या ने बताया कि इन बैठकों के कार्यवृत्तों को डाउनलोड कर देखने पर मालूम चला कि जहाँ एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने  कार्यकाल में हुई तीनों बैठकों की अध्यक्षता की तो वहीं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल में हुई 3 बैठकों में से एक मात्र  दिनांक 26-03-2015 की बैठक
में ही उपस्थित रहे और बाकी 2 बैठकों की अध्यक्षता जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने की. ऐश्वर्या बताती हैं कि राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के पदेन अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं और सामान्यतया इस प्राधिकरण की बैठकों की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री के द्वारा की जानी चाहिए किन्तु वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस प्राधिकरण की दिनांक 27-10-2014 और 04-07-2016 की बैठक में अनुपस्थिति से गंगा साफ-सफाई पर उनके  वास्तव  में गंभीर होने पर प्रश्नचिन्ह तो लग ही रहा है.


ऐश्वर्या ने बताया कि वे अपने ‘अंकल मोदी’ को पत्र लिखकर उनसे अनुरोध करेंगी कि वे आगे से ‘नमामि गंगे’ योजना पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देकर गंगा को निर्धारित समयान्तर्गत साफ करायें और माँ गंगा से किये अपने सभी वादे पूरे करें. ऐश्वर्या को विश्वास है कि विश्व में भारत के नाम का डंका बजबाने वाले उसके ‘अंकल मोदी’ उसके पत्र का संज्ञान लेकर गंगा को साफ कराकर एक नई मिसाल कायम करने में कामयाब होंगे.


उर्वशी शर्मा (सामाजिक कार्यकर्ता, सूचना के अधिकार से सम्बन्धित मसायल में सक्रिय, लखनऊ में निवास, इनसे urvashiindiasharma@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Aug 5, 2016

उत्तर प्रदेश के तराई का पहला वन्य जीवन एवं कृषि पर आधारित हिन्दी-अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय जर्नल दुधवा लाइव





आदरणीय पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह की प्रेरणा और उनके आशीर्वाद का नतीजा है दुधवा लाइव- 

DudhwaLive-International Journal of Environment and Agriculture



दुधवा लाइव कृषि एवं पर्यावरण पर आधारित लखीमपुर खीरी जनपद का पहला अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल
जर्मनी के डायचे वेले संस्थान से द बाब्स एवार्ड और उत्तर प्रदेश सरकार से ई-उत्तरा सम्मान से सम्मानित हिंदी-अंग्रेजी में प्रकाशित व् प्रसारित दुधवा लाइव पत्रिका जो की यूनेस्को फ्रांस द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आई एस एस एन प्राप्त वैज्ञानिक जर्नल के तौर पर वन्य जीवन, पर्यावरण, एवं कृषि से सम्बंधित शोधपत्र, आलेख व् ख़बरें प्रकाशित करता है, जनवरी २०१० से शुरू होकर दुधवा लाइव वाइल्ड लाइफ से सम्बंधित हिन्दी की प्रथम वेबसाईट से २०१६ तक आते आते वैश्विक मानचित्र पर वैज्ञानिक जर्नल के तौर पर स्थापित हो चुकी है, दुधवा लाइव पत्रिका एवं दुधवा लाइव डॉट कॉम बैनर तले गौरैया बचाओ जन अभियान-२०१०, १८५७ की क्रान्ति के महानायक राजालोने सिंह गढ़ी सरंक्षण अभियान २०१५, तालाब सरंक्षण अभियान २०१६ तथा वृक्षारोपण व् जल सरंक्षण से सम्बंधित सफल जागरूकता अभियान चलाये जा चुके हैं.


डायरेक्टरी ऑफ़ रिसर्च जर्नल्स इंडेक्सिंग ने दुधवा लाइव जर्नल को किया सूचीबद्ध


अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी पत्रिका अथवा जर्नल की रैंकिंग व् प्रतिष्ठा इस बात से निर्धारित की जाती है की वह कितनी वैश्विक वैज्ञानिक जर्नल की संस्थाओं में सूचीबद्ध व् प्रमाणित की गयी है, दुधवा लाइव तमाम वैश्विक वैज्ञानिक संस्थानों में सूचीबद्ध है, कल डायरेक्टरी ऑफ़ रिसर्च जर्नल्स इंडेक्सिंग रोमानिया, ब्राजील और इंडिया द्वारा दुधवा लाइव जर्नल को सूचीबद्ध कर प्रामाणिक अंतर्राष्ट्रीय जर्नल के तौर पर मान्यता दी.
वन्यजीवन, पर्यावरण और कृषि पर आधारित रिसर्च पेपर दुधवा लाइफ में प्रकाशन हेतु भेज सकते हैं 


email- editor.dudhwalive@gmail.com 

दुधवा लाइव डेस्क 

Jul 23, 2016

पानी दूर हुआ या हम ?




ग्लेशियर पिघले। नदियां सिकुङी। आब के कटोरे सूखे। भूजल स्तर तल-वितल सुतल से नीचे गिरकर पाताल तक पहुंच गया। मानसून बरसेगा ही बरसेगा.. अब यह गारंटी भी मौसम के हाथ से निकल गई है। पहले सूखे को लेकर हायतौबा मची, अब बाढ़ की आशंका से कई इलाके परेशान हैं। नौ महीने बाद फिर सूखे को लेकर कई इलाके हैरान-परेशान होंगे। हम क्या करें ? वैश्विक तापमान वृद्धि को कोसें या सोचें कि दोष हमारे स्थानीय विचार.व्यवहार का भी है  ? दृष्टि साफ करने के लिए यह पङताल भी जरूरी है कि पानी हमसे दूर हुआ या फिर पानी से दूरी बनाने के हम खुद दोषी है।
पलटकर देखिए। भारत का दस्तावेजी इतिहास 75,000 वर्ष पुराना है। आज से 50.60 वर्ष पहले तक भारत के ज्यादातर नगरों में हैंडपम्प थे, कुएं थे, बावङियां, तालाब और झीलें थी, लेकिन नल नहीं थे। अमीर से अमीर घरों में भी नल की चाहत नहीं पहुंची थी। दिल्ली में तो एक पुराना लोकगीत काफी पहले से प्रचलित था . ''फिरंगी नल न लगायो'' 
स्पष्ट है कि तब तक कुआं नहीं जाता था प्यासे के पास। प्यासा जाता था कुएं के पास। कालांतर में हमने इस कहावत को बेमतलब बना दिया। पानी का इंतजाम करने वालों ने पानी को पाइप में बांधकर प्यासों के पास पहुंचा लिया। बांध और नहरों के ज़रिये नदियों को खींचकर खेतों तक ले आने का चलन तेज हो गया। हमें लगा कि हम पानी को प्यासे के पास ले आये। वर्ष 2016 में मराठवाङा का परिदृश्य गवाह बना कि असल में वह भ्रम था। हमने पानी को प्यासों से दूर कर दिया। 
हुआ यह कि जो सामने दिखा, हमने उसे ही पानी का असल स्त्रोत मान लिया। इस भ्रम के चलते हम असल स्त्रोत के पास जाना और उसे संजोना भूल गये। पानी कहां से आता है ? पूछने पर बिटिया कहेगी ही कि पानी नल से आता है, क्योंकि उसे कभी देखा ही नहीं कि उसके नगर में आने वाले पानी का मूल स्त्रोत क्या है। किसान को भी बस नहर, ट्युबवैल, समर्सिबल याद रहे। नदी और धरती का पेट भरने वाली जल सरंचनाओं को वे भी भूल गये। आंख से गया, दिमाग से गया। 

पहले एक अनपढ़ भी जानता था कि पानी, समंदर से उठता है। मेघ, उसे पूरी दुनिया तक ले जाते हैं। ताल.तलैया, झीलें और छोटी वनस्पतियां मेघों के बरसाये पानी को पकङकर धरती के पेट में बिठाती हैं। नदियां, उसे वापस समंदर तक ले जाती हैं। अपने मीठे पानी से समंदर के खारेपन को संतुलित बनाये रखने का दायित्व निभाती हैं। इसीलिए अनपढ़ कहे जाने वाले भारतीय समाज ने भी मेघ और समंदर को देवता माना। नदियों से मां और पुत्र का रिश्ता बनाया। तालाब और कुआं पूजन को जरूरी कर्म मानकर संस्कारों का हिस्सा बनाया। जैसे.जैसे नहरी तथा पाइप वाटर सप्लाई बढ़ती गई। जल के मूल स्त्रोतों से हमारा रिश्ता कमजोर पङता गया। ''सभी की जरूरत के पानी का इंतजाम हम करेंगे।'' नेताओं के ऐसे नारों ने इस कमजोरी को और बढ़ाया। लोगों ने भी सोच लिया कि सभी को पानी पिलाना सरकार का काम है। इससे पानी संजोने की साझेदारी टूट गई। परिणामस्वरूप, वर्षा जल संचयन के कटोरे फूट गये। पानी के मामले में स्वावलंबी रहे भारत के गांव.नगर 'पानी परजीवी' में तब्दील होते गये।

हमारी सरकारों ने भी जल निकासी को जलाभाव से निपटने का एकमेव समाधान मान लिया। जल संसाधन मंत्रालय, जल निकासी मंत्रालय की तरह काम करने लगे। सरकारों ने समूचा जल बजट उठाकर जल निकासी प्रणालियों पर लगा दिया। 'रेन वाटर हार्वेस्टिंग' और 'रूफ टाॅप हार्वेस्टिंग' की नई शब्दावलियों को व्यापक व्यवहार उतारने के लिए सरकार व समाजण्ण् दोनो आज भी प्रतिबद्ध दिखाई नहीं देती। लिहाजा, निकासी बढ़ती जा रही है। वर्षा जल संचयन घटता जा रहा है। ’वाटर बैलेंस' गङबङा गया है। अब पानी की 'फिक्सड डिपोजिट' तोङने की नौबत आ गई है। भारत 'यूजेबल वाटर एकाउंट' के मामले में कंगाल होने के रास्ते पर है। दूसरी तरफ कम वर्षा वाले गुजरात, राजस्थान समेत जिन्होने भी जल के मूल स्त्रोतों के साथ अपने रिश्ते को जिंदा रखा, वे तीन साला सूखे में भी मौत को गले लगाने को विवश नहीं है। 

जल के असल स्त्रोतों से रिश्ता तोङने और नकली स्त्रोतों से रिश्ता जोङने के दूसरे नतीजों पर गौर फरमाइये।

नहरों, नलों और बोरवैलों के आने से जलोपयोग का हमारा अनुशासन टूटा। पीछे.पीछे फ्लश टाॅयलट आये। सीवेज लाइन आई। इस तरह नल से निकला अतिरिक्त जल-मल व अन्य कचरा मिलकर नदियों तक पहुंच गये। नदियां प्रदूषित हुईं। नहरों ने नदियों का पानी खींचकर उन्हे बेपानी बनाने का काम किया। इस कारण, खुद को साफ करने की नदियों की क्षमता घटी। परिणामस्वरूप, जल-मल शोधन संयंत्र आये। शोधन के नाम पर कर्ज आया; भ्रष्टाचार आया। शुद्धता और सेहत के नाम पर बोतलबंद पानी आया। फिल्टर और आर ओ आये। चित्र ऐसा बदला कि पानी पुण्य कमाने की जगह, मुनाफा कमाने की वस्तु हो गया। समंदर से लेकर शेष अन्य सभी प्रकार के जल स्त्रोत प्रदूषित हुए; सो अलग। बोलो, यह किसने किया ? पानी ने या हमने ? पानी दूर हुआ कि हम ??

अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-92
amethiarun@gmail.com
9868793799

आइये, जल मैत्री बढ़ायें

Water well of Raja Lone Singh of Mitauli





आइये, पानी से रिश्ता बनायें



नदियों को जोङने, तोङने, मोङने अथवा बांधने का काम बंद करो। रिवर.सीवर को मत मिलने दो। ताजा पानी, नदी में बहने दो। उपयोग किया शोधित जल, नहरों में बहाओ। जल बजट को जल निकासी में कम, वर्षा जल संचयन में ज्यादा लगाओ। नहर नहीं, ताल, पाइन, कूळम आदि को प्राथमिकता पर लाओ। 'फाॅरेस्ट रिजर्व' की तर्ज पर 'वाटर रिजर्व एरिया' बनाओ। ये सरकारों के करने के काम हो सकते हैं। पानी की ग्राम योजना बनाना, हर स्थानीय ग्रामीण समुदाय का काम हो सकता है। आप पूछ सकते हैं कि निजी स्तर पर मैं क्या कर सकता हूं  ? 
संभावित उत्तर बिंदुओं पर गौर कीजिए :

1.     पानी, ऊर्जा है और ऊर्जा, पानी। कोयला, गैस, परमाणु से लेकर हाइड्रो स्त्रोतों से बिजली बनाने में पानी का उपयोग होता है। अतः यदि पानी बचाना है, तो बिजली बचाओ; ईंधन बचाओ; सोलर अपनाओ। 

2.    दुनिया का कोई ऐसा उत्पाद नहीं, जिसके कच्चा माल उत्पादन से लेकर अंतिम उत्पाद बनने की प्रक्रिया में पानी का इस्तेमाल न होता हो। अतः न्यूनतम उपभोग करो; वरना् पानी की कमी के कारण कई उत्पादों का उत्पादन एक दिन स्वतः बंद करना पङ जायेगा। 

