International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jun 9, 2018

जहरीली हवा से मुक्ति के 13 रास्ते


वायु प्रदूषण से मुक्ति संभवः अमरीकी विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट ने सुझाए वायु प्रदूषण से निपटने के 13 तरीकेअगर सुझाव पर अमल हुआ तो देशभर में 40% कम हो जायेगा वायु प्रदूषण

नई दिल्ली। 30 मई 2018 अमेरिका की लुसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी (एलएसयू) की एक नयी रिपोर्ट में उन 13 उपायों के बारे में बताया गया है जिससे देश में वायु प्रदूषण को 40 फीसदी तक कम किया जा सकता है। साथ हीहर साल होने वाली लाख लोगों को मौत से बचाया जा सकता है। इन 13 उपायों को अपनाकर सर्दियों के समय दिल्ली सहित उत्तर भारत के पीएम 2.5 स्तर को 50 से 60 फीसदी तक कम भी किया जा सकता है।

इस रिपोर्ट में प्रदूषण के विभिन्न कारणों से निपटने के लिये बनी नीतियों का विश्लेषण किया गया है जिसमें थर्मल पावर प्लांट (चालूनिर्माणाधीन और नये पावर प्लांट)मैन्यूफैक्चरिंग उद्योगईंट भट्ठीघरों में इस्तेमाल होने वाले ठोस ईंधनपरिवहनपराली को जलानाकचरा जलानाभवन-निर्माण और डीजल जनरेटर का इस्तेमाल जैसी बातें शामिल हैं।

ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया का कहना है, “हम लोग पहली बार विस्तृत और व्यावहारिक नीतियों को सामने रख रहे हैं जिससे सर्दियों में उत्तर भारत के वायु प्रदूषण को घटाकर आधा कम किया जा सकता है। हम पर्यावरण मंत्रालय से गुजारिश करते हैं कि वे इन उपायों को स्वच्छ वायु के लिये तैयार हो रहे राष्ट्रीय कार्ययोजना में शामिल करे और पावर प्लांट के लिये दिसंबर 15 में अधिसूचित उत्सर्जन मानकों को कठोरता से पालन करे। साथ ही अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कठोर मानकों को लागू करके प्रदूषण नियंत्रित करे।

रिपोर्ट के लेखक होंगलियांग जेंग कहते हैं, “हमारे शोध बताते हैं कि थर्मल पावर प्लांट के उत्सर्जन को कम करकेऔद्योगिक ईकाइयों के उत्सर्जन मानको को मजबूत बनाकर और घरों में कम जिवाश्म ईंधन जलाकर,ईंट भट्टियों को जिग-जैग पद्धति में शिफ्ट करके तथा वाहनों के लिये कठोर उत्सर्जन मानक लागू करके वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है। हालांकि 13 उपायों के साथ-साथ एक व्यापक योजना बनाकर ही वायु प्रदूषण को 40 फीसदी तक कम किया जा सकता है और हर साल होने वाले लाख लोगों की मौत से बचा जा सकता है।


रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले कारकों से निपटने के लिये थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों के कठोर उत्सर्जन मानकों को लागू करने के बाद ही वायु प्रदूषण के स्तर में कमी लायी जा सकती है। इसलिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्ययोजना को मज़बूत बनाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा मांगे गए जन सुझावों के रूप में सीविल सोसाइटी संगठनोंकार्यकर्ताओं,वकीलों और अन्य विशेषज्ञों द्वारा दिये गए सुझावों में भी थर्मल पावर प्लांट के उत्सर्जन मानको को कठोरता से लागू करने की मांग की गयी थी।

सुनील कहते हैं, “एलएसयू के शोघ ने एकबार फिर वही बातें दुहराई है जिसकी मांग देश के लोग बहुत लंबे से समय से कर रहे हैं जिसमें थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों के लिये कठोर उत्सर्जन मानक बनाया जाना भी शामिल है। हालांकि पर्यावरण मंत्रालय लगातार थर्मल पावर प्लांट को उत्सर्जन मानकों के लिये छूट देने की कोशिश में है। दिसंबर 2015 में पर्यावरण मंत्रालय ने थर्मल पावर प्लांट को दो सालों के भीतर उत्सर्जन मानकों को पूरा करने की अधिसूचना जारी की थीजिसे अब वे अवैद्य तरीके से पांच साल और बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के ड्राफ्ट में भी मंत्रालय ने विभिन्न सेक्टरों जैसे थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य को शामिल नहीं किया है।

सुनील अंत में कहते हैं, “इस रिपोर्ट में शामिल नीतियों के विश्लेषण से भारत के स्वच्छ वायु आंदोलन को बड़ी मदद मिलेगी। अगर पर्यावरण मंत्रालय लोगों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है तो उसे जल्द से जल्द राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में क्लीन एयर कलेक्टिव के सुझावों के साथ-साथ एलएसयू द्वारा इस रिपोर्ट में शामिल 13 उपायों को भी शामिल करना चाहिएजिससे सच में भारत की हवा को साफ बनायी जा सके।


For further details-
Avinash Kumar, Greenpeace India, avinash.kumar@greenpeace.org ; +91 8882153664
Sunil Dahiya, Greenpeace India, sdahiya@greenpeace.org; +91 9013673250
Professor Hongliang Zhang, Author of Report- hlzhang@lsu.edu

वानर शिशु के आँसू




                                                                            

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भारत के एक जंगल में बंदरों की एक अनोखी प्रजाति मकाका सिलेंस पाई जाती है। उस प्रजाति के अब अधिकतम लगभग 4000 बन्दर ही रह गए, कहे जाते हैं और वे सब भी विलुप्त होने के कगार पर खड़े है। 

एक दिन एक मदारी उस प्रजाती के नन्हे से बंदर को उठाकर उस जंगल से रवाना हो गया। मदारी ने उस नन्हे वानर को घर न ले जा कर पैसों की तात्कालिक ज़रूरतों के दबाव में शहर के चिड़ियाघर में बेच दिया। चिड़ियाघर में आने के बाद वह वानर घर से बिछड़ने के कारण दुःख और घबराहट में चीखने - चिल्लाने लगा, लेकिन उसका दुःख और दर्द किसी ने नहीं सुना। दूसरी तरफ उस जंगल में नन्हे वानर के परिवार में मातम छाया हुआ था। 

हर चिड़ियाघर में सुबह और शाम दो मीटिंग ही जीवों को खाना खिलाया जाता है। उस चिड़ियाघर में दिन के वक्त रमन जीवों को खाना खिलाता तो रात के वक्त अमित जो की बुज़ुर्ग था वह खाना खिलाता। रमन थोड़ा गड़बड़ आदमी था, वह नन्हे वानर का केला उसे खिलाने के बजाय खुद खा जाता था और वह नन्हा वानर कुछ न कर पाता सिवाय भूखे रहने के। शाम के वक्त जब अमित की बारी आती तो वह उस नन्हे वानर को केला खिलाने जाता था। उस वानर को देखते ही वह चकित सा रह जाता था, वह देखता था की नन्हे वानर का हाल अधमरा सा होता जा रहा है। वह देखते ही समझ गया की इस नन्हे वानर के खाने में ज़रूर कोई लापरवाही की जा रही है। वह उसे सारा केला खिला दिया और नन्हे वानर को अमित अच्छा लगने लगा था क्योंकि अमित ने उसे सारा केला खिला दिया और अब वह नन्हा वानर ठीक लग रहा था लेकिन उस नन्हे वानर का हाल बेहाल देखकर अमित का मन आत्मग्लानि से भरा पड़ा था। वह सोच रहा था की “हम इंसान कैसे होते जा रहे हैं, जीवों का खाना भी नहीं छोड़ रहे हैं, हम इंसानियत भूलते जा रहें हैं। हम इंसान ही अब अपनी गलती सुधर सकतें हैं।” अमित ने तुरंत चुपके से नन्हे वानर को चिड़ियाघर के पिंजड़े से निकालकर अपने झोले में छिपा लिया और वहां से निकल गया बिना किसी के नज़र में आए और इस काम में नन्हे वानर ने भी अमित का साथ दिया और शांति से उसके झोले में बैठा रहा। 

अमित उस वानर को अपने घर ले जा कर उसके हुलियानुसार अपने कम्प्यूटर पर उसके बारे में सर्च करने लगा, काफी सर्च करने के बाद उसे उस जगह का पता चल गया जहाँ पर उस नन्हे वानर की प्रजाती पाई जाती है और वह जगह पूरी दुनिया में एक थी, वह भारत में स्थित थी और उसका नाम भी उसमे अंकित  था। अमित बिना वक्त ज़ाया किए नन्हे वानर के संभावित स्थान के लिए उस नन्हे वानर के साथ निकल पड़ा। वह रास्ते भर यही मना रहा था कि बस इस नन्हे वानर का समूह मिल जाए तो मेरा यहाँ आना सफल हो जाएगा। उस नन्हे वानर को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह बूढ़ा व्यक्ति उसे कहाँ ले जा रहा है लेकिन फिर भी वह नन्हा वानर उसपर विश्वास किए शांति से बैठा हुआ था। नन्हे वानर के संभावित स्थान से चार किलोमीटर पहले ही अमित ने नन्हे वानर जैसे कुछ वानरों को देखा उन्हें देखते ही उसने नन्हे वानर को उन्हें दिखाया, उन्हें देखते ही नन्हे वानर ने उनकी ओर हाँथ फेंका। नन्हे वानर को हाँथ फेंकता देख अमित समझ गया कि वह सही गजह आया है और अमित फॉरन अपने वाहन से उतरकर नन्हे वानर को जमीन पर छोड़ दिया। छूटते ही नन्हा वानर अपने वानरी समूह के पास दौड़ पड़ा। यह सब देखकर अमित की आँखों में बिछड़े परिवार से मिलन सुख के आँसू सहसा निकल पड़े।



-वैशम्पायन चतुर्वेदी

कक्षा :- X-C, सेंट जॉन्स स्कूल, डी.एल. डब्लू., वाराणसी -221005

निवास :- 3/16, कबीर नगर, दुर्गाकुंड, वाराणसी-221005

Cell : 9415389731


Mar 24, 2018

... कभी मौत सुनिश्चित हुआ करती थी इस मर्ज़ में


विश्व क्षय रोग दिवस 

महान वैज्ञानिक राबर्ट कोच ने पहचाना इस राक्षस बैक्टीरिया को जो जिम्मेदार है अनगिनत मौतों का... 

रॉबर्ट कोच (11 December 1843 – 27 May 1910) एक जर्मन वैज्ञानिक जिसने मौत की विभीषिकाओं को भेद डाला अपने अविष्कारों से, एक वक्त था जब भारत ही नही दुनिया के तमाम मुल्कों में कालरा, एंथ्रेक्स, और टीबी जैसी भयानक बीमारियां महामारी का रूप गढ़ती थी, गांव शहर और इलाके तबाह हो जाते थे, मानव सभ्यता का वह सबसे कठिन दौर रहा होगा, जब इंसान प्राकृतिक विभीषिकाओं से लड़कर खुद को सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में महसूस करने के बावजूद इन मौत के नुमाइंदों से लड़ पाने की कुंठा और शोक आदमियत के गरूर को यकीनन चकनाचूर कर रही होगी, ये वही आदमी था जिसने बारिश आग समंदर पहाड़ जंगल जानवर सब पर विजय पताका लहराई, पर नँगी आखों से ये न दिखने वाले जीवों से वह हार रहा था, इंसानी रिहाइशें ही नही सभ्यताओं को भी नष्ट किया इन सूक्ष्म जीवों ने जिन्हें वैक्टीरिया के नाम से जाना जाता है अब, रॉबर्ट कोच वही व्यक्ति है जिन्होंने पहली बार दुनिया को बताया कि तमाम बीमारियों से इन सूक्ष्म जीवों का नाता है, रॉबर्ट कोच एक दौर में कलकत्ता भी आए जब कॉलरा जैसी महामारी में गांव के गांव उजड़ रहे थे, टीबी, कालरा और एंथ्रेक्स बैक्टीरिया से होता है और किस किस्म के बैक्टीरिया से, यह बात दुनिया को रॉबर्ट कोच ने बताई... टीबी के बैक्टीरिया की खोज के लिए उन्हें 1905 में नोबल पुरस्कार से नवाजा गया, माइक्रोबायलॉजी के जनकों में से एक रॉबर्ट कोच ने इंसानियत को उन जीवों से लड़ना सिखाया जो आंखों से दिखाई नही देते और उनकी पहचान भी कराई, मानवीय इतिहास में टीबी कालरा जैसे बैक्टीरिया की खोज एक अद्वतीय घटना थी, यदि मैं खीरी जनपद की बात करूँ, तो बुजुर्गों की जुबानी हमारे गांव घर भी कॉलरा जिसे स्थानीय भाषा मे हैजा कहते थे न जाने कितनी लोगों की मौत का कारण बना, गोमती नदी के किनारे की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता भी लाल बुखार और हैजा जैसी बीमारियों से खत्म हो गई, विशाल भवनों की ज़मीदोज़ दीवारें और अवशेष आज भी गवाही देते है कि जैसे यहां मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी सिंधु घाटी सभ्यता रही हो, और कौन जाने की सिंधु घाटी जैसी सभ्यता भी तबाह हुई हो इन जीवाणु जनित महामारियों से....गोमती नदी के किनारे जंगलीनाथ भगवान के मंदिर के पास कोरहन जैसा समृद्ध गांव आज से तकबीरन 150 वर्ष पूर्व हैजा जैसी महामारी में खत्म हो गया, जो बचे वो इधर उधर जा बसे...गूगल अभी भी इस गाँव के वजूद को जिओ लोकेशन में दर्शा रहा है। .इन बीमारियों से ग्रस्त लोग और गांवो के नजदीक भी न जाते थे लोग क्योंकि ये छुआछूत की बीमारियां थी , यहां तक जनाजे को कंधा देने वाले लोग भी नही मिलते थे, और तो और परिजन जैसे तैसे मृत व्यक्ति को नदी आदि में प्रवाह के लिए ले जाते तो बीच मे पड़ने वाले गांव के लोग उन्हें गुजरने न देते की कही उस गांव में भी यह बीमारी न फैल जाए...अपृश्यता का इससे करुण उदाहरण क्या हो सकता है,और इससे सुखद भी क्या की इस छुआछूत को मिटा दिया उस जर्मन वैज्ञानिक ने इन महामारी फैलाने वाले जीवाणुओं की खोज करके, कहते है दुश्मन की तस्दीक़ हो जाए तो खतरा खुद ब खुद कम हो जाता है..



ये सब लिखने और कहने मायने सिर्फ ये है कि आज 24 मार्च को दुनिया टीबी दिवस मना रही है, एक ऐसी बीमारी जिसका नाम लेने से भी परहेज था लोगो को, भय की पराकाष्ठा वो इसलिए कि इस सफेद मौत का कोई इलाज नही था, तब तक वैज्ञानिक और दुनिया इसे आनुवंशिक बीमारी की तरह मानती थी, इसे कंजमशन भी कहते थे उस दौर में, भारत ने भी सेनिटोरियम खोले टीबी के मरीजों के लिए जहां पौष्टिक आहार और आबो हवा ही एक मात्र इलाज का जरिया थी, भवाली उत्तराखंड का सेनेटोरियम आज भी चल रहा है बावजूद इसके की अब टीबी लाइलाज नही, रॉबर्ट कोच ने जब टीबी बैसिलाई की खोज की और उसके संक्रामक होने के जरिए भी बताए तो बचाव की शुरुवात हुई, और फिर इसका इलाज भी खोज लिया गया..पेंसिलीन से लेकर अबतक बहुत ही बेहतरीन एंटीबायोटिक विकसित हो चुकी है मानवता में जो समूल नष्ट करने की कूबत रखती है इस घातक टीबी के जीवाणु को...

इस टीबी ने जॉन कीट्स, चेखव, कमला नेहरू से लेकर जयशंकर प्रसाद जैसीे शख्सियतों को मौत के आगोश में लिया, कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की भी मृत्यु भी इसी लाइलाज भयानक बीमारी से हुई, और दे गई बंटवारे की त्रासदी भी, एक अलाहिदा मुल्क़ पाकिस्तान की आज़ादी में जो ज़ल्द बाज़ी जिन्ना ने दिखाई उसका एक बड़ा कारण यह टीबी की बीमारी भी थी, उनके निजी डाक्टर के मुताबिक उन्हें पता चल चुका था कि अब वह बहुत दिनों तक जीवित रहने वाले नही...

विश्व टीबी दिवस पर नमन रॉबर्ट कोच को जिन्होंने मानवता को मौत की इन भीषण विभीषिकाओं से आज़ाद किया।

सम्पादक की कलम से..... 
कृष्ण कुमार मिश्र 
मैनहन

एक चिड़िया की आत्मा



एक चिड़िया की आत्मा-

एक चिड़िया की आत्मा
अक्सर सवार हो जाती है-
मेरे ऊपर 
और उड़ा ले जाती है आसमान में
जहां सूरज अपनी प्रचण्ड किरणॊं से 
बरसाता रहता है आग
हवा में उड़ते हुए
वह मुझे दिखाती है
श्रीहीन पर्वत श्रेणियां
ठूंठ में तब्दील हो चुके मुस्कुराते जंगल
सूखी नदियां-नाले-जलाशय
मेड़ पर बैठा
हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुका किसान
जो टकटकी लगाए ताकता रहता है
आसमान की ओर, कि
कोई दयालु बादल का टुकड़ा
हवा में तैरता हुआ आएगा
और बुझा देगा उसकी
जनम-जनम की प्यास.
(२)
एक चिड़िया की आत्मा
अक्सर सवार हो जाती है मेरे ऊपर
और उड़ा ले जाती है मुझे
चिपचिपे-कपसीले बादलों के बीच
फ़िर हवा में तैरती हुई वह
मुझे दिखाती है वह
पी.दयाल और रोहित का घर
जहां एक बाल-कविताएं रच रहा होता है
तो दूसरा, चित्रों में भर रहा होता है-
रंग-बिरंगे रंग
फ़िर एक गौरैया,
चित्र के ऊपर आकर बैठ जाती है, अनमनी सी
फ़िर दूर उड़ाती हुई वह
मुझे दिखाती है-
सतपुड़ा के घने जंगल
पहाड़ॊं के तलहटी पर-
अठखेलिया खेलती- 
अल्हड़ देनवा-
सरगम बिखेरते झरने-
हल चलाते किसान-
कजरी गातीं औरतें
और, टिमकी की टिमिक-टिम पर
आल्हा गाती मर्दों की टोलियां
न जाने, कितना कुछ दिखाने के बाद
वह, मुझे छॊड़ जाती है वापस
अपने घर की मुंडेर पर 
मैं बैठा रहता हूं देर तक भौंचक....


गोवर्धन यादव 

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१

07162-246651,9424356400


Mar 23, 2018

मिलिए सुनील दददा से...जिनके बेडरूम में रहते हैं पटटे पूत, गुटरगूं करने वाला कबूतर


=पत्नी की मौत के बाद अकेले रह गए सुनील दददा के जीने का सहारा बन गए पशु पक्षी
=हर पशु पक्षी की है अपनी अलग कहानी, जिसका कोई नहीं था, तब दददा ने दी जिंदगी

शाहजहांपुर।
मिलिए शाहजहांपुर जिले के खुदागंज में रहने वाले सुनील मिश्रा उर्फ दददा से। पत्नी की अरसा पहले मौत हो गई। अकेलापन था जिदंगी में तो उन्होंने अपना मन चिड़िया चिनगुनों में लगा लिया। बेडरूम में इनके पटटे पूत रहते हैं। कबूतर गुटरगूं करते हैं। बेडरूम से बाहर आते हैं तो गौरैया उनका इंतजार करती है। यह उन पशु पक्षियों के हमदर्द और खैरख्वाह हैं, जिनका सहारा कोई नहीं होता है। जो भी पशु पक्षी इनके घर में रहते हैं, सबकी अपनी कहानी है। इस कहानी का हीरों अगर कोई है तो वह अपने दददा हैं,जगत दददा...गौरैया वाले, कबूतर वाले, बुलबुल वाले, बंदर वाले, तोते वाले अपने दददा।

खुदागंज नगर में पशु पक्षी प्रेमी नाम से मशहूर सुनील मिश्रा उर्फ दद्दा किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। मगर उनकी यह पहचान उनके पक्षी प्रेम के नाते ही बनी है। सुनील मिश्रा खुदागंज के मोहल्ला साहूकारा में रहते हैं। इनके पिता जी पुलिस में कांस्टेबल थे। अब से लगभग 60 वर्ष पूर्व खुदागंज थाने में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने अपना निवास भी खुदागंज में बना लिया था। सुनील मिश्रा दद्दा का पालन-पोषण बहुत छोटे पर से खुदागंज में ही हुआ। परंतु दुर्भाग्यवश उनकी पत्नी का देहांत होने के बाद बीमारी के जाल में फंसने के कारण आर्थिक रुप से दद्दा परेशान रहने लगे। मात्र एक इलेक्ट्रॉनिक की दुकान के सहारे रोजी-रोटी चलाने का काम करते हैं। अपनी ईमानदारी व खुद्दारी के चलते उन्होंने कभी किसी से कोई मदद नहीं मांगी। 

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जिसका कोई नहीं, उसके दददा तो हैं यारों
खुद का परिवार के लिए दिनभर जद्दोजहद करने के बाद दद्दा कभी भी अपने पालतू पक्षियों व नगर में घूमने वाले आवारा पशु पक्षियों की चिंता में ही रहते। उन्हें कहीं भी कोई भी लाचार पशु या पक्षी सड़क पर मिल जाए तो वह तुरंत उसको उठाकर उसका पूरा इलाज व खाना-पानी की व्यवस्था अपने आवास पर करते हैं। जब पशु पक्षी स्वस्थ हो जाते हैं, तब उसको  पुन: छोड़ देते हैं, ताकि वह आजादी से फिर विचरण कर सकें। 

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सुनील मिश्रा का बेडरूम कम चिड़ियाघर ज्यादा
सुनील मिश्रा के मकान में पशु पक्षियों के रहने की कोई अलग व्यवस्था नहीं है। उन्होंने अपने कमरे में ही सभी निरीह पक्षियों को स्थान दे रखा है। उनके कमरे की शोभा उनका तोता पट्टे व कबूतर बढ़ा रहे हैं। बकौल सुनील मिश्रा लगभग 4 साल पहले सुबह टहलने के दौरान यह तोता पेड़ के नीचे गिरा पड़ा था, उड़ने में असमर्थ था, सुनील मिश्रा इसको वहां से ले आए और उसको खिला-पिलाकर स्वस्थ बना दिया। वहीं उनका कबूतर जिसको एक कुत्ते ने पूरी तरीके से चबा लिया था, वर्ष 2010 में यह कबूतर उनको खुदागंज की सड़क पर मरणासन्न अवस्था में पड़ा  मिला था, दद्दा आज भी इस कबूतर के दाना पानी की व्यवस्था अपने परिवार की तरह कर रहे हैं। वहीं अपने कमरे के ठीक आगे उन्होंने गौरैया के लिए खुला पिंजड़ा बैठने के लिए रखा है। वहीं पर दाने पानी की व्यवस्था कर रखी है, जिसे वह सुबह उठकर नित्य रूप से प्यार करते हैं। उनके आवास पर ही एक पेड़ पर तमाम बुलबुल आकर बैठती हैं। सुनील मिश्रा का यह पक्षी प्रेम मन को प्रफुल्लित करता है। सुनील गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने कई अस्वस्थ जानवरों का इलाज भी करवाया। 

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तब करंट से जख्मी बंदर की सेवा की
एक घटना दददा ने बताई, जिसमें लगभग 8 वर्ष पहले 11000 की बिजली लाइन से टकराकर बंदर झुलस गया था। सुनील गुप्ता उसको घर ले आए। लगभग 2 वर्ष तक उसकी सेवा की। उसके शरीर में कीड़े पड़ गए थे। 2 वर्ष बाद वह बंदर पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया, फिर अपने गंतव्य स्थल पर चला गया। सुनील मिश्रा हृदय के रोगी भी हैं। वह बताते हैं कि यह सब करने से उन्हें सुकून मिलता है और इन्हीं सभी पशु पक्षियों की दुआओं के चलते उनका परिवार व की बीमारी का इलाज हो रहा है। सुनील मिश्रा संग्रह की एक जीती जागती उदाहरण है उनके पास तमाम ऐसे चीजें आज भी उपलब्ध है जो नगर में खोजने पर भी नहीं मिलती। सुनील मिश्रा का यह जीव प्रेम वह मुश्किल ही देखने को मिलता है।


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साभार:-दैनिक हिन्दुस्तान, शाहजहांपुर
लेखक : रोहित सिंह का असली नाम तो विजय विक्रम सिंह है। वह हिन्दुस्तान में खुदागंज से प्रतिनिधित्व करते हैं। रोहित अमर उजाला में भी सेवाएं दे चुके हैं। रोहित बीपीएड हैंं। शाहजहांपुर के सुदूर खुदागंज की आर्थिक, सामाजिक मसलों को समय समय पर बेहद दमदार तरीके से उठाते हैं। रोहित बेहद संवेदनशील हैं। इनसे इनके मोबाइल फोन नंबर 7007620713 पर संपर्क किया जा सकता है।

Mar 22, 2018

विश्व टीबी दिवस- मौत का कहर बरपा है कभी इस बीमारी से..


टीबी से बचाव ही टीबी का बेहतर उपचार (विश्व क्षय रोग दिवस, 24 मार्च पर विशेष आलेख) 

टीबी (क्षय रोग) एक घातक संक्रामक रोग है जो कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु की वजह से होती है। टीबी (क्षय रोग)  आम तौर पर ज्यादातर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह फेफड़ों के अलावा शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह रोग हवा के माध्यम से फैलता है। जब क्षय रोग से ग्रसित व्यक्ति खांसता, छींकता या बोलता है तो उसके साथ संक्रामक ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई उत्पन्न होता है जो कि हवा के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है। ये ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई कई घंटों तक वातावरण में सक्रिय रहते हैं। जब एक स्वस्थ्य व्यक्ति हवा में घुले हुए इन माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई के संपर्क में आता है तो वह इससे संक्रमित हो सकता है। क्षय रोग सुप्त और सक्रिय अवस्था में होता है। सुप्त अवस्था में संक्रमण तो होता है लेकिन टीबी का जीवाणु निष्क्रिय अवस्था में रहता है और कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। अगर सुप्त टीबी का मरीज अपना इलाज नहीं कराता है तो सुप्त टीबी सक्रिय टीबी में बदल सकती है। लेकिन सुप्त टीबी ज्यादा संक्रामक और घातक नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार विश्व में 2 अरब से ज्यादा लोगों को लेटेंट (सुप्त) टीबी संक्रमण है।  सक्रिय टीबी की बात की जाए तो इस अवस्था में टीबी का जीवाणु शरीर में सक्रिय अवस्था में रहता है, यह स्थिति व्यक्ति को बीमार बनाती है। सक्रिय टीबी का मरीज दूसरे स्वस्थ्य व्यक्तियों को भी संक्रमित कर सकता है, इसलिए सक्रिय टीबी के मरीज को अपने मुँह पर मास्क या कपडा लगाकर बात करनी चाहिए और मुँह पर हाथ रखकर खाँसना और छींकना चाहिए।

टीबी (क्षय रोग) के लक्षण

1) लगातार तीन हप्तों से खांसी का आना और आगे भी जारी रहना।
2) खांसी के साथ खून का आना।
3)  छाती में दर्द और सांस का फूलना।
4) वजन का कम होना और ज्यादा थकान महसूस होना।
5) शाम को बुखार का आना और ठण्ड लगना।
6) रात में पसीना आना।

टीबी (क्षय रोग) के प्रकार

1) पल्मोनरी टीबी (फुफ्फुसीय यक्ष्मा) - अगर टीबी का जीवाणु फेफड़ों को संक्रमित करता है तो वह पल्मोनरी टीबी (फुफ्फुसीय यक्ष्मा) कहलाता है। टीबी का बैक्टीरिया 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में फेंफड़ों को प्रभावित करता है।  लक्षणों की बात की जाए तो आमतौर पर सीने में दर्द और लंबे समय तक खांसी व बलगम होना शामिल हो सकते हैं। कभी-कभी पल्मोनरी टीबी से संक्रमित लोगों की खांसी के साथ थोड़ी मात्रा में खून भी आ जाता है। लगभग 25 प्रतिशत ज्यादा मामलों में किसी भी तरह के लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। बहुत कम मामलों में, संक्रमण फुफ्फुसीय धमनी तक पहुंच सकता है। जिसके कारण भारी रक्तस्राव हो सकता है। टीबी एक पुरानी बीमारी है और फेफड़ों के ऊपरी भागों में व्यापक घाव पैदा कर सकती है। फेंफड़ों के ऊपरी में होने वाली टीबी को कैविटरी टीबी कहा जाता है। फेफड़ों के ऊपरी भागों में निचले भागों की अपेक्षा तपेदिक संक्रमण प्रभाव की संभावना अधिक होती है।  इसके अलावा टीबी का जीवाणु कंठनली को प्रभावित कर लेरींक्स टीबी करता है।

2) एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) - अगर टीबी का जीवाणु फेंफड़ों की जगह शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित करता है तो इस प्रकार की टीबी एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) कहलाती है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी पल्मोनरी टीबी के साथ भी हो सकती है। अधिकतर मामलों में संक्रमण फेंफड़ों से बाहर भी फैल जाता है और शरीर के दूसरे अंगों को प्रभावित करता है। जिसके कारण फेंफड़ों के अलावा अन्य प्रकार के टीबी हो जाते हैं। फेंफड़ों के अलावा दूसरे अंगों में होने वाली टीबी को सामूहिक रूप से एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) के रूप में चिह्नित किया जाता है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) अधिकतर कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों और छोटे बच्चों में अधिक आम होता है। एचआईवी से पीड़ित लोगों में, एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) 50 प्रतिशत से अधिक मामलों में पाया जाता है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) को अंगों के हिसाब से नाम दिया गया है। अगर टीबी का जीवाणु केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है तो वह मैनिंजाइटिस टीबी कहलाती है। लिम्फ नोड (लसिका प्रणाली, गर्दन की गंडमाला में) में होने वाली टीबी को लिम्फ नोड टीबी कहा जाता है। पेराकार्डिटिस तपेदिक में ह्रदय  के आसपास की झिल्ली (पेरीकार्डियम) प्रभावित होती है। पेराकार्डिटिस तपेदिक में पेरीकार्डियम झिल्ली और ह्रदय के बीच की जगह में फ्लूइड (तरल पदार्थ) भर जाता है। हड्डियों व जोड़ों को प्रभावित करने वाली टीबी हड्डी व् जोड़ों की टीबी कहलाती है। जनन मूत्रीय प्रणाली को प्रभावित करने वाली टीबी जेनिटोयूरिनरी टीबी (मूत्रजननांगी तपेदिक) कहलाती है। इसके अलावा भी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर विभिन्न प्रकार की एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) करता है।    


ड्रग रेजिस्टेंस टीबी के प्रकार
1) मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी- इस प्रकार की ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फस्र्ट लाइन ड्रग्स का टीबी के जीवाणु  (माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस) पर कोई असर नहीं होता है। अगर टीबी का मरीज नियमित रूप से टीबी की दवाई नहीं लेता है या मरीज द्वारा जब गलत तरीके से टीबी की दवा ली जाती है या मरीज को गलत तरीके से दवा दी जाती है और या फिर टीबी का रोगी बीच में ही टीबी के कोर्स को छोड़ देता है (टीबी के मामले में अगर एक दिन भी दवा खानी छूट जाती है तब भी खतरा होता है) तो रोगी को मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी हो सकती है। इसलिए टीबी के रोगी को डॉक्टर के दिशा निर्देश में नियमित टीबी की दवाओं का सेवन करना चाहिए। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फस्र्ट लाइन ड्रग्स आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन जैसे दवाओं का मरीज पर कोई असर नहीं होता है क्योंकि आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन का टीबी का जीवाणु (माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस) प्रतिरोध करता है।
2) एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी- इस प्रकार की टीबी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी से ज्यादा घातक होती है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजीस्टेंट टीबी में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी के उपचार के लिए प्रयोग होने वाली सेकंड लाइन ड्रग्स का टीबी का जीवाणु प्रतिरोध करता है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फस्र्ट लाइन ड्रग्स आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन के साथ-साथ टीबी का जीवाणु सेकंड लाइन ड्रग्स में कोई फ्लोरोक्विनोलोन ड्रग (सीप्रोफ्लॉक्सासिन, लेवोफ्लॉक्सासिन और मोक्सीफ्लोक्सासिन) और कम से कम एक अन्य इंजेक्शन द्वारा दी जाने वाली ड्रग (अमिकासिन, कैनामायसिन और कैप्रीयोमायसिन) का प्रतिरोध करता है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का रोगी द्वारा अगर सेकंड लाइन ड्रग्स को भी ठीक तरह और समय से नहीं खाया जाता या लिया जाता है तो एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की सम्भावना बढ़ जाती है। इस प्रकार की टीबी में एक्सटेंसिव थर्ड लाइन ड्रग्स द्वारा 2 वर्श से अधिक तक उपचार किया जाता है। लेकिन एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का उपचार सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।

टीबी की जांच कैसे की जाती है
टीबी के लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर द्वारा रोगी को टीबी को जांचने के लिए कई तरह के टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है जो निम्न है-

1) स्पुटम/अन्य फ्लूइड टेस्ट- इस टेस्ट में मरीज के बलगम/अन्य फ्लूइड की लैब में प्रोसेसिंग होने के बाद स्लाइड पर उसका स्मीयर बनाया जाता है फिर उसकी एसिड फास्ट स्टैंनिंग की जाती है। स्टैंनिंग के बाद में स्लाइड पर टीबी के जीवाणु की माइक्रोस्कोप के जरिए पहचान की जाती है। माइक्रोस्कोप द्वारा बलगम की जांच में 2-3 घंटे का समय लगता है। इस जांच के आधार पर डॉक्टर रोगी का इलाज शुरू कर देता है। लेकिन विभिन्न कारणों की वजह से इसमे गड़बड़ी की आशंका होती है। इसलिए सैंपल का  प्रोसेसिंग के समय पर ही लोएस्टीन जेनसेन मीडिया पर कल्चर लगाया जाता है। इसके बाद सैंपल से इनोक्यूलेटेड कल्चर को इनक्यूबेटर में 37 डिग्री सेल्सियस पर रख देते हैं। इस जांच में 45 दिन या उससे अधिक समय लग सकता है।  

2) स्किन टेस्ट (मोन्टेक्स टेस्ट)- इसमे इंजेक्शन द्वारा दवाई स्किन में डाली जाती है जो 48-72 घंटे बाद पॉजिटिव रिजल्ट होने पर टी.बी. की पुष्टि होती है। लेकिन इस टेस्ट में बीसीजी टीका लगे हुए और लेटेंट टीबी संक्रमण का भी पॉजिटिव रिजल्ट आ जाता है।

3) लाइन प्रोब असे- यह एक रैपिड ड्रग संवेदनशीलता टेस्ट है। इस टेस्ट के जरिए टीबी के जीवाणु के फर्स्ट लाइन ड्रग्स (आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन) के प्रतिरोध से जुडी जेनेटिक म्यूटेशन की पहचान 1-2 दिनों में कर ली जाती है जिसकी वजह से मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की भी पहचान हो जाती है।

4) जीन एक्सपर्ट टेस्ट- नवीनतम तकनीक जीन एक्सपर्ट एक कार्टिरेज बेस्ड न्यूक्लिक एसिड एम्फ्लिफिकेशन आधारित टेस्ट है। जीन एक्सपर्ट द्वारा महज दो घंटे में बलगम द्वारा टीबी का पता लगाया जा सकता है। साथ ही इस टेस्ट में जीवाणु के फर्स्ट लाइन ड्रग रिफाम्पिसिन के प्रतिरोध से जुडी जेनेटिक म्यूटेशन तक की भी पहचान कर ली जाती है जिसकी वजह से मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की भी पहचान हो जाती है।

टीबी का उपचार
टीबी के जीवाणुओं को मारने के लिए इसका उपचार करने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। टीबी के उपचार में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली दो एंटीबायोटिक्स आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन हैं, और उपचार कई महीनों तक चल सकता है। सामान्य टीबी का उपचार ६-९ महीने में किया जाता है। इन छह महीनों में पहले दो महीने आइसोनियाजिड, रिफाम्पिसिन, इथाम्बुटोल और पायराजीनामाईड का उपयोग किया जाता है। इसके बाद इथाम्बुटोल और पैराजिनामाइड ड्रग्स को बंद कर दिया जाता है बाकी के ४-७ महीने आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही टीबी के इलाज के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन इंजेक्शन का भी उपयोग किया जाता है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फर्स्ट लाइन ड्रग्स का प्रभाव खत्म हो जाता है इसके लिए सेकंड लाइन ड्रग्स का उपयोग किया जाता है जिसमे सीप्रोफ्लॉक्सासिन, लेवोफ्लॉक्सासिन, मोक्सीफ्लोक्सासिन, अमिकासिन, कैनामायसिन और कैप्रीयोमायसिन इत्यादि एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जाता है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का इलाज २ साल तक चलता है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का इलाज डॉक्टर की विशेष देखरेख में थर्ड लाइन ड्रग्स द्वारा किया जाता है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का इलाज दो वर्ष से अधिक समय तक चलाया जाता है।  एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है।       

टीबी की रोकथाम
1)  क्षय रोग की रोकथाम और नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से शिशुओं के बैसिलस कैल्मेट-ग्यूरिन (बीसीजी) का टीकाकरण कराना चाहिए  बच्चों में यह 20% से ज्यादा संक्रमण होने का जोखिम कम करता है।
2)  सक्रिय मामलों के पता लगने पर उनका उचित उपचार किया जाना चाहिए। टीबी रोग का उपचार जितना जल्दी शुरू होगा उतनी जल्दी ही रोग से निदान मिलेगा।
3)  टीबी रोग से संक्रमित रोगी को खाँसते वक्त मुँह पर कपड़ा रखना चाहिए, और  भीड़-भाड़ वाली जगह पर या बाहर कहीं भी नहीं थूकना चाहिए।
4)   साफ-सफाई के ध्यान रखने के साथ-साथ कुछ बातों का ध्यान रखने से भी टीबी के संक्रमण से बचा जा सकता है।
5)   ताजे फल, सब्जी और कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, फैट युक्त आहार का सेवन कर रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। अगर व्यक्ति की रोक प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी तो भी टीबी रोग से काफी हद तक बचा जा सकता हैं।

लेखक
ब्रह्मानंद राजपूत, दहतोरा, आगरा (पूर्व प्रोजेक्ट ट्रेनी, राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ रोग संस्थान एवं अन्य मायकोबैक्टीरियल रोग, आगरा)
(Brahmanand Rajput) Dehtora, Agra

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