डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Himalaya

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Mar 31, 2015

भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ और भूमि अधिकार के लिए आन्दोलन की रणनीति

2 अप्रैल, डिप्टी स्पीकर हॉलकंस्टीट्यूशन क्लबदिल्ली


वर्ष 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करके मोदी की अगुवाई वाली वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया जो अब लोक सभा में पास होकर भूमि अधिग्रहण बिल का रूप ले चूका है. अध्यादेश के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक देश की जनता इसके विरोध में आन्दोलन कर रही है. यह बिल सरकार को देश के किसानों से बिना उनके अनुमति के ज़मीनें छीनकर कम्पनियों को देने की ताकत प्रदान करता है. केवल ज़मीन ही नही बल्कि सरकार देश का पानीदेश की बिजलीदेश के खनिज संपदा और देश की जनता का श्रम सबकुछ कंपनियों को सस्ते में उपलब्ध कराने की जुगत में है ताकि उनके (कंपनियों) के लिए कम लागत विनिर्माण (Low Cost Manufacturing) की गारंटी हो सके तथा वे इस देश में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सकें. इसे ही देश की वर्तमान सरकार तेज गति से विकास बता रही है और प्रधान मंत्री मेक इन इंडिया का नाम दे रहे हैजिस मेक इन इंडिया की दुनिया में श्रम कानून लागू नही होंगे और मजदूरों पर कंपनियों का पूर्ण नियंत्रण होगा. दुसरे शब्दों में भारत में संविधान का राज नही होगा बल्कि कंपनीयों का राज होगाजो देश की जनता के लिए गुलामी के एक नए दौर की शुरुआत होगी.  

देश की जनता शाशकों के जन विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त मंशा को पहचानने लगी,यही कारण है कि अध्यादेश के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक भारत की जनता भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ देश के सभी हिस्सों में लगातार सड़कों पर प्रतिरोध आन्दोलन कर रही है. इस मुद्दे पर जनता के जुझारू प्रतिवाद ने संसद के विपक्षी पार्टियों को भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करने के लिए बाध्य कर दिया हैऔर बीते 17 मार्च को संसद में विपक्ष के सांसदों में ने साथ मिलकर के भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च भी किया है. विपक्षी पार्टियों द्वारा किये जा रहे विरोध के कारण ही सरकार इस बिल को राज्य सभा में लाने का सहस नही दिखा पा रही है.

इस अध्यादेश ने भूमि के प्रश्न को एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है. देश की जनता भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने की मांग के साथ-साथ भूमिहीनों के लिए भू अधिकार की मांग को भी प्रमुखता से उठा रही है. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द करने की मांग पर देश भर के जनांदोलनों और ट्रेड यूनियनों ने मिल कर अध्यादेश के विरोध में 24 फ़रवरी को संसद मार्ग पर विशाल रैली आयोजित की थी जिसकी धमक संसद में भी सुनाई पड़ी और सरकार को अध्यादेश में कुछ बदलाव का ड्रामा भी करना पड़ा था.

वर्तमान में भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने और भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार सुनिश्चित करने के लिए पुरे देश में जन प्रतिरोध खड़ा हो रहा है और जगह-जगह से जुझारू प्रतिवादों और आन्दोलन की ख़बरें आ रही हैं. पुरे भारत में जन संगठन और ट्रेड यूनियन अपने-अपने इलाकों में आन्दोलन को और अधिक तीखा करने के लिए लोगों के सामने बिल के जन विरोधी चरित्र को रखते हुए हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं,तथा पुरे देश में जगह-जगह शहीदी दिवस (23 मार्च) को भू-अधिकार दिवस के रूप में मनाया गया है. भूमि अधिग्रहण बिल रद्द हो यह आन्दोलनों की फौरी मांग है लेकिन भू-अधिकार और विशेष तौर पर भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार के मुद्दे को भूमि अधिग्रहण बिल विरोधी आन्दोलन के केंद्र में रखा गया हैऔर यह आन्दोलन अध्यादेश रद्द हो जाने के बाद भी भू-अधिकार के प्रश्न पर आगे भी जारी रहेगा. आने वाले दिनों में भूमि अधिकार और श्रम अधिकारों के सवाल पर भूमि अधिग्रहण नहीभू-अधिकार चाहिएनारे के साथ जन संगठनों और ट्रेड यूनियनों के संयुक्त नेतृत्व में जन अभियान चलेगा.  

भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने और सबके लिए और खास कर भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार की लड़ाई को आगे बढ़ाने हेतु व्यापक और दूरगामी रणनीति तैयार करने के हेतु विचार विमर्श करने के लिए 2 अप्रैल 2015 को एक सम्मलेन आयोजित किया गाया है और उसी दिन सायं 4-6 बजे तक राजनितिक पार्टी के प्रतिनिधियों/सांसदों के साथ भी इस मुद्दे पर मीटिंग आयोजित होगी. जिसमे भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में संघर्ष करने वाले सभी संगठनों के प्रतिनिधि सादर आमंत्रित हैं. मीटिंग में मेधा पाटकर, अशोक चौधरी, हन्नान मौला, अतुल अंजान, डॉ सुनीलम, राकेश रफीक, भूपेन्द्र सिंह रावत एवं अन्य साथी शामिल होंगे.

रोमा, संजीव, मधुरेश, श्वेता, कृष्णा प्रसाद, वीजू कृष्णन, प्रताप, सत्यम, मीरा, रागीव
 समन्वय समिति की ओर से  (For Coordinating Committee)

Contact : 9818905316, 9958797409, 9911528696

महान में लोकतंत्र महोत्सव, ग्रामीणों ने किया भूमि अधिग्रहण कानून का विरोध


महान संघर्ष समिति ने भरी हुंकार, अबकी बार जंगल-जमीन पर हमारा अधिकार

30 मार्च 2015। सरकार द्वारा महान जंगल को कोयला खदान के लिये आंवटित नहीं करने के निर्णय को लोकतंत्र की जीत बताते हुए आज अमिलिया में महान संघर्ष समिति द्वारा लोकतंत्र महोत्सव का आयोजन किया गया। इस महोत्सव में महान वन क्षेत्र में स्थित करीब 20 गांवों के सैंकड़ों ग्रामीण शामिल हुए। समारोह में ग्रामीणों ने सरकार द्वारा प्रस्तावित भूमि अघिग्रहण कानून के विरोध में अबकी बार जंगल-जमीन पर हमारा अधिकार के नारे लगाये।
महोत्सव की शुरुआत ग्रामीणों ने जंगल के रक्षक डीह बाबा की पूजा से की। महोत्सव में शामिल महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने जंगल और उससे जुड़े अपने रिश्ते पर बनी पारंपरिक लोकगीतों और लोकनृत्य के माध्यम से अपनी खुशी का इजहार किया। 


कोयला मंत्रालय द्वारा महान को निलामी सूची से हटा दिया गया है लेकिन इसी जंगल क्षेत्र में कई दूसरे कोल ब्लॉक को निलामी सूची से नहीं हटाया गया है। जनसम्मेलन को संबोधित करते हुए महान संघर्ष समिति के सदस्य कृपानाथ यादव ने कहा, महान जंगल में प्रस्तावित कोयला खदान के खिलाफ लड़ते हुए हमने लगातार धमकियों, गैरकानूनी गिरफ्तारी और छापेमारी का सामना किया है। हमारे आंदोलन का ही नतीजा है कि सरकार को हमारी बात माननी पड़ी और महान कोल ब्लॉक को निलामी सूची से बाहर करना पड़ा। अब हम सरकार से मांग करते हैं कि वन क्षेत्र के आसपास बसे गाँवों को वनाधिकार कानून के तहत सामुदायिक वनाधिकार दिया जाय। हम आगे भी किसी भी परिस्थिति में फिर से कोयला खदान को आवंटित नहीं होने देंगे और जंगल का विनाश होने से बचायेंगे



इस आंदोलन में शुरुआत से शामिल महान संघर्ष समिति की कार्यकर्ता और ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर प्रिया पिल्लई ने कहा, सरकार का यह फैसला लोकतंत्र की जीत है। यह लोगों के आंदोलन की जीत है। एक ऐसे समय में जब दिल्ली की केन्द्र सरकार लोगों के जंगल-जमीन को हड़पने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून में फेरबदल करना चाहती है, महान जैसे जमीनी आंदोलनों की अहमियत बढ़ जाती है। नियामगिरी आंदोलन के बाद महान की लड़ाई ने देश में दूसरी बार साबित किया है कि लोगों के आंदोलन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस संघर्ष ने देश भर के जनआंदोलनों को ताकत दी है
प्रिया ने आगे कहा, प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में सरकार ने ग्रामीणों की सहमति और जनसुनवाई को जरुरी नहीं माना है, जो सीधे-सीधे गरीबों और  किसानों के हित के खिलाफ है। इस प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ पूरे देश में लोगों ने आंदोलन शुरू कर दिया है। महान संघर्ष समिति भी इन आंदोलनों के साथ मिलकर प्रस्तावित कानून का विरोध करेगी

राष्ट्रीय वन श्रमजीवि अधिकार मंच की तरफ से सभा को संबोधित करते हुए गंभीरा भाई ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध किया और कान्हड़ डैम से प्रभावित लोगों के द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के बारे में बताया। उन्होंने 2013 में पारित भू अधिग्रहण कानून को लागू करने की मांग की।
जनसम्मेलन के अंत में महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ताओं ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की प्रतियों को फाड़कर जमीन में दफनाया और उसपर आंदोलन के प्रतीक के रुप में पौधारोपण किया।

प्रिया पिल्लई
ग्रीनपीस भारत 
 ppillai@greenpeace.org


अविनाश कुमार 
ग्रीनपीस भारत 
Avinash.kumar@greenpeace.org

Mar 26, 2015

मेरा रंग दे बसन्ती चोला ?




बुंदेलखंड में मौत की खेती
पोखर को मैदान बनाया, मरता हुआ किसान बनाया, 
शहर बनाए, गांव मिटाए, जंगल और पहाड़ हटाए,
 जहर मिले दुकानों में मरना कितना आसान बनाया, ये कैसा हिंदुस्तान बनाया ?
-  आशीष सागर, Banda 
बांदा। आप किसान आत्महत्या और सर्वाधिक जल संकट वाले क्षेत्र बुंदेलखंड से रूबरू होंगें।यहां अप्रैल वर्ष 2003 से मार्च 2015 तक 3280 ( करीब चार हजार ) किसान आत्महत्या किए हैं। समय-समय पर इन मुद्दों को किसान आंदोलन, बेमौसम बारिश और ओलों से हलाकान किसान परिवारों ने जिंदा किया है। बुंदेलखंड में फरवरी और मार्च का महीना मौत के मौसम के लिए अनुकूल रहता है। इस बार भी यही हुआ पहले सूखा और फिर हाड़तोड़ मेहनत के बाद तैयार फसल पर ओलों की बारिश इस तरह हुई कि किसान आत्महत्याओं की बयार एक बार फिर बुंदेलखंड में हाहाकार मचा रही है। बीते 2 महीनों में शायद ही कोई दिन ऐसा गया हो जब गांव से निकलती खबर में किसी किसान के आत्महत्या का मामला न आया हो। हां यह अलग बात है कि राज्य और केंद्र की सरकारों ने कभी लिखित रूप में अपनी गर्दन बचाने के लिए यहां किसान आत्महत्या को नहीं माना। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार वर्ष 2009 में यहां 568, 2010 में 583, 2011 में 519, 2012 में 745, 2013 में 750 और दिसंबर 2014 तक 58 किसान आत्महत्या किए हैं। वहीं वर्ष 2015 अगुवाई ही किसान आत्महत्या के साथ हुई। खबर लिखे जाने तक बुंदेलखंड के 7 जिलों में बीते 3 महीनों में 28 किसान आत्महत्या कर चुके है। मौत की फसल अपनी रफ्तार से पक रही है। लाशों पर आंदोलन और सियासत का माहौल गर्म है मगर उन गांव का हाल जस का तस है जहां संनाटे को चीरती किसान परिवारों की चींखें सिसकियों के साथ हमदर्दी जताने वालों की होड़ में बार-बार शर्मसार होती है। अभी तक बांदा में रबी की फसलों पर 1.70 अरब का बीमा किसानों ने दांव पर लगाया है। जिले की 9 बैंकों ने 39948 किसानों की 51800 हेक्टेयर भूमि का बीमा किया है। बीमा कंपनी मनमने ढंग से सर्वे कर रहीं हैं। अलसी की फसल बीमा से मुक्त रखी गई है। आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखंड में 80.53 फीसदी किसान कर्जदार है। बांदा में कुल बीमा राशि एक अरब 70 करोड़ 90 लाख 62 हजार रुपए है, जिसका प्रीमियम 6 करोड़ 96 लाख 35 हजार 268 रुपए है। अगर इन बैंकों के किसान के्रडिट कार्ड पर किसानों की खेती का क्रेडिट कर्ज में देखा जाए तो 6 अरब रुपए की फसल किसानों ने कर्ज से पैदा की है। जिसे 90 फीसदी मौत के मौसम ने बर्बाद कर दिया है। सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किसानों के लिए मुआवजे की घोषणा करते हुए 200 करोड़ रुपए जारी करने का दावा किया है। तत्कालीन चित्रकूट मंडल आयुक्त पीके सिंह ने जिलाधिकारी बांदा सुरेश कुमार प्रथम के साथ कुछ गांवों में खुद जाकर किसानों के बिगड़े हालात का जायजा लिया। उन्होंने लेखपाल को सख्त हिदायत दी है कि कहीं भी सर्वे करने में लापरवाही न बरती जाए। मगर गांव से छनकर आती हुई खबरें यह भी बताती हैं कि मुख्तयार खाने से जमीनों के नक्शे उड़ा देने वाले लेखपाल किसानों के मुआवजों के लिए सुविधा शुल्क लेने के बाद सर्वे रिपोर्ट लगा रहे है। होली से पहले और होली के बाद तक किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला थमा नहीं। 9 मार्च को जिला जालौन के उरई- आटा थाना के गाँव बम्हौरी निवासी गोटीराम और चमारी गाँव के उमेशपाल ने मौत को गले लगाया। 


22 मार्च को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी किसानों से मन की बात कर रहे थे और बुंदेलखंड का किसान सियासी प्रवचन से ऊबकर आत्महत्या और आत्मदाह कर रहा था। बानगी के लिए बांदा के पैलानी तहसील के ग्राम नान्दादेव के किसान सिद्ध पाल एवं रामप्रसाद पाल ( सगे भाई ) ने अतिवृष्टि एवं ओलावृष्टि से नष्ट हुई फसल का मुआवजा ना मिलने के चलते मानसिक अवसाद में खुद को बीच चैराहे में आग के हवाले किया था। दोनों का इलाज तिंदवारी विधायक दलजीत सिंह की तरफ से 10 हजार रुपए मदद करने के बाद हो रहा है। हैरत की बात है कि पीड़ित किसान को देखने सरकारी अधिकारी नहीं पहुंचे। इसी क्रम में 22 मार्च को ही बबेरू के बिसंडा क्षेत्र से सिकलोढ़ी गांव में युवा किसान रामनरेश द्विवेदी ने भाई की लाइसेंसी रायफल से खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। अफसर और नेताओं की धमाचैकड़ी ने गांव के संनाटे को तोड़ा आत्महत्या से चंद घंटे पहले मृतक किसान को 31 हजार 285 रुपए के बकाए का बिल मिला था। रविवार को दोपहर खेत से मसूर की चैपट फसल देखकर इस किसान ने खुदकुशी कर ली। इस पर 88 हजार रुपए का कर्ज इलाहाबाद यूपी ग्रामीण बैंक पुनाहुर शाखा का बकाया है। इसी तरह 20 मार्च को अतर्रा के महुआ ब्लाक के अनथुआ गांव के 60 वर्षीय किसान रामऔतार कुशवाहा की तबाह फसल के सदमे में दिल का दौरा पड़ने के बाद जिला अस्पताल बांदा में मौत हो गई। यहां यह भी बताते चलें कि देश के प्रधानमंत्री ने उन किसानों को 5 हजार रुपए पेंशन देने की घोषणा शहीद दिवस पर की है जो 60 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन प्रधानमंत्री जी बुंदेलखंड के अधिक्तर किसान तो 60 वर्ष से पहले ही आत्महत्या कर रहे है। प्रवासनामा संवाददाता जब मृतक किसान राम औतार कुशवाहा के घर पहुंचा तो शोक में डूबा परिवार किसान की आत्मा की शांति के लिए गरुण पुराण सुन रहा था। इस किसान की 2 सयानी बेटियां रजनी और विमला ब्याह के लिए बैठी हैं जिनका आसरा उनकी मां सतबंती और भाई की आस पर टिका है।

आशीष सागर 
संपादक - प्रवासनामा मासिक पत्रिका 
बांदा-बुंदेलखंड 
ashish.sagar@bundelkhand.in

गौरैया का ब्याह




प्रकृति के प्रहरियो ने रचाया  गौरैया का ब्याह

छिउल की सूखी लकड़ी से बना मंडप, 

आम के पत्तो और केले के पत्तो हुआ सगुन 
 कुस की घास से बनी मंडप की मुंडेर (छत )

ची- ची के ब्याह में जमकर नाचे ग्यारह घोड़े और गंवई बाराती l 
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                               बुंदेलखंड में हुआ ची - ची का ब्याह 

बाँदा / बुंदेलखंड - 

हर बरस बीस मार्च को मनाया जाने वाला विश्व गौरैया दिवस एस बार भी देश भर में अपने - अपने अंदाज से आयोजित हुआ l इस भीड़ से इतर बुंदेलखंड के जिला बाँदा के नरैनी तहशील का ग्राम मोहनपुर ( दोआबा क्षेत्र - रंज और बागे नदी का कछार ) इस मायने में अलहदा रहा l  
 गौरैया दिवस दिल्ली के  राज्य पक्षी गौरैया ( रेड लिस्ट में शामिल  / विलुप्त प्रजाति ) का विवाह हिन्दू विधि - विधान से  किया गया । आस पास के गाँवो के 600 ग्रामीण अपने उत्साह के साथ इस प्रकृति सम्यक परिंदे के ब्याह के गवाह बने । 
जहाँ ब्याह की तैयारी एक सप्ताह पहले से चल रही थी। गौरतलब है कि इस विलुप्त होती गौरैया चिड़िया के विवाह को ग्राम मोहनपुर निवासी अध्यापक यशवंत पटेल और उनकी पत्नी सुमनलता पटेल (कन्या पक्ष ) , वर पक्ष से अध्यापक ग्राम रानीपुर निवासी राम प्रकाश पटेल पत्नी अनीता रहे। पूरे विधि विधान से पहले वर पक्ष के लोगो ने प्राथमिक स्कूल मोहनपुर से नर गौरैया की निकासी की ,उसका स्वागत सत्कार किया गया । बारात की अगवानी में आये ग्यारह घोड़ो ने जमकर थिरका और गौरैया मादा चिड़िया के घर तक बारात के साथ उपस्थित रहे । बारात पहुँचने के बाद कन्या पक्ष के लोगो ने बाराती का अभिनन्दन किया इसके बाद गैल्मर से बचते हुए मादा गौरैया चिड़िया और नर चिड़िया का विवाह किया फेरो,लावा और विदाई के साथ संपन्न हुआ । विवाह के बाद बरातियो को प्रकृति के ही फल मसलन चने का हरा बिरवा, बेर और चूल्हे की आग में बना भोजन करवाया गया l गाँव वालो ने कहाँ जो लोग इसको हमारा पागलपन समझ रहे है उन्हें ये भी जानकारी होनी चाहिए कि ये गाँव वालो के विरोध करने का अपना सलीका है l आज एक घरेलु चिड़िया का भी हमें दिवस मनाने को बाध्य होना पड़ रहा है l मनुष्य रिश्ते नही निभा पाया लेकिन ये परिंदे बिना रिश्तो के प्रकृति के साथ - साथ मनुष्य के पर्यावरण को सुन्दर बना रहे है l आदमी आज इनको भी अवशेष बनाने में माहिर हो गया है l ब्याह के बाद आसमानी परिंदों को उड़ा दिया गया l 




वन रेंजर जे.के. जयसवाल ने अपने संबोधन में वन्य जीवो के साथ रेड लिस्ट में शामिल गौरैया को बचाने की पहल की सराहना की । स्थानीय क्षेत्रीय वन अधिकारी जे.के. जयसवाल, नफीस खान, इलाहाबाद से एप्सा हर्बल उत्पाद के कंसल्टेंट मंजीत,बिहार राज्य के बक्सर से आये लेखचन्द्र त्रिपाठी, राघवेन्द्र मिश्रा,बुंदेलखंड.इन न्यूज पोर्टल के फाउनडर राहुल गुप्ता ( दिल्ली ),दीनेश पाल सिंह,जगदीश निषाद सहित,वन्य जीव कार्यकर्ता महिर्षि कुमार तिवारी मुख्य मेहमानों में शामिल रहे। 

वही इलाहाबाद से आये मंजीत ने किसानो को खेतो में अत्यंत पेस्टीसाइड (कीटनाशक ) उपयोग के चलते होने वाले नुकसान और उसक असर इस गौरैया चिड़िया पर कैसे पड़ता है इसका डेमो , प्रदर्शन हाइब्रिड टमाटर,बैगन और नीबू के फलो पर करके दिखलाया । प्रवास सोसाइटी / हरियाली चौपाल से जुड़े आशीष सागर ने उपस्थित लोगो के छोटे छोटे जीव की सामाजिक हिस्सेदारी की भूमिका बतलाते हुए एक एजेंडा प्रस्ताव किसान भाइयो से हस्ताक्षर युक्त लिया जिसको देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भेजा जा रहा है कि जल-जंगल और जमीन से वीरान होता ये बुंदेलखंड क्यों आज किसान आत्महत्या की कोख बन गया है । गौरैया के विवाह से पहले हुई संगोष्टी में वक्ताओ ने बुंदेलखंड में प्राकृतिक संसाधनों के खनन का मुद्दा उठाया और कहा कि किसान आत्महत्या वही हुई जहाँ नदी,पहाड़ो,जंगलो का विनाश किया गया । कंक्रीट का विकास किसान की तबाही का कारण है जिसका खामयाजा हाल ही में उसने बे- मौसम बरसात और ओलो के रूप में भुगता है।



मोहनपुर,रानीपुर,बिलहरका,पिपरहरी गाँवो के किसानो में रविन्द्र मिश्र,सुभास पाण्डेय,रामदेव पटेल,बड़े भैया राजपूत,प्रमोद कुमार पटेल,जगप्रसाद पाल,बुआरानी,कल्लू महाराज,शोभा लाल,कामता प्रसाद श्रीवास गाँव की युवा लड़के - लड़कियां ,किसान शामिल रहे ।

आशीष सागर 
बांदा - बुंदेलखंड 
संपादक-प्रवासनामा मासिक पत्रिका 



Mar 1, 2015

उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी सारस की रहस्यमयी मौतें


मैलानी के निकट एक गाँव में एक दर्जन से अधिक सारस मृत पाये गए 

अन्य स्थानीय व् प्रवासी पक्षियों की भी हुई मौत 

अप्रमाणित व् नकली जहरीले  कीट-नाशक  हो सकते है  मौत की वजह 


मैलानी से मनोज शर्मा की रिपोर्ट 

मैलानी-खीरी: मैलानी से कुछ दूर स्थित नारायणपुर गाँव के तालाब में जहर से १७ सारस और सैकड़ो परिंदों की मौत २७ जनवरी २०१५ को हो गयी, जाहिर है सारस उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी है,  और वर्तमान में इसकी तादाद कृषि के बदलते स्वरूप, पेस्टीसाइड के अंधाधुंध इस्तेमाल, और शिकार के चलते काफी घटी है,  गौरतलब है की एक माह पूर्व घटी यह घटना जिसमे देशी विदेशी पक्षियों की मौत इतनी तादाद में हो गयी और वन विभाग व् ग्रामीण चुप रहे, इन मृत पक्षियों के मृत शरीरों को चुपचाप ठिकाने लगाने के भी प्रयास किए गए, 


सूत्रों द्वारा प्राप्त जानकारी है की इन पक्षियों के मृत शरीर एक जगह गढ्ढे में दबाये गए, जो व्यक्ति तस्वीर में दिख रहा है, उसे वन विभाग का वॉचर बताया जा रहा है, एक तरफ भारत सरकार, और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान पक्षियों को बचाने और उनके आवासों को सुरक्षित रखने में करोड़ों रुपये खर्च कर रहे है, तो दूसरी तरफ ऐसी घटनाएं घट रही है, और इन्हे छुपाने की कोशिश की जा रही है.

उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी की इतनी संख्या में मौत के कारणों की जांच सुनिश्चित होना जरूरी है, ताकि यह पता लगाया जा सके की किस प्रकार के जहर से उनकी मौत हुई, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए की जनपद में पेस्टीसाइड की दुकानों पर कौन से ऐसे जहर है जो इस विशाल पक्षी की भी मौत का कारण बन सकते है, नकली व् अप्रमाणित कीटनाशकों का जनपद में जो धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है वह कीट पतंगों पशु पक्षियों के अलावा मानव के लिए भी बहुत हानिकारक हो सकता है.



ग्रामीण भी इतनी संख्या में मृत परिंदों के कारण सहमे हुए है और जिम्मेदार विभाग ने अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है.

सारस राज्य पक्षी होने के अतिरिक्त रेड डाटा बुक में वल्नरेबल श्रेणी में रखा गया है, भारतीय पक्षी वैज्ञानिक और सरकार इसके सरंक्षण पर जोर देते आ रहे है.



मनोज शर्मा (पत्रकार) 
मैलानी-खीरी 
9839393921                                                                                                                                        

Feb 28, 2015

भाषागिरी ने ईज़ाद किया शुद्ध हिन्दी लिखने का आसान तरीका


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हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा और भारत की मातृभाषा होते हुए भी कंप्यूटर तकनीकी Computer Technology) में अपना स्थान बनाने के लिये संघर्षरत है, बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां भी अब हिन्दी के लिये सुविधाएं प्रदान कर रही है । जिससे सामान्य जन के लिये कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करना आसान हुआ है । मगर हिन्दी लिखते समय होने वाली वर्तनी (स्पेलिंग) अशुद्धियां अभी भी एक बड़ी समस्या है । इसका आसान और सुलभ तकनीकी समाधान ना होने के कारण अशुद्ध हिन्दी काफी प्रचलन में आ गयी हैं । कई गलत शब्द इतने प्रयोग में आ गये हैं कि युवा पीढ़ी उन्हें ही सही समझने लगी हैं ।

पूरा लेख मेन्युअली पढ़कर वर्तनी अशुद्धियां सुधारने में काफी समय बर्बाद होता है। इन्हीं सब समस्याओं का सामना करना पड़ा बेंगलोर में रहने वाले अर्पित और श्वेता पालीवाल को जब वो एक आध्यात्मिक हिन्दी मासिक पत्रिका के डिजिटिलाइजेशन प्रोजेक्ट में अपना समयदान कर रहे थे । यहीं से शुरूआत हुई भाषागिरी की । हिन्दी भाषा पर काफी शोध करने के बाद एक विशेष तकनीक ईजाद की और Spell Guru सॉफ्टवेयर बनाया । इस नयी तकनीक के लिये उन्होंने पेटेंट भी फाइल किया है । इस सॉफ्टवेयर में आप आसानी से हिन्दी लिख सकते है । गलत शब्द लिखते ही यह आपको सूचित कर देगा और शब्द की वर्तनी सुधारने के लिए सुझाव भी देगा । यह भारत सरकार द्वारा निर्धारित हिन्दी मानकीकरण पर आधारित है । Spell Guru इस प्रकार का पहला सॉफ्टवेयर है जो मंगल, कृतिदेव और चाणक्य फाॅण्ट में काम करता है । भाषागिरी शीघ्र ही नया सॉफ्टवेयर भी उपलब्ध कराने वाली है जो कि सीधे MS Word में काम करेगा ।

श्वेता 
भाषागिरी 
support@bhashagiri.com

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वन्य जीवन व् पर्यावरण  पर आधारित दुनिया की पहली दुधवा लाइव  डिजिटल मैगज़ीन  की ज़ानिब से  हिन्दी  लिखने के लिए किये गए इस  सुन्दर कार्य  के लिए भाषागिरी  के आविष्कारकों  को शुभकामनाएं। . 

दुधवा लाइव डेस्क 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: