डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

इस जिन्दा खूबसूरती को नष्ट न करे..तस्वीर पर क्लिक करे

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Sep 24, 2014

केन – बेतवा नदी गठजोड़ पानी और जंगल की तबाही



सरकारी दस्तावेजो की माने तो पन्ना टाइगर रिजर्व पार्क के अन्दर बसे चार गाँव वर्ष 2010 में ही  विस्थापित कर दिए गए थे लेकिन हकीकत में गाँव आज भी आबाद है, वहां प्राथमिक स्कूल में मध्यान्ह भोजन बन रहा है गरीब किसान मुआवजे की ताक में लगातार कर्जदार बनता जा रहा है वहां सरकारी घुसपैठिये पहले की तरह आते – जाते है आदिवासी के साथ ये विडंबना है कि विस्थापन के डर से वे न तो महानगरो में रोजगार के लिए जा पा रहे है और न खेतो में.  
पन्ना टाइगर रिजर्व पार्क और  बफर जोन ( प्रतिबंधित क्षेत्र ) में शामिल कुल 10 ग्राम विस्थापित किये जाने है, लेकिन जनसूचना अधिकार में 1 जुलाई वर्ष 2010 को जल संसाधन मंत्रालय ने लिखित जवाब दिया कि दौधन बांध ( ग्रेटर गंगऊ ) से प्रभावित होने वाले 10 गाँव में चार गाँव मैनारी,खरयानी , पलकोहा, एवं दौधन को वनविभाग विस्थापित कर चुका है, शेष छह गाँव में शुकवाहा, भोरखुआ, घुघरी,बसुधा,कूपी और शाहपुरा है जिन्हें विस्थापित किया जाना है,करीब 8500 किसान इससे प्रभावित होंगे लेकिन सरकारी आंकड़ो में मात्र 806 किसानो के विस्थापन का ज़िक्र है, इस दोहरेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अकेले दौधन ग्राम की जनसँख्या 2500 है,जंगलो से पकड़े जा रहे बाघों की तरह ये आदिवासी भी वनविभाग के गुलाम बनाये जा रहे है इन्हे भी लोकतंत्र में वन्य जीवो की तरह आज स्वतंत्रता की दरकार है l बांध की जद में आने वाले आदिवासी पार्वती, शिवनारायण यादव ने बेबाकी से कहा कि 50 लाख रूपये मुआवजा चाहिए प्रति परिवार जान देंगे मगर जमीन मुफ्त में नही देंगे

हमारी पीढ़ियाँ इन जंगलो की प्रहरी रही है जिसे वनविभाग ने उजाड़ दिया है, वे आन्दोलन की फ़िराक में देर एक आदिवासी आंबेडकर की है सरकारी कागज कहते है आदिवासी लोगो का पुनर्वास मध्यप्रदेश सरकार के ‘ राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण,वन विभाग,मध्यप्रदेश (एन.टी.सी.ए.) के माध्यम से किया जाना है इन परिवारों के पुनर्वास – विस्थापन आदि  कार्य केंद्र सरकार की वर्ष 2007 एवं मध्यप्रदेश सरकार की आदर्श विस्थापन नीति में दिए गए मापदंडो के अनुरूप किया जायेगा जिसमे आदिवासी के आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक आजीवका के साधनों की व्यवस्था की जानी है गौरतलब है कि हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार ने इस परियोजना को स्वीकृति दी है पूर्व कांग्रेसी केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस परियोजना से पर्यावरण में दखलंदाजी होने के चलते अनुमति नही दी थी पिछले दस वर्षो गाँव रह – रहकर  सर्वे कार्य चल रहा है इस बात का अहसास कराने के लिए कि घर से बेघर होने के लिए किसी भी क्षण तैयार रहो 


उल्लेखनीय है कि प्रवास सोसाइटी ने टीम के साथ  इस परिक्षेत्र के गाँवो का दो दिवस भ्रमण किया है आदिवासी परिवारों से बातचीत की गई जिसमे कई परिवारों के बुजुर्ग , युवा साथी शामिल रहे है बांध क्षेत्र से प्रभावित होने वाले शुकवाहा गाँव के बलवीर सिंह, दौधन गाँव के गुबंदी कोंदर( अध्यापक ), मुन्ना लाल यादव और पलकोहा गाँव के ग्राम प्रधान जगन्नाथ यादव अपना अपने पूर्वजो को याद करते हुए विस्थापन का दर्द बतलाते है प्रधान ने दावा किया है कि वनविभाग की निगहबानी में रहते है यहाँ दलित आदिवासी आदिवासियों के लिए दिखलाये गए सब्जबाग से इतर बड़ी बात ये है हमें कभी इस बांध के बारे में कुछ नही बतलाया जाता है, उधर प्रति बीपीएल परिवार को मात्र 40,000 रूपये मुआवजा 2010 में मिली जनसूचना में जानकारी दी गई तीन वर्ष पूर्व बांध परियोजना में लगभग 7,614.63 करोड़ रुपया खर्च का अनुमान था जो अब बढ़कर 11 हजार करोड़ रुपया के करीब है  यानि केंद्र सरकार आदिवासियों के पुनर्वास पर 1 हजार करोड़ रूपये भी खर्च नही करना चाहती है  इस केन – बेतवा लिंक में नहरों के विकास पर 6499 हेक्टेयर सिंचित कृषि जमीन अधिग्रहीत की जानी है आदिवासी परिवारों की माने तो 40 हजार में तो बमीठा कसबे में ही आवास की जमीन नही मिलेगी छतरपुर,खजुराहो की तो बात ही अलग है इनके अनुसार 2 लाख रूपये एक परिवार को मुआवजा सरकार के हिसाब से होता है एक परिवार को केन – बेतवा नदी गठजोड़ की डीपीआर के मद्देनजर कोई संवाद आज तक आदिवासी लोगो के साथ केंद्र या मध्यप्रदेश की राज्य सरकार ने स्थापित नही किया है वे इसकी परिकल्पना मात्र से निःशब्द हो जाते जब ये बात पत्रकारों के तरफ से निकलती है कि आपको तो विस्थापित किया जा चुका है कागजो में लेकिन उनके निःशब्द होने में व्यवस्था के प्रति आक्रोश साफ दिखता है सवाल उठता है कि गर विस्थापन हुआ है तो मुआवजा किसको दिया गया ? वे आज भी यही क्यों बसे है ? पन्ना टाइगर के जंगलो में जो कोंदर, सोर आदिवासी कभी  मालिक हुआ करते थे आज वनविभाग के मर्जी बगैर एक लकड़ी तक जंगलो से नही उठा पाते है  गंगली सब्जियां तो दूर की बात है बकौल श्यामजी कोंदर मेरा बचपन इन्ही जंगलो में गुजरा है जब उन यादो की तरफ पलटता हूँ तो जंगल शब्द व्यंग्य सा लगता है ! वो विशाल कैमूर का जंगल तो इन्ही वनविभाग के आला अफसरों ने लूट लिया मोटे – मोटे पेड़ो के दरख़्त रात के अंधेरो में शेर की चमड़ी की तरह बेच दिए गए है 

  बाघ,चीतल,हिरनों और अन्य का बसेरा हुआ करता था यहाँ मगर अब तो पट्टे वाले लाये हुए जोकर बसेरा करते है यहाँ जिन्हें कभी – कभार देखकर लोग पूर्णमासी के चाँद की तरह खुश हो लेते है अब तो यहाँ मैदान और तबाही हाँ वो जंगल भी है जिनमे आदिवासी की लोक परम्परा अपनी अस्मिता को बचा पाने की जद्दोजहद अवसाद से लबालब है 



क्या है केन – बेतवा नदी गठजोड़ –
देश की तीस चुनिन्दा नदियों को जोड़ने वाली राष्ट्रीय परियोजना में से एक है केन – बेतवा नदी गठजोड़ परिजोना इस लिंक हास्यास्पद पहलु ये है कि ग्रेटर गंगऊ बांध बन जाने के बाद दो बड़े बांध धसान नदी, माताटीला जल विहीन होंगे रनगँवा बांध एक डूब क्षेत्र का बांध है इसमे बारिश का जल ठहरने से यह बांध की स्थति में है इसका क्षेत्रफल बड़े दायरे में विस्तार लिए है  वही दौधन बांध को केन में तटबंध बनाकर रोका गया है जिसे गंगऊ बैराज कहते है गंगऊ बैराज के अपस्ट्रीम से 2.5 किलोमीटर दूर दौधन गाँव में केन नदी पर ही 173.2 मीटर ऊँचा ग्रेटर गंगऊ बांध बनाया जाना है यानि 24 किलोमीटर के दायरे में तीन बड़े बांध केन को घेरेंगे इससे धसान नदी में पानी कम हो जायेगा जिसका असर माताटीला डैम पर पड़ेगा और अगर ऐसा हुआ तो केन बेतवा में पानी देने काबिल ही नही बचेगी कैमूर की पहाडिय़ों में अठखेलियां करने वाली केन और 500 किमी के सफर में 20 से ज्यादा बांधों से लदी बेतवा नदी है केन नदी पर डोढऩ गांव में 9,000 हेक्टेयर में बांध की झील बनेगी  केन नदी की कुल लम्बाई से कुछ कम 212 किलोमीटर लम्बी कंक्रीट की नहर से केन नदी का पानी बरुआ सागर ( झाँसी ) में बेतवा नदी में डाला जायेगा इसमे 72 मेगावाट के दो बिजलीघर भी प्रस्तावित है, केन जबलपुर के मुवार गाँव से निकलकर पन्ना की तरफ 40 किलोमीटर आकर कैमूर पर्वत मालाओं के ढलान पर उत्तर दिशा में आती है तिगरा के पास इसमे सोनार नदी मिलती है  पन्ना जिले के अमानगंज से 17 किलोमीटर दूर पंडवा नामक स्थान पर इसमे 6 नदी क्रमशः मिठासन, श्यामरी, बराना छोटी नदियों का संगम होता  है छतरपुर जिले की गौरिहार तहसील को छूती हुई यह बाँदा ( उत्तर प्रदेश ) में प्रवेश करती है ,रास्ते में इसमे बन्ने,कुटनी,कुसियार,लुहारी आदि  सहायक नदी मिलती है दौधन बांध 1915 में बना था इसके समीप ही  ग्रेटर गंगऊ डैम बनाया जाना है  कमोवेश बुंदेलखंड के अन्य बांधो की तरह ये सबसे बड़ा बांध विश्व बैंक के कर्जे से आदिवासी को विस्थापित करने और किसानो को पानी की लूट के लिए मजबूर करेगा बुंदेलखंड के ईको सिस्टम का उलट जाना तो बांध के दंश में शामिल है ही         

- सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित, बाँदा - बुंदेलखंड  
ashishdixit01@gmail.com

Sep 20, 2014

इतिहास रचने वाली बाघिन टी - 4 अब नहीं रही




कान्हा की इस अनाथ बाघिन ने पन्ना को दी है नई ऊंचाई
पालतू से जंगली बनने वाली दुनिया की यह पहली बाघिन
पन्ना, 19 सितम्बर -
पूरी दुनिया में पन्ना टाइगर रिजर्व का नाम रोशन कर एक नया इतिहास रचने वाली बाघिन टी - 4 अब नहीं रही. कान्हा की इस अनाथ पालतू बाघिन ने पन्ना में आकर वह करिश्मा किया है जिससे बाघ प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने की नई संभावनाओं के द्वार खुले हैं. पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना के संस्थापक बाघों में इस बाघिन का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा.

उल्लेखनीय है कि कान्हा टाइगर रिजर्व की इस अनाथ और अद्र्धजंगली बाघिन को जंगली बनाने के अनूठे और अभिनव प्रयोग हेतु 27 मार्च 2011 को पन्ना लाया गया था. बाघिन टी - 4 के पन्ना आने से पहले तक पूरी दुनिया में यह माना जाता था कि जो शावक अनाथ हो गये और किसी मनुष्य के संपर्क में आ गये हैं उन्हें जंगली नहीं बनाया जा सकता. इस मान्यता को बाघिन टी - 4 ने पूरी तरह से गलत साबित कर बाघ प्रजाति के विलुप्त होने की संभावनाओं को भी खत्म कर दिया. पालतू से जंगली बनी दुनिया की इस पहली बाघिन टी - 4 ने पन्ना टाइगर रिजर्व में आकर न सिर्फ जंगली हुई अपितु उसने यहां पृथक - पृथक तीन बार शावकों को जन्म देकर बाघों की वंशवृद्धि में अपना अभूतपूर्व योगदान भी दिया. दूसरी जंगली बाघिनों की तरह टी - 4 ने अपने शावकों का न सिर्फ लालन - पालन किया बल्कि उन्हें खुले जंगल में शिकार करने की कला में भी पारंगत किया. तीसरी बार इस बाघिन ने तीन शावकों को जन्म दिया था जो 14 माह के हो चुके हैं और मां से अलग होकर जंगल में स्वच्छन्द विचरण करने लगे हैं. इन शावकों में दो नर व एक मादा है.

मड़ला परिक्षेत्र में मृत मिली बाघिन
पन्ना टाइगर रिजर्व का नाम रोशन करने वाली बाघिन टी - 4 की मौत से हर कोई दुखी और व्यथित है. क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि अनुश्रवण दल के द्वारा दी गई सूचना के अनुसार 18 सितम्बर की शाम 6.45 बजे बाघिन का मॉर्टलिटी रेडियो सिगनल प्राप्त हुआ. इस आधार पर आज सुबह सर्चिंंग में मड़ला परिक्षेत्र के बीट पठान झिरिया में बाघिन मृत पाई गई. नियमानुसार मौके पर निरीक्षण व जांच के उपरान्त रेडियो कॉलर निकाला गया. प्रारंभिक जांच में 10 वर्षीय इस बाघिन की मौत का कारण अप्राकृतिक नहीं माना जा रहा.

जांच के लिए भेजा गया सेम्पल
बाघिन टी - 4 के शव का पोस्ट मार्टम पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. संजीव कुमार गुप्ता द्वारा किया गया. उन्होंने बताया कि प्रथम दृष्टया बाघिन की मौत प्राकृतिक प्रतीत हो रही है. लेकिन मौत की असल वजह का पता लगाने के लिए सेम्पल जांच हेतु बरेली, जबलपुर, सागर व देहरादून भेजा जा रहा है. जांच रिपोर्ट आने पर बाघिन की मौत के कारणों का पता चल सकेगा. इस पूरी कार्यवाही के दौरान राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण नई दिल्ली के प्रतिनिधि राजेश दीक्षित एडवोकेट मौजूद रहे.

राष्ट्रगान के साथ हुआ अन्तिम संस्कार
महज डेढ़ साल की उम्र में अनाथ होने के बाद इनक्लोजर के भीतर पली बढ़ी यह बाघिन जब पन्ना लाई गई तो किसी को भरोसा नहीं था कि यह जंगली बन पायेगी. लेकिन इस बाघिन ने सारी मान्यताओं और वैज्ञानिक समझ को नकारते हुए पन्ना के जंगल को अपना आशियाना बनाया और तीन बार शावकों को जन्म दिया. इस बाघिन ने यह साबित कर दिखाया कि अनाथ हो जाने वाले बाघ शावकों को पाल पोसकर बड़ा करने के बाद जंगली बनाया जा सकता है. नया इतिहास रचने वाली इस बाघिन की मौत पर पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन के द्वारा श्रद्धांजलि देते हुए राष्ट्रीय गान के साथ अन्तिम संस्कार किया गया.

अरुण सिंह 
aruninfo.singh08@gmail.com

Sep 9, 2014

तो फिर उठ कर खड़ा हो गया पीपल का पेड़



उत्तर भारत के खीरी जनपद में हुआ ये अजीबो गरीब वाकया
चमत्कार को देखने के किये हजारो की भीड़ उमड़ी

मितौली-भूपितपुर। क्षेत्र में देवस्थान के कटे पेड़ की जड़ दुबारा कड़ी हो गई ।हजारो की भीड़ उमड़ी चमत्कार देखने व् पूजा पाठ भी करने लगे ।

क्षेत्र के मल्हपुर गडरिया में देवस्थान पर खड़े पीपल का पेड़ के गिरने के बाद उसकी जड़ दुबारा खड़ी हो जाने से लोग जहां आश्चर्य चकित है वही लोग इसे देवताओ का प्रताप मानते हुए हजारो की भीड़ दर्शन व् पूजापाठ में लग गए। जानकारी के अनुसार मल्हपुर गडरिया में बदलू यादव का पीपल का पेड़ था जो कि 3 महीने पहले गिर गया था गिरे पेड़ की लकड़ी को बदलू ने एक ठेकेदार के हाथ कुछ दिन पहले बेच दिया था। उसकी सारी लकड़ी उठ गई परन्तु उस पीपल का धड़ वही पड़ा रह गया एक दिन पहले पीपल की जड़ पड़ी थी जो की अचानक खड़ी हो गई जिसे देखकर क्षेत्र् के लोग आश्चर्यचकित रह गए। अब उसी स्थान पर हजारो की भीड़ उमड़ पड़ी और लोग पूजा पाठ में लग गए। क्षेत्र के कुछ व्यक्तियों कृष्णकुमार देवीदयाल संजय कुमार लालता प्रशाद कालीचरण आदि लोगो ने बताया की इस पेड़ की कई वर्षो से सिद्ध देव बाबा के नाम से पूजा होती थी ।जरुर इस पेड़ में देवो का वास होगा जिस कारण ये चमत्कार हुआ।

ब्रजेश सिंह
9721505049
(एक दैनिक अखबार में पत्रकार है)

Sep 5, 2014

Public Hearing on the Non- Implementation of Forest Rights

Public Hearing on the Non- Implementation of Forest Rights and the Oppression of Forest Dwellers in Forest Areas of Lakhimpur Khiri


On: 9th of September 2014
At: Palia Kalan, Lakhimpur Khiri district, Uttar Pradesh
 

The Public Hearing to be held on 9th September at Palia Kala, LakhimpurKhiri district aims at bringing attention to the conflict, violence and atrocities inflicted upon the forest people of the Tarai region in Uttar Pradesh.  The Forest Rights Act (FRA), 2006 recognizes the "historical injustices" done to the people living in the forests. However, the Indian Parliament has not defined the nature of such injustice, or the forces that have been responsible for the same. Yet, this Act is a significant step towards creating a democratic and political space within forest areas in the country. It is also a weapon in the hands of forest dwellers to fight the atrocities of the Forest Department and it’s allies.

Lakimpur Khiri is second largest district in UP with the most dense and rich forest cover. The district is part of the Tarai region, which extends along the Nepal border. The forest region is inhabited by Tharu tribes and other marginalised communities such as Dalit and Other Backward Communities (OBC). Even after coming of the FRA, major conflict between the Forest Department, District Administration, Judiciary and other powerful forces have continued. Dominant feudal communities in these areas have been opposing the claims for democratic rights within the forests. Apart from this the environmental lobby has also been opposed to the civil and constitutional rights of forest people inside the National Park and Sanctuaries.

While there is strong pressure from the community to implement this Act, there is no political will on the part of the state to implement the same. The Tarai region has many "Forest Villages" known as Taungiya, as well as other forest villages that were settled during British regime to plant vast forests, primarily for commercial purposes. These villages are now to be recognized as Revenue Villages according to FRA. But except for a few such as Surma in Khiri, two villages in Gonda and two villages in Baharaich, around 30 villages are yet to be converted to Revenue villages.

Apart from the above, there are significant community and community resource rights that are yet to be recognized under this Act. But as yet, efforts to recognize such rights have not taken place at the State level. The delay in recognition is resulting in mounting conflict between the people and state. People, especially women are becoming politically conscious about their rights and are not leaving any stone unturned to claim rights that have consistently been snatched by the State since the  British rule. The entire area of Lakhimpur Khiri has also witnessed vibrant people's movement under the leadership of women in the last one and a half decade, which has brought many positive results.

It is the relentless effort of local organizations with active support of National Forum of Forest People and Forest Workers (Now All India Union of Forest People) that fought democratic and mass struggles in these areas, that has led to the implementation of the FRA in the area. A major achievement has been the reversal of the judgment by the High Court to evict the Surma Forest Village from the Dudhwa National Park in 2003. The community had lost their case in the High Court in 2003, when the Court had ordered the eviction and relocation without verification, under pressure from the environmental lobby. The community resisted the eviction and it was blessing in disguise when the Indian Parliament enacted the FRA in 2006. By building a strong people's movement and engaging in a political dialogue with the UP Govt. In 2008, the High Court order was sent to Law and Justice Department to review by the Govt. In 2011 the order was reversed and the State Govt. took a resolution to convert the Surma village into a revenue village. The conversion process has also now started. 

But such success is unpalatable to existing vested interests and violent attacks on forest communities have taken place. The attack on Nabada Rana by the police and the Forest Department on 20th January 2012, the current attack on Dilawar Nagar village in Mohamaddi Tehsil, and the filing of false cases on hundreds of forest people are glaring examples of such conflicts. Such attacks have resulted in a vibrant struggle against atrocities committed by Forest Department.

The Case of Dilawar Nagar

Dilawar Nagar has been fighting for recognition of their village as forest village since the last one decade under the strong leadership of women. The people were removed from their village in 2005 when their village was burnt to ashes by the order of the then Sub-Divisional Magistrate (SDM) Tulsi Ram and the Forest Department. The fire as well as repeated attacks on the village led to the dispersal of the communities, and it was only in 2008 that the people got organized under the AIUFWP and started an organized struggle against the forest officials. They have continued to carry on their struggle with the help of FRA. The administration, Forest Department and local vested interests are leaving no stone unturned to sabotage the village’s struggle by resorting to illegal and brutal measures. In such a move on the 6th of June 2014 in Dilawar Nagar, 300 houses belonging to Dalit and Adivasi and other forest dwellers were burnt down. While there are as yet no conclusive clues as to what caused the fire, villagers strongly assert the involvement of the Forest Department officials. The communities affected by the recent fire were till 1988 living in the Puranpur Tehsil of District Pilibhit in Uttar Pradesh, till the Sharda river flood washed away their land and the people were rendered homeless for three years. In 1991 the families were resettled in Dilawar Nagar, Gram Panchayat, SimraJanipur, Tehsil Mohammadi, LakhimpurKheri.

Even though many cases were filed against the officials, no charges have been pressed until now. The process of claiming legal entitlements under the Forest Rights Act have also been disrupted by the Forest Department, and cognizance of this incidence and the possible involvement of the forest department officials has been taken by NHRC, as well as various media sources. The National Human Rights Commission has clearly stated that the processes at play in Dilawar Nagar is a violation of the Right to Life and Shelter – that are constitutional provisions.

Compounding the above issues, only minimal rehabilitative measures have been carried out.  300 families of more than a thousand people are still homeless and out of these, only 110 have been provided a paltry compensation of Rs. 5700. There has been no investigation to ascertain the cause of the fire and the district officials have resisted all efforts to address people’s problems.

In response to these atrocities, the Delhi Solidarity Group in collaboration with the All India Union for Forest Working People (AIUFWP), is holding a Public Hearing on 9th of September at Palia Kalan, Lakhimpur Khiri district in Uttar Pradesh so that the forest people from the affected area can depose the matter in front of the larger public. The public hearing will be presided over by an independent panel comprising of concerned individuals from related fields and expertise. The panelists will be visiting Dilawar Nagar on 8th of September to do the fact finding, followed by a public hearing on the 9th of September. The members of the panel are as follows:
  • Mannu Lal Markam (Retired District Judge, Madhya Pradesh)
  • Smita Gupta (Senior Economist at the Indian School of Women’s Studies and Development, New Delhi)
  • Viren Lobo (Activist, Indian Community Activist Network)
  • Dr. Kamal Nayan Choubey (PUDR, Delhi)
  • Prof. Sanjay (Associate Professor in Political Science from LakhimpurKhiri)

The public hearing will focus on cases related to the following key issues: 
Rights of forest dwellers and the implementation of the Forest Rights Act 2006 in forest areas of Lakhimpur Khiri.
-  The oppression of women and their struggle against the forest and district administration.
-  The incident of fire in Dilawar Nagar on 6th of June, and the involvement of forest officials and the damages to the forest dwellers due to the fire.
-   Filling of false cases against the forest people in Lakhimpur Khiri.

The public hearing hopes to bring to the forefront, the issue of Forest Rights and the oppression of forest dwellers in the Lakhimpur Khiri region of UP.

On behalf of:
Delhi Solidarity Group
All India Union of Forest Working People(AIUFWP)

For further queries contact:
Shefali - 9582671784
Shweta - 9911528696
Ishita - 08527325400
Rajnish (AIUFWP) - 0800989223



--
In Solidarity, 
Shefali

Program/Campaign Associate
Delhi Forum 
F 10/12 (Basement),
Malviya Nagar,New Delhi-110017 

Phone: 011 - 26680883 (O), 9582671784 (M)

Sep 3, 2014

मोबाइल रेडियो की शुरूवात करेगा दुधवा लाइव डाट काम

अब जंगलों और गाँवों से गूंजेगी आवाज....





डिजिटल तकनीक के माध्यम से दुधवा लाइव वेब पोर्टल इंटरनेट पर वन्य जीवन एवं पर्यावरण की जानकारियाँ लोगों तक पहुंचाता रहा है, साथ ही दुधवा लाइव वेब-चैनल के माध्यम से प्रकृति की सुन्दरता और विभीषिका के  दृश्य भी प्रस्तुत किए. दुधवा लाइव पत्रिका के ज्ञानपरक आलेखों व् ख़बरों के पाठक व् लेखक भारत के अतिरिक्त विदेशों में भी मौजूद है. पर्यावरण व् वन्यजीवन के सन्दर्भ में डायचे वेले जर्मनी ने दुधवा लाइव को हिन्दी भाषा में सर्वश्रेष्ठ कार्य करने के लिए द बाब्स पुरस्कार २०१३ से सम्मानित किया.

The BOBS Award 2013
वेबपत्रकारिता द्वारा जो मुद्दे व् पूरी दुनिया की नज़र में आते है, उनका सीधा संवाद लेखक/पत्रकार से टिप्पड़ी के माध्यम से होता है बल्कि विमर्श भी हो जाते है. सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों, जंगलों की बातें वेब-पत्रकारिता के माध्यम से दुनिया के हर हिस्से में पहुँचती है और मौजूद रहती है हमेशा सभी के लिए जो तकनीक का इस्तेमाल जानते है, इंटरनेट पर वेबसाइट्स एक प्रकार का सूचनाओं का डाक्यूमेंटेशन है, जो मात्र एक क्लिक की जुम्बिश से लोगों के समक्ष होता है. इसी सिलसिले में सूचनाओं के संचार का एक बेहतर साधन मोबाइल भी है, जो अब ग्रामीण भारत के हर कोने में मौजूद है लोगों के पास, वह चाहे जिस पेशे से जुड़े हुए लोग हो, डाक्टर इंजीनियर्स, आई टी प्रोफेशनल्स और किसान.  इंटरनेट पर वही लोग सूचनाओं का आदान प्रदान कर पाते है जिन्हें कंप्यूटर का ज्ञान हो और वह कम्प्यूटर किसी भी कंपनी के इंटरनेट कनेक्शन से  जुड़े हो और भाषा का भी उत्तम ज्ञान आवश्यक है, परन्तु ग्रामीण भारत में अभी भी लोगों के पास यह सुविधाएं मुहैया नहीं है, लोगों की जरूरतों के मुताबिक़ उनकी ही भाषा में मोबाइल पर सन्देश व् ध्वनी सन्देश  भेजने की व्यवस्था एक कारगर उपाय है सूचना के प्रसार में और उत्तर प्रदेश के तराई जनपद खीरी में इसी परिकल्पना को साकार रूप देने की तैयारी में है "रेडियो दुधवा लाइव".

क्या है रेडियो दुधवा लाइव
मोबाइल व् इंटरनेट पर पर्यावरण कृषि इतिहास व् अन्य शैक्षणिक सूचनाओं का जन जन तक संचार 

विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा रिकार्ड किए हुए वक्तव्यों को वेबसाईट व् मोबाइल पर उपलब्ध करवाना 

ग्रामीण क्षेत्रों व् शहरी क्षेत्रों में विभिन्न वर्गों (कार्यानुरूप) के मोबाइल रेडियों क्लबों की स्थापना 

जनमानस द्वारा अपनी समस्याओं की रिकार्डिंग कर रेडियो दुधवा लाइव/ दुधवा लाइव पत्रिका द्वारा पूरी  दुनिया में संचारित करने की व्यवस्था

खीरी जनपद के थारू व् ग्रामीण क्षेत्र के पारंपरिक गीत संगीत की रिकार्डिंग कर उन्हें वेबसाईट व् मोबाइल पर उपलब्ध कराना 

पारम्परिक ज्ञान- कृषि, पर्यावरण, वनस्पति संबंधी जानकारियाँ लोगों से प्राप्त कर समाज में अधिक से अधिक  लोगों तक पहुंचाना  

जनपद के सभी वर्गों के लोगों को मोबाइल रेडियो के माध्यम से आपस में जोड़ना ताकि वे एक दूसरे की मदद कर सके व् समस्याओं के निस्तारण में सलाह दे सके

किसी भी आपदा के वक्त मोबाइल रेडियों द्वारा जन मानस को आगाह करना व् समस्या से निपटने के तरीकों का विशेषज्ञों व् जिम्मेदार लोगों द्वारा सलाह (बाढ़, स्वास्थ्य एवं मौसम संबंधी जानकारियाँ..)

मोबाइल रेडियो द्वारा ग्रामीण स्तर पर सिटीजन जर्नालिस्ट तैयार करना जो अपने गाँव घर की समस्याओं को सही जगह तक पहुंचा सके

उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद में रेडियो दुधवा लाइव की शुरूवात के लिए तमाम गैर राजनैतिक संगठनो व् सामाजिक कार्यकर्ताओं से सहयोग की अपेक्षा रहेगी ताकि विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोग अपनी जानकारियों को साझा कर सके सबके मध्य............







एडीटर/माडरेटर 
कृष्ण कुमार मिश्र
www.dudhwalive.com 
e-magazine for wildlife & environment
email- editor.dudhwalive@gmail.com

Aug 25, 2014

जल पुरुष के नाम एक पत्र बुंदेलखंड की धरती से


बुंदेलखंड की धरती पर नदियों तालाबों को बचाने के नाम पर ठगी का जो व्यापार चल रहा है उसका एक ये भी मजमून है ज़रा देख लीजिए....................



सेवा में ,                                                                                                     दिनांक – 14.08.2014
                                                                             

 

आदरणीय राजेंद्र सिंह राणा ( जल पुरुष ) तरुण भारत संघ जी / 
श्रीमान श्री प्रकाश सिंह जी ( सचिव नगर विकास विभाग उत्तर प्रदेश शासन ) लखनऊ ,


विषय - आगामी 30 अगस्त 2014 को बुंदेलखंड के जनपद महोबा में होने वाली बैठक के बावत l 

महोदय ,

आप सभी को सादर प्रणाम कर रहा हूँ l आशा है आप सभी प्रबुद्ध जन स्वाथ्य लाभ से सकुशल होंगे l 
उपरोक्त विषयक अवगत कराना है कि आज 13 अगस्त को मैंने महोबा दैनिक जागरण समाचार की स्थानीय संलग्न खबर पढ़ी है l  जिसमे आदरणीय श्री राजेंद्र सिंह राणा जी एवं प्रमुख सचिव ग्राम्य विकास , अन्य सभी आला अधिकारी के सानिध्य में एक बैठक महोबा की चन्द्रावल और झाँसी की पहुंज नदी के पुनर्जागरण को लेकर की जा रही है l इसके लिए साधुवाद है लेकिन कुछ संदर्भित आवश्यक समीचीन प्रश्न भी आपके समक्ष छोड़ रहा हूँ जिनका उत्तर और समाधान बुंदेलखंड के पानीदार भविष्य के लिए जनहित में , समाजहित में है l इन पे ध्यान केन्द्रित करे - 

दैनिक जागरण महोबा 13 अगस्त की खबर देखी मैंने लेकिन सवाल यह भी है अपना कि - 
उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार के मुख्यमंत्री श्रीमान अखिलेश यादव जी के ही सानिध्य में गत 7 फरवरी 2013 और 22 मार्च 2013 को " बुंदेलखंड जल पैकेज 223.91 करोड़ - 16 तालाब के पुनर्निर्माण " को लेकर आहूत की गई थी जिसमे एक की अध्यक्षता माननीय आज़म खान , शिवपाल सिंह यादव जी के साथ झाँसी में और दूसरी स्वयं माननीय मुख्यमंत्री जी के साथ हुई थी l 

इसमे बुंदेलखंड के 16 तालाबो को सहेजने और उनके माध्यम से यहाँ के जल संकट के समाधान खोजने की पहल पर  विस्तार से चर्चा की गई थी l मगर उन 16 तालाबो को हम नही सहेज पाए आज तक l 

1 - 16
प्रस्तावित तालाबो को बचा नही पाए माननीय मुख्यमंत्री जी तो क्या अब दो इन नदियों की बारी !
2 -
तो क्या फिर छला जायेगा बुंदेलखंड का पानी ?

3 -
तो क्या अबकी बार चन्द्रावल और पहुंज नदी का बहाना है पुनर्निर्माण के नाम पर ?


4 – बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश वाले इलाके में प्रस्तावित प्रकृति विनाशक केन – बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना पर आपका क्या मंतव्य है ?

इस पुरे प्रस्ताव में महोबा के 5 तालाब , बाँदा 4 और झाँसी के 6 तालाब थे l जिनमे महोबा के बेला सागर , कीरत सागर ( राष्ट्रीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है )

,
मदन सागर,रैपुरा तालाब, कुरवारा तालाब , कुलपहाड़ तालाब के साथ बाँदा के छाबी तालाब , प्रागी तालाब , , बाबू साहेब तालाब ,गोसाई तालाब , नवाब टैंक , झाँसी के लक्ष्मी तालाब , पचवारा तालाब , बंगरा लठवारा , गुरसराय बड़ागांव और मौउरानीपुर तालाब शामिल थे l जल पैकेज था 223.91 करोड़ रुपया प्रस्तावित हुआ जिसमे 19 करोड़ महोबा और झाँसी से रुपया वापस हुआ जिला प्रसाशन की बदोलत ? ये कार्य " राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम " के तहत होने थे जिसमे आधा रुपया पैकेज का केंद्र सरकार ( आर.आर. योजना से देना था ) को देना था l गत 7 फरवरी 2013 और 22 मार्च 2013 को दो बैठक हुई एक में झाँसी आयुक्त सभागार में माननीय आजम खान मंत्री नगर विकास विभाग , श्रीमान शिवपाल सिंह यादव मंत्री शिचाई / लोकनिर्माण विभाग , सातो जिलो के जिलाधिकारी , चित्रकूट - बाँदा और झाँसी के मंडल आयुक्त , जलनिगम महा प्रबंधक , जल संस्थान अधिकारी , और दुसरे में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव खुद शामिल थे शिवपाल सिंह यादव , श्री आज़म खान के साथ हुई थी l इसकी तीसरी बैठक में भाई पियूष बबेले i इंडिया टुडे पत्रकार सदस्य एक्सपर्ट समिति ) )और श्री सुधीर जैन ( जनसत्ता ) रहे बुंदेलखंड की तरफ से बाकि पहली दो बैठको में मै खुद ( सदस्य एक्सपर्ट समिति ) शामिल रहा था l 
मगर प्रदेश सरकार ने कुछ

नही किया इस सपने का महज हम सबने सब्जबाग ही देखा अभी तक l 16 तालाब आज भी अपने पुनर्निर्माण का रास्ता देख रहे है l बुंदेलखंड क्या हर बार बस वादों के पिटारे  के साथ छला जायेगा ? बुंदेलखंड को सिवाय छलने के सरकारे करती क्या है और उनके लिए इसका मोहरा बनते है सामाजिक कार्यकर्ता , पर्यावरण कार्यकर्ता जिसका समाज में नितांत गलत  सन्देश जा रहा है l आप से निवेदन है कि एक बार पुनः इस पर चिंतन और मंथन की महती आवश्यकता है कि हमसे गलतियाँ कहाँ पे हुई है या हो रही है ?

क्या हर मर्तबा बुंदेलखंड के हिस्से केंद्र और प्रदेश की सरकारे , जन सामाजिक कार्यकर्ता आवाम के सामने प्राकृतिक सम्पदा को  सुरक्षित रखने के नाम पर मात्र अपना प्रसिद्धी का उच्च सोपान ही प्राप्त करती रहेंगी और ये कब तक चलना है ?

आगामी तीस अगस्त का जनपद महोबा में मै आपकी सेवा में एक ज्ञापन पात्र इस सन्दर्भ में प्रस्तुत करूँगा l 
जो कटु बोल लिखे है उनके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ लेकिन ये समय की मांग है जनहितार्थ l समुदाय और समाज के साथ भ्रान्ति उतनी ही घातक है जितना की राज्य और स्वराज्य में मनभेद होना l 
                                                       
                                                                         सादर समर्पित - प्रणाम 
                                    
आपका अनुज – आशीष सागर , बाँदा - बुंदेलखंड 
ashishdixit01@gmail.com

कुछ अखबारों की कतराने बुंदेलखंड में हो रहे पानी के व्यापार की-





दुधवा लाइव डेस्क* 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: