डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

इस जिन्दा खूबसूरती को नष्ट न करे..तस्वीर पर क्लिक करे

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Dec 18, 2014

लीमा में बनी सहमति का मतलब

कोरल डेवनपोर्ट 



यह इतिहास में पहली बार हुआ है। विगत रविवार को लीमा में वार्ताकार इस पर राजी हो गए कि सभी देश ग्रीन हाउस गैस की उत्सर्जन दर को कम करने का प्रयास करेंगे। हालांकि अब भी यह ग्लोबल वार्मिंग के खतरनाक और खर्चीले प्रभाव से खुद को बचाने का छोटा प्रयास ही होगा। मगर लीमा में 196 देशों के प्रतिनिधियों ने उस मसौदे को कुबूल कर लिया है, जिस पर अगले वर्ष पेरिस में हस्ताक्षर होने हैं।


संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी इस मसौदे को शुक्रवार को ही सार्वजनिक करने वाले थे, लेकिन अमीर और गरीब देशों के बीच तकरार की वजह से रविवार तक मामला टलता रहा। नए मसौदे के अनुसार, अगले छह महीने के अंदर सभी देशों को ग्लोबल वार्मिंग कम करने को लेकर घरेलू नीतियां बनानी होंगी। यही नीतियां 2015 के पेरिस समझौते का आधार होंगी, जो 2020 में प्रभावी होंगी। यह एक बेहतर ग्लोबल वार्मिंग समझौते को लेकर उस राजनीतिक गतिरोध का टूटना है, जिसे खत्म करने के लिए संयुक्त राष्ट्र पिछले 20 वर्षों से प्रयास कर रहा था। अब तक सारी चर्चाएं क्योटो प्रोटोकॉल के आधार पर ही होती रही थीं, जिसे लेकर विकसित और विकासशील देशों में मतभेद रहा है। इसमें विकसित देशों को बाध्य किया गया था, मगर चीन और भारत जैसे दो बड़े ग्रीन हाउस उत्सर्जक देश इससे मुक्त थे।


शोध करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट से जुड़ी जेनिफर मॉर्गन कहती हैं, 'यह नया समझौता अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक ऐसा नया रूप है, जिसमें सभी देश शामिल हैं। इसलिए कहना अतिशयोक्ति नहीं कि पेरिस का नया वैश्विक समझौता बस मुट्ठी में ही है।' हालांकि लीमा की राजनीतिक सफलता से भी समझौते का यह घोषित लक्ष्य स्वतः नहीं पाया जा सकता कि महज वैश्विक उत्सर्जन को कम करने से ही 3.6 डिग्री फारेनहाइट से ज्यादा बढ़ रही वैश्विक गर्मी से धरती को बचाया जा सकता है। यही वजह है कि समुद्री जलस्तर बढ़ने, समुद्री बर्फ के पिघलने, बाढ़ और अकाल बढ़ने, खाद्यान्न और जल की कमी और अत्यधिक तूफान जैसे खतरनाक और अपरिवर्तनीय प्रभावों में धरती के डूबने की आशंका वैज्ञानिक जता रहे हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जिन प्रतिबद्धताओं की बात मसौदे में कही गई है, वे उन प्रयासों के आधे हैं, जो 3.6 डिग्री फारेनहाइट की वृद्धि रोकने के लिए जरूरी हैं। इसलिए समझौते में तापमान में हो रही वृद्धि को रोकने के लिए उत्सर्जन कम करने का स्तर दोगुना करना होगा। हालांकि लीमा समझौते के बाद अब गेंद देशों की संसदों तथा ऊर्जा, आर्थिक और पर्यावरण मंत्री अथवा मंत्रालयों के पाले में है कि वे कार्बन कटौती को लेकर अपना दायित्व कितना पूरा कर पाते हैं।


पर्यावरण को लेकर काम करने वाली कुछ संस्थाओं ने नए मसौदे की 'नरम' भाषा की आलोचना की है। उनका कहना है कि इस दिशा में कठोर पारदर्शी प्रयासों की जरूरत है। मसलन, उत्सर्जन में जब से कटौती की जाएगी, उसका एक ही टाइम टेबल और एक ही बेस लाइन वर्ष होगा। लीमा समझौते में सरकारों को इन मापकों के इस्तेमाल की बात तो कही गई है, लेकिन इसे जरूरी नहीं बताया गया है। इसलिए यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स के प्रमुख अल्डेन मेयर कहते हैं, 'हमें जितने प्रयासों की आवश्यकता है, उस लिहाज से यह काफी कम है। मगर इन समझौतों के साथ ही हम बढ़ना चाहेंगे, ताकि दबाव बन सके।' मेयर और अन्य विशेषज्ञ गैर सरकारी समूहों, अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों की वकालत करते हैं, ताकि वे देशों की कार्बन कटौती नीतियों की स्वतंत्र समीक्षा कर यह बता सकें कि तुलनात्मक रूप से उनकी नीति कितनी तर्कसंगत है।


बहरहाल, इससे इन्कार नहीं कि अमेरिका और चीन में हुआ पर्यावरण समझौता ही लीमा समझौते के लिए उत्प्रेरक बना। ग्रीन हाउस गैसों के दो सबसे बड़े उत्सर्जक देशों के मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने को लेकर पिछले दिनों समझौता किया था। इसी समझौते ने तय किया कि गरीबों की बड़ी आबादी होने के बाद भी विकासशील देशों को कार्बन कटौती के गंभीर प्रयास करने चाहिए। इसलिए लीमा में चीन के राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग के उप मंत्री शी जेन्हुआ ने कहा कि इसकी सफलता ने पेरिस की सफलता के लिए एक अच्छी नींव रख दी है।


ग्रीन हाउस गैस के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक देश भारत ने भी लीमा समझौते की तारीफ की है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है, भारत इसे लेकर सहमत है। हालांकि बढ़ रहे कार्बन प्रदूषण में शुद्ध कटौती को लेकर प्रतिबद्धता जताने से भारत ने इन्कार किया है। उसका कहना है कि सस्ते कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के इस्तेमाल में कटौती नहीं होनी चाहिए, क्योंकि लाखों गरीब भारतीय अब भी बिजली के बिना रहते हैं। लेकिन उसने यह संकेत जरूर दिया है कि उत्सर्जन की अपनी दर को कम करने के लिए वह योजना बनाने का इरादा रखता है।


हालांकि लीमा समझौते के बाद सभी देशों के लिए यह जरूरी हो जाएगा कि उत्सर्जन को कम करने को लेकर वे योजना प्रस्तुत करें, पर उनकी अर्थव्यवस्था के आकार के मुताबिक योजनाओं का चरित्र अलग-अलग हो सकता है। अमेरिका जैसे विकसित देशों से यह उम्मीद है कि वे इन योजनाओं के साथ सामने आएंगे कि आखिर कैसे 2020 के बाद वे अपने उत्सर्जन का स्तर नीचे ले जाएंगे। इसी तरह चीन जैसी बड़ी, लेकिन विकासशील अर्थव्यवस्था वह वर्ष स्पष्ट करेगी, जो उत्सर्जन के लिहाज से उनका शिखर होगा। जबकि गरीब अर्थव्यवस्था से ऐसी योजनाओं की उम्मीद होगी, जिसमें उनके प्रदूषण बढ़ाने की बात तो होगी, पर उसकी दर धीमी रहेगी।

     साभार: अमर उजाला 




कोरल डेवनपोर्ट  (Coral Davenport) न्यूयार्क टाइम्स में ऊर्जा व् पर्यावरण नीतियों के मामलों की लेखिका हैं इनसे coral.davenport@nytimes.com संपर्क पर कर सकते है.

Dec 16, 2014

आखिर क्यों निकलना पड़ता है इन्हें अपने जंगलों से बाहर...

अर्धवयस्क बाघिन को बेहोश कर रेस्क्यू दल उसे रेडियो कॉलर पहनाते हुए 


बाघ शावक ने खेत में बंधी गाय का किया शिकार 
पन्ना टाइगर रिजर्व के बाहर छतरपुर जिले के चुरारन गांव की घटना 
रेस्क्यू टीम ने अर्धवयस्क बाघिन को बेहोश कर मड़ला परिक्षेत्र में छोंड़ा 
पन्ना, 12 दिसबर - 
म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व की सीमा से बाहर निकलकर एक अर्धवयस्क बाघिन ने छतरपुर जिले के चुरारन गांव स्थित खेत में बंधी एक गाय का शिकार किया है. घटना की जानकारी मिलते ही पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारी रेस्क्यू दल के साथ मौके पर पहुंचे और इस 17 माह की अर्धवयस्क बाघिन को बेहोश करके उसे सुरक्षित तरीके से पन्ना टाइगर रिजर्व के मड़ला वन परिक्षेत्र में गुरूवार को स्वच्छन्द विचरण के लिए छोड़ दिया है. 
पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने घटना की जानकारी देते हुए आज बताया कि मादा बाघ शावक पन्ना - 433 विचरण करते हुए रिजर्व क्षेत्र से बाहर निकल गई थी. इसके द्वारा छतरपुर जिले में स्थित चन्द्रनगर परिक्षेत्र के बाहर नादिया बेहर के आगे चुरारन गांव के खेत में बंधी एक गाय का किल किया गया था. यहां चारो तरफ आबादी का माहौल था, फलस्वरूप गांव के लोगों ने जैसे ही इस मादा बाघ शावक को देखा तो यह खबर पूरे इलाके में फैल गई. जानकारी मिलने पर तत्काल पन्ना टाइगर रिजर्व एवं छतरपुर वन मण्डल का अमला मौके पर पहुंच गया. घटना स्थल का जायजा लेने के बाद प्रशिक्षित हांथियों की मदद से उक्त मादा बाघ शावक को बेहोश करके उसे दोबारा पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर पहुंचा दिया गया है. इस अर्धवयस्क बाघिन की पहचान पन्ना 433 के रूप में की गई है, जो बाघिन टी - 4 की संतान है. इस बाघिन की विगत माह मौत हो चुकी है.

बाघिन टी - 4 की असमय मौत होने के बाद उसके तीन अर्धवयस्क शावक अनाथ हो गये, जिनमें से एक पन्ना - 433 है. अनाथ हो चुके तीनों शावक कुछ दिनों तक अपनी मां की तलाश करते रहे लेकिन जब वह नहीं मिली तो तीनों एक साथ रहने लगे. लेकिन बीते कुछ दिनों से यह मादा शावक अपने दोनों भाईयों से बिछुड़ गई और भटककर चुरारन गांव के क्षेत्र में पहुंच गई. जहां पर इसने खेत में बंधी गाय का शिकार किया. क्षेत्र संचालक श्री मूर्ति ने बताया कि इस अर्धवयस्क बाघिन की पीठ के ऊपर पुराना घाव भी देखा गया है. ऐसी आशंका जताई जा रही है कि यह घाव किसी अन्य बाघ या फिर तेंदुए के हमले से हुआ होगा. बाघिन को बेहोश किये जाने के उपरान्त पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. संजीव कुमार गुप्ता द्वारा घाव का समुचित इलाज किया गया. ऐसा बताया गया है कि यह घाव जल्दी ही ठीक हो जायेगा. पूरे कार्यक्रम का नेतृत्व एस.के. मण्डल मुय वन संरक्षक छतरपुर के द्वारा किया गया. बेहोश करने की कार्यवाही पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. सजीव कुमार गुप्ता के द्वारा की गई. इस दौरान क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति, डा. राघवेन्द्र श्रीवास्तव वन मण्डलाधिकारी छतरपुर, डा. अनुपम सहाय उप संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व मौजूद रहे. मौके पर भीड़ के नियंत्रण की जिमेदारी छतरपुर पुलिस विभाग के द्वारा निभाई गई. 


अर्धवयस्क बाघिन को पहनाया गया रेडियो कॉलर 
बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाइगर रिजर्व में नर बाघों की तादाद मादा बाघों की तुलना में अधिक है. इस असंतुलन के चलते मादा बाघ शावकों व बाघिनों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है. अर्धवयस्क बाघिन पन्ना - 433 की चौबीसों घंटे निगरानी हो सके तथा यह दोबारा रिजर्व वन क्षेत्र के बाहर न जा पाये, इसके लिए पार्क प्रबंधन द्वारा इसे रेडियो कॉलर पहना दिया गया है. पन्ना टाइगर रिजर्व की सभी बाघिनों को सुरक्षा के लिहाज से व्ही.व्ही.आई.पी. का दर्जा प्राप्त है, अब इस अर्धवयस्क बाघिन को भी इसी दर्जे की सुरक्षा प्रदान की जायेगी ताकि आगे चलकर यह बाघों की वंशवृद्धि में योगदान कर सके. मालुम हो कि पन्ना टाइगर रिजर्व में जन्में तकरीबन आधा दर्जन बाघ शावक (नर) वयस्क होने के बाद पन्ना टाइगर रिजर्व के बाहर विचरण कर रहे हैं. 

अरुण सिंह 
पन्ना 
मध्य प्रदेश भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com



Dec 15, 2014

देखने काबिल है पन्ना के लखनपुर सेहा का मशरूम रॉक

पन्ना शहर के निकट स्थित लखनपुर सेहा का मशरूम रॉक 

जैव विविधता से परिपूर्ण है यहां का घना जंगल
पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है यह स्थल 

पन्ना- जिला मुयालय पन्ना से महज 10 किमी. की दूरी पर सड़क मार्ग के निकट स्थित लखनपुर सेहा का घना जंगल तथा ऊंची मीनार जैसा नजर आने वाला यहां का मशरूम रॉक देखने जैसा है. जैव विविधता से परिपूर्ण इस मनोरम स्थल में पर्यटन विकास की असीम संभावनाएं मौजूद हैं, फिर भी आश्चर्य इस बात का है कि अभी तक प्रकृति की इस अनूठी और विस्मय विमुग्ध कर देने वाली कृति की ओर शासन व प्रशासन का ध्यान नहीं गया. यदि इस स्थल का समुचित विकास हो जाय तो यह देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है. 

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले को प्रकृति ने अनुपम सौगातों से नवाजा है. यहां के हरे - भरे घने जंगल, अनूठे जल प्रपात व गहरे सेहे देखकर लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि यहां इतना सब है फिर भी यह इलाका पिछड़ा और गरीब क्यों है? पन्ना शहर में जहां भव्य व विशाल प्राचीन मंदिर हैं वहीं इस जिले में ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भी भरमार है. प्रकृति तो जैसे यहां अपने बेहद सुन्दर रूप में प्रकट हुई है. यदि इन सभी खूबियों का सही ढंग से क्षेत्र के विकास व जनकल्याण में रचनात्मक उपयोग हो तो इस पूरे इलाके का कायाकल्प हो सकता है. पन्ना शहर के बेहद निकट स्थित लखनपुर का सेहा एक ऐसा स्थान है जो इस जिले को पर्यटन के क्षेत्र में समानजनक स्थान दिलाने की क्षमता रखता है. जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इस अनूठे स्थान को देश व दुनिया के सामने सही तरीके से प्रस्तुत किया जाय तथा इस स्थल का अपेक्षित व जरूरी विकास किया जाय. 

जानकारों का यह कहना है कि लखनपुर का सेहा सैकडों वर्षों से बाघों का प्रिय रहवास रहा है. यहां पर सैकडों प्रजाति की जहां वनस्पतियां व वृक्ष पाये जाते हैं वहीं वन्य जीवों के मामले में भी यह जंगल अत्यधिक समृद्ध है. बारिश के मौसम में तो लखनपुर का सेहा जीवंत हो उठता है. पहाड़ के ऊंचे शिखरों से जब जल प्रपात के रूप में पानी की धारा नीचे गिरती है तो यह नजारा लोग अपलक होकर निहारते हैं. इसी सेहा से होकर रूंज नदी गुजरती है, क्यों इस जंगल और पहाड़ का पानी इसी नदी में जाकर मिलता है. सब कुछ इतना निराला और अनूठा है कि इस स्थान के बारे में यही कहा जा सकता है कि अवश्य देखिये यह देखन जोगू मशरूम रॉक है वल्चरों का बसेरा 

ऊंची मीनार की शक्ल जैसा दिखने वाला लखनपुर सेहा का मशरूम रॉक आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है. प्रकृति ने इस कलाकृति को बड़े ही अनूठे अंदाज में गढ़ा है. पहली मर्तबे जो कोई यहां जाता है वह यहां के घने हरे - हरे भरे जंगल का विहंगम दृश्य व मशरूम रॉक के अद्भुत नजारे को देख अवाक रह जाता है. ऊंचे पहाड़ों के बीच स्थित यह मशरूम रॉक बल्चरों का सुरक्षित ठिकाना भी है. यहां के जंगल में दर्जनों की संया में बल्चर ऊंची उड़ान भरते नजर आते हैं. कुछ आकाश की ऊंचाई को नापते हुए उड़ते हैं तो कुछ इस मीनार में आकर विश्राम करते हैं. बल्चरों के लिए शायद यह बेहद प्रिय व अनुकूल जगह है, क्यों कि यहां उनकी जिन्दगी में किसी भी तरह का कोई खलल और बाधा नहीं है. 


पर्यटन विकास समिति इस ओर दे ध्यान 

पन्ना जिले में पर्यटन विकास की संभावनाओं की तलाश करने के लिए अभी हाल ही में कलेक्टर आर.के. मिश्रा द्वारा जिला स्तरीय समिति का गठन किया गया है. प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2015 को पर्यटन वर्ष के रूप में मनाये जाने की घोषणा की गई है. इसी परिप्रेक्ष्य में पर्यटन वर्ष मनाने के लिए पन्ना जिले में भी कार्य योजना तैयार की जा रही है. जिसके लिए बकायदे समिति बनाई गई है जिसमें जिले के कई प्रमुख अधिकारियों को शामिल किया गया है. इस अच्छे अवसर का पन्ना जिले को भरपूर फायदा मिल सकता है, क्यों कि इस जिले में वह सारी चीजें और परिस्थितियां मौजूद हैं जो एक अच्छे पर्यटन स्थल के लिए जरूरी हैं. यदि पर्यटन विकास समिति ने रूचि के साथ कार्य किया और बेहतर कार्ययोजना बनाई तो पन्ना एक अनूठा पर्यटन स्थल बन सकता है. 



अरुण सिंह 
पन्ना 
मध्य प्रदेश भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com




Dec 12, 2014

एक लालची करुणाहीन शिकारी की तरह जिसकी हवस अंतहीन है.....




प्रवासनामा एक बहुत सुन्दर शब्द ...असल में हम सभी प्रवासी ही तो है। धरती पर इंसान और जानवर में फर्क इतना है की सभ्यता के विकास के साथ इंसान ने ठहरना सीख लिया एक जगह वजह थी कृषि का सृजन जिसे इंसानी दिमाग ने धीरे धीरे विकसित किया और आज चरम पर आकर वैज्ञानिक प्रयोगों और अतिउत्पादन की लालसाओं ने कृषि की बुनियाद को खोखला कर दिया नतीजतन हमारी बुनियादी जरूरतें भी प्रवासी हो गयी। हम एक जगह से दूसरी जगह उसी सदियों पुराने आदमी की आदिम प्रवृत्ति को दोहराने लगे फर्क बस इतना है की तब संसाधनों से भरी धरती का दोहन हम अपने और अपने परिवार के लिए करते थे और अब हम दूर दूर जाकर जल जंगल जमीन को खोजकर उसका व्यापार करते है! समय दोहरा रहा है खुद को और हम भी प्रक्रियाओं के दोहराव में है पर एक लालची करुनाहीन शिकारी की तरह जिसकी हवस अंतहीन है।

धरती को नोचता खसोटता ये इंसान जिसकी शक्ल तो काफी कुछ आदिम मनुष्य से मिलती है पर मौजूदा आदमी जो इंसानियत का आविष्कार करने के बाद खुद को इंसान कहता आया है इसकी इंसानियत की परिभाषाएं बदली हुई...

प्रवास धरती के जीवों की मूल प्रवत्तियों में से एक है और जो उस जीव के जीने और अपनी नस्ल को वजूद देने के लिए एक बुनियादी जरूरत रही है। आदमी की इस कहानी में बड़े खूबसूरत प्रवासों का जिक्र है बापू को ही ले तो साउथ अफ्रीका में प्रवास के कारण क्रान्ति का बिगुल बजा। भारत भूमि में ऋषियों के जगह जगह प्रवास कर शिक्षा और नैतिकता का प्रसार और प्रचार हुआ। महावीर और गौतम के प्रवासों ने भारत भूमि के कोने कोने में शिक्षा शान्ति और प्रेम का प्रादुर्भाव किया।

पशु पक्षी बाघ तितली सभी जीव अपनी जरूरतों की खातिर प्रवास करते है विभिन्न स्थानों पर प्रकृति से कुछ लेते है तो परागण और बीज प्रकीर्णन की प्रक्रियाओं में सहयोग के साथ साथ वहां के जैविक संतुलन में भी अपनी भूमिका निभाते है।

बस प्रवासन की कहानियों के वे दस्तावेज तैयार करने है प्रवास नामा में जो इस बात को समझा सके की हम धरती के प्रवासी जिन जिन जगहों पर प्रवास करते है तो उस जगह की प्राकृतिक संपदा का कितना शोषण करते है और हमारी कितनी सकारात्मक  भूमिका होती है प्रकृति के लिए। और हाँ उन चेहरों को भी बेनकाब कर यह सुनश्चित किया जाए की जो बुनियादी जरूरतों के अलावा जल जंगल जमीन का सौदा करते है उन सौदागरों की भी एक फेहरिस्त तैयार हो।

वसुंधरा के हम सभी प्रवासियों को अब प्रवास नामा लिखना होगा ताकि सनद रहे की हमने जीने की जरूरतों से अलाहिदा इस धरती को कितना नोचा है और अगर कोइ सज़ा मुक़र्रर हो सके तो इन अपराधियों को जरूर हिरासत में ले अन्यथा एक दिन हम जीने के लिए पानी की बूँद बूँद और हरियाली के टुकड़ों की खातिर लड़ते लड़ते ख़त्म हो जायेंगे और इस पश्चाताप के साथ की जहां हमें प्रवास मिला पानी मिला अन्न मिला जीने का सब सामान, हमने उस धरती को बंजर कर दिया और बंजर जमीनों में बीज नहीं उगते...


प्रवास नामा में प्रकृति कृषि और आदम सभ्यता की कहानियों का सुन्दर दस्तावेजीकरण हो और जिससे हम और हमारी सरकारे कुछ सीख सके और हमारी वसुंधरा की हरियाली में इजाफा हो बस इसी आशा के साथ प्रवास नामा के अतुलनीय सफर को शुभकामनाएं।।।।
कृष्ण 

(यह लेख बुंदेलखंड से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका "प्रवासनामा" के नवम्बर अंक में प्रकाशित हो चुका है)





संपादक की कलम से........ 
कृष्ण कुमार मिश्र 
editor.dudhwalive@gmail.com
संस्थापक संपादक 
दुधवा लाइव पत्रिका व् दुधवा लाइव  रेडियो 

Dec 11, 2014

एशिया पेसिफिक मंथन पुरस्कार २०१४ में दुधवा लाइव को किया गया नामित



नई दिल्ली: इंडिया हैविटेट सेंटर में चार दिसम्बर को आयोजित एशिया पेसिफिक मंथन पुरस्कार २०१४ में दुधवा लाइव डिजिटल मैगजीन व् दुधवा लाइव रेडियों को नामित किया गया. इस आयोजन में ३५ देशों ने हिस्सा लिया जिसमे श्रीलंका, बांग्लादेश व् पाकिस्तान के तकनीकी संस्थाओं व् इन्नोवेटर्स ने प्रमुखता से अपनी हिस्सेदारी की. इंडिया हैविटेट सेंटर में पुरस्कार समारोह के अतिरिक्त डिजिटल डेवलपमेंट समिति का भी आयोजन किया गया जिसमे तमाम देश विदेश की संस्थाओं ने हिस्सा लिया, इस समिति में श्रीलंका के शिक्षा मंत्री बंदुला गुनावर्धने ने मुख्य अतिथि के तौर पर विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया.

इस आयोजन के प्रमुख डिजिटल एम्पावरमेंट फाउन्डेसन के संस्थापक ओसामा मंजर थे और कार्यक्रम समिति के सरंक्षकों में सैम पित्रोदा, प्रो. अनिल गुप्ता, प्रो. अशोक झुनझुनवाला, डॉ. आर इ माशेलकर जैसी हस्तियाँ रही. यूनेस्को की संस्कृति कार्यक्रम विशेषग्य मो चीबा व्  योर पब्लिक इंटरेस्ट रजिस्ट्री के वाइस चयरमैन ने कार्यक्रम में शिरकत की. 



दुधवा लाइव ने इंडिया हैविटेट सेंटर नई दिल्ली में लगाई प्रदर्शनी

नई दिल्ली: इंडिया हैविटेट सेंटर में दुधवा लाइव ने वन्य जीवन से सम्बंधित तस्वीरों एवं तराई के जंगलों की कहानियों को इस वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया, तस्वीरों, व् डिजिटल तकनीक से विभिन्न आडियो व् वीडियों व् पावर पाइंट प्रजेंटेशन के जरिये एशिया पेसिफिक देशों से आये प्रतिनिधियों को तराई के जंगलों की जैविक विविधिता व् पर्यावरण की समस्याओं से अवगत कराया. 

इंडिया हैविटेट सेंटर में लगे उस डिजिटल बाजार में विश्व की वन्य जीवन व् पर्यावरण पर पहली हिन्दी पत्रिका दुधवा लाइव व् दुधवा लाइव वेब रेडियो को दुनिया से आये तमाम तकनीकी विशेषज्ञों व् आगुन्तकों द्वारा अत्यधिक सराहना मिली. 

तराई के जंगलों पर केन्द्रित दुधवा लाइव की इस प्रदर्शनी को दुधवा लाइव के संस्थापक व् सम्पादक कृष्ण कुमार मिश्र ने आयोजित किया, दुधवा लाइव टीम के प्रमुख सहयोगी सदस्यों में हिमांशु तिवारी, सुशांत झा, मंगेश त्रिवेदी, व् सतपाल सिंह मौजूद रहे.


गौरतलब है की मंथन अवार्ड २०१४ नई दिल्ली इंडिया हैविटेट सेंटर में दुधवा लाइव को ई उत्तरा पुरस्कारों की श्रंखला में बेस्ट इनीसिएटिव ऑफ़ ई उत्तरा अवार्ड २०१४ में प्रथम श्रेणी में स्थान मिला.


दुधवा लाइव डेस्क  


     

Nov 15, 2014

पर्यटकों के लिए खोल दिया गया दुधवा पार्क



हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति ने फीता काटकर किया उद्घाटन

दुधवा टाइगर रिजर्व-खीरी से डीपी मिश्रा

दुधवा नेशनल पार्क को विधिविधान से फीता काटकर पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। उद्घाटन के अवसर पर दुधवा की सात हट तथा गेस्ट हाउस का वीआईपी सूट में रूके पर्यटकों ने जंगल का भ्रमण किया। दुधवा जंगल का भ्रमण करके हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरूण टंडन व पीके शाही ने प्रथम पर्यटक होने का गौरव हासिल किया। गैंडा दर्शन के साथ ही न्यायमूर्तिद्वय ने अन्य वन्यजीव जंतुओं को जंगल में करीब से विचरण करते देखकर खुशी जताई। 




यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क पर्यटकों के भ्रमण के लिए खोल दिया गया है। इससे पूर्व दुधवा पर्यटन परिसर में आयोजित संक्षिप्त समारोह पर पहले विधिविधान से मेन गेट पर हुई पूजा के बाद हाईकोर्ट इलाहाबाद के न्यायमूर्ति अरूण टंडन तथा लखनऊ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पीके शाही ने फीता काटकर पर्यटन सत्र का उद्घाटन किया। इस दौरान मौजूद हाथी शिशु सुहेली व विनायक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बिन्दु बने रहे। जबकि न्यायमूर्ति अरूण टंडन तथा न्यायमूर्ति पीके शाही ने दुधवा दर्शन करके नए सत्र के प्रथम पर्यटक बनने का गौरव हासिल किया। उन्होंने सलूकापुर पहुंचकर हाथी से गैंडा दर्शन करने के साथ ही जंगल में स्वच्छंद घूमते हुए अन्य जीव जन्तुओं को करीब से देखकर खुशी जताते हुए दुधवा की जैवविविधता की भरपूर सराहना की।


 इसके अतिरिक्त सिंचाई विभाग के सचिव एमपी अग्रवाल ने परिवार के संग दुधवा दर्शन किया। इसके साथ ही अन्य तमाम पर्यटकों ने जिप्सी गाडि़यों से जंगल का यादगार भ्रमण किया। डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि दुधवा आने वाले पर्यटकों को कोई दिक्कत या परेशानी न हो इसके निर्देश अधीनस्थों को दिए गए हैं। इसके बाद भी असुविधा होने पर पर्यटक सीधे हमसे संपर्क कर सकते हैं। श्री सिंह ने बताया कि पर्यटकों के लिए इस बार दुधवा, दक्षिण सोनारीपुर, गैंडा इकाई, सोठियाना एवं किशनपुर वन्यजीव विहार खोला गया है। श्री सिंह ने सभी के प्रति आभार जताते हुए दुधवा के जंगल में पालीथीन आदि न फेंकने, वन्यजीवों से छेड़छाड़ न करने एवं पार्क के नियमों का पालन करने की अपील पर्यटकों से की है। इस दौरान दुधवा पर्यटन रेंजर टीआर दोहरे, दक्षिण सोनारीपुर रेंजर डीकेलाल श्रीवास्तव, गाइड मोहम्मद नसीम, नासिर अली, भागीराम, श्रवण कुमार, मनोज कुमार, सुनील जायसवाल समेत क्षेत्र के तमाम वन्यजीव प्रेमी, पत्रकार उपस्थित रहे।


देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
पलिया खीरी 
dpmishra7@gmail.com

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: