डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.6, no.7, July 2016, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 23, 2016

पानी दूर हुआ या हम ?




ग्लेशियर पिघले। नदियां सिकुङी। आब के कटोरे सूखे। भूजल स्तर तल-वितल सुतल से नीचे गिरकर पाताल तक पहुंच गया। मानसून बरसेगा ही बरसेगा.. अब यह गारंटी भी मौसम के हाथ से निकल गई है। पहले सूखे को लेकर हायतौबा मची, अब बाढ़ की आशंका से कई इलाके परेशान हैं। नौ महीने बाद फिर सूखे को लेकर कई इलाके हैरान-परेशान होंगे। हम क्या करें ? वैश्विक तापमान वृद्धि को कोसें या सोचें कि दोष हमारे स्थानीय विचार.व्यवहार का भी है  ? दृष्टि साफ करने के लिए यह पङताल भी जरूरी है कि पानी हमसे दूर हुआ या फिर पानी से दूरी बनाने के हम खुद दोषी है।
पलटकर देखिए। भारत का दस्तावेजी इतिहास 75,000 वर्ष पुराना है। आज से 50.60 वर्ष पहले तक भारत के ज्यादातर नगरों में हैंडपम्प थे, कुएं थे, बावङियां, तालाब और झीलें थी, लेकिन नल नहीं थे। अमीर से अमीर घरों में भी नल की चाहत नहीं पहुंची थी। दिल्ली में तो एक पुराना लोकगीत काफी पहले से प्रचलित था . ''फिरंगी नल न लगायो'' 
स्पष्ट है कि तब तक कुआं नहीं जाता था प्यासे के पास। प्यासा जाता था कुएं के पास। कालांतर में हमने इस कहावत को बेमतलब बना दिया। पानी का इंतजाम करने वालों ने पानी को पाइप में बांधकर प्यासों के पास पहुंचा लिया। बांध और नहरों के ज़रिये नदियों को खींचकर खेतों तक ले आने का चलन तेज हो गया। हमें लगा कि हम पानी को प्यासे के पास ले आये। वर्ष 2016 में मराठवाङा का परिदृश्य गवाह बना कि असल में वह भ्रम था। हमने पानी को प्यासों से दूर कर दिया। 
हुआ यह कि जो सामने दिखा, हमने उसे ही पानी का असल स्त्रोत मान लिया। इस भ्रम के चलते हम असल स्त्रोत के पास जाना और उसे संजोना भूल गये। पानी कहां से आता है ? पूछने पर बिटिया कहेगी ही कि पानी नल से आता है, क्योंकि उसे कभी देखा ही नहीं कि उसके नगर में आने वाले पानी का मूल स्त्रोत क्या है। किसान को भी बस नहर, ट्युबवैल, समर्सिबल याद रहे। नदी और धरती का पेट भरने वाली जल सरंचनाओं को वे भी भूल गये। आंख से गया, दिमाग से गया। 

पहले एक अनपढ़ भी जानता था कि पानी, समंदर से उठता है। मेघ, उसे पूरी दुनिया तक ले जाते हैं। ताल.तलैया, झीलें और छोटी वनस्पतियां मेघों के बरसाये पानी को पकङकर धरती के पेट में बिठाती हैं। नदियां, उसे वापस समंदर तक ले जाती हैं। अपने मीठे पानी से समंदर के खारेपन को संतुलित बनाये रखने का दायित्व निभाती हैं। इसीलिए अनपढ़ कहे जाने वाले भारतीय समाज ने भी मेघ और समंदर को देवता माना। नदियों से मां और पुत्र का रिश्ता बनाया। तालाब और कुआं पूजन को जरूरी कर्म मानकर संस्कारों का हिस्सा बनाया। जैसे.जैसे नहरी तथा पाइप वाटर सप्लाई बढ़ती गई। जल के मूल स्त्रोतों से हमारा रिश्ता कमजोर पङता गया। ''सभी की जरूरत के पानी का इंतजाम हम करेंगे।'' नेताओं के ऐसे नारों ने इस कमजोरी को और बढ़ाया। लोगों ने भी सोच लिया कि सभी को पानी पिलाना सरकार का काम है। इससे पानी संजोने की साझेदारी टूट गई। परिणामस्वरूप, वर्षा जल संचयन के कटोरे फूट गये। पानी के मामले में स्वावलंबी रहे भारत के गांव.नगर 'पानी परजीवी' में तब्दील होते गये।

हमारी सरकारों ने भी जल निकासी को जलाभाव से निपटने का एकमेव समाधान मान लिया। जल संसाधन मंत्रालय, जल निकासी मंत्रालय की तरह काम करने लगे। सरकारों ने समूचा जल बजट उठाकर जल निकासी प्रणालियों पर लगा दिया। 'रेन वाटर हार्वेस्टिंग' और 'रूफ टाॅप हार्वेस्टिंग' की नई शब्दावलियों को व्यापक व्यवहार उतारने के लिए सरकार व समाजण्ण् दोनो आज भी प्रतिबद्ध दिखाई नहीं देती। लिहाजा, निकासी बढ़ती जा रही है। वर्षा जल संचयन घटता जा रहा है। ’वाटर बैलेंस' गङबङा गया है। अब पानी की 'फिक्सड डिपोजिट' तोङने की नौबत आ गई है। भारत 'यूजेबल वाटर एकाउंट' के मामले में कंगाल होने के रास्ते पर है। दूसरी तरफ कम वर्षा वाले गुजरात, राजस्थान समेत जिन्होने भी जल के मूल स्त्रोतों के साथ अपने रिश्ते को जिंदा रखा, वे तीन साला सूखे में भी मौत को गले लगाने को विवश नहीं है। 

जल के असल स्त्रोतों से रिश्ता तोङने और नकली स्त्रोतों से रिश्ता जोङने के दूसरे नतीजों पर गौर फरमाइये।

नहरों, नलों और बोरवैलों के आने से जलोपयोग का हमारा अनुशासन टूटा। पीछे.पीछे फ्लश टाॅयलट आये। सीवेज लाइन आई। इस तरह नल से निकला अतिरिक्त जल-मल व अन्य कचरा मिलकर नदियों तक पहुंच गये। नदियां प्रदूषित हुईं। नहरों ने नदियों का पानी खींचकर उन्हे बेपानी बनाने का काम किया। इस कारण, खुद को साफ करने की नदियों की क्षमता घटी। परिणामस्वरूप, जल-मल शोधन संयंत्र आये। शोधन के नाम पर कर्ज आया; भ्रष्टाचार आया। शुद्धता और सेहत के नाम पर बोतलबंद पानी आया। फिल्टर और आर ओ आये। चित्र ऐसा बदला कि पानी पुण्य कमाने की जगह, मुनाफा कमाने की वस्तु हो गया। समंदर से लेकर शेष अन्य सभी प्रकार के जल स्त्रोत प्रदूषित हुए; सो अलग। बोलो, यह किसने किया ? पानी ने या हमने ? पानी दूर हुआ कि हम ??

अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-92
amethiarun@gmail.com
9868793799

आइये, जल मैत्री बढ़ायें

Water well of Raja Lone Singh of Mitauli





आइये, पानी से रिश्ता बनायें



नदियों को जोङने, तोङने, मोङने अथवा बांधने का काम बंद करो। रिवर.सीवर को मत मिलने दो। ताजा पानी, नदी में बहने दो। उपयोग किया शोधित जल, नहरों में बहाओ। जल बजट को जल निकासी में कम, वर्षा जल संचयन में ज्यादा लगाओ। नहर नहीं, ताल, पाइन, कूळम आदि को प्राथमिकता पर लाओ। 'फाॅरेस्ट रिजर्व' की तर्ज पर 'वाटर रिजर्व एरिया' बनाओ। ये सरकारों के करने के काम हो सकते हैं। पानी की ग्राम योजना बनाना, हर स्थानीय ग्रामीण समुदाय का काम हो सकता है। आप पूछ सकते हैं कि निजी स्तर पर मैं क्या कर सकता हूं  ? 
संभावित उत्तर बिंदुओं पर गौर कीजिए :

1.     पानी, ऊर्जा है और ऊर्जा, पानी। कोयला, गैस, परमाणु से लेकर हाइड्रो स्त्रोतों से बिजली बनाने में पानी का उपयोग होता है। अतः यदि पानी बचाना है, तो बिजली बचाओ; ईंधन बचाओ; सोलर अपनाओ। 

2.    दुनिया का कोई ऐसा उत्पाद नहीं, जिसके कच्चा माल उत्पादन से लेकर अंतिम उत्पाद बनने की प्रक्रिया में पानी का इस्तेमाल न होता हो। अतः न्यूनतम उपभोग करो; वरना् पानी की कमी के कारण कई उत्पादों का उत्पादन एक दिन स्वतः बंद करना पङ जायेगा। 

3.    एक लीटर बोतलबंद पानी के उत्पादन में तीन लीटर पानी खर्च होता है। एक लीटर पेटा बोतल बनाने में 3.4 मेगाज्युल ऊर्जा खर्च होती है। एक टन पेटा बोतल के उत्पादन के दौरान तीन टन कार्बन डाइआॅक्साइड निकलकर वातावरण में समा जाती है। लिहाजा, बोतलबंद पानी पीना बंद करो। पाॅली का उपयोग घटाओ।

4.    आर ओ प्रणाली, पानी की बर्बादी बढ़ाती है; मिनरल और सेहत के लिए जरूरी जीवाणु घटाती है। इसे हटाओ। अति आवश्यक हो, तो फिल्टर अपनाओ। पानी बचाओ; सेहत बचाओ।

5.    पानी दवा भी है और बीमारी का कारण भी। पानी को बीमारी पैदा करने वाले तत्वों से बचाओ। फिर देखिएगा, पानी का उचित मात्रा, उचित समय, उचित पात्र और उचित तरीके से किया गया सेवन दवा का काम करेगा।

6.    सूखे में सुख चाहो, तो कभी कम बारिश वाले गुजरात.राजस्थान के गांवों में घूम आओ। उनकी रोटी, खेती, मवेशी, चारा, हुनर और जीवन.शैली देख आओ। बाढ़ के साथ जीना सीखना चाहो, तो कोसी किनारे के बिहार से सीखो। बाढ़ और सुखाङ के कठिन दिनों में भी दुख से बचे रहना सीख जाओगे।

7.    प्याऊ को पानी के व्यावसायीकरण के खिलाफ औजार मानो। पूर्वजों के नाम पर प्याऊ लगाओ। उनका नाम चमकाओ; खुद पुण्य कमाओ।

8.    स्नानघर.रसोई की जल निकासी पाइप व शौचालय की मल निकासी पाइप के लिए अलग-अलग चैंबर बनाओ। गांव के हर घर के सामने सोख्ता पिट बनाओ। छत के पानी के लिए 'रूफ टाॅप हार्वेस्टिंग' अपनाओ। 

9.    जहां सीवेज न हो, वहां सीवेज को मत अपनाओ। शौच को सीवेज में डालने की बजाय, 'सुलभ' सरीखा टैंक बनाओ। 

10.    बिल्डर हैं, तो अपने परिसर में वर्षा जल संचयन सुनिश्चित करो। खुद अपनी जल-मल शोधन प्रणाली लगाओ। पुनर्चक्रीकरण कर पानी का पुर्नोपयोग बढ़ाओ। मल को सोनखाद बनाओ।

11.    फैक्टरी मालिक हैं, तो जितना पानी उपयोग करो उतना और वैसा पानी धरती को वापस लौटाओ। शोधन संयंत्र लगाओ। तालाब बनाओ।

12.    कोयला, तैलीय अथवा गैस संयंत्र के मालिक हैं, तो उन्हे पानी की बजाय, हवा से ठंडा करने वाली तकनीक का इस्तेमाल करो।

13.    किसान हैं, तो खेत की मेङ ऊंची बनाओ। सूखा रोधी बीज अपनाओ। कम अवधि व कम पानी की फसल व तरीके अपनाओ। कृषि के साथ बागवानी अपनाओ। देसी खाद व मल्चिंग अपनाकर मिट्टी की गुणवत्ताा व नमी बचाओ। बूंद.बूंद सिंचाई व फव्वारा पद्धति अपनाओ। 

14.    जन्म, ब्याह, मृत्यु में जलदान, तालाब दान यानी महादान का चलन चलाओ। मानसून आने से पहले हर साल नजदीक की सूखी नदी के हर घुमाव पर एक छोटा कुण्ड बनाओ। मानसून आये, तो उचित स्थान देखकर उचित पौधे लगाओ। नदी किनारे मोटे पत्ते वाले वृक्ष और छोटी वनस्पतियों के बीज फेंक आओ।

15.    ''तालों में भोपाल ताल और सब तलैया'' जैसे कथानक सुनो और सुनाओ। जलगान गाओ। बच्चों की नदी.तालाब.कुओं से बात कराओ। पानी का पुण्य और पाप समझाओ। जल मैत्री बढ़ाओ। असल जल स्त्रोताें से रिश्ता बनाओ।

 अरुण तिवारी 
दिल्ली
amethiarun@gmail.com
9868793799

Jul 10, 2016

यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में आयोजित हुई तालाब सरंक्षण पर राष्ट्रीय कार्यशाला



लखीमपुर से शुरू तालाब बचाओ अभियान अब प्रदेश व् देश स्तर पर-

सात दिवसीय जल-यात्रा का समापन हुआ यू पी प्रेस क्लब लखनऊ में-

लखीमपुर खीरी में तालाब बचाओ अभियान की शुरुवात करने वाले वन्य जीव विशेषग्य कृष्णकुमार मिश्र की यह मुहिम प्रदेश व् देश स्तर पर कई संगठनों के साथ विस्तारित हुई है, नदियाँ, कुँए, तालाब के सरंक्षण में जनपद के विधायक, और जनमानस भी इनके अभियान में साथ जुड़ा, साथ ही तराई की धरती पर भी बाढ़ और सूखे के प्रभावों के अध्ययन का अनुभव प्रदेश व् देश के उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी मिले इस उद्देश्य से दुधवा लाइव डॉट कॉम के बैनर तले यह मुहिम प्रदेश व्यापी हुई, कृष्ण कुमार मिश्र ने बताया की  सन २००० में  भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय एवं सलीम अली पक्षी विज्ञान संस्थान द्वारा  शुरू किए गए इनलैंड वेटलैंड्स प्रोजेक्ट में कार्य किया है जिसके तहत उन्होंने प्रदेश के तराई जनपदों में खीरी, बहराइच, सीतापुर व् हरदोई जनपद में तालाबों नदियों व् नाम भूमियों का वैज्ञानिक अध्ययन किया, यह प्रोजेक्ट जूलोजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया से गवर्न हुआ और तबके उतरांचल के देहरादून में कई कार्यशालाएं आयोजित की गयी जिमें इन्होने वेटलैंड्स के अध्ययन व् डाटा कलेक्शन की विधाए भी सीखी जो मौजूदा समय में इनके तालाब बचाओ अभियान में मददगार साबित हो रही है.



दुधवा लाइव डॉट कॉम के संस्थापक कृष्ण कुमार मिश्र के सरंक्षण में सात दिवसीय जल-यात्रा जो बांदा से एक जुलाई को शुरू हुई और सात जुलाई को लखनऊ पहुँची, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जल-यात्रियों के सम्मान में प्रायोजक दुधवा लाइव एवं प्रवासनामा खबर द्वारा प्रेसक्लब लखनऊ में आठ जुलाई को एक जल-विमर्श कार्य शाला  का आयोजन हुआ, जिसमे मुख्य वक्ता के तौर पर कृष्णकुमार मिश्र (वन्य जीव विशेषग्य), सुधीर जैन (जल-विशेषग्य, एनडीटीवी), वी के जोशी (भूगर्भ वैज्ञानिक), स्वामी आनंद स्वरूप, आशीष सागर, पीयूष बबेले (इंडिया टुडे), ने तालाबों और नदियों के सन्दर्भ में अपने मत व्यक्त किए. तालाब भूदान एवं चारागाह मुक्ति अभियान कार्यक्रम का आयोजन अन्नदाता की आखत के माध्यम से हुआ.



जल -सरंक्षण कार्यशाला में कृष्ण कुमार मिश्र ने तालाबों के प्राकृतिक स्वरूपों को बनाए रखने पर जोर दिया, ना कि उन्हें गड्ढे में तब्दील करने के, एक आदर्श तालाब वही है जो मध्य में गहरा फिर किनारों पर उथला जिसमे तमाम वनस्पतियाँ मौजूद हो ताकि तालाब का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ्य रहे, साथ ही उन्होंने कहाँ की नवीन तालाब खुदवाने में यह ध्यान नहीं दिया जाता की उसमे चारो तरफ से बरसात का पानी ठीक से आ सकेगा या नहीं, और तालाब खुदाई के बाद उसके चारो तरफ की मिट्टी भी नहीं हटाई जाती नतीजतन तालाब में बारिश का पानी नहीं इकट्ठा हो पाता, तालाबों पर समुदायों की निर्भरता भी रही है उसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.
भूगर्भ वैज्ञानिक वी के जोशी ने गोमती और गंगा नदी पर अपने विचार रखे और कहा की गोमती दस हज़ार वर्ष पुराणी नदी है, जो अविरल बह रही है, साथ ही गंगा नदी की खासियत बताते हुए उन्होंने कहा की गंगा ग्लेशियर से निकलती है और गोमती मैदानी क्षेत्रों से फिर भी इन नदियों की खासियत यह है की यह धरती से नीर लेती है और धरती को नीर देती हैं और तभी यह सदानीरा हैं, ग्लेशियर से गंगा को अलग कर दे या ग्लेशियर पूरा पिघल जाए फिर भी गंगा बहती रहेगी.
सुधीर जैन ने अपने बुंदेलखंड के अनुभव साझा किए साथ ही तालाबों के अध्ययन की वैज्ञानिक व् तकनीकी विधियों पर बात की. 



दुधवा लाइव सामुदायिक संगठन ने जल-यात्रियों का किया सम्मान-

नलिनी मिश्रा एवं राम बाबू तिवारी के नेतृत्व में इलाहाबाद विश्व विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सात दिवसीय बुंदेलखंड की यात्रा में दुधवा लाइव द्वारा दिए गए वेटलैंड सर्वे के फोर्मेट पर वहां के तालाबों की दशा का विवरण भरा है, जो भविष्य में तालाबों के उद्धार के लिए बनने वाली योजनाओं और शोधकार्यों में काफी मददगार साबित होगा, इन जल-यात्रियों के इस उम्दा काम के लिए कृष्ण कुमार मिश्र ने 9 जल-यात्रियों को प्रशस्ति पत्र देकर तथा फूलमाला पहनाकर सम्मानित किया. 


रेडियो दुधवा लाइव व्हाट्सएप ग्रुप द्वारा जल-यात्रा को किया गाइड-

लखीमपुर खीरी  में तालाब बचाओ जन-अभियान के प्रणेता कृष्ण कुमार मिश्र द्वारा पूरे सप्ताह बांदा से लखनऊ तक की यात्रा को लखीमपुर खीरी से संचालित किया गया तकनीक के माध्यम से, जल-यात्रियों की खैर-खबर व् उन्हें वेटलैंड्स के डाटा कलेक्शन में मदद ग्रुप के माध्यम से दी गयी, साथ ही एक एक गाँव के तालाबों की तस्वीरें व् विवरण जल-यात्रियों द्वारा रेडियो दुधवा लाइव लखीमपुर को भेजा जाता रहा.



दुधवा लाइव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल के ऑफलाइन संस्करण का हुआ विमोचन-

यू पी प्रेस क्लब लखनऊ में आयोजित तालाब सरंक्षण पर कार्यशाला में जनसत्ता व् एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार व् लेखक सुधीर जैन द्वारा लखीमपुर खीरी से प्रकाशित वन्य जीवन व्  कृषि पर आधारित दुधवा लाइव जर्नल के ऑफलाइन संस्करण का विमोचन किया, इस हिन्दी व् अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाले जर्नल के पीडीफ अंक ऑनलाइन स्थल अकेडेमिया डॉट एडू व् इस्स्सू डॉट कॉम पर भी मौजूद है. जून का अंक जल-विशेषांक के तौर पर प्रकाशित किया गया है.

दुधवा लाइव डेस्क 

Jul 2, 2016

गंगा मैली है और वो महज़ व्यापार कर रहे हैं...

Image Courtesy-  http://www.gangaaction.org/


ये तो गंगा के व्यापारी निकले 

उन्होने कहा - ''मैं आया नहीं हूं, मां गंगा ने बुलाया है।'' लोगों ने समझा कि वह गंगा की सेवा करेंगे। बनारसी बाबू लोगों ने उन्हे बनारस का घाट दे दिया; शेष ने देश का राज-पाट दे दिया। उन्होने ’नमामि गंगे’ कहा; जल मंत्रालय के साथ ’गंगा पुनर्जीवन’ शब्द जोङा; एक गेरुआ वस्त्र धारिणी को गंगा की मंत्री बनाया। पांच साल के लिए 20 हजार करोङ रुपये का बजट तय किया। अनिवासी भारतीयों से आह्वान किया। नमामि गंगे कोष बनाया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की स्थापना की। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का पुनर्गठन किया। बनारस के अस्सी घाट पर उन्होने स्वयं श्रमदान किया। गंगा ने समझा कि यह उसके प्रति भारतीय संस्कृति की पोषक पार्टी के प्रतिनिधि और देश के प्रधानमंत्री की आस्था है। वह अभिभूत हो गई कि चलो अब उसके भी अच्छे दिन आयेंगे; उसके भी गले में लगे फांसी के फंदे हटेंगे; उसे उसका नैसर्गिक प्रवाह हासिल होगा; खुलकर बहने की आज़ादी मिलेगी; मल से मलीन होने से जान छूटेगी। 

पहला झटका: नदी विकास

जल मंत्रालय के साथ ’नदी विकास’ शब्द भी जोङा गया। नदी विशेषज्ञों को पहला झटका लगा। भला कहीं कोई नदी का भी विकास कर सकता है ? किंतु मां गंगा ने इसे भी एक संतान का अति उत्साह ही माना। लेकिन शीघ्र ही इस नदी विकास की पोल खुलने लगी। ’जल मंथन’ और ’गंगा मंथन’ कार्यक्रमों में नदी जोङ परियोजना को तेज करने और इस पर राज्यों की सहमति बनाने की कोशिश ज्यादा हुई, गंगा की अविरलता-निर्मलता पर कम। गंगा अफसोस करने लगी। उसे अब समझ में आया कि नदी विकास का मतलब, तथाकथित विकास के लिए नदी का ह्यस होता है। जिसे गंगा सेवक समझा था, वह तो गंगा का व्यापारी निकला। एक बार फिर छले जाने से मां गंगा दुखी है। 

घटना चक्र देखिए: पिछले डेढ़ दशक के सक्रिय गंगा आंदोलनों, सामने आये अध्ययनों और जांच समितियों की  समितियों की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अविरलता सुनिश्चित किए बगैर गंगा की निर्मलता सुनिश्चित करना संभव नहीं है। इसी बिना पर मैने यह बात बार-बार दोहराई है कि गंगा निर्मलता को धन से ज्यादा धुन की जरूरत है; अविरलता सुनिश्चित करने की धुन। किंतु क्या 'नमामि गंगे' के कर्णधारों ने यह धुन सुनी। नही, उन्होने गंगा के नाम पर बजट बढ़ाने और व्यवसाय बनाने की चिंता की। 

दूसरा झटका: दिखावटी काम, बेबस गंगा मंत्री 

उन्होने गंगा मंत्री उमा भारती जी को शोध, अध्ययन, जन-जागरूकता, गंगा किनारे औषधि विकास, गंगा ग्राम विकास, ई निगरानी विकास, घाट विकास, मल शोधन संयंत्र विकास, गंगा कार्यबल विकास और गंगा किनारे के गांवों में शौचालय विकास का झुनझुना थमा दिया। बजाती रहिए; लोगों को भरमाती रहिए। 'नमामि गंगे के पीछे छिपे असल व्यापारिक एजेण्डे की पूर्ति के लिए  परिवहन, पर्यावरण और ऊर्जा मंत्रियों को लगा दिया। गंगा की मूल धाराओं पर बांध परियोजनाओं को लेकर उमा भारती जी ने पर्यावरण मंत्री को एक चिट्ठी भेजकर रस्म अदायगी भी कर दी कि देखो मैने तो अपना विरोध दर्ज करा दिया था। अब वे नहीं सुनते, तो मैं क्या करूं ? 

कभी वह कहती हैं कि गंगा के लिए कानून बनाने के लिए राज्यों से बात करंेगी। कभी कहती हैं कि सुनिश्चित करेंगी कि अवजल चाहे शोधित हो, चाहे अशोधित वह नदियों में नहीं जाये। किंतु उनकी बात बयानों से आगे बढ़ नहीं रही। उमा भारती जी की बेबसी देखिए कि उनके मंत्रालय के ’राष्ट्रीय भूजल प्रबंधन बेहतरी कार्यक्रम’ का प्रारूप भी विश्व बैंक बना रहा है। शायद यह बेबसी ही है, जो उनके दिल पर बैठ गई है। ईश्वर, उमाजी को स्वस्थ रखे।

तीसरा झटका: अविरलता पर चुप्पी

गौर कीजिए कि उत्तराखण्ड में गंगा की अविरलता बाधित करने के लिए एक नहीं, 60 परियोजनायें हैं। याद कीजिए, मनमोहन सरकार में उत्तराखण्ड में बांधों को लेकर कितनी तकरार हुई थी; कितने अनशन, कितने आंदोलन। स्वयं केन्द्र की पहल पर गठित रवि चोपङा कमेटी रिपोर्ट ने यह माना भी था कि 2013 में हुई उत्तराखण्ड त्रासदी और उसके दुष्प्रभावों को बढ़ाने में जल विद्युत परियोजनाओं के तहत् बने बांधों और सुरंगों की नकारात्मक भूमिका थी। मोदी सरकार ने तय किया कि बांधों को लेकर चर्चा करना ही बंद कर दो। ’नमामि गंगे’ के बीते दो सालों में बांधो को लेकर चुप्पी ऐसी छाई जैसे चर्चा करने वालों को भी बता दिया गया कि वे भी चर्चा न करें। आखिर कोई तो वजह होगी कि बांधों को लेकर सक्रिय रही गंगा महासभा, उत्तराखण्ड नदी बचाओ, स्वामी सानंद, जलपुरुष राजेन्द्र सिंह, ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य... सभी ने चर्चा बंद कर दी है। खैर, आगे देखिए।

चौथा झटका: मंजूरी मंत्री में तब्दील हुए पर्यावरण मंत्री

पर्यावरण, वन एवम् जलवायु परिवहन मंत्री को काम दिया कि पर्यावरण का चाहे जो हो, परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने में देर न होने पाये। प्रकाश जावेङकर जी ने यही किया भी। जैसे वह पर्यावरण संरक्षण मंत्री ने होकर पर्यावरण मंजूरी मंत्री हों। 

गौर कीजिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये बगैर विकास जारी रखने के लिए दुनिया के 170 देशों ने 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में एक औजार पेश किया था - ''

प्रत्येक  परियोजना के पर्यावरण प्रभाव का आकलन जरूरी हो।''भारत  ने भी इसे स्वीकारा। अब भारत सरकार का पर्यावरण, वन एवम् जलवायु परिवर्तन मंत्रालय वर्ष 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना के दस्तावेज में बदलाव करने जा रहा है। मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी बदलाव के प्रारूप में पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को छूट दी जा रही है कि पर्यावरण अनुपूरक योजना के साथ काम जारी रख सकेंगी । सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च की अध्ययनकर्ताओं ने इसे पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना की हत्या करने की ओर उठा कदम करार दिया है।

पांचवां झटका: गंगा से ऊर्जा और पर्यटन 

भारत सरकार के बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा है कि जल विद्युत परियोजनाओं को गति देने के लिए वह जल ऊर्जा नीति लायेंगे। पर्यटन मंत्री डाॅ. महेश शर्मा जी बनारस में ई नौका पर्यटन का खेल सजायेंगे। 

बनारस के मछुआरों को इस खेल से नफा होगा कि नुकसान ? कभी जाकर किसी ने पूछा ?? 

छठा झटका: गंगा जलमार्ग परियोजना

परिवहन मंत्री नितीन गडकरी जी को गंगा से व्यापार का जिम्मा दिया गया है। वह गंगा जल मार्ग परियोजना ले आये। यहां भी विश्व बैंक ! हर सौ किलोमीटर पर एक बैराज की घोषणा कर डाली। जहाजों को चलाने के लिए 45 मीटर की चौड़ाई में गंगा को गहरी करने का भी दावा ठोक दिया। मामला अदालती हुआ, तो बैराज नहीं बनाने का हलफनामा दे दिया। 

सोचिए, 
क्या गंगा जलमार्ग परियोजना से गंगा को कुछ लाभ होगा ? 
क्या इससे गंगा अविरल या निर्मल होगी ??

नहीं, व्यापारियों को लाभ होगा। सउदी के लोग टापू बनाने के लिए भारतीय महासागर की रेत निकाल ले गये। ये जानते हैं कि गंगा की रेत अनोखी है; अनमोल! ये गंगा की बेशकीमती रेत बेचकर नोट बनायेेेंगे। जलपोत चलाकर बेरोक-टोक माल ले जायेंगे । उससे गंगा प्रदूषित होगी, तो हो। गहरीकरण करने से गंगा का पानी कम चैङाई में सिमटेगा। गंगा के पाट की चौड़ाई  घटेगी। जो ज़मीन सूखी बचेगी, ये ’रिवर फ्रंट डेवल्पमेंट’ के नाम पर उसे बेच देंगे। ऐसा करके ये पहले बिना सरकारी धन के नदी विकास करने को लेकर अपनी पीठ ठोकेंगे; फिर खरीददारों को मुनाफा कमावयेंगे। अमेरिका यूं ही गंगा विकास में  रुचि नहीं दिखा रहा है। साबरमती में यही हुआ है। 

गौर कीजिए कि भागलपुर के कहलगांव में गंगा के गहरीकरण का काम शुरु हो गया है। इस गहरीकरण ने मानव आहुति लेनी भी शुरु कर दी है। गहराई का अंदाजा न मिल पाने के कारण पिछले छह महीने में वहां के बरारी घाट पर 20 से अधिक मौते हुईं हैं। 
ऊपर गंगा बांध दी, नीचे लहरें बेचने जा रहे हैं। क्या गंगा बख्शेगी ? 
याद कीजिए, दक्षिणी चीन के हुआन में क्या हुआ ? एक बांध पानी नहीं रोक पाया। दो लाख बेघर हो गये। 

सातवां झटका: गंगाजल बिक्री को बढ़ावा

अमेज़न - आॅनलाइन खरीददारी की अग्रणी कंपनी है। वह 299 रुपये में एक लीटर गंगाजल बेच रही है। दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद जी ने डाक से घर-घर गंगाजल पहुंचाने की घोषणा कर दी है। उन्होने भी गंगाजल बेचकर कमाने वालों की राह आसान करने की योजना बना ली है। 

अब बताइये कि इस पूरे कार्यक्रम में  गंगा की अविरलता और निर्मलता कहां है ? यह तो नमामि गंगे की बजाय गंगा बिक्री का कार्यक्रम है। 

आठवां झटका : अमेरिकी संसद  में तालियों के निहितार्थ 

अमेरिकी संसद में भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण पर तालियों की गङगङाहट का निहितार्थ अब पता चला है कि अमेरिका अब गंगा स्वच्छता की योजना भी बनायेगा और पैसा भी लगायेगा। अब पता चला है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए एजेण्डा तय करने के लिए गंगा संगम पर हुई भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में ’नमामि गंगे’ को चुनावी लाभ की उपलब्धि को जनता तक ले जाना तो दूर, चर्चा करना भी क्यों मुनासिब नहीं समझा गया। अब समझ में आया कि उमा भारती जी ने प्रस्तावित उत्तर प्रदेश चुनाव के वर्ष के पश्चात् के वर्ष 2018 तक गंगा सफाई संबंधी बयान क्यों दिया। 

नौवां झटका : स्वच्छता यानी सिर्फ शौचालय 

अब समझ में आया कि स्वच्छता के नाम पर सबसे ज्यादा ज़ोर शौचालय पर ही क्यों हैं। भारत में शौचालय बनाने के काम को लेकर आयोजन विदेशों में क्येां हो रहे हैं; देश के भीतर दबाव बनाने के लिए अधिकारी नैतिक-अनैतिक सब तरीके क्यों अपना रहे हैं। आखिरकार गांव-गांव बंद कमरे के शौच से भी तो आगे बङा धंधा है भाई। टंकी, मोटर, सैनेटरी सामान, बिजली आपूर्ति, जलापूर्ति, पानी का बिल; सबसे बङा धंधा तो तब होगा, जब ग्रामीण शौचालय का मल संभालना मुश्किल हो जायेगा। घर-घर शौचालय के चलते भूजल प्रदूषित होगा। गांव-गांव तालाब और नदियां मल ढोने लगेंगी। उपाय के तौर पर पानी साफ करने वाली मशीने जायेंगीं। सीवेज पाइप पहुंचेंगी। मल शोधन संयंत्र लगाने जरूरी हो जायेंगे। पानी का बिल और सीवेज का चार्ज तो अपने आप पहुंच जायेंगे। 

दसवां झटका : वित्त मंत्री की अध्यक्षता में गंगा सफाई समिति

मेरे ख्याल से अब तक हमें यह भी समझ में आ जाना चाहिए कि गंगा सफाई और स्वच्छ भारत को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में समिति क्यों बनाई गई है; क्योंकि उनके लिए गगा व स्वच्छता पूर्णरूपेण एक वित्तीय एजेण्डा है, पर्यावरणीय नहीं। 

ग्यारवां झटका : सांस्कृतिक बोल, वित्तीय खेल

क्या न्यायसंगत बात है कि अपने यहां पर्यावरण विरोधी विकास माॅडल अपनाने और परिणामस्वरूप हर माह कोई न कोई तबाही झेलने वाला चीन अब महाराष्ट्र का सूखा निपटायेगा और भारत को प्रदूषण मुक्ति की तकनीक बतायेगा !! क्या यह पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में  अघोषित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति है ? गंगा मीटिंग में मोंटेक सिंह अहलुवालिया तो कहते ही रह गये '' सीवेज  इज ब्लैक गोल्ड, सीवेज इज ब्लैक गोल्ड''  ये तो  मल और गंगाजल के उनसे भी तेज व्यापारी निकले। बातें नमामि संस्कृति की और निगाहें एफ डी आई पर !!



अरुण तिवारी 
amethiarun@gmail.com

Jul 1, 2016

नदी जोड़ों परियोजना- कही प्राकृतिक विनाश का आमंत्रण तो नहीं ?



क्या नदियों को जोड़ देना ही समस्या का समाधान है


एक बार फिर केन-बेतवा नदी जोडऩे के बहाने केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने नदी जोड़ों परियोजना को हवा दे दी है। अबकि उमा ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का जिक्र करते हुए कहा कि इस परियोजना में देरी करना राष्ट्रीय अपराध है। वे बोली कि जब मैं इसे राष्ट्रीय अपराध कह रही हूं तो मेरा आशय है कि इस परियोजना से मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश दोनों प्रदेशों के बुंदेलखंड क्षेत्र के 70 लाख लोगों की खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होगा जिन्हें पानी की कमी, फसल खराब होने एवं अन्य कारणों से दिल्ली और अन्य महानगरों में पलायन करने को मजबूर होना पड़ता है, उन्हें महानगरों में बद्तर जिंदगी गुजारने और मजदूरी करने को मजबूर होना पड़ता है। यहां तक तो ठीक है लेकिन उमाजी ने इस परियोजना में होने वाली देरी पर अनशन की चेतावनी दे दी।

 बेशक लोकतंत्र की यही ताकत है। बुंदेलखंड की प्यासी जमीन और लाखों लोगों को राहत देने के लिए केन-बेतवा नदियों को जोडऩे के प्रस्ताव पर मंजूरी नहीं मिलने की स्थिति में अनशन सहित आंदोलन की घोषणा कर उमा क्या निशाना साधना चाहती है यह तो गर्भ में है। बताते है कि उमाजी ने अनशन का मन वन्यजीव मंजूरी मिलने में विलंब से क्षुब्ध होने के बाद बनाया है। वे इस विलंब के चलते ही रूष्ट होकर बोली कि पिछले काफी समय से इस परियोजना को वन्यजीव समिति की मंजूरी नहीं मिल पाई है। पर्यावरण मंत्रालय की वन्य जीव समिति के समक्ष केन-बेतवा संगम परियोजना विचाराधीन है, जबकि मंत्रालय ने हर एक बिन्दु को स्पष्ट कर दिया है, उस क्षेत्र में सार्वजनिक सुनवाई पूरी हो चुकी है। इस विषय पर पर्यावरण मंत्रालय अथवा मंत्री प्रकाश जावडेकर से भी कोई मतभेद नहीं है। बल्कि एक ऐसी समिति जिसमें कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं है, न कोई मंत्री है और कोई सांसद सदस्य है, वह समिति इसे मंजूरी नहीं दे रही है जबकि केन-बेतवा नदी क्षेत्र के लोग इसके पक्ष में हैं। 

इसके आगे वे बोली कि केन- बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के आगे बढऩे से अन्य 30 नदी जोड़ो परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त होगा। अगर लाखों लोगों की खुशहाली सुनिश्चित करने वाली इस परियोजना को पर्यावरणविदों, एनजीओ की हिस्सेदारी वाली स्वतंत्र वन्यजीव समिति की मंजूरी में आगे कोई अड़चन आई तो बर्दाशत नही करेगी और अनशन पर बैठ जाएगी। बहरहाल एक केन्द्रीय मंत्री की इस पहल को लेकर आमजन में चर्चा और आशंका यह है कि आखिर उमाजी नमामी गंगे का राग अलापते- अलापते आखिर केन-बेतवा परियोजना को मंजूरी दिलाने का राग क्यों अपनाने लगी है। बता दे कि वे स्वयं जल संसाधन नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय की मंत्री हैं। नदी जोड़ परियोजना उनके मंत्रालय के तहत है और वह स्वंय बुंदेलखंड की चुनी हुई जन प्रतिनिधि हैं। साध्वी के इस हठ राग को लेकर चर्चा तो यह भी है कि कहीं वे नदी जोड़ परियोजना के बहाने खुद को उत्तरप्रदेश में स्थापित तो नही करना चाहती है। आगामी दिनों में यूपी में चुनाव होने है और इसी बहाने कहीं वे अपनी राजनीति चमकाना चाहती हो।

 बताते है कि जब से स्मृति ईरानी को यूपी में सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करने की बाते चलने लगी है तब से तो उमा की निंदें ओर भी हराम है। अब तो यूपी की मुख्यमंत्री बनने के सपने भी आने लगे है। केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना के बहाने ही वह बुंदेलखंड़ के आवाम को भी साधती दिख रही है, तभी तो वह यह कहने से भी नही चुकी कि मैं बुंदेलखंड के लोगों का भी इस अनशन में हिस्सा लेने के लिए आह्वान करूंगी। नदी जोड़ो परियोजना नरेन्द्र मोदी सरकार की प्रतिबद्धता है और इसे पूरा किया जायेगा। सरकार ने इस क्षेत्र में पन्ना रिजर्व से जुड़े विषय पर ध्यान दिया है और बाघ एवं गिद्धों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। पर्यावरणविदों की आपत्तियों पर तीखा प्रहार करते हुए उमा बोली कि अगर इनको पर्यावरण की चिंता है तो चिडिय़ाघरों पर आपत्ति क्यों नहीं उठाते। बांध की ऊंचाई कम करने के मामले में भी वह कहती है कि ऊंचाई के विषय पर कोई समझौता नहीं होगा। इस परियोजना से 70 लाख लोगों को फायदा होगा,जबकि 7 हजार लोग प्रभावित होंगे और वे दूसरी जगह जाने को तैयार है क्योंकि वे जिस क्षेत्र में रह रहे हैं वह अधिसूचित क्षेत्र हैं और उन्हें कई समस्याएं आती हैं। 

सवाल यह है कि सरकार में बैठे मंत्रियों,सांसदों को विभिन्न मंत्रालयों के बीच धीमी गति से चलने वाली फाइलों के लिए आंदोलन की चेतावनी देने की नौबत क्यों आ जाती है। नदियों के जल के सही उपयोग और लाखों लोगों की जीवन रक्षा जैसे प्रस्तावों पर महीनों तक अड़ंगेबाजी क्यों होती है। बुंदेलखंड और मराठवाड़ा में किसान-पशु मरते हैं और लालफीताशाही के कारण योजनाएं लटकी रहती हैं। बिहार हो या पूर्वोत्तर राज्य या चाहे हिमाचल प्रदेश या उत्तराखंड, पर्यावरण की रक्षा के लिए समुचित कदम कहीं भी नहीं उठाए गए हैं। भारत सरकार चाहे विदेशी भूगर्भ विज्ञानियों की रिपोर्ट पर आपत्ति एवं खंडन कर दे, लेकिन असलियत तो यही है कि बढ़ते प्रदूषण से भारतीयों की औसत उम्र करीब 6 वर्ष कम हो रही है। कुछ इलाकों में यह और अधिक होगी। अमेरिकी भूगर्भ विज्ञानी संस्थान के अध्ययन में कोई राजनीतिक पूर्वाग्रह नहीं हो सकता है। 

जरूरत है तो सिर्फ सर्वोच्च स्तर पर पर्यावरण एवं पशु संरक्षण के लिए कारगर कदम उठाए जाने की न कि अनशन जैसी बचकानी हरकतों की। खैर उमा भारती, केन-बेतवा नदी जोड़ो की गुगली फेंक कर क्या अर्जित करना चाहती है यह कहना तो कठिन है लेकिन इसमें दो राय नही है कि नदियों को जोडऩे का काम आसान नही है। नदी जोडऩे की परियोजना देश की सिंचाई, बाढ़ और खाद्य संकट जैसी बहुत सी समस्याओं को खत्म कर सकती है लेकिन यह इतना भी आसान नही है जितना हमारे राजनेता समझते है। बता दे कि नदियों को जोडऩे की चर्चा देश में रह-रह कर उठती रही है। यह सिलसिला 1970 के दशक से लगातार चल रहा है। उन दिनों गंगा को कावेरी से जोडऩे की बात होती थी और अब लगभग 30 नदियों को जोडऩे का प्रस्ताव है जिनमें से केन- बेतवा नदी जोड़ो परियोजना भी एक है।

 इन सभी नदियों को जोडऩे के प्रस्ताव पर सन् 2002 में उच्चतम न्यायालय ने एक तरह से मुहर लगा दी थी और तभी से इस मुददे ने एक राजनीतिक रूप भी ले लिया है। यह एक सच है कि नदी जोड़ो जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना के माध्यम से देश में सिचांई और बाढ़ की समस्या को हमेशा के लिए खत्म करने का दावा और संकल्प जुड़ा हुआ है। इस हिसाब से देखे तो नदी जोड़ो योजना ऐसी है, जिससे आप बहुत सी उम्मीदें बांध सकते हो। इससे हम देश की खाद्य समस्या के हल होने की आशा भी पाल सकते है। पर असल सवाल तो यह है कि आखिर मोदी सरकार लगभग 5.6 लाख करोड़ रूपये की नदी जोड़ो योजना के लिए संसाधन कहां से जुटाएगी, यही सवाल पिछले 13 सालों से उठता रहा है। इस बीच लागत संभवत: 22-25 लाख करोड़ तो हो ही गई है। सबसे पहला और अहम प्रश्र तो यही है कि क्या सरकार ने इसके लिए धन का प्रबंधन कर लिया है? अगर कर भी लिया है तो इसके पूरा होने का लक्ष्य भी तय कर लिया होगा। बताया जाता है कि नदी जोड़ो योजना को सन् 2016 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था जो अब 2030 तक भी पूरा होते नही दिखाई दे रही है। इस योजना के लक्ष्य को देखते हुए केन्द्र सरकार ने धन का प्रबंधन कर भी लिया हो, तब भी इसके क्रियान्वयन में संदेह है। काबिलेगौर हो कि इस योजना के संबंध में पंजाब और केरल पहले ही अपनी नाराजगी जाहिर कर चुका है। इन दोनों राज्यों ने नदी जोड़ योजना के विरोध में ही अपना मत दिया था। इसके साथ ही बिहार का भी यही कहना था कि पहले अपनी नदियों को जोडक़र उसके परिणाम देखेगें उसके बाद ही राष्ट्रीय स्तर पर इसका समर्थन करेगा, और वह भी तब जब उसके पास अपनी जरूरतों के अतिरिक्त पानी बचेगा। कुछ इसी तरह का जवाब असम का भी था और वह इस योजना को लेकर ज्यादा उत्साहित नही था, यह बात दीगर है कि अब असम में भाजपा की सरकार है।

 यह भी ध्यान देने काबिल है कि असम और बिहार ऐसे दो राज्य है जिनके पास देश में अतिरिक्त पानी उपलब्ध होने की बात कही जाती है। असल में नदियों को जोडऩे के पीछे जो मकसद बताया जा रहा है वह यह है कि देश की नदियों में कहीं बाढ़ तो कहीं सुखाढ़ पड़ा है अगर नदियों को जोड़ दिया जाएगा तो सिंचाई का रकबा भी बढ़ जाएगा, लेकिन सच तो यह है कि नदियों में तेजी से पानी घट रहा है। बिहार के सहरसा और खगडिय़ा जैसे जिलों में आज से कोई दस साल पहले बाढ़ ने अपना घर बना लिया था लेकिन अब यहां वर्षा 1300 मिलीमीटर से घटकर 1000 मिलीमीटर तक आ गई है ,इस कारण वहां की नदियों का जल स्तर भी कम होना पाया गया है, इसकी किसी को कोई चिंता नही है। असल सवाल तो यही है कि जब नदियों में पानी ही नही होगा तो नदियों को जोडक़र भी क्या कर लेगें। बहरहाल हम नदियों को जोडऩे का काम शुरू कर भी दे तो इसकी क्या गारंटी की इस योजना का हर राज्य समर्थन ही करेगा। नदी जोड़ परियोजना के मामले में हम थोड़ा अतीत में झांककर देखते है। ज्ञात हो कि पुनर्वास और तटबंधो के रेखांकन को लेकर व्यापक जन-आक्रोश के कारण 1956 के अंत में कोसी नदी के निर्माणाधीन तटबंधों का काम रोक देना पड़ा था। तब यह सवाल बिहार विधानसभा में भी उठा था और उस समय सरकार ने सदन को बताया था कि जन विरोध के कारण काम बंद कर देना पड़ा। इसके साथ ही सदन में यह भी कहा गया कि 1957 के आम चुनाव के बाद जब समुचित मात्रा में पुलिस बल उपलब्ध हो जाएगा, तब काम फिर से शुरू कर दिया जाएगा। यह एक सच है कि कोसी तटबंधों के निर्माण का काम पुलिस की देखरेख में ही हुआ था, इसके लिए अनेक लोगों को जेलों भी ठुंसा गया था। यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नदी जोड़ योजना को लागू करने में नही होगी। गर ऐसा विवाद नही भी खड़ा हो तब भी हम नदी जोड़ों योजना की अनियमितताओं को लेकर राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की 1980 की रिर्पोट पर नजरे इनायत करना नही भुले। इस रिर्पोट के अनुसार बाढ़ की सारी बहस और जानकारी यूपी , बिहार , असम , ओडि़सा और पश्चिम बंगाल के इर्द- गिर्द ही घुमती थी, इसमें महाराष्ट्र , गुजरात , कश्मीर , राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों की गिनती ही नही होती थी। लेकिन अब ऐसा नही है, अब बाढ़ की कहानी इन्हीं प्रांतों से शुरू होती है और यहीं पर खत्म हो जाती है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि सन् 1952 में देश का बाढग़्रस्त क्षेत्र 250 लाख हेक्टेयर था, जो केन्द्रीय जल आयोग के अनुसार अब बढक़र 500 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है। इस आंकडें को देखते हुए इतना तो अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि बाढ़ नियंत्रण या प्रबंधन को लेकर अब तक जितना भी काम किया गया और पैसे लगाए गए , उसने फायदे कि जगह नुकसान ही पहुंचाया है। इस गलत पूंजी निवेश के कौन लोग उत्तरदायी है, इसकी तो आज तलक कहीं चर्चा नही हुई है। हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस पर चर्चा भले ही न कि हो लेकिन इस बात पर भी विचार नही किया जा रहा है कि अगर नुकसान हुआ है तो कम से कम अब तो ऐसे काम न किए जाए। इस तरह के काम बंद कर दिए जाए जिससे आम जनता की पूंजी का नुकसान हो रहा हो।

 जो लोग नदियों के जुडऩे के बाद सिंचाई का रकबा बढऩे की बात करते है उनके लिए भी केन्द्र सरकार की रिर्पोट आईना दिखाने का काम करती है। असल में सिंचाई के क्षेत्र में देश में जितनी भी उपलब्धता है वह एक सीमा पर आकर ठहर गई है, इस बात का समर्थन स्वंय सरकार की रिर्पोटें भी करती है। रिर्पोर्टों के अनुसार 1991 से 2006 के बीच बड़ी और मध्यम आकार की सिंचाई परियोजनाओं पर प्राय: दो लाख करोड़ रूपये खर्च हुए और सिंचाई का रकबा इतने निवेश के बाद भी आगे खिसका ही नही। ऐसे लगता है अब जो कुछ उम्मीद बची है वह नदी जोड़ योजना पूरी करेगी। चिंता का सबब तो यह है कि इस योजना को देश की बाढ़ और सिंचाई समस्या का आखिरी समाधान बताया जाता है लेकिन अब तक की बिना किसी उत्तरदायित्व के बनी योजनाओं का जो हश्र हुआ है, उसकी पृष्ठभूमि को देखते हुए यह डऱ लगना लाजिमी है कि अंतिम समाधान कहीं पुरानी बातों पर पर्दा ड़ालने के काम आया तो देश की कृषि व्यवस्था किस खाई में गिरेगी, इसकी कल्पना भी भयावह है। नदी जोड़ योजना का राग अलापने वाले हमारे नेता फिर भी यह मानने को तैयार नही है कि यह समस्या का समाधान नही है। 


संजय रोकड़े 
103, देवेन्द्र नगर अन्नपूर्णा रोड़ इंदौर
 संपर्क-09827277518
ईमेल- mediarelation1@gmail.com

Jun 28, 2016

दुधवा लाइव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल का जल-विशेषांक "आज भी खरे हैं तालाब"


जल-विशेषांक 

दुधवा लाइव पत्रिका का मई-जून २०१६ का प्रकाशित अंक पीडीएफ के रूप में यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं.

Dear Friends,
I am pleased to share Dudhwa Live International Magazine Vol.6 Issue 5-6, May-June 2016, please check the link below to download the 44 pages Print edition (PDF)

http://issuu.com/dudhwalive/docs/dudhwa_live_issue_may-june_best_201

Dudhwa Live Magazine has been assigned ISSN number as a continuing resource (ISSN Number - 2395 - 5791) from Jan 2010. This will help in electronic archiving and act as a bibliographical tool so that students, researchers, librarians can use it to give the precise references of a serial publication.
To contribute articles to Dudhwa Live Magazine, mail to editor.dudhwalive@gmail.com
I look forward to your inputs and support in preserving our natural treasure. For other interesting articles and images check –






Please feel free to email, circulate in your network to raise awareness.
Regards,

Krishna Kumar Mishra


विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

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Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen  संस्मरण गौरैया और मैं -- (3) ....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी बात उस समय की है जब घर के नाम पर ...

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!