डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol. 5, no. 7, July 2015, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 2, 2015

दुधवा नेशनल पार्क में फिर एक गैंडे की मौत



दुधवा में  गैंडा परियोजन को एक और झटका

पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क की सोनारीपुर रेंज के सलूकापुर गैंडा परियोजना क्षेत्र में बुधवार को दो गैंडों के बीच संघर्ष हो गया। संघर्ष इतना जोरदार था कि इसमें एक गैंडे की मौत हो गई। सूचना मिलते ही वार्डेन एनके उपाध्याय मौके पर पहुंच गए और मौका मुआयना किया। 

दुधवा नेशनल पार्क के सोनारीपुर रेंज में सलूकापुर गैंडा परियोजना क्षेत्र के अम्हा फांटा में बुधवार को दोपहर में एक गैंडे का शव देखा गया। उसके शरीर पर कई जख्म थे सूचना वार्डेन को दी गई जिस पर वार्डेन एनके उपाध्याय मौके पर पहुंचे और मुआयना किया। घटना स्थल पर गैंडों में संघर्ष की पुष्टि हुई है। पार्क अधिकारियों के मुताबिक गैंडों में काफी देर तक संघर्ष हुआ है जिससे एक गैंडे की मौत हो गई है। उसके शरीर पर कई जगह जख्म मिले हैं। गैंडे की संघर्ष में हुई मौत से पार्क को एक और तगड़ा झटका लगा है।
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तीन डॉक्टरों के पैनल ने किया पोस्टमार्टम
मृत गैंडे का पोस्टमार्टम तीन डॉक्टरों के पैनल ने पार्क में ही किया है। पैनल में डॉ. जेबी सिंह, डॉ. सौरभ सिंघई और डॉ. नेहा सिंघई शामिल रहे।
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सुहेली की बताई जा रही तीसरी संतान,  छह साल थी उम्र
मरने वाला गैंडा सुहेली मादा की तीसरी संतान बताई जा रही है। बताया गया है कि उसकी उम्र करीब छह साल थी।
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट घहरे घावों की वजह से हुई मौत
तीन डॉक्टरों के पैनल ने गैंडे की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पार्क प्रशासन को सौंप दी है। वार्डेन के मुताबिक रिपोर्ट में गैंडे की मौत आपसी संघर्ष में आए गहरे जख्मों की वजह से होना पाया गया है।
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महबूब आलम 
पलिया -खीरी 
 m.alamreporter@gmail.com


Jul 1, 2015

बाघ शावकों से गुलजार हुआ पन्ना टाइगर रिजर्व



तीन माह की अवधि में तीन बाघिनों ने दिया शावकों को जन्म
वयस्क सभी 6 बाघिनों के साथ घूम रहे 15 से अधिक शावक 

बाघों के बावत पन्ना टाइगर रिजर्व से अरुण सिंह की ख़ास रिपोर्ट
पन्ना, 1 जून -
म.प्र. का पन्ना टाइगर रिजर्व इन दिनों बाघ शावकों से गुलजार है. यहां विगत तीन माह की अवधि में तीन बाघिनों ने 6 शावकों को जन्म दिया है. इस तरह से टाइगर रिजर्व में मौजूद सभी वयस्क 6 बाघिनें अपने 15 से भी अधिक शावकों को साथ में लेकर स्वच्छन्द विचरण कर रही हैं. पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघ पुर्नस्थापना योजना की यह अनोखी सफलता विस्मय विमुग्ध कर देने वाली है. वर्तमान में यहां बाघों की कुल संख्या 32 हो गई है, जबकि 8 नर बाघ बाहर हैं.

उल्लेखनीय है कि जिस जंगल में बाघ का रहवास होता है वह जंगल समृद्ध और अच्छा माना जाता है. बाघ की मौजूदगी जंगल के बेहतर स्वास्थ्य का परिचायक है. इस लिहाज से पन्ना का जंगल बाघों के लिए अनुकूल और उत्तम रहवास साबित हुआ है. बाघ पुर्नस्थापना योजना शुरू होने के बाद बीते पांच सालों में यहां 41 बाघ शावकों का जन्म हुआ, जिनमें सिर्फ 6 शावकों की मृत्यु हुई. इस तरह से यहां पर बाघ शावकों का सरवाइवल रेट 85 फीसदी से भी अधिक है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है. पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति इस अनोखी सफलता का श्रेय टीम वर्क तथा पन्ना एवं बुन्देलखण्ड के सभी आम व खास लोगों को देते हैं. श्री मूर्ति ने आज पत्रकारों को बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व में मौजूद सभी वयस्क बाघिनें शावकों के साथ हैं, इन शावकों में ढाई माह से लेकर 18 माह तक के शावक हैं.

क्षेत्र संचालक श्री मूर्ति ने बताया कि विगत तीन माह के अन्तराल में जिन तीन बाघिनों ने शावकों को जन्म दिया है, उनमें बाघिन टी - 2, टी - 5 एवं पन्ना - 222 हैं. बाघिन टी - 2 ने तीन शावकों को जन्म दिया है जो लगभग 3 माह के आयु के हैं. जबकि बाघिन टी - 5 के सिर्फ एक शावक को ही प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सका है. बाघिन पन्ना - 222 के साथ दो शावक देखे गये हैं. इन तीन बाघिनों के अलावा पन्ना - 213 के साथ चार शावक, बाघिन टी - 1 के साथ 2 शावक तथा बाघिन टी - 6 के साथ 3 शावक विचरण कर रहे हैं. इन बाघिनों में सिर्फ पन्ना - 213 के चार शावकों के लिंग की पहचान हुई हैं, जिनमें 3 मादा व एक नर शावक है.

बाघों का लिंग अनुपात भी हुआ बेहतर
सबसे उत्साहजनक और सुखद बात यह है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में नर व मादा बाघों की संख्या का अनुपात पूर्व से काफी बेहतर हुआ है. क्षेत्र संचालक श्री मूर्ति ने बताया कि यहां पर वयस्क बाघिन 6 व अर्ध वयस्क बाघिनों की संख्या 5 है. जबकि नर वयस्क 4 व अर्ध वयस्क 5 हैं. इस तरह से मौजूदा समय बाघों की तुलना में बाघिनों की संख्या अधिक है जो शुभ संकेत है. श्री मूर्ति ने बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व बाघों की नर्सरी के रूप में विकसित हुआ है. यहां जन्म लेने वाले शावक अब कोर क्षेत्र से बाहर निकल कर समूचे विन्ध्य व बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जंगल को आबाद कर रहे हैं. पन्ना के बाघों के दहाड़ आने वाले समय में हर तरफ सुनाई देगी.
फोटो  - पन्ना की बाघिन अपने दो शावकों के साथ 

अरुण सिंह 
पन्ना- मध्य प्रदेश, भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com

Jun 29, 2015

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में मितौली में आयोजित की गयी योग-कार्यशाला



योग आदि भारत की है देन
 शिक्षकों व् मितौली क्षेत्र के तमाम लोगों ने की भागीदारी
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में खीरी जनपद के मितौली तहसील में एक विशाल आयोजन हुआ, राजा लोने सिंह विद्यालय के प्रांगण में एक जनसभा आयोजित की गयी जिसमें योग से सम्बंधित जानकारियाँ दी गयी. कार्यक्रम के संयोजक व् दुधवा लाइव जर्नल के सम्पादक कृष्ण कुमार मिश्र ने बताया की योग आदि भारत की देन है यह वैदिक परम्परा से पूर्व के अभ्यास हैं, जिन्हें हमारे लोगों ने प्रकृति से सीखा, पशु पक्षियों से योग की विभिन्न मुद्राओं का मेल है, जाहिर है हमारे पूर्वजों ने इन जीवों से सीखा योग जो आज सार्वभौमिक हो चुका है.



इसी क्रम में सौजन्या संस्था की अध्यक्षा डा० उमा कटियार ने योग की विभिन्न मुद्राओं का अभ्यास करवाया तथा स्वस्थ्य रहने के लिए योग के महत्त्व बतलाये, युवराज दत्त महाविद्यालय की डा० नीलम त्रिवेदी ने भारतीय संस्कृति में योग की परम्परा और उसके महत्वों पर चर्चा की.



कार्यक्रम में कई प्रार्थना के उपरान्त कई योगाभ्यास कराए गए, कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीयगान के उद्घोष के साथ संम्पन्न हुआ. 



कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं राजा लोने सिंह इंटर कालेज के संस्थापक बलबीर सिंह ने योग के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए इस प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सभी को शुभकामनाएं दी.

विद्यालय परिसर में सैकड़ों लोगों ने किया योगाभ्यास, जिसमें प्रशिक्षु शिक्षक, प्राथमिक शिक्षक संघ, स्थानीय जनमानस ने भाग लिया.


कार्यक्रम में शिक्षक राजेन्द्र कटियार, अशोक मिश्रा, वजीहुल हसन, विमल मिश्रा, होमेश्वर पाण्डेय, प्रशांत पाण्डेय, ब्रजकिशोर शुक्ल, एवं युवा व्यापार मंडल मितौली अध्यक्ष अमित गुप्ता, महबूब राजा, प्रशिक्षु शिक्षकों में प्रशांत दीक्षित, सतेन्द्र, नितिन पाण्डेय, शिवसेवक पाण्डेय, आरती मिश्रा, पल्लवी, आदि ने अपनी सहभागिता दी.


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दुधवा लाइव डेस्क

Jun 28, 2015

158 वर्ष बाद क्रान्ति के इस महानायक के गढ़ पर हुआ वन्दे मातरम का उदघोष

1857 की क्रान्ति की 158वीं वर्षगाँठ पर क्रान्ति के महानायक राजा लोने सिंह की मितौली गढ़ी पर विशाल जनसभा ..

158 वर्ष से अधिक पुराने राजा लोने सिंह द्वारा निर्मित शिव मंदिर में हुआ हवन 



मितौली-खीरी, प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के महानायक राजा लोने सिंह की गढ़ी पर स्थानीय मितौलीवासी, शिक्षक व् उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आये हुए प्रशिक्षु शिक्षकों ने अपनी राष्ट्रीय एतिहासिक धरोहर को जानने व् उसे सरंक्षित करने  के जज्बे के साथ एक शैक्षणिक भ्रमण व् विशाल जनसभा का आयोजन किया.,  वन्दे मातरम् के उद्घोष के साथ ही गढ़ी में स्थित गढ़ देवेश्वर महादेव के मंदिर में रुद्राभिषेक हुआ.



कार्यक्रम की अध्यक्षता राजा लोने सिंह विद्यालय के संस्थापक बलबीर सिंह ने की, मुख्य अतिथि कस्ता विधान सभा के विधायक सुनील कुमार लाला व् कार्यक्रम का निर्देशन कृष्ण कुमार मिश्र ने किया.

कार्यक्रम में विधायक सुनील कुमार लाला ने स्थानीय कमेटी बनाकर इस पुरातात्विक महत्त्व के स्थल को सरंक्षित करने की बात कही तथा देश की इस महत्त्व पूर्ण धरोहर को संजोने में अपने हर संभव योगदान देने का आश्वाशन दिया.



बलबीर सिंह ने क्रान्ति के महानायक राजा लोने सिंह के बलिदान की गौरवशाली गाथा से जनमानस को परिचित कराया और साथ ही गढ़ी परिसर में वृक्ष रोपे जाए और उसके लिए ५० ट्री- गार्ड देने की बात कही, इसी सन्दर्भ में मितौली विकास क्षेत्र के प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष होमेश्वर पाण्डेय ने २१ ट्री -गार्ड देने का आश्वासन दिया.


कार्यक्रम के निदेशक कृष्ण कुमार मिश्र-मैनहन ने राजा लोने सिंह की बेगम हज़रात महल के साथ आजादी की लड़ाई के किस्सों से सभी को परिचित कराया और कहा की देश की पुरातात्विक धरोहरों को संजोना हम सभी का संवेधानिक कर्तव्य है.

विधायक सुनील कुमार भार्गव, बलबीर सिंह, कृष्ण कुमार मिश्र, शिव सेवक पाण्डेय, नितिन पाण्डेय, मितौली युवा व्यापार मंडल अध्यक्ष अमित गुप्ता और सभी शिक्षको ने सैकड़ों वर्ष पुराने शिव मंदिर में पूजा अर्चना की, भगवान् शिव को विधायक सुनील कुमार लाला व् कृष्ण कुमार मिश्र ने नारियल चढ़ा कर पूजन किया.



मितौली गढ़ी पर स्थित मजार पर विधायक सुनील कुमार लाला बलबीर सिंह कृष्ण कुमार मिश्र ने चादर चढ़ाई और साम्प्रादायिक सौहार्द की यह मिसाल जहां दो धर्म स्थल मौजूद है उनके विकास की बात कही.

कार्यक्रम में अध्यापक ब्रजकिशोर शुक्ल, रमेश चन्द्र मिश्र, राजेन्द्र कटियार, संतोष भार्गव, प्रशांत पाण्डेय, राजेश पाण्डेय मौजूद रहे, 1857 की क्रान्ति के महानायक की इस ध्वंश गढ़ी पर हजारों लोग एकत्र हुए, सभी ने राजा लोने सिंह की शहादत को याद किया और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली दी.

कार्यक्रम की तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !

दुधवा लाइव डेस्क

Jun 11, 2015

Flying Kites is Dangerous

 "Don’t enjoy at the cost of others"


April  1, 2014. Kheri, UP , India. An Indian short-nosed fruit bat found  cuffed  and injured on ground. This bat was the victim of kiting thread remains on mulberry tree. In urban area, people  enjoy  kiting and remains of the thread used, usually noticed here and there on trees. This Bat came to get mulberry fruits and got cuffed. After desperate  efforts the thread broke  and bat fell down. In the morning one bird watcher  saw  this and released the bat. The bat flew-away  immediately. The question arises that how many urban  birds are lucky enough  to get help in time.     

Ajeet Kumar Shaah 
(The Writer is a Nature Photographer and conservationist in Lakhimpur-Kheri, He may be reached at ajeetkshaah@gmail.com )           

Jun 8, 2015

हम देखेंगे, लाजि़म है कि हम भी देखेंगे...

भू-अधिग्रहण अध्यादेश और दमन के खिलाफ
विशाल जनविरोध प्रदर्शन
12-14 जून 2015
लक्ष्मण पार्क  धरना स्थल-लखनऊ-उ0प्र0
31 मई 2015 को केन्द्र की एन.डी.ए सरकार ने देशभर में हो रहे भरपूर विरोध के बावज़ूद तीसरी बार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को एक बार फिर से जारी कर दिया है। इससे पूर्व इस अध्यादेश को दिनांक 31 दिसम्बर 2014 को व 3 अप्रैल को भी जारी किया गया था। देशभर के खेतीहर किसान, दलित आदिवासी तबकों और भूमि अधिकार के सवाल पर लड़ रहे जनसंगठनों, ट्रेड यूनियनों, संगठनों, संस्थाओं व आम लोगों में भी इसके खिलाफ एक हाहाकार मच गयी थी व संसद में भी विपक्षी सदस्यों ने इस अध्यादेश का भारी विरोध किया। 
क्यूंकि नियम ये है कि अध्यादेश जारी होने के बाद इसे कानून के रूप में बदलने के लिये इसे संसद के दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा में पारित कराना ज़रूरी होता है। संसद में भी भारी विरोध के चलते यह कानून पारित नहीं हो पाया। इसी लिये सरकार को तीन बार अध्यादेश जारी करने की ज़रूरत पड़ी। दोनों बार ही प्रस्तावित कानून लेाकसभा में पारित हो गया था, लेकिन पहली बार राज्य सभा में पारित नहीं हो पाया और दूसरी बार तो राज्य सभा में विरोध के चलते पेश ही नहीं किया गया। क्योंकि तब तक दूसरी बार अध्यादेश जारी होने के बाद उस समय में इस अध्यादेश के विरोध में जो सशक्त जनांदोलन चल रहा है, उनके साथ संसद में अध्यादेश का विरोध कर रहे दलों के साथ इस जनांदोलन का एक तालमेल बन गया, जिसके कारण इसे वे राज्यसभा में पेश नहीं कर पाए और सरकार को मजबूरन इस प्रस्तावित कानून को संयुक्त संसदीय समिति को गठित कर विचार के लिए रखना पड़ा। यह सरकार के लिए एक कदम पीछे हटना था। संसदीय समिति को जुलाई माह में संसदीय सत्र मे अपना सुझाव देना है और तब इस प्रस्तावित कानून पर दोनों सदनों में चर्चा होगी और यह तय होगा कि यह कानून पारित होगा या नहीं। ज्ञात रहे कि मोदी सरकार के पास लोकसभा में भारी बहुमत है लेकिन राज्य सभा में उनके पास बहुमत नहीं है। सवाल यह है कि जब सरकार ने प्रस्तावित विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेज दिया था, तो फिर तीसरी बार अध्यादेश ज़ारी करने की ज़रूरत क्यों पड़ी। साफ ज़ाहिर है कि सरकार को संसदीय प्रणाली में भरोसा नहीं है, इसलिए वह बार-बार अध्यादेश ज़ारी कर रही है। इस से यही साबित होता है कि सरकार ज़मीनों को हड़पने पर तुली हुई है। यह सूटबूट और रंग बिरंगी बंडियों की मोदी सरकार बड़ी-बड़ी कम्पनियों के हाथ देश की ज़मीनें व सम्पदा को सौंपने के लिए ज़रूरत से ज्यादा बैचेन है। इससे पहले भी सरकारों ने प्राकृतिक सम्पदा को कम्पनियों के हाथों में दिया, लेकिन इस कदर ऐसी हड़बड़ी कभी दिखाई नहीं दी। लगता है कि सरकार का टिकना इसी बात पर निर्भर है। अगर जल्दी-जल्दी मालिकों के हाथ में सम्पदा नहीं पहुंची तो शायद इनकी नौकरी चली जाएगी। क्योंकि यह सरकार तो मालिकों की नौकरी कर रही है। उन्हें इस बात की कोई फिक्र नहीं कि देश में हर तबके के लोग ऐसे कानून का विरोध कर रहे हैं। तमाम जनसंगठन, किसान संगठन, खेतीहर मज़दूर संगठन, मानवाधिकार संगठन व तमाम केन्द्रीय मज़दूर संगठन भी सम्मिलत रूप से इसका विरोध कर रहे हैं। लगभग सभी विपक्षी पार्टियां ऐसे कानून का न केवल विरोध कर रही हैं, बल्कि जनसंगठनों के समूह ‘‘भूमि अधिकार आंदोलन’’ के साथ भी तालमेल बना रही हैं। 2 अप्रैल 2015 को संसद क्लब में आयोजित की गई सार्थक बैठक व 5 मई को संसद मार्ग पर किये गये संयुक्त प्रर्दशन से यह बात सामने भी आ गई। सरकार इसी तालमेल से बौखला रही है। इसलिए अध्यादेशबाज़ी से बाज़ नहीं आ रही। चोर चोरी से जाए हेरा फेरी से न जाए। 
ये तो रही केन्द्रीय सरकार की बात अब देखा जाए कि राज्य सरकारें क्या कर रही हैं। जिन राज्यों में एन0डी0ए की सरकार है वहां तो मामला साफ है। लेकिन कई राज्यों में जहां एन0डी0ए की सरकार नहीं है, जैसे उ0प्र0, तेलंगाना, असम, उड़ीसा आदि में ज़मीनी स्तर पर सरकारी मशीनरी जबरन भूमि अधिग्रहण में लगी हुई है। ज़्यादहतर राज्यों में अभी भी वनविभाग वनाश्रित समुदायों को विस्थापित करने में लगा हुआ है, सिंचाई विभाग बांधों के नाम से कृषि एवं ग्रामसभा की भूमि को गैरकानूनी रूप से छीन कर लोगों को जबरन विस्थापित कर रहा है, रोड व ढांचागत निर्माण के नाम से लोक निर्माण विभाग शहरी और गांव की ज़मीनें बेधड़क हड़प रहे हैं। सरकार चाहे किसी की भी हो सरकारी मशीनरी एक ही बात जानती है, कि विकास के नाम पर सारी भूमि कम्पनियों और ठेकेदारों के हाथ में दे दो। राज्य सरकारें चाहे कांग्रेस, सपा, अन्ना डी.एम.के, बी.जे.डी या टी.आर.एस की हो सबकी चाल मोदी चाल ही है। क्योंकि इस काम में अफसरों, बड़े बड़े कांट्रेक्टरों, सीमेंट व लोहा कम्पनियों, बड़े-बड़े मशीन बनाने वाले उद्योगों की चांदी ही चांदी है। इन सारे चक्करों में फंस कर आम जनता बेहाल होती जा रही है। इसलिए आज जो संसद में विरोध में चल रहा है, वो कब तक चलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। देखना यह है कि संयुक्त संसदीय समिति की बैठक में सबसे पहले राज्यों के मुख्य सचिवों को बुलाया गया है, जो अपने-अपने राज्य की तरफ से क्या पेशकश देते हैं? जैसे उ0प्र0 में मुख्य मंत्री ने स्पष्ट रूप से यह ऐलान किया कि प्रदेश में कोई भी भूमि जबरन नहीं ली जाएगी। लेकिन बावजूद इसके अधिकारीगण जमीन अध्रिगहण के सारे हथकंडे अपना रहे हंै, चाहे गोली क्यों न चलाई जाए। जिसकी सबसे बड़ी ताज़ा मिसाल सोनभद्र में बन रहे कनहर बांध में जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में चल रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान 14 अप्रैल 2015 को अम्बेडकर जयंती के दिन आंदोलनकारियों पर सीधे गोली चलाने की घटना में मिलती है।यही नहीं इसके बाद 18 अप्रैल को एक बार फिर सुब्ह निकलते ही जब लोग आधी नींद में थे


पुलिस ने स्थानीय गुंडों माफियाओं की मदद लेकर एक बार फिर सैकड़ों राउंड गोली बारी की व बिना किसी महिला पुलिस के महिलाओं, बुजु़र्गों, नौजवानों पर खुला लाठी चार्ज किया, निशाना साध कर सरों पर सीधे वार किये गये जिसमें सैकड़ों लोग घायल हुए। जिसमें आदिवासी नेता अकलू चेरो के सीने पर पुलिस द्वारा निशाना साध कर गोली चलाई गई, गोली सीने के आर-पार निकल जाने के कारण अकलू चेरो की जान तो बच गई, लेकिन इरादा हत्या का ही था। उ0प्र0 के एक कददावर मंत्री ने आंदोलनकारीयों को अब अराजक तत्व बताया है ठीक उसी तरह जिस तरह केन्द्रीय सरकार ने दिल्ली विधान सभा के अधिकारों के लिए लड़ रही दिल्ली सरकार को अराजकतावादी बताया है। विदित हो कि यह सब खेल सत्ता के इशारे पर पुलिस प्रशासन द्वारा उस 2300 करोड़ रुपये के लालच में किया गया जो कि बाॅध के निर्माण के लिये आना है। 
भूमि अधिकार आंदोलन जो कि देश के तमाम जनसंगठनों का साझा मंच है और जो केन्द्रीय स्तर पर इस अध्यादेश के खिलाफ संघर्षरत है और इस साझा मंच के बैनर तले दिल्ली में दो बड़ी रैलीयां की गई हैं। तमाम विरोधी सांसदों के साथ वार्ता भी की गई, जिसका सीधा असर संसद की बहस में दिखाई दिया। यह आंदोलन इसके साथ-साथ राज्य की स्थिति के बारे में भी जागरूक है। इसलिएयह साझा आंदोलन हर राज्य के मुख्यालय और क्षेत्रों में भी विरोध प्रर्दशन के कार्यक्रम चला रहा है, ताकि आम जनता जागरूक हो और राज्य सरकार भी सचेत हो। राज्य सरकारों को भी अपनी जनता के प्रति प्रतिबद्धता भी जाहिर करना ज़रूरी है। केन्द्र में तो अध्यादेश का विरोध करें और क्षेत्र में भूमि हड़प कार्यक्रम चलाकर कुछ और करें ऐसा नहीं चल सकता। इसलिए भूमि अधिकार आंदोलन उ0प्र0 की राजधानी लखनऊ में भी एक तीन दिवसीय धरने का आयोजन करने जा रहा है, जो कि 12 जून 2015 से 14 जून तक चलेगा। इस कार्यक्रम को अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन आयोजित कर रहा है, जिसमें देश के तमाम जनसंगठन भी शामिल होंगे। 
हमारी मांगे -
1. राज्य में जबरन किसी भी तरह का भूमि अधिग्रहण नहीं किया जाए।

2. कनहर नदी पर बनाए जा रहे बांध के काम को रोकने के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के 24 दिसम्बर 2014 के आर्डर के तहत जनता के प्रतिरोध को 14 अप्रैल 2015 को अम्बेडकर जंयती पर व 18 अप्रैल को पुलिस द्वारा गोली एवं लाठी चार्ज कर आदिवासीयों एवं अन्य समुदायों पर जो दमन किया गया उसकी उच्च स्तरीय न्यायिक जांच अथवा सी0बी0आई जांच कराई जाए। 7 मई 2015 के एन.जी.टी के फैसले के तहत नये काम पर तत्काल रोक लगायी जाये।

3. कन्हर गोली कांड़ के दोषी अधिकारियों पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं की गई और घायलों की तरफ से प्राथमिकी को फौरन दर्ज किया जाए।

4. आंदोलनकारियों पर दायर असंख्य फर्जी केसों को फौरन वापिस लिया जाए, आंदोलन के नेता गंभीरा प्रसाद, राजकुमारी, पंकज भारती, अशर्फी यादव, लक्ष्मण भुईयां, को बिना शर्त रिहा किया जाए।

5. 14 अप्रैल को गोली कांड़ में घायल अकलु चेरो पर लगाये गये तमाम फर्जी केसों को खत्म किया जाए, उनका पूरा इलाज सरकारी खर्च पर चलाया जाए एवं उनको सरकारी नौकरी मुहैया कराई जाए।

6. सन् 2006 में संसद में पारित केन्द्रीय विशिष्ट कानून वनाधिकार कानून-2006  के क्रियान्वयन की स्थिति प्रदेश में अभी तक दयनीय बनी हुई है, जिसके कारण वनक्षेत्रों में समुदायों व वनविभाग के बीच का टकराव लगातार बढ़ रहा है लोग अभी तक अपने हक़-ओ-हुकूक से वंचित हैं। इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

7. इस देश के नागरिकों को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, कि वे संविधान में प्राप्त अपने मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 19 के तहत अपनी बात रख सके, संगठन का निर्माण कर सकें व संगठित हो कर अन्याय के विरूद्ध लड़ सकें। जनवादी तरीके से चल रहे जनआंदोलनों पर दमन की कार्रवाईयों पर पूरी तरह से रोक लगे व ऐसा करने वाले अधिकारियों को कड़े रूप से दंडित किया जाये। जिला सोनभद्र में प्रशासन द्वारा लगायी गयी अघोषित आपातकालीन स्थिति को समाप्त किया जाये व शांति बहाल की जाये।

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां, रूई की तरहा उड़ जायेंगे
हम महक़ूमों के पाॅव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर, जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
हम देखेंगे, लाजि़म है कि हम भी देखेंगे -‘‘फै़ज़’’

अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन
भूमि अधिकार आंदोलन
रोमा 
romasnb@gmail.com

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: