डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

इस जिन्दा खूबसूरती को नष्ट न करे..तस्वीर पर क्लिक करे

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 24, 2014

आओ विगन बने....

 शाकाहार ही मानवता का चरम बिंदु है 

आओ हम सब विगन बने ताकि वसुंधरा हरी भरी बनी रह सके. पशुओं का मांस और उससे बने उत्पादों का बहिष्कार करे, क्योंकि जिस क्रूरता से छोटे छोटे दबड़ों में इन पशुओं को पाला जाता है वह सब देखकर परतंत्रता की पराकाष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता, प्रकृति में उत्पन्न ये जीव जो खुले आसमान में उड़ते है, हरी भरी धरती में कुलांचें भरते है, सरोवरों में तैरते है अपने अपने कुटुंब के साथ, उनकी खरीद फरोक्त कर एक छोटी व् गंदी जगह पर रखना और दवाओं के साथ उन्हें भोजन देना जिससे उनमे मांस में बढ़ोत्तरी हो सके, कितना नैतिक है, इसे जरूर महसूस करिएगा, जीव ह्त्या न करे इस बात के लिए हम संवेदनशील है किन्तु मांस खाने के लिए जो जीव क़त्ल किए जा रहे है उनके लिए नहीं..आखिर ऐसा क्यों?

धरती सबकी है सबका इस पर बराबर का अख्तियार है, और प्रकृति में संतुलन भी तभी बरकरार रहेगा जब प्रकृति में मौजूद हर जीव को उसकी प्राकृतिक जगह पर प्राकृतिक तौर पर रहने दिया जाएगा, हर जीव की पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी अपनी सह्भाकिता है जो संतुलन के लिए आवश्यक है.

ह्रदय के भावों को स्वछंद छोड़ दे ताकि वे सवेद्नाओं को आपके भीतर आने दे और स्थिर रहने में मदद करे, यकीन मानिए इन लाखों करोड़ों जीवों को बंधक बनाकर जो क़त्ल किया जा रहा है उनकी चीत्कार आप को झकझोर देगी और आप फिर कभी इन बेजुबान जानवरों की लाशों की कब्रगाह अपने पेट में नहीं बनायेंगे...

सिर्फ अनुरोध है की शाकाहार ही मानवता का चरम बिंदु है आइये चले उस और कुछ कदम राह खूबसूरत लगेगी....

कृष्ण कुमार मिश्र
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इस वीडियो को अवश्य देखिये थोड़ा वक्त निकाल कर....
वीडियो साभार: मीटफ्रीइंडिया.काम 




Jul 22, 2014

उथली होती नदियाँ और डूबती धरती !


फिर खीरी के जंगलों में बाढ़ की दस्तक....

शारदा और घाघरा नदी ने लिया रौद्र रूप, सुहेली भी उफनाई....

ये मंजर है लखीमपुर खीरी के दुधवा नेशनल पार्क के बाहरी इलाकों का, ये रिहाइशी इलाके जलमग्न हो गए है और सड़के सिर्फ मानचित्रों पर दिखाई देती है, असल में गायब है, भारत के उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद का नाम दुनिया में शाखू के जंगलों और यहाँ के बाघों के लिए मशहूर है, ये वन्य संपदा हजारों सालों से हिमालय की तलहटी में फल फूल रही है, पर अब ये मंजर ये बयान कर रहा है, की ये जानवर और वनस्पतियाँ खतरे में है, जब तकनीकी दिमाग वाला इंसान इस बाढ़ की चपेट में है और साल दर साल वह अपने घर और संपत्ति को खो देता है, उसे सड़क भी मुहैया नहीं होती बसर करने के लिए, और सरकारे सिर्फ बाढ़ योजनाओं पर करोड़ों का घालमेल कर चुप बैठ जाती है अगले साल के इन्तजार में, की कब बाढ़ आये और कब पैसा पानी की तरह बहाया जाए अपने अपने घरों में !! अब ऐसे हालातों में उन जीवों की स्थिति क्या होती है, जो प्रकृति के नियमों के मुताबिक़ चलते आये है सदियों से, उन्हें हर उन विपरीत परिस्थितियों से दो चार हो लेने की कूबत रही है जो प्राकृतिक आपदाओं के रूप में आती है, पर इंसानी करतूतों की वजह से इन महा प्रलयों से निपटने की कूबत उनमे नहीं है, जाहिर है इन तमाम जानवरों और वनस्पतियों की प्रजातियाँ इस भयंकर बाढ़ की चपेट में आकर अपना स्थानीय वजूद खो देती है, या किसी दूसरी जगह पर विस्थापित होने की कोशिश करती है जहां इंसान पहले से इनकी ताक में बैठा है इन्हें नष्ट करने के लिए, जानवरों का शिकार वनस्पतियों को उगने से पहले ही कृषि भूमि पर हल चला देता है या परती पडी भूमियों पर कंक्रीट का जंगल तैयार कर देता है, इन प्रजातियों के सुरक्षित रहने की उन सारी संभावनाओं को उजाड़ता हुआ मनुष्य खुद इस प्रलय की गोद में बैठा है.

 


तराई के जनपदों में जब हिमालय से उतरती हुई तेज जलधाराएं जिन्हें राह में पड़ने वाले जंगल पोखर व् परती भूमियाँ अपने आगोश में लेकर शांत करती थी तो ये जलधाराए हमारी नदियों के मुहाने की मर्यादाओं का पालन करते हुए अविरल बहती थी ..कल कल की मंद ध्वनि  के साथ ! किन्तु पहाड़ों से लेकर समतल इलाकों में मौजूद जंगलों का  बेजा कटान तालाबों और स्थानीय छोटी नदियों का विनाश इन जलधाराओं की गति बढाता गया और साथ ही इनकी राहों में सिल्ट (गाद) जमा करता गया, ये सिल्ट घास के मैदानों और जंगलों को ख़त्म कर कृषि भूमि में तब्दील कर देने से पानी के साथ रेत और मिट्टी का बहाव नदियों की राहों में जमा होने लगा नतीजतन नदियाँ अपनी मर्यादाओं को लांघ हमारे शहर घर और सड़क तक आ पहुँची, कोइ है जो समझ सकता है इनका दर्द, और दूर कर सकता है इनकी राहों में पडी उस सिल्ट को, ताकि इनके राहों की गहराई इन्हें अपने में समाये हुए रख सके और इनकी अविरल धारा बंगाल की खाड़ी से समंदर के हवाले हो सके.....

वनों को फिर विकसित करे, घास के मैदानों को दोबारा अस्तित्व में लाया जाए,  तालाबों को और उनकी गहराई को भी सुनाश्चित करे, और जो छोटी छोटी नदियाँ हमारे गाँवों से होकर गुजराती है, इन विशाल नदियों की सहायक होती है उनके अस्तित्व को बचा ले, यह जरूरी है धरती के लिए और इस पर बसने वाले जीवों के लिए .याद रहे .इंसान भी उनमे से एक है अलाहिदा नहीं!


और यह सब  किसी एक कार्ययोजना बना देने से नहीं होने वाला और न ही अरबों कागज़ के नोट खर्च कर देने से हो सकेगा. ये हो सकता है जब समूचा मानव समुदाय अपनी मर्यादा में रहना सीख जाए फिर से सदियों पहले वाला मनुष्य जिसे प्रकृति का सम्मान करना आता हो ....हम अपनी मर्यादा न लांघे तो यकीन मानिए  ये नदियाँ कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघेगी.




 

सम्पादक की कलम से ....
कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com 

Jul 12, 2014

मैं हैरान हूं, परेशान हूं मैं गोमती हूं




० एक नदी की व्यथा कथा

हरिओम त्रिवेदी*

पुवायां। मैं गोमती हूं। कुछ लोग मुझे आदिगंगा के नाम से भी पुकारते हैं।  इंद्र ने एक बार गौतम ऋषि का रूप धर कर उनकी पत्नी अहिल्या से छल किया था। कुपित गौतम ऋषि ने इंद्र और अहिल्या को श्राप दे दिया था। काफी अनुनय, विनय करने पर गौतम ऋषि ने श्राप मुक्ति के लिए इंद्र को मेरे तटों पर १००१ स्थानों पर शिवलिंग स्थापित कर तपस्या करने को कहा था। इंद्र ने मेरे तटों पर शिवलिंगों की स्थापना कर तपस्या की तब कहीं जाकर उनको ऋषि के श्राप से मुक्ति मिल सकी। इंद्र को श्राप से मुक्ति मिल गई लेकिन मैं आज प्रदूषण, जलीय जीवों की हत्या, तटों पर की जा रही खेती से इस कदर घायल और व्याकुल हूं कि आज मुझे भी किसी भागीरथ की दरकार है। 

मेरी यात्रा पीलीभीत जनपद के माधौटांडा कसबे के पास (गोमत ताल) फुलहर झील से शुरू होती है। पीलीभीत में उद्गम स्थल के अलावा त्रिवेणी बाबा आश्रम, इकोत्तरनाथ, शाहजहांपुर में सुनासिरनाथ (बंडा), बजरिया घाट, पन्नघाट, मंशाराम बाबा, भंजई घाट, मंझरिया घाट, लखीमपुर में सिरसाघाट, टेढ़ेनाथ बाबा, मढिय़ा घाट, हरदोई में धोबियाघाट, प्राकृतिक जलस्रोत, हत्याहरण, नल दमयंती स्थल, सीतापुर में नैमिषारण्य, चक्रतीर्थ, ललिता देवी, अठासी कोस परिक्रमा, दधीचि आश्रम, मनोपूर्णा जल प्रपात, लखनऊ में चंद्रिका देवी मंदिर, कौडिन्य घाट, मनकामेश्वर मंदिर, संकटमोचन हनुमान मंदिर, बाराबंकी में महदेवा घाट, टीकाराम बाबा, सुल्तानपुर में सीताकुंड तीर्थ, धोपाप, प्रतापगढ़ में ढकवा घाट, जौनपुर में जमदग्नि आश्रम, वाराणसी में गोमती गंगा मिलन स्थल, मार्कडेश्वर नाथ आदि आश्रम और तट हैं। मुझे सदानीरा बनाने में पीलीभीत में वर्षाती नाला, शाहजहांपुर में  झुकना, भैंसी, तरेउना, लखीमपुर में छोहा, अंधराछोहा, सीतापुर में कठिना, सरायन, गोन, लखनऊ में कुकरैल, अकरद्दी, बाराबंकी में रेठ, कल्याणी, सुल्तानपुर में कादूनाला, जौनपुर में सई नदी का योगदान रहता है। ९६० किमी का सफर तय कर बनारस गाजीपुर के बीच मार्कण्डेय आश्रम के पास मैं गंगा मैया की गोद में विश्राम लेती हूं।

पीलीभीत से मार्कंडेय आश्रम तक के सफर में तमाम लोग मेरे कई रूप देखते हैं लेकिन मैं अपने ममतामयी मन से सभी का कल्याण करने की भावना लेकर निरंतर चलती रहती हूं। कहा गया है कि 'वृक्ष कबहुं नहिं फल भखै नदी न संचय नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीरÓ। अब साधु को अपनी पीड़ा किसी से कहने की क्या जरूरत है लेकिन आज मेरा मन आपसे अपनी पीड़ा कहने का हो रहा है। इस पीड़ा के पीछे मानव के साथ ही जीव जंतुओं और पेड़ पौधों का भला छिपा हुआ है। इस कारण मुझे उम्मीद है कि आप मेरी पीड़ा को पढ़ेंगे, समझेंगे और इस पर ध्यान भी देंगे। 

मैं धीरे -धीरे बहती हुई पर्यावरण की रक्षा के लिए अहम पेड़ पौधों को सिंचित करती हूं। खेतों को पानी देती हूं और लगतार बहते हुए निरंतर आगे बढऩे का संदेश देती हूं। मैं बताती हूं कि गति से ही जीवन का श्रंगार है, मेरे पैरों में दीवार ना बांधो। मैं कहती हंू कि रास्ते कितने भी मुश्किल क्यों न हों वह हासिल जरूर होते हैं। मैं यह भी संदेश देती हूं कि सब कुछ सहकर भी आगे बढऩे को ही धार कहते हैं। मैं बताती हूं कि सीमाएं कुछ भी नहीं होती। यह कैसे तोड़ी जाती हैं और तोड़कर फिर कैसे जोड़ी जाती हैं। युवाओं को मेरा संदेश होता है कि अपना पथ अपने आप चुनना चाहिए। अपनी रफ्तार, अपनी कश्ती और अपनी पतवार से आगे बढ़ा जा सकता है। सागर के घर पहुंचकर मैं थोड़ा रूकती हूं, सुस्ताती हूं, स्थिरता का सुख लेती हूं, इसकी तह तक जाती हूं। इसके बाद सूर्य की किरणों से गर्मी लेकर बादलों का रूप धर फिर से परोपकार के लिए मैदान में आ जाती हूं। 

अपनी कहानी सुनाते हुए अब मेरा मन बेहद आहत हो चला है। कारण यह है कि मेरा भविष्य मुझे चिंता में डाल रहा है। जिस मनुष्य के लिए मैं इतना सब करती हूं वह थोड़े लालच में मेरे घर आंगन में रहने वाले जीवों की हत्या कर रहे हैं। इससे मुझमें गंदगी बढ़ती जा रही है। मेरे तट तक अतिक्रमण कर लिया गया है। खेतों में डाली जाने वाली जहरीली दवाओं का असर है कि मेरे घर में रहने वाले जंतु मरते जा रहे हैं। तटों के पेड़ पौधे बेरहमी से काटे जा रहे हैं। मैं उनकी करूण पुकार सुनकर भी कुछ नहीं कर पाती हूं। लोग घरों में हवन आदि कराने के बाद राख, कागज, सूखे फूल आदि मेरे ऊपर फेंक देते हैं। लोग मुझे मां कहते हैं, क्या कोई अपनी मां के ऊपर भी गंदगी फेंकता है। इस गंदगी में मेरा दम घुटने लगा है। जहरीले पानी और कचरे से मेरे घर के जीव मर रहे हैं इससे घर में गंदगी बढ़ती जा रही है। पीलीभीत में जहां से मैं निकलती हूं वहां से शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई में कई जगह मुझे बांध दिया गया है। अब भला मां को बांधने से कैसे कल्याण हो सकता है लेकिन यह बात कोई समझता ही नहीं है। लखनऊ, सुल्तानपुर, जौनपुर से लेकर वाराणसी तक मेरी धार चलती रहती है लेकिन इसमें कारखानों का इतना गंदा पानी मिल चुका होता है कि मेरा अमृत समान पानी जहर बन चुका होता है। तटों तक खेती के कारण जहरीली दवाओं का असर मेरे नस-नस में भर चुका है। ऐसे में मैं जीवनदायिनी कैसे रह पाउंगी। तटों और जंगलों के पेड़ काटने से बारिश नहीं होगी तो मुझमें पानी कहां से आएंगा, खेतों की सिंचाई कैसे होगी?  मैं जो सोंच रही हूं, जिस कारण छटपटा रही हूं आप वह क्यों नहीं सोंचते? कब सोचेंगे जब मेरी मौत हो जाएगी, फिर सोंचने से क्या होगा? क्या कोई भागीरथ नहीं है जो मुझे प्रदूषण, जहरीली खेती की दवाओं, कारखानों के गंदे पानी से बचा सके। क्या कोई ऐसा नहीं है जो मेरे पैरों में बेड़ी डालने वालों को रोक सके। मैं गोमती अपने भागीरथ के इंतजार में हूं।  कब पूरी होगी मेरी प्रतीक्षा..... 

*हरिओम त्रिवेदी
मो. रायटोला, कसबा खुटार जिला - शाहजहांपुर
 
hariomreporter1@gmail.com
मो. 9473972828, 9935986765

Jun 18, 2014

प्रणय युद्ध में दुधवा के जंगल में हुई हाथी की मौत




तीन डाक्टरों की टीम ने किया पोस्टमार्टम
फोटो: दुधवा क्षेत्र के बांकेंताल में मृत पड़ा हाथी का शव



दुधवा-खीरी से, डीपी मिश्र। दुधवा नेशनल पार्क के इतिहास में पहली बार दो नर हाथियों के बीच बांकेताल के पास हुए प्रणय युद्ध में एक युवा हाथी को अपनी जान असमय गंवानी पड़ गई। हाथी की मौत से पार्क प्रशासन में खासा हड़कंप मच गया है। सूचना पर दुधवा के एफडी शैलेष प्रसाद, डीडी वीके सिंह आदि मौके पर पहुंच गए एवं घटनास्थल का निरीक्षण किया। तीन डाक्टरों के पैनल से हाथी केशव का पोस्टमार्टम किया है। जिसमें मौत का कारण घावों से अधिक खून का बह जाना बताया गया है। हाथी के शव को पार्क अधिकारियों ने अपनी देखरेख में दफन करा दिया है।

यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगल में चार दर्जन से ऊपर हाथियों का दल स्वच्छंद विचरण कर रहा है। इस दल में शामिल दो युवा नर हाथियों के बीच बांकेताल के पास प्रणय को लेकर बलशाली साबित करने के लिए हुए युद्ध में कमजोर पड़े एक हाथी की मौत हो गयी। पार्क के इतिहास में प्रणय युद्ध में पहली बार हाथी की मौत की हुई घटना से दुधवा पार्क प्रशासन में खासा हड़कंप मच गया। सूचना पर दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर शैलेष प्रसाद, डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह, बेलरायां वार्डन आनंद कुमार, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वरिष्ठ समन्वयक डाॅ मुदित गुप्ता आदि मौके पर पहुंच गए एवं घटनास्थल का गहनता से निरीक्षण किया। डब्ल्यूटीआई के डाॅ सौरभ सिंघई तथा राजकीय पशु चिकित्सालय सूंडा के डाॅ वीआर निगम, खजुरिया के डाॅ नीरज गुप्ता ने हाथी के शव का परीक्षण किया। लगभग दस-बारह वर्ष की आयु वाले हाथी की मौत का कारण अधिक रक्तस्त्राव बताया गया है। उसके गले तथा पिछले हिस्से में हाथी दांत के गहरे निशान मिले हैं। बीते रविवार को दोपहर बाद दो से चार बजे के आसपास हाथी की मौत होने के समय का अनुमान लगाया गया है। दुधवा के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद शव को मौके पर निगरानी में ही दफन करा दिया गया है।


देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
पलिया - खीरी 
dpmishra7@gmail.com

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Jun 17, 2014

ये है किशनपुर वन्य जीव विहार की खूबसूरत बाघिन

किशनपुर वन्य जीव विहार लखीमपुर खीरी में स्थित है, मौजूदा  वक्त में यह दुधवा टाइगर रिजर्व का भी हिस्सा है, शारदा नदी के निकट झादी ताल मुख्य आकर्षण का केंद्र है यहां, वजह यहाँ मौजूद बारहसिंघा की अच्छी तादाद और  बाघों का इस ताल के आसपास विचरण, किन्तु यहां बाघों व् अन्य जीवों के शिकार की घटनाएं  होती रही है, स्थानीय गाँवों के अपराधिक लोगों विशेषत: क्रिमिनल ट्राइब्स और वन्य जीव अपराधियों की साठ - गाँठ हमेशा इस वन्य जीव विहार के जीवों के लिए ख़तरा बना हुआ है. जंगल के बफर जोन में भूमि अतिक्रमणकारी भी किशनपुर के वन्य जीवन के लिए दुश्मन बने हुए है. मानव और वन्य जीवों के मध्य यहां संघर्ष जारी है, गुनहगार मानव ही जीतता है इस जंग में, जो इन जीवों के आवासों और इनकी जिंदगियों का दुश्मन है.
गर्मियों में बाघों व् अन्य वन्य जीवों के लिए सेंक्चुरी में पानी के स्रोतों की अत्यधिक आवश्यकता है. और  सुरक्षा की भी. ताकि खीरी के ये वन सदैव इस धारीदार चमकीले पीतवर्ण व् साहस के प्रतीक जंगल के राजा बाघ की प्रजाति को सरंक्षित रख सके.....

डॉ धर्मेन्द्र सिंह के कैमरे की नज़र से .......(सभी तस्वीरें: डॉ धर्मेन्द्र सिंह)












डॉ धर्मेन्द्र सिंह ( वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर, जंगलों में नियमित भ्रमण, पेशे से आटोलैरिंगोलॉजिस्ट (ई इन टी सर्जन) लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे dharmusingh.balyan@facebook.com पर संपर्क  कर सकते हैं)

खीरी के युवाओं ने ली बागडोर नदियों को बचाने की- अफ़सोस प्रशासन और सरकार हैं तटस्थ

लखीमपुर खीरी जनपद में छोटी बड़ी नदियों का एक बड़ा जाल है जो इस धरती को उपजाऊँ बनाती है साथ ही कृषि को उन्नत भी, और बड़ी नदियों की जलधारा को मजबूत करती है ताकि वो विशाल नदियां बंगाल की खाड़ी तक पहुँच सके. मगर अफ़सोस की प्रदूषण बोर्ड के नियमों और संवेधानिक व् नैतिक कर्तव्यों से विमुख प्रशासन की नाक के टेल चीनी मिल और अन्य सरकारी व् गैर सरकारी उद्यम इन नदियों में खुलेआम जहरीला पानी व् कचरा दाल रहे है. एक बड़ी मुहीम की जरूरत ताकि भ्रष्ट तंत्र को सुधारा जा सके पर्यावरण के लिए जिसमे हम और न जाने कितने जीव व् वनस्पतियाँ निवास करती है. नदियां नहीं बची तो मानव सभ्यता प्रभावित होगी और साथ ही न जाने कितनी प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी जो जरूरी है हमारे पारिस्थतिकी तंत्र के लिए.।इन युवाओं के जज्बे को हमारा सलाम।...  सम्पादक दुधवा लाइव।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,लखीमपुर-खीरी। जैसा कि विदित है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कई सप्ताह से पर्यावरण संरक्षण बचाओ कार्यक्रम चला रही है। इस श्रंखला मे उल्ल नदी की सफाई विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओ ने श्रमदान करके अपने स्तर से पुरजोर कोशिश की। इसके अगले चरण मे वृक्षारोपण, पक्षी संरक्षण, जल संरक्षण, तथा जन जागरण के लिए पर्यावरण बचाओ रैली निकाली। 

      पर्यावरण बचाओ कार्यक्रम के संदर्भ मे विद्यार्थी परिषद का प्रतिनिधि मण्डल जिला प्रमुख आशीष श्रीवास्तव और जिला संयोजक सूर्यान्श गुप्ता की अगुवाई मे खीरी सांसद अजय मिश्र टेनी से मिला और जिले मे पर्यावरण संरक्षण की दिशा मे परिषद द्वारा किये जा रहे कार्याें से अवगत कराया और जिले मे पर्यावरण सुधार की दिशा मे लाइफ लाइन, नदियो के संरक्षण व जल संसाधन एवं पर्यावरण वृक्षारोपण करवाने के लिए प्रधानमंत्री और जल संसाधन एवं पर्यावरण मंत्री को सम्बोधित ज्ञापन खीरी सांसद अजय मिश्र टेनी को सौपा। जिससे अपने जिले का पर्यावरण स्वच्छ हो और वो हरित जिला के रुप मे मानचित्र मे जाना जाये। जिला प्रमुख आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि नदियो मे शहर का सीवेज वाटर, कचड़ा गिरने, जिले की मिलो का अपशिष्ट पदार्थ नदियो मे गिरने से नदियां नाला का रुप ले चुकी है, और नदियां अपने ही जीवन को बचाने के लिए जद्दोजहद व त्राहिमाम कर रही है। ऐसे मे जनसामान्य, प्रशासन और सरकार सभी को आगे आने की आवश्यकता है। जिला संयोजक सूर्यान्श गुप्ता ने कहा कि प्रदूषित और बदलते वातावरण के लिए हम सभी जिम्मेदार है, अतः इसको बचाने की जिम्मेदारी भी हम सभी की है। 


       इस अवसर पर जिला संयोजक सूर्यान्श गुप्ता, सह जिला संयोजक राम सहारे पाण्डेय, नगर मंत्री अमोघ वर्मा, नगर संयोजक पीयूष बाजपेई, नगर सहमंत्री जितेन्द्र अवस्थी, शशांक तिवारी, रजनीश मिश्र, कोषाध्यक्ष अपूर्वम कात्यायन, कार्यालय मंत्री मंजेश चक्रवर्ती, वरिष्ठ कार्यकर्ता अविरल शुक्ला तथा परिषद के मीडिया प्रभारी शुभम त्रिपाठी समेत तमाम कार्यकर्ता मौजूद रहे।



शुभम् त्रिपाठी
मीडिया प्रभारी
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
लखीमपुर-खीरी
मो0 नं0: 91.8090476921

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: