डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.6, no.5, May 2016, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

May 17, 2016

नदियां हमारी संस्कृतियों की धरोहर हैं


कठना नदी- 
नदियां हमारी संस्कृतियों की धरोहर हैं 
अवध की तमाम कहानियों को संजोएँ है कठना नदी 
गूगल मैप कठना नदी को बता रहा है गोमती नदी 
कठ्ना जहां औरंगजेब के वक्त छिप्पी खान का था आतंक 

तराई की जलधाराएं जो पूरी दुनिया में अद्भुत और प्रासंगिक हैं, क्योंकि इन्ही जलधाराओं से यहाँ के जंगल हरे भरे और जैव  विविधिता अतुलनीय रही, यहाँ हिमालय से उतर कर शारदा घाघरा जैसी  विशाल नदियां तराई की भूमि को सरोबार करती है अपने जल अमृत से, तो गोमती, पिरई, चौका, सरायन, जमुहारी, सुहेली और कठना जैसी जंगली नदियाँ जंगल और कृषि क्षेत्र में जीवन धाराओं के तौर पर बहती रही हैं, सबसे ख़ास बात है की ये नदियाँ गोमती गंगा जैसी विशाल नदियों को पोषित करती है ताकि गंगा बंगाल की खाडी तक अपना सफ़र पूरा कर सके.

शाखू के जंगलों से गुजरते हुए यह जलधारा बन गयी कठना  

आज हम बात कर रहे हैं काठ के जंगलों से निकले वाली कठ्ना की, एक खतरनाक कौतुहल पैदा करने वाली जंगली नदी, शाहजहांपुर के खुटार के नज़दीक स्थित मोतीझील से निकलती है, और  10 मील का सफ़र तय करने के बाद खीरी जनपद में पहुँचती है, मैलानी, फिर  दक्षिण खीरी के जंगलों से गुजरते हुए मोहम्मदी मितौली के आस पास से गुजरती हुई लगभग १०० मील का रास्ता तय करने के बाद सीतापुर जनपद में आदि गंगा गोमती में विलीन हो जाती है, इसके १०० मील की लम्बी जलधारा जो घने जंगलों से गुजरते हुए कई किस्से कहती है, शाखू आदि के बड़े वृक्षों की वजह से इस जल धारा में लकड़ी का व्यापार भी हुआ मुगलों के वक्त और काठ के जंगलों से गुजरने के कारण यह जलधारा कठ्ना बन गयी.

अंग्रेजों ने इस नदी पर बनवाये एतिहासिक विशाल पुल 

अंग्रेजों ने इस नदी पर विशाल एतिहासिक पुल भी बनवाये, हालांकि पूर्व में मुगलों के दौर में भी इस पर गोला मोहम्मदी, मुहम्मदी-लखीमपुर, औरंगाबाद- मितौली आदि के मध्य में इस जलधारा पर भी लकड़ी के पुल बने जो अब नदारद है, ब्रिटिश हुकूमत में इस नदी पर कुछ एतिहासिक पुल बने जिसमे मोहम्मदी से गोला मार्ग पर बना पुल योरोपियन वास्तुकला का अद्भुत नमूना है.

छिप्पी खान के आतंक के साए में कठ्ना 

मोहम्मदी क्षेत्र में एतिहासिक बड़खर में बाछिलों का साम्राज्य रहा, इन राजपूतों ने स्वयं को राजा वेना अर्थात राजा विराट के पुत्र राजा वेना का वशंज बताया है, और कठ्ना-गोमती से कठ्ना-शारदा के भूभाग पर बहुत समय तक राज किया, औरंगजेब के समय बाछिल राजा छिप्पी खान जो की मुस्लिम बन गया था, बागी हो गया, जिसका आतंक पूरे कठ्ना के जंगलों और रिहाइशी इलाकों में बसने वाले लोगों में व्याप्त था, कहते है युद्ध में इसने इतनी मारकाट की इसके पूरे वस्त्र खून से सरोबार थे सो दिल्ली के बादशाह औरंगजेब ने इसे छिप्पी खान का खिताब दिया.

डाकू भगवंत सिंह और कठ्ना 

छिप्पी खान के बाद राजपूत भगवंत सिंह का आतंक भी कठ्ना की सरहदों ने झेला, उसके घोड़े की टापों से कठ्ना के क्षेत्र दहशतजदा रहे, इसकी मौत के बाद अटवा-पिपरिया की सारी जागीर इसकी पत्नी ने करमुक्त कर दी जो बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार के द्वारा एनेक्शेसन के बाद लगान आदि कर में सम्मलित हुई, बाद में यह जागीर १८५७ के बाद अंग्रेजों ने खरीद ली या उन्हें रिवार्ड के तौर पर दे दी गयी.

उपरहर और भूड़ की जमीनों को करती रही सिंचित 

दरअसल कठना चूँकि घने जंगलों से गुजरती है, और बारिश में लाखो हेक्टेयर जंगली क्षेत्रों का पानी इस नदी में गिरता था, और जमीन में ढलान के कारण इसकी जलधारा का वेग बहुत अधिक रहा, सो खेती की जमीन को सिंचित करने का कोइ औचित्य नही था, पर ब्रिटिश भारत में जंगलों के अत्यधिक कटान से नदी के आस पास गाँव बसने लगे, बाद में आजाद भारत में तो यह जंगली क्षेत्र उडती धूल के मैदान बने और इंसान बसता चला गया, आज कठ्ना के किनारे सैकड़ों गाँव और हज़ारो हेक्टेयर कृषि भूमि आबाद हो गयी.
एक और बात कठना एक तरह से तराई और उपरहरि के भू क्षेत्र को अलग करती है, कठना के उत्तरी भूभाग हिमालय की तराई की तरफ फैले हुए है और दक्षिणी भूभाग गंगा के मैदानी भू क्षेत्रों की तरफ.

१८५७ की क्रान्ति की कहानी भी कहती है यह नदी 

कठ्ना के किनारों के घने जंगलों ने जहां डाकुओं को छिपने की जगह दी, वही १८५७ के विद्रोह में क्रांतिकारियों को रहने की जगह दी, ये क्रांतिकारी कठ्ना की जलधारा में टिम्बर व्यवसाय के कारण लकड़ी के चलायमान टटरों पर एक जगह से दूसरी जगह तक चले जाते, इसकी सरहदों पर अंग्रेजों की सेनाओं से जंगलों में छुप कर रहते, एक और कहानी जुडी है इस कठ्ना के मितौली के पास बने हुए पुल के समीप की, कहते है की जब १८५७ में राजा लोने सिंह आफ़ मितौली ने अवध की बेगम हज़रत महल के साथ मिल कर कम्पनी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति का बिगुल फूंका तो पूरे इलाके में आग सी लग गयी अंग्रेजों के विरुद्ध, और यह मितौली राज्य और कठ्ना के जंगल कम्पनी सरकार से मुक्त हो गए तकरीबन एक वर्ष से अधिक समय के लिए, किन्तु अंग्रेजों की फौजे कानपुर और लखनऊ से चलकर शाहजहांपुर होते हुए नवम्बर  १९५८ में सर कॉलिन कैम्पबेल और मेजर टाम्ब की कमान में मितौली पहुँची तो राजा लोने सिंह ने अपने मितौली गढ़ से अपनी तोपों से एक रात और एक दिन तक अंग्रेजों की फौजों से लोहा लेते रहे, फिर किवदंती कहती है की राजा की मुख्य तोप लछमनिया ने जवाब दे दिया और वह कठना नदी में जा गिरी, लोगों में आज भी यह किवदंती जीवंत है की राजा की तोप आज भी होली दिवाली कठना से निकलकर दगती है जिसकी आवाज आसपास के ग्रामीण इलाकों में सुनाई देती है. खैर जो भी हो उस वक्त जब राज्य पर  ख़तरा मडराता था तो राज्य की धन संपत्ति असलहे तोपे आदि नदियों कुओं और जंगलों में छुपा दिए जाते थे, राजा लोने सिंह ने भी यही किया होगा, कुछ बुजुर्ग बताते है की हाथियों और बैलगाड़ियों पर रानी साहिबा के साथ बहुत सा खजाना मितौली गढ़ी से कठ्ना नदी के जंगलों में भेजा गया और जिन लोगों के साथ यह खजाना गया उन्होंने कठ्ना के किनारे कई संपन्न गाँव बसा लिए क्योंकि मितौली राज्य अंग्रेज सेनाओं ने ध्वस्त कर दिया था और राजा को गिरफ्तार. 

गूगल मैप कठना नदी को बता रहा है गोमती नदी 

अवध की इस एतिहासिक नदी को गूगल अपने मैप में दिखा रहा है गोमती, इस सन्दर्भ में अभी तक शासन और प्रशासन ने कोइ सुध नही ली, भारत के भूभागों और जंगलों नदियों आदि की सही सैटेलाईट मैपिंग न होना दुर्भाग्यपूर्ण है, और जनमानस को भ्रमित करने वाली भी.

प्रदूषण और कृषि ने कठना के स्वरूप को बिगाड़ा 

एक तेज रफ़्तार, पानी से लबालब भरी नदी अब एक पतली विखंडित जलधारा के स्वरूप में है, वजह कठना के आसपास घने जंगलों को काटकर कृषि भूमि में तब्दील कर देना, जगह जगह औद्योगिक कचरे को कठना में डालना, खेतों की रासायनिक उर्वरक, कीटनाशकों का बहकर नदी में गिरना, इसके जलीय  पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ दिया है, जिस कारण न जाने कितनी प्रजातियाँ यहाँ से नष्ट हो गयी, और नदी के किनारों के वृक्षों की कटाई ने भी इसके सौन्दर्य को बिगाड़ दिया है, अब यह नदी बरसात के अलावा सिर्फ सूखे नाले के तौर पर धरती पर एक सूखी लकीर बन जाती है.

कभी बाघों और तेंदुओं का बसेरा थे कठ्ना नदी के किनारें 
दक्षिण खीरी के घने जंगलों के मध्य बहती इस जलधारा में बाघ और तेंदुओं की अच्छी तादाद थी, और यह बात साबित करती है, राजाओं और अंग्रेजों की शिकार की कहानियां, कठ्ना नदी के परिक्षेत्र में कभी राजा महमूदाबाद ने मैनहन गाँव में एक विशाल बाघ का शिकार किया था वह जगह आज बघमरी बोली जाती है, मितौल गढ़ पुस्तक में राजा लोने सिंह के भाई के नाम से बसे खंजन नगर में अंग्रेजों की शिकारगाह थी जहां अंग्रेज मेमे और उनके अतिथि इन बाघ तेंदुओं का शिकार करते थे, दुधवा नेशनल पार्क के संस्थापक डाइरेक्टर राम लखन सिंह ने भी कठ्ना की बाघिन का जिक्र किया है अपनी किताबों में, आज भी कभी कभी ये बाघ तेंदुओं अपने पूर्वजों की इस नष्ट हो चुकी विरासत में आ जाते है, इस तरह कठ्ना की इस दुर्दशा ने जंगल और जंगली जीवों की दुर्लभ प्रजातियों को भी नष्ट कर दिया यहाँ से.

कृष्ण कुमार मिश्र 


(लेखक जीव विज्ञानी, स्वतंत्र पत्रकार, व् दुधवा लाइव अन्तराष्ट्रीय पत्रिका के संस्थापक संपादक है )

May 13, 2016

DudhwaLive International Magazine Issue April 2016


दुधवा लाइव पत्रिका का अप्रैल २०१६ का प्रकाशित अंक पीडीएफ के रूप में यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं.

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I am pleased to share Dudhwa Live International Magazine Vol.6 Issue4, April 2016, please check the link below to download the 24 pages Print edition (PDF)

Dudhwa Live Magazine has been assigned ISSN number as a continuing resource (ISSN Number - 2395 - 5791) from Jan 2010. This will help in electronic archiving and act as a bibliographical tool so that students, researchers, librarians can use it to give the precise references of a serial publication.
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Krishna Kumar Mishra 



आँख में पानी आ जाए तो यह तालाब और नदियाँ मुस्करा कर उफन पड़ेगी तुम सब के लिए ...

Dudhwa Live - An International Journal of Environment and Agriculture 
Vol.6, no.4 April 2016
सम्पादक की कलम से....
तपती धरती, प्यासे परिन्दें, सड़कों पर प्यास की विभीषिका उन सभी जानवरों के लिए जो इंसान की सोहबत में जंगल से उनके शहरों में आ गए, पानी बुनियादी जरुरत है प्यास एक त्रासदी, मैं पानी की बात कर रहा हूँ जो जुबान को तर न करे तो जीवों की जान चली जाए, और आँखों को तर न करे तो इंसानियत मर जाए- मगर अफ़सोस पानी की इस दरकार ने पानी का मैनेजमेंट कर दिया, बड़े बड़े प्रोजेक्ट, बड़ी रकम वाले फंड और मीडिया का शोरगुल जो टी आर पी के लिए है, एन जी ओ की चिल्लाहट, पानी की खबरों का व्यापार, जिसमें सबके अपने अपने छुपे हुए स्वार्थ, और इस चिंताजनक माहौल में तड़प रहे हैं जीव प्यास से, जल रहे हैं जंगल, और सूखी नदियाँ, सूखे तालाब, नष्ट कर दिए गए कुँए मानो कह रही हों की तुम्हारी आँखों से पानी सूख गया है तो हम क्यों भरे रहे हैं इस जीवनरस से तुम्हारे लिए, लेकिन इंसान की विनाशक प्रवत्ति ने बेबस कर दिया उन जानवरों को जो निर्भर थे इस प्रकृति के सहज वरदान से जो धरती पर सरलता से मौजूद था इनके लिए, तुमने तो धरती माँ का पेट भी फाड़ डाला, न जाने कितने सुराख कर दिए उसके सीने में फिर भी आज एक मूर्ख की तरह हाथ मल रहे हो बोरिंगे सुख रही है, हैवी पावर के इंजन भी धुक धुक कर बंद हो जा रहे है पर रसधार नही फूट रही धरती से, क्योंकि तुमने निरादर किया है प्रकृति का और इस माँ स्वरूपा वसुंधरा का, तुमने विनाश किया है अपने सहोदरों का जो धरती पर तुमसे पहले से रहते आये एक सुनियोजित तरीके से तुमने शिकार किया उनके समुदाय ही नहीं उनकी प्रजातियाँ ही नष्ट कर दी अपनी बेजा जरूरतों के लिए...अब मैं मशविरा नही दूंगा क्योंकि तुम सब बुद्धिमान हो जानते हो अपने कृत्य और उनके प्रतिफल भी फिर भी नहीं रुक रहे हैं तुम्हारे वो विनाशकारी शिकारी हाथ, नोच लेना चाहते है प्रकृति के उस हर खजाने को जो सब के लिए है ..विचारिएगा
आँख में पानी आ जाए तो यह तालाब और नदियाँ मुस्करा कर उफन पड़ेगी तुम सब के लिए ..याद रखना तुम्हारे लिए भी....क्षमा वत्स!

कृष्ण कुमार मिश्र

krishna.manhan@gmail.com

संस्थापक सम्पादक

अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका दुधवा लाइव  

www.dudhwalive.com




May 11, 2016

कबुलहा- एक तालाब की कहानी



तालाबों की व्यथा-कथा

तालाब जीवन ऊर्जा के पावर हाउस हैं।
एक तालाब की कहानी- मैनहन गाँव का कबुलहा ताल 

कहानियाँ तो हमेशा हमारा अतीत कहती हैं, वर्तमान दिखलाती है, और भविष्य का संकेत भी देती है, कहांनियां सिर्फ इतिहास नही कहती! इस तालाब को देख रहें है न, कभी यह वाकई प्राकृतिक तालाब था, कबुलहा कहते हैं इसे शायद इंडो-अफगानी रिश्तों से उपजा है ये शब्द, कोइ भी बेहतरीन, लंबी चौड़ी वस्तु को काबुल की बाज़ारों से जोड़ दिया जाता था, फिर वह चाहे चने हों या फिर काबुली घोड़ा। 

दरअसल भारत पर आक्रमण करने वाले गोर चिट्टे लंबे, खूबसूरत नाक नक्श वाले वे लोग सुंदर व् फुर्तीले बेहतरीन नस्ल के घोड़ों से उत्तर भारत की जमीन रौंद  रहे थे, विजेता, विजातीय और विदेशी सदैव आकर्षण, और कौतुहल का कारण होते हैं! सो हिन्दुस्तानियों के लिए भी हर बेहतर वस्तु काबुली हो गयी, बाद में इंग्लैण्ड की सत्ता के कारण भी हमारे यहाँ उत्कृष्ट बहुत चीजों को विलायती की संज्ञा दी, और अब कुछ कुछ चीजें चाइनीज हो रही हैं। खैर बात कबुलहा ताल की हो रही है, जिसकी विशालता और सुंदरता ने उसे काबुली बना दिया। इस तालाब की विशालता से इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की मैनहन गाँव से ओदारा गाँव तक इसकी सीमाएं हैं, तालाब के मध्य में एक आइलैंड था, जो तमाम प्रजातियों की लैंडिंग का सुरम्य स्थल था, और तालाब आगे चलकर छिछला होकर झाबर की शक्ल ले लेता था जिसमें विभिन्न किस्म की घासें उगती थी और बारिश के बाद यह दोनों गाँवों के पशुओं का चारागाह हुआ करता था साथ ही गाँव के बच्चों का प्ले-ग्राउंड तथा बुजुर्गों की विमर्श स्थली, और निठल्लों की निंदारस व् ठिठोली की महान कर्मस्थली, पर अब न वह आइलैंड बचा, न ही झाबर, क्योंकि इन जैवविवधिता वाले स्थलों को पंचायती राज के अनियोजित व् भ्रष्ट विकास ने निगल लिया, नरेगा ने तालाब में की अनियोजित खुदाई से उसके प्राकृतिक स्वरूप को बदल डाला, झाबर पट्टे और कृषि भूमि के तौर पर अतिक्रमित कर लिया गया, अब न इस तालाब में पक्षी चहचहातें है, न ही तमाम तरह की मछलियों की उछल कूद है, न ही बेहया जलकुम्भी के रंग बिरंगे पुष्प खिलते हैं, और न ही मवेशी व् उनके रखवालों का मेला लगता है, श्मशान के सन्नाटें में तब्दील हो गया यह पारिस्थितिकी तंत्र जहाँ हज़ारों किस्म की वनस्पति व् जंतु जगत की प्रजातियां निवास करती थी, गौरतलब बात यह है की खुदाई के उपरान्त इसके चारो तरफ मिट्टी के ढेर लगा दिए गए जिससे जल संचयन की व्यवस्था ही ख़त्म हो गयी। प्रकृति कैसे ढालती है चीजों को अपने अनुरूप यदि मानव उससे छेड़छाड़ न करे, कभी मैनहन गाँव के इस तालाब के उत्तर में बहने वाली पिरई नदी इस तालाब से जुड़ जाती थी बरसात के महीनों में, यदि नदी में उफान आता तो उसका जल इस तालाब में आकर संचित हो जाता, और जब तालाब में पानी अधिक हो जाता तो नदी की जल धारा में मिलकर बाह जाता और तालाब का जलस्तर उसकी सरहदों में सीमित हो जाता, इस तरह बाढ़ की समस्या भी नही उत्पन्न होती। लेकिन अब नदी सिकुड़ गयी, मैदान खेत में बदल गए, खेतों की चौ हद्दियों पर ऊँची ऊँची मेढे बाँध दी गयी और रही सही कसर समतल चकरोडों की पटाई कर उन्हें इतना ऊंची सड़क में तब्दील कर दिया गया की पानी का मुसलसल बहना ही बंद हो गया, अब बारिश का पानी इन खेतों की मेढ़ों और चकरोडों की चारदीवारी में ही कैद हो जाता नतीजतन जल भराव की समस्या के साथ साथ पानी अपने उचित संचयन स्थल यानी तालाबों तक नही आ पाता और न ही स्थानीय नदियों को पोषित कर पाता ताकि वह सदानीरा हो सके।

कबुलहा ताल के करीब मुखिया बाबा की आम की बाग़, फिर ठेकेदार बाबा की बाग़ और उसके बाद मुनीम बाबा की बाग़, इस बेहतरीन प्राकृतिक स्थल के कारण ही गाँव के किसी भी कुँए और नल का जल स्तर नही घटता था, और 25 फुट पर ही धरती से रसधार फूट पड़ती, गाँव में कहावत है ऐसे जलस्तर वाले कुँए के ताजे मीठे पानी को डाल से तोड़ा हुआ पानी कहना, परन्तु कबुलहा की दुर्दशा ने अब डाल के टूटे पानी अर्थात ताज़ा मीठे पानी वाले कथन को खारिज कर दिया, अब जलस्तर भी 100 फुट पर हो गया और पानी की मिठास भी जाती रही, विकास की आंधी ने संस्कार तोड़ दिए तो अब इस गाँव का सारा गंदा पानी इस तालाब में गिरता है, और नाबदान विलुप्त हो गए, या यूँ कह ले की विकास की नालियों ने नाबदानों को निगल लिया, पेस्टिसाइड और रासायनिक खादों के प्रयोग से खेतों का जहरीला पानी भी अब कबुलहा में ही गिरता है, सो जलीय जलीय जैव विविधिता की दुर्गति भी हो गयी, तालाब भी व्यापारियों के हवाले हो गए, सहकारिता के नाम पर किसी एक ठेकेदार से रकम लेकर उसे उसके हवाले कर दिया जाता मछली व् सिंघाड़े पालन के लिए, और गाँव के वे समुदाय वंचित रह जाते उस प्राकृतिक लाभ से जिसमें स्वतंत्रता से वह मछली आदि वस्तुओं को भोजन के तौर पर प्रयोग करते आएं, वे सारे समुदाय जो मिट्टी, मछली कमल गट्टा, नारी, और अन्य जलीय खाद्य वस्तुओं के साथ साथ औषधीय वनस्पतियों पर सदियों से इन तालाबों पर निर्भर थे अब विकास के इस तन्त्र में महरूम है उन सब चीजों से, जाहिर है बाज़ार की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता ख़त्म। बस यही हालात आने वाले समय में घातक होंगे, जब बाज़ार हमारे घरों खेतो और खलिहानों तालाबों पर तांडव कर रहा होगा और हम अपना सब कुछ उसके हवाले कर चुके होंगे, और तब मानवता किसी कोने में बैठकर बेसाख़्ता आँसू बहायेगी और राजनीति तथा सरकारें बेबश और लाचार होंगी। 

अभी भी वक्त है हो सके तो कुँए तालाब बागें बीज और अपनी जमीन जे साथ साथ अपनी इस संस्कृति को भी बचा ले जिसमें नदियां तालाब खेत वृक्ष अन्न जल अग्नि पृथ्वी और आकाश के अतिरिक्त सम्पूर्ण जगत के चराचर की वन्दना होती आई है। 
तालाब अब भी खरे हैं, कबुलहा तो सिर्फ एक बानगी है !


कृष्ण कुमार मिश्र 

krishna.manhan@gmail.com 

May 7, 2016

महान शिक्षाविद और प्रकृति के असाधारण चित्रकार- रबींद्रनाथ ठाकुर




-फ़िरदौस ख़ान
रबीन्द्रनाथ ठाकुर को आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है. वे बांग्ला कविकहानीकारगीतकारसंगीतकानाटककारनिबंधकार और चित्रकार थे. वे एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता हैंजिन्हें 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इतना ही नहींवे एकमात्र ऐसे कवि हैंजिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं. भारत का राष्ट्रगान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएं हैं. ग़ौरतलब है कि उनका जन्म 7 मई1861 को कोलकाता के जो़डासांको ठाकुरबा़डी में हुआ था. उनकी शुरुआती शिक्षा सेंट ज़ेवियर स्कूल में हुई. इसके बाद 1878 में उन्होंने इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में दाख़िला ले लिया. फिर उन्होंने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में क़ानून का अध्ययन कियालेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए. दरअसलबहुमुखी प्रतिभा के धनी रबीन्द्रनाथ का बचपन से ही कला के प्रति रुझान था और कविताएं और कहानियां लिखना उन्हें बेहद पसंद था. हालांकि उनके पिता देबेंद्रनाथ ठाकुर यही चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर वकील बनेलेकिन रबीन्द्रनाथ का मन कला और साहित्य को कब का समर्पित हो चुका था. आख़िरकार पिता को बेटे की ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा और उन्होंने रबीन्द्रनाथ पर घर-परिवार की ज़िम्मेदारियां डाल दीं. 1883 में मृणालिनी देवी से उनका विवाह हुआ.

गौरतलब है कि रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था. उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और 1877 में महज़ सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी. उनकी शुरुआती रचनाओं में बनफूल और कवि काहिनी उल्लेखनीय हैं. किड़ओ कोमलप्रभात संगीतछबि ओ गानमानसी में उनकी काव्य शैली का विकास सा़फ़ झलकता है. इसी तरह सोनार तरी नामक काव्य संग्रह में विश्व जीवन की आनंद चेतना का पहला स्वर फूटता हैजो चित्रा में बुलंदी तक पहुंचता है. उसी वक़्त नैवेद्य काव्य संग्रह में भक्ति के प्रति उनकी व्याकुलता नज़र आती हैजो बाद में गीतांजलि में और भी तीव्र हो उठती है. ब्रिटिश सरकार ने 1913 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया थालेकिन जलियांवाला बाग़ के नरसंहार से मर्माहत होकर उन्होंने यह उपाधि वापस कर दी. 1916 में उनका काव्य संग्रह श्लाका प्रकाशित हुआ. इसके बाद पलातकपूरबीप्रवाहिनीशिशु भोलानाथमहुआवनवाणीपरिशेष, पुनश्चवीथिकापत्रपुटआरोग्यशेषलेखा आदि काव्य संग्रह प्रकाशित हुए और ख़ूब सराहे भी गए. रबीन्द्रनाथ ठाकुर पारंपरिक बंधनों से मुक्त होकर सृजन करने में विश्वास करते थे. उन्होंने पद्य की तरह गद्य की रचना भी बचपन से ही शुरू कर दी थी. उनके निबंध उनके शिल्प कार्य केबेहतरीन उदाहरण हैं. इनमें विचारों की गंभीरता के साथ भाषा शैली भी उत्कृष्ट है. उनका श्रेष्ठ गद्य ग्रंथ जीवनस्मृति हैजिसमें जीवन के अनेक चित्र अंकित हैं. उन्होंने 1888 में आधुनिक बांग्ला साहित्य में छोटी कहानी का सृजन करके एक नई विधा की शुरुआत कीजिसे बाद में कई साहित्यकारों ने अपनाया.

1884 में उनका पहला उपन्यास करुणा प्रकाशित हुआ. उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में चोखेर बालीनौका डूबीगोराघरे-बाइरे आदि उल्लेखनीय हैं. नाटक के क्षेत्र में भी उन्होंने बेहतरीन काम किया. बाल्मीकि प्रतिभा और मायेर खेला उनके शुरुआती गीतिनाट्य हैं. राजा ओ रानीविसर्जन और चित्रांगदा में उनकी उत्कृष्ट नाट्य प्रतिभा के दर्शन होते हैं. उनका सांकेतिक नाटक रक्तकरबी उनकी श्रेष्ठ कृतियों में से एक है. काव्यस्वरनाट्य और नृत्य से सजा उनका नाटक नटीर पूजाश्यामा आदि भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं. शारदोत्सवराजाअचलायतन और फाल्गुनी भी उनके प्रसिद्ध नाटकों में शामिल हैं. उन्होंने तक़रीबन 2230 गीतों की भी रचना कीजो रबीन्द्र संगीत के नाम से जाने जाते हैं. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित उनके ये गीत ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने में समेटे हुए हैं.

रबीन्द्रनाथ ठाकुर सियालदह और शजादपुर स्थित अपनी पैतृक संपत्ति की देखभाल के लिए 1891 में पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) आ गए और तक़रीबन दस साल तक यहीं रहे. उन्होंने यहां के जनमानस के सुख-दुख को बेहद क़रीब से देखा और अपनी रचनाओं में उसका मार्मिक वर्णन भी कियाजिसे उनकी कहनानियों दीन-हीनों और छोटे-मोटे दुख में महसूस किया जा सकता है. वे प्रकृति प्रेमी थेइसलिए वे चाहते थे कि विद्यार्थी प्रकृति के बीच रहकर अध्ययन करें. इसी मक़सद से 1901 में उन्होंने सियालदह छोड़ दिया और उसी साल शांति निकेतन नामक एक विद्यालय की स्थापना कीजो 1921 में विश्व भारतीय विश्वविद्यालय बन गया. उनकी रचनाओं में आसमानसूरजचांदसितारेबरसातबलखाती नदियांपेड़ और लहलहाते खेतों का मनोहारी चित्रण मिलता है. उनकी रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ और वे देश-विदेश में मशहूर हो गए. रबीन्द्रनाथ के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए. 1902 और 1907 के बीच उनकी पत्नी और उनके दो बच्चों की मौत हो गई. इस दुख से उबरने के लिए उन्होंने अपना सारा वक़्त काम में लगा दिया. एक वक़्त ऐसा भी आयाजब शांति निकेतन की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब हो गई. धन संग्रह के लिए गुरुदेव ने नाटकों का मंचन शुरू कर दिया. उस वक़्त महात्मा गांधी ने उन्हें साठ हज़ार रुपये का चेक दिया था. कहा जाता है कि रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने ही गांधी जी को महात्मा का विशेषण दिया था. ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त में उन्होंने चित्र बनाना शुरू किया. यहां भी उन्होंने ज़िंदगी के तमाम रंगों को कैनवास पर उकेरा. उनके चित्र भी उनकी अन्य कृतियों की तरह दुनिया भर में सराहे गए. हालांकि उन्होंने चित्रकला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थीबावजूद इसके उन्होंने ब्रुशरूई और अपनी उंगलियों को रंग में डुबोकर कैनवास पर मन के भावों को उकेर दिया.

रबीन्द्रनाथ ठाकुर की मौत 7 अगस्त1941 को कलकत्ता में हुई. भले ही आज यह महान कलाकार हमारे बीच नहीं हैलेकिन अपनी महान रचनाओं के कारण वे हमेशा याद किए जाते रहेंगे. वे कहा करते थेविश्वास वह पक्षी हैजो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है. 


फ़िरदौस ख़ान
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)
newsdesk.starnewsagency@gmail.com

Apr 30, 2016

बिजली की प्यास ने करोड़ों को प्यासा कर दिया...




प्रत्येक साल महाराष्ट्र में कोयला पावर प्लांट्स निगल रहा 1.2 करोड़ लोगों के हिस्से का पानी: ग्रीनपीस

मुंबई। 28 अप्रैल 2016 एक तरफ महाराष्ट्र लगातार सूखे से जूझ रहा हैदूसरी तरफ ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट ‘द ग्रेट वाटर ग्रैब-हाउ द कोल इंडस्ट्री इज डिपनिंग द ग्लोबल वाटर क्राइसिस’ में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि अकेले महाराष्ट्र में कोयला पावर प्लांट्स इतनी अधिक मात्रा में पानी का खपत करता है जो हर साल लगभग सवा करोड़ लोगों के लिये पर्याप्त है।

वर्तमान मेंमहाराष्ट्र के पास 16,500 मेगावाट क्षमता के कोयला से पैदा होने वाली बिजली है। इनमें से लगभग 13000 मेगावाट महाराष्ट्र के उन इलाकों में स्थित हैं जहां पहले से ही पानी का संकट है। ये प्लांट अभी 218 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी खपत कर रहे हैं। दूसरी तरफ पानी संकट को बढ़ाने वाली 37,370 मेगावाट वाले कोयला पावर प्लांट को लगाये जाने की योजना प्रस्तावित है। इस योजना से कोयला प्लांट द्वारा पानी की मौजूदा खपत दोगुना हो जाएगा तथा जल संकट और अधिक गहरा जाएगा।

ग्रीनपीस इंडिया के सीनियर कैंपेनर जय कृष्णा ने कहा, “ पानी की कमी एक अनिवार्य सच है। इससे हमारे कृषि पर गंभीर संकट पैदा हो गया है। इससे देश भर के लोगों का आजीविका और जीवन दोनों खतरे में पड़ गया है। एक तरफ पानी को बचाए जाने का उपाय करना जरुरी तो है हीउससे भी बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा पानी का किस तरह इस्तेमाल हो

फिलहाल भारी मात्रा में पानी थर्मल पावर प्लांट्स को दिया जा रहा है। जैसा कि ग्रीनपीस की रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रस्तावित कोयला पावर की बड़ी परियोजनाओं की वजह से आने वाले समय में कोयला उद्योग और भी बड़ी मात्रा में पानी सोखेगा। अगर हम प्रस्तावित प्लांट्स और वर्तमान में निर्माणाधीन प्लांट्स को देखें तो स्पष्ट है कि महाराष्ट्र का करीब 490 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी इन प्लांटों में चला जायेगा। एक मोटे अनुमान के मुताबिकइतना पानी राज्य के करीब 2.6 करोड़ लोगों की जरुरतों को पूरा करने में सक्षम है।

जय कृष्णा ने कहा कि सरकार को कोयले की वास्तविक लागत की गणना के वक्त पानी के अभाव को भी जोड़ने की जरुरत है। स्पष्ट है कि लगातार कोयला पावर प्लांट पर बढ़ रही निर्भरता राज्य के किसानों और निवासियों के लिये विनाशकारी साबित होगा। जिस तरह से जल संकट गहराता जा रहा हैउससे कोयला पावर प्लांट्स के अक्सर बंद होने की भी आशंका भी  है। इस तरह ये प्लांट्स ‘फंसा हुआ निवेश’ साबित होंगे और यह निवेशकों के लिये भी जोखिम भरा है।

इस साल गर्मी मेंपहले से केपीसीएच का रायचुर पावर प्लांट और एनटीपीसी फरक्का पावर प्लांट को पानी के अभाव में तात्कालीक रूप से बंद कर दिया गया है। महागेंसो परली पावर प्लांट जूलाई 2015से ही पानी के अभाव में बंद है।


Notes to editors:
  1. यह आकड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुमानित प्रतिदिन 50 लीटर पानी प्रति व्यक्ति के आधार पर है जो लोगों के मूलभूत स्वस्थ्य के लिये जरुरी है। http://www.who.int/water_sanitation_health/diseases/WSH03.02.pdf (page 22)
  2. यह आकलन कोयला विद्युत संयंत्रों के लिए पानी की खपत के मानक आंकड़ों के आधार पर कर रहे है। साथ ही, बिजली संयंत्रों को ठंडा करने में शामिल पानी भी इसी अनुमान पर आधारित है। अधिक जानकारी के लिये विश्लेषण संलग्न किया गया है।
  3. Photo- http://photo.greenpeace.org/C.aspx?VP3=SearchResult&LBID=27MZKTDW0VI&IT=Thumb_FixedHeight_M_Details_NoToolTip
  4. The Great Water Grab: How the coal industry is deepening the global water crisis’ is available here: http://www.greenpeace.org/international/Global/international/publications/climate/2016/The-Great-Water-Grab.pdf
अविनाश कुमार 
 ईमेल: avinash.kumar@greenpeace.org,
मोबाइल- 8882153664

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