International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jan 6, 2018

एक मेला, अलबेले परिंदों के नाम

फोटो साभार- विकीपीडिया

लेखक: अरुण तिवारी


पक्षी बन उड़ती फिरूं मैं मस्त गगन में, 
आज मैं आज़ाद हूं दुनिया के चमन में.....

आसमान में उड़ते परिंदों को देखकर हसरत जयपुरी ने फिल्म चोरी-चोरी के लिए यह गीत लिखा। लता मंगेश्कर की आवाज़, शंकर जयकिशन के संगीत तथा अनंत ठाकुर के निर्देशन ने इस गीत को लोगों के दिल में बैठा दिया। परिंदों को देखकर ऐसी अनेक कवि कल्पनायें हैं; ''पिय सों कह्ये संदेसड़ा, हे भौंरा, हे काग्..'' - मलिक मोहम्म्द जायसी द्वारा पद्मावत की नायिका नागमती से कहे इन शब्दों से लेकर हसरत जयपुरी के एक और गीत ''पंख होते तो उड़ आती रे, रसिया ओ जालिमा..'' (फिल्म सेहरा) तक। परिंदों को देखकर आसमान में उड़ने के ख्याल ने ही कभी अमेरिका के राइट बंधुओं से पहले हवाई जहाज का निर्माण कराया।

अनेक दिवस, पक्षियों के नाम 

यह भूलने की बात नहीं कि अमेरिका के पेनसेल्वानिया स्कूल के सुपरिटेंडेंट अल्मनज़ो बेबकाॅक ने चार मई को स्कूल की छुट्टी सिर्फ इसलिए घोषित की, ताकि उनके स्कूल के बच्चे, परिदों के साथ उत्सव मनाते हुए उन्हे संरक्षित करने हेतु प्रेरित हो सकें। अमेरिका में पक्षी उत्सव के नाम पर दिया गया यह अपने तरह की पहला अवकाश था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 13 अप्रैल को 'अंतर्राष्ट्रीय पक्षी दिवस' घोषित किया और मई के दूसरे सप्ताह के अंतिम दिन को 'विश्व प्रवासी पक्षी दिवस'। अमेरिका ने 05 जनवरी को अपना 'राष्ट्रीय पक्षी दिवस' घोषित किया और भारत ने 12 नवंबर को। दुनिया के अलग-अलग देशों ने अलग-अलग तारीखों को अपने-अपने देश का 'अंतराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी दिवस' बनाया है। 

एक शख्स, जो था पक्षी मानव

कहना न होगा कि पक्षियों से प्रेरित ऐसे ख्याल मन में लाने वाले अरबों होंगे, परिंदों को दाना-पानी देने वालों की संख्या भी करोड़ों में तो होगी ही। परिदों के डाॅक्टर लाखों में होंगे, तो परिंदों पर अध्ययन करने वाले हज़ारों में। किंतु परिंदों को दीवानगी की हद तक चाहने वाले लोग, दुनिया में कुछ चुनिंदा ही होंगे। ऐसे लोगों में से एक थे, भारत के विरले पक्षी विशेषज्ञ जनाब श्री सालिम अली। 

1896 में जन्मे श्री सालिम अली ने अपना जीवन, भारतीय मानस में पक्षियों की महत्ता स्थापित करने में लगाया। उनकी लिखी अनेक पुस्तकों में  'बर्ड्स आॅफ इंडिया' ने सबसे अधिक लोकप्रियता पाई। बुद्धिजीवियों ने सालिम अली को ’पक्षी मानव’ के संबोधन से नवाजा। भारत सरकार ने श्री सालिम अली को पद्मभूषण (1958) और पद्मविभूषण (1976) से नवाजा। श्री सालिम अली की स्मृति में डाक टिकट जारी किया। श्री सालिम अली को सबसे अनोखा सम्मान तो तब हासिल हुआ, जब भारत सरकार ने सालिम अली की जन्म तिथि ( 12 नवम्बर ) को ही भारत का 'राष्ट्रीय पक्षी दिवस' घोषित कर दिया। 

संगत ने सुबोध को बनाया पक्षी प्रेमी 

इन्ही सालिम अली की संगत के एक मौके ने अलीगढ़ के रहने वाले सुबोधनंदन शर्मा की ज़िंदगी का रास्ता बदल दिया। श्री सुबोधनंदन शर्मा, आज आज़ाद परिंदों को देख खुश होते हैं; कैद परिंदों को देख उन्हे आज़ाद कराने की जुगत में लग जाते हैं। बीमार परिंदा, जब तक अच्छा न हो जाये; सुबोध जी को चैन नहीं आता। परिंदों को पीने के लिए साफ पानी मिले। परिदों को खाने के लिए बिना उर्वरक और कीटनाशक वाले अनाज मिले। परिंदों को रहने के लिए सुरक्षित दरख्त... सुरक्षित घोसला मिले। सुबोध जी और उनकी पेंशन, हमेशा इसी की चिंता में रहते हैं। 

सुबोध जी, 'हमारी धरती' पत्रिका के संपादक हैं। 'हमारी धरती', पहले एक साहित्यिक पत्रिका थी। परिदों और उनकी ज़रूरत के विषयों ने 'हमारी धरती' को पूरी तरह पानी, पर्यावरण और परिंदों की पत्रिका में तब्दील कर दिए। 'हमारी धरती' के कई अंक, परिंदों पर विशेष जानकारियों से भरे पड़े हैं। 

शेखा झील बनी, पक्षियों का भयरहित आवास

उत्तर प्रदेश स्थित ज़िला अलीगढ़ की 200 साल से अधिक पुरानी शेखा झील, विदेश से आने वाले 166 प्रवासी मेहमान परिंदों की पसंद का ख़ास आवास है। 25 हेक्टेयर के रकबे वाली शेखा झील, अलीगढ़ के पूर्व में जीटी रोड से पांच किलोमीटर दूर गंगनहर के नजदीक स्थित है। 2013 में जब शेखा झील पर जब संकट आया, तो सबसे पुरजोर आवाज़ श्री सुबोधनंदन शर्मा ने ही उठाई। शेखा झील को पक्षी अभयारण्य घोषित  करने की मांग उठाई। शेखा झील और परिंदों के गहरे रिश्ते पर एक संग्रहणीय किताब लिखी। परिणामस्वरूप शेखा झील को बचाने की शासकीय पहल शुरु हुई। शासन ने शेखा झील को वापस पानीदार बनाने के लिए दो करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया। शेखा झील को पक्षी अभ्यारण्य के रूप में विकसित करने हेतु एक करोड़ रुपये अतिरिक्त घोषित किए। श्री सुबोधनंदन ने झील को उसका स्वरूप दिलाने के काम की खुद निगरानी की। समाज को झील के परिंदों से जोड़ा। विशेषकर अलीगढ़ के स्कूली बच्चों में परिंदों के प्रति स्नेह का संस्कार विकसित करने की मुहिम चलाई। इसके लिए हरीतिमा पर्यावरण सुरक्षा समिति बनाई। 

शेखा पर लगेगा बच्चों संग पक्षी मेला

इसी हरीतिमा पर्यावरण सुरक्षा समिति ने आगामी 09 जनवरी, 2018 को शेखा झील पर परिंदों का मेला लगाना तय किया है। सुनिश्चित किया है कि 09 जनवरी को लगने वाले इस पक्षी मेले में अलीगढ़ के कम से कम 400 बच्चे शामिल हों। उन्हे कोई तकलीफ न हो, इसके लिए उनके नाश्ते की व्यवस्था की है। 

गौरतलब है कि यूनाइटेड किंग्डम की 'राॅयल सोसाइटी फाॅर द प्रोटेक्शन आॅफ बर्ड्स' ने परिंदों की गिनती करने के लिए एक दिन तय किया है। 09 जनवरी के शेखा झील के पक्षी मेले में भी परिंदों की गिनती का काम होगा। यह काम, अलीगढ़ के बच्चे करेंगे। गिनती के बहाने परिंदों से जान-पहचान भी कराई जायेगी। परिंदों की पहचान करने में सहयोग के लिए, समिति ने चार ऐसे लोगों का चुना है, जो परिंदों पर पीएच.डी कर रहे हैं। अच्छा मेला होगा। पक्षियों के साथ-साथ बच्चे भी चहकेंगे। बनाने वाले, परिंदों के चित्र बनायेंगे। कोई कैमरे से फोटो खींचेगा। कोई परिंदों के करीब जाना चाहेगा। किंतु इस सभी से परिंदे असुरक्षित महसूस न करें; इसका ख्याल खुद श्री सुबोधनंदन और उनकी समिति रखेगी। 

यह जानकारी लिखते वक्त 05 जनवरी की सुबह-सुबह खबर मिली कि बहराइच की महसी झील पहुंचे चार प्रवासी पक्षियों ने दम तोड़ दिया। काश ! महसी झील को भी मिले कोई पक्षी प्रेमी सुबोधनंदन सा; ताकि सुरक्षित रहे झील और सुरक्षित रहें मेहमान परिंदे। 



अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली - 110092
9868793799

Jan 4, 2018

A Tribute to The Tigerman Billy Arjan Singh


बिली अर्जन सिंह की आठवीं पुण्यतिथि पर उनके निवास जसवीर नगर, पलिया जनपद खीरी में आयोजित बाघ सरंक्षण कार्यशाला में फिल्म स्टार रणदीप हुड्डा, वन्यजीव प्रेमी शमिंदर बोपाराय तथा वन्यजीव विशेषज्ञ कृष्ण कुमार मिश्र ने सैकड़ों वन्यजीव प्रेमियों के साथ बाघ सरंक्षक बिली को भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनके कार्यों  मांगे बढ़ाया जाए ऐसे संकल्प के साथ कार्यक्रम का आगाज़ हुआ.

दुधवा लाइव डेस्क 




वैदिक संस्कृति सभ्यता द्वारा पर्यावरण प्रदूषण का समाधान


यूनान, मिश्र, रोम सब मिट गए जहाँ से।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।

उपरोक्त पंक्तियाँ भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की गौरव गाथा का बखान करती हैं। संस्कृति के मामले में हम दुनिया के सिरमौर रहे हैं। इसका मूल वैदिक साहित्य में प्राप्त होता है। वातावरणीये पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से प्रभावित होकर आज सारा विश्व प्रदूषण को दूर करने तथा पर्यावरण स्वच्छता के वैज्ञानिक उपाय खोज रहे हैं। इस समस्या की ओर जन-जन का ध्यान आकृर्षित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र संघ तथा उससे जुड़ी संस्थाओं द्वारा प्रत्येक वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण की गोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं जिनमें विश्व के पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति और प्राणियों के अस्तित्व पर बड़ा खतरा बन चुकी है। इस समस्या पर चिन्ता व्यक्त की जाती है तथा इसके समाधान की दिशा में प्रतिभागी राष्ट्रों के प्रतिनिधियों द्वारा अपने सुझाव दिये जाते हैं और रणनीति तय की जाती है। वैज्ञानिक ने पर्यावरण की शुद्धि के लिए प्रकृति को मानव की सर्वाधिक सहयोगिनी मानते हुए विशेष रूप से वन एवं वृक्षों के महत्व को स्वीकार किया है। विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद में मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व उपर्युक्त तथ्य का दर्शन कर लिया था। वैदिक संहिताओं में पर्यावरण की शुद्धि के लिए वन, वृक्ष एवं वनस्पतियों को उपयोगी मानते हुए उनके महत्व का निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त वेदी में यज्ञ को पर्यावरण शुद्धि के लिए सर्वाधिक प्रभावशाली व सर्वोत्तम साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। इसलिए वैदिक संस्कृति में प्रत्येक शुभ अवसर पर यज्ञ को अनिवार्य दैनिक कर्तव्य माना गया है। आज के इस प्राकृतिक प्रदूषण युग में वातावरण को प्रतिक्षण परिशुद्ध और पवित्र करने एवं उसे जीवनदायक बनाने तथा सुखद वर्षा के अनुकूल करने के लिए यज्ञ के द्वारा आकाशीय वातावरण शुद्धकर आकाश वर्षा द्वारा पृथ्वी को तृप्त करता है। यज्ञ से मेद्य से वर्षा होती है।
‘भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति, दिवं जिन्वन्त्यग्नयः’
(ऋग्वेद 1-164-51)

यजुर्वेद में उत्तम कृषि के लिए यज्ञ को आवश्यक बताया गया है। वेदों में जहाँ विश्व के लिए जीवन उपयोगी अन्य वस्तुओं का निर्देश किया गया है। वहीं वृक्ष, वनस्पति, औषधि, लता एवं वनों का भी सम्मानपूर्वक उल्लेख किया गया है। वैदिक ऋषियों ने पर्यावरण की दृष्टि से इनका महत्व समझते हुए इन्हें श्रद्धापूर्वक नमस्कार करते हुए कहा है-
‘नमो वृक्षेभ्यः’
(यजुर्वेद० 16-17)
इतना ही नहीं वृक्ष, वन एवं औषधियों का संरक्षण एवं संवर्धन करने वालों को भी ‘वनानां पतये नमः’ तथा
‘औषधीनां पतये नमः
(यजुर्वेद० 16-18 एवं 19)
कहकर नमस्कार किया गया है।
मन्त्रद्रष्टा ऋषिगण इस तथ्य को भलीभाँति जानते थे कि वृक्ष एवं लताएँ आदि जहाँ अपने फल, फूल एवं लकड़ी आदि द्वारा समृद्धि प्रदान करते हैं वहाँ शुद्ध एवं प्राणदायक वायु द्वारा पर्यावरण को भी माधुर्य गुणयुक्त बनाते हैं। अतः ऋग्वेद में कहा गया है कि वृक्ष प्रदूषण को नष्ट करते है, अतः उन्हें न काटो।
वृक्षों एवं वनस्पतियों के सम्पर्क से वातावरण को प्राणवान एवं मधुमय बना देने वाले वायु को एक मन्त्र में विष्वभेषज कहा गया है और प्रार्थना की गई है कि वह दूषित वायु को दूर करें तथा शुद्ध वायु ‘भेषजवात्’ को प्रवाहित करें-
‘अग्निः कृणोतु भेषजम्’
(अथर्व० 8-106-3)
वेद में वर्णित इस जीवनदायक भेषजवात् के मूलस्त्रोत वन एवं वृक्ष है जिनके महत्व का वेदमन्त्रों में विवरण प्राप्त होता है। पर्यावरण की दृष्टि से वृक्षों के महत्व की यह वैदिक मान्यता जैसे बाद के लौकिक संस्कृत साहित्य में भी दृष्टिगत होती है।
‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ में वनस्पतियों के प्रति जिस स्नेहिल भावना की अभिव्यक्ति हुई है वह उस समय के पर्यावरण चेतना का सर्वोष्कृष्ट स्वरूप प्रस्तुत करता है। वृक्षों को पुत्र रूप से प्रतिष्ठा तथा इससे भी बढ़कर उनके प्रति कृतज्ञता एवं श्रद्धा का भाव प्रायः प्रत्येक पुराण में मिलता है। सर्वप्रथम महाभारत में वृक्षों को धर्मपुत्र मानकर इनके संरक्षण एवं संवर्धन को अत्यन्त श्रेयस्कर बताया गया है। महाभारत के मोक्ष धर्म पर्व में तो वृक्षों को सजीव प्राणी के रूप में वर्णित किया गया है।
वेद में पर्वतों का बहुत महत्वपूर्ण वर्णन किया गया है। पर्वत खनिज के बहुमूल्य स्त्रोत है। पर्वत वनादि के द्वारा वातावरण के स्त्रोत भी हैं। पर्वत पृथ्वी का सन्तुलन बनाए हुए हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि पर्वत शुद्ध वायु देकर मृत्यु से रक्षा करते हैं। अतएव पर्वतों में रक्षा की प्रार्थना की गई हैं।
वैदिक मान्यतानुसार पर्यावरण की शुद्धि का सर्वाेत्तम साधन यज्ञ है इसलिए यज्ञ को वैदिक संस्कृति का अभिन्न अंग माना गया है यदि यज्ञ का गूढ़-दार्शनिक अर्थ लें तो यह सृष्टि एवं मानव-जीवन ही यज्ञ है और परमात्मा इस सृष्टियाग का सर्वप्रथम होता है। अन्य वेदमन्त्रों एवं विशेष रूप से ‘पुरूषसूक्त’ में यज्ञ से ही सृष्टि की उत्पत्ति प्रतिपादित है। इसी वैदिक भावना की अनुपालना करते हुए भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि पहले प्रजापति ने यज्ञ से ही सृष्टि परम्परा को बढ़ाया, पर ही आपकी कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो- भौतिक दृष्टि से यज्ञ वह अग्निहोत्र है जिसके अन्तर्गत घी एवं सामग्री की आहुतियां पवित्र वेदमन्त्रों का उच्चारण करके अग्नि में दी जाती है और अग्नि अपने में डाले गए उक्त द्रव्यों को अत्याधिक शक्तिशाली बनाकर वायु-जल-पृथ्वी एवं अन्तरिक्ष में पहुँचा देता है जिससे वातावरण शुद्ध, पवित्र, सुगन्धित, प्राणदायक एवं स्वास्थ्य प्रद हो जाता है। अतः वैदिक सिद्धान्तानुसार अग्निहोत्र ही पर्यावरण की समस्या का सर्वाेत्तम एवं सरलतम समाधान है। अग्निहोत्र का आधारस्तम्भ अग्नि है। यही अग्नि सूर्य के रूप में प्रकाश एवं उष्णता प्रदान करता है और अपनी तीक्ष्ण किरणों से समस्त दूषित पदार्थों व मल-मूत्रादि को सूखाकर पर्यावरण को स्वच्छ, रोगाणुरहित, स्वास्थ्यप्रद एवं जीवन को उपयोगी बनाता है।

इस वेदमन्त्र में
‘इंद हविर्यातुधानान् नदी फैनामिवावहत्’
(अथर्व० 7-8-2)
कहकर रोगाणुओं को नष्ट करने के विषय में कहा गया है। पर्यावरण के प्रदूषण का कारण यह है कि आज प्रत्येक व्यक्ति किसी ने किसी प्रकार से पर्यावरण को दूषित करता है। किन्तु पर्यावरण की शुद्धि एवं संरक्षण का उपाय की ओर किसी का ध्यान नहीं है। वाहनों से निकलने वाला धुंआ एवं कारखानों से निकलने वाला धुंआ तथा अपशिस्ट पदार्थ पर्यावरण को दूषित करते हैं। अतः यदि विश्व को आज प्रदूषण के भंयकर विनाश से बचाना है तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य व्यवस्था करनी होगी कि हम प्रतिदिन जितना प्रदूषण फेलाते हैं उतना ही उसे दूर करने के लिए भी यत्किंचित् प्रयास अवश्य करें। वैदिक ऋषियों की दृष्टि जब हजारों साल पूर्व इस ओर गई थी और उन्होंने पर्यावरण की समस्या के समाधान के लिए प्रतिदिन प्रत्येक गृहस्थ के लिए यज्ञ को दैनिक कृत्य के रूप में अपनाने का विधान किया था। दैनिक यज्ञ के अतिरिक्त वेद में दर्षपौर्णमास एवं ऋतुओं के अनुसार किए जाने वाले यज्ञों का भी विधान है जिससे कि ऋतु परिवर्तनों के अवसर पर होने वाले प्रदूषण एवं रोगों के फैलाव को दूर किया जा सके-

ऋतवस्ते यज्ञं वितन्वन्तु।
वयं देवा नों यज्ञमृतुथा नयन्तु।।

वैदिक मन्त्रों से ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक ऋषियों ने पर्यावरण की समस्या के समाधान हेतु गम्भीर चिन्तन किया था और मानव एवं विश्व के कल्याण के लिए पर्यावरण को जीवनोपयोगी बनाने के साधनाभूत यज्ञों का एक वैज्ञानिक विधि के रूप में आविष्कार किया था। यज्ञ की इसी महत्ता के कारण मन्त्र में उसे ‘अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः’ कहकर विश्व के केन्द्र के रूप में महिमा मण्डित किया गया है। आज यद्यपि पर्यावरण की स्वच्छता के वैज्ञानिक उपाय भी किए जा रहे हैं, किन्तु एक तो वे उपाय अत्यन्त व्यय साध्य है और दूसरे वे सर्वजन सुलभ भी नहीं है। अतः पर्यावरण की समस्या के समाधान के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम, सरलतम एवं सर्वजन-सुलभ-साधन है। इसके अतिरिक्त याजक वेदमन्त्रों में यज्ञ करते समय अन्तरात्मा से विश्व के कल्याण एचं विश्व शान्ति की जो कामना करता है। वेदमन्त्रों का स्वर सहित मधुर गायन ध्वनि प्रदूषण को दूर करके वातावरण को सौम्य, शान्त एवं आहलादक बनाता है।

पर्यावरण की शुद्धि के लिए अग्नि में गोघृत, पीपल, गूगल आदि औषधियों की आहुति का विधान वेदमन्त्रों में मिलता है। यदि हम वैदिक साहित्य में वार्णित वन सम्पदा एवं यज्ञ आदि के अनुरूप अपनी दैनिक वैदिक संहिताओं में पर्यावरण की शुद्धि के वन वृक्ष एवं वनस्पतियों तथा यज्ञ को पर्यावरण के लिए सर्वाधिक प्रभावशाली व सर्वोत्तम साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। यदि हम वैदिक साहित्य में वर्णित वन सम्पदा एवं यज्ञ आदि के अनुरूप अपनी दैनिक क्रियाओं का सम्पादन करें तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव विश्व में सर्वत्र व्याप्त होगा।
उपसंहार- आज आधुनिकता के युग में मानव का सामाजिक एवं चारित्रिक ह्रास हो रहा है जो गम्भीर चिन्ता का विषय है। आज के पर्यावरणवेत्ता केवल भौतिक दृष्टि से जल एवं वायु, ध्वनि, भूमि के प्रदूषण को दूर करने के उपाय खोजने तक की सीमित रह गए हैं जबकि इनके अतिरिक्त आज विश्व में बढ़ता हुआ वाचिक, मानसिक एवं चारित्रिक प्रदूषण और भी अधिक मानसिक अशान्ति का कारण बना हुआ है जिसके रहते हम एक अनन्त परिवेश की कल्पना नहीं कर सकते। वैदिक मन्त्र-द्रष्टाओं का ध्यान इस भयावह समस्या के इस बिन्दु पर भी गया था और उन्होंने-

‘‘वाचं वदत भद्रया वाचं ते शुन्धामि चरित्रांस्ते शुन्धामि तन्गे मनः शिव संकल्पमस्तु’’ इत्यादि
वेदमंत्रों में व्यक्ति के मानसिक, वाणी एवं चारित्रिक शुद्धि के लिए भी दिव्य प्रेरणा प्रदान की थी। इस प्रकार सार्वभौम मानव संस्कृति के आदि स्त्रोत वेदों में भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से पर्यावरण की शुद्धि के ऐसे साधनों का विधान किया गया है जिन्हें अपनाकर संसार में एक सुखी एवं आनन्दमय वातावरण बनाया जा सकता है। हम प्राचीन ऋषियों के मार्ग का अनुसरण करके ही इस स्नेहिल भावना को पुष्ट कर सकते हैं। तभी यह उद्घोषणा सार्थक सिद्ध होगी-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाण्यवेत्।।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-
1. ऋग्वेद संहिता, सातवंलकर, स्वाध्याय मण्डल, पारडी।

2. अथर्ववेद संहिता, सातवलेकर, स्वाध्याय मण्डल, पारडी।

3. श्रीमद् भगवद् गीता, गीता प्रेस, गोरखपुर।

4. चरक संहिता।

5. ऋग्वेदीय भाष्य भूमिका।

6. यजुर्वेद संहिता, सातवलेकर, स्वाध्याय मण्डल, औध, पारडी संवत् 1985

7. मनु स्मृति।

8. वैदिक साहित्य और संस्कृति।


अंजूलिका                                         
एम० ए० उत्तरार्द्ध (हिन्दी)                                                   
एस० एम० काॅलेज चन्दौसी                                 
                                                 
डाॅ. कादम्बरी मिश्रा
सहायक प्रवक्ता
संस्कृत विभाग
एस० एम० काॅलेज चन्दौसी (सम्भल)

डाॅ. रूपेश कुमार मिश्रा
 प्राचार्य
कुँवर कंचन सिंह महाविद्यालय,नरौली

Corresponding Author- 
Dr.ROOPESH KUMAR MISHRA
PRINCIPAL
KUNWAR KANCHAN SINGH MAHAVIDYALAYA
NARAULI, SAMBHAL
email- roopeshnbfgr@gmail.com


दुधवा लाइव डेस्क 

Jan 3, 2018

सिने अभिनेता रणदीप हुड्डा ने पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह को दी पुष्पांजलि

बाघ सरंक्षण पर कार्यशाला का हुआ आयोजन
बिली अर्जन सिंह की आठवीं पुण्यतिथि पर जसवीर नगर पलिया में दुधवा लाइव डॉट कॉम व द लास्ट कॉल संस्था ने बाघ सरंक्षण पर एक वर्कशाप का आयोजन किया, इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि चर्चित फिल्मस्टार रणदीप हुडा थे, हुड्डा ने दुधवा के बाघों को बचाने की मुहिम में अपनी भागीदारी की बात कही, और कहा कि तराई के जंगल खासतौर से दुधवा टाइगर रिजर्व धरती पर स्वर्ग की तरह है, उन्होंने बिली अर्जन सिंह जैसी महान शख्सियत को बच्चों के पाठ्यक्रम में सम्मलित करने की भी बात कही ताकि घर घर बिली हो जो कुछ नया और धरती के पर्यावरण के लिए बेहतर कर सके।

कार्यशाला का संचालन वन्यजीव विशेषज्ञ के के मिश्र ने किया, मिश्र ने बिली से जुड़ी अपनी यादों को साझा किया और कहा कि अर्जन सिंह कहते थे बाघ बचेंगे तो जंगल बचेंगे, जंगल बचेंगे तो बरखा आएगी और सभी को आबोहवा मिलेगी,  आदमी को अपने अस्तित्व को बचाना है तो उसे बाघ और जंगल बचाने होंगे, के के मिश्र बताया कि कैसे श्रीमती इंदिरा गांधी बिली के कार्यों से प्रभावित थी, और दुधवा के जंगलों को बिली के ही प्रयासों के चलते श्रीमती गांधी ने 1977 में दुधवा को नेशनल पार्क का दर्ज़ा दिया, बिली की बाघिन तारा, तेंदुआ प्रिंस व जूलिएट हैरिएट कैसे उनके टाइगर हावेन पार्क में रहते थे किस तरह उन्होंने उन्हें जंगलों में रहने के काबिल बनाया, बिली को पद्म श्री, पद्मभूषण, इंटरनेशनल पालगेटी अवार्ड और उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती से सम्मानित किया।

कार्यक्रम में तराई नेचर कंजर्वेशन सोसाइटी के प्रमुख डॉ वीपी सिंह ने बिली से जुड़े अपने संस्मरणों में बिली की बाघिन तारा के किस्से सुनाए, बाघों के लिए गन्ने के खेत उनके प्राकृतिक पर्यावास है किसानों को बाघों से तालमेल बनाना होगा, एकतरह से बाघ फसलों की सुरक्षा करते हैं।
विशिष्ट अतिथि एमएलसी शशांक यादव ने बिली को श्रद्धांजलि देते हुए कहा दुधवा के जंगलों के सरंक्षण में वह अपनी महती भूमिका निभाएंगे।
पूर्व प्रमुख पलिया गुरप्रीत सिंह जॉर्जी ने बिली को एक महान विजनरी बताया और कहा कि वो 100 साल आगे की सोचते थे, उन्ही की सोच का नतीजा है खीरी के सरंक्षित जंगल जो आज दुधवा टाइगर रिजर्व के तौर पर मौजूद है।
कार्यक्रम में रेंजर बेलरायां अशोक  कश्यप जोकि एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर भी हैं ने पशु पक्षियों के सरंक्षण के लिए बिली के प्रयासों को नमन किया
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शमिंदर बोपाराय जिन्होंने बिली के जसवीर नगर को बिली की यादों से सजाया है आउट तकरीबन 50 एकड़ की जमीन में खेती बंद कर जंगल लगवा दिया है, अब जसवीर नगर एक प्राइवेट वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी के तौर पर विकसित हो गई है, शमिंदर ने बिली की यादों को और उनकी सोच को आगे बढाने की बात कही।
कार्यशाला में जनपद के महत्वपूर्ण लोग मौजूद रहे, डॉ धर्मेंद्र सिंह, वेटनरी डाक्टर सौरभ सिंह, नेहा सिंह, एडवोकेट गौरव गिरी, ब्रजेश मिश्रा, रामौतार मिश्रा, शिक्षक राममिलन मिश्र, हरिशंकर शुक्ल, राहुलनयन मिश्र, अचल मिश्रा  मुगलीं प्रोडक्शन के निदर्शक व तमाम वन्यजीव प्रेमियों ने पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह को श्रद्धांजलि दी
बिली अर्जन सिंह की आठवीं पुण्यतिथि पर जसवीर नगर पलिया में दुधवा लाइव डॉट कॉम व द लास्ट कॉल संस्था ने बाघ सरंक्षण पर एक वर्कशाप का आयोजन किया, इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि चर्चित फिल्मस्टार रणदीप हुडा थे, हुड्डा ने दुधवा के बाघों को बचाने की मुहिम में अपनी भागीदारी की बात कही, और कहा कि तराई के जंगल खासतौर से दुधवा टाइगर रिजर्व धरती पर स्वर्ग की तरह है, उन्होंने बिली अर्जन सिंह जैसी महान शख्सियत को बच्चों के पाठ्यक्रम में सम्मलित करने की भी बात कही ताकि घर घर बिली हो जो कुछ नया और धरती के पर्यावरण के लिए बेहतर कर सके।


कार्यशाला का संचालन वन्यजीव विशेषज्ञ के के मिश्र ने किया, मिश्र ने बिली से जुड़ी अपनी यादों को साझा किया और कहा कि अर्जन सिंह कहते थे बाघ बचेंगे तो जंगल बचेंगे, जंगल बचेंगे तो बरखा आएगी और सभी को आबोहवा मिलेगी,  आदमी को अपने अस्तित्व को बचाना है तो उसे बाघ और जंगल बचाने होंगे, के के मिश्र बताया कि कैसे श्रीमती इंदिरा गांधी बिली के कार्यों से प्रभावित थी, और दुधवा के जंगलों को बिली के ही प्रयासों के चलते श्रीमती गांधी ने 1977 में दुधवा को नेशनल पार्क का दर्ज़ा दिया, बिली की बाघिन तारा, तेंदुआ प्रिंस व जूलिएट हैरिएट कैसे उनके टाइगर हावेन पार्क में रहते थे किस तरह उन्होंने उन्हें जंगलों में रहने के काबिल बनाया, बिली को पद्म श्री, पद्मभूषण, इंटरनेशनल पालगेटी अवार्ड और उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती से सम्मानित किया।


कार्यक्रम में तराई नेचर कंजर्वेशन सोसाइटी के प्रमुख डॉ वीपी सिंह ने बिली से जुड़े अपने संस्मरणों में बिली की बाघिन तारा के किस्से सुनाए, बाघों के लिए गन्ने के खेत उनके प्राकृतिक पर्यावास है किसानों को बाघों से तालमेल बनाना होगा, एकतरह से बाघ फसलों की सुरक्षा करते हैं।
विशिष्ट अतिथि एमएलसी शशांक यादव ने बिली को श्रद्धांजलि देते हुए कहा दुधवा के जंगलों के सरंक्षण में वह अपनी महती भूमिका निभाएंगे।
पूर्व प्रमुख पलिया गुरप्रीत सिंह जॉर्जी ने बिली को एक महान विजनरी बताया और कहा कि वो 100 साल आगे की सोचते थे, उन्ही की सोच का नतीजा है खीरी के सरंक्षित जंगल जो आज दुधवा टाइगर रिजर्व के तौर पर मौजूद है।
कार्यक्रम में रेंजर बेलरायां अशोक  कश्यप जोकि एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर भी हैं ने पशु पक्षियों के सरंक्षण के लिए बिली के प्रयासों को नमन किया
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शमिंदर बोपाराय जिन्होंने बिली के जसवीर नगर को बिली की यादों से सजाया है आउट तकरीबन 50 एकड़ की जमीन में खेती बंद कर जंगल लगवा दिया है, अब जसवीर नगर एक प्राइवेट वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी के तौर पर विकसित हो गई है, शमिंदर ने बिली की यादों को और उनकी सोच को आगे बढाने की बात कही।
कार्यशाला में जनपद के महत्वपूर्ण लोग मौजूद रहे, डॉ धर्मेंद्र सिंह, वेटनरी डाक्टर सौरभ सिंह, नेहा सिंह, एडवोकेट गौरव गिरी, ब्रजेश मिश्रा, रामौतार मिश्रा, शिक्षक राममिलन मिश्र, हरिशंकर शुक्ल, राहुलनयन मिश्र, अचल मिश्रा  मुगलीं प्रोडक्शन के निदर्शक व तमाम वन्यजीव प्रेमियों ने पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह को श्रद्धांजलि दी.



दुधवा लाइव डेस्क

Aug 7, 2017

विश्व पर्यावरण दिवस पर दिल्ली में सोलर बस को हरी झंडी


ग्रीनपीस इंडिया की पहलपहियों पर घर- जो छत सौर पैनलों पर चलने वाले आवश्यक घरेलू उपकरणों से सुसज्जित है- के साथस्थानीय निवासियों के बीच सौर ऊर्जा को प्रचलन में लाने और उनमें जागरूकता पैदा करने के लिए पूरे दिल्ली का दौरा करेगी

नई दिल्ली, 5 जुन, 2017 विश्व पर्यावरण दिवस पर ग्रीनपीस इंडिया ने एक अनोखी यात्रा शुरु की है। दिल्ली के छतों पर सौर ऊर्जा के लाभ के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए ग्रीनपीस ने सौर धूमकेतु को चौपहिया वाहन के घरनुमा छत पर लगाया है जो सभी आधुनिक उपकरणों से लैस हैजो दर्शाता है कि कितनी आसानी से पूरे घरेलू उपकरणों को सौर ऊर्जा से चलाया जा सकता है।

बिजली की बचत वाली बल्बों से सजी इस घरनुमा गाड़ी में मोबाइल चार्जिंग के लिए प्वाईंट हैउसमें एक एयर कूलर लगा हैएक फ्रीज है और साथ हीएक एयर कंडीशन भी है। आगामी बीस दिनों तक सौर धूमकेतु छत पर सौर पैनलों से होनेवाले फायदों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए दिल्ली के विभिन्न रेसिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन (आर डब्लू ए) के साथ बातचीत करने पूरे शहर का दौरा करेगा।

ग्रीनपीस इंडिया की जलवायु और ऊर्जा कैंपेनर पुजारिनी सेन का कहना है, “दिल्ली सरकार पिछले साल सौर ऊर्जा नीति लेकर आई थी। लेकिन तरह-तरह के लाभ दिए जाने के वायदे के बावजूद दिल्ली के अधिकांश लोगों ने इसके बारे में सोचा ही नहीं है। इसलिए आवासीय इलाकों में इसका विस्तार नहीं के बराबर हुआ है।

दिल्ली की कुल सौर क्षमता 2500 मेगावाट है जिसमें 1250 मेगावाट सौर ऊर्जा छत से मिल सकती है। राज्य सरकार का 2020 तक का सौर ऊर्जा का अधिकारिक लक्ष्य 1000मेगावाट है और 2025 तक इसे बढ़ाकर 2000 मेगावाट करने की है। लेकिन दिसबंर 2016 तक मात्र 35.9 मेगावाट सौर ऊर्जा ही स्थापित किया जा सका है और 2016 के मार्च तक तो सिर्फ मेगावाट सौर ऊर्जा ही आवासीय इलाकों से उत्पादन होता था।  

पुजारिनी सेन कहती हैं, “हम आशा करते हैं कि सौर ऊर्जा से सुसज्जित बस अधिक से अधिक लोगों को सौर ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने में मदद करेगा। आर डब्लू ए के साथ जब हमारी शुरूआती बातचीत हो रही थी तो हमें ऐसा लगा कि सौर ऊर्जा के बारे में कई गलतफहमियां हैं जिसे खत्म करने  की जरूरत है। एक व्यापक मान्यता यह है कि रूफटॉप सौर ऊर्जा के लिए बहुत अधिक पूंजी की जरूरत पड़ती है जबकि हकीकत यह है कि राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा दिए जा रहे लाभ को मिला दिया जाए तो अब यह कोई समस्या ही नहीं रह गई है।



पुजारिनी बताती हैं कि दिल्ली में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) द्वारा 30 फीसदी का प्रोत्साहन राशि मिलती है। इसके अलावा सौर ऊर्जा पर आनेवाले कुल खर्च पर पचास फीसदी तक का ऋृण लिया जा सकता है। इसके साथ-साथनेट मीटरिंग के माध्यम से ग्रिड कनेक्टिविटी उपभोक्ताओं को मुख्य ग्रिड से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली की बिक्री और अपने बिजली के बिल को बचाने की अनुमति भी देता है। चार से पांच वर्षों के बीच उपभोक्ता अपना पैसा वसूल कर सकता है। जबकि सोलर पैनल का जीवन 25 वर्षों तक होता है और रखरखाव पर न्युनतम खर्चा है।

अपार्टमेंट्स में रहनेवालों के लिए सबसे बड़ी समस्या छत पर अधिकार को लेकर होता है कि छत पर किसका अधिकार है क्योंकि समान्यतया जो परिवार टॉप फ्लॉर पर रहते हैं छत का स्वामित्व उसी का होता है। पुजारिनी दिल्ली के अलकन्दा के ऋृषि अपार्टमेंट्स का उदाहरण देते हुए बताती हैं, “ऐसे मामलों में आर डब्लू ए कॉलनी के कॉमन एरिया में एक सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने का सामूहिक निर्णय ले सकते हैं जहां के लोगों ने 21 केडब्लूपी सिस्टम स्थापित करने का वायदा किया है।

पुजारिनी कहती हैं, “हमें सिर्फ दिमाग खुला रखने की जरूरत है। रूफटॉप ऊर्जा कोयला से उत्पन्न होने वाली बिजली का अनुकुल विकल्प है जो पर्यावरण के लिए हितकर है। यह बार-बार साबित हुआ है कि थर्मल विद्युत संयंत्र सबसे अधिक वायु प्रदूषण फैलाता है और इससे हर साल तकरीबन 12 लाख लोगों की मौत होती है। दिल्ली हमारे देश का सबसे प्रदूषित शहर है अगर हम सौर ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो एक छोटी सी पहलकदमी से हम शहर की अावोहवा में बेहतर ढ़ंग से सांस ले पाएगें।

Contact information:
Pujarini Sen, Climate and Energy campaigner, Greenpeace India: 8586016050; pujarini.sen@greenpeace.org
Avinash Chanchal, avinash.kumar@greenpeace.org , 8882153664

Jun 16, 2017

देवभूमि में देवदार खतरे में- रक्षासूत्र आंदोलन

गौमुख 


गंगोत्री के हरे पहरेदारों की पुकार सुनो
लेखक: सुरेश भाई

एक ओर 'नमामि गंगे'  के तहत् 30 हजार  हेक्टेयर भूमि पर वनों के रोपण का लक्ष्य है तो दूसरी ओर गंगोत्री से हर्षिल के बीच हजारों हरे देवदार के पेडों की हजामत किए जाने का प्रस्ताव है। यहां जिन देवदार के हरे पेडों को कटान के लिये चिन्हित किया गया हैं, उनकी उम्र न तो छंटाई योग्य हैं, और न ही उनके कोई हिस्से सूखे हैं। कहा जा रहा है कि ऐसा 'आॅल वेदर रोड' यानी हर मौसम में ठीक रहने वाली 15 मीटर चौड़ी सड़क के नाम पर किया जायेगा। क्या ऊपरी हिमालय में सड़क की इतनी चौड़ाई उचित है ? क्या ग्लेशियरों के मलवों के ऊपर खडे पहाड़ों को थामने वाली इस वन संपदा का विनाश शुभ है ? कतई नहीं।

गौर कीजिए कि इस क्षेत्र में फैले 2300 वर्ग किमी क्षेत्र में गंगोत्री नेशनल पार्क भी है। गंगा उद्गम का यह क्षेत्र राई, कैल, मुरेंडा, देवदार, खर्सू, मौरू नैर, थुनेर, दालचीनी, बाॅज, बुराॅस आदि शंकुधारी एवं  चौड़ी पत्ती वाली दुर्लभ वन प्रजातियों का घर है। गंगोत्री के दर्शन से पहले देवदार के जंगल के बीच गुजरने का आनंद ही स्वर्ग की अनुभूति है। इनके बीच में उगने वाली जडी-बूटियों और यहां से बहकर आ रही जल धाराये हीं गंगाजल की गुणवतापूर्ण निर्मलता बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। यह ध्यान देने की जरूरत हैं कि यहां की वन प्रजातियां एक तरह से रेनफेड फाॅरेस्ट (वर्षा वाली प्रजाति) के नाम से भी जानी जाती हैं। इन्ही के कारण जहां हर समय बारिश की संभावना बनी रहती हैं। गंगोंत्री के आसपास गोमुख समेत सैकडों ग्लेशियर हैं। जब ग्लेशियर टूटते हैं, तब ये प्रजातियां ही उसके दुष्परिणाम से हमें बचाती हैं। देवदार प्रधान हमारे जंगल हिमालय और गंगा..दोनो के हरे पहरेदार हैं। ग्लेशियरों का तापमान नियंत्रित करने में रखने में भी इनकी हमारे इन हरे पहरेदारों की भूमिका बहुत अधिक है।

रक्षा सूत्र आंदोलन 


हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए हमे चाहिए कि हम इन हरे पहरेदारों की आवाज़ सुनें। इनकी इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार ने गंगोत्री क्षेत्र के चार हजार वर्ग किमी के दायरे को इको सेंसटिव ज़ोन' यानी ’पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ घोषित किया था। ऐसा करने का एक लक्ष्य गंगा किनारे हरित क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र को बढ़ाना ही था। शासन को याद करना चाहिए कि इसी क्षेत्र में वर्ष 1994-98 के बीच भी देवदार के हजारों हरे पेडों को काटा गया था। उस समय हर्षिल, मुखवा गांव की महिलाओं ने पेडों पर रक्षासूत्र बांधकर विरोध किया था। केन्द्रीय वन एवम् पर्यावरण मंन्त्रालय ने 'रक्षासूत्र आन्दोलन' की मांग पर एक जांच टीम का गठन भी किया था। जिस जांच में वनकर्मी बड़ी संख्या में दोषी पाये गये थे। देवदार कटान की व्यापक कार्रवाई के समाचार से ’रक्षा सूत्र आंदोलन’ पुनः चिंतित है।

चिंता करने की बात है कि यह क्षेत्र पिछले वर्ष लगी भीषण आग से अभी भी पूरी तरह भी नहीं उभर पाया हैं। यहां की वनस्पतियां धीरे-धीरे पुनः सांस लेने की कोशिश में हैं। ऐसे में उनके ऊपर आरी-कुल्हाड़ी का वार करने की तैयारी अनुचित है। हम कैसे नजरअंदाज़ कर सकते हैं कि गंगा को निर्मल और अविरल रखने में वनों की महत्वपूर्ण भागीदारी हैं; बावजूद इस सत्य के पेड़ों के कटान पर रोक लगाने की कोई नीयत नजर नहीं आ रही है। सन् 1991 के भूकम्प के बाद यहां की धरती इतनी नाजुक हो चुकी है कि हर साल बाढ से जन-धन की हानि हो रही है। वनाग्नि और भूस्खलन से प्रभावित स्थानीय इलाकों में पेडों के कटान और लुढ़कान से मिट्टी कटाव की समस्या बढ़ जाती हैं। इस कारण गंगोत्री क्षेत्र की शेष बची हुई जैवविविधता के बीच में एक पेड़ का कटान का नतीजा बुरा होता हैं।

'रक्षा सूत्र आंदोलन' बार-बार सचेत कर रहा है कि बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प की दृष्टि सेे संवेदनशील ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में देहरादून और हरिद्धार जैसे निचले हिस्सों के मानकों के बराबर ही मार्ग को चौड़ा करने की योजना पर्यावरण के लिए आगे चलकर घातक सिद्व होगी। इस चेतावनी को सुन कई लोग गंगोत्री के इस इलाके में पहुंच रहे है। वे सभी हरे देवदार के देववृक्ष को बचाने की बचाने की गुहार लगा रहे है। कुछ ने देवदारों को रक्षासूत्र बांधकर अपना संकल्प जता दिया है। 30 किमी में फैले इस वनक्षेत्र को बचाने के लिये हम 15 मीटर के स्थान पर 07 मीटर चौड़ी सडक बनाने का सुझाव दे रहे है। इतनी चौड़ी सड़के पर दो बसें आसानी से एक साथ निकल सकती हैं। शासन-प्रशासन को चाहिए कि प्रकृति अनुकूल इस स्वर को सुने; ताकि आवागमन भी बाधित न हो और गंगा के हरे पहरेदारों के जीवन पर भी कोई संकट न आये।





सुरेश भाई 
(लेखक, रक्षा सूत्र आंदोलन के प्रणेता हैं )
फोन संपर्क: 94120-77-896

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था