3.    एक लीटर बोतलबंद पानी के उत्पादन में तीन लीटर पानी खर्च होता है। एक लीटर पेटा बोतल बनाने में 3.4 मेगाज्युल ऊर्जा खर्च होती है। एक टन पेटा बोतल के उत्पादन के दौरान तीन टन कार्बन डाइआॅक्साइड निकलकर वातावरण में समा जाती है। लिहाजा, बोतलबंद पानी पीना बंद करो। पाॅली का उपयोग घटाओ।

4.    आर ओ प्रणाली, पानी की बर्बादी बढ़ाती है; मिनरल और सेहत के लिए जरूरी जीवाणु घटाती है। इसे हटाओ। अति आवश्यक हो, तो फिल्टर अपनाओ। पानी बचाओ; सेहत बचाओ।

5.    पानी दवा भी है और बीमारी का कारण भी। पानी को बीमारी पैदा करने वाले तत्वों से बचाओ। फिर देखिएगा, पानी का उचित मात्रा, उचित समय, उचित पात्र और उचित तरीके से किया गया सेवन दवा का काम करेगा।

6.    सूखे में सुख चाहो, तो कभी कम बारिश वाले गुजरात.राजस्थान के गांवों में घूम आओ। उनकी रोटी, खेती, मवेशी, चारा, हुनर और जीवन.शैली देख आओ। बाढ़ के साथ जीना सीखना चाहो, तो कोसी किनारे के बिहार से सीखो। बाढ़ और सुखाङ के कठिन दिनों में भी दुख से बचे रहना सीख जाओगे।

7.    प्याऊ को पानी के व्यावसायीकरण के खिलाफ औजार मानो। पूर्वजों के नाम पर प्याऊ लगाओ। उनका नाम चमकाओ; खुद पुण्य कमाओ।

8.    स्नानघर.रसोई की जल निकासी पाइप व शौचालय की मल निकासी पाइप के लिए अलग-अलग चैंबर बनाओ। गांव के हर घर के सामने सोख्ता पिट बनाओ। छत के पानी के लिए 'रूफ टाॅप हार्वेस्टिंग' अपनाओ। 

9.    जहां सीवेज न हो, वहां सीवेज को मत अपनाओ। शौच को सीवेज में डालने की बजाय, 'सुलभ' सरीखा टैंक बनाओ। 

10.    बिल्डर हैं, तो अपने परिसर में वर्षा जल संचयन सुनिश्चित करो। खुद अपनी जल-मल शोधन प्रणाली लगाओ। पुनर्चक्रीकरण कर पानी का पुर्नोपयोग बढ़ाओ। मल को सोनखाद बनाओ।

11.    फैक्टरी मालिक हैं, तो जितना पानी उपयोग करो उतना और वैसा पानी धरती को वापस लौटाओ। शोधन संयंत्र लगाओ। तालाब बनाओ।

12.    कोयला, तैलीय अथवा गैस संयंत्र के मालिक हैं, तो उन्हे पानी की बजाय, हवा से ठंडा करने वाली तकनीक का इस्तेमाल करो।

13.    किसान हैं, तो खेत की मेङ ऊंची बनाओ। सूखा रोधी बीज अपनाओ। कम अवधि व कम पानी की फसल व तरीके अपनाओ। कृषि के साथ बागवानी अपनाओ। देसी खाद व मल्चिंग अपनाकर मिट्टी की गुणवत्ताा व नमी बचाओ। बूंद.बूंद सिंचाई व फव्वारा पद्धति अपनाओ। 

14.    जन्म, ब्याह, मृत्यु में जलदान, तालाब दान यानी महादान का चलन चलाओ। मानसून आने से पहले हर साल नजदीक की सूखी नदी के हर घुमाव पर एक छोटा कुण्ड बनाओ। मानसून आये, तो उचित स्थान देखकर उचित पौधे लगाओ। नदी किनारे मोटे पत्ते वाले वृक्ष और छोटी वनस्पतियों के बीज फेंक आओ।

15.    ''तालों में भोपाल ताल और सब तलैया'' जैसे कथानक सुनो और सुनाओ। जलगान गाओ। बच्चों की नदी.तालाब.कुओं से बात कराओ। पानी का पुण्य और पाप समझाओ। जल मैत्री बढ़ाओ। असल जल स्त्रोताें से रिश्ता बनाओ।

 अरुण तिवारी 
दिल्ली
amethiarun@gmail.com
9868793799

विविधा

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अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

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