डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.6, no.2, Feb 2016, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 7, 2016

वर्तमान विकास की संरचना में गाँधीवादी वैकल्पिक विकास की आवश्यकता एवं उपयोगिता


भारती देवी

विकास एवं शांति अध्ययन विभाग,  संस्कृति विद्यापीठ,  महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र}


आज सम्पूर्णमानव सभ्यता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ पर विनाश का संकट सिर पर मंडरा रहा है। विश्व के हर हिस्से में अलग-अलग तरह की प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिल रही हैं। लाखों लोग इन आपदाओं का शिकार हो रहे हैं। इन सब का कारण हमारे आधुनिक अनियंत्रित विकास को बताया जा रहा है। इस तरह से हमने अपने अस्तित्व को समाप्त करने के सामान आधुनिक विकास के नाम पर एकत्रित कर लिये हैं।

जैसा की जनार्दन पांडे अपनी पुस्तक ‘Gandhi and 21st Century’ में मार्टिन लूथर किंग के शब्दों में बताते हैं, की यह ऐसा युग है जहाँ की मिसाइल्स को उचित दिशा है परंतु लोगों को नहीं । जब तक की इस युग के मनुष्यों को उचित दिशा प्राप्त नहीं होगी तब तक विकास को सही दिशा में नहीं ले जाया जा सकता है। गांधी का विकास का सिद्धांत इस संदर्भ में आर्थिक आवश्कयता और इसकी चाह में अन्तर को स्पष्ट करता है । 

वर्तमान परिस्थिति का यदि सूक्ष्मता से आंकलन किया जाए तो पता चलता है कि आज मानवजाति के सामने विकास की अंतिम पायदान आ चुकी है जो की विकास को विपरीत दिशा में चलने को निर्देशित कर रही है। विकास के दुष्परिणामों को देखते हुए यह महसूस किया जा रहा है, की इसे किस दिशा में मोड़ा जाए जिसे जानने का अथक प्रयास न केवल वैज्ञानिक स्तर पर किया जा रहा है बल्कि सामाजिक स्तर पर भी लोगों ने सोचना प्रारंभ कर दिया है। उन्नीसवी सदी के अंत में जब उपभोगवादी सभ्यता अपने उत्कर्ष पर थी, उसी समय रस्किन, थोरो, टालस्टाय , आदि पश्चिम के विचारकों ने कई मूलभूत प्रश्न खड़े किए और भविष्य के बारे में चिंता व्यक्त की थी। इस संदर्भ में चिंता जताते हुए गैर पश्चिमी विचारकों में गांधी का महत्त्वपूर्ण स्थान आता है, जिन्होंने 1909 में इसी विषय को हिन्द स्वराज में अधिक तीखे लेकिन विश्वासपूर्ण स्वर में आगे बढ़ाया  । 
विकास के जिन भयानक खतरों के प्रति आगाह बीसवी सदी के प्रारंभ में किया गया था, सदी के अंत तक आते‌‌-आते हम आधुनिक सभ्यता पर मंडराते खतरों से रूबरू होंने लगे।
आधुनिक औधौगीकरण ने संपूर्ण विश्व के सामने जो विकास का ढाँचा तैयार किया और जिसमें गरीबी एवं अभाव को समाप्त करने का लुभावना सपना था वह केवल सपना ही रह गया। इसी तरह सामाजिक क्षेत्र में बराबरी और व्यक्ति स्वतंत्र्य का तथा राजनैतिक क्षेत्र में जनतंत्र का। इन दिशाओ में विकास के नाम पर कुछ हुआ भी, पर अब यह स्पष्ट  हो गया है की कुल मिलकर यह सब एक छलावा था । असली मकसद तो अपने मुनाफे के खातिर दुनिया के संसाधनों पर विशेष वर्ग के द्वारा कब्जा जमाने का तथा लोगों  को शोषण के जाल में फंसाये रखने का था । 

सभी क्षेत्रों में विकास चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो, या फिर राजनीतिक हो इन सभी में जिस बराबरी की बात की गयी थी आज उससे उल्टी ही परिस्थितियाँ निर्मित हो रही हैं। जीडीपी में लगातार हो रही वृद्धि किसी भी रूप में गरीबी का स्तर कम करने में कतई कामयाब नहीं दिखाई दे रही है बल्कि गरीबी अपने चरम पर है। विकास के सारे उपाय गरीबी को कम करने की बजाय गरीबी को कैसे ढका जाए के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। अभाव, मंहगाई, बेरोजगारी की समस्या ने तीसरे विश्व के देशों में भयानक रूप धारण कर लिया है। विश्व में विकास के नाम पर दश प्रतिशत लोग लगभग संपूर्ण संसार के संसाधनों पर कब्जा कर चुके हैं। लगातार दोहन से खनिजों की समप्ति का संकट पास आता जा रहा है। उपभोग की प्रवृत्ति को इस ऊँचाई तक बढ़ा दिया गया है की वह विलासिता के चरम पर पहुँच गयी है, जिसके परिणाम स्वरूप ग्लोबल वार्मिंग और भयानक पर्यावरण प्रदूषण के ख़तरे हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं ।

वैकल्पिक विकास की आवश्यकता-
ऐसे विकास की आवश्यकता इसलिए महसूस की गयी क्योकि गांधी जी इस बात से पूरी तरह से सहमत थे कि हमारी अधिक आबादी गाँवों में रहती है इसलिए ऐसे विकल्प की  खोज हो कि जिसमें वे अपने समाज के साथ अधिक सामंजस्य से जीवन बिता सके। तभी हम यह कह सकते हैं कि हम एक बड़े समानतामूलक समाज का नेतृत्व कर रहे हैं   समाज के विकास के लिए अभी तक जो भी प्रारूप अपनाए गए चाहे वह पूंजीवादी प्रारूप हो या साम्यवादी, दोनों ही इस उपभोक्तावादी विकास के कुचक्र के शिकार होकर एक ही दिशा की तरफ बढ़े। दोनों में ही बाजार का प्रभाव अधिक रहा । समाज में जिस समानता को स्थापित करने की बात की जाती थी वह कोई भी विकास का प्रारूप पूरा करने में सफल नहीं हो सका। पूंजीवादी प्रारूप जो की निजी स्वामित्व के आधार पर उधोगों का विकास करके लाभ को समाज के अंतिम आदमी तक पहुँचाने का दावा कर रहा था वह सिर्फ वर्ग असमानता एवं उपभोक्त्तावादी संस्कृति को बढ़ाता रहा इसने संपूर्ण विश्व को बाजार में परिवर्तित कर दिया तथा सभी को खरीददार बना दिया । 

मार्क्स ने उत्पादन के साधन और इनसे जुड़े उत्पादन संबंधो को विकास की दिशा का नियामक बता कर एक तरह से तकनीकी निर्यातवाद को जन्म दिया। उन्होंने यह भी मान लिया की एक स्तर पर तकनीकी और उससे जुड़े उत्पादन संबंध में विरोध पैदा होता है, इससे क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत होती है। पूर्वकाल में यानि पूंजीवादी व्यवस्था के पहले जैसा भी हुआ हो लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन की तकनीकी के उत्पादन संबंध यानि पूंजीपति और मजदूरों के संबंध में विरोध पैदा होता है और इससे क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत होती है ।

पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन की तकनीकी और उत्पादन संबंध के मध्य यानि पूंजीपति और मजदूरों के संबंध उनके बीच तनाव पर हावी होते दिखते हैं । प्रतिस्पर्धा पर आधारित पूंजीवाद मजदूर समेत हर नागरिक को एस्केलेटेर की एक सीढ़ी पर खड़ा कर देता है, इस  आश्वस्ति के साथ की वह ऊपर उठता जाएगा । ठीक विपरीत विकल्प के रूप में जहाँ-जहाँ साम्यवादी व्यवस्था आयी चाहे वह रूस हो, चीन हो या फिर वियतनाम हो वे सब राज्य सत्ता के नियंत्रण में ही भिन्न रही और कलेवर उनका भी पूरी तरह से पूंजीवादी था । इसने भी समाज में समानता स्थापित करने में नकामयाबी हासिल की । आज चीन पूरी तरह से पूंजीवादी व्यवस्था को अपना चुका है । 

आज भी हम विकास के जिस प्रतिमान के साथ जा रहे हैं वह हमें किस कदर नष्ट होने की कगार पर ले जा रहा है उसके उदाहरण हम दिन प्रति दिन देख रहे हैं। वर्तमान औदद्योगिक समाज के नियामक तत्व 18 वीं 19 वीं सदी से परवान चढ़ी औदद्योगिक क्रांति और इसके वे आदर्शवाद हैं जो इस गति को औचित्य प्रदान करते है। जैसा की समाज शास्त्री मैक्स बेबर का मानना था, ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट धारा की इस स्थापना मंं  विशेष भूमिका थी जो की व्यावसायिक सफलता को ईश्वरीय अनुकंपा मानती थी, और इसे मानव समाज का सर्वोच्च और सर्वजनीय आदर्श बना डाला। इस मान्यता के सार्वभौम होने से आर्थिक गति विधियों का क्षेत्र एवं वैश्विक अखाड़ा बन गया है, जहाँ सभी खिलाड़ी मार पछाड़ में लगे रहते हैं, जिसमें प्रतिस्पर्धी की मौत से ऊर्जा ग्रहण  कर अधिक बलिष्ठ बना जाता है  ।

एक तरफ पूंजीवादी व्यवस्था अत्यधिक उत्पादन कर बाजार को पाट डालती है, दूसरी तरफ भुखमरी, बेरोजगारी, आत्महत्या, अवसाद, आदि को भी बढ़ाती है। श्रमिकों के शोषण और इससे उपजे बाजार के संकट एवं ट्रेड मार्क साइकिल यानि उत्पादन की स्फीति और संकुचन के चक्र की समझ मार्क्स की अर्थशास्त्र में दूसरे विचारों से अधिक विश्वसनीय लगती है। लेकिन अनवरत औधोगिक  विकास की जो संभावना पूंजीवादी तकनीकी में दिखाई देती है उसके प्रति मार्क्स में एक सम्मोहन था। जो की ‘कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो’में जाहिर होता है, जहाँ  पूंजीवाद की उपलब्धियों को इन शब्दों में गरिमामंडित किया गया है। प्रकृति की शक्तिओं को मनुष्य  के मातहत करना , मशीन व रसायन शास्त्र को उद्योग और कृषि में लगाना , भाप से समुद्री जहाज , रेल और इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ चलना , पूरे महादेशों को खेती के लायक बनाना, नदियों से सिंचाई के लिए नहर, भूमि  से हठात पूरी आबादी का उभार आना, किसी पूर्ववर्ती सदियों  की कल्पना में भी सामाजिक श्रम की ऐसी उत्पादकता नहीं रही होगी ।

मार्क्स ने भी एक अलग रूप में प्रकृति के दोहन और औधोगीकरण की बात की । इससे पूंजी का संचय होना अवश्यंभावी था । लेकिन इस बात को नजर अंदाज किया की संचित श्रम सदा किसी उत्पाद का रूप होता है और यह उत्पाद प्रकृति से प्राप्त कच्चे माल, खनिज आदि के रूपांतरण से एवं ऊर्जा प्रदान करने वाले कोयला, तेल आदि को जला कर प्राप्त होता है । दरअसल अत्याधुनिक उद्योगों में मानव श्रम जो की ऊर्जा का ही एक परिष्कृत और संचित रूप है अपना महत्त्व खोता गया है और मशीन एवं रोबोट धीरे-धीरे इनका काम संभालने लगे हैं । इस दृष्टि से देखने पर यह तुरंत जाहिर होता है की चूकि धरती के संसाधन कच्चे उद्धृत पदार्थ हों, खनिज हों, या ऊर्जा देने वाला कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस इसके अति दोहन से कुछ दिनों  बाद संकट पैदा होगा । इनके दोहन से इनके ख़त्म होने का संकट पैदा हुआ है| आज संपूर्ण विश्व पर्यावरण प्रदूषण केविश्वव्यापी संकट से भी जूझ रहा है जिसने मानव सभ्यता के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है । 

यू तो ऊर्जा संकट और प्रदूषण के प्रभाव इ. एफ. शूमाकर के ‘स्माल इस बियूटीफुल’,‘ क्लब आफ रॉम’ के अध्ययन ‘द लिमिट्स आफ ग्रोथ’ के प्रकाशन के बाद से ही पिछली शताब्दी के उत्तार्ध से चर्चा होने लगी थी । लेकिन इस पर दुनिया के राष्ट्रों द्वारा साक्रिय पहल 1922 के ब्राजील के ‘रियो डी जेनेरिओ’में हों वाले शिखर सम्मेलन में शुरू हुई । इसके बाद 1944 में क्योटो प्रोटोकाल नाम से एक समझौता हुआ और तय हुआ की औद्द्यगिक देश ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 2012 तक 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत घटा देंगे । इस पर 1995 में मान्यता की मुहर लगी , लेकिन दुनिया के बड़े औद्योगिक देश और प्रति व्यक्ति सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने इस पर अपनी स्वीकृति नहीं दी । कार्बनडाई आक्साइड का उत्सर्जन 1990 में 22.7 अरब टन था । क्योटो प्रोटोकाल में इसे घटाकर 21.5 अरब करने का लक्ष्य था। लेकिन 2010 में यह बढ़कर 33 अरब टन हो गया। यानि घटाने की बजाए डेढ़ गुना बढ़ गया । दरअसल औदद्योगिक प्रगति के उन्माद में प्रदूषण फैलाने वाली गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्यों को सदैव नजर अंदाज किया गया ।

आज विकास के प्रतिमानों से उपजे भयंकर परिणामों से ऐसे वैकल्पिक विकास के मॉडल की अत्यधिक आवश्यकता है, जो असमनता को पाटते हुए पर्यावरण की रक्षा में भी योगदान दे सके । गांधी जी तो पहले ही कह चुके थे की यह एक पागल दौड़ है जो हमें सिर्फ़ विनाश की गर्त में ले जाएगी । उन्होंने धरती की संसाधनों की सीमितता एवं मर्यादा की तरफ ही हमारा ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा था की यह आवश्यकता तो सबकी पूरी कर सकती है पर लालसा एक की भी नहीं । 

वैकल्पिक विकास की उपयोगिता
विकल्प की खोज तो दुनिया में बहुत ही पहले से हो रही है । परंतु आज सर्वाधिक आवश्यकता उन प्रयोगों को जमीन पर उतारने की है तभी हम सभ्यता को संकट से बचा सकते हैं। गांधी के पहले भी लोगो ने विकल्प पर चर्चा प्रारंभ की थी परंतु गांधी इस मायने में सर्वाधिक उपयुक्त साबित हुए । उन्होंने 1904 से अपने जीवन काल में लगातार विकल्प का सफल प्रयोग 1947 तक किया । संपूर्ण देश के लोगो में इस वैकल्पिक विकास से एक ऊर्जा का संचार हुआ और लोगो में आत्मविसवास की भावना भी देखने को मिली वे हमेशा अहिंसक अर्थ व्यवस्था की बात करते हैं। तथा विकास शब्द के स्थान पर स्वराज को लाने का समर्थन करते थे। जो की स्वावलंबी जीवन पर आधारित समानता मूलक समाज की स्थापना करता है । उन्होंने विकल्प के सफल प्रयोगों में नयी तालीम, खादी ,ग्रामउधोगों, पर आधारित ग्राम स्वराज की संकल्पना को साकार करके दिखाया। आधुनिक भारत और आधुनिक विकास के मोह में नेहरू ने गांधी के विकल्प को छोड़ दिया था तथा विकास के मशीनी औदद्योगिक प्रारूप को अपनाया जिससे की समाज में गैर बराबरी का संकट अधिक गहरा हो गया । 

परंतु इन सबके बाद भी कुछ गांधी वादी उनके ही विकास के मॉडल पर चलते रहे और आज भी वे प्रयोग समस्त विश्व को विकास के वैकल्पिक मॉडल का सफल प्रयोग करके अपनाने को प्रोत्साहित कर रहे है जिससे प्रेरणा लेकर विकास करने से संपूर्ण विश्व की सभ्यता नष्ट होने से बच सके । जिनमें लक्ष्मी आश्रम कौसनी जो की नयी तालीम के माध्यम से विकास के विकल्प का संपूर्ण ढांचा हमारे सामने प्रस्तुत करता है ,यहाँ की शिक्षा में गांधी के’ Three-H’ head,heart,hand को वास्तव में परिपक्व करने का उद्देश्य है| ये शिक्षा ऐसी है जो की संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास कर सके ।

पर्यावरण संरक्षण भी उससे ही निकाल कर आता है । गुजरात विद्यापीठ का ग्राम शिल्पी कार्यक्रम भी गाँवों को उनके संसाधनों से ही श्रम आधारित अहिंसक अर्थ व्यवस्था पर आधारित ग्राम स्वराज्य का कार्य कर रहा है ।

मगन संग्रहालय एवं उसका एक प्रकल्प ग्रामोपयोगीविज्ञान केंद्र वर्तमान विकास के विकल्प का सम्पूर्ण ढांचा प्रस्तुत करता है, अन्ना हजारे का रालेगड़ सिद्धि, मोहन हीरा भाई हीरालाल का मेढ़ालेखा एवं हिबरे बाजार इसके कुछ महत्तवपूर्ण उदाहरण हैं, जो की संपूर्ण सभ्यता को समानता पर आधारित पर्यावरण की रक्षा करते हुए अहिंसक समाज रचना की ओर अग्रसर करने का प्रयास कर रहे हैं। आज आवश्यकता  समाज को जागरूक करते हुए इन्हें अपनाने के लिए प्रेरित करने की है।


निष्कर्ष
यहाँ पर विकास के अंतिम पग पर आकर किस तरह से हमारा पूरा का पूरा विकास का उपक्रम विनाश के पग पर चलने लगता है को जानने का प्रयास किया गया है, और ऐसे भारत के लिए कोशिश है की जिसमें गरीब से गरीब लोग भी विकास का हिस्सा बन सके और यह महसूस करे की यह उनका उद्देश्य  है और इसके निर्माण में उनका भी श्रम महत्त्व पूर्ण भूमिका अदा करता है ।

गांधी के ही शब्दों में ही कहें तो ऐसे भारत की कोसिस है जिसमें की ऊँचे और नीचे वर्गो का भेद नहीं होगा और जिसमें विविध संप्रदायों से पूरा मेल जोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता एवं शराब व दूसरी नशीली चीजों का कोई स्थान नहीं होगा। स्त्रियों को भी समान अधिकार होगा और वे भी विकास का हिस्सा होंगी । सारी दुनिया के साथ हमारा रिश्ता शांति का होगा और विकास के फलस्वरूप होने वाले विनाश में सबके साथ मिलकर उपाय निकालने की कोशिश सतत बनी रहेगी। शोषण की राजनीति से इस समाज और देश को बाहर निकालना है।  ऐसे भारत की कल्पना करना ही मेरा उद्देश्य है जिसमें की सभी का सम्मान हो और सबको काम का समान अवसर हो ।


संदर्भ ग्रंथ सूची ;

गांधी, महात्मा,हिन्द स्वराज, नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद, 2010 । 

-----------------,मेरे सपनों का भारत, नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद, 2005 । 

------------------,आत्मकथा, नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद, 2011 ।

डड्ढ़ा, सिद्धराज,वैकल्पिक समाज रचना, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, वाराणसी, 2000।

पटनायक, किशन, विकल्पहीन नहीं है दुनिया, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2000 ।  

नन्दकिशोर, आचार्य,सत्याग्रह की संस्कृति, बाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 2008।
------------------------,अहिंशा विश्वकोश, प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर, 2010 ।
सिन्हा, सच्चिदानंद,वर्तमान विकास की सीमायें , विकल्प प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, 2000 ।

-----------------------,उपभोक्तावादी संस्कृति का जाल, रोशनाई प्रकाशन, कचरपदा, 2012 ।

------------------------,पूंजी का अंतिम अध्याय, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008,

Gandhi’s India; Unity in Diversity, National Book Trust of India, New Delhi, First published in 1968, reprinted 2008.

M.K. Gandhi, Constructive Programme; its meaning and place, Navjivan Publishing House, First published in 1941, reprint 2007
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Pandey, Janardan (ed.),Gandhi and 21st Century, Concept Publishing Company, New Delhi, 1998.
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                          नोट- इस शोध पत्र की पी डी ऍफ़ फ़ाइल देखने के लिए यहाँ क्लिक करें.                                                                                   

       
                                                                          लेखिका                                                                                    भारती देवी ,पी-एच.डी. शोधार्थी
                                                  विकास एवं शांति अध्ययन विभाग
                                                       महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा(महाराष्ट्र)
email: bharatitiwari009@gmail.com







Feb 6, 2016

Dudhwa National Park – Best Place to Spot Big 4



Dudhwa Tiger Reserve or Dudhwa National Park is one of the great paradises located in the border of Nepal. The Dudhwa National Park is in the Lakhimpur & Kheri district, Uttar Pradesh and it lies adjacent to Indo-Nepal border that will bring together many different incredible sanctuaries. Some of the sanctuaries are Kishanpur Wildlife Sanctuaries and Katerniaghat Wildlife Sanctuaries. These represent the wide area of natural greenery forests that is inhabited by a variety of animals in Terai region. Mohana River flows near to the northern boundary of the park so that it will be quite efficient for getting the suitable water supply and makes the place suitable for wildlife living. Southern boundary has the beautiful river Suheli making the forest to have the most wonderful view. Kishanpur Sanctuary is also located near to the Lakhimpur Kheri as well as Shahajahanpur districts, Uttar Pradesh. Dudhwa National Park is spread in the 811 sq km that holds the way for nature lover for marshes, dense forests and grasslands. There are many different Tigers species and Swamp Deer available in this most beautiful region enabling the tourist across the world to visit this most beautiful place.

Dudhwa Big 4 & Wildlife:

Dudhwa National Park is the home for many wildlife species such as Elephant, Tiger, Leopard and Rhinoceros these comes under the Big 4 of wildlife.

Swamp Deer, Sambar Deer, Spotted Deer, Blue bull, Sloth bear, Hog deer and many more are the wildlife animal species of Dudhwa National Park. Apart from other wildlife sanctuaries, the Dudhwa National Park offers the most wonderful way of animal living and it will be convenient for increasing the better educational research in the best manner. Some of the other animals that are located in this beautiful region are Langur, Otter, Monitor lizard, Python, Mugger, Sloth bear, Gharial and many more.

 Dudhwa National Park has more than 450 birds so it will be more entertainment while visiting these most beautiful forests. Most famous birds here are Hornbill, Pea fowl, Red Jungle Fowl, Serpent eagle, Fishing eagle, Indian Pitta, Shama, Bengal Florican, Fishing eagle, Bengal Florican, Osprey, Woodpeckers, Orioles and many more. A wide variety of migratory birds from all over the world visits this most beautiful spot. The park is considered as the paradise for most of the wild animals and birds making their home convenient. Dudhwa National Park is also the best place for doing a wide research about the wildlife.

Attracting Features:


Dudhwa National Park attracts most of the visitors with the 2 crore wide area in Kishanpur Wildlife Sanctuary. Like other parks such as Jim Corbett National Park, Bandhavgarh National Park and Kaziranga National Park, all the features in this Dudhwa National Park are widely maintained by the government with the appropriate facilities. The ideal habitat in the Dudhwa National Park is quite useful for the wild creatures and it is convenient with the nature's serenity. Booking for the accommodation and Jeep safari booking is enabled in the online so that it will be convenient to get the fantastic view of all the wildlife in the beautiful forest. Dudhwa tiger reserve India is fully maintained with many differ attractive features. 


Faiz Alam 
faizlimra@gmail.com
http://dudhwa.co.in/



Jan 7, 2016

एक पवित्र नदी को फिर से बना दिया निर्मल- एक और भागीरथ


"नदी से रिश्ता बनाओ, वाहे गुरु फतेह करेगा’’
कारसेवा का करिश्मा
निर्मल कालीबेंई 

होशियारपुर के धनोआ गांव से निकलकर कपूरथला तक जाती है 160 किमी लंबी कालीबैन। इसेे कालीबेरी भी कहते हैं। कुछ खनिज के चलते काले रंग की होने के कारण ’काली’ कहलाई। इसके किनारे बेरी का दरख्त लगाकर गुरुनानक साहब ने 14 साल, नौ महीने और 13 दिन साधना की। एक बार नदी में डूबे, तो दो दिन बाद दो किमी आगे निकले। मुंह से निकला पहला वाक्य था: ’’न कोई हिंदू, न कोई मुसलमां।’’ उन्होने ’जपजीसाहब’ कालीबेईं के किनारे ही रचा। उनकी बहन नानकी भी उनके साथ यहीं रही। यह कोई 500 साल पुरानी बात है। अकबर ने कालीबेईं के तटों को सुंदर बनाने का काम किया। ब्यास नदी, इसे पानी से सराबोर करती रही। एक बार ब्यास ने अपना पाट क्या बदला; कालीबेईं पर अगले 400 साल संकट ही संकट रहा। उपेक्षा व संवेदनहीनता का नतीजा यह हुआ कि कपूरथला कोच फैक्टरी से लेकर तमाम उद्योगों व किनारे के पांच शहरों ने मिलकर कालीबेईं को कचराघर बना दिया।

इसी बीच काॅलेज की पढाई पूरी न सका एक नौजवान नानक की पढाई पढ़ने निकल पङा। बलबीर सिंह सींचवाल, संत सींचवाल ने किसी काम के लिए कभी सरकार की प्रतीक्षा नहीं की। पहले खुद काम शुरु किया; बाद में दूसरों से सहयोग लिया। उन्होने कारसेवा के जरिए गांवों की उपेक्षित सङकों को दुरुस्त कर ख्याति पाई। वर्ष 2003 में कालीबेईं की दुर्दशा ने संत की शक्ति को गुरु वचन पूरा करने की ओर मोङ दिया - ’’ पवन गुरु, पानी पिता, माता धरती मात्।’’ कहते हैं कि कीचङ में घुसोगे, तो मलीन ही हो जाओगे। सींचवाल भी कीचङ में घुसे, लेकिन मलीन नहीं हुए। उसे ही निर्मल कर दिया। यही असली संत स्वभाव है। 

संत ने खुद शुरुआत की। समाज को कारसेवा का करिश्मा समझाया। कालीबेईं से सिख इतिहास का रिश्ता बताया। प्रवासी भारतीयों ने इसे रब का काम समझा। उन्होने धन दिया, अनुनायियों ने श्रम। सब इंतजाम हो गया। काम के घंटे तय नहीं; कोई मजदूरी तय नहीं; बस! तय था, तो एक सपने को सच करने के लिए एक जुनून - ’’यह गुरु का स्थान है। इसे पवित्र होना चाहिए।’’ नदी से कचरा निकालने का सिलसिला कभी रुका नहीं। 27 गावों के कचरा नाले नदी में आ रहे थे। तालाब खोदे। नालों का मुंह उधर मोङा। पांच शहरों के कचरे की सफाई के लिए ट्रीटमेंट प्लांट की मांग बुलंद की। पूरे तीन साल यह सिलसिला चला। ए पी जे अब्दुल कलाम इस काम को देखने सुल्तानपुर लोदी आये। एक वैज्ञानिक राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय तक्नालाॅजी दिवस जैसे तकनीकी रुचि के मौके पर संत के सत्कर्म की सराहना की। प्रशासन को भी थोङी शर्म आई। उसने पांच करोङ की लागत से सुलतानपुर लोदी शहर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाया; 10 करोङ की लागत से कपूरथला में। टांडा, बेगोवाल जैसे औद्योगिक नगरों में भी तैयारी शुरु कर दी गई। ’वीड टैक्नोलाॅजी’ पर आधारित तालाबों ने नतीजे देने शुरु कर दिए हैं। 




संत सींचवाल कहते हैं - ’’ अभी लोग प्लान बनाते हैं कि नदी गंदी हो गई हैं; क्या करें ? इसके लिए जाने कितने अध्ययन होते हैं। मीटिंगों में लोग मांग करते हैं कि नया कानून बनाओ। मैं कहता हूं कि भाई, अभी जो कानून है, पहले उसे तो लागू करा लोे। कानून, नदी के पक्ष में है। लोग हाउस टैक्स देते हैं। म्युनिसपलिटी वालों से क्यों नहीं पूछते कि नदी में कचरा क्यों डाल रहे हो ? लोग चुप क्यों रहते हैं ? सरकार जब करेगी, तब करेगी। लोगों को चाहिए कि हिम्मत करें। लोग नदी पर जाकर खुद खङे हों। जहां-जहां लोग जाकर नदी पर खङे हो जायेंगे, कई कालीबेंई निर्मल हो उठेंगी। लोगों के खङे होने से होता है। लोग खङे हों।’’

संत का कहते है कि उन्होने कालीबेंई नदी में कोई अजूबा नहीं दिया - ’’हमने सिर्फ मिस-मैनेजमेंट ठीक किया है। हमने लोगों को 100 प्रतिशत विकल्प दिया। यह साधारण सा काम है। समझें, तो बात भी साधारण सी है। क्या करना है ? पानी कम खींचो। आसमान से बरसा पानी तालाबों में रोको। बाढ का पानी भूजल रिचार्ज के काम में कैसे आये ? सोचो! हर शहर से गंदे पानी की एक नदी निकलती है। उस गंदे पानी को साफ करके, खेती में दे दो। नियम बना लो कि शोधन के पश्चात् भी नदी में नहीं डालना है। हमने यही किया है। सुल्तानपुर लोदी के आठ किलोमीटर के दायरे में यही गंदा पानी साफ करके खेती में पहुंचा रहे हैं। लोग आनन्दित हैं। इससे भूजल खींचने का काम कम हुआ है। ग्राउंड वाटर बैंक में हमारा अकाउंट बैलेंस बढ गया है। पानी का टीडीएस नीचे आ गया है। सबसे बङी बात कि इससे कालीबेंई को साफ रखने में हमे मदद मिल रही है। हर शहर में यह हो सकता है। आपको कभी आकर देखना चाहिए।’’

संत का संदेश: नदी से रिश्ता बनाओ, वाहे गुरु फतेह करेगा।

पंजाब में कैंसर बेल्ट.. कैंसर टेªन जैसे शब्द सुनकर संत की आंखों में आंसू आ जाते हैं। कहते हैं कि जिस पानी का काम पानी जीवन देना है, हम उससे मौत ले रहे हैं। यह क्यों हुआ ? क्योंकि हम रिश्ता भूल गये। हमने यह रिश्ता याद रखा होता, तो हम जिस नदी में स्नान करते हैं, उसमें पेशाब नहीं करते।  कहावत है - ’’जैसा पाणी, वैसा प्राणी। लोगों को सोचना होगा कि पीने के पानी की बोतल कोई मंगल ग्रह से नहीं आने वाली। हम अमृतजल बर्बाद कर रहे हैं। मेरी तो यही प्रार्थना है कि रब के सच्चे बंदों! अपने लिए न सही, अगली पीढ़ी के लिए सही, कुछ करो। जिस पीढी की पढाई, दवाई और परवरिश पर इतना पैसा और समय खर्च करते हो, उसकी खातिर घरों से बाहर निकलो। नदी से रिश्ता बनाओ। वाहे गुरु फतेह करेगा।’’

सत्कर्म से मिली नसीहत: किसी भी काम से लोगों को जोङने के लिए लोगों को उससे उनका रिश्ता समझाना पङता है। आस्था, इतिहास और नियमित संसर्ग इसमें बङी भूमिका अदा कर सकते हैं। अच्छी नीयत व निस्वार्थ भाव से काम शुरु कीजिए। संसाधन खुद-ब-खुद जुट जायेंगे। शासन-प्रशासन भी एक दिन साथ आ ही जाएंगे।

अरुण तिवारी 
दिल्ली 
amethiarun@gmail.com

Jan 6, 2016

तराई के जंगलों में दो बाघों की मौत, बाघ सरंक्षण मुहिम एक बार फिर सवालों के घेरें में...

दक्षिण खीरी वन प्रभाग में गन्ने के खेत में मिला मृत बाघ का शव 
खीरी, 3 जनवरी-दुधवा नेशनल पार्क के करीब साउथ खीरी वन क्षेत्र में रविवार दोपहर एक बाघ की लाश मिलने से सनसनी फैल गयी। भीरा वन रेंज में एक गन्ने के खेत में बाघ का कई हफ्ते पुराना शव पाया गया है। बाघ के शव की हालत ऐसी हो चुकी है कि यह भी पहचान होनी मुश्किल है कि बाघ नर है या मादा लेकिन बाघ के नाखून और दांत सुरक्षित मिलने से शिकार की आशंका को वन अधिकारी नकार रहे हैं। शव को पोस्टमार्टम के लिए आईवीआरआई बरेली भेजने की तैयारी हो रही है।
बाघ का शव रविवार दोपहर भीरा इलाके के एक गन्ने के खेत में देखा गया। यह खेत दुधवा पार्क के करीब और शारदा नदी की तलहटी में है। दोपहर के वक्त गन्ना छील रहे मजदूर जब खेत के अंदर गए तो वहां उनको बाघ की लाश मिली। बाघ का यह शव पूरी तरह से सड़ चुका था। उससे बदबू उठ रही थी और यह कई दिन पुराना लग रहा था। सूचना पर डीएफओ साउथ खीरी नीरज कुमार, दुधवा पार्क के उप निदेशक पीपी सिंह भी पहुंच गए।
दुधवा के डिप्टी डायरेक्टर पीपी सिंह ने बताया कि बरामद शव टाइगर का ही है। शव सड़ने के बाद भी बाघ के नाखून और सभी दांत प्री मेलर से लेकर केनाइन तक सुरक्षित हैं। दांतों को देखने से वे घिसे हुए लग रहे हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह बूढ़ा और शिकार करने के नाकाबिल हो चुका बाघ था। अधिकारियों ने शिकार जैसी आशंका से इंकार किया है।


किशन पुर वन्यजीव विहार में मिला मृत बाघ शावक 

खीरी, ४ जनवरी-दुधवा टाइगर रिजर्व की किशनपुर सेंक्चुरी में सोमवार सुबह बाघ शावक का शव बरामद हुआ है। शावक की उम्र एक साल के करीब है। उसके पिछले हिस्से का मांस गायब है और पिछला पैर भी धड़ से अलग है। दुधवा के उप निदेशक पीपी सिंह ने शावक का शव मिलने की पुष्टि की है।
रविवार को दुधवा जंगल के करीब एक बूढ़े बाघ का शव मिलने के बाद वन विभाग सवालों में घिरा हुआ था। इस बीच सोमवार सुबह एक और खबर ने बाघ संरक्षण की मुहिम को कटघरे में खड़ा कर दिया। दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सैंक्चुरी क्षेत्र में झादी ताल के पास एक बाघ शावक का शव मिला है। शव पाए जाने की लोकेशन जंगल के कोर जोन में मचान नंबर एक के पास बताई गई।
मौके पर पहुंचे वन अधिकारियों के मुताबिक, बाघ शावक के पिछले हिस्से का मांस गायब था। उसका पिछला पैर भी शरीर से अलग हुआ पड़ा था। दुधवा नेशनल पार्क के उप निदेशक पीपी सिंह ने बाघ शावक का शव मिलने की पुष्टि करते हुए बताया कि इस शावक की मौत किसी नर बाघ के हमले में हुई है। बाघ के शावक को वयस्क बाघ अक्सर मारकर खा जाते हैं। वन विभाग ने बाघ शावक के शव को कब्जे में ले लिया है। उसको पोस्टमार्टम के लिए आईवीआरआई बरेली भेजा जाएगा।
दुधवा लाइव डेस्क 

Jan 3, 2016

बाघों के महान सरंक्षक कुंवर अर्जन सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित बाघ सरंक्षण कार्यशाला


दुधवा नेशनल पार्क के संस्थापक थे बिली अर्जन सिंह 
 जंगल में स्थित टाइगर हैवन में बाघिन और तेंदुओं के साथ रहते थे बिली 

दुधवा-खीरी। नववर्ष के आरम्भ में पहली जनवरी 2016 को पलिया सम्पूर्णानगर रोड पर स्थित जसबीर नगर में पद्म भूषण बिली अर्जन सिंह की याद में दुधवा लाइव के बैनर तले के के मिश्र के संयोजन में बाघ सरंक्षण जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आयोजक शमिन्दर बोपाराय थे जिन्होंने बिली अर्जन सिंह पर एक किताब लिखी "टाइगर ऑफ दुधवा" और वह मौजूदा वक्त में बिली के घर को संग्रहालय के रूप में विकसित कर रहे हैं।

बिली अर्जन सिंह की सातवीं पुण्य तिथि पर आयोजित इस कार्यक्रम में दुधवा के उपनिदेशक पी पी सिंह, स्थानीय विधायक रोमी साहनी, पलिया ब्लॉक प्रमुख जॉर्जी, वनस्पतिविज्ञान प्रवक्ता ब्रजेंद्र प्रताप सिंह अभय मिश्रा के अलावा महाविद्यालयों के स्नातक स्तर के सैकड़ों छात्र छात्राओं ने भाग लिया।


कार्यक्रम की शुरुवात बिली अर्जुन सिंह के टाइगर हैवन पर स्थित उनकी समाधि पर पुष्पांजलि से हुई फिर जसबीर नगर में उनकी तस्वीर पर स्थानीय निवासियों एवं कार्यक्रम में आये हुए गणमान्य व्यक्तियों ने पुष्प अर्पित कर कुंवर अर्जन सिंह को श्रद्धांजलि दी।


कार्यशाला की शुरुवात सर्वप्रथम दुधवा के उपनिदेशक ने की उन्होंने बिली के साथ अपने एक दशक से अधिक बिताये समय में दुधवा और यहाँ के बाघों के बारे में तमाम संस्मरण सुनाए और विद्यार्थियों को बाघ और जंगल बचाने की प्रेरणा दी।

विधायक रोमी साहनी ने कहा की बिली अर्जन जैसी अंतर्राष्ट्रीय शख्सियत के बारे में नई पीढ़ी को सबक लेना चाहिए ताकि हम अपने वन्य जीवन को सरंक्षित कर सके।

बिली अर्जन सिंह की धरोहर को सरंक्षित करने वाले शमिन्दर बोपाराय ने कहा कि वह इस जगह को बिली साहब के स्मारक के तौर पर विकसित करेंगे। और वह बिली और उनकी बाघिन तारा पर एक फिल्म निर्माण के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे है.

पलिया के ब्लॉक प्रमुख जॉर्जी ने अर्जन सिंह के बाघों को बचाने के जूनून के कई किस्से बताये।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों और छात्रों को बिली अर्जन सिंह और बाघ व् तेंदुओं पर किए गए उनके प्रयोगों से सम्बंधित फिल्में दिखाई गयी।

कार्क्रम का संचालन बिली अर्जन सिंह के नजदीक रहे वन्य जीव विशेषज्ञ के के मिश्र ने किया और उन्होंने बताया 16 वर्षों से अधिक समय में उन्होंने बिली अर्जन सिंह के सानिध्य में रहकर बाघ सरंक्षण की जो प्रेरणा उन्हें मिली वह उनके जीवन का आदर्श है। मिश्र ने बताया की बिली की किताबे और उनके महान कार्य हमें अगली पीढ़ी में पहुंचाना है और हमारे जंगलों को संवर्धित करना है


गौर तलब है की बिली ने एक बाघिन तारा और तीन तेंदुओं को जंगल में पुनर्वासित किया। यह दुनिया में अकेला सफल प्रयोग है जो बिली अर्जन सिंह ने कर दिखाया। 

डेस्क 

Dec 31, 2015

पद्म भूषण बिली अर्जन सिंह की सातवीं पुण्यतिथि पर बाघ सरंक्षण पर कार्यशाला

Jasbeer Nagar-Pallia

विश्व विख्यात बाघ सरंक्षक पद्म भूषण बिली अर्जन सिंह की स्मृति में बाघ सरंक्षण पर कार्यशाला का आयोजन-

Billy Arjan Singh 
(15 Agust 1917-01 Jan 2010)
पलिया-खीरी, कल दिनांक एक जनवरी 2016 को पद्म भूषण स्वर्गीय बिली अर्जन सिंह की 7वीं पुण्यतिथि पर दुधवा लाइव संगठन द्वारा टाइगर मैन बिली अर्जन सिंह को श्रद्धांजलि दी जायेगी जिसमें अर्जन सिंह से जुड़े हुए लोग, पर्यावरणविद्, वन्य जीव प्रेमी व् जनपद के छात्र छात्राएं उपस्थित रहेंगें। कार्यक्रम के संयोजक वन्य जीव विशेषज्ञ व् संस्थापक दुधवा लाइव कृष्ण कुमार मिश्र के संयोजन में यह कार्यक्रम कराये जाएंगे।
कार्यक्रम रूपरेखा- 

1-प्रात: बिली अर्जन सिंह की टाइगर हैवेन स्थित समाधि पर पुष्पांजलि।

2-दोपहर सम्पूर्णानगर मार्ग पर स्थित बिली साहब के आवास पर बाघ सरंक्षण जागरूकता विषय पर गोष्ठी।
3- सांयकालीन जसवीर नगर में बिली अर्जन द्वारा बाघ व् तेंदुओं पर किए गए प्रयोगों से सम्बंधित फ़िल्में दिखाई जाएंगी।
बिली अर्जन सिंह के जसवीर नगर स्थित आवास के मौजूदा सरंक्षक व् ऑनर वन्य जीव प्रेमी व् बिली के जीवन पर आधारित पुस्तक टाइगर ऑफ़ दुधवा के लेखक शमिन्दर बोपाराय कार्यक्रम का संचालन करेंगें।

बाघ सरंक्षण व् दुधवा नेशनल पार्क की अतुलनीय जैवविवधिता पर वन्य जीव विशेषज्ञ गोष्ठी में एक विमर्श आयोजित करेंगे ताकि तराई की इस हरी भरी धरती को सरंक्षित व् सवंर्धित किया जा सके।

कार्यक्रम में दुधवा नेशनल पार्क के उप निदेशक पी पी सिंह, राज्य सभा सांसद रवि प्रकाश वर्मा, डॉ वी पी सिंह  वन्य जीव बोर्ड उत्तर प्रदेश के सदस्य विधायक सुनील कुमार लाला, स्थानीय विधायक पलिया रोमी साहनी, वनस्पति विज्ञान प्रवक्ता ब्रजेंद्र प्रताप सिंह, और बिली अर्जन सिंह से जुड़े हुए तमाम लोग महान बाघ सरंक्षक को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

विभिन्न महाविद्यालयों के छात्र छात्राएं इस आयोजन में हिस्सा लेंगे जिन्हें बिली अर्जन सिंह के बाघ सरंक्षण की महान कहानियों से परिचित कराया जाएगा ताकि भविष्य में यह नही पीढ़ी बाघ और जंगल के रिश्ते को समझ सके और समाज में वन्य जीवन के सरंक्षण का सन्देश प्रसारित व् प्रचारित करने के लिए प्रेरित हो।

दुधवा लाइव डेस्क 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: