International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Aug 7, 2017

विश्व पर्यावरण दिवस पर दिल्ली में सोलर बस को हरी झंडी


ग्रीनपीस इंडिया की पहलपहियों पर घर- जो छत सौर पैनलों पर चलने वाले आवश्यक घरेलू उपकरणों से सुसज्जित है- के साथस्थानीय निवासियों के बीच सौर ऊर्जा को प्रचलन में लाने और उनमें जागरूकता पैदा करने के लिए पूरे दिल्ली का दौरा करेगी

नई दिल्ली, 5 जुन, 2017 विश्व पर्यावरण दिवस पर ग्रीनपीस इंडिया ने एक अनोखी यात्रा शुरु की है। दिल्ली के छतों पर सौर ऊर्जा के लाभ के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए ग्रीनपीस ने सौर धूमकेतु को चौपहिया वाहन के घरनुमा छत पर लगाया है जो सभी आधुनिक उपकरणों से लैस हैजो दर्शाता है कि कितनी आसानी से पूरे घरेलू उपकरणों को सौर ऊर्जा से चलाया जा सकता है।

बिजली की बचत वाली बल्बों से सजी इस घरनुमा गाड़ी में मोबाइल चार्जिंग के लिए प्वाईंट हैउसमें एक एयर कूलर लगा हैएक फ्रीज है और साथ हीएक एयर कंडीशन भी है। आगामी बीस दिनों तक सौर धूमकेतु छत पर सौर पैनलों से होनेवाले फायदों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए दिल्ली के विभिन्न रेसिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन (आर डब्लू ए) के साथ बातचीत करने पूरे शहर का दौरा करेगा।

ग्रीनपीस इंडिया की जलवायु और ऊर्जा कैंपेनर पुजारिनी सेन का कहना है, “दिल्ली सरकार पिछले साल सौर ऊर्जा नीति लेकर आई थी। लेकिन तरह-तरह के लाभ दिए जाने के वायदे के बावजूद दिल्ली के अधिकांश लोगों ने इसके बारे में सोचा ही नहीं है। इसलिए आवासीय इलाकों में इसका विस्तार नहीं के बराबर हुआ है।

दिल्ली की कुल सौर क्षमता 2500 मेगावाट है जिसमें 1250 मेगावाट सौर ऊर्जा छत से मिल सकती है। राज्य सरकार का 2020 तक का सौर ऊर्जा का अधिकारिक लक्ष्य 1000मेगावाट है और 2025 तक इसे बढ़ाकर 2000 मेगावाट करने की है। लेकिन दिसबंर 2016 तक मात्र 35.9 मेगावाट सौर ऊर्जा ही स्थापित किया जा सका है और 2016 के मार्च तक तो सिर्फ मेगावाट सौर ऊर्जा ही आवासीय इलाकों से उत्पादन होता था।  

पुजारिनी सेन कहती हैं, “हम आशा करते हैं कि सौर ऊर्जा से सुसज्जित बस अधिक से अधिक लोगों को सौर ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने में मदद करेगा। आर डब्लू ए के साथ जब हमारी शुरूआती बातचीत हो रही थी तो हमें ऐसा लगा कि सौर ऊर्जा के बारे में कई गलतफहमियां हैं जिसे खत्म करने  की जरूरत है। एक व्यापक मान्यता यह है कि रूफटॉप सौर ऊर्जा के लिए बहुत अधिक पूंजी की जरूरत पड़ती है जबकि हकीकत यह है कि राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा दिए जा रहे लाभ को मिला दिया जाए तो अब यह कोई समस्या ही नहीं रह गई है।



पुजारिनी बताती हैं कि दिल्ली में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) द्वारा 30 फीसदी का प्रोत्साहन राशि मिलती है। इसके अलावा सौर ऊर्जा पर आनेवाले कुल खर्च पर पचास फीसदी तक का ऋृण लिया जा सकता है। इसके साथ-साथनेट मीटरिंग के माध्यम से ग्रिड कनेक्टिविटी उपभोक्ताओं को मुख्य ग्रिड से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली की बिक्री और अपने बिजली के बिल को बचाने की अनुमति भी देता है। चार से पांच वर्षों के बीच उपभोक्ता अपना पैसा वसूल कर सकता है। जबकि सोलर पैनल का जीवन 25 वर्षों तक होता है और रखरखाव पर न्युनतम खर्चा है।

अपार्टमेंट्स में रहनेवालों के लिए सबसे बड़ी समस्या छत पर अधिकार को लेकर होता है कि छत पर किसका अधिकार है क्योंकि समान्यतया जो परिवार टॉप फ्लॉर पर रहते हैं छत का स्वामित्व उसी का होता है। पुजारिनी दिल्ली के अलकन्दा के ऋृषि अपार्टमेंट्स का उदाहरण देते हुए बताती हैं, “ऐसे मामलों में आर डब्लू ए कॉलनी के कॉमन एरिया में एक सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने का सामूहिक निर्णय ले सकते हैं जहां के लोगों ने 21 केडब्लूपी सिस्टम स्थापित करने का वायदा किया है।

पुजारिनी कहती हैं, “हमें सिर्फ दिमाग खुला रखने की जरूरत है। रूफटॉप ऊर्जा कोयला से उत्पन्न होने वाली बिजली का अनुकुल विकल्प है जो पर्यावरण के लिए हितकर है। यह बार-बार साबित हुआ है कि थर्मल विद्युत संयंत्र सबसे अधिक वायु प्रदूषण फैलाता है और इससे हर साल तकरीबन 12 लाख लोगों की मौत होती है। दिल्ली हमारे देश का सबसे प्रदूषित शहर है अगर हम सौर ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो एक छोटी सी पहलकदमी से हम शहर की अावोहवा में बेहतर ढ़ंग से सांस ले पाएगें।

Contact information:
Pujarini Sen, Climate and Energy campaigner, Greenpeace India: 8586016050; pujarini.sen@greenpeace.org
Avinash Chanchal, avinash.kumar@greenpeace.org , 8882153664

Jun 16, 2017

देवभूमि में देवदार खतरे में- रक्षासूत्र आंदोलन

गौमुख 


गंगोत्री के हरे पहरेदारों की पुकार सुनो
लेखक: सुरेश भाई

एक ओर 'नमामि गंगे'  के तहत् 30 हजार  हेक्टेयर भूमि पर वनों के रोपण का लक्ष्य है तो दूसरी ओर गंगोत्री से हर्षिल के बीच हजारों हरे देवदार के पेडों की हजामत किए जाने का प्रस्ताव है। यहां जिन देवदार के हरे पेडों को कटान के लिये चिन्हित किया गया हैं, उनकी उम्र न तो छंटाई योग्य हैं, और न ही उनके कोई हिस्से सूखे हैं। कहा जा रहा है कि ऐसा 'आॅल वेदर रोड' यानी हर मौसम में ठीक रहने वाली 15 मीटर चौड़ी सड़क के नाम पर किया जायेगा। क्या ऊपरी हिमालय में सड़क की इतनी चौड़ाई उचित है ? क्या ग्लेशियरों के मलवों के ऊपर खडे पहाड़ों को थामने वाली इस वन संपदा का विनाश शुभ है ? कतई नहीं।

गौर कीजिए कि इस क्षेत्र में फैले 2300 वर्ग किमी क्षेत्र में गंगोत्री नेशनल पार्क भी है। गंगा उद्गम का यह क्षेत्र राई, कैल, मुरेंडा, देवदार, खर्सू, मौरू नैर, थुनेर, दालचीनी, बाॅज, बुराॅस आदि शंकुधारी एवं  चौड़ी पत्ती वाली दुर्लभ वन प्रजातियों का घर है। गंगोत्री के दर्शन से पहले देवदार के जंगल के बीच गुजरने का आनंद ही स्वर्ग की अनुभूति है। इनके बीच में उगने वाली जडी-बूटियों और यहां से बहकर आ रही जल धाराये हीं गंगाजल की गुणवतापूर्ण निर्मलता बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। यह ध्यान देने की जरूरत हैं कि यहां की वन प्रजातियां एक तरह से रेनफेड फाॅरेस्ट (वर्षा वाली प्रजाति) के नाम से भी जानी जाती हैं। इन्ही के कारण जहां हर समय बारिश की संभावना बनी रहती हैं। गंगोंत्री के आसपास गोमुख समेत सैकडों ग्लेशियर हैं। जब ग्लेशियर टूटते हैं, तब ये प्रजातियां ही उसके दुष्परिणाम से हमें बचाती हैं। देवदार प्रधान हमारे जंगल हिमालय और गंगा..दोनो के हरे पहरेदार हैं। ग्लेशियरों का तापमान नियंत्रित करने में रखने में भी इनकी हमारे इन हरे पहरेदारों की भूमिका बहुत अधिक है।

रक्षा सूत्र आंदोलन 


हमें नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए हमे चाहिए कि हम इन हरे पहरेदारों की आवाज़ सुनें। इनकी इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार ने गंगोत्री क्षेत्र के चार हजार वर्ग किमी के दायरे को इको सेंसटिव ज़ोन' यानी ’पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ घोषित किया था। ऐसा करने का एक लक्ष्य गंगा किनारे हरित क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र को बढ़ाना ही था। शासन को याद करना चाहिए कि इसी क्षेत्र में वर्ष 1994-98 के बीच भी देवदार के हजारों हरे पेडों को काटा गया था। उस समय हर्षिल, मुखवा गांव की महिलाओं ने पेडों पर रक्षासूत्र बांधकर विरोध किया था। केन्द्रीय वन एवम् पर्यावरण मंन्त्रालय ने 'रक्षासूत्र आन्दोलन' की मांग पर एक जांच टीम का गठन भी किया था। जिस जांच में वनकर्मी बड़ी संख्या में दोषी पाये गये थे। देवदार कटान की व्यापक कार्रवाई के समाचार से ’रक्षा सूत्र आंदोलन’ पुनः चिंतित है।

चिंता करने की बात है कि यह क्षेत्र पिछले वर्ष लगी भीषण आग से अभी भी पूरी तरह भी नहीं उभर पाया हैं। यहां की वनस्पतियां धीरे-धीरे पुनः सांस लेने की कोशिश में हैं। ऐसे में उनके ऊपर आरी-कुल्हाड़ी का वार करने की तैयारी अनुचित है। हम कैसे नजरअंदाज़ कर सकते हैं कि गंगा को निर्मल और अविरल रखने में वनों की महत्वपूर्ण भागीदारी हैं; बावजूद इस सत्य के पेड़ों के कटान पर रोक लगाने की कोई नीयत नजर नहीं आ रही है। सन् 1991 के भूकम्प के बाद यहां की धरती इतनी नाजुक हो चुकी है कि हर साल बाढ से जन-धन की हानि हो रही है। वनाग्नि और भूस्खलन से प्रभावित स्थानीय इलाकों में पेडों के कटान और लुढ़कान से मिट्टी कटाव की समस्या बढ़ जाती हैं। इस कारण गंगोत्री क्षेत्र की शेष बची हुई जैवविविधता के बीच में एक पेड़ का कटान का नतीजा बुरा होता हैं।

'रक्षा सूत्र आंदोलन' बार-बार सचेत कर रहा है कि बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प की दृष्टि सेे संवेदनशील ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में देहरादून और हरिद्धार जैसे निचले हिस्सों के मानकों के बराबर ही मार्ग को चौड़ा करने की योजना पर्यावरण के लिए आगे चलकर घातक सिद्व होगी। इस चेतावनी को सुन कई लोग गंगोत्री के इस इलाके में पहुंच रहे है। वे सभी हरे देवदार के देववृक्ष को बचाने की बचाने की गुहार लगा रहे है। कुछ ने देवदारों को रक्षासूत्र बांधकर अपना संकल्प जता दिया है। 30 किमी में फैले इस वनक्षेत्र को बचाने के लिये हम 15 मीटर के स्थान पर 07 मीटर चौड़ी सडक बनाने का सुझाव दे रहे है। इतनी चौड़ी सड़के पर दो बसें आसानी से एक साथ निकल सकती हैं। शासन-प्रशासन को चाहिए कि प्रकृति अनुकूल इस स्वर को सुने; ताकि आवागमन भी बाधित न हो और गंगा के हरे पहरेदारों के जीवन पर भी कोई संकट न आये।





सुरेश भाई 
(लेखक, रक्षा सूत्र आंदोलन के प्रणेता हैं )
फोन संपर्क: 94120-77-896

May 12, 2017

जहाँ सूरज की किरणें सिर्फ दोपहर में पहुँचती हैं !

Photo courtesy: Rohit Yaduvanshi (wikipedia) 


पातालकोट-धरती पर एक अजूबा
और यहाँ का आदिवासी जगत

गगनचुंबी इमारतों, सडकों पर फ़र्राटे भरती रंग-बिरंगी-चमचमाती लक्जरी कारें, मोटरगाड़ियों और न जाने कितने ही कल-कारखानों, पलक झपकते ही आसमान में उड़ जाने वाले वायुयानों, समुद्र की गहराइयों में तैरती पनडुब्बियों, बड़े-बड़े स्टीमरों-जहाजों आदि को देख कर किसी के मन में तनिक भी कौतुहल नहीं होता। होना भी नहीं चाहिये, क्योंकि हम उन्हें रोज देख रहे होते हैं, उनमें सफ़र कर रहे होते हैं। यदि आपसे यह कहा जाय कि इस धरती ने नीचे भी यदि कोई मानव बस्ती है, जहाँ के आदिवासीजन हजारों-हजार साल से अपनी आदिम संस्कृति और रीत-रिवाज को लेकर जी रहे हैं, जहाँ चारों ओर बीहड़ जंगल हैं, जहाँ आवागमन के कोई साधन नहीं हैं, जहाँ विषैले जीव जन्तु, हिंसक पशु खुले रुप में विचरण कर रहे हैं, जहाँ दोपहर होने पर ही सूरज की किरणें अंदर तक झाँक पाती हैं, जहाँ हमेशा धुंध-सी छाई रहती है, चरती भैंसों को देखने पर ऐसा प्रतीत है, जैसे कोई काला सा धब्बा चलता-फिरता दिखाई देता हो, सच मानिए ऐसी जगह पर मानव-बस्ती का होना एक गहरा आश्चर्य पैदा करता है।

हमारे पुरा आख्यानों में “पातालकोट” का जिक्र बार-बार आया है। ”पाताल” कहते ही हमारे मस्तिष्क-पटल पर, एक दृष्य तेजी से उभरता है। लंका नरेश रावण का एक भाई, जिसे अहिरावण के नाम से जाना जाता था, के बारे में पढ़ चुके हैं कि वह पाताल में रहता था। राम-रावण युद्ध के समय उसने राम और लक्ष्मण को सोता हुआ उठाकर पाताललोक ले गया था, और उनकी बलि चढाना चाहता था, ताकि युद्ध हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाए। इस बात का पता जैसे ही वीर हनुमान को लगता है वे पाताललोक जा पहुँचते हैं। दोनों के बीच भयंकर युद्ध होता है और अहिरावण मारा जाता है। उसके मारे जाने पर हनुमान उन्हें पुनः युद्धभूमि पर ले आते हैं। 

पाताल अर्थात अनन्त गहराइयों वाला स्थान। वैसे तो हमारे धरती के नीचे सात तलों की कल्पना की गई है-....अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल, महातल तथा महातल के नीचे पाताल। शब्दकोष में कोट के भी कई अर्थ मिलते हैं- जैसे- दुर्ग, गढ़, प्राचीर, रंगमहल और अँग्रेजी ढँग का एक लिबास जिसे हम कोट कहते है। यहाँ कोट का अर्थ है- चट्टानी दीवारों से. दीवारें भी इतनी ऊँची, कि आदमी का दर्प चूर-चूर हो जाए। कोट का एक अर्थ होता है-कनात। यदि आप पहाड़ी की तलहटी में खड़े हैं, तो लगता है जैसे कनातों से घिर गए हैं। कनात की मुड़ेर पर उगे पेड़-पौधे, हवा मे हिचकोले खाती डालियाँ... हाथ हिला-हिला कर कहती हैं कि हम कितने ऊपर है। यह कनात कहीं-कहीं एक हजार दो सौ फुट, कहीं एक हजार सात सौ पचास फुट, तो कहीं खाइयों के अंतःस्थल से तीन हजार सात सौ फुट ऊँची है। उत्तर-पूर्व में बहती नदी की ओर यह कनात नीची होती चली जाती है। कभी-कभी तो यह गाय के खुर की आकृति में दिखाई देती है। 

पातालकोट का अंतःक्षेत्र शिखरों और वादियों से आवृत है। पातालकोट में, प्रकृति के इन उपादानों ने इसे अद्वितीय बना दिया है। दक्षिण में पर्वतीय शिखर इतने ऊँचे होते चले गए हैं कि इनकी ऊँचाई उत्तर-पश्चिम में फैलकर इसकी सीमा बन जाती है। दूसरी ओर घाटियाँ इतनी नीची होती चली गई है कि उसमें झाँककर देखना मुश्किल होता है। यहाँ का अद्भुत नजारा देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो शिखरों और वादियों के बीच होड़ सी लग गई हो। कौन कितने गौरव के साथ ऊँचा हो जाता है और कौन कितनी विनम्रता के साथ झुकता चला जाता है। इस बात के साक्षी हैं यहाँ पर उगे पेड़-पौधे, जो तलहटियों के गर्भ से, शिखरों की फ़ुनगियों तक बिना किसी भेदभाव के फैले हुए हैं। पातालकोट की झुकी हुई चट्टानों से निरंतर पानी का रिसाव होता रहता है। यह पानी रिसता हुआ ऊँचे-ऊँचे आम के वृक्षों के माथे पर टपकता है और फिर छितरते हुए बूँदों के रुप में खोह के आँगन में गिरता रहता है। बारहमासी बरसात में भीगकर तन और मन पुलकित हो उठते है।

जी हाँ, भारत का हृदय कहलाने वाले मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा जिले से 62 किमी. तथा तामियाविकास खंड से महज 23 किमी. की दूरी पर स्थित “पातालकोट” को देखकर ऊपर लिखी सारी बातें देखी जा सकती है। समुद्र सतह से लगभग 3250 फ़ुट ऊँचाई पर तथा भूतल से 1000 से 1700 फ़ुट गहराई में अवस्थित है. धरती का कुँआ कहलाने वाले इस पातालकोट में बारह गाँव –(१) गैलडुब्बा, (२)कारेआम, (३) रातेड, (४) घटलिंग-घुढ़ीछत्री, (५) घाना, कौड़िया, (६) चिमटीपुर, (७)जड़-मांदल, (८) छर्राकछार, (९) खमारपुर, (१०) शेरपंचगेल, (११) सुखाभांड-हरमुहुभंजलाम और (१२) मालती-डोमनी समाये हुए है.

भारिया जनजाति का विस्तार क्षेत्र मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा, सिवनी, मण्डला और सरगुजा जिले हैं.इस अपेक्षाकृत बड़े भू-भाग में फ़ैली जनजाति का एक छोटा सा समूह छिन्दवाड़ा जिले में स्थित इसी “पातालकोट” में सदियों से रह रहा है. पातालकोट की 90% आबादी “भारिया” जनजाति की है, शेष 10% में दूसरे आदिवासी हैं.

पातालकोट के भारिया कोल समूह के हैं जो न जाने कब से इस क्षेत्र में निवास कर रहे हैं. उन्हेंनतो अपनी पुरानी भाषा का ज्ञान है और न ही धर्म का किन्तु यही पुराने आस्ट्रिक वर्ग के टूटॆसमूहों की पहचान भी है. भारिया शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है, यह ज्ञात नहीं, परन्तु कुछ लोगों का मत है कि अज्ञातवास में जब कौरवों के गुप्तचर, पाण्डवों को ढूंढ रहे थे तब अर्जुन ने अभिमंत्रित बर्रू घास के शस्त्र देकर इन्हें गुप्तचरों से लड़ने भेज दिया था. इन्होंने विजय प्राप्त की और तब से इन्हें “ भारिया “ नाम मिला. अब इस किंवदन्ती में कितनी सच्चाई है, यह एक खोज का विषय हो सकता है.

यहाँ की जलवायु मौसमी है तथा सघन वनों की अधिकता के कारण वार्षिक वर्षा 1250 मि.मी. तक होती है. वर्षा का अधिकांश भाग म.प्र. के अन्य जिलों की ही भांति जून से सितम्बर तक प्राप्त होता है. अधिकतम तापमान 46 डिग्री सेल्सियस तथा न्यूनतम 18 डिग्री सेल्सियस पाया जाता है. यहाँ की मिट्टी चूने और रेत की प्रधानता वाली अनुर्वर है. यहाँ नाना प्रकार की घासें, तथा बड़े वृक्षों में हर्रा, बीजा, धावा, जामुन, पलाश, बेर, हल्दू, पीपल और सेमल प्रमुख हैं. यहाँ पर बहुत सी औषधियाँ भी पायी जाती है. जंगलों में नीलगाय, भालू, चिंकारा तथा खरहे इत्यादि देखने को मिल जाते हैं.

अपने इष्ट, देवों के देव महादेव, इनके आराध्य देव हैं। इनके अलावा और भी कई देव हैं जैसेमढुआदेव, हरदुललाला, ग्रामदेवी, खेडापति, भैंसासुर, चंडीमाई, खेडामाई, घुरलापाट, भीमसेनी, जोगनी, बाघदेवी, मेठोदेवी आदि को पूजते हुए अपनी आस्था की लौ जलाए रहते हैं, वहीं अपनी आदिम संस्कृति, परम्पराओं, रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों में गहरी आस्था लिए शान से अपना जीवन यापन करते हैं। ऐसा नहीं है कि यहाँ अभाव नहीं है। अभाव ही अभाव है, लेकिन वे अपना रोना लेकर किसी के पास नहीं जाते और न ही किसी से शिकवा-शिकायत ही करते हैं। बित्ते भर पेट के गढ्ढे को भरने के लिए वनोपज ही इनका मुख्य आधार होता है। पारंपरिक खेती कर ये कोदो- कुटकी,-बाजरा उगा लेते हैं। महुआ इनका प्रिय भोजन है। महुआ के सीजन में ये उसे बीनकर सुखाकर रख लेते हैं और इसकी बनी रोटी बड़े चाव से खाते हैं। महुआ से बनी शराब इन्हें जंगल में टिके रहने का जज्बा बनाए रखती है। यदि बीमार पड़ गए तो तो भुमका-पड़िहार ही इनका डाक्टर होता है। यदि कोई बाहरी बाधा है तो गंडा-ताबीज बाँधकर इलाज हो जाता है।

शहरी चकाचौंध से कोसों दूर आज भी वे सादगी के साथ जीवन यापन करते हैं। कमर के इर्द-गिर्द कपडा लपेटे, सिर पर फड़िया बाँधे, हाथ में कुल्हाड़ी अथवा दराती लिए। होठों पर मंद-मंद मुस्कान ओढ़े ये आज भी देखे जा सकते हैं। विकास के नाम पर करोड़ों-अरबों का खर्चा किया गया लेकिन वह रकम कहाँ से आकर कहाँ चली जाती है, इन्हें पता ही नहीं चलता और न ही ये किसी के पास शिकायत-शिकवा लेकर जाते हैं। विकास के नाम पर केवल कोट में उतरने के लिए सीढ़ियों बना दी गयी है, लेकिन आज भी ये इसका उपयोग न करते हुए अपने बने–बनाए रास्ते-पगडंडियों पर चलते नजर आते हैं। सीढ़ियों पर चलते हुए आप थोड़ी दूर ही जा पाएँगे, लेकिन ये अपने तरीके से चलते हुए सैकड़ों फुट नीचे उतर जाते हैं। हाट-बाजार के दिन ही ये ऊपर आते हैं और इकठ्ठा किया गया वनोपज बेचकर, मिट्टी का तेल तथा नमक आदि लेना नहीं भूलते। जो चीजें जंगल में पैदा नहीं होती, यही उनकी न्यूनतम आवश्यकता है।

एक खोज के अनुसार पातालकोट की तलहटी में करीब 20 गाँव साँस लेते थे, लेकिन प्रकृति के  प्रकोप के चलते वर्तमान समय में अब केवल 12 गाँव ही शेष बचे हैं। एक गाँव में 4-5 अथवा सात-आठ से ज्यादा घर नहीं होते। जिन बारह गाँव में ये रहते हैं, सभी के नाम संस्कृति से जुड़े-बसे हैं। भारियाओं के शब्दकोष में इनके अर्थ धरातलीय संरचना, सामाजिक प्रतिष्ठा, उत्पादन विशिष्टता इत्यादि को अपनी संपूर्णता में समेटे हुए है।
ये आदिवासीजन अपने रहने के लिए मिट्टीतथा घास-फूस की झोपड़ियाँ बनाते है। दिवारों पर खड़िया तथा गेरू से प्रतीक चिह्न उकेरे जाते हैं। हॉसिया-कुल्हाडी तथा लाठी इनके पारंपरिक औजार है। ये मिट्टी के बर्तनों का ही उपयोग करते हैं। ये अपनी धरती को माँ का दर्जा देते हैं। अतः उसके सीने में हल नहीं चलाते। बीज को छिड़ककर ही फसल उगाई जाती है...वनोपज ही उनके जीवन का मुख्य आधार होता है। पातालकोट में उतरने के और चढ़ने के लिए कई रास्ते हैं। रातेड-चिमटीपुर और कारेआम के रास्ते ठीक हैं। रातेड़ का मार्ग सबसे सरल मार्ग है, जहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है। फिर भी सँभलकर चलना होता है। जरा-सी भी लापरवाही किसी बड़ी दुर्धटना को आमंत्रित कर सकती है। पातालकोट के दर्शनीय स्थल में, रातेड, कारेआम, चिमटीपुर, दूधी तथा गायनी नदी का उद्गम स्थल और राजाखोह प्रमुख है। आम के झुरमुट, पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। आम के झुरमुट में शोर मचाता- कलकल के स्वर निनादित कर बहता सुन्दर सा झरना, कारेआम का खास आकर्षण है।

रातेड के ऊपरी हिस्से से कारेआम को देखने पर यह ऊँट की कूबड सा दिखाई देता है। राजाखोहपातालकोट का सबसे आकर्षक और दर्शनीय स्थल है। विशाल कटोरे में स्थित, एक विशाल चट्टानके नीचे 100 फुट लंबी तथा 25 फुट चौडी कोट (गुफ़ा) में कम से कम दो सौ लोग आराम से बैठ सकते हैं। विशाल कोटरनुमा चट्टान, बड़े-बड़े गगनचुंबी आम-बरगद के पेड़ों, जंगली लताओं तथा जडी-बूटियों से यह ढँकी हुई है। कल-कल के स्वर निनादित कर बहते झरने, गायनी नदी का बहता निर्मल, शीतल जल, पक्षियों की चहचाहट, हर्रा-बहेड़ा-आँवला, आचार-ककई एवं छायादार तथा फलदार वृक्षों की सघनता, धुंध और हरीतिमा के बीच धूप-छाँव की आँख मिचौनी, राजाखोह की सुंदरता में चार चाँद लगा देते है, और उसे एक पर्यटन स्थल विशेष का दर्जा दिलाते हैं।
नागपुर के राजा रघुजी ने अँगरेजों की दमनकारी नीतियों से तंग आकर मोर्चा खोल दिया था, लेकिन विपरीत परिस्थितियाँ देखकर उन्होंने इस गुफ़ा को अपनी शरण-स्थली बनाया था, तभी से इस खोह का नाम “राजाखोह” पडा। राजाखोह के समीप गायनी नदी अपने पूरे वेग के साथ चट्टानों को काटती हुई बहती है। नदी के शीतल तथा निर्मल जल में स्नान कर व तैरकर सैलानी अपनी थकान भूल जाते हैं। पातालकोट का जलप्रवाह उत्तर से पूर्व की ओर चलता है। पतालकोट की जीवन-रेखा दूधी नदी है, जो रातेड़ नामक गाँव के दक्षिणी पहाड़ों से निकलकर, घाटी में बहती हुई उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होती हुई पुनः पूर्व की ओर मुड़ जाती है। तहसील की सीमा से सटकर कुछ दूर तक बहने के बाद पुनः उत्तर की ओर बहने लगती है और अंत में नरसिंहपुर जिले में नर्मदा नदी में मिल जाती है। 

पातालकोट का आदिम-सौंदर्य जो भी एक बार देख लेता है, वह उसे जीवन पर्यंत नहीं भूल सकता। पातालकोट में रहने वाली जनजाति की मानवीय धड़कनों का अपना एक अद्भुत संसार है, जो उनकी आदिम परंपराओ, संस्कृति, सांस्कृतिक-रिवाज, खान-पान, नृत्य-संगीत में निहित है। यह सामान्यजनों के क्रियाकलापों से मेल नहीं खाते। आज भी वे उसी निश्छलता, सरलता तथा सादगी में जी रहे हैं। 

यहाँ प्राकृतिक दृश्यों की भरमार है। यहाँ की मिट्टी में एक जादुई खुशबू है, पेड़-पौधों के अपने निराले अंदाज है, नदी-नालों में निबार्ध उमंग है, पशु-पक्षियों मे आनंद का कलरव है, खेत- खलिहानों मे श्रम का संगीत है, चारो तरफ़ सुगंध ही सुगंध है, ऐसे मनभावन वातावरण में दुख भला कहाँ सालता है? कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी यहाँ आकर नतमस्तक हो जाती है. सूरज के प्रकाश में नहाता-पुनर्नवा होता- खिलखिलाता-मुस्कुराता- खुशी से झूमता- हवा के संग हिचकोले खाता- जंगली जानवरों की गर्जना में काँपता- कभी अनमना तो कभी झूमकर नाचता जंगल, खूबसूरत पेड़-पौधे, रंग-बिरंगे फूलों से लदी-फ़दी डालियाँ, शीतलता और मंद हास बिखेरते, कलकल के गीत सुनाते, आकर्षक झरने, नदी का किसी रूपसी की तरह इठलाकर- बल खाकर, मचलकर चलना देखकर, भला कौन मोहित नहीं होगा ?
जैसे–जैसे साँझ गहराने लगती है, और अन्धकार अपने पैर फैलाने लगता है, तब अन्धकार में डूबेवृक्ष किसी दैत्य की तरह नजर आने लगते है और वह अपने जंगलीपन पर उतर आते हैं। हिंसकपशु-पक्षी अपनी-अपनी माँद से निकल पड़ते हैं, अपने शिकार की तलाश में। सूरज की रौशनी में,कभी नीले तो कभी काले-कलूटे दिखने वाले, अनोखी छटा बिखेरते पहाड़ों की शृंखला, किसी विशालकाय राक्षस से कम दिखलाई नहीं पड़ती। खूबसूरत जंगल, जो अब से ठीक पहले, हमे अपने सम्मोहन में समेट रहा होता था, अब डरावना दिखलाई देने लगता है। एक अज्ञात भय, मन के किसी कोने में आकर सिमट जाता है। इस बदलते परिवेश में पर्यटक, वहाँ रात गुजारने की बजाय, अपने-अपने होटलों में आकर दुबकने लगता है, जबकि जंगल में रहने वाली जनजाति के लोग, बेखौफ़ अपनी झोपड़ियों में रात काटते हैं। वे अपने जंगल का, जंगली जानवरों का साथ छोड़कर नही भागते। जंगल से बाहर निकलने की वह सपने में भी सोच नहीं बना पाते। “जीना यहाँ-मरना यहाँ” की तर्ज पर ये जनजातियाँ बड़े सुकून के साथ अलमस्त होकर अपने जंगल से खूबसूरत रिश्ते की डोर से बंधे रहते हैं। 

अपनी माटी के प्रति अनन्य लगाव, और उनके अटूट प्रेम को देखकर एक सूक्ति याद हो आती है-” जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसी।”  जननी और जन्म- भूमि स्वर्ग से भी महान होती है” इस बात को फलितार्थ और चरितार्थ होते हुए यहाँ देखा जा सकता है। यदि इस अर्थ की गहराइयों तक कोई पहुँच पाया है, तो वह यहाँ का वह आदिवासी है, जिसे हम केवल जंगली कहकर इतिश्री कर लेते है। लेकिन सही मायने में वह “धरतीपुत्र” है, जो आज भी उपेक्षित है।
  


  गोवर्धन यादव.             
103,कावेरी नगर,छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480-001                       
 (अध्यक्ष, म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जिला इकाई,छिन्दवाड़ा.)
 मोबाईल-  094243-56400 E-mail-goverdhanyadav44@gmail.com

Apr 23, 2017

पृथ्वी दिवस- कभी धरती की बात भी सुन ले फायदे में रहेंगें



22 अप्रैल - पृथ्वी दिवस पर विशेष
धरती की डाक सुनो रे केऊ

मनुस्मृति के प्रलय खंड में प्रलय आने से पूर्व लंबे समय तक अग्नि वर्षा और फिर सैकङो वर्ष तक बारिश ही बारिश का जिक्र किया गया है। क्या वैसे ही लक्षणों की शुरुआत हो चुकी है ?  तापमान नामक  नामक डाकिये के जरिये भेजी पृथ्वी की चिट्ठी का ताजा संदेशा तो यही है और मूंगा भित्तियों के अस्तित्व पर मंडराते संकट का संकेत भी यही। अलग-अलग डाकियों से धरती ऐसे संदेशे भेजती ही रहती है। अब जरा जल्दी-जल्दी भेज रही है। हम ही हैं कि उन्हे अनसुना करने से बाज नहीं आ रहे। हमें चाहिए कि धरती के धीरज की और परीक्षा न लें। उसकी डाक सुनें भी और तद्नुसार बेहतर कल के लिए कुछ अच्छा गुने भी।

गौरतलब है कि मूुुगा भित्तियां कार्बन अवशोषित करने का प्रकृति प्रदत अत्यंत कारगर माध्यम हैं। इन्हे पर्यावरणीय संतुलन की सबसे प्राचीन प्रणाली कहा जाता है। हमारी पृथ्वी पर जीवन का संचार सबसे पहले मूंगा भित्तियों में ही हुआ। यदि जीवन संचार के प्रथम माध्यम का ही नाश होना शुरु हो जाये, तो समझ लेना चाहिए कि अंत का प्रारंभ हो चुका है। खबर है कि लाखों एकङ मूंगा भित्तियां  हम पहले ही खो चुके हैं। समुद्र का तापमान मात्र आधा इंच बढने से शेष मूंगा भित्तियों का अस्तित्व भी खतरे पङ जायेगा। यदि इस सदी में 1.4 से 5.8 डिग्री सेल्सियस तक वैश्विक तापमान वृद्धि की रिपोर्ट सच हो गई और अगले एक दशक में 10 फीसदी आधिक वर्षा का आकलन झूठा सिद्ध नहीं हुआ, तो समुद्रों का जलस्तर 90 सेंटिमीटर तक बढ जायेगा; तटवर्ती इलााके डूब जायेंगे। इससे अन्य विनाशकारी नतीजे तो आयेंगे ही, धरती पर जीवन की नर्सरी कहे जाने वाली मूंगा भित्तियां पूरी तरह नष्ट हो जायेंगी; तब जीवन बचेगा... इस बात की गारंटी कौन दे सकता है ? 

एटमोस्फियर, हाइड्रोस्फियर और लिथोस्फियर - इन तीन के बिना किसी भी ग्रह पर जीवन संभव नहीं होता। ये तीनो मंडल जहां मिलते हैं, उसे ही बायोस्फियर यानी जैवमंडल कहते हैं। इस मिलन क्षेत्र में ही जीवन संभव माना गया है। यदि इन तीनों पर ही प्रहार होने लगे.... यदि ये तीनों ही नष्ट होने लगें, तो जीवन पुष्ट कैसे हो सकता है ? परिदृश्य देखें तो चित्र यही है। जिस अमेरिका में पहले वर्ष में 5-7 समुद्री चक्रवात का औसत था, उसकी संख्या 25 से 30 हो गई है। न्यू आर्लिएंस नामक शहर ऐसे ही चक्रवात में नेस्तनाबूद हो गया। लू ने फ्रांस में हजारों को मौत दी। कायदे के विपरीत आबूधाबी में बर्फ की बारिश हुई। जमे हुए ग्रीनलैंड की बर्फ भी अब पिघलने लगी है। पिछले दशक की तुलना में धरती के समुदों का तल 6 से 8 इंच बढ गया है। परिणामस्वरूप, दुनिया का सबसे बङा जीवंत ढांचा कहे जाने वाले ग्रेट बैरियर रीफ का अस्तित्व खतरे में है। करीब 13 साल पहले प्रशांत महासागर के एक टापू किरीबाटी को हम समुद्र में खो चुके हैं। 

ताज्जुब नहीं कि वनुबाटू द्वीप के लोग द्वीप छोङने को विवश हुए। न्यू गिनी के लोगों को भी एक टापू से पलायन करना पङा। भारत के सुंदरबन इलाके में स्थित लोहाचारा टापू भी आखिरकार डूब ही गया।मात्र तीन दिन की प्रलयंकारी बारिश ने मुंबई शहर का सीवर तंत्र व जमीनी ढांचों की उनकी औकात बता ही दी थी। सुनामी का कहर अभी हमारे जेहन में जिंदा है ही। हिमालयी ग्लेशियरों का 2077 वर्ग किमी का रकबा पिछले 50 सालों में सिकुङकर लगभग 500 वर्ग किमी कम हो गया है। गंगा के गोमुखी स्त्रोत वाला ग्लेशियर का टुकङा भी आखिरकार चटक कर अलग हो ही गया। अमरनाथ के शिवलिंग के रूप-स्वरूप पर खतरा मंडराता ही रहता है। उत्तराखण्ड विनाश के कारण अभी खत्म नहीं हुए हैं। तमाम नदिया सूखकर नाला बन ही रही हैं। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड के अलावा भारी धातुओं के इलाके बढ़ ही रहे हैं। 

यह सच है कि अपनी धुरी पर घुमती पृथ्वी के झुकाव में आया परिवर्तन, सूर्य के तापमान में आया सूक्ष्म आवर्ती बदलाव तथा इस ब्राह्मंड में घटित होने वाली घटनायें भी पृथ्वी की बदलती जलवायु के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। लेकिन इस सच को झूठ में नहीं बदला जा सकता कि आर्थिक विकास और विकास के लिए अधिकतम दोहन से जुङी इंसानी गतिविधियों ने इस पृथ्वी का सब कुछ छीनना शुरु कर दिया है। जीवन, जैवविविधता, धरती के भीतर और बाहर मौजूद जल, खनिज, वनस्पति, वायु, आकाश.... वह सब कुछ जो उसकी पकङ में संभव है। दरअसल, नये तरीके का विकास.. भोग आधारित विकास है। यदि यह बढेगा तो  भोग बढेगा, दोहन बढेगा, कार्बन उत्सर्जन बढेगा, ग्रीन गैसें बढेंगी, तापमान बढेगा; साथ ही बढेगा प्राकृतिक वार और प्रहार। घटेगी तो सिर्फ पृथ्वी की खूबसूरती, समृद्धि। यह तय है। फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा कि विकास, भोग, दोहन, उत्सर्जन, तापमान सब कुछ बढाने वाले खुद सीमा में आ जायेंगे। पुनः मूषक भव ! यह भी तय ही है। अब तय सिर्फ हमें यह करना है कि पृथ्वी के जीवन की सबसे पुरानी इकाई तक जा पहुंचे इस संकट को लाने में मेरी निजी भूमिका कितनी है।

गौरतलब है कि अपने घरों में तरह-तरह के मशीनी उपाय बढाकर हम समझ रहे हैं कि हमने प्रकृति के क्रोध के प्रति अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढा ली है। लेकिन सच यह है कि हमारे शरीर व मन की प्रतिरोधक क्षमता घट रही है। थोङी सी गर्मी, सर्दी, बीमारी और संताप सहने की हमारी प्राकृतिक प्रतिरोधक शक्ति कम हुई है। अब न सिर्फ हमारा शरीर, मन और समूची अर्थव्यवस्था अलग-अलग तरह के एंटीबायोटिक्स पर जिंदा हैं। धरती को चिंता है कि बढ रहे भोग का यह चलन यूं ही जारी रहा, तो आने वाले कल में ऐसी तीन पृथ्वियों के संसाधन भी इंसानी उपभोग के लिए कम पङ जायेंगे। मानव प्रकृति का नियंता बनना चाहता है। वह भूल गया है कि प्रकृति अपना नियमन खुद करती है। धरती चिंतित इस प्रवृति के परिणाम को लेकर भी है। 

फिलहाल सरकारें क्या करेंगी या नहीं करेंगी; दुनिया के शक्तिशाली कहे जाने वाले देश जिस तरह दूसरे देशों के संसाधनों से आर्थिक लूट का खेल चला रहे हैं, बिगङते पर्यावरण के पीछे एक बङा कारण यह भी है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि आर्थिक साम्राज्यवाद के फैले जाल में फंस चुकों का निकलना इतना आसान नहीं। लेकिन निजी भोग व लालच के जाल से तो हम निकल ही सकते हैं। आइये, निकलें! इसी से प्रकृति और राष्ट्र के बचाव का दरवाजा खुलेगा; वरना् प्रकृति ने तो संकेत कर दिया है।

आज संकट साझा है... पूरी धरती का है; अतः प्रयास भी सभी को साझे करने होंगे। समझना होगा कि अर्थव्यवस्था को वैश्विक करने से नहीं, बल्कि ’वसुधैव कुटुंबकम’ की पुरातन भारतीय अवधारणा को लागू करने से ही धरती और इसकी संतानों की सांसें सुरक्षित रहेंगी। यह नहीं चलने वाला कि विकसित को साफ रखने के लिए वह अपना कचरा विकासशील देशों में बहाये। निजी जरूरतों को घटाये और भोग की जीवन शैली को बदले बगैर इस भूमिका को बदला नहीं जा सकता है। ''प्रकृति हमारी हर जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन लालच किसी एक का भी नहीं।'' - बापू का यह संदेश इस संकट का समाधान है। यह मानवीय भी है और पर्यावरणीय भी। 

यदि हम सचमुच प्रकृति के गुलाम नहीं बनना चाहते, तो जरूरी है कि प्रकृति को अपना गुलाम बनाने का हठ और दंभ छोड़ें। टेस्ट ट्युब बेबी का जनक बनने में वक्त न गंवायें। अजन्मी बच्चियों को बेमौत मारने का अपराध न करें। कुदरत को जीत लेने में लगी प्रयोगशालाओं को प्रकृति से प्राप्त सौगातों को और अधिक समृद्ध, सेहतमंद व संरक्षित करने वाली धाय मां में बदल दें। नदियों को तोङने, मरोङने और बांधने की नापाक कोशिश न करें। पानी, हवा और जंगलों को नियोजित करने की बजाय प्राकृतिक रहने दें। बाढ और सुखाङ के साथ जीना सीखें। जीवन शैली, उद्योग, विकास, अर्थव्यवस्था आदि के नाम पर जो कुछ भी करना चाहते हैं,करें... लेकिन प्रकृति के चक्र में कोई अवरोध या विकार पैदा किए बगैर। उसमें असंतुलन पैदा करने की मनाही है। हम प्रकृति को न छेङेंगे, प्रकृति हमें नहीं छेङेगी। हम प्रकृति से जितना लें, उसी विन्रमता और मान के साथ उसे उतना और वैसा लौटायें भी। यही साझेदारी है और मर्यादित भी। इसे बनाये बगैर प्रकृति के गुस्से से बचना संभव नहीं। बचें। अनसुना न करें धरती का यह संदेश। ध्यान रहे कि सुनने के लिए अब वक्त भी कम ही है।


अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली - 92
9868793799 

Apr 20, 2017

आस्था बचाने से रुकेगा गोवंश का कत्ल



संप्रदाय नहीं, मुनाफाखोरी है गोवंश की दुश्मन


उत्तर प्रदेश में बूचड़खानों को इस आधार पर बंद किया गया कि वे कानूनन अवैध थे। गोरक्षा के नाम पर हिंसात्मक कार्रवाई करने वालों को भी इसी आधार पर चुनौती दी जा रही है कि उनकी हरकत कानूनन अवैध व अमानीवीय है। गोरक्षा के लिए औजार के तौर पर मांग भी  गोवंश-कत्ल पर पाबंदी कानून के रूप में सामने आई है। किंतु दुखद है कि गोरक्षा के मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष के बंटवारे का आधार कानून अथवा मानवता न होकर, संप्रदाय व दलीय राजनीति हो गया है। हिंदू संगठन यह स्थापित करने में जुटे हैं कि हिंदू, गाय के पक्षधर हैं और मुसलमान, गाय के दुश्मन हैं। मुद्दे पर राजनैतिक दलों के बंटवारे का आधार यह है कि वे मुसलमानों के पक्षधर हैं अथवा हिंदुओं के। राजनैतिक विश्लेषक इसेे गाय अथवा संप्रदाय की पक्षधरता की बजाय, वोट को अपनी-अपनी पार्टी के पक्ष में खींचने की कवायद के रूप में देख रहे हैं। मेरा मानना है कि राजनीति, राज करने की नीति होती है। इसका गोवंश की रक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। लिहाजा, जब तक गाय पर राजनीति होती रहेगी, गोवंश की लौकिक नीति और परालौकिक रीति कभी न सुनी जायेगी और न गुनी जायेगी। 

सांप्रदायिक मसला नहीं है गोवंश का कत्ल

शांत मन से सुनने लायक आंकडे़ ये हैं कि भारत मेें गोवंश भी बढ़ रहा है और गोदुग्ध का उत्पादन भी। यदि कुछ घट रही है, तो बूढ़ी गायों की संख्या तथा बछङे व बैलों की वृद्धि दर। बछड़ों और बैलों की वृद्धि दर। वर्ष - 2012 में हुई शासकीय गणता बताती है कि 2007 की गणना की तुलना में गायों की संख्या में 6.52 प्रतिशत वृद्धि हुई है। वर्ष - 2012 में गायों की संख्या 1229 लाख दर्ज की गई। आंकङे गवाह हैं कि वर्ष 1966 से लेकर वर्ष 2015 तक सिर्फ वर्ष 1975 ही एक ऐसा वर्ष आया, जब पिछले वर्ष की तुलना में अगले वर्ष गाय के दूध का उत्पादन कम हुआ है; वरना् भारत में गाय के दूध का उत्पादन हर वर्ष बढ़ा ही है। 69 लाख, 18 हजार मीट्रिक टन (वर्ष 1966) की तुलना में छह करोङ, 35 लाख मीट्रिक (वर्ष 2015) टन हो गया। गोदूध उत्पादन की वर्तमान वृद्धि दर, 4.96 प्रतिशत है। इन आंकङों से यह भी स्पष्ट है कि मुद्दा गाय नहीं, गोवंश का कत्ल है। कत्ल भी सामान्य गाय की बजाय, बछङे, बैल और बूढ़ी गायों का ही ज्यादा है। चिंताजनक है कि बछङे तथा बैलों की वृद्धि दर में 12.75 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 

अब प्रश्न आता है गोवध और गोमांस बिक्री तथा खानपान के कारण क्षतिग्रस्त होती हमारी आस्था का। प्रश्न किया जाना चाहिए कि क्या गोमांस के लिए उपलब्ध सारा गोवंश, चोरी करके बेचा जाता हैं ? नहीं, वह बिक्री करके आता हैं। अगला प्रश्न है कि गोवध के लिए बूढ़ी गायों, बैलों और बछङों को बेचता कौन है ? क्या गोवंश बेचने वाले सभी गोपालक, गैर हिंदू हैं ? क्या सभी गो विक्रेता, गोमांस विक्रेता, खरीददार और कत्लखानों के मालिक सिर्फ मुसलमान हैं ? नहीं, तो फिर गोवंश का कत्ल, एक संप्रदाय विशेष के विरोध का मसला कैसे हो गया ? 

अतः विनम्र निवेदन है कि गाय पर राजनीति कभी भी न की जाय। इसे राजनैतिक अथवा सांप्रदायिक वर्चस्व का हथियार बनने से सदैव रोका जाय। गोकशी करने वालों को मौत के घाट उतार देने से भी गोवंश की रक्षा संभव नहीं है। पाबंदी कानून बनाने से पहले सुनिश्चित करना होगा कि गोपालक बछड़ों तथा बूढे़-बीमार गोवंश को कसाइयों के हाथों बेचने की बजाय, जब तक वे जिंदा हैं, उनकी सेवा करें। क्या भारत का गोपालक समाज इतना आस्थावन है कि इसकी कसम ले सके ? यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। वरना् पाबंदी कानून का उल्ट नतीजा यह होगा कि छुट्टा छोड़े गोवंश के कारण कई इलाकों में खेती करना मुश्किल हो जायेगा। नीलगायों को लेकर हमारा रवैया और उन्हे मारने को लेकर जारी आदेशों से हम परिचित हैं ही।  

आज का हमारा सच यही है। क्या हम इसे नकार सकते हैं ? यदि नही तो मैं कहूंगा कि भाई, गोमांस पर पाबंदी कानून बनाने अथवा संपद्राय विशेष को जिम्मेदार ठहराने मात्र से गोवंश की रक्षा संभव नहीं है। 

गांधी जी की गाय पर प्रबल आस्था थी। गांधी जी ने एक जगह कहा - ''गाय के नष्ट होने के साथ, हमारी सभ्यता भी नष्ट हो जायेगी। गाय की रक्षा करो, सब की रक्षा हो जायेगी।'' गोरक्षा को महत्वपूर्ण मानते हुए ही गांधी जी ने एक समय जमनालाल बजाज जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को गोशालाओं की जिम्मेदारी सौंपी। इस आस्था के बावजूद गांधी ज़मीनी हकीकत से परिचित थे। अतः एक फरवरी, 1942 में गो-पालकों की सभा को संबोधित करते हुए उन्होने चेताया था - ''मुसलमानों से गोकशी छुङाने के लिए उनका विरोध किया जाता है। गायों को बचाने के लिए इंसानों का खून तक हो जाता है। लेकिन मैं बार-बार कहता हूं कि मुसलमानों से लङने से गाय नहीं बच सकती।''

मेरा मानना है कि गाय को सांप्रदयिक अथवा राजनैतिक वर्चस्व का हथियार बनाने से गोेवंश की भला होने की बजाय, बुरा ही होगा। मेव, वनगुर्जर, बक्करवाला, धनगड़, गडरिया, बंजारा से लेकर तमाम हिंदू-मुसलिम पारंपरिक मवेशीपालक समुदायों में से गैर हिंदू समुदाय के मन में भेद पैदा हो सकता है कि गाय तो हिंदुओं की है, वे क्यों पाले-पोसें। अलवर के मेवों ने गाय वापसी अभियान चलाकर इस विभेद का इजहार भी शुरु कर दिया है। विभेद की बेङियां, अक्सर बाधा बनकर हमारी गति रोकती रही है। इन बेङियों को काटकर ही भारत, विकास की समग्रता और गति अनवरत् बनाये रख सकता है।

कितनी उचित, मुनाफे के आधार पर पैरोकारी ?

बुनियादी प्रश्न है कि गोवंश का कत्ल कैसे रुके ? क्या मुनाफे का गणित बताकर यह संभव है ? याद कीजिए कि महात्मा गांधी जी ने भी गाय से मुनाफे के गणित को दुरुस्त करने का रास्ता बताने की कोशिश की थी। उन्होने अधिक दूध देने वाली गायों की बात की थी। गोशालाओं में खेती और गोपालन की शिक्षा व महत्ता बताने का भी प्रबंध की बात कही थी। अच्छे सांडों को रखने की सलाह दी थी। गोमृत्यु के बाद, उसके चमङे, हड्डी, मांस और अंतङियों का उपयोग करने की सलाह दी थी। हर गोशाला के साथ चर्मशाला की बात भी वह कहते थे। गांधी जी ने अपने आश्रम में ऐसी व्यवस्था भी की थी। गोसेवा संघ के सदस्यों के लिए शर्त थी कि वे गाय का ही दूध, दही, घी आदि सेवन करेंगे तथा मुर्दा गाय-बैल का चमङा काम में लायेंगे। किंतु सच यह है कि गांधी जी को खुद भी यकीन नहीं था कि गणित के बल पर गोवंश को बचाया जा सकेगा। इसीलिए वे यह बताना कभी नहीं भूले कि गोशालाओं का काम, दूध का व्यवसाय करना नहीं है। उनका काम सूखे, बूढ़े और अपाहिज गोवंश का पालन करना है। मुझे लिखते हुए अफसोस है कि गोवंश के अत्यंत विद्वान पैरोकार भी आज गाय को गोधन अथवा गो सम्पदा कहकर पेश कर रहे हैं। वे हमें समझाते हैं कि गाय से प्राप्त होने वाले तत्वों में पोषक तत्व और औषधीय गुण कितने उम्दा हैं; गोवंश से हमें कितना मुनाफा है। ऐसे में यदि हमारे गोपालक, नफा-नुकसान के गणित पर गोपालन की लौकिक व्यवहार नीति तय कर रहे हैं, तो अफसोस क्यों ?

व्यवहार यह है कि ज्यादातर इलाकों में ट्रैक्टर ने बैल की जगह ले ली है। बैल-बछडे. से चलने वाले टयुबवैल हैं, लेकिन हम उसे बढ़ावा नहीं दे रहे। मुनाफे का कुल गणित दूध, गोबर, गोमूत्र और बछिया संतान पर आकर टिक गया है। गाय के कारण सकारात्मक ऊर्जा, देवत्व का भाव आदि अदृश्य मुनाफे की बातें उनके गणित में शामिल नहीं है। गाय का दूध लाख पौष्टिक हो; दूध के दाम, वसा के मानक पर तय करने का बाजार नियम है। अधिक वसायुक्त होने के कारण, भैंस का दूध, गाय के दूध से मंहगा बिकता है। गाय कम दूध देती है; भैंस ज्यादा दूध देती है। इसी कारण गाय सस्ती बिकती है; भैंस महंगी बिकती है। गाय के सस्ता होने के कारण जिन इलाकों में चारागाह नहीं बचे हैं; जिन इलाकों में गेहूं जैसी चारा फसलों की खेती न के बराबर होती है; जिन किसानों का जोर पूरी तरह नकदी फसलों पर है अथवा चारे का संकट है, वे दूध न देने के दिन आने पर गाय को छुट्टा छोङ देते हैं अथवा बेच देते हैं। वे सोचते हैं कि जितने रुपया का चारा गाय-बछङे को खिलायेंगे; दूध खरीदकर पीयेंगे, उतने में तो दूसरी गाय ले आयेंगे। कम पानी और चारे के दिनों में गाय को इंजेक्शन लगाकर मरने के लिए छोड़ देने की प्रवृति से हम वाकिफ हैं ही। मुुर्गा, मछली आदि अन्य की तुलना में गोमांस सस्ता बिकता है; इस कारण भी जिंदा गोवंश से ज्यादा मुर्दा गोवंश की बिक्री ज्यादा हैं।

सच मानिए, नफा-नुकसान के इस गणित के कारण ही बिना दूध की गायें, आज बिकने को विवश हैं और बछङे, कटने को। इसी गणित के कारण, मवेशी दूध कम दे, तो बिक्री जाने वाले दूध में कटौती नहीं की जाती, घर के बच्चे के दूध में कटौती कर दी जाती है। इसी गणित के कारण, संताने आज मां-बाप को बोझ मानती दिखाई दे रही हैं। इसी कारण हर रिश्ते का मानक नफा-नुकसान हो गया है। इसी गणित को पेश करने के कारण, पोषण करने वाली पृथ्वी के पंचतत्वों का शोषण बेतहाशा बढ़ गया है; करोङों खर्च के बावजूद गंगा की मलीनता बढ़ गई है; प्रवाह घट रहा है; तो गोवंश क्यों नहीं घटेगा ? यह सबके शुभ को छोङकर, सिर्फ लाभ की परवाह करने वाला नया व्यापारिक और निहायत व्यक्तिवादी चरित्र है। इस चरित्र के रहते माताओं का संरक्षण कदापि नहीं हो सकता।

गाय मां है, मुनाफा कमाने की कोई वस्तु नहीं

लाख मुनाफा हो, तो भी मातायें मुनाफा कमाने की वस्तु नहीं हैं। यह परालौकिक भाव है। समझना होगा कि इस परालौकिक भाव होने पर हम पत्थर को भी पूज्यनीय मानकर, हर हाल में संजोते है। इस परालौकिक भाव ने ही सदियों से गो, गंगा, गायत्री को संजोने का लौकिक कार्य किया है। यह भाव कोई मोलभाव नहीं करता, न तर्क मांगता है; यह सिर्फ समर्पण करता है। इसका एकमेव आधार, श्रृद्धा होता है। श्रृद्धा, विश्वास से आती है। विश्वास, व्यवहार से आता है। व्यवहार का आधार, हमेशा हमारा चरित्र ही होता है। सहअस्तित्व और सहजीवन, सिर्फ सहायक तत्व होते हैं। परिस्थिति भी, हमेशा इसका अपवाद पेश नहीं कर पाती। आज भी यह भाव पूर्णतया मरा नहीं है। सिर्फ इस भाव का ह्यस हुआ है। हम गो, गंगा और अपनी जन्मना मां को मां मानते जरूर हैं, किंतु संतानवत् व्यवहार करना लगभग भुला दिया हैं। कटु सत्य है कि धर्मसंसदों में भी इनके खूब जयकारे हैं, लेकिन ज़मीनी सरोकार के नाम पर, सिर्फ जुबानी फव्वारे हैं। संरक्षण के नाम पर खुल रही फंड आधारित गोशालाओं को हमारा ’एनजीओ चरित्र’ ले डुबा है। इसका कारण न राजनीति है और न लोकनीति, यह विशुद्ध रूप से हमारे चारित्रिक और सांस्कृतिक गिरावट का परिणाम है। इसे मुनाफा नहीं, चारित्रिक शुचिता की दरकार है। 

अतः गोवंश के पैरोकार, यदि सचमुच गोमाता की समृद्धि चाहते हैं, तो गणित बताना तथा राजनीति व संप्रदाय की फांस लगाना बंद करें; जीव-जीव और जीव-जड़ के परालौकिक संबंधों की शुचिता बताना और अपने व्यवहार में शुचिता बढ़ाना शुरु करें; तभी मां के प्रति हमारा व्यवहार बदलेगा; शुचितापूर्ण संबध का संस्कार पुनर्जीवित होगा और गो, गंगा, गायत्री, पृथ्वी से लेकर हमें जन्म देने वाली माता तक की रक्षा हो सकेगी।







अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-110092
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150 बरस पहले बहराइच के जंगलों में रहता था मोगली

विलियम स्लीमैन 

ब्रिटिश अफसर विलियम स्लीमन ने उत्तर भारत खोजे थे कई वुल्फ बॉय-

कतरनिया घाट में मिली वन दुर्गा ही नहीं है अकेली, जानवरों संग पले मानव-बच्चों के दर्जनों है उदाहरण-

उत्तर भारत में मोगली के कई किस्से, मौजूदा दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगलों में भी मिले वुल्फ ब्वाय 




बात ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार के दिनों की है, जब एक युवा ब्रिटिश आफीसर बंगाल आर्मी में एक सैनिक के तौर पर नियुक्त हुआ, उसका नाम था विलियम हेनरी स्लीमैन, बाद में इन्होने 1914  में नेपाल वार में बहादुरी से हिस्सा लिया, नतीजतन इन्हे कैप्टन का ओहदा हासिल हुआ, बाद में इन्हे मध्य भारत में ठगों के विशाल गिरोह को ख़त्म करने के लिए भेजा गया, जहां इन्होने भारत के उन सभी दुर्दांत ठगों को ख़त्म कर दिया जिन्होंने अपने जीवन में हज़ारों हत्याएं, लूट और डकैतियां की थी, स्लीमैन का ओहदा अब लेफ्टिनेंट कर्नल का था, जब विलियम स्लीमैन मध्य भारत में थे तब जबलपुर के आसपास के इलाकों में ओटेहीटी गन्ने की बुआई शुरू करवाई, गन्ने की इस खेती का परिचय मध्यभारत में सर्व प्रथम विलियम स्लीमैन को जाता है, इस विषय पर कभी और चर्चा, हाँ यही जबलपुर के पास मध्यप्रदेश में कटनी जिले में एक कस्बा इनके नाम से बसा जिसे स्लीमनाबाद कहते हैं, कर्नल स्लीमैन ठगों को ख़त्म करने के लिए यहाँ आये थे और जबलपुर को अपना हेडक़्वार्टर बनाया था, फिलहाल स्लीमैन को गवर्नर जरनल की तरफ से सन्देश आया की उन्हें अवध रियासत का रेजिडेंट आफिसर बनाया जाता है, और यह वक्त था सन 1939 का, विलियम स्लीमैन ने पूरे उत्तर भारत की यात्रा की और यहाँ की परम्पराओं, धर्म, जातियों, बोलियों और कहानियों का अध्ययन किया, उन्हीं कहानियों में से कुछ कहानियों हैं मोगली की, जी  हाँ यह वही मोगली की कहानी है जिसे रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी किताब जंगल बुक के जरिए पूरी दुनिया को सुना डाली, यहाँ एक गौरतलब बात यह है की रुडयार्ड ने जिन भारतीय जंगलों का जिक्र किया है वह जबलपुर के आस-पास, खासतौर से पचमढ़ी और सेवनी के हैं और इस जगह रूडयार्ड कभी नहीं आये, विलियम स्लीमैन ने इन मध्य प्रदेश के जंगलों का भी विस्तृत ब्यौरा दिया है, और स्लीमैन के ही वास्तविक कार्य को आधार बनाकर रूडीयार्ड किपलिंग ने जंगल बुक लिखी, चलिए अब हम बात करते हैं अवध की यानी आज का उत्तर प्रदेश, जहां विलियम स्लीमैन ने गोमती और घाघरा के किनारे के जंगलों में कई मोगली खोजे जो उनकी किताबों और शोध पत्रों में प्रकाशित हुए.

एक जमाने में कुछ समुदायों के लोग जंगली जीवों को मारते थे, भोजन के लिए वह उन जीवों के मांस पर आश्रित रहते थे, उसी वक्त विलियम हेनरी स्लीमैन उत्तर भारत के भ्रमण पर थे और उनके पास इस बात के संदेशे आते की बच्चे गायब हो रहे हैं,  बच्चे तो नही मिलते पर भेदियों की मांदो से बच्चों को पहनाये जाने वाले जेवर जरुर मिल जाते, और इसलिए इस समुदाय के लोग भेदियों की मादें खोजते और फिर उनकी खुदाई करते ताकि उन्हें चांदी या सोने के कुछ आभूषण मिल सके, और यही बात साबित करती थी की भेडियों की मांदों में बच्चे रहते हैं और जीवित हैं, मादा भेड़िया उन मानव बच्चों का पालन पोषण और सुरक्षा अपने बच्चों की तरह करती हैं.

सबसे हम चलते हैं उस वक्त की सुल्तानपुर से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर गोमती के किनारे, जहाँ रियासत का एक सिपाही अपने घोड़े पर सवार उस इलाके से गुजर रहा था तभी अचानक उसने एक बच्चे को भेड़िए के बच्चों के साथ नदी में पानी पीते देखा, वह बच्चा भी भेड़ियों की तरह पानी पी रहा था, जब घुड़सवार उनके नजदीक बढ़ा तो वह बच्चा और भेड़िए के तीन बच्चे एक साथ भाग पड़े, घुड़सवार अभी तक यह सोच रहा था की वह बच्चे को बचा ले नहीं तो दूर खड़ी भेड़िए के बच्चों की मां उसे मार डालेगी, लेकिन जब वह बच्चा भागा तो वह अपने हाथो का इस्तेमाल चौपाया जानवरों की तरह अगले पैरों की तरह कर रहा था, और वह भेड़िए के बच्चों के साथ, मांद में घुस गया, उस सैनिक ने गाँव वालों को इकट्ठा किया, और उस मांद की खुदाई शुरू करवाई तकरीबन आठ फ़ीट गहरी मांद थी, खुदाई और शोर मचाने से वे भेड़िए के बच्चे के साथ वह मानव बच्चा भी बाहर निकलकर भागा, लेकिन सिपाही ने उसे पकड़ लिया और गाँव ले आया... जहाँ उसे देखकर भीड़ इकट्ठा हुई, वह रस्सियों से बंधा था बावजूद इसके वह जंगली आवाजें निकालता और छुड़ाने की कोशिश करता, कोई आदमी नजदीक आता तो चौकन्ना हो पीछे हट जाता, और यदि बच्चा सामने आ जाता तो कुत्ते की तरह गुर्राता और उसपर हमला कर देता, उसे खाने के लिए रोटी दी गयी नहीं खाया, बल्कि कच्चा मांस देने पर वह जमीन में झुककर अपने दोनों हाथ जमीन पर टिकाकर उस मांस को खाने लगता, यदि खाते वक्त कोई इंसान उसके नज़दीक आ जाता तो वह गुर्रा पड़ता किन्तु जब कोई कुत्ता आ जाता तो वह कतई प्रतिकार नहीं करता और उसे अपने साथ खा लेने देता, बाद में उस सिपाही ने उस वुल्फ ब्वाय को राजा हसनपुर के हवाले किया, राजा साहब ने अपने एक नौकर को उस जंगली बच्चे की जिम्मेदारी सौंप दी, लेकिन वह बच्चा न तो कपडे पहनता, लाख कोशिशों के बाद वह कुछ भी नहीं बोलता, कपड़ों को फाड़कर उन्हें खाने की कोशिश करता, स्लीमैन लिखते है की दूध या छांछ वह बिना श्वांस लिए पी जाता, बाद में राजा हसनपुर ने इस बच्चे को सुल्तानपुर मिलेट्री कैम्प में कैप्टन निकोलस के पास भेज दिया, यह बच्चा  इंसान के बजाए कुत्ता, सियार आदि चौपाओं के साथ खेलना पसंद करता।




दीना शनिचरा 
कुछ वर्ष पहले सुल्तानपुर के एक गाँव चुपरा का एक किसान अपने परिवार के साथ खेतों में काम कर रहा था, तभी जंगलों से निकलकर एक भेड़िया आया और खेत में एक जगह सोते हुए तीन साल के बच्चे को उठा ले गया, उसकी माँ और पिता दोनों उस जानवर के पीछे दौड़े लेकिन घने जंगलों में बच्चे का कोई नामोनिशान नहीं मिला, यह वाकया मार्च 1843 का है, इसके छह साल बाद फरवरी 1850 में सिंगरामऊ के पास दो सिपाहियों ने एक स्थानीय नदी में तीन भेड़ियों के साथ एक बच्चे को देखा जो नदी में कुत्ते की तरह पानी पी रहा था, और उन सिपाहियों ने बच्चे को पकड़ लिया जो लगभग 9 साल का रहा होगा, सिपाही उसे कोइलीपुर बाज़ार ले आये और वहां भीड़ ने इस वुल्फ ब्वाय को देखा, बहुत लोगों ने उसे खिलाने की कोशिश की, वह बच्चा कई दिन तक बाजार में रहा लोग उसे देखते चिढ़ाते, कुछ खाने को देते, तभी छपरा गाँव के एक आदमी ने उस बच्चे को देखा, और गाँव जाकर उसने इस बात की चर्चा की, गाँव की वह किसान बुढ़िया ने भी यह बात सुनी तो दौड़कर उस आदमी के पास आई और उससे बच्चे का हुलिया पूछा साथ यह भी पूछा की क्या उस बच्चे के दाहिने हाथ पर कोई काला दाग है, जो जन्म से था, बात सही निकली आदमी ने उस दाग की तस्दीक़ की, बुढ़िया का पति तब तक मर चुका था वह अकेले कोइलीपुर बाज़ार पहुंची और उस बच्चे को अपने साथ लिवा लाई, लेकिन वह बच्चा कोहनी और घुटनों के बल ही चलता, जिससे वहां की खाल सख्त और काली पड़ चुकी थी, कच्चा मांस ही खाता जिस कारण उसके पूरे शरीर से बदबू आती, बावजूद इसके माँ की ममता उसे पालती रही, गाँव वालों का सहयोग भी मिला, किन्तु रात होते ही वह बच्चा जंगल में भाग जाता, माँ के पास आता तो सिर्फ इसलिए की खाने को कुछ मिल सके, उसे कोई लगाव या आत्मीयता नहीं थी उस बूढी माँ से... यह घटना भी स्थानीय जमींदार, अफसरों द्वारा पुष्ट है.



आमला-कामला 
1843 में सुल्तानपुर जनपद के लगभग 30 किलोमीटर पश्चिम में घुटकरी में एक जंगली बच्चा देखा गया, वह भी अपने घुटनों और कोहनियों के सहारे चलता, आदमियों को देखकर गुर्राता, इस बच्चे को भी जंगल से एक चरवाहा लेकर आया जब वह एक भेड़िए के साथ जंगल में घूम रहा था, बाद में इस बालक को अवध लोकल इन्फैंट्री सुल्तानपुर के कमांडर कर्नल ग्रे ने अपने पास बुलवाया, जहाँ सेना के तमाम अफसरों और उनके परिवारों ने इस जंगली बच्चे को देखा, एक दिन चरवाहा अपनी भेड़ों को जंगल किनारे घास चरा रहा था, तभी उसे नींद आ गयी, और यह जंगली बच्चा जंगल में भाग गया, दुबारा इस बच्चे का पता लगा या नहीं यह रिकार्ड में दर्ज़ नहीं है. 



कमला 
सुलतानपुर में गोमती के किनारे के जंगलों और झुरमुटों में बहुत से मोगली बच्चे देखे गए, और उनकी पुष्टि ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज अफसरों, स्थानीय राजाओ और जमींदारों ने की, उत्तर प्रदेश में ऐसी बहुत सी रोचक घटनाए हैं जिनमे एक ऐतिहासिक घटना है बहराइच जनपद की, जहाँ अभी कुछ दिन पहले मंकी गर्ल या मोगली गर्ल मिली, यह जंगली इलाके में घाघरा जैसी विशाल नदी गुजरती है, और इन जंगलों का काफी बड़ा हिस्सा कतर्नियाघाट वन्य जीव विहार अब दुधवा टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है,  इसी बहराइच के जंगलों में सन 1841 के आसपास बौड़ी  (बमनौटी) के करीब घाघरा नदी के बाईं ओर के जंगली इलाके में अवध सरकार के एक सैनिक ने एक बच्चे और दो भेड़ियों को एक साथ एक जंगली जलधारा में पानी पीते देखा, उसने बच्चे को दौड़कर पकड़ने की कोशिश की, वह बच्चा हाथ तो आया लेकिन उस सिपाही की वर्दी दाँतों से फाड़ डाली, और उसे कई जगह काट लिया, सैनिक ने उस बच्चे को घोड़े पर बिठाने की कोशिश की पर नाकाम रहा, आखिरकार उसने बच्चे के दोनों हाथ बाँध दिए और बौड़ी ले आया जहां के राजा हरदत्त सिंह के सामने उस जंगली बच्चे को पेश किया, राजा ने उसे रस्स्सियों से बंधवाया, और खाने को कच्चा गोश्त दिया, वह राजा के पास तीन महीने तक रहा, इस बीच यह बच्चा रस्सी दाँतों से काटकर कई बार भागने की कोशिश कर चुका था, अंतत: राजा तंग आ चुका था और इस बच्चे को एक कश्मीरी भांड (हास्य-विनोद करने वाला पेशेवर) को सौंप  दिया, यहाँ भी यह बालक तकरीबन छह महीने रहा, आखिरकार यह कश्मीरी भी तंग आ गया इस बच्चे से, तभी सनोअल्लाह नाम का कश्मीरी व्यापारी बूंदी के राजा हरदत्त सिंह के यहाँ आया कश्मीरी शाल बेंचने, उसे भी यह वाक़या बताया गया, सनोअल्लाह के पास कई खिदमतगार थे, उनमें से एक था जानू, जानू ने इस बच्चे की परवरिश का जिम्मा ले लिया, बच्चे को अपनी जिम्मेदारी में लेने का किस्सा भी बहुत मार्मिक है, वह कश्मीरी भाड़ जब तंग गया बच्चे से तो उसने उसे खुला छोड़ दिया, अब वह बौड़ी बाज़ार में इधर उधर घूमता, लोगों के लिए यह कौतूहल का विषय था, कभी किसी गोश्त की दूकान से गोश्त का टुकड़ा उठाकर भागता तो कभी बनिए की दूकान से कोई भी सामान लेकर भाग जाता एक दिन एक बनिए ने इस बच्चे पर एक तीर चला दिया जो इसकी जांघ पर लगा, इसी वक्त वह कश्मीरी व्यापारी अपने नौकरों के साथ बाज़ार में घूम रहा था, इसके नौकर जानू ने जब बच्चे की यह दशा देखी तो उसने बच्चे को अपने साथ ले लिया, उसकी जांघ में लगे तीर को निकाला और उस घाव पर पट्टी की, इस बच्चे को जानू एक आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर लिटाता, मगर उसे चारपाई सहित पेड़ से बाँध देता ताकि यह भाग न पाए, इस बच्चे के जिस्म से बहुत दुर्गन्ध आती, जानू ने सरसों के तेल की मालिश शुरू की, लेकिन यह गंध तब भी ख़त्म नहीं हुई, कई हफ़्तों बाद जानू ने इस बच्चे को चावल दाल और रोटी खिलाने में सफलता प्राप्त कर ली, नतीजतन इसके शरीर से बदबू भी लगभग गायब हो गई, जानू इसके घुटनो और कोहनियों में खूब तेल रगड़ता जिससे इसके सख्त हो चुकी कोहनिया और घुटने मुलायम हो जाए, क्योंकि यह बच्चा अपने हाथों के भल ही चलता था, जानू की इस करुणाभरी सेवा ने बच्चे को अपने दो पैरों पर चलना भी सिखा दिया। जानू ने चार महीनों में इस बच्चे के मुहं से गर्राहट भरी आवाज़ के अतिरिक्त कुछ नहीं सुना बस एक दो बार यह इसने अबुदिया कहा? जी हाँ यह नाम था उस कश्मीरी भाड़ की लड़की का जहाँ पहले यह बालक छह महीने रहा था,  लेकिन जानू ने इन चार महीनों में एक और सफलता पा ली थी अब यह बच्चा जानू से लगाव दर्शाने लगा था, और जानू के हुक्के में कोयले की आग भी भर लाता था.


Photo Courtesy: John Charles Dollman
इसी बीच एक और दिलचस्प वाक़या हुआ, आम के पेड़ के नीचे यह बच्चा लेटा हुआ था कुछ दूर पर जानू और कश्मीरी व्यापारी का सिपाही मीर अकबर अली भी सो रहे थे, तभी जानू को कुछ आहत सुनाई दी जानू ने उठकर देखा की दो भेड़िए उस बच्चे के साथ खेल रहे हैं, तभी अकबर अली भी उठ गए, और उन्होंने अपनी बन्दूक उठा ली लेकिन जब देखा की वह भेड़िए उस बच्चे को चाट रहे हैं, और उसके सिर  पर अपने पंजे रख रहे हैं और तीनो मगन है इस खेल में तो उन्होंने अपनी बन्दूक रख दी और इस इंसानी बच्चे और भेड़ियों के स्नेह को एकटक देखते रहे, मगर यह सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ दूसरी रात तीन भेड़िए आये और तीसरी रात चार ! यह सिलसिला चलता रहा और वह बच्चा हर रात उन्ही के साथ खेलता, बहुत खदेड़ने पर ये भेड़िए वापस जाते, दरअसल पहले दो भेड़िए वो रहे होंगे जब उस बच्चे को उस सैनिक ने नदी के किनारे से पकड़ा था, और तब भी उन भेड़ियों के बच्चों ने विरोध किया था उस सैनिक पर गुर्रा कर, अब यह बड़े हो चुके थे किन्तु बच्चे की गंध से इन्होने अपने बचपन के साथी को खोज निकाला था, अब यह खेल ख़त्म होने वाला था क्योंकि जानू का मालिक सनोअल्लाह अब लखनऊ जाने की तैयारी में था, सो एक दिन व्यापारी का यह दल यहाँ से लखनऊ की तरफ कूच कर दिया, जानू ने इस जंगली बच्चे को भी अपने साथ लिया और उसके सिर पर कपडे की गठरी रख दी, यह बच्चा जहाँ भी घने जंगल से गुजरता गठरी फेंक कर भागता, जानू और व्यापरी के नौकर उसे पकड़ कर लाते, उसकी पिटाई भी करते और दोबारा गठरी लेकर चलने को कहते लेकिन कुछ देर बाद  वह बच्चा फिर गठरी फेंक देता और भागता, इसतरह बमुश्किल यह यात्रा लखनऊ आकर समाप्त हुई, जहाँ यह बच्चा व्यापारी के घर पर जानू के साथ रहता, जानू ने इसे कुछ कपडे पहनाना भी शुरू कर दिया था पर यह अब भी पतलून फाड़कर फेंक देता था, हाँ यहाँ स्नेह की एक मार्मिक बात रह गयी बताने को, जब बौड़ी से सनोअल्लाह ने चलने का हुक्म दिया तो जानू ने इरादा कर लिया की अब वह व्यापारी की नौकरी छोड़ देगा, क्योंकि व्यापारी इस बच्चे को साथ ले चलने में आपत्ति कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सनोअल्लाह ने जानू को इस बच्चे को अपने साथ लाने की इजाजत दे दी.

कुछ दिनों बाद सनोअल्लाह ने जानू को दो दिन के लिए लखनऊ से दूर किसी व्यापारिक कार्य से भेज दिया और जब जानू वापस आया तो वहां वह बच्चा नहीं था, उसे बताया गया उसके जाने के बाद उसी रात वह कहीं चला गया, कहानी ने फिर एक दिलचस्प मोड़ लिया, बौड़ी रियासत की एक महिला जो चुरैरोकोटरा की रहने वाली थी लखनऊ सनोअल्लाह के घर आई और साथ में राजा हरदत्त का पत्र भी, जिसमे लिखा था की जानू जिस जंगली बालक को अपने साथ ले गया है वह इस औरत का बेटा है, जो तब चार साल का था जिसे आज से पांच छह वर्ष पहले भेड़िया उठाकर ले गया था, शिनाख्त के लिए औरत के बताए निशान थे जो बालक के सीने पर और माथे पर थे, बात सच्ची निकली सभी ने यह निशान उस बच्चे के शरीर पर देखे थे, लेकिन अब वह बच्चा वहां नहीं था, वह औरत कुछ महीनों बाद फिर लखनऊ उस व्यापारी के घर गयी की शायद उसका खोया हुआ बेटा मिल जाए, पर उसे खाली हाथ लौटना पड़ा. जानू के साथ यह बच्चा कुल पांच महीने रहा, वह उसे पुत्रवत स्नेह करने लगा  था,तमाम आदतों में भी परिवर्तन आया था, लेकिन कहीं भी खुजलाहट होने पर अभी भी वह बच्चा किसी पेड़ या दीवार से ही अपने शरीर को रगड़ता था. यह बच्चा लगभग दस वर्ष का था जब इसे उठाया गया तब इसकी उम्र चार बरस थी और इस बीच छह वर्षों में उस मादा भेड़िए ने पांच यह छह बार बच्चे दिए जिन सभी के साथ यह बच्चा रहा और इसी का नतीजा बनी उस बाग़ की घटना थी की वे भेड़िए के बच्चे जो अब बड़े हो चुके थे अपने साथी यानी इस इंसान के बच्चे को नहीं भूले जो उनकी माँ इन सभी के साथ इसे भी दूध पिलाती थी, शायद जानवर की फितरत में भूलना नहीं होता... 

यहां यह बताना जरुरी हो जाता है की उत्तर प्रदेश खासतौर से अवध खेत्र में भेड़िए द्वारा पाले गए बच्चो की तादाद बहुत है, इसकी वजह हैं यहाँ के जंगल, झाड़ियाँ, मांद बनाने की उपयुक्त धरती और नदियों का सुन्दर जाल, इन वजहों से भेड़ियों की तादाद अवध प्रांत में सबसे अधिक थी, अक्सर मानव आबादी में भेड़ियों के घुसने के किस्से सुनने को मिलते हैं आज भी, उस वक्त भेड़िए बच्चे ही नहीं बकरी जैसे पालतू जानवरों को भी उठा ले जाते थे, गाँवों में खुले हुए घरों और झोपड़ियों में ये जंगली जानवर आसानी से घुस जाता था, आज भी उत्तर प्रदेश की तराई में मानव द्वारा किए गए शिकार और जंगलों की कटाई के बावजूद भेड़िए, सियार मौजूद हैं, इंसान ने तराई से वन-कुत्ते जरूर समाप्त कर दिए, और भी प्रजातियां संकट में है, मानव की बढ़ती आबादी और उसके प्राकृतिक दोहन के वीभत्स तरीकों से... खैर विलियम स्लीमैन लिखते हैं की जब मादा भेड़िए के बच्चे मर जाते है तो उसके दुग्धपान न होने से उसे पीड़ा होती है, और फिर वह किसी इंसानी बच्चे को उठा लाती है, वैसे इसके अतरिक्त भी कई कारण होते है जानवर इंसानी बच्चो को अमूनन नुक्सान नहीं पहुंचाते और उनमे मातृत्व भाव अत्यधिक होता है, भेड़िया मांड में इस बच्चे को रखता है, उसके अन्य बच्चो के साथ या फिर अगली पीढ़ी के बच्चो के साथ वह रहता है क्योंकि इंसानी बच्चे का विकास भेड़ियों के बच्चो के विकास से धीमा होता है इस लिए इंसानी बच्चा मादा भेड़िए के साथ कई वर्ष रहने पर अपने दर्जनों दूध के रिश्ते के भाइयों का साथी बन जाता है, लेकिन कभी किसी भेड़िया मानव का किस्सा प्रकाश में नहीं आया, इसकी वजह है की जब तक वह मानव बच्चा कम उम्र का होता है और अपने दोनों हाथों के भल दौड़ लगाता है तो उसकी ऊंचाई और भेड़िए की ऊंचाई में कोइ खासा फर्क नहीं होता, साथ ही जब उम्र बढ़ती है तो वो फुर्ती और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घटती है, साथ ही भोजन की मात्रा भी बढ़ जाती है जो वुल्फ ब्वाय के लिए मुश्किलें खड़ी कर देती है, पर इन सबसे हटकर जो मौजू बात है वह है, की मानव बच्चे को जब मादा भेड़िया अपने बच्चे की तरह पालता है वह भेड़िया दस वर्ष के अंदर ही मर जाता है, जाहिर है भेड़िए की उम्र 7 या आठ वर्ष होती है, ऐसे में वह मानव बच्चा सच कहे तो अनाथ होता है और उसे अन्य भेड़िए या अन्य जंगली जानवर मार देते हैं, चूँकि अतीत में ऐसे बच्चे की लाश जंगल में इसलिए नहीं मिलती क्योंकि यदि शेर ने ऐसे भेड़ियों के साथ रहे बच्चे का शिकार किया और उसे खाया तो उसके बाद जो बचा उसे सियार या अन्य भेड़िया खा लेते हैं, नतीजतन शिनाख्त के लिए शरीर का कोई हिस्सा नहीं मिलता।

विलियम स्लीमैन के द्वारा खोजे और लिखे गए किस्सों का इंग्लैण्ड में 1888 में द जूलॉजिस्ट जर्नल में प्रकाशित हुआ, किन्तु इससे पूर्व विलियम स्लीमन ने 1849-1850 में "ए  जर्नी थ्रू  द  किंगडम ऑफ़ अवध में इन भेड़िया द्वारा पाले गए बच्चों का जिक्र किया है.

यहाँ गौर तालाब बात यह की भेड़िए द्वारा उठाकर ले जाए गए बच्चे जिन मांदों से मिले उनमे अधिकतर नर बच्चे थे, किन्तु मिदनापुर आसाम में दो बच्चिया मिली जिनका नाम रखा गया अमला और कमला ये दोनों बच्चियां आसाम के जंगलों में भेड़िए की मांद से सन 1920 में पादरी जोसेफ सिंह के द्वारा खोजी गयी जो बाद में मानव सभ्यता में कई वर्षों तक रहीं. 

इसके अलावा 1867 में मौजूदा जिमकार्बेट नेशनल पार्क के जंगलों में बुलंद शहर के नजदीक शिकारियों को दीना शनिचरा मिला, तब इसकी उम्र छह वर्ष थी, जिसे रिहेब्लिटेशन सेंटर में रखा गया, किन्तु वह कभी भी प्लेट में खाना नहीं खाता, प्लेट से खाना निकालकर जमीन पर रखता फिर खाता, कभी कुछ बोला भी नहीं, कपडे भी फाड़ता, लेकिन वह आखिर में तम्बाखू खाना सीख गया था, 1895 में शनिचरा की मृत्यु हो गयी, यह शिकारियों को शनीचर के दिन भेड़िए की माँद में मिला था सो इसका नाम दीना शनिचरा पड़ गया, जिम कार्बेट ने भी अपनी किताब में इस बच्चे का जिक्र किया है,

उत्तर भारत की तराई का एक और किस्सा है जिसे स्लीमैन ने देखा और लिखा है, यह भेड़िया मानव था, जिसे उत्तर प्रदेश की तराई से लखनऊ के राजा के अफसर लेकर आये थे, यह आदमी 40 वर्ष का रहा होगा तब जो जंगल में अकेले एक स्थान पर मिला जहाँ भेड़ियों की माँदें थी, लोगों का कहना था की यह आदमी जब बच्चा होगा तब इसे भेड़िए ले गए होंगे और इसे पालने वाली मादा भेड़ियाँ और इसके भेड़िए साथी जब मर गए होंगे तब यह अकेला रह गया होगा, और जंगल में किसी तरह बसर कर रहा होगा, विलियम स्लीमैन लिखते है की यह आदमी नाक-नक्श  से थारू जनजाति का लगता था, जो लखीमपुर जनपद के दुधवा नेशनल पार्क में मौजूद है.


इतिहास में लखीमपुर से सटे हुए शाहजहांपुर जनपद में भी मोगली यानी भेड़िया द्वारा पाला गया मानव बच्चा मिल चुका है जो अंग्रेज अफसरों की डायरियों में दर्ज़ है. भारत ही नहीं पर दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी घटनाएं घाटी जिसमे युगांडा का मंकी ब्वाय, आसाम का लियोपार्ड ब्वाय, तुर्की की भालू गर्ल, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं दुनिया में जिनकी तस्वीरें, वीडियो भी उपलब्ध हैं.

जंगल और इंसान के रिश्ते बहुत पुराने हैं, यक़ीनन हमने जंगल काटकर अपनी सभ्यता बसा ली किन्तु हम ताल्लुक तो वहीँ से रखते हैं, ये अलग बात है की हम उस जंगल और जंगली जानवरो के अपने सदियों पुराने ताल्लुक से मुहं मोड़ते आएं हैं वो भी सिर्फ अपने नफ़े की ख़ातिर।




कृष्ण कुमार मिश्र 
मैनहन- 262727 
भारत 
KK Mishra
Wildlife Photographer and Conservationist)
krishna.manhan@gmail.com 

















   

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था