डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

वर्ष-5, अप्रैल 2015

वर्ष-5,  अप्रैल  2015
हिमालय
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Apr 26, 2015

एक फूल की दास्ताँ जो बतलाती है इंसान के बिसरे हुए कल को

 
Pulicaria dysenterica? 

तराई में उगा है यह बिलायती फूल 
कामन फ्लीबेन नाम है इस खूबसूरत फूल का 
उजड़ी धरती और रिसती हुई नदी की कहानी भी बयान कर रहा है यह फूल 

*कृष्ण कुमार मिश्र 

उत्तर भारत के तराई जनपद खीरी की एक नदी “पिरई” और उसके दक्षिण में बसा एक गाँव “मैनहन”, बस यहीं  की यह दास्ताँ है जो एक फूल से बावस्ता है, दरअसल कभी यह नदी यहाँ के शाखू, महुआ, पलाश आदि के जंगलों और घास के बड़े बड़े मैदानों से होकर गुजरती थी, भौगोलिक दृष्टिकोण से नदी की धारा अभी भी अपने हजारों वर्ष वाले रास्ते पर मुस्तकिल है, परन्तु अब यह नदी बहती नहीं रिसती है, वजह जाहिर है कि जंगलों और मैदानों से जो बरसाती पानी एकत्र होता था वह इस नदी को पोषित करता था, किन्तु इसके आस-पास के जंगल और घास के मैदान उजड़ चुके है, यहाँ अब सिर्फ इंसानी बस्तियां और उनके खेत है, जिनमे अब पारंपरिक खेती और असली  बीज नदारद है, सिर्फ गन्ना गेहूं और धान के संकर बीजों की खेती ही बची हुई है वह भी तमाम रासायनिक खादों और पेस्टीसाइड के बलबूते पर.

.उत्तर भारत में पहली बार रिकार्ड की गयी यह वनस्पति 

.जहां इस खूबसूरत फूल से मेरी पहली मुलाक़ात हुई वह जगह नदी के उत्तरी छोर पर है, इस उजाड़ बंजर जमीन पर अब कुछ किसान खेती करने लगे है, फिर भी जमीन की तासीर अभी भी अम्लीय है, इस उजड़ी हुई धरती पर यह फूल कैसे खिला यह कहानी दिलचस्प है, इस फूल का योरोप से एशिया तक का सफ़र इंसानी सभ्यताओं और उपनिवेशों के इतिहास से जुडा हुआ है?,

 संभव हो चिड़ियों की हजारों मील की लम्बी यात्राओं में भी राज हो इस फूल के कास्मोपोलिटन होने का , सदियों पुरानी यात्रा हो इस फूल की धरती के महाद्वीपों पर ! खैर इस वनस्पति का बीज मैनहन की धरती पर कैसे पल्लवित हुआ और इसकी खासियते क्या है यह बयान करना जरूरी है, इस वनस्पति को “पुलीकेरिया डिसेंटेंरिका” वैज्ञानिक नाम मिला तकरीबन दो सौ पचास वर्ष पूर्व, हालांकि कार्ल लीनियास ने इसका पहला नाम इन्युला डिसेंटेंरिका रखा था, जो बाद में बदला गया, पुलीकेरिया के ग्रीक में मायने होते है “यह गुण” और डिसेंटेंरिका इसके पेचिस में उपयोगी होने के कारण कहा गया, दुनिया की एक बड़ी वनस्पति परिवार एस्टेरेसी कुल का यह पौधा है, इस कुल में सूरजमुखी जैसी सर्वविदित प्रजाति भी आती है, और जरबेरा जैसे जीनस भी जिनमे तमाम खूबसूरत पुष्पों की प्रजातियाँ सम्मलित हैं, इस एस्टेरेसी कुल के सभी फूलों की खासियत यह है, कि जिन्हें हम एक पुष्प कह कर पुकारते है दरअसल उसमे सैकड़ों पुष्प होते है, यह एक सयुंक्त पुष्पों का गुच्छा होता है जो देखने में एक पुष्प सा प्रतीत होता है, और इसके सैकड़ों पुष्प निषेचन के पश्चात सैकड़ों बीज बनाते है, इसमें नर व् मादा पुष्प एक साथ होते है, इस फूल के परिवार की एक और अहम् बात है की यह विषम परिस्थितियों में भी अपने वजूद को बरकरार रख सकता है हालांकि यह गुण प्रकृति ने सभी जीवों को दिया है, इस कुल की प्रजातियों में उपापचय क्रियाओं में शर्करा के एक बहुलक जिसे “फ्रैक्टान” कहते है, में ऊर्जा सरंक्षित रखने की काबिलियत होती है, और यह क्षमता सूरज मुखी आदि के अतिरिक्त गेंहूं और तमाम घासों में भी पाई जाती है, 


इस फूल वाली वनस्पति की पत्तियां व् तना रोयेंदार होते है, एक या दो फिट तक यह वनस्पति बढ़ती है, और खीरी जनपद में अप्रैल से जुलाई तक इस प्रजाति में पुष्पन होता है, तना तांबे की तरह लाल, पुष्प पीतवर्ण, पत्तिया रोमिल, जड़े दूर तक फ़ैलने की क्षमता रखती है, आम तौर पर नदियों व् तालाबों के किनारे, सडकों के आस-पास इस प्रजाति का उग आना सामान्य है, और यह वनस्पति थोड़ी बहुत क्षारीय जमीन में भी उग आने की कूबत रखती है, दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव को छोड़कर इस प्रजाति ने योरोप के अलावा एशिया, अफ्रीका और अमेरिकी महाद्वीप में में भी अपना अस्तित्व बनाया. 

औषधीय गुणों से युक्त है यह वनस्पति

पुलीकेरिया डिसेंटेंरिका जिसे अंग्रेजी में “कामन फ्लीबेन” कहते है, इस नाम के पीछे की कहानी यह है, कि सदियों पहले जब हमारे पूर्वजों ने आग में इस प्रजाति के सूखे पौधों को डाला तो उस धुंए से वहां के वातावरण से मख्खियाँ व् कीट-पतंगे गायब हो गए, इसके इस विषाक्त गुण के कारण इसे यह नाम दिया गया, कहते है एक रूसी जनरल जब परसिया पर आक्रमण करने जा रहा था तो राह में उसे डिसेंट्री हुई और वहां के स्थानीय लोगों ने कामन फ्लीबेन के रस से उसे ठीक कर दिया, यह बात उस जनरल ने कार्ल लीनियस को खुद बताई, और इस प्रजाति के अद्भुत गुण को लीनियस ने अपने जर्नल्स में लिख लिया, यही वह औषधीय गुण जिसने इस प्रजाति को डिसेंटेंरिका नाम दिया, दुनिया के तमाम हिस्सों में इस वनस्पति का उपयोग अल्सर, त्वचा रोग और घावों के उपचार के लिए किया जाता है, 




अब सवाल यह है की यह कामन फ्लीबेन योरोप से भारत और भारत के इस गाँव तक कैसे पहुंचा, वनस्पति विज्ञान के जर्नल्स में बहुत कम जिक्र है इस प्रजाति का, पुलिकेरिया जीनस के अंतर्गत आने वाली कुछ प्रजातियों का जिक्र ब्रिटिश भारत के बंगाल में पाए जाने का जिक्र हुआ है, कुछ अंग्रेज वैज्ञानिकों द्वारा, किन्तु उत्तर भारत में यह प्रजाति अभी भी दर्ज नहीं है,

योरोप से एशिया तक का सफ़र इस फूल के साथ 

 कुल मिलाकर तराई में यह पौधा कैसे पहुंचा इस रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश है, योरोप से नील नदी तक फिर गंगा के मैदानों से होकर तराई की इस छोटी नदी के किनारे खिला यह पुष्प अपनी खिलखिलाहट में वह रहस्य छुपाये हुए है, जो सैकड़ों वर्ष की लम्बी दास्ताँ कहते है, अंग्रेजों के उपनिवेश काल के दौरान यह पुष्प योरोप से अफ्रीका होता हुआ एशिया में दाखिल हुआ, चाहे इसके बीज अनजाने में जहाज में दाखिल हुए हो या इसे साज सज्जा वाले पुष्प के तौर पर अंग्रेज अफसरों ने स्वयं इसे धरती के विभिन्न भागों में रोपित किया हो, चूंकि भारत के प्राचीन आयुर्वेद में इस प्रजाति का जिक्र नहीं है, तो संभव है की यह प्रजाति ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ साथ उत्तर भारत की तराई में दाखिल हुई हो, अंग्रेज अफसरों की पत्नियों का प्रकृति प्रेम खासतौर से तितलियों और फूलों के प्रति, पूरी दुनिया में जाहिर है, वे अपने उपनिवेश वाले देशों से न जाने कितनी वनस्पतियों और तितलियों की प्रजातियाँ इकठ्ठा कर इंग्लैण्ड ले गयी जो आज भी वहा के म्यूजियम्स में मौजूद है, कई गवर्नर जनरल्स की मेमसाहिबों ने तो न जाने कितनी पेंटिंग्स बनाई जंगली पुष्पों और तितलियों की जो बाद में कई किताबों का हिस्सा बनी.... 
  



चूंकि पुलीकेरिया जीनस की प्रजातियों पर भारत में बहुत कम अध्ययन हुआ है, इस लिए अभी भी ये खूबसूरत फूल वाली वनस्पति लोगों की नज़र में कम ही आ पाई है, इनकी कितनी हाइब्रिड प्रजातियाँ हैं यह भी कहना मुश्किल है, जाहिर है इस जीनस की प्रजातियों की पहचान में त्रुटियाँ संभव है, किन्तु भारत में पुलीकेरिया फोलिओसा, पुलीकेरिया वुलगैरिस, पुलीकेरिया विघटियाना आदि पर कुछ जानकारी मौजूद है. विभिन्न देशों की रेड डाटा बुक में इन प्रजातियों को सरंक्षण की जरूरत वाली प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है, कुछ तो खतरे में पडी प्रजाति के तौर पर भी दर्ज की गयी है, इस पीतवर्ण पुष्प वाली वनस्पति में जो गुण छुपे है मानवता ने जानकारी के आधार पर उसके लाभ भी लिए है, जरूरत है तो बस इतना जानने की कि प्रकृति में यदि कोइ नुक्सान पहुंचाने वाली चीज मौजूद है तो उसका इलाज भी इसी प्रकृति में है,  बस नजरिया चाहिए, ताकि आप उसे खोज सके. 


इस कहानी में जो सबसे रोचक बात है वह है इसके इस कुछ कुछ अम्लीय जमीन पर उगने की, क्योंकि जिस जमीन पर इंसानी बसाहट होती है उस जमीन की उपजाऊँ शक्ति क्षीण हो जाती है, और मिट्टी अम्लीय या क्षारीय, और जब वह इंसानी बसाहट वहां से ख़त्म होती है किसी कारण बस जैसे भयानक बीमारी या कोई अन्य मानव जनित कारण तो ऐसी जमीनों में अक्सर खजूर जैसे दरख़्त उग आते है, ये निशानी होती है की इस जगह पर इंसान कभी रहा है, परशपुर के उजड़ने और यहाँ की जमीन पर ऐसी कई प्रजातियों का उगना जो बंजर जमीनों में भी अपना अस्तित्व बरकरार रख सके, यह रहस्य उस फूल की यहाँ मौजूदगी से जाहिर हो जाता है. 



  
ग़दर की कहानी भी कहता है यह फूल 

तकरीबन १५० वर्ष पूर्व यहाँ एक गाँव हुआ करता था जिसका नाम था “परशपुर” और यह एक विशेष तरह के लोगों का था जो यहाँ के स्थानीय राजा द्वारा बसाया गया था, ये लोग थे ढाल तलवार भाला और फ़ौज में इस्तेमाल होने वाली तमाम चीजों को बनाने वाले कारीगर, १८५७ की क्रान्ति से पहले जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध का ऐनक्सेशन शुरू किया तो यहाँ के राजाओं और जागीरदारों की संपत्ति हथियार और फ़ौज का सारा विवरण कंपनी सरकार ने माँगा यह दौर था क्रान्ति से ठीक एक वर्ष पूर्व का, यानि सन १८५६ ईस्वी, लोगों में एक बुरी खबर दौड़ गयी कि अब यह सब ब्योरा कंपनी सरकार लेकर हमारी संपत्ति हमारे हथियार और हमारी फ़ौज पर अप्रत्यक्ष रूप से कब्जा कर लेगी, और यही होने वाला भी था,

 १८५७ की क्रान्ति में उत्तर भारतीय राज्यों का ऐनक्सेशन एक विशेष कारण था जिसे इतिहासकारों ने नज़रअंदाज किया है, खैर जब ग़दर का वक्त आया, अवध के लोगों में अपनी परतंत्रता को लेकर जो रोष था वह फूट पडा और मैनहन-मितौली के राजा ने विद्रोह कर दिया, अंग्रेजों ने इनका अपने संस्मरणों में कुख्यात राजा के तौर पर जिक्र किया, यह ग़दर की कहानी बड़ी रोमांचित करती है इस क्षेत्र के लोगों को और वे तमाम किस्से आज भी जनमानस में कहे और सुने जाते है, पर यह किस्सा कभी और !


 हाँ तो जब ग़दर हुआ राजा ख़त्म हो गए जो अंग्रेजो से मिल गए उन्हें नाम का राजा बनाया गया खिताब देकर, राजाओं के हथियार और फौजे या तो नष्ट कर दी गयी या जो बची उन्हें कंपनी सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया, और इस तरह फ़ौज में तलवार ढाल और भाला जैसे हथियारों की जगह अब बारूद उगलने वाले हथियारों ने ले ली....बस यही कहानी थी की जहां अब यह फूल खिलखिला रहा है वहां वहाँ बसा वह परशपुर गाँव ख़त्म हो गया, क्योंकि अब उन पारंपरिक हथियारों का दौर कंपनी सरकार ने ख़त्म कर दिया था और जो ये कारीगरों के गाँव  राजा के गुजारे पर बसे हुए थे, उजाड़ हो गए और यहाँ खिल गया यह बिलायती फूल जो उस अतीत की कहानी कह रहा है, कहते है जीवन अपनी राह तलाश ही लेता है, प्रकृति देश प्रदेश की लकीरें नहीं खींचती, जिसे धरती ने अपना लिया उसके लिए क्या योरोप क्या एशिया और क्या भारत आखिर इस एक धरती का जीवन भी एक ही है बस प्रजातियाँ रंग रूप अलाहिदा है, यहाँ कुछ भी इतर नहीं.....! 






*कृष्ण कुमार