डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 04, April 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Apr 23, 2017

पृथ्वी दिवस- कभी धरती की बात भी सुन ले फायदे में रहेंगें



22 अप्रैल - पृथ्वी दिवस पर विशेष
धरती की डाक सुनो रे केऊ

मनुस्मृति के प्रलय खंड में प्रलय आने से पूर्व लंबे समय तक अग्नि वर्षा और फिर सैकङो वर्ष तक बारिश ही बारिश का जिक्र किया गया है। क्या वैसे ही लक्षणों की शुरुआत हो चुकी है ?  तापमान नामक  नामक डाकिये के जरिये भेजी पृथ्वी की चिट्ठी का ताजा संदेशा तो यही है और मूंगा भित्तियों के अस्तित्व पर मंडराते संकट का संकेत भी यही। अलग-अलग डाकियों से धरती ऐसे संदेशे भेजती ही रहती है। अब जरा जल्दी-जल्दी भेज रही है। हम ही हैं कि उन्हे अनसुना करने से बाज नहीं आ रहे। हमें चाहिए कि धरती के धीरज की और परीक्षा न लें। उसकी डाक सुनें भी और तद्नुसार बेहतर कल के लिए कुछ अच्छा गुने भी।

गौरतलब है कि मूुुगा भित्तियां कार्बन अवशोषित करने का प्रकृति प्रदत अत्यंत कारगर माध्यम हैं। इन्हे पर्यावरणीय संतुलन की सबसे प्राचीन प्रणाली कहा जाता है। हमारी पृथ्वी पर जीवन का संचार सबसे पहले मूंगा भित्तियों में ही हुआ। यदि जीवन संचार के प्रथम माध्यम का ही नाश होना शुरु हो जाये, तो समझ लेना चाहिए कि अंत का प्रारंभ हो चुका है। खबर है कि लाखों एकङ मूंगा भित्तियां  हम पहले ही खो चुके हैं। समुद्र का तापमान मात्र आधा इंच बढने से शेष मूंगा भित्तियों का अस्तित्व भी खतरे पङ जायेगा। यदि इस सदी में 1.4 से 5.8 डिग्री सेल्सियस तक वैश्विक तापमान वृद्धि की रिपोर्ट सच हो गई और अगले एक दशक में 10 फीसदी आधिक वर्षा का आकलन झूठा सिद्ध नहीं हुआ, तो समुद्रों का जलस्तर 90 सेंटिमीटर तक बढ जायेगा; तटवर्ती इलााके डूब जायेंगे। इससे अन्य विनाशकारी नतीजे तो आयेंगे ही, धरती पर जीवन की नर्सरी कहे जाने वाली मूंगा भित्तियां पूरी तरह नष्ट हो जायेंगी; तब जीवन बचेगा... इस बात की गारंटी कौन दे सकता है ? 

एटमोस्फियर, हाइड्रोस्फियर और लिथोस्फियर - इन तीन के बिना किसी भी ग्रह पर जीवन संभव नहीं होता। ये तीनो मंडल जहां मिलते हैं, उसे ही बायोस्फियर यानी जैवमंडल कहते हैं। इस मिलन क्षेत्र में ही जीवन संभव माना गया है। यदि इन तीनों पर ही प्रहार होने लगे.... यदि ये तीनों ही नष्ट होने लगें, तो जीवन पुष्ट कैसे हो सकता है ? परिदृश्य देखें तो चित्र यही है। जिस अमेरिका में पहले वर्ष में 5-7 समुद्री चक्रवात का औसत था, उसकी संख्या 25 से 30 हो गई है। न्यू आर्लिएंस नामक शहर ऐसे ही चक्रवात में नेस्तनाबूद हो गया। लू ने फ्रांस में हजारों को मौत दी। कायदे के विपरीत आबूधाबी में बर्फ की बारिश हुई। जमे हुए ग्रीनलैंड की बर्फ भी अब पिघलने लगी है। पिछले दशक की तुलना में धरती के समुदों का तल 6 से 8 इंच बढ गया है। परिणामस्वरूप, दुनिया का सबसे बङा जीवंत ढांचा कहे जाने वाले ग्रेट बैरियर रीफ का अस्तित्व खतरे में है। करीब 13 साल पहले प्रशांत महासागर के एक टापू किरीबाटी को हम समुद्र में खो चुके हैं। 

ताज्जुब नहीं कि वनुबाटू द्वीप के लोग द्वीप छोङने को विवश हुए। न्यू गिनी के लोगों को भी एक टापू से पलायन करना पङा। भारत के सुंदरबन इलाके में स्थित लोहाचारा टापू भी आखिरकार डूब ही गया।मात्र तीन दिन की प्रलयंकारी बारिश ने मुंबई शहर का सीवर तंत्र व जमीनी ढांचों की उनकी औकात बता ही दी थी। सुनामी का कहर अभी हमारे जेहन में जिंदा है ही। हिमालयी ग्लेशियरों का 2077 वर्ग किमी का रकबा पिछले 50 सालों में सिकुङकर लगभग 500 वर्ग किमी कम हो गया है। गंगा के गोमुखी स्त्रोत वाला ग्लेशियर का टुकङा भी आखिरकार चटक कर अलग हो ही गया। अमरनाथ के शिवलिंग के रूप-स्वरूप पर खतरा मंडराता ही रहता है। उत्तराखण्ड विनाश के कारण अभी खत्म नहीं हुए हैं। तमाम नदिया सूखकर नाला बन ही रही हैं। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड के अलावा भारी धातुओं के इलाके बढ़ ही रहे हैं। 

यह सच है कि अपनी धुरी पर घुमती पृथ्वी के झुकाव में आया परिवर्तन, सूर्य के तापमान में आया सूक्ष्म आवर्ती बदलाव तथा इस ब्राह्मंड में घटित होने वाली घटनायें भी पृथ्वी की बदलती जलवायु के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। लेकिन इस सच को झूठ में नहीं बदला जा सकता कि आर्थिक विकास और विकास के लिए अधिकतम दोहन से जुङी इंसानी गतिविधियों ने इस पृथ्वी का सब कुछ छीनना शुरु कर दिया है। जीवन, जैवविविधता, धरती के भीतर और बाहर मौजूद जल, खनिज, वनस्पति, वायु, आकाश.... वह सब कुछ जो उसकी पकङ में संभव है। दरअसल, नये तरीके का विकास.. भोग आधारित विकास है। यदि यह बढेगा तो  भोग बढेगा, दोहन बढेगा, कार्बन उत्सर्जन बढेगा, ग्रीन गैसें बढेंगी, तापमान बढेगा; साथ ही बढेगा प्राकृतिक वार और प्रहार। घटेगी तो सिर्फ पृथ्वी की खूबसूरती, समृद्धि। यह तय है। फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा कि विकास, भोग, दोहन, उत्सर्जन, तापमान सब कुछ बढाने वाले खुद सीमा में आ जायेंगे। पुनः मूषक भव ! यह भी तय ही है। अब तय सिर्फ हमें यह करना है कि पृथ्वी के जीवन की सबसे पुरानी इकाई तक जा पहुंचे इस संकट को लाने में मेरी निजी भूमिका कितनी है।

गौरतलब है कि अपने घरों में तरह-तरह के मशीनी उपाय बढाकर हम समझ रहे हैं कि हमने प्रकृति के क्रोध के प्रति अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढा ली है। लेकिन सच यह है कि हमारे शरीर व मन की प्रतिरोधक क्षमता घट रही है। थोङी सी गर्मी, सर्दी, बीमारी और संताप सहने की हमारी प्राकृतिक प्रतिरोधक शक्ति कम हुई है। अब न सिर्फ हमारा शरीर, मन और समूची अर्थव्यवस्था अलग-अलग तरह के एंटीबायोटिक्स पर जिंदा हैं। धरती को चिंता है कि बढ रहे भोग का यह चलन यूं ही जारी रहा, तो आने वाले कल में ऐसी तीन पृथ्वियों के संसाधन भी इंसानी उपभोग के लिए कम पङ जायेंगे। मानव प्रकृति का नियंता बनना चाहता है। वह भूल गया है कि प्रकृति अपना नियमन खुद करती है। धरती चिंतित इस प्रवृति के परिणाम को लेकर भी है। 

फिलहाल सरकारें क्या करेंगी या नहीं करेंगी; दुनिया के शक्तिशाली कहे जाने वाले देश जिस तरह दूसरे देशों के संसाधनों से आर्थिक लूट का खेल चला रहे हैं, बिगङते पर्यावरण के पीछे एक बङा कारण यह भी है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि आर्थिक साम्राज्यवाद के फैले जाल में फंस चुकों का निकलना इतना आसान नहीं। लेकिन निजी भोग व लालच के जाल से तो हम निकल ही सकते हैं। आइये, निकलें! इसी से प्रकृति और राष्ट्र के बचाव का दरवाजा खुलेगा; वरना् प्रकृति ने तो संकेत कर दिया है।

आज संकट साझा है... पूरी धरती का है; अतः प्रयास भी सभी को साझे करने होंगे। समझना होगा कि अर्थव्यवस्था को वैश्विक करने से नहीं, बल्कि ’वसुधैव कुटुंबकम’ की पुरातन भारतीय अवधारणा को लागू करने से ही धरती और इसकी संतानों की सांसें सुरक्षित रहेंगी। यह नहीं चलने वाला कि विकसित को साफ रखने के लिए वह अपना कचरा विकासशील देशों में बहाये। निजी जरूरतों को घटाये और भोग की जीवन शैली को बदले बगैर इस भूमिका को बदला नहीं जा सकता है। ''प्रकृति हमारी हर जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन लालच किसी एक का भी नहीं।'' - बापू का यह संदेश इस संकट का समाधान है। यह मानवीय भी है और पर्यावरणीय भी। 

यदि हम सचमुच प्रकृति के गुलाम नहीं बनना चाहते, तो जरूरी है कि प्रकृति को अपना गुलाम बनाने का हठ और दंभ छोड़ें। टेस्ट ट्युब बेबी का जनक बनने में वक्त न गंवायें। अजन्मी बच्चियों को बेमौत मारने का अपराध न करें। कुदरत को जीत लेने में लगी प्रयोगशालाओं को प्रकृति से प्राप्त सौगातों को और अधिक समृद्ध, सेहतमंद व संरक्षित करने वाली धाय मां में बदल दें। नदियों को तोङने, मरोङने और बांधने की नापाक कोशिश न करें। पानी, हवा और जंगलों को नियोजित करने की बजाय प्राकृतिक रहने दें। बाढ और सुखाङ के साथ जीना सीखें। जीवन शैली, उद्योग, विकास, अर्थव्यवस्था आदि के नाम पर जो कुछ भी करना चाहते हैं,करें... लेकिन प्रकृति के चक्र में कोई अवरोध या विकार पैदा किए बगैर। उसमें असंतुलन पैदा करने की मनाही है। हम प्रकृति को न छेङेंगे, प्रकृति हमें नहीं छेङेगी। हम प्रकृति से जितना लें, उसी विन्रमता और मान के साथ उसे उतना और वैसा लौटायें भी। यही साझेदारी है और मर्यादित भी। इसे बनाये बगैर प्रकृति के गुस्से से बचना संभव नहीं। बचें। अनसुना न करें धरती का यह संदेश। ध्यान रहे कि सुनने के लिए अब वक्त भी कम ही है।


अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली - 92
9868793799 

Apr 20, 2017

आस्था बचाने से रुकेगा गोवंश का कत्ल



संप्रदाय नहीं, मुनाफाखोरी है गोवंश की दुश्मन


उत्तर प्रदेश में बूचड़खानों को इस आधार पर बंद किया गया कि वे कानूनन अवैध थे। गोरक्षा के नाम पर हिंसात्मक कार्रवाई करने वालों को भी इसी आधार पर चुनौती दी जा रही है कि उनकी हरकत कानूनन अवैध व अमानीवीय है। गोरक्षा के लिए औजार के तौर पर मांग भी  गोवंश-कत्ल पर पाबंदी कानून के रूप में सामने आई है। किंतु दुखद है कि गोरक्षा के मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष के बंटवारे का आधार कानून अथवा मानवता न होकर, संप्रदाय व दलीय राजनीति हो गया है। हिंदू संगठन यह स्थापित करने में जुटे हैं कि हिंदू, गाय के पक्षधर हैं और मुसलमान, गाय के दुश्मन हैं। मुद्दे पर राजनैतिक दलों के बंटवारे का आधार यह है कि वे मुसलमानों के पक्षधर हैं अथवा हिंदुओं के। राजनैतिक विश्लेषक इसेे गाय अथवा संप्रदाय की पक्षधरता की बजाय, वोट को अपनी-अपनी पार्टी के पक्ष में खींचने की कवायद के रूप में देख रहे हैं। मेरा मानना है कि राजनीति, राज करने की नीति होती है। इसका गोवंश की रक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। लिहाजा, जब तक गाय पर राजनीति होती रहेगी, गोवंश की लौकिक नीति और परालौकिक रीति कभी न सुनी जायेगी और न गुनी जायेगी। 

सांप्रदायिक मसला नहीं है गोवंश का कत्ल

शांत मन से सुनने लायक आंकडे़ ये हैं कि भारत मेें गोवंश भी बढ़ रहा है और गोदुग्ध का उत्पादन भी। यदि कुछ घट रही है, तो बूढ़ी गायों की संख्या तथा बछङे व बैलों की वृद्धि दर। बछड़ों और बैलों की वृद्धि दर। वर्ष - 2012 में हुई शासकीय गणता बताती है कि 2007 की गणना की तुलना में गायों की संख्या में 6.52 प्रतिशत वृद्धि हुई है। वर्ष - 2012 में गायों की संख्या 1229 लाख दर्ज की गई। आंकङे गवाह हैं कि वर्ष 1966 से लेकर वर्ष 2015 तक सिर्फ वर्ष 1975 ही एक ऐसा वर्ष आया, जब पिछले वर्ष की तुलना में अगले वर्ष गाय के दूध का उत्पादन कम हुआ है; वरना् भारत में गाय के दूध का उत्पादन हर वर्ष बढ़ा ही है। 69 लाख, 18 हजार मीट्रिक टन (वर्ष 1966) की तुलना में छह करोङ, 35 लाख मीट्रिक (वर्ष 2015) टन हो गया। गोदूध उत्पादन की वर्तमान वृद्धि दर, 4.96 प्रतिशत है। इन आंकङों से यह भी स्पष्ट है कि मुद्दा गाय नहीं, गोवंश का कत्ल है। कत्ल भी सामान्य गाय की बजाय, बछङे, बैल और बूढ़ी गायों का ही ज्यादा है। चिंताजनक है कि बछङे तथा बैलों की वृद्धि दर में 12.75 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 

अब प्रश्न आता है गोवध और गोमांस बिक्री तथा खानपान के कारण क्षतिग्रस्त होती हमारी आस्था का। प्रश्न किया जाना चाहिए कि क्या गोमांस के लिए उपलब्ध सारा गोवंश, चोरी करके बेचा जाता हैं ? नहीं, वह बिक्री करके आता हैं। अगला प्रश्न है कि गोवध के लिए बूढ़ी गायों, बैलों और बछङों को बेचता कौन है ? क्या गोवंश बेचने वाले सभी गोपालक, गैर हिंदू हैं ? क्या सभी गो विक्रेता, गोमांस विक्रेता, खरीददार और कत्लखानों के मालिक सिर्फ मुसलमान हैं ? नहीं, तो फिर गोवंश का कत्ल, एक संप्रदाय विशेष के विरोध का मसला कैसे हो गया ? 

अतः विनम्र निवेदन है कि गाय पर राजनीति कभी भी न की जाय। इसे राजनैतिक अथवा सांप्रदायिक वर्चस्व का हथियार बनने से सदैव रोका जाय। गोकशी करने वालों को मौत के घाट उतार देने से भी गोवंश की रक्षा संभव नहीं है। पाबंदी कानून बनाने से पहले सुनिश्चित करना होगा कि गोपालक बछड़ों तथा बूढे़-बीमार गोवंश को कसाइयों के हाथों बेचने की बजाय, जब तक वे जिंदा हैं, उनकी सेवा करें। क्या भारत का गोपालक समाज इतना आस्थावन है कि इसकी कसम ले सके ? यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। वरना् पाबंदी कानून का उल्ट नतीजा यह होगा कि छुट्टा छोड़े गोवंश के कारण कई इलाकों में खेती करना मुश्किल हो जायेगा। नीलगायों को लेकर हमारा रवैया और उन्हे मारने को लेकर जारी आदेशों से हम परिचित हैं ही।  

आज का हमारा सच यही है। क्या हम इसे नकार सकते हैं ? यदि नही तो मैं कहूंगा कि भाई, गोमांस पर पाबंदी कानून बनाने अथवा संपद्राय विशेष को जिम्मेदार ठहराने मात्र से गोवंश की रक्षा संभव नहीं है। 

गांधी जी की गाय पर प्रबल आस्था थी। गांधी जी ने एक जगह कहा - ''गाय के नष्ट होने के साथ, हमारी सभ्यता भी नष्ट हो जायेगी। गाय की रक्षा करो, सब की रक्षा हो जायेगी।'' गोरक्षा को महत्वपूर्ण मानते हुए ही गांधी जी ने एक समय जमनालाल बजाज जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को गोशालाओं की जिम्मेदारी सौंपी। इस आस्था के बावजूद गांधी ज़मीनी हकीकत से परिचित थे। अतः एक फरवरी, 1942 में गो-पालकों की सभा को संबोधित करते हुए उन्होने चेताया था - ''मुसलमानों से गोकशी छुङाने के लिए उनका विरोध किया जाता है। गायों को बचाने के लिए इंसानों का खून तक हो जाता है। लेकिन मैं बार-बार कहता हूं कि मुसलमानों से लङने से गाय नहीं बच सकती।''

मेरा मानना है कि गाय को सांप्रदयिक अथवा राजनैतिक वर्चस्व का हथियार बनाने से गोेवंश की भला होने की बजाय, बुरा ही होगा। मेव, वनगुर्जर, बक्करवाला, धनगड़, गडरिया, बंजारा से लेकर तमाम हिंदू-मुसलिम पारंपरिक मवेशीपालक समुदायों में से गैर हिंदू समुदाय के मन में भेद पैदा हो सकता है कि गाय तो हिंदुओं की है, वे क्यों पाले-पोसें। अलवर के मेवों ने गाय वापसी अभियान चलाकर इस विभेद का इजहार भी शुरु कर दिया है। विभेद की बेङियां, अक्सर बाधा बनकर हमारी गति रोकती रही है। इन बेङियों को काटकर ही भारत, विकास की समग्रता और गति अनवरत् बनाये रख सकता है।

कितनी उचित, मुनाफे के आधार पर पैरोकारी ?

बुनियादी प्रश्न है कि गोवंश का कत्ल कैसे रुके ? क्या मुनाफे का गणित बताकर यह संभव है ? याद कीजिए कि महात्मा गांधी जी ने भी गाय से मुनाफे के गणित को दुरुस्त करने का रास्ता बताने की कोशिश की थी। उन्होने अधिक दूध देने वाली गायों की बात की थी। गोशालाओं में खेती और गोपालन की शिक्षा व महत्ता बताने का भी प्रबंध की बात कही थी। अच्छे सांडों को रखने की सलाह दी थी। गोमृत्यु के बाद, उसके चमङे, हड्डी, मांस और अंतङियों का उपयोग करने की सलाह दी थी। हर गोशाला के साथ चर्मशाला की बात भी वह कहते थे। गांधी जी ने अपने आश्रम में ऐसी व्यवस्था भी की थी। गोसेवा संघ के सदस्यों के लिए शर्त थी कि वे गाय का ही दूध, दही, घी आदि सेवन करेंगे तथा मुर्दा गाय-बैल का चमङा काम में लायेंगे। किंतु सच यह है कि गांधी जी को खुद भी यकीन नहीं था कि गणित के बल पर गोवंश को बचाया जा सकेगा। इसीलिए वे यह बताना कभी नहीं भूले कि गोशालाओं का काम, दूध का व्यवसाय करना नहीं है। उनका काम सूखे, बूढ़े और अपाहिज गोवंश का पालन करना है। मुझे लिखते हुए अफसोस है कि गोवंश के अत्यंत विद्वान पैरोकार भी आज गाय को गोधन अथवा गो सम्पदा कहकर पेश कर रहे हैं। वे हमें समझाते हैं कि गाय से प्राप्त होने वाले तत्वों में पोषक तत्व और औषधीय गुण कितने उम्दा हैं; गोवंश से हमें कितना मुनाफा है। ऐसे में यदि हमारे गोपालक, नफा-नुकसान के गणित पर गोपालन की लौकिक व्यवहार नीति तय कर रहे हैं, तो अफसोस क्यों ?

व्यवहार यह है कि ज्यादातर इलाकों में ट्रैक्टर ने बैल की जगह ले ली है। बैल-बछडे. से चलने वाले टयुबवैल हैं, लेकिन हम उसे बढ़ावा नहीं दे रहे। मुनाफे का कुल गणित दूध, गोबर, गोमूत्र और बछिया संतान पर आकर टिक गया है। गाय के कारण सकारात्मक ऊर्जा, देवत्व का भाव आदि अदृश्य मुनाफे की बातें उनके गणित में शामिल नहीं है। गाय का दूध लाख पौष्टिक हो; दूध के दाम, वसा के मानक पर तय करने का बाजार नियम है। अधिक वसायुक्त होने के कारण, भैंस का दूध, गाय के दूध से मंहगा बिकता है। गाय कम दूध देती है; भैंस ज्यादा दूध देती है। इसी कारण गाय सस्ती बिकती है; भैंस महंगी बिकती है। गाय के सस्ता होने के कारण जिन इलाकों में चारागाह नहीं बचे हैं; जिन इलाकों में गेहूं जैसी चारा फसलों की खेती न के बराबर होती है; जिन किसानों का जोर पूरी तरह नकदी फसलों पर है अथवा चारे का संकट है, वे दूध न देने के दिन आने पर गाय को छुट्टा छोङ देते हैं अथवा बेच देते हैं। वे सोचते हैं कि जितने रुपया का चारा गाय-बछङे को खिलायेंगे; दूध खरीदकर पीयेंगे, उतने में तो दूसरी गाय ले आयेंगे। कम पानी और चारे के दिनों में गाय को इंजेक्शन लगाकर मरने के लिए छोड़ देने की प्रवृति से हम वाकिफ हैं ही। मुुर्गा, मछली आदि अन्य की तुलना में गोमांस सस्ता बिकता है; इस कारण भी जिंदा गोवंश से ज्यादा मुर्दा गोवंश की बिक्री ज्यादा हैं।

सच मानिए, नफा-नुकसान के इस गणित के कारण ही बिना दूध की गायें, आज बिकने को विवश हैं और बछङे, कटने को। इसी गणित के कारण, मवेशी दूध कम दे, तो बिक्री जाने वाले दूध में कटौती नहीं की जाती, घर के बच्चे के दूध में कटौती कर दी जाती है। इसी गणित के कारण, संताने आज मां-बाप को बोझ मानती दिखाई दे रही हैं। इसी कारण हर रिश्ते का मानक नफा-नुकसान हो गया है। इसी गणित को पेश करने के कारण, पोषण करने वाली पृथ्वी के पंचतत्वों का शोषण बेतहाशा बढ़ गया है; करोङों खर्च के बावजूद गंगा की मलीनता बढ़ गई है; प्रवाह घट रहा है; तो गोवंश क्यों नहीं घटेगा ? यह सबके शुभ को छोङकर, सिर्फ लाभ की परवाह करने वाला नया व्यापारिक और निहायत व्यक्तिवादी चरित्र है। इस चरित्र के रहते माताओं का संरक्षण कदापि नहीं हो सकता।

गाय मां है, मुनाफा कमाने की कोई वस्तु नहीं

लाख मुनाफा हो, तो भी मातायें मुनाफा कमाने की वस्तु नहीं हैं। यह परालौकिक भाव है। समझना होगा कि इस परालौकिक भाव होने पर हम पत्थर को भी पूज्यनीय मानकर, हर हाल में संजोते है। इस परालौकिक भाव ने ही सदियों से गो, गंगा, गायत्री को संजोने का लौकिक कार्य किया है। यह भाव कोई मोलभाव नहीं करता, न तर्क मांगता है; यह सिर्फ समर्पण करता है। इसका एकमेव आधार, श्रृद्धा होता है। श्रृद्धा, विश्वास से आती है। विश्वास, व्यवहार से आता है। व्यवहार का आधार, हमेशा हमारा चरित्र ही होता है। सहअस्तित्व और सहजीवन, सिर्फ सहायक तत्व होते हैं। परिस्थिति भी, हमेशा इसका अपवाद पेश नहीं कर पाती। आज भी यह भाव पूर्णतया मरा नहीं है। सिर्फ इस भाव का ह्यस हुआ है। हम गो, गंगा और अपनी जन्मना मां को मां मानते जरूर हैं, किंतु संतानवत् व्यवहार करना लगभग भुला दिया हैं। कटु सत्य है कि धर्मसंसदों में भी इनके खूब जयकारे हैं, लेकिन ज़मीनी सरोकार के नाम पर, सिर्फ जुबानी फव्वारे हैं। संरक्षण के नाम पर खुल रही फंड आधारित गोशालाओं को हमारा ’एनजीओ चरित्र’ ले डुबा है। इसका कारण न राजनीति है और न लोकनीति, यह विशुद्ध रूप से हमारे चारित्रिक और सांस्कृतिक गिरावट का परिणाम है। इसे मुनाफा नहीं, चारित्रिक शुचिता की दरकार है। 

अतः गोवंश के पैरोकार, यदि सचमुच गोमाता की समृद्धि चाहते हैं, तो गणित बताना तथा राजनीति व संप्रदाय की फांस लगाना बंद करें; जीव-जीव और जीव-जड़ के परालौकिक संबंधों की शुचिता बताना और अपने व्यवहार में शुचिता बढ़ाना शुरु करें; तभी मां के प्रति हमारा व्यवहार बदलेगा; शुचितापूर्ण संबध का संस्कार पुनर्जीवित होगा और गो, गंगा, गायत्री, पृथ्वी से लेकर हमें जन्म देने वाली माता तक की रक्षा हो सकेगी।







अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-110092
amethiarun@gmailom
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150 बरस पहले बहराइच के जंगलों में रहता था मोगली

विलियम स्लीमैन 

ब्रिटिश अफसर विलियम स्लीमन ने उत्तर भारत खोजे थे कई वुल्फ बॉय-

कतरनिया घाट में मिली वन दुर्गा ही नहीं है अकेली, जानवरों संग पले मानव-बच्चों के दर्जनों है उदाहरण-

उत्तर भारत में मोगली के कई किस्से, मौजूदा दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगलों में भी मिले वुल्फ ब्वाय 




बात ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार के दिनों की है, जब एक युवा ब्रिटिश आफीसर बंगाल आर्मी में एक सैनिक के तौर पर नियुक्त हुआ, उसका नाम था विलियम हेनरी स्लीमैन, बाद में इन्होने 1914  में नेपाल वार में बहादुरी से हिस्सा लिया, नतीजतन इन्हे कैप्टन का ओहदा हासिल हुआ, बाद में इन्हे मध्य भारत में ठगों के विशाल गिरोह को ख़त्म करने के लिए भेजा गया, जहां इन्होने भारत के उन सभी दुर्दांत ठगों को ख़त्म कर दिया जिन्होंने अपने जीवन में हज़ारों हत्याएं, लूट और डकैतियां की थी, स्लीमैन का ओहदा अब लेफ्टिनेंट कर्नल का था, जब विलियम स्लीमैन मध्य भारत में थे तब जबलपुर के आसपास के इलाकों में ओटेहीटी गन्ने की बुआई शुरू करवाई, गन्ने की इस खेती का परिचय मध्यभारत में सर्व प्रथम विलियम स्लीमैन को जाता है, इस विषय पर कभी और चर्चा, हाँ यही जबलपुर के पास मध्यप्रदेश में कटनी जिले में एक कस्बा इनके नाम से बसा जिसे स्लीमनाबाद कहते हैं, कर्नल स्लीमैन ठगों को ख़त्म करने के लिए यहाँ आये थे और जबलपुर को अपना हेडक़्वार्टर बनाया था, फिलहाल स्लीमैन को गवर्नर जरनल की तरफ से सन्देश आया की उन्हें अवध रियासत का रेजिडेंट आफिसर बनाया जाता है, और यह वक्त था सन 1939 का, विलियम स्लीमैन ने पूरे उत्तर भारत की यात्रा की और यहाँ की परम्पराओं, धर्म, जातियों, बोलियों और कहानियों का अध्ययन किया, उन्हीं कहानियों में से कुछ कहानियों हैं मोगली की, जी  हाँ यह वही मोगली की कहानी है जिसे रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी किताब जंगल बुक के जरिए पूरी दुनिया को सुना डाली, यहाँ एक गौरतलब बात यह है की रुडयार्ड ने जिन भारतीय जंगलों का जिक्र किया है वह जबलपुर के आस-पास, खासतौर से पचमढ़ी और सेवनी के हैं और इस जगह रूडयार्ड कभी नहीं आये, विलियम स्लीमैन ने इन मध्य प्रदेश के जंगलों का भी विस्तृत ब्यौरा दिया है, और स्लीमैन के ही वास्तविक कार्य को आधार बनाकर रूडीयार्ड किपलिंग ने जंगल बुक लिखी, चलिए अब हम बात करते हैं अवध की यानी आज का उत्तर प्रदेश, जहां विलियम स्लीमैन ने गोमती और घाघरा के किनारे के जंगलों में कई मोगली खोजे जो उनकी किताबों और शोध पत्रों में प्रकाशित हुए.

एक जमाने में कुछ समुदायों के लोग जंगली जीवों को मारते थे, भोजन के लिए वह उन जीवों के मांस पर आश्रित रहते थे, उसी वक्त विलियम हेनरी स्लीमैन उत्तर भारत के भ्रमण पर थे और उनके पास इस बात के संदेशे आते की बच्चे गायब हो रहे हैं,  बच्चे तो नही मिलते पर भेदियों की मांदो से बच्चों को पहनाये जाने वाले जेवर जरुर मिल जाते, और इसलिए इस समुदाय के लोग भेदियों की मादें खोजते और फिर उनकी खुदाई करते ताकि उन्हें चांदी या सोने के कुछ आभूषण मिल सके, और यही बात साबित करती थी की भेडियों की मांदों में बच्चे रहते हैं और जीवित हैं, मादा भेड़िया उन मानव बच्चों का पालन पोषण और सुरक्षा अपने बच्चों की तरह करती हैं.

सबसे हम चलते हैं उस वक्त की सुल्तानपुर से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर गोमती के किनारे, जहाँ रियासत का एक सिपाही अपने घोड़े पर सवार उस इलाके से गुजर रहा था तभी अचानक उसने एक बच्चे को भेड़िए के बच्चों के साथ नदी में पानी पीते देखा, वह बच्चा भी भेड़ियों की तरह पानी पी रहा था, जब घुड़सवार उनके नजदीक बढ़ा तो वह बच्चा और भेड़िए के तीन बच्चे एक साथ भाग पड़े, घुड़सवार अभी तक यह सोच रहा था की वह बच्चे को बचा ले नहीं तो दूर खड़ी भेड़िए के बच्चों की मां उसे मार डालेगी, लेकिन जब वह बच्चा भागा तो वह अपने हाथो का इस्तेमाल चौपाया जानवरों की तरह अगले पैरों की तरह कर रहा था, और वह भेड़िए के बच्चों के साथ, मांद में घुस गया, उस सैनिक ने गाँव वालों को इकट्ठा किया, और उस मांद की खुदाई शुरू करवाई तकरीबन आठ फ़ीट गहरी मांद थी, खुदाई और शोर मचाने से वे भेड़िए के बच्चे के साथ वह मानव बच्चा भी बाहर निकलकर भागा, लेकिन सिपाही ने उसे पकड़ लिया और गाँव ले आया... जहाँ उसे देखकर भीड़ इकट्ठा हुई, वह रस्सियों से बंधा था बावजूद इसके वह जंगली आवाजें निकालता और छुड़ाने की कोशिश करता, कोई आदमी नजदीक आता तो चौकन्ना हो पीछे हट जाता, और यदि बच्चा सामने आ जाता तो कुत्ते की तरह गुर्राता और उसपर हमला कर देता, उसे खाने के लिए रोटी दी गयी नहीं खाया, बल्कि कच्चा मांस देने पर वह जमीन में झुककर अपने दोनों हाथ जमीन पर टिकाकर उस मांस को खाने लगता, यदि खाते वक्त कोई इंसान उसके नज़दीक आ जाता तो वह गुर्रा पड़ता किन्तु जब कोई कुत्ता आ जाता तो वह कतई प्रतिकार नहीं करता और उसे अपने साथ खा लेने देता, बाद में उस सिपाही ने उस वुल्फ ब्वाय को राजा हसनपुर के हवाले किया, राजा साहब ने अपने एक नौकर को उस जंगली बच्चे की जिम्मेदारी सौंप दी, लेकिन वह बच्चा न तो कपडे पहनता, लाख कोशिशों के बाद वह कुछ भी नहीं बोलता, कपड़ों को फाड़कर उन्हें खाने की कोशिश करता, स्लीमैन लिखते है की दूध या छांछ वह बिना श्वांस लिए पी जाता, बाद में राजा हसनपुर ने इस बच्चे को सुल्तानपुर मिलेट्री कैम्प में कैप्टन निकोलस के पास भेज दिया, यह बच्चा  इंसान के बजाए कुत्ता, सियार आदि चौपाओं के साथ खेलना पसंद करता।




दीना शनिचरा 
कुछ वर्ष पहले सुल्तानपुर के एक गाँव चुपरा का एक किसान अपने परिवार के साथ खेतों में काम कर रहा था, तभी जंगलों से निकलकर एक भेड़िया आया और खेत में एक जगह सोते हुए तीन साल के बच्चे को उठा ले गया, उसकी माँ और पिता दोनों उस जानवर के पीछे दौड़े लेकिन घने जंगलों में बच्चे का कोई नामोनिशान नहीं मिला, यह वाकया मार्च 1843 का है, इसके छह साल बाद फरवरी 1850 में सिंगरामऊ के पास दो सिपाहियों ने एक स्थानीय नदी में तीन भेड़ियों के साथ एक बच्चे को देखा जो नदी में कुत्ते की तरह पानी पी रहा था, और उन सिपाहियों ने बच्चे को पकड़ लिया जो लगभग 9 साल का रहा होगा, सिपाही उसे कोइलीपुर बाज़ार ले आये और वहां भीड़ ने इस वुल्फ ब्वाय को देखा, बहुत लोगों ने उसे खिलाने की कोशिश की, वह बच्चा कई दिन तक बाजार में रहा लोग उसे देखते चिढ़ाते, कुछ खाने को देते, तभी छपरा गाँव के एक आदमी ने उस बच्चे को देखा, और गाँव जाकर उसने इस बात की चर्चा की, गाँव की वह किसान बुढ़िया ने भी यह बात सुनी तो दौड़कर उस आदमी के पास आई और उससे बच्चे का हुलिया पूछा साथ यह भी पूछा की क्या उस बच्चे के दाहिने हाथ पर कोई काला दाग है, जो जन्म से था, बात सही निकली आदमी ने उस दाग की तस्दीक़ की, बुढ़िया का पति तब तक मर चुका था वह अकेले कोइलीपुर बाज़ार पहुंची और उस बच्चे को अपने साथ लिवा लाई, लेकिन वह बच्चा कोहनी और घुटनों के बल ही चलता, जिससे वहां की खाल सख्त और काली पड़ चुकी थी, कच्चा मांस ही खाता जिस कारण उसके पूरे शरीर से बदबू आती, बावजूद इसके माँ की ममता उसे पालती रही, गाँव वालों का सहयोग भी मिला, किन्तु रात होते ही वह बच्चा जंगल में भाग जाता, माँ के पास आता तो सिर्फ इसलिए की खाने को कुछ मिल सके, उसे कोई लगाव या आत्मीयता नहीं थी उस बूढी माँ से... यह घटना भी स्थानीय जमींदार, अफसरों द्वारा पुष्ट है.



आमला-कामला 
1843 में सुल्तानपुर जनपद के लगभग 30 किलोमीटर पश्चिम में घुटकरी में एक जंगली बच्चा देखा गया, वह भी अपने घुटनों और कोहनियों के सहारे चलता, आदमियों को देखकर गुर्राता, इस बच्चे को भी जंगल से एक चरवाहा लेकर आया जब वह एक भेड़िए के साथ जंगल में घूम रहा था, बाद में इस बालक को अवध लोकल इन्फैंट्री सुल्तानपुर के कमांडर कर्नल ग्रे ने अपने पास बुलवाया, जहाँ सेना के तमाम अफसरों और उनके परिवारों ने इस जंगली बच्चे को देखा, एक दिन चरवाहा अपनी भेड़ों को जंगल किनारे घास चरा रहा था, तभी उसे नींद आ गयी, और यह जंगली बच्चा जंगल में भाग गया, दुबारा इस बच्चे का पता लगा या नहीं यह रिकार्ड में दर्ज़ नहीं है. 



कमला 
सुलतानपुर में गोमती के किनारे के जंगलों और झुरमुटों में बहुत से मोगली बच्चे देखे गए, और उनकी पुष्टि ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज अफसरों, स्थानीय राजाओ और जमींदारों ने की, उत्तर प्रदेश में ऐसी बहुत सी रोचक घटनाए हैं जिनमे एक ऐतिहासिक घटना है बहराइच जनपद की, जहाँ अभी कुछ दिन पहले मंकी गर्ल या मोगली गर्ल मिली, यह जंगली इलाके में घाघरा जैसी विशाल नदी गुजरती है, और इन जंगलों का काफी बड़ा हिस्सा कतर्नियाघाट वन्य जीव विहार अब दुधवा टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है,  इसी बहराइच के जंगलों में सन 1841 के आसपास बौड़ी  (बमनौटी) के करीब घाघरा नदी के बाईं ओर के जंगली इलाके में अवध सरकार के एक सैनिक ने एक बच्चे और दो भेड़ियों को एक साथ एक जंगली जलधारा में पानी पीते देखा, उसने बच्चे को दौड़कर पकड़ने की कोशिश की, वह बच्चा हाथ तो आया लेकिन उस सिपाही की वर्दी दाँतों से फाड़ डाली, और उसे कई जगह काट लिया, सैनिक ने उस बच्चे को घोड़े पर बिठाने की कोशिश की पर नाकाम रहा, आखिरकार उसने बच्चे के दोनों हाथ बाँध दिए और बौड़ी ले आया जहां के राजा हरदत्त सिंह के सामने उस जंगली बच्चे को पेश किया, राजा ने उसे रस्स्सियों से बंधवाया, और खाने को कच्चा गोश्त दिया, वह राजा के पास तीन महीने तक रहा, इस बीच यह बच्चा रस्सी दाँतों से काटकर कई बार भागने की कोशिश कर चुका था, अंतत: राजा तंग आ चुका था और इस बच्चे को एक कश्मीरी भांड (हास्य-विनोद करने वाला पेशेवर) को सौंप  दिया, यहाँ भी यह बालक तकरीबन छह महीने रहा, आखिरकार यह कश्मीरी भी तंग आ गया इस बच्चे से, तभी सनोअल्लाह नाम का कश्मीरी व्यापारी बूंदी के राजा हरदत्त सिंह के यहाँ आया कश्मीरी शाल बेंचने, उसे भी यह वाक़या बताया गया, सनोअल्लाह के पास कई खिदमतगार थे, उनमें से एक था जानू, जानू ने इस बच्चे की परवरिश का जिम्मा ले लिया, बच्चे को अपनी जिम्मेदारी में लेने का किस्सा भी बहुत मार्मिक है, वह कश्मीरी भाड़ जब तंग गया बच्चे से तो उसने उसे खुला छोड़ दिया, अब वह बौड़ी बाज़ार में इधर उधर घूमता, लोगों के लिए यह कौतूहल का विषय था, कभी किसी गोश्त की दूकान से गोश्त का टुकड़ा उठाकर भागता तो कभी बनिए की दूकान से कोई भी सामान लेकर भाग जाता एक दिन एक बनिए ने इस बच्चे पर एक तीर चला दिया जो इसकी जांघ पर लगा, इसी वक्त वह कश्मीरी व्यापारी अपने नौकरों के साथ बाज़ार में घूम रहा था, इसके नौकर जानू ने जब बच्चे की यह दशा देखी तो उसने बच्चे को अपने साथ ले लिया, उसकी जांघ में लगे तीर को निकाला और उस घाव पर पट्टी की, इस बच्चे को जानू एक आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर लिटाता, मगर उसे चारपाई सहित पेड़ से बाँध देता ताकि यह भाग न पाए, इस बच्चे के जिस्म से बहुत दुर्गन्ध आती, जानू ने सरसों के तेल की मालिश शुरू की, लेकिन यह गंध तब भी ख़त्म नहीं हुई, कई हफ़्तों बाद जानू ने इस बच्चे को चावल दाल और रोटी खिलाने में सफलता प्राप्त कर ली, नतीजतन इसके शरीर से बदबू भी लगभग गायब हो गई, जानू इसके घुटनो और कोहनियों में खूब तेल रगड़ता जिससे इसके सख्त हो चुकी कोहनिया और घुटने मुलायम हो जाए, क्योंकि यह बच्चा अपने हाथों के भल ही चलता था, जानू की इस करुणाभरी सेवा ने बच्चे को अपने दो पैरों पर चलना भी सिखा दिया। जानू ने चार महीनों में इस बच्चे के मुहं से गर्राहट भरी आवाज़ के अतिरिक्त कुछ नहीं सुना बस एक दो बार यह इसने अबुदिया कहा? जी हाँ यह नाम था उस कश्मीरी भाड़ की लड़की का जहाँ पहले यह बालक छह महीने रहा था,  लेकिन जानू ने इन चार महीनों में एक और सफलता पा ली थी अब यह बच्चा जानू से लगाव दर्शाने लगा था, और जानू के हुक्के में कोयले की आग भी भर लाता था.


Photo Courtesy: John Charles Dollman
इसी बीच एक और दिलचस्प वाक़या हुआ, आम के पेड़ के नीचे यह बच्चा लेटा हुआ था कुछ दूर पर जानू और कश्मीरी व्यापारी का सिपाही मीर अकबर अली भी सो रहे थे, तभी जानू को कुछ आहत सुनाई दी जानू ने उठकर देखा की दो भेड़िए उस बच्चे के साथ खेल रहे हैं, तभी अकबर अली भी उठ गए, और उन्होंने अपनी बन्दूक उठा ली लेकिन जब देखा की वह भेड़िए उस बच्चे को चाट रहे हैं, और उसके सिर  पर अपने पंजे रख रहे हैं और तीनो मगन है इस खेल में तो उन्होंने अपनी बन्दूक रख दी और इस इंसानी बच्चे और भेड़ियों के स्नेह को एकटक देखते रहे, मगर यह सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ दूसरी रात तीन भेड़िए आये और तीसरी रात चार ! यह सिलसिला चलता रहा और वह बच्चा हर रात उन्ही के साथ खेलता, बहुत खदेड़ने पर ये भेड़िए वापस जाते, दरअसल पहले दो भेड़िए वो रहे होंगे जब उस बच्चे को उस सैनिक ने नदी के किनारे से पकड़ा था, और तब भी उन भेड़ियों के बच्चों ने विरोध किया था उस सैनिक पर गुर्रा कर, अब यह बड़े हो चुके थे किन्तु बच्चे की गंध से इन्होने अपने बचपन के साथी को खोज निकाला था, अब यह खेल ख़त्म होने वाला था क्योंकि जानू का मालिक सनोअल्लाह अब लखनऊ जाने की तैयारी में था, सो एक दिन व्यापारी का यह दल यहाँ से लखनऊ की तरफ कूच कर दिया, जानू ने इस जंगली बच्चे को भी अपने साथ लिया और उसके सिर पर कपडे की गठरी रख दी, यह बच्चा जहाँ भी घने जंगल से गुजरता गठरी फेंक कर भागता, जानू और व्यापरी के नौकर उसे पकड़ कर लाते, उसकी पिटाई भी करते और दोबारा गठरी लेकर चलने को कहते लेकिन कुछ देर बाद  वह बच्चा फिर गठरी फेंक देता और भागता, इसतरह बमुश्किल यह यात्रा लखनऊ आकर समाप्त हुई, जहाँ यह बच्चा व्यापारी के घर पर जानू के साथ रहता, जानू ने इसे कुछ कपडे पहनाना भी शुरू कर दिया था पर यह अब भी पतलून फाड़कर फेंक देता था, हाँ यहाँ स्नेह की एक मार्मिक बात रह गयी बताने को, जब बौड़ी से सनोअल्लाह ने चलने का हुक्म दिया तो जानू ने इरादा कर लिया की अब वह व्यापारी की नौकरी छोड़ देगा, क्योंकि व्यापारी इस बच्चे को साथ ले चलने में आपत्ति कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सनोअल्लाह ने जानू को इस बच्चे को अपने साथ लाने की इजाजत दे दी.

कुछ दिनों बाद सनोअल्लाह ने जानू को दो दिन के लिए लखनऊ से दूर किसी व्यापारिक कार्य से भेज दिया और जब जानू वापस आया तो वहां वह बच्चा नहीं था, उसे बताया गया उसके जाने के बाद उसी रात वह कहीं चला गया, कहानी ने फिर एक दिलचस्प मोड़ लिया, बौड़ी रियासत की एक महिला जो चुरैरोकोटरा की रहने वाली थी लखनऊ सनोअल्लाह के घर आई और साथ में राजा हरदत्त का पत्र भी, जिसमे लिखा था की जानू जिस जंगली बालक को अपने साथ ले गया है वह इस औरत का बेटा है, जो तब चार साल का था जिसे आज से पांच छह वर्ष पहले भेड़िया उठाकर ले गया था, शिनाख्त के लिए औरत के बताए निशान थे जो बालक के सीने पर और माथे पर थे, बात सच्ची निकली सभी ने यह निशान उस बच्चे के शरीर पर देखे थे, लेकिन अब वह बच्चा वहां नहीं था, वह औरत कुछ महीनों बाद फिर लखनऊ उस व्यापारी के घर गयी की शायद उसका खोया हुआ बेटा मिल जाए, पर उसे खाली हाथ लौटना पड़ा. जानू के साथ यह बच्चा कुल पांच महीने रहा, वह उसे पुत्रवत स्नेह करने लगा  था,तमाम आदतों में भी परिवर्तन आया था, लेकिन कहीं भी खुजलाहट होने पर अभी भी वह बच्चा किसी पेड़ या दीवार से ही अपने शरीर को रगड़ता था. यह बच्चा लगभग दस वर्ष का था जब इसे उठाया गया तब इसकी उम्र चार बरस थी और इस बीच छह वर्षों में उस मादा भेड़िए ने पांच यह छह बार बच्चे दिए जिन सभी के साथ यह बच्चा रहा और इसी का नतीजा बनी उस बाग़ की घटना थी की वे भेड़िए के बच्चे जो अब बड़े हो चुके थे अपने साथी यानी इस इंसान के बच्चे को नहीं भूले जो उनकी माँ इन सभी के साथ इसे भी दूध पिलाती थी, शायद जानवर की फितरत में भूलना नहीं होता... 

यहां यह बताना जरुरी हो जाता है की उत्तर प्रदेश खासतौर से अवध खेत्र में भेड़िए द्वारा पाले गए बच्चो की तादाद बहुत है, इसकी वजह हैं यहाँ के जंगल, झाड़ियाँ, मांद बनाने की उपयुक्त धरती और नदियों का सुन्दर जाल, इन वजहों से भेड़ियों की तादाद अवध प्रांत में सबसे अधिक थी, अक्सर मानव आबादी में भेड़ियों के घुसने के किस्से सुनने को मिलते हैं आज भी, उस वक्त भेड़िए बच्चे ही नहीं बकरी जैसे पालतू जानवरों को भी उठा ले जाते थे, गाँवों में खुले हुए घरों और झोपड़ियों में ये जंगली जानवर आसानी से घुस जाता था, आज भी उत्तर प्रदेश की तराई में मानव द्वारा किए गए शिकार और जंगलों की कटाई के बावजूद भेड़िए, सियार मौजूद हैं, इंसान ने तराई से वन-कुत्ते जरूर समाप्त कर दिए, और भी प्रजातियां संकट में है, मानव की बढ़ती आबादी और उसके प्राकृतिक दोहन के वीभत्स तरीकों से... खैर विलियम स्लीमैन लिखते हैं की जब मादा भेड़िए के बच्चे मर जाते है तो उसके दुग्धपान न होने से उसे पीड़ा होती है, और फिर वह किसी इंसानी बच्चे को उठा लाती है, वैसे इसके अतरिक्त भी कई कारण होते है जानवर इंसानी बच्चो को अमूनन नुक्सान नहीं पहुंचाते और उनमे मातृत्व भाव अत्यधिक होता है, भेड़िया मांड में इस बच्चे को रखता है, उसके अन्य बच्चो के साथ या फिर अगली पीढ़ी के बच्चो के साथ वह रहता है क्योंकि इंसानी बच्चे का विकास भेड़ियों के बच्चो के विकास से धीमा होता है इस लिए इंसानी बच्चा मादा भेड़िए के साथ कई वर्ष रहने पर अपने दर्जनों दूध के रिश्ते के भाइयों का साथी बन जाता है, लेकिन कभी किसी भेड़िया मानव का किस्सा प्रकाश में नहीं आया, इसकी वजह है की जब तक वह मानव बच्चा कम उम्र का होता है और अपने दोनों हाथों के भल दौड़ लगाता है तो उसकी ऊंचाई और भेड़िए की ऊंचाई में कोइ खासा फर्क नहीं होता, साथ ही जब उम्र बढ़ती है तो वो फुर्ती और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घटती है, साथ ही भोजन की मात्रा भी बढ़ जाती है जो वुल्फ ब्वाय के लिए मुश्किलें खड़ी कर देती है, पर इन सबसे हटकर जो मौजू बात है वह है, की मानव बच्चे को जब मादा भेड़िया अपने बच्चे की तरह पालता है वह भेड़िया दस वर्ष के अंदर ही मर जाता है, जाहिर है भेड़िए की उम्र 7 या आठ वर्ष होती है, ऐसे में वह मानव बच्चा सच कहे तो अनाथ होता है और उसे अन्य भेड़िए या अन्य जंगली जानवर मार देते हैं, चूँकि अतीत में ऐसे बच्चे की लाश जंगल में इसलिए नहीं मिलती क्योंकि यदि शेर ने ऐसे भेड़ियों के साथ रहे बच्चे का शिकार किया और उसे खाया तो उसके बाद जो बचा उसे सियार या अन्य भेड़िया खा लेते हैं, नतीजतन शिनाख्त के लिए शरीर का कोई हिस्सा नहीं मिलता।

विलियम स्लीमैन के द्वारा खोजे और लिखे गए किस्सों का इंग्लैण्ड में 1888 में द जूलॉजिस्ट जर्नल में प्रकाशित हुआ, किन्तु इससे पूर्व विलियम स्लीमन ने 1849-1850 में "ए  जर्नी थ्रू  द  किंगडम ऑफ़ अवध में इन भेड़िया द्वारा पाले गए बच्चों का जिक्र किया है.

यहाँ गौर तालाब बात यह की भेड़िए द्वारा उठाकर ले जाए गए बच्चे जिन मांदों से मिले उनमे अधिकतर नर बच्चे थे, किन्तु मिदनापुर आसाम में दो बच्चिया मिली जिनका नाम रखा गया अमला और कमला ये दोनों बच्चियां आसाम के जंगलों में भेड़िए की मांद से सन 1920 में पादरी जोसेफ सिंह के द्वारा खोजी गयी जो बाद में मानव सभ्यता में कई वर्षों तक रहीं. 

इसके अलावा 1867 में मौजूदा जिमकार्बेट नेशनल पार्क के जंगलों में बुलंद शहर के नजदीक शिकारियों को दीना शनिचरा मिला, तब इसकी उम्र छह वर्ष थी, जिसे रिहेब्लिटेशन सेंटर में रखा गया, किन्तु वह कभी भी प्लेट में खाना नहीं खाता, प्लेट से खाना निकालकर जमीन पर रखता फिर खाता, कभी कुछ बोला भी नहीं, कपडे भी फाड़ता, लेकिन वह आखिर में तम्बाखू खाना सीख गया था, 1895 में शनिचरा की मृत्यु हो गयी, यह शिकारियों को शनीचर के दिन भेड़िए की माँद में मिला था सो इसका नाम दीना शनिचरा पड़ गया, जिम कार्बेट ने भी अपनी किताब में इस बच्चे का जिक्र किया है,

उत्तर भारत की तराई का एक और किस्सा है जिसे स्लीमैन ने देखा और लिखा है, यह भेड़िया मानव था, जिसे उत्तर प्रदेश की तराई से लखनऊ के राजा के अफसर लेकर आये थे, यह आदमी 40 वर्ष का रहा होगा तब जो जंगल में अकेले एक स्थान पर मिला जहाँ भेड़ियों की माँदें थी, लोगों का कहना था की यह आदमी जब बच्चा होगा तब इसे भेड़िए ले गए होंगे और इसे पालने वाली मादा भेड़ियाँ और इसके भेड़िए साथी जब मर गए होंगे तब यह अकेला रह गया होगा, और जंगल में किसी तरह बसर कर रहा होगा, विलियम स्लीमैन लिखते है की यह आदमी नाक-नक्श  से थारू जनजाति का लगता था, जो लखीमपुर जनपद के दुधवा नेशनल पार्क में मौजूद है.


इतिहास में लखीमपुर से सटे हुए शाहजहांपुर जनपद में भी मोगली यानी भेड़िया द्वारा पाला गया मानव बच्चा मिल चुका है जो अंग्रेज अफसरों की डायरियों में दर्ज़ है. भारत ही नहीं पर दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी घटनाएं घाटी जिसमे युगांडा का मंकी ब्वाय, आसाम का लियोपार्ड ब्वाय, तुर्की की भालू गर्ल, ऐसे बहुत से उदाहरण हैं दुनिया में जिनकी तस्वीरें, वीडियो भी उपलब्ध हैं.

जंगल और इंसान के रिश्ते बहुत पुराने हैं, यक़ीनन हमने जंगल काटकर अपनी सभ्यता बसा ली किन्तु हम ताल्लुक तो वहीँ से रखते हैं, ये अलग बात है की हम उस जंगल और जंगली जानवरो के अपने सदियों पुराने ताल्लुक से मुहं मोड़ते आएं हैं वो भी सिर्फ अपने नफ़े की ख़ातिर।




कृष्ण कुमार मिश्र 
मैनहन- 262727 
भारत 
KK Mishra
Wildlife Photographer and Conservationist)
krishna.manhan@gmail.com 

















   

Apr 7, 2017

पृथ्वी सभी वनस्पतियों की माता और मेघ पिता हैं- अथर्ववेद

फोटो साभार: शादाब रजा 
              
भारतीय महिलाएँ एवं आरण्य संस्कृति (गोवर्धन यादव)

पेट की आग बुझाने के लिए अनाज चाहिए, अनाज को खाने योग्य बनाने के लिए उसे कूटना-छानना पडता है और फ़िर रोटियां बनाने के लिए आटा तैयार करना होता है. इतना सब होने के बाद, उसे पकाने के लिए ईंधन चाहिए और ईंधन जंगलॊं से प्राप्त करना होता है. इस तरह पेट में धधक रही आग को शांत किया जा सकता है. बात यहाँ नहीं रुकती. जब पेट भर चुका होता है तो फ़िर आदमी के सामने तरह-तरह के जरुरतें उठ खडी होने लगती हैं. अब उसे रहने के लिए एक छत चाहिए ,जिसमें लकडियाँ लगती है. लकडियाँ जंगल से प्राप्त होती है. फ़िर उसे बैठेने-सोने अथवा अपना सामान रखने के लिए पलंग-कुर्सियाँ और अलमारियाँ चाहिए, इनके बनाने के लिए लकडियाँ चाहिए. लकडियाँ केवल जंगल से ही प्राप्त होती है. द्रुत गति से भागने के लिए वाहन चाहिए. गाडियां बनाने के किए कारखाने चाहिए और कारखाने को खडा करने के लिए सैकडॊं एकड जगह चाहिए. अब गाडियों कि पेट्रोल चाहिए. उसने धरती के गर्भ में कुएं खोद डाले  .कारखाने चलाने के लिए बिजली चाहिए. और बिजली के उत्पादन के लिए कोयला और पानी. अब वह धरती पर कुदाल चलाता है और धरती के गर्भ में छिपी संपदा का दोहन करने लगता है. कारखाना सैकडॊं की तादात में गाडियों का उत्पाद करता है. अब गाडियों को दौडने के जगह चाहिए. सडकों का जाल बिछाया जाने लगता है और देखते ही देखते कई पहाडियां जमीदोज हो जाती है., जंगल साफ़ हो जाते हैं  बस्तियां उजाड दी जाती है, आज स्थिति यह बन पडी है कि आम आदमी को सडक पर चलने को जगह नहीं बची.

अब आसमान छूती इमारतें बनने लगी हैं  इनके निर्माण में एक बडा भूभाग लगता है. कल-कारखानों और अन्य बिजली के उपकरणॊं को चलाने के लिए बिजली चाहिए नयी बसाहट को.पीने को पानी चाहिए. इन सबकी आपूर्ति के लिए जगह-जगह बांध बनाए जाने लगे. सैकडॊ एकड जमीन बांध में चली गई. बांध के कारण आसपास की जगह दलदली हो जाती है, जिसमें कुछ भी उगाया नहीं जा सकता. आदमी की भूख यहां भी नहीं रुकती है. अब हिमालय जैसा संवेदनशील इलाका भी विकास के नाम पर बलि चढाने को तैयार किया जा रहा है. करीब दो सौ योजनाएं बन चुकी है और करीब छः सौ फ़ाईलों में दस्तखत के इन्तजार में पडी है. बडॆ-बडॆ बांध बनाए जा रहे हैं और नदियों का वास्तविक बहाव बदला जा रहा है. उत्तराखण्ड में आयी भीषण त्रासदी,और भी अन्य त्रासदियाँ, आदमी की विकासगाथा की कहानी कह रही है.


आने वाले समय में सब कुछ विकास के नाम पर चढ चुका होगा. जब पेड नहीं होंगे तो कार्बनडाइआक्साईड  और अन्य जहरीले गैसों का जमावडा हो जाएगा? फ़ेफ़डॊं में घुसने वाली जहरीली हवा का दरवाजा कौन बंद करेगा? बादलों से बरसने के लिए किसके भरोसे मनुहार करोगे ?भारत के पुरुषॊं ने भले ही इस आवाज को अनसुना कर दिया हो, लेकिन भारतीय महिलाओं ने इसके मर्म को-सत्य को पहचाना है.


इतिहास को किसी कटघरे में खडा करने की आवश्यक्ता नहीं है. वर्तमान भी इसका साक्षी है. महिलाएँ आज भी वृक्षों की पूजा कर रही हैं. वटवृक्ष के सात चक्कर लगाती है और उसे भाई मानकर उसके तनों में मौली बांधती हैं और अपने परिवार के लिए और बच्चों के लिए मंगलकामनाओं और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थनाएँ करती है. तुलसी के पौधे में रोज सुबह नहा-धोकर लोटा भर जल चढाती हैं. और रोज शाम को उसके पौधे के नीचे दीप बारना नहीं भूलती है. तुलसी के वृक्ष में वह वॄंदा और श्रीकृष्ण को पाती हैं. उनका विवाह रचाती है. पीपल के वृक्ष में जल चढाना –उसके चक्कर लगाना और दीपक रखना नहीं भूलतीं. अमुआ की डाल पर झुला बांधकर कजरी गाती और अपने भाई से सुरक्षा और नेह मांगती है. अनेकों कष्ट सहकर बच्चों का पालन-पोषण करना, कष्ट सहना, उसकी मर्यादा है. और संवेदनशीलता उसका मौलिक गुण. यदि धोके से कोई एक छोटा सा कीडा/मकोडा उसके पैरों तले आ जाए, तो वह असहज हो उठती है और यह कष्ट, उसे अन्दर तक हिलाकार रख देता है. जो ममता की साक्षात मूरत हो, जिसके हृदय में दया-ममता-वात्सल्य का सागर लहलहाता रहता हो, वह भला क्योंकर जीवित वृक्ष को काटने की सोचेगी ?.

उद्दोगपतियों को कागज के ,निर्माण के लिए मोटे,घने वृक्ष चाहिए, लम्बे सफ़ेद और विदेशी नस्ल के यूक्लिप्टिस चाहिए और अन्य उद्दोगों के लिए उम्दा किस्म के पेड चाहिए., तब वे लाचार-हैरान-परेशान,- गरीब तबके को स्त्री-पुरुषॊं को ज्यादा मजदूरी के एवज में घेरते हैं और वृक्ष काटने जैसा जघन्य अपराध करने के लिए मजबूर करते है. मजबूरी का जब मजदूरी के साथ संयोग होता है तो गाज पेडॊं पर गिरना लाजमी है. इनकी मिली-भगत का नतीजा है कि कितने ही वृक्ष रात के अन्धेरे में बलि चढ जाते हैं. इस प्रवृत्ति के चलते न जाने कितने ही गिरोह पैदा हो गए हैं,जिनका एक ही मकसद होता है –पॆड काटना और पैसा बनाना. अब तो ये गिरोह अपने साथ धारदार हथियार के साथ पिस्तौल जैसे हथियार भी रखने लगे हैं. वन विभाग के अधिकारी और गस्ती दल,सरकारी कानून में बंधे रहने के कारण, इनका कुछ भी बिगाड नहीं सकते. केवल खानापूर्ति होती रहती है. यदि कोई पकडा भी गया, तो उसको कडी सजा दिए जाने का प्रावधान नहीं है. उसकी गिरफ़तार होते ही जमानतदार तैयार खडा रहता है. इस तरह वनमाफ़िया अपना साम्राज्य फ़ैलाता रहता है. देखते ही देखते न जाने कितने पहाडॊं को अब तक नंगा किया जा चुका है. आश्चर्य तो तब होता है कि इस काम में महिलाएं भी बडॆ पैमाने में जुड चुकी हैं,जो वृक्ष पूजन को अपना धर्म मानती आयी हैं. यह उनकी अपनी मजबूरी है,क्योंकि पति शराबी है-जुआरी है-बेरोजगार है-कामचोर है, बच्चों की लाईन लगी है, उनके पॆट में भूख कोहराम मचा रही है, अब उस ममतामयी माँ की मजबूरी हो जाती है और माफ़ियों से जा जुडती हैं.

एक पहलू और भी है तस्वीर का दूसरा एक पहलू और भी है और वह है त्याग, बलिदान और उत्सर्ग का. पुरुष का पौरुष जहाँ चुक जाता है, वहीं नारी “रणचंडी” बनकर खडी हो जाती है .इतिहास के पृष्ठ, ऎसे दृष्टान्तो से भरे पडे हैं. नारी के कुर्बानी के सामने प्रुरुष नतमस्तक होकर खडा रह जाता है. जहाँ नारी अपने शिशु को अपने जीवन का अर्क पिलाकर उसे पालती-पोसती है, अगर जरुरत पडॆ तो अपने बच्चे को दीवार में चुनवाने में भी पीछे नहीं हटतीं. पन्ना धाई के उस बलिदानी उत्सर्ग को कैसे भुलाया जा सकता है.? जब मर्द फ़िरंगियों की चमचागिरी में अल्मस्त हो,अथवा आततायियों के मांद में जा दुबका हो, तो एक नारी झांसी की रानी के रुप में उसकी सत्ता को चुनौतियाँ देती हुई ललकारती हैं.और इन आततायियों के विरुद्ध शस्त्र उठा लेती है.
पर्यावरण की रक्षा को महिलाओं ने धार्मिक अनुष्ठान की तरह माना है और अनेकानेक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं. “चिपको” आन्दोलन आखिर क्या है?. उसने पूंजींवादी व्यवस्था, शासनतंत्र और समाज के तथाकथित टेकेदारों के सामने जो आदर्श प्रस्तुत किया है ,वह अपने आपमें अनूठा है. जब कोई पेड काटने आता है, तो वे उनसे जा चिपकती है, और उन्हें ललकाराते हुए कहती हैं कि पेड के साथ हम भी कट जाएंगी,लेकिन इन्हें कटने नहीं देंगी. लाल खून की यह कुर्बानी देश के लाखों-करोडॊं पेडॊं की रक्षार्थ खडी हुई. यह एक अहिंसक विरोध था और इन अहिंसा के सामने उन दुर्दांतों को नतमस्तक होना पडा. ऎसी नारियों का नाम बडी श्रद्धा के साथ लिए जाते हैं. वे हैं करमा, गौरा, अमृतादेवी, दामी और चीमा आदि-आदि. पेडॊं के खातिर अपना बालिदान देकर ये अमर हो गई और समूची मानवता को संदेश दे गई कि जब पेड ही नहीं बचेगा, तो जीवन भी नहीं बचेगा. इस अमर संदेश की गूंज आज भी सुनाई पडती है.


विश्नोई समाज ने पर्यावरण के रक्षा का एक इतिहास ही रच डाला है. पुरुष-स्त्री, बालक-बालिकाएं पेडॊं से जा चिपके और उनके साथ अपना जीवन भी होम करते रहे थे. विश्व में ऎसे उदाहरण बिरले ही मिलते हैं. जोधपुर का तिलसणी गाँव आज भी अपनी गवाही देने को तैयार है कि यहाँ प्रकृति की रक्षा में विश्नोई समाज ने अपने प्राणॊं की आहूतियाँ दी थी. श्रीमती खींवनी खोखर और नेतू नीणा का बलिदान अकारण नहीं जा सकता. शताब्दियां इन्हें और इनके बलिदान को सादर नमन करती रहेंगी. बात संवत 1787 की है. जोधपुर के महाराजा के भव्य महल के निर्माण के लिए चूना पकाने के लिए लकडियाँ चाहिए थी. सब जानते थे कि केजडली का वनांचल वृक्षॊं से भरा-पूरा है. वहाँ के लोग पेडॊं को अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते है. ये पेड उनके सुख-दुख में सगे-संबंधियों की तरह और अकाल पडने पर बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते रहे हैं. लोग इस बात से भी भली-भांति परिचित थे कि वे पेडॊं कॊ किसी भी कीमत पर कटने नहीं देंगे. महाराजा ने कारिन्दों की एक बडी फ़ौज भेजी, जो कुल्हाडियों से लैस थी. उन्हें दलबल के साथ आता देख ग्रामीणॊं ने अनुनय-विनय आदि किए, हाथ जोडॆ और कहा की ये पेड हमारे राजस्थान के कल्पवृक्ष हैं. ये पेड धरती के वरदान स्वरुप हैं. आप चाहें हमारे प्राण लेलें लेकिन हम पेडॊं को काटने नहीं देंगे. इस अहिंसात्मक टॊली की अगुआयी अमृता देवी ने की. थीं.
 

वे सामने आयीं और एक पेड से जा चिपकी और गर्जना करते हुए कहा-“चलाओ अपनी कुल्हाडी....मैं भले ही कट जाऊँ लेकिन इन्हें कटने नहीं दूंगी.” उसकी आवाज सुनी-अनसुनी कर दी गई और एक कारिन्दे ने आगे बढकर उसके ऊपर कुल्हाडी का निर्मम प्रहार करना शुरु कर दिया. अपनी माँ को मृत पाकर इनकी तीन बेटियाँ वृक्ष से आकर लिपट गईं. कारिन्दे ने निर्मम प्रहार करने में देर नहीं लगाई. कुल्हाडी के वार उनके शरीर पर पडते जा रहे थे और उनके मुख से केवल एक ही बोल फ़ूट रहे थे:-“सिर साठे सट्टे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण”. इनके बलिदान ने ग्रामीणॊं के मन में एक अभूतपूर्व जोश और उत्साह को बढा दिया था. इसके बाद बारी-बारी से ग्रामीण पेडॊं से जा चिपकता और कारिन्दे उन्हें अपनी कुल्हाडी का निशाना बनाते जाता. इस तरह 363 व्यक्तियों ने हँसते-हँसते अपने प्राणॊं का उत्सर्ग कर दिया. हम जब इतिहास की बात कर ही रहे हैं तो और थोडा पीछे की ओर चलते हैं. और उस पौराणिक युग की यात्रा करते हैं ,जब प्रकृति और मनुष्य के जीवन के बीच कैसे संबंध थे.

मत्स्यपुराण में वृक्ष लगाने कि विधि बतलायी गई है.
“पादानां विधिं सूत//यथावद विस्तराद वद//विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्दापनं बुधै//ये चे लोकाः   स्मृतास्तेषां तानिदानीं वदस्व नः ऋषियों ने सूतजी से पूछा;- ’अब आप हमें विस्तार के साथ वृक्ष लगाने की यथार्थ विधि बतलाइये. विद्वानों को किस विधि से वृक्ष लगाने चाहिए तथा वृक्षारोपण करने वालों के लिए जिन लोकों की प्राप्ति बतलायी गयी है, उन्हें भी आप इस समय हम लोगों को बतलाइए”.

सूतजी ने वृक्ष लगाए जाने के की विधि के बारे में विस्तार से वर्णण किया है. वर्तमान समय में शायद ही इस विधि से कोई वृक्ष लगा पाता है. वृक्ष लगाने वाले अतिविशिष्ठ व्यक्ति के लिए, पहले ही इसकी व्यवस्था करा दी जाती है. उनके आने का इन्तजार किया जाता है और उसके आते ही उसे फ़ूलमालाओं से लाद दिया जाता है और वृक्ष लगाते समय उन महाशय की फ़ोटॊ उतारकर अखबार में प्रकाशित करा दी जाती है. उसके बाद उस वृक्ष की जडॊं में, पानी डालने शायद ही कोई जा पाता है. नतीजन वृक्ष सूख जाता है. कोशिश तो यह होनी चाहिए कि वृक्ष पले-बढे, और लोगो को शीतल छाया और फ़ल दे सके. यदि ऎसा होता तो अब तक उस क्षेत्र विशेष में हरियाला का साम्राज्य छाया होता और न जाने कितने फ़ायदे वहां के रहवासियों को मिलते. खैर. सूतजी ने वृक्ष लगाए जाने पर किस-किस चीज की प्राप्ति होती है बतलाया है.


“अनेन विधिना यस्तु कुर्याद वृक्षोत्सवं/ सर्वान कामानवाप्नोति फ़लं चानन्त्यमुश्नुते यश्चैकमपि राजेन्द्र वृक्षं संस्थापयेन्नरः/सोSपि स्वर्गे वसेद राजन यावदिन्द्रायुतत्रयम भूतान भव्यांश्च मनुजांस्तारयेदद्रुमसम्मितान/परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम य इदं श्रृणुयान्नित्यं श्रावयेद वापि मानवः/सोSपि सम्पूजितो देवैब्रर्ह्मलोके महीपते(16-17-18-19)

अर्थात:- जो विद्वान उपर्युक्त विधि से वृक्षारोपण का उत्सव करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती है. राजेन्द्र ! जो मनुष्य इस प्रकार एक भी वृक्ष की स्थापना करता है, वह जब तक तीस इन्द्र समाप्त हो जाते हैं ,तब तक स्वर्ग में निवास करता है. वह जितने वृक्षों का रोपण करता है, अपने पहले और पीछॆ की उतनी ही पीढियों का उद्धार कर देता है तथा उसे पुनरावृत्ति से रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है. जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसंग को सुनता या सुनाता है, वह भी देवताओं द्वारा सम्मानित और ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है.”(मत्स्यपुराण-उनसठवाँ अध्याय) मत्स्यपुराण में वृक्षों का वर्णण बार-बार मिलता है. इसके अलावा पद्मपुराण, भविष्यपुराण, स्कन्दादिपुराणॊं में इसकी विस्तार से विधियां बतलायी गईं है. 

“य़स्य भूमिः प्रमाSन्तरिक्षमुतोदरम/दिव्यं यश्च बूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रहमणॆ नमः(अथर्ववेद   (१०/७/३२) अर्थात “भूमि जिसकी पादस्थानीय़ और अन्तरिक्ष उदर के समान है तथा द्दुलोक जिसका मस्तक है, उन सबसे बडॆ ब्रह्म को नमस्कार है.” यहाँ परमब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार कर, प्रकृति के अनुसार चलने का निर्देश दिया गया है. वेदों के अनुसार प्रकृति एवं पुरुष का सम्बन्ध एक दूसरे पर आधारित है. ऋग्वेद में प्रकृति का मनोहारी चित्रण हुआ है. वहाँ प्राकृतिक जीवन को ही सुख-शांति का आधार माना गया है. किस ऋतु में कैसा रहन-सहन हो, क्या खान-पान हो, क्या सावधानियाँ हों- इन सबका सम्यक वर्णण है. ऋग्वेद (७/१०३/७) में वर्षा ऋतु को उत्सव मानकर शस्य-श्यामला प्रकृति के साथ, अपनी हार्दिक प्रसन्नता अभिव्यक्त की गयी है. वेर्दों के अनुसार पर्यावरण को अनेक वर्गों में बांटा जा सकता है.-यथा- वायु-,जल,-ध्वनि-,खाद्य और मिट्टी, वनस्पति, वनसंपदा, पशु-पक्षी-संरक्षण आदि. स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए पर्यावरणकी रक्षा में वायु की स्वछता का प्रथम स्थान है. बिना प्राणवायु के एक क्षण भी जीना संभव नहीं है. ईश्वर ने प्राणिजगत के लिए संपूर्ण पृथ्वी के चारों ओर वायु का सागर फ़ैला रखा है. हमारे शरीर में रक्त-वाहिनियों में बहता हुआ खून, बाहर की तरफ़ दवाब डालता है, यदि इसे संतुलित नहीं किया गया तो शरीर की धमनियां फ़ट जाएगीं और हमारा जीवन नष्ट हो जाएगा. वायु का सागर इससे हमारी रक्षा करता है. पॆड-पौधे आक्सीजन देकर क्लोरोफ़िल की उपस्थिति में, इसमें से कार्बनडाईआक्साइड अपने लिए रख लेते हैं और हमें आक्सीजन देते हैं. इस प्रकार पेड-पौधे वायु की शुद्धि द्वारा हमारी प्राण-रक्षा करते हैं.

वायु की शुद्धि के लिए यजुर्वेद में स्पष्ट किया है . “तनूनपादसुरो विश्ववेदा देवो देवेषु देवः/पथो अनक्तु मध्वा घृतेन” (२७/१२) “द्वाविमौ वातौ वात सिन्धोरा परावतः/दक्षं ते अन्य आ वायु परान्यो वातु यद्रपः (ऋग्वेद-१०/१३७/२) यददौ वात ते गृहेSमृतस्य निधिर्हितः/ततो नो देहि जीवसे (ऋग्वेद-१०/१८६/३)
हमारे पूर्वजों को यह ज्ञान था कि हवा कई प्रकार के गैसों का मिश्रण है, उनके अलग-अलग गुण एवं अवगुण हैं, इसमें प्राणवायु भी है, जो हमारे जीवन के लिए आवश्यक है. शुद्ध ताजी हवा अमूल्य औषधी है और वह हमारी आयु को बढाती है.

वेदों में यह भी कहा गया है कि तीखी ध्वनि से बचें, आपस में वार्ता करते समय धीमा एवं मधुर बोलें.
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा/सम्यश्च सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया(अथर्ववेद ३/३०/३). जिव्हाया अग्र मधु मे जिव्हामूले मधूलकम/ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि(अथर्वेवेद१/३४/२)

अर्थात;- मेरी जीभ से मधुर शब्द निकलें. भगवान का भजन-पूजन-कीर्तन करते समय मूल में मधुरता हो. मधुरता मेरे कर्म में निश्चय रहे. मेरे चित्त में मधुरता बनी रहे..इसी तरह खाद्य-प्रदूषण से बचाव के उपाय एवं. मिट्टी(पृथ्वी) एवं वनस्पतियों में प्रदूषण की रोकथाम के उपाय भी बतलाए गए हैं.

यस्यामन्नं व्रीहियवौ यस्या इमाः पंच कृष्टयः/भूम्यै पर्जन्यपल्यै नोमोSत्तु वर्षमेदसे.(अथर्ववेद-१२/१/४२)
अर्थात;- भोजन और स्वास्थय देने वाली सभी वनस्पतियाँ इस भूमि पर उत्पन्न होती है. पृथ्वि सभी वनस्पतियों की माता और मेघ पिता हैं,क्योंकि वर्षा के रुप में पानी बहाकर यह पृथ्वी में गर्भाधान करता है.
आप किसी भी ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए,सभी में प्रकृति का यशोगान मिलेगा और यह भी मिलेगा कि आपके और उसके बीच कैसे संबंध होंने चाहिए और किस तरह से हमें उसॆ स्वस्थ और स्वच्छ बनाए रखना है. शायद हम भूलते जा रहे हैं कि पर्यावरण चेतना हमारी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा रहा है. हमने हमेशा से ही उसे मातृभाव से देखा है. प्यार-दुलार-और जीवन देने वाली माता के रुप में. जो मां अपने बच्चे को, अपने जीवन का अर्क निकालकर पिलाती हो, उसे उस दूध की कीमत जानना चाहिए. यदि हम उसके साथ दुर्व्यवहार करेंगे, उसका अपमान करेंगे अथवा उसकी उपेक्षा करेंगे, तो निश्चित ही उसके मन में हमारे प्रति ममत्व का भाव स्वतः ही तिरोहित होता जाएगा. काफ़ी गलतियाँ करने के बावजूद ,माँ कभी भी अपने बच्चों पर कुपित नहीं होती. लेकिन जब अति हो जाए –मर्यादा टूट जाए तो फ़िर उसके क्रोध को झेलना कठिन हो जाता है. अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए फ़िर उसे अपने बच्चों की बलि लेने में भी, कोई झिझक नहीं होती.


गोवर्धन यादव 
कावेरीनगर,छिन्दवाडा goverdhanyadav44@gmail.com

Apr 6, 2017

एक ऐसी जगह जहाँ सब कुछ केले का...




बनाना एग्रो रिजॉर्ट टीकापुर नेपाल

केले की खेती के साथ साथ पर्यटन का भी व्यवसाय

केले में मौजूद हैं रेडियोएक्टिव पोटैशियम-40 

यदि आप केला खा रहें है तो आप रेडियोएक्टिव पोटैशियम-40 भी खा रहे हैं! सोचिए!

सुदूर पश्चिम नेपाल देश के कैलाली जनपद के टीकापुर में एक जगह ऐसी है जो आप के मन को कौतूहल से भर देगी, ग्रामीण इलाके में केले के बागानों के मध्य एक रिजॉर्ट, जी हाँ यह शायद भारत-नेपाल या शायद दुनिया में पहली जगह होगी जहां किसान टूरिज्म को बढ़ावा दे रहे हैं, वह भी एक केले की प्रजाति की दम पर, ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक जगहें हैं जहाँ टूरिज्म की व्यवस्था हैं, किन्तु कृषि के साथ वह भी सिर्फ केले को आधार पर यह पर्यटन व्यवसाय अनूठा और अप्रतिम हैं, कहते हैं रचनात्मकता कहीं भी किसी भी इंसान के मस्तिष्क में उपज सकती है, जिसका उदाहरण नेपाल की इस छोटी से जगह टीकापुर का यह "बनाना एग्रो रिजॉर्ट" है.

भारत में कृषि की उन्नत तकनीक और उपजाऊ कृषि भूमियां हैं, जहाँ किसान खेती के साथ ग्रामीण पर्यटन का व्यवसाय कर सकते हैं, थोड़ी लगन और म्हणत किसी के भी गाँव की खेती किसानी की जमीन को कृषिकार्य के साथ साथ टूरिज्म में भी पैसा कमाने का जरिया बन सकती है.



टीकापुर नेपाल -धनगढी से पूर्व चीसा-पानी वाले राजमार्ग पर लगभग ५० किलोमीटर दूर चलने पर सड़क से दक्षिण कुछ मील के फासले पर ग्रामीण अंचल में यह बनाना फ़ार्म और बनाना एग्रो रिजॉर्ट स्थित है, भारत की तराई में बसे जनपद लखीमपुर खीरी की इंडो नेपाल सरहद में तिकुनिया से तो यह रिजॉर्ट बहुत ही नज़दीक है, यहाँ की खासियत यह है की इनके रेस्तरा में  आपको खाने के लिये जो भी मिलेगा वह केले का ही बना होगा यहाँ तक चाय काफी को छोड़कर आप को पीने के लिए केले से बनी वाइन, केले की लस्सी, केले की ब्रांडी, केले का जूस, अब आइए खाने की वस्तुओं पर तो यहाँ केले की टिक्की, केले का पनीर, केले के पराठे, केला चिली, केला सूप, केले का सलाद, बनाना मोमो, केले की पकौड़ी, केले का अचार और न जाने कितनी केले की रेसिपी आप को यहाँ मिल जाएंगी, ठहरने के लिए डिजायन की हुई हट, और बैठने के लिए केले के बगीचे में बहुत दूर में फैला हुआ यह रिजॉर्ट आरामदायक कुर्सियों और ममेजों से सुसज्जित है, केले के जंगल में बैठकर केले से ही बनी चीजों का स्वाद लेना अपने आप में एक अद्भुत एहसास दिलाता है, और हाँ यहाँ केले से बने हस्तशिल्प को देख व् खरीद भी सकते है.

नेपाल के व्यवसायी कालू हमाल इस रिजॉर्ट के मालिक हैं, बहुत काम जमीन में कुछ केले के पौधों के साथ इन्होंने यह रिजॉर्ट बनाया जो अब पूरे नेपाल में प्रसिद्द, मिस्टर कालू हमाल कभी इंस्टिट्यूट ऑफ़ एग्रीकल्चर एन्ड एनीमल साइंस से भी सम्बद्ध रहे. इनका यह प्रयोग भारत में भी किसानों को एक नई दिशा दे सकता है.

केले से हर भारतीय अच्छी तरह से वाकिफ है, केले के पौधे को वृहस्पति और विष्णु भगवान् के रूप में माना जाता है, ये केला दक्षिण भारत और उत्तर भारत की वैवाहिक व् धार्मिक आयोजनों में इस्तेमाल होता है, इसकी उत्पत्ति भारत मलाया क्षेत्र में मानी जाती है, लीनियस ने सर्व प्रथम इसका नामकरण किया और नाम रखा मूसा सैपिएंटम, जो की अगस्तस के डाक्टर एंटोनियस मूसा के नाम पर था, केले की दो जंगली प्रजातियां मूसा एक्युमिनिटा और मूसा बैलबिसियाना है, इन प्रजातियों में केले के फल के अंदर बड़े बड़े कठोर बीज होते है, इन्हें क्रास कराकर वैज्ञानिकों ने मूसा पैराडिसियइका जैसी प्रजाति बनाई,  मूसा (केला) जीनस  में अभी तक ७० प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं किन्तु आनुवंशिक पद्धतियों से संम्वर्धित केले की अब तमाम उन्नत किस्में उपलब्ध है, किन्तु शुरुवाती दौर में ये केला दो मुख्य किस्मों में आम जनमानस में जाना जाता था एक को लोग बनाना कहते थे जिसके पके फल खाने में इस्तेमाल करते थे और दुसरे को प्लैनटेन्स कहते है जो पकाकर सब्जी के तौर पर खाया जाता है, मगर यह विभेद सिर्फ आम जनमानस में सामाजिक है, वैज्ञानिक नही.

केले में पोटैशियम की अच्छी मात्रा होती है साथ ही इसमें कुछ मात्रा में आइसोटोप पोटैशियम-४० भी मौजूद होता है,  इसलिए आप केले को रेडियोएक्टिव फल भी कह सकते हैं, और जब आप केला खा रहे होते हैं तो आप रेडियोएक्टिव पोटैशियम-४० भी खा रहे होते हैं, पर घबराने की जरुरत नही, प्रकृति में सभी तत्व जरुरी हैं, और अन्य कई फलों और सब्जियों में भी होते है, रेडियोएक्टिविटी एक निश्चित मात्रा में वनस्पतियों में मौजूद है, इसलिए यदि एक दिन में आप एक करोड़ केला खा लेंगे तभी यह रेडियो एक्टिव तत्व आप को नुक्सान पहुंचाएंगा ! अन्यथा नही, केला विटामिन सी, विटामिन बी ६, विटामिन दी और कार्बोहायड्रेट का बेहतर स्रोत है, फाइबर मौजूद होने की वजह से यह स्वास्थ्य के लिए भी गज़ब का फल है. केला पोषक तत्वों से तो भरपूर है ही, औषधि के रूप में भी इसका इस्तेमाल होता है, केले की पत्तियां और फूल, सूजन, दर्द और केले का फल पेट की बीमारियों में फायदेमंद है, केले के तने के मध्यभाग के रस से पथरी का इलाज़ और डायबिटीज में मुफीद बताया गया है. पारम्परिक औषधियों में केले के फूल को पकाकर खाने से डायबटीज, अल्सर, पेचिस, जैसी बीमारियों में लाभप्रद बताया गया है. 

नेपाल के इस बनाना रिजार्ट के किस्से के अतरिक्त दुनिया में केले को लेकर बहुत सी कहानियाँ है, इनमे से एक है बनाना म्यूजियम वाशिंगटन अमरीका में जहाँ बनाना से जुडी आप 4000 वस्तुएं देख सकते हैं.





कृष्ण कुमार मिश्र 
मैनहन-26272701 
भारत 
krishna.manhan@gmail.com 









Apr 5, 2017

आलू का किस्सा-पूँजीवाद की चालाकियोँ ने समाजवाद को ख़त्म कर दिया!



आलू एक ऐसी फसल जो दुनिया का पेट भरने में अहम दर्ज़ा हासिल किए है.


इतिहास में आलू की पैदाइश दक्षिण अमरीका के पेरू में बताई जाती है, सुदूर बोलीविया में भी आर्कियोलॉजी के अन्वेषण में आलू के चिन्ह मिले, जहाँ तकरीबन 10000 वर्ष पूर्व से इंका इन्डियन इस कन्द को उगाते थे, १५वीं  सदी में जब स्पेन ने पेरू पर हमला किया और वहां काबिज़ हुए, तो उनका  आलू जैसे पौष्टिक कन्द से परिचय हुआ, और यही से इस आलू का सफर शुरू हुआ जो पहले योरोप पहुंचा और फिर अफ्रीका और एशिया, जहाँ तक भारत की बात है तो यह आलू सत्रवहीं सदी में पुर्तगालियों द्वारा भारत लाया गया, जिसे पुर्तगाली में बटाटा कहाँ जाता है, और भारत के उन समुद्री छोरों गोवा आदि में इसे आज भी बटाटा के नाम से जानते है, अंग्रेजों ने इस आलू को बंगाल में दाखिल किया और १८वीं  सदी में उत्तर भारत की पहाड़ियों में अंग्रेजों ने आलू की बाकायदा खेती शुरू कर दी, वैसे यह आलू यानी सोलेनम ट्यूबरोसम जिसे अंग्रेजी में पोटैटो कहते हैं इसकी भी उत्पत्ति स्पेनिश पटाटा शब्द से हुई, खैर अंग्रेजों ने अपने उपनिवेश के दौरान इसे योरोप लाये और सबसे पहले आयरलैंड में इसकी खेती हजारों हेक्टेयर में शुरू की, एक वक्त आया की समूचा आयरलैंड आलू की खेती पर निर्भर हो गया और तभी अचानक इस आलू में एक बीमारी लग गयी जिसे लेट ब्लाईट कहते हैं, इस फंगस वाली बीमारी ने पुरे आयरलैंड के किसानों और वहां की अर्थ व्यवस्था को तबाह कर दिया और न जाने कितने लोग देश छोड़कर चले गए, 1840 के इस अकाल को आयरलैंड का सबसे बड़ा अकाल कहा जाता है, एक फसल पर निर्भरता किस तरह तबाही मचाती है यह बात अभी शायद हमारे तराई के गन्ना बोने वाले किसान नही समझ रहे! 

चावल, गेहूं और मक्का के बाद आलू दुनिया में चौथी सबसे प्रमुख खाद्य फसल है, अब इसे पाँचवीं मुख्य फसल कह सकते हैं, क्योंकि गन्ना चौथे नंबर पर दाखिल हो चुका है, आलू की तकरीबन 5000 किस्में पूरी दुनिया में लोग इस्तेमाल कर रहें हैं, जबकि अभी तक जंगली आलू की 200 से अधिक प्रजातियाँ खोजी जा चुकी हैं, भारत में पोटैटो रिसर्च सेंटर शिमला द्वारा 48 उन्नत किस्मों का विकास किया गया है, जिसे भारत के किसान आलू की खेती में इस्तेमाल करते हैं, यहाँ यह बताना दिलचस्प होगा की अंग्रेजों ने सन १९३५ में शिमला, कुफरी हिमाचल और कुमायूं हिल्स में भवाली में पोटैटो ब्रीडिंग सेंटर की शुरुवात की बाद में भारत सरकार ने इसका नाम सेन्ट्रल पोटैटो रिसर्च इंस्टिट्यूट कर दिया और इन तीनों रिसर्च सेंटर को मिलाकर १९५६ में शिमला को हेडक़्वाटर बनाया। 



भारत में इन प्रमाणित 48 प्रजातियों के अतिरिक्त भी कई देशी किस्में होगी आलू की, किन्तु एक मनमोहक आलू की प्रजाति ने भारत में तकरीबन ८-९ वर्ष पहले दस्तक दी, इसका नाम है लेडी रोजेटा जैसा नाम वैसी ही खूबियां, सुर्ख गुलाबी रंग लिए यह आलू लो-शुगर वाला और चिप्स के लिए सबसे बेहतरीन माना जाता है, नीदरलैंड की यह किस्म डच पोटैटो के नाम से भी विख्यात है, गुजरात सहित उत्तर प्रदेश के किसान भी आलू की यह किस्म उगा रहे हैं, कुछ चिप्स बनाने वाली कंपनियां लेडी रोजेटा, चिप्सोना, फ़्राइसोना जैसी आलू की किस्मों की मांग अत्यधिक करती हैं.


आलू की कहानियां कोलम्बस से भी जुड़ी है, इसलिए अमरीका और योरोप में एक शब्द प्रचलित हुआ कोलंबियन एक्सचेंज, कोलम्बस द्वारा नई दुनिया की खोज के बाद जो भी चीजे जैसे आलू, टमाटर, तम्बाखू, सिफलिस जैसी बीमारियों का आदान प्रदान नई दुनिया यानी अमरीका और पुरानी दुनिया यानी योरोप, अफ्रीका और एशिया आदि के मध्य हुआ, ये आलू भी उसी कोलम्बियन एक्सचेंज का नतीजा था योरोप में, ख़ास बात यह की केमिकल फर्टिलाइजर की उत्पत्ति से पहले इसी कोलंबियन एक्सचेंज के तहत पेरू से चिड़ियों का मल जो ठोस यूरिक एसिड होता है खाद के रूप में योरोप में आलू की खेती में इस्तेमाल किया गया जिसे फिर अमरीकी सरकार ने प्रतिबन्धित किया और गुआनो(चिड़ियों का मॉल ) आइलैंड्स पर एकाधिकार कर लिया, इस तरह उर्वरक भी सत्ता की एक महत्वपूर्ण चीज बन गयी जो आज भी है! इस खाद्य ट्यूबर यानि कंद ने पूरे योरोप के राजाओं, किसानों को हतप्रभ किया, अन्न उपजाने के बजाए आलू की खेती ज्यादा मुफीद साबित हुई, और खाद्य संकटों से बचने का सबसे बढ़िया फसल बनी आलू की, इसी फसल ने फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैण्ड को कई बार अकालों से बचाया भी, लेकिन गन्ने की मिठास का वह रूप जिसे व्हाइट शुगर कहते है जिसने एक दौर में योरोप के राजाओं और मध्य एशिया के खलीफाओं के मध्य विलासिता और अमीर होने का रुतबा दिया था, उसी तरह इससे पहले योरोप में अमरीका से आई यह आलू की प्रजाति भी थी, जिसके जनमानस में प्रसारित होने से पहले यह उपनिवेशी राजाओं के महलों की शोभा बनी, फ्रांस का बादशाह लुइस द  ग्रेट आलू के फूलों को अपने बटन में लगाता था, और  महरानी मैरी एंटोनियता आलू के पुष्प को अपने बालो में गूँथती थी,  दक्षिण पश्चिम जर्मनी में ओफ्फेनबुर्ग में सर फ्रैंसिस ड्रेक की एक प्रतिमा सन 1853 में लगाए गयी जिसमे उनके एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में आलू का पौधा है, 1586 में इन्होंने जर्मनी में आलू के प्रसार की मुहीम चलाई, और इस पौष्टिक और काम समय में उगने वाले कंद से जर्मनी के लोगों को परिचित कराया, इन्हें वहां आलू का महान प्रसारक माना जाता है, यकीनन इन्होंने आलू की खेती योरोप में नही शुरू कराई, यह कार्य वहां स्थापित हुए एंडीज पर्वतमालाओं के रहने वाले लोगों ने किया जो यहाँ आकर बेस किन्तु इस आलू की खेती के प्रसार में फ्रैंसिस  ड्रेक ने अपने आप को समर्पित किया, और फिर नाज़ी जर्मनी के वक्त इनकी यह खूबसूरत प्रतिमा ढहा दी गयी, यह इतिहास का अपमान नही था बल्कि उस कला का अपमान था, जिस अलसेसन स्कल्पचर को बनाया था एंड्रीज फ्रैड्रिक ने यह उस कला और उस कलाकार का अपमान था.


चलिए इस आलू के अतीत से निकल कर इसकी पौष्टिकता की बात कर ली जाए, तो सबसे पहले यह की मानव जैवविकास के तहत यदि इतना बुद्धिमान बन पाया तो यह इस जमींदोज़ कन्द यानी आलू के बदौलत, विज्ञान ने यह साबित किया है की मनुष्य के मस्तिष्क के विकास में स्टार्ची कार्बोहायड्रेट का सबसे अधिक महत्त्व है, आलू काम कैलोरी, कोलेस्ट्राल रहित, मैग्नीशियम, पोटेशियम, विटामिन्स खासतौर से विटामिन सी, बी6, से भरपूर होता है, चूँकि आलू में स्टार्च की अधिकता होती है सो पाचन प्रक्रिया के तहत इसका कुछ हिस्सा बिना पचे ही बड़ी आंत तक पहुँच जाता है, यह फाइबर की तरह कार्य करता है और कोलन कैंसर और अपच की समस्या से बचाता है, स्टार्च के तौर पर कार्बोहायड्रेट लेने से डायबटीज में भी फायदेमंद है. कुल मिलाकर आलू वसा, सोडियम और क्लोरेस्ट्राल से रहित खाद्य है जो ह्रदय और डायबटीज जैसी बीमारियों से निज़ात दिलाता है.

आखिर में किसान की दशा पर चर्चा करना जरुरी है, आलू उत्पादकों की मौजूदा स्थिति बदतर है, आलू के महंगे बीज से लेकर, खेत तैयार करना, उर्वरक, और पेस्टिसाइड यह सब मिलाकर एक बड़ी रकम का इन्वेस्टमेंट हैं साथ ही श्रम जिसकी कोई कीमत अमूनन नहीं आंकी जाती हमारे यहाँ!, फसल तैयार हुई तो आलू खुदाई, फिर बोरियों का इंतजाम जो १२ रूपये से लेकर २० रूपये तक की कीमत में आती हैं 100 कुंतल आलू के लिए 200 बोरिया लाजिमी है, साथ ही ट्रैक्टर या अन्य भार वाहन का भाड़ा, फिर आढ़तिए का कमीशन और फिर आखिर में बाज़ार का खुदरा मूल्य कुल जमा इस बार किसान के हाथ शून्य लगा है, अब ऐसे हालातों में जहाँ आलू की खेती करने वाले किसान तबाह हुए है, उन्हें न तो सरकार से कोई सहयोग मिल रहा है और न ही अगली फसल पर कोई सहायता, ऐसा सिर्फ आलू के साथ ही नही है, सब्जी की खेती करने वाले किसान हो या धान, गेहूं, मक्का की सबका हाल रामभरोसे ही है, फसल तैयार होने पर बाजार शेयर मार्केट की तरह लुढ़कता है और किसान की फसल आने पौने दामों में खरीदने के बाद बाजार में उछाल आ जाता है, और किसान दूर खड़ा अपनी किस्मत पर न रो पाता है और न मुस्करा, और यहाँ अवधी कवि पंडित बंशीधर शुक्ल की वह रचना याद आती है "चौराहे पर ठाढ़  किसनऊ ताकै  चारिव वार ", अब बात करे कांट्रेक्ट फार्मिंग की तो गन्ना के क्षेत्र में प्राइवेट लिमिटेड का बोलबाला हो गया तराई की जमीन गन्ने से आच्छादित है, किसान और सरकार दोनों को इस बात से फर्क नही की फसल चक्र ख़त्म हो गया, जैव विविधता नष्ट हो रही है और जमीन से अत्यधिक जल दोहन से जल स्तर नीचे गिर चुका है, भविष्य में गन्ने की प्रजातियों पर कोई संकट मंडराया या ये प्राइवेट लिमिटेड का एकाधिकार कोई आफत लेकर आया तो किसान कहाँ खड़ा होगा, कभी इसी गन्ने की खेती ने दुनिया में सबसे ज्यादा गुलाम पैदा किए, भारत में गिरमिटियों की एक कौम ही खड़ी हो गई  मारीशस जैसे द्वीपों में वे आज भी विद्यमान है, जब तक गन्ने की मिठास उपनिवेशिक राजशाही के पास रही तब भी ये कथित किसान गुलाम रहे फिर कंपनियों के पास आई तब भी ये लाचार हैं, अपनी ही फसल की कीमत ये तय नही कर सकते, फसल बेच लेने के  बाद यह उस रकम के लिए महीनों बैंकों के साइनबोर्ड ताकते हैं, फिर भी इन किसानों को एहसास नही की इस दुर्दशा के बाद भी ये इस देश को खिलाने वाले दानवीर है क्योंकि इनकी म्हणत की कीमत आंकी नहीं जाती सिर्फ फसल की कीमत का मुआवजा भर मिल जाता है, और इनकी वजह से ही मुल्क में कलेक्टर और मजिस्ट्रेट बनते हैं, ये रेवन्यू न हो तो अफसरान की कारों से नीली बत्तियां उतर जाए, पण्डित दीन दयाल के शब्दों में ये दरिद्र नारायण है जो स्वयं दरिद्र रहकर भी लोगों के पेट भरता है. 

 हम खाद्य सुरक्षा चाहते हैं तो बीजों, किसानों, और इस धरती मां  इन तीनों का संवर्धन करना होगा हमें बिना किसी फौरी लालच के, यकीनन हमें रेवन्यू एक्ट में बदलाव करने होगें, कंपनियों पर किसानों का साझा जैसा अधिकार देना होगा, हाँ वैसा कतई नहीं जो मौजूदा समय में सहकारिता की स्थिति है, किसान और बाजार के बीच के बिचौलियों को ख़त्म करना होगा भले ही वह कोइ सरकार के साझे वाली प्राइवेट लिमिटेड हो, उपभोक्ता तक सीधी अपनी उपज पहुंचाने की व्यवस्था, बाजार पर सरकार का कड़ा नियंत्रण, देशी बीजों का सरंक्षण व् प्रसार, फसलों में विवधिता, और किसानों के लिए उनके आस पास अस्पताल, विश्वविद्यालय और तमाम जरुरी सहूलियतें जिससे वह पलायन न कर सकें, मजदूर संगठित हो सकता है, बोल्शेविक क्रांति इसका उदाहरण हैं, पर किसान संगठित नही होता, यदि किसान संगठित होकर अपने श्रम और अपनी फसल की उचित कीमत मांगे तो सरकारों को जरूर इस बावत विचार करना पडेगा। 

कभी यह आलू भी उपनिवेशी सत्ता के हाथों रहा और किसान मजदूर की तरह इस खेल में अपनी म्हणत लगाता रहा, मौजूदा हालातों में ये बाजार और बिचौलिए उन उपनिवेशी सरकारों से अधिक घातक हैं, इनकी रसीदों पर लिखी वह इबारत "भूल चूक लेनी देनी" आज भी कचोटती है मन को और सरकार नज़रन्दाज करती है इसे, बाज़ार ने सहकारिता को ख़त्म कर दिया और नतीजतन किसान का समाजवाद उसके पसीने की जलालत के साथ दम  तोड़ गया 


और यह किसान अभी भी ठीक से नही समझ पाया है की अंग्रेजी के पीजेंट का मतलब गंवार, देहाती होता है!  






कृष्ण  कुमार मिश्र 
मैनहन-२६२७२७ 
भारत 
krishna.manhan@gmail.com 













विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
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तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

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दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

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