डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

इस जिन्दा खूबसूरती को नष्ट न करे..तस्वीर पर क्लिक करे

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 20, 2014

दुधवा में हिमरानी गैंडा की हुई मौत


दुधवा के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी तक पहुंचाने में रहा योगदान


दुधवा में मादा गैंडा हिमरानी का पोस्टमार्टम करते डाक्टर

दुधवा नेशनल पार्क से देवेंद्र प्रकाश मिश्रा की रिपोर्ट

पलियाकलां-खीरी। दुधवा नेशनल पार्क में चल रही गैंडा पुर्नवास परियोजना की फाउंडर मेम्बर मादा गैंडा हिमरानी की बीमारी की चलते असमय मौत हो गई। इसके कारण दुधवा परिवार में शोक की लहर दौड़ गई। तीन डाक्टरों के पैनल से शव का पोस्टमार्टम कराया गया। बेलरायां वार्डन ने अपनी देखरेख में हिमरानी के शव को दफन करवा दिया।

दुधवा नेशनल पार्क में एक अप्रैल 1984 को विश्व की पहली गैंडा पुर्नवास परियोजना शुरू की गई थी। तब हिमरानी नामक मादा गैंडा को आसाम से यहां लाया गया था। लगभग चालिस वर्ष की आयु पूरी कर चुकी हिमरानी को बीते दिवस मानीटरिंग के दौरान बीमारी की स्थिति में सुस्त देखा गया था।

 दुधवा पार्क प्रशासन द्वारा उसके उपचार की कोई व्यवस्था की जाती इससे पहले ही बीती रात उसकी असमय मौत हो गई। इसकी सूचना से दुधवा परिवार में शोक दौड़ गई। दुधवा टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि डब्ल्यूटीआई के पशु चिकित्सक डाॅ सौरभ सिंघई, राजकीय पशु चिकित्सालय परसिया के डाॅ नीरज कुमार तथा दुधवा की प्रतिनिधि डाॅ नेहा सिंघई द्वारा हिमरानी के शव का पोस्टमार्टम कराया गया है। इस दौरान डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के गैंडा विशेषज्ञ रोहित रवि भी मौजूद रहे। उन्होंने बताया कि हिमरानी ने पांच बच्चों को जन्म देकर दुधवा के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी में पहुंचाया है।

 बेलरायां वार्डन एनके उपाध्याय की देखरेख में हिमरानी के शव को दफन किया गया। उल्लेखनीय है कि दिसम्बर 2012 में बाघ ने हमला करके हिमरानी गैंडा को बुरी तरह से जख्मी कर दिया था। तब डब्ल्यूटीआई के डाॅ सौरभ सिंघई एवं डाॅ नेहा सिंघई आदि ने अथक प्रयास करके उसे मौत के चंगुल से बचा लिया था। डीडी वीके सिंह ने चालिस वर्षीय हिमरानी की मौत पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए बताया कि वह दुधवा के गैंडा परिवार की सबसे बुजुर्ग सदस्य थी उसने यहां के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी तक पहुंचाया उसके इस योगदान को दुधवा के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।
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मादा गैंडा हिमरानी 

हिमरानी से चैथी पीढ़ी में पहुंचा दुधवा का गैंडा परिवार
बाघ के हमला से एक बार बची थी उसकी जान
दुधवा के गैंडा परिवार की थी सबसे बुजुर्ग सदस्य


दुधवा नेशनल पार्क के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी तक पहुंचाने वाली फांउडर मेम्बर मादा गैंडा हिमरानी की असमय मौत से गैंडा पुर्नवास परियोजना को करारा झटका लगा है। हालांकि उसके जवान पांच बच्चों के तीस सदस्यीय गैंडा परिवार दुधवा के जंगल में स्वच्छंद विचरण कर रहा है जो यहां आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण के केन्द्र बिन्दु होते हैं। 


तराई इलाका के मैदानों से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा को फिर से उनके पूर्वजों की धरती पर बसाने की दुधवा नेशनल पार्क में विश्व की एकमात्र दुधवा पुर्नवास परियोजना चल रही है। एक अप्रैल 1984 को शुरू की गई इस परियोजना में आसाम से छह गैंडा को लाया गया था। इसमें से तीन गैंडों की असमय मौत हो जाने पर सोलह हाथी के बदले छह गैंडा नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान से लाया गया था। उतार-चढ़ाव के तमाम झंझावतों को झेलने के बाद भी गैंडा पुर्नवास परियोजना सफलता के फायदान पर चढ़ रही है। हालांकि पितामह नर गैंडा वार्क से ही सभी सतानें हुई हैं, इसके कारण दुधवा के गैंडा परिवार पर आनुवंशिक प्रदूषण यानी इनब्रीडिंग का खतरा मंडरा रहा है। इससे निपटने के लिए बाहर से अन्य गैंडों का यहां लाया जाना आवश्यक बताया जा रहा है।

 दुधवा नेशनल पार्क की सोनारीपुर दक्षिण रेंज के 27 वर्गकिमी जंगल को ऊर्जाबाड़ से संरक्षित इलाका के पास ही गैंडों के लिए नया प्राकृतिक आवास तैयार किया गया है। इसमें आसाम से गैंडा लाने की योजना है, जो शासन में विचाराधीन चल रही है। दुधवा के गैंडा परिवार को बीती रात तब करारा झटका लग गया जब सबसे बुजुर्ग मादा गैंडा हिमरानी की बीमारी के चलते असमय मौत हो गई। चालिस बंसत देख चुकी हिमरानी ने चार मादा एवं एक नर बच्चे को जन्म देकर परियोजना को आगे बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसमें हिमरानी से पैदा हुए राजश्री, विजयश्री, राजरानी, सहदेव एवं हेमवती दुधवा के गैंडा परिवार की वंशवृद्धि कर रहे हैं। राजश्री ने दो तथा हेमवती ने एक बच्चे को जन्म देकर दुधवा के गैंडा परिवार की वंशवृद्धि कर रहे हैं। हिमरानी की नाक का छोटा सींग ही उसकी पहचान भी था।

 संकटकाल में गैंडा अपने सींग के घातक प्रहार दुश्मन पर करके अपनी सुरक्षा करते हैं। चूंकि हिमरानी का सींग छोटा था, इसीलिए दिसम्बर 2012 में दुधवा के इतिहास में पहली बार बलशाली बाघ ने उसपर पीछे से हमला करके गंभीर रूप से घायल कर दिया था। कड़े पहरा और सुरक्षित बाड़ा में चले उपचार के दौरान हिमरानी ने मौत को पराजित कर नई जिंदगी हासिल कर ली और फिर से जंगल मे स्वच्छंद घूमने लगी थी। दुधवा टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि गैंडों की अनुमानित आयु 36 से 40 साल के बीच मानी जाती है। बाघ के हमला से तो हिमरानी की जान प्रयास करके बचा ली गई थी। लेकिन इस बार वह कुदरत की मौत से हार गई।
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देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
dpmishra7@gmail.com

Oct 12, 2014

उत्तर प्रदेश सरकार ने दुधवा लाइव को किया सम्मानित


पर्यावरण के क्षेत्र में जागरूकता अभियान व् पर्यावरण एवं वन्य जीवन के सरंक्षण में योगदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा डिजिटल एम्पावरमेंट प्रोग्राम के तहत दुधवा लाइव ई पत्रिका के संस्थापक/सम्पादक कृष्ण कुमार मिश्र को ११ अक्टूबर २०१४ को क्लार्क्स अवध में आयोजितई उत्तरा एवार्ड समारोह में सम्मानित किया. कार्यक्रम का उदघाटन उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन ने किया व् एवार्ड वितरण के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री अभिषेक मिश्रा उपस्थित रहे.




पूरे उत्तर प्रदेश में प्रत्येक जनपद से जिलाधिकारियों एवं इंटरनेट के माध्यम से नामांकन हुए जिनमे विभिन्न क्षेत्रों से  कुल १३७ नामांकन शामिल किए गए. कृषि एवं पर्यावरण में १४ नामांकन थे जिनमे अंतिम चरण में ५ नामांकनों को शामिल किया गया. पूरे उत्तर प्रदेश में पर्यावरण के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए दुधवा लाइव पत्रिका को फाइनलिस्ट की श्रेणी में ई उत्तरा पुरस्कार दिया गया.




गौरतलब है सन २०१३ में जर्मन सरकार के डाईचे वैले संस्थान ने १४ भाषाओं में विशिष्ट कार्य करने वाले विभिन्न देशों के लोगों में भारत से दुधवा लाइव को हिन्दी भाषा में श्रेष्ठ कार्य करने के लिए "द बाब्स"  पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.



भारत के उत्तर प्रदेश की तराई में मौजूदवनों व् कृषि क्षेत्रों में मौजूद जैव विविधिता के अध्ययन व् सरंक्षण में दुधवा लाइव पिछले पांच वर्षों से प्रयत्नशील है. पर्यावरण सरंक्षण व् गौरैया बचाओ अभियान जैसे जमीनी कार्यक्रमों द्वारा लोगों में गाँव गाँव तक पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया है.



दुधवा लाइव उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त भारत के सरंक्षित क्षेत्रों के वन्य जीवों व् वनस्पतियों के सन्दर्भ में भी समय समय पर खबरे प्रकाशित करता आया है साथ ही दुनिया के तमाम देशों से पर्यावरण व् वन्य जीवन की कहानियों को दुधवा लाइव  पत्रिका में स्थान मिलता रहता है ताकि जनमानस की रूचि जीवों एवं पर्यावरण के सरंक्षण में बढ़ सके.

दुधवा लाइव ने बुंदेलखंड के अवैध खनना व् जल माफियाओं की ख़बरों को प्रमुखता से जगह दी ताकि बुंदेलखंड की धरती पर बहती नदियाँ सदानीरा रह सके.

दुधवा लाइव के प्रोजेक्ट "रेजिंग एन्वायरमेंटल अवेअरनेस थ्रू दुधवा लाइव ई मैगजीन " को डिजिटल एम्पावरमेंट फाउन्डेसन व् द पब्लिक इंटरेस्ट रजिस्ट्री संस्थान व् उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित किताब में प्रमुखता से जगह दी है.


प्रकृति की कहानियों को संजोने का यह कार्य करते हुए दुधवा लाइव पत्रिका को पांच वर्ष हो गए, भविष्य में वन्य जीवन सरंक्षण, पशु क्रूरता के खिलाफ आवाज़, नदियों-तालाबों के सरंक्षण, व् कृषि क्षेत्र में मौजूद जैव विवधिता के सरंक्षण में हम यूं ही काम करते रहे इसके लिए आप सभी का सहयोग व् स्नेह की आकांक्षा है.

डेस्क दुधवा लाइव

Oct 3, 2014

विश्व प्रकृति दिवस ३ अक्टूबर पर विशेष




बाँदा – सरकारी दस्तावेजो से निकली 3 अक्तूबर की तारीख एक बार फिर आ गई  विश्व प्रकृति दिवस है आज पूरी दुनिया में आज के दिन प्रकृति को बचाने , उसे सुन्दर और अपनी गतिविधि को प्रकृति सम्यक बनाने की पुनः कसमे खाई जाएगी 

बुंदेलखंड भी तो अपना प्राकृतिक रूप से खुशहाल था न इतिहास पलटे तो यहाँ भी चन्देल कालीन स्थापित किले और मंदिर हरे – भरे जंगलो और सीना ताने पहाड़ो के मध्य ही बने थे  लेकिन कंक्रीट के विकास की रफ़्तार इतनी तेज हो गई कि हमने प्रकृति के साथ न सिर्फ बलात्कार किया बल्कि उसकी अस्मिता पर ही आज प्रश्न चिन्ह लगा दिया है l बुंदेलखंड के खजुराहो और कालिंजर के अवशेष कभी इसलिए ही ख्यातिप्राप्त स्तम्भ थे क्योकि उनको पर्यावरणीय नजर से सम्रध पाया गया था मगर अब यहाँ परती होती कृषि जमीने,प्राकृतिक संसाधनों के उजाड़ ने इसको सूखा और नदी – पहाड़ो के खनन की मंडी के रूप में स्थापित कर दिया है  एक सर्वे के मुताबिक इस प्राकृतिक उजाड़ के खेल में पल रहे है 8500 बाल श्रमिक जिनके हाथो में बस्ता नही हतौड़ा है lसात जनपद में तेजी से जंगल का प्रतिशत घट कर 7 फीसदी से कम है तो वही 200 मीटर ऊँचे पहाड़ो को 300 फुट नीचे तक गहरी खाई में तब्दील कर दिया गया है बुंदेलखंड में इस वर्ष 19 वा सूखा है l पानी का एक्यूप्रेशर कहे जाने वाले पहाड़ अब देखने में डरावने लगते है  पर यह सब प्रकृति की तबाही जारी है क्योकि हमें विकास करना है ! एक ऐसा अंधा विकास जो बुंदेलखंड को रेगिस्तान बना देगा  चित्रकूट,महोबा और झाँसी , ललितपुर यहाँ काले पत्थर के खनन और बाँदा,हमीरपुर,जालौन लाल बालू के लिए मशहूर है  एनजीटी , सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय इलाहाबाद के कई आदेश इस प्रकृति विरोधी कार्य के लगाम लगाने में जारी हुए पर थक हारकर उसकी लड़ाई लड़ने वाले या तो खामोश हुए या करा दिए गए  ठेठ हिंदी पट्टी के केन , यमुना,मंदाकनी,बेतवा,पहुंज,धसान,उर्मिल,चन्द्रावल,बागे नदियों की कभी अविरल धार में खेलता बुंदेलखंड आज समसामयिक द्रष्टि से किसान आत्महत्या और जल संकट के लिए अधिक पहचाना जाता है 




सरकारी तंत राजस्व की आड़ में चुप है और प्रकृति के दुश्मन बेख़ौफ़ है आंकड़ो में निगाह डाले तो बुंदेलखंड के हिस्से कुल 1311 खनन पट्टे है  जिसमे 1025 चालू और 86 रिक्त है वही पुरे उत्तर प्रदेश में ये सूरत 3880 खदान पर है जिसमे 1344 खनन पट्टे चालू है बालू और पत्थर के खनन के लिए वनविभाग की एनओसी लेनी होती है कानून का राज बुंदेलखंड में नही चलता, यहाँ लोग प्रगतिशील किसान नही खनन माफिया कहलाना अधिक पसंद करते है l बकौल बाँदा जिले के तिंदवारी से कांग्रेस के विधायक दलजीत सिंह खुद कहते है ‘ हाँ मै बालू माफिया हूँ और गुंडा टैक्स भी देता हूँ  

इसके ठीक उलट एक गाँव का कर्जदार किसान गर्व से यह नही कह पाता कि हाँ मै कर्ज के मकड़ जाल में फंसा हूँ  और समय से कर्ज अदा करता हूँ क्योकि उसको तो प्रकृति के विनाश से ख़ुदकुशी ही मिलनी है दबंग , दादू विनाशकारी ताकतों की बदौलत 


सामाजिक कार्यकर्ता - आशीष सागर दीक्षित,बाँदा   
 ashishdixit01@gmail.com

Sep 24, 2014

केन – बेतवा नदी गठजोड़ पानी और जंगल की तबाही



सरकारी दस्तावेजो की माने तो पन्ना टाइगर रिजर्व पार्क के अन्दर बसे चार गाँव वर्ष 2010 में ही  विस्थापित कर दिए गए थे लेकिन हकीकत में गाँव आज भी आबाद है, वहां प्राथमिक स्कूल में मध्यान्ह भोजन बन रहा है गरीब किसान मुआवजे की ताक में लगातार कर्जदार बनता जा रहा है वहां सरकारी घुसपैठिये पहले की तरह आते – जाते है आदिवासी के साथ ये विडंबना है कि विस्थापन के डर से वे न तो महानगरो में रोजगार के लिए जा पा रहे है और न खेतो में.  
पन्ना टाइगर रिजर्व पार्क और  बफर जोन ( प्रतिबंधित क्षेत्र ) में शामिल कुल 10 ग्राम विस्थापित किये जाने है, लेकिन जनसूचना अधिकार में 1 जुलाई वर्ष 2010 को जल संसाधन मंत्रालय ने लिखित जवाब दिया कि दौधन बांध ( ग्रेटर गंगऊ ) से प्रभावित होने वाले 10 गाँव में चार गाँव मैनारी,खरयानी , पलकोहा, एवं दौधन को वनविभाग विस्थापित कर चुका है, शेष छह गाँव में शुकवाहा, भोरखुआ, घुघरी,बसुधा,कूपी और शाहपुरा है जिन्हें विस्थापित किया जाना है,करीब 8500 किसान इससे प्रभावित होंगे लेकिन सरकारी आंकड़ो में मात्र 806 किसानो के विस्थापन का ज़िक्र है, इस दोहरेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अकेले दौधन ग्राम की जनसँख्या 2500 है,जंगलो से पकड़े जा रहे बाघों की तरह ये आदिवासी भी वनविभाग के गुलाम बनाये जा रहे है इन्हे भी लोकतंत्र में वन्य जीवो की तरह आज स्वतंत्रता की दरकार है l बांध की जद में आने वाले आदिवासी पार्वती, शिवनारायण यादव ने बेबाकी से कहा कि 50 लाख रूपये मुआवजा चाहिए प्रति परिवार जान देंगे मगर जमीन मुफ्त में नही देंगे

हमारी पीढ़ियाँ इन जंगलो की प्रहरी रही है जिसे वनविभाग ने उजाड़ दिया है, वे आन्दोलन की फ़िराक में देर एक आदिवासी आंबेडकर की है सरकारी कागज कहते है आदिवासी लोगो का पुनर्वास मध्यप्रदेश सरकार के ‘ राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण,वन विभाग,मध्यप्रदेश (एन.टी.सी.ए.) के माध्यम से किया जाना है इन परिवारों के पुनर्वास – विस्थापन आदि  कार्य केंद्र सरकार की वर्ष 2007 एवं मध्यप्रदेश सरकार की आदर्श विस्थापन नीति में दिए गए मापदंडो के अनुरूप किया जायेगा जिसमे आदिवासी के आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक आजीवका के साधनों की व्यवस्था की जानी है गौरतलब है कि हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार ने इस परियोजना को स्वीकृति दी है पूर्व कांग्रेसी केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस परियोजना से पर्यावरण में दखलंदाजी होने के चलते अनुमति नही दी थी पिछले दस वर्षो गाँव रह – रहकर  सर्वे कार्य चल रहा है इस बात का अहसास कराने के लिए कि घर से बेघर होने के लिए किसी भी क्षण तैयार रहो 


उल्लेखनीय है कि प्रवास सोसाइटी ने टीम के साथ  इस परिक्षेत्र के गाँवो का दो दिवस भ्रमण किया है आदिवासी परिवारों से बातचीत की गई जिसमे कई परिवारों के बुजुर्ग , युवा साथी शामिल रहे है बांध क्षेत्र से प्रभावित होने वाले शुकवाहा गाँव के बलवीर सिंह, दौधन गाँव के गुबंदी कोंदर( अध्यापक ), मुन्ना लाल यादव और पलकोहा गाँव के ग्राम प्रधान जगन्नाथ यादव अपना अपने पूर्वजो को याद करते हुए विस्थापन का दर्द बतलाते है प्रधान ने दावा किया है कि वनविभाग की निगहबानी में रहते है यहाँ दलित आदिवासी आदिवासियों के लिए दिखलाये गए सब्जबाग से इतर बड़ी बात ये है हमें कभी इस बांध के बारे में कुछ नही बतलाया जाता है, उधर प्रति बीपीएल परिवार को मात्र 40,000 रूपये मुआवजा 2010 में मिली जनसूचना में जानकारी दी गई तीन वर्ष पूर्व बांध परियोजना में लगभग 7,614.63 करोड़ रुपया खर्च का अनुमान था जो अब बढ़कर 11 हजार करोड़ रुपया के करीब है  यानि केंद्र सरकार आदिवासियों के पुनर्वास पर 1 हजार करोड़ रूपये भी खर्च नही करना चाहती है  इस केन – बेतवा लिंक में नहरों के विकास पर 6499 हेक्टेयर सिंचित कृषि जमीन अधिग्रहीत की जानी है आदिवासी परिवारों की माने तो 40 हजार में तो बमीठा कसबे में ही आवास की जमीन नही मिलेगी छतरपुर,खजुराहो की तो बात ही अलग है इनके अनुसार 2 लाख रूपये एक परिवार को मुआवजा सरकार के हिसाब से होता है एक परिवार को केन – बेतवा नदी गठजोड़ की डीपीआर के मद्देनजर कोई संवाद आज तक आदिवासी लोगो के साथ केंद्र या मध्यप्रदेश की राज्य सरकार ने स्थापित नही किया है वे इसकी परिकल्पना मात्र से निःशब्द हो जाते जब ये बात पत्रकारों के तरफ से निकलती है कि आपको तो विस्थापित किया जा चुका है कागजो में लेकिन उनके निःशब्द होने में व्यवस्था के प्रति आक्रोश साफ दिखता है सवाल उठता है कि गर विस्थापन हुआ है तो मुआवजा किसको दिया गया ? वे आज भी यही क्यों बसे है ? पन्ना टाइगर के जंगलो में जो कोंदर, सोर आदिवासी कभी  मालिक हुआ करते थे आज वनविभाग के मर्जी बगैर एक लकड़ी तक जंगलो से नही उठा पाते है  गंगली सब्जियां तो दूर की बात है बकौल श्यामजी कोंदर मेरा बचपन इन्ही जंगलो में गुजरा है जब उन यादो की तरफ पलटता हूँ तो जंगल शब्द व्यंग्य सा लगता है ! वो विशाल कैमूर का जंगल तो इन्ही वनविभाग के आला अफसरों ने लूट लिया मोटे – मोटे पेड़ो के दरख़्त रात के अंधेरो में शेर की चमड़ी की तरह बेच दिए गए है 

  बाघ,चीतल,हिरनों और अन्य का बसेरा हुआ करता था यहाँ मगर अब तो पट्टे वाले लाये हुए जोकर बसेरा करते है यहाँ जिन्हें कभी – कभार देखकर लोग पूर्णमासी के चाँद की तरह खुश हो लेते है अब तो यहाँ मैदान और तबाही हाँ वो जंगल भी है जिनमे आदिवासी की लोक परम्परा अपनी अस्मिता को बचा पाने की जद्दोजहद अवसाद से लबालब है 



क्या है केन – बेतवा नदी गठजोड़ –
देश की तीस चुनिन्दा नदियों को जोड़ने वाली राष्ट्रीय परियोजना में से एक है केन – बेतवा नदी गठजोड़ परिजोना इस लिंक हास्यास्पद पहलु ये है कि ग्रेटर गंगऊ बांध बन जाने के बाद दो बड़े बांध धसान नदी, माताटीला जल विहीन होंगे रनगँवा बांध एक डूब क्षेत्र का बांध है इसमे बारिश का जल ठहरने से यह बांध की स्थति में है इसका क्षेत्रफल बड़े दायरे में विस्तार लिए है  वही दौधन बांध को केन में तटबंध बनाकर रोका गया है जिसे गंगऊ बैराज कहते है गंगऊ बैराज के अपस्ट्रीम से 2.5 किलोमीटर दूर दौधन गाँव में केन नदी पर ही 173.2 मीटर ऊँचा ग्रेटर गंगऊ बांध बनाया जाना है यानि 24 किलोमीटर के दायरे में तीन बड़े बांध केन को घेरेंगे इससे धसान नदी में पानी कम हो जायेगा जिसका असर माताटीला डैम पर पड़ेगा और अगर ऐसा हुआ तो केन बेतवा में पानी देने काबिल ही नही बचेगी कैमूर की पहाडिय़ों में अठखेलियां करने वाली केन और 500 किमी के सफर में 20 से ज्यादा बांधों से लदी बेतवा नदी है केन नदी पर डोढऩ गांव में 9,000 हेक्टेयर में बांध की झील बनेगी  केन नदी की कुल लम्बाई से कुछ कम 212 किलोमीटर लम्बी कंक्रीट की नहर से केन नदी का पानी बरुआ सागर ( झाँसी ) में बेतवा नदी में डाला जायेगा इसमे 72 मेगावाट के दो बिजलीघर भी प्रस्तावित है, केन जबलपुर के मुवार गाँव से निकलकर पन्ना की तरफ 40 किलोमीटर आकर कैमूर पर्वत मालाओं के ढलान पर उत्तर दिशा में आती है तिगरा के पास इसमे सोनार नदी मिलती है  पन्ना जिले के अमानगंज से 17 किलोमीटर दूर पंडवा नामक स्थान पर इसमे 6 नदी क्रमशः मिठासन, श्यामरी, बराना छोटी नदियों का संगम होता  है छतरपुर जिले की गौरिहार तहसील को छूती हुई यह बाँदा ( उत्तर प्रदेश ) में प्रवेश करती है ,रास्ते में इसमे बन्ने,कुटनी,कुसियार,लुहारी आदि  सहायक नदी मिलती है दौधन बांध 1915 में बना था इसके समीप ही  ग्रेटर गंगऊ डैम बनाया जाना है  कमोवेश बुंदेलखंड के अन्य बांधो की तरह ये सबसे बड़ा बांध विश्व बैंक के कर्जे से आदिवासी को विस्थापित करने और किसानो को पानी की लूट के लिए मजबूर करेगा बुंदेलखंड के ईको सिस्टम का उलट जाना तो बांध के दंश में शामिल है ही         

- सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित, बाँदा - बुंदेलखंड  
ashishdixit01@gmail.com

Sep 20, 2014

इतिहास रचने वाली बाघिन टी - 4 अब नहीं रही




कान्हा की इस अनाथ बाघिन ने पन्ना को दी है नई ऊंचाई
पालतू से जंगली बनने वाली दुनिया की यह पहली बाघिन
पन्ना, 19 सितम्बर -
पूरी दुनिया में पन्ना टाइगर रिजर्व का नाम रोशन कर एक नया इतिहास रचने वाली बाघिन टी - 4 अब नहीं रही. कान्हा की इस अनाथ पालतू बाघिन ने पन्ना में आकर वह करिश्मा किया है जिससे बाघ प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने की नई संभावनाओं के द्वार खुले हैं. पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना के संस्थापक बाघों में इस बाघिन का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा.

उल्लेखनीय है कि कान्हा टाइगर रिजर्व की इस अनाथ और अद्र्धजंगली बाघिन को जंगली बनाने के अनूठे और अभिनव प्रयोग हेतु 27 मार्च 2011 को पन्ना लाया गया था. बाघिन टी - 4 के पन्ना आने से पहले तक पूरी दुनिया में यह माना जाता था कि जो शावक अनाथ हो गये और किसी मनुष्य के संपर्क में आ गये हैं उन्हें जंगली नहीं बनाया जा सकता. इस मान्यता को बाघिन टी - 4 ने पूरी तरह से गलत साबित कर बाघ प्रजाति के विलुप्त होने की संभावनाओं को भी खत्म कर दिया. पालतू से जंगली बनी दुनिया की इस पहली बाघिन टी - 4 ने पन्ना टाइगर रिजर्व में आकर न सिर्फ जंगली हुई अपितु उसने यहां पृथक - पृथक तीन बार शावकों को जन्म देकर बाघों की वंशवृद्धि में अपना अभूतपूर्व योगदान भी दिया. दूसरी जंगली बाघिनों की तरह टी - 4 ने अपने शावकों का न सिर्फ लालन - पालन किया बल्कि उन्हें खुले जंगल में शिकार करने की कला में भी पारंगत किया. तीसरी बार इस बाघिन ने तीन शावकों को जन्म दिया था जो 14 माह के हो चुके हैं और मां से अलग होकर जंगल में स्वच्छन्द विचरण करने लगे हैं. इन शावकों में दो नर व एक मादा है.

मड़ला परिक्षेत्र में मृत मिली बाघिन
पन्ना टाइगर रिजर्व का नाम रोशन करने वाली बाघिन टी - 4 की मौत से हर कोई दुखी और व्यथित है. क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि अनुश्रवण दल के द्वारा दी गई सूचना के अनुसार 18 सितम्बर की शाम 6.45 बजे बाघिन का मॉर्टलिटी रेडियो सिगनल प्राप्त हुआ. इस आधार पर आज सुबह सर्चिंंग में मड़ला परिक्षेत्र के बीट पठान झिरिया में बाघिन मृत पाई गई. नियमानुसार मौके पर निरीक्षण व जांच के उपरान्त रेडियो कॉलर निकाला गया. प्रारंभिक जांच में 10 वर्षीय इस बाघिन की मौत का कारण अप्राकृतिक नहीं माना जा रहा.

जांच के लिए भेजा गया सेम्पल
बाघिन टी - 4 के शव का पोस्ट मार्टम पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. संजीव कुमार गुप्ता द्वारा किया गया. उन्होंने बताया कि प्रथम दृष्टया बाघिन की मौत प्राकृतिक प्रतीत हो रही है. लेकिन मौत की असल वजह का पता लगाने के लिए सेम्पल जांच हेतु बरेली, जबलपुर, सागर व देहरादून भेजा जा रहा है. जांच रिपोर्ट आने पर बाघिन की मौत के कारणों का पता चल सकेगा. इस पूरी कार्यवाही के दौरान राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण नई दिल्ली के प्रतिनिधि राजेश दीक्षित एडवोकेट मौजूद रहे.

राष्ट्रगान के साथ हुआ अन्तिम संस्कार
महज डेढ़ साल की उम्र में अनाथ होने के बाद इनक्लोजर के भीतर पली बढ़ी यह बाघिन जब पन्ना लाई गई तो किसी को भरोसा नहीं था कि यह जंगली बन पायेगी. लेकिन इस बाघिन ने सारी मान्यताओं और वैज्ञानिक समझ को नकारते हुए पन्ना के जंगल को अपना आशियाना बनाया और तीन बार शावकों को जन्म दिया. इस बाघिन ने यह साबित कर दिखाया कि अनाथ हो जाने वाले बाघ शावकों को पाल पोसकर बड़ा करने के बाद जंगली बनाया जा सकता है. नया इतिहास रचने वाली इस बाघिन की मौत पर पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन के द्वारा श्रद्धांजलि देते हुए राष्ट्रीय गान के साथ अन्तिम संस्कार किया गया.

अरुण सिंह 
aruninfo.singh08@gmail.com

Sep 9, 2014

तो फिर उठ कर खड़ा हो गया पीपल का पेड़



उत्तर भारत के खीरी जनपद में हुआ ये अजीबो गरीब वाकया
चमत्कार को देखने के किये हजारो की भीड़ उमड़ी

मितौली-भूपितपुर। क्षेत्र में देवस्थान के कटे पेड़ की जड़ दुबारा कड़ी हो गई ।हजारो की भीड़ उमड़ी चमत्कार देखने व् पूजा पाठ भी करने लगे ।

क्षेत्र के मल्हपुर गडरिया में देवस्थान पर खड़े पीपल का पेड़ के गिरने के बाद उसकी जड़ दुबारा खड़ी हो जाने से लोग जहां आश्चर्य चकित है वही लोग इसे देवताओ का प्रताप मानते हुए हजारो की भीड़ दर्शन व् पूजापाठ में लग गए। जानकारी के अनुसार मल्हपुर गडरिया में बदलू यादव का पीपल का पेड़ था जो कि 3 महीने पहले गिर गया था गिरे पेड़ की लकड़ी को बदलू ने एक ठेकेदार के हाथ कुछ दिन पहले बेच दिया था। उसकी सारी लकड़ी उठ गई परन्तु उस पीपल का धड़ वही पड़ा रह गया एक दिन पहले पीपल की जड़ पड़ी थी जो की अचानक खड़ी हो गई जिसे देखकर क्षेत्र् के लोग आश्चर्यचकित रह गए। अब उसी स्थान पर हजारो की भीड़ उमड़ पड़ी और लोग पूजा पाठ में लग गए। क्षेत्र के कुछ व्यक्तियों कृष्णकुमार देवीदयाल संजय कुमार लालता प्रशाद कालीचरण आदि लोगो ने बताया की इस पेड़ की कई वर्षो से सिद्ध देव बाबा के नाम से पूजा होती थी ।जरुर इस पेड़ में देवो का वास होगा जिस कारण ये चमत्कार हुआ।

ब्रजेश सिंह
9721505049
(एक दैनिक अखबार में पत्रकार है)

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