डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

इस जिन्दा खूबसूरती को नष्ट न करे..तस्वीर पर क्लिक करे

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Nov 15, 2014

पर्यटकों के लिए खोल दिया गया दुधवा पार्क



हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति ने फीता काटकर किया उद्घाटन

दुधवा टाइगर रिजर्व-खीरी से डीपी मिश्रा

दुधवा नेशनल पार्क को विधिविधान से फीता काटकर पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। उद्घाटन के अवसर पर दुधवा की सात हट तथा गेस्ट हाउस का वीआईपी सूट में रूके पर्यटकों ने जंगल का भ्रमण किया। दुधवा जंगल का भ्रमण करके हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरूण टंडन व पीके शाही ने प्रथम पर्यटक होने का गौरव हासिल किया। गैंडा दर्शन के साथ ही न्यायमूर्तिद्वय ने अन्य वन्यजीव जंतुओं को जंगल में करीब से विचरण करते देखकर खुशी जताई। 




यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क पर्यटकों के भ्रमण के लिए खोल दिया गया है। इससे पूर्व दुधवा पर्यटन परिसर में आयोजित संक्षिप्त समारोह पर पहले विधिविधान से मेन गेट पर हुई पूजा के बाद हाईकोर्ट इलाहाबाद के न्यायमूर्ति अरूण टंडन तथा लखनऊ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पीके शाही ने फीता काटकर पर्यटन सत्र का उद्घाटन किया। इस दौरान मौजूद हाथी शिशु सुहेली व विनायक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बिन्दु बने रहे। जबकि न्यायमूर्ति अरूण टंडन तथा न्यायमूर्ति पीके शाही ने दुधवा दर्शन करके नए सत्र के प्रथम पर्यटक बनने का गौरव हासिल किया। उन्होंने सलूकापुर पहुंचकर हाथी से गैंडा दर्शन करने के साथ ही जंगल में स्वच्छंद घूमते हुए अन्य जीव जन्तुओं को करीब से देखकर खुशी जताते हुए दुधवा की जैवविविधता की भरपूर सराहना की।


 इसके अतिरिक्त सिंचाई विभाग के सचिव एमपी अग्रवाल ने परिवार के संग दुधवा दर्शन किया। इसके साथ ही अन्य तमाम पर्यटकों ने जिप्सी गाडि़यों से जंगल का यादगार भ्रमण किया। डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि दुधवा आने वाले पर्यटकों को कोई दिक्कत या परेशानी न हो इसके निर्देश अधीनस्थों को दिए गए हैं। इसके बाद भी असुविधा होने पर पर्यटक सीधे हमसे संपर्क कर सकते हैं। श्री सिंह ने बताया कि पर्यटकों के लिए इस बार दुधवा, दक्षिण सोनारीपुर, गैंडा इकाई, सोठियाना एवं किशनपुर वन्यजीव विहार खोला गया है। श्री सिंह ने सभी के प्रति आभार जताते हुए दुधवा के जंगल में पालीथीन आदि न फेंकने, वन्यजीवों से छेड़छाड़ न करने एवं पार्क के नियमों का पालन करने की अपील पर्यटकों से की है। इस दौरान दुधवा पर्यटन रेंजर टीआर दोहरे, दक्षिण सोनारीपुर रेंजर डीकेलाल श्रीवास्तव, गाइड मोहम्मद नसीम, नासिर अली, भागीराम, श्रवण कुमार, मनोज कुमार, सुनील जायसवाल समेत क्षेत्र के तमाम वन्यजीव प्रेमी, पत्रकार उपस्थित रहे।


देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
पलिया खीरी 
dpmishra7@gmail.com

Nov 12, 2014

खत्म हो जायेगा बाघों और घडियालों का बसेरा


पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए विनाशकारी है केन - बेतवा लिंक परियेाजना 

जीवनदायिनी नदी के नैसर्गिक प्रवाह से खिलवाड़ करना खतरनाक 


पन्ना, 11 नवम्बर - किसी भी जीवनदायिनी नदी के अविरल प्रवाह को बाधित कर उसकी प्रकृति से छेड़छाड़ करना खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसा करने से लाभ होने की तुलना में हानि की संभावना अधिक है. चूंकि हर नदी की अपनी अलग केमिस्ट्री और बायोलॉजी होती है, इसलिए नदियों को लिंक करने से उनकी नैसर्गिकता खत्म हो जायेगी जिसका असर पूरे ईको सिस्टम पर पड़ेगा. यह बात केन नदी के अध्ययन प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे प्रोफेसर ब्रिज गोपाल ने खजुराहो में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में कही. 
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ईकोलॉजी के तत्वाधान में आयोजित इस कार्यशाला में देश की विभिन्न नदियों का गहन अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ, रिसर्चर व छात्र शामिल रहे. कार्यशाला में केन नदी के विभिन्न पहलुओ उसके ईको सिस्टम तथा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत चर्चा हुई. जिसमें यह बात उभरकर सामने आई कि दो नदियों को जोडऩा अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक है. नदी जीवनदायिनी होती है और उसके बहाव से खिलवाड़ करना जीवन से छेड़छाड़ करने जैसा है. केन - बेतवा लिंक परियोजना के संदर्भ में प्रोफेसर ब्रिज गोपाल ने बताया कि यह परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए जहां विनाशकारी साबित होगी वहीं केन नदी जो कि घडिय़ालों का घर है वह भी उजड़ जायेगा. नदी जोड़ परियोजना से डाउन स्ट्रीम में घातक दुष्परिणाम दिखाई देंगे जिसका असर मानव जीवन पर भी पड़ेगा. 


 पन्ना टाइगर रिजर्व के बीच से प्रवाहित होने वाली केन नदी का दृश्य 
इस कार्यशाला में मौजूद पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि केन - बेतवा लिंक परियोजना के मूर्त रूप लेने पर पन्ना टाइगर रिजर्व का सौ वर्ग किमी. से भी अधिक क्षेत्र डूब में आ जायेगा. डूब में आने वाला यह क्षेत्र टाइगर रिजर्व का कोर एरिया है तथा बाघों का सबसे उत्तम रहवास है. निश्चित ही इस परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व की अपूर्णीय क्षति होगी. आपने कहा कि केन नदी पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए जीवनदायिनी है, यह एक जीवन्त नदी है. इसलिए इसमें सिर्फ पानी को देखना काफी नहीं है, इसके अलावा भी यह बहुत कुछ है जिसे उसकी पूरी समग्रता में देखे जाने की जरूरत है. तभी हम यह समझ पायेंगे कि नदी से हम कैसे प्रभावित होते हैं तथा नदी को हम कैसे प्रभावित करते हैं. श्री मूर्ति ने कहा कि ज्यादातर प्राकृतिक आपदायें मानव निर्मित होती हैं, आपने कहा कि नदियों के किनारों को बचाने के लिए एकीकृत प्रबंधन होना चाहिए. 


प्रोफेसर के.डी. जोशी ने अपने अध्ययन रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि हमने केन नदी में 89 प्रजाति की मछलियां पाई हैं. इस नदी की इकोनामिक वैल्यू क्या है यह इस प्रोजेक्ट के पूरा होने पर निकल कर आयेगा. श्री जोशी ने कहा कि यहां सिर्फ केन नदी की बात करना ठीक नहीं है, हमें केन रिवर्स की बात करनी होगी. क्यों कि केन की अनेको छोटी - बड़ी सहायक नदियां भी हैं. आपने बताया कि नदी का सबसे बड़ा धर्म ग्राउण्ड वाटर रिचार्ज होता है. नदी तथा उसके ईको सिस्टम को हम जितना जानते हैं वह बहुत कम है. नवम्बर के महीने में नदी सूखनी नहीं चाहिए, यदि कोई नदी सूखती है और सीजनल बन गई है तो उसके कारणों को जानने की कोशिश होनी चाहिए. कार्यशाला में दिनेश मरोठिया व रीतेश शर्मा सहित अन्य लोगों ने भी केन नदी तथा ईको सिस्टम के संबंध में अपने विचार साझा किये. 



केन नदी के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा के लिए शिल्प नगरी खजुराहो
में आयोजित कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए
 प्रोफेसर ब्रिज गोपाल तथा उपस्थित अतिथिगण

प्रवाह रूकने पर कैसे आयेगी बालू 

नदी की इकोनामिक वैल्यू क्या है, इस पर चर्चा करते हुए प्रोफेसर ब्रिज गोपाल ने बालू का उदाहरण देते हुए बताया कि नदी मुफ्त में बालू देती है. यदि बालू को बनाने का प्रयास किया जाय तो यह कितना मंहगा सौदा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. इसके बावजूद उस गुणवत्ता की बालू का निर्माण मुमकिन नहीं होगा जो बालू प्राकृतिक रूप से नदियों में मिलती है. आपने कहा कि प्राकृतिक व्यवस्था के तहत नदियों में बालू का स्टोर होता है, यदि नदी का प्रवाह थम गया तो बालू का निर्माण भी नहीं हो सकेगा. प्रवाह के बिना कुछ भी नहीं होगा. नदी का प्रवाह रूकने से सिर्फ बालू बनना ही नहीं थमेगा बल्कि अन्य कई बदलाव भी आयेंगे, जिसका हम इस प्रोजेक्ट में अध्ययन करने का प्रयास करेंगे. 


अरुण सिंह 
aruninfo.singh08@gmail.com

Nov 8, 2014

गन्ने के खेत में मिला मृत तेंदुआ

खीरी जनपद में एक और तेंदुए की मौत 

तेंदुओं की सरकारी गिनती के मुताबिक इस तरह तो यहाँ  से विलुप्त हो जायेगी यह प्रजाति 

लखीमपुर -खीरी -आज एक स्वथ्य तेदुआ की मौत पर वन विभाग चुप्पी साधे है वन विभाग के अधिकारियो ने अपने मोबाइल सेट तक बंद कर रखे है तेदुआ कैसे मरा इस पर वन विभाग बोलने पर तैयार नहीं। यह वन विभाग की झूठी गस्त को दर्शाता है,  ज़िले में भारी भरकम वन विभाग आज एक तेदुआ को जो काफी दिनों से मुख्यालय से 30 किलोमीटर रिहाइशी इलाको के आस  पास चहलकदमी कर रहा था वह आज  मरा पड़ा मिला। वन विभाग की उदासीनता सामने आई।  पेड़ो की कटान के ज़रिये मालामाल हो रहे वन कर्मियों की उदासीनता का जीता जागता उदाहरण है स्वस्थ्य तेदुए की मौत.

 आपको बता दे की आज कोतवाली फूलबेहड़ के गावं लौकिहा में गन्ने के खेत में एक जवान तेंदुए का शव पड़ा है ग्रामीणो ने इसकी सूचना वन कर्मियों को दी। शव काफी पुराना था शव पर कीड़े तक पड़ गए थे दूर दूर तक इसकी बदबू फैली थी। वन कर्मियों ने उसे पोस्टमार्टम के लिए फूलबेहड़ के मवेशी अस्पताल ले गए( समाचार भेजने तक शव का पी ऍम नहीं हुआ था )मौत के कारणों का पता नहीं चल सका है.






मो. यासीन (टी वी पत्रकार)
लखीमपुर खीरी 
patwarapage@gmail.com

Nov 7, 2014

पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघ पुनर्वासन की कहानी

 पन्ना टाइगर रिजर्व का प्रवेश द्वार
गौरवशाली अतीत की ओर लौटा पन्ना टाइगर रिजर्व 

बाघ पुर्नस्थापना की पहली बाघिन टी - 1 ने चौथी बार दिया शावकों को जन्म 

पांच वर्ष के भीतर ही बाघों की संख्या पहुंची शून्य से तीस के पार 

(पन्ना, 4 नवम्बर - 2014) म.प्र. का पन्ना टाइगर रिजर्व अपने गौरवशाली अतीत की ओर तेजी के साथ लौट रहा है. यहां बाघों की वंशवृद्धि में अहम भूमिका निभाने वाली बाघिन टी - 1 ने चौथी बार शावकों को जन्म दिया है. पन्ना टाइगर रिजर्व के जंगल में इन नन्हें मेहमानों के आगमन से यहां बाघों की संख्या तीस के पार जा पहुंची है. यह चमत्कारिक उपलब्धि यहां पर पांच वर्ष के भीतर हासिल हुई है जो अपने आप में एक मिशाल है. 
उल्लेखनीय है कि चौथी बार शावकों को जन्म देने वाली बाघिन टी - 1 पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना की पहली बाघिन है, जिसे मार्च 2009 में बांधवगढ़ से पन्ना लाया गया था. बाघ विहीन पन्ना टाइगर रिजर्व में सबसे पहला कदम इसी बाघिन के पड़े थे, जो बहुत ही शुभ और फलदायी साबित हुए. क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व आर.श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि बाघिन टी - 1 के द्वारा ठीक एक माह पूर्व चौथी बार शावकों को जन्म दिए जाने की पुष्टि अनुश्रवण के आधार पर हुई है. इस बाघिन के अनुश्रवण दल द्वारा गत 3 नवम्बर रविवार को मंडला वन परिक्षेत्र में बाघिन टी - 1 के नन्हें शावकों में से एक को प्रत्यक्ष रूप से देखा भी गया है. इतना ही नहीं इस नन्हें बाघ शावक का छायाचित्र लेने में भी कामयाबी मिली है. चौथी बार इस बाघिन ने कितने शावकों को जन्म दिया है अभी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी है. आने वाले दिनों में जब शावक अपनी मां के साथ बाहर निकलने लगेंगे तभी उनकी संख्या का सही आकलन हो पायेगा. 


पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए भाग्यशाली साबित होने वाली बांधवगढ़ की इस बाघिन के अतीत पर नजर डालने से पता चलता है कि इस बाघिन ने कभी भी चार से कम शावकों को जन्म नहीं दिया. बाघिन टी - 1 ने पहली बार यहां 19 अप्रैल 2010 में चार शावकों को जन्म दिया था. दूसरी बार फिर इसने चार शावक जन्मे थे तथा तीसरी बार भी इस बाघिन ने अप्रैल 2014 में शावकों को जन्म दिया लेकिन किन्ही अज्ञात प्राकृतिक कारणों के चलते उसने इन शावकों का त्याग कर दिया, परिणाम स्वरूप तीसरी बार बाघिन के कितने शावक हुए, इसका आकलन नहीं हो सका. लेकिन इस बाघिन के इतिहास को दृष्टिगत रखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि जन्मे शावकों की संख्या चार हो सकती है. पन्ना टाइगर रिजर्व में आने वाली अन्य दूसरी बाघिने टी-2 व टी-4 ने यहां तीन - तीन बार शावकों को जन्म देकर बाघों की वंश वृद्धि में अपना योगदान दिया है. मालुम हो कि मार्च 2009 में जब पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना शुरू हुई थी, उस समय किसी ने भी इस बात की कल्पना नहीं की थी कि बाघों का उजड़ चुका संसार यहां इतनी तेज गति से पुन: आबाद हो सकेगा. विशेषज्ञों का भी यही कहना था कि सब कुछ यदि बेहतर रहा तो पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 15 से अधिक होने में कम से कम 10 साल लग जायेंगे. लेकिन प्रकृति ने विशेषज्ञों के सारे आकलन व ज्ञान को झुठलाते हुए पांच साल से भी कम समय में पन्ना टाइगर रिजर्व को उस बुलंदी और मुकाम पर पहुंचा दिया, जहां वह कभी था. निश्चित ही इस अनूठी सफलता का श्रेय पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति व उनके समर्पित सहयोगियों को जाता है जिन्होंने पन्ना टाइगर रिजर्व को फिर से आबाद करने के लिए अथक परिश्रम किया और प्रकृति के उसके सृजन में सहभागी बने. श्री मूर्ति का यह मानना है कि प्रकृति सृजन का कार्य स्वयं करती है, हमने तो सिर्फ अनुकूल माहौल व परिस्थितियां निर्मित करने का काम किया है जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारियों व कर्मचारियों सहित इस जिले के नागरिकों का भी सराहनीय योगदान रहा है. 



बाघिन टी - 1 का नन्हा शावक
बढ़ती संख्या से छोटा पडऩे लगा जंगल का दायरा 


यह जानकर सुखद अनुभूति होती है कि पन्ना टाइगर रिजर्व दुनिया का पहला संरक्षित क्षेत्र है जहां बाघों के पुर्नस्थापना का कार्यक्रम इतने कम समय में इतना सफल रहा है. पन्ना का यह संरक्षित वन क्षेत्र बीते चार - पांच सालों में बाघों की नर्सरी के रूप में विकसित हुआ है. यहां जन्म लेने वाले बाघ शावक सुरक्षित और अनुकूल माहौल में पलकर न सिर्फ बड़े होते हैं बल्कि जंगल की निराली दुनिया और कानून से भी परिचित होते हैं. शिकार करने में कुशलता व दक्षता हासिल होते ही मां से अलग होकर शावक स्वच्छन्द रूप से विचरण करते हुए अपने इलाके का निर्धारण करते हैं. बाघों की तेजी से बढ़ती संख्या के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व का सीमित दायरा अब छोटा पडऩे लगा है, नतीजतन यहां के बाघ समूचे बुन्देलखण्ड व बघेलखण्ड के जंगलों में भी विचरण करने लगे हैं. इसी को कहते हैं अच्छे दिनों का आना जिसने बुरे दिनों को विस्मृत कर दिया है. पन्ना के जंगलों की यह समृद्धि और खुशहाली बनी रही, इसी में यहां के रहवासियों की भी समृद्धि और खुशहाली निहित है. 


अरुण सिंह 
aruninfo.singh08@gmail.com

Nov 2, 2014

यू पी में पहली बार देखा गया रेड स्ट्रिप्ड टाइगर माथ


Red Striped Tiger Moth- Cyana bianca

उत्तर भारत के खीरी जनपद में पहली बार देखी गयी यह खूबसूरत प्रजाति 

इस कीट के जहरीले प्रभाव से लोगों में फ़ैल रही है त्वचा की बीमारियाँ..

कहते है धरती अपने दामन में न जाने कितने ज़िंदा रंग समेटे हुए है, और हम उनका लुत्फ़ नहीं ले पाते वजह है नजरिया,... खीरी जनपद के मैलानी क़स्बे एक पत्रकार मित्र सुनील निगम ने आज सुबह मुझे एक तस्वीर भेजी,  ताकि मैं इसकी पहचान कर सकूं, और इसके विषैले प्रभावों का पता लगाया जा सके. मैलानी के जंगली इलाकों में एक रंग बिरंगे जीव की आमद, इस नन्हे जीव की प्रकृति ने पंखों पर लाल धारियां और काले नुक्तों से सजावट की है, 

इस तस्वीर को भेजने की वजह तो खौफनाक है, दक्षिण खीरी वन प्रभाग के शाखू के जंगल के इलाकों में जो रिहाइशी इलाका है, वहां के लोग खौफजादा है इस उड़ने वाले रंग बिरंगे जीव से, बताया जा रहा है की इस जीव के छू जाने से इंसान की चमड़ी में सडन पैदा होना शुरू हो जाती है, और लोग त्वचा की तमाम बीमारियों से बावस्ता हो रहे है.

दरअसल यह रंग बिरंगा जीव एक माथ है, जो लेपिडोप्टेरा वर्ग के आर्कीटीडी फैमिली से ताल्लुक रखता है, इसका जंतु वैज्ञानिक नाम है Cyana bianca, सबसे ख़ास बात है की इस परिवार में तकरीबन ११००० खूबसूरत व् रंगों से लबरेज प्रजातियाँ मौजूद है पूरी दुनिया में, और इनमे से भी टाइगर माथ का तबका सबसे बड़ा है, ये रंगीन व् चटकीले रंग वाले कीट है.

बहुत से टाइगर माथ जहरीले होते है, खासतौर से इनका कैटरपिलर, उसके खोखले बालों में भरा जहर किसी भी जानवर को अपंग कर सकता है, वयस्क में भी जहरीले लक्षण होते है ताकि शिकारी पक्षी चमगादड़ आदि इनके  कसैले स्वाद के कारण इन्हें बख्स दे.

यह रेड स्ट्रिप्ड टाइगर माथ में भी विषैले लक्षण पाए गए है.

गौरतलब यह है की रेड स्ट्रिप्ड टाइगर माथ पहली बार उत्तर प्रदेश के हिमालयन तराई में देखा गया, इसके मौजूदगी के जो सबूत है वह श्री लंका जावा बाली व् चीन में मिलते है, भारत के उत्तरी छोर में यह सुन्दर कीट पहली बार देखा गया. इसके व्यहवार के अध्ययन की आवश्यकता है ताकि इस माथ के जीवन चक्र व् गुणों का पता लगाया जा सके और जान मिले की मानव समाज व् कृषि पर इसका प्रभाव क्या है.

इस तरह प्रकृति की एक और  सुन्दर कृति से मेरी जान पहचान हो सकी........


कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com 



Dudhwa Live Magazine wins award for environmental reporting

Dudhwa Live eMagazine on Saturday (11th October 2014 at Clarks Avadh Lucknow) won an  award for raising environmental awareness from The Government of Uttar Pradesh and Digital Empowerment Foundation of India.

A film by Digital Empowerment Foundation




DudhwaLive Desk



विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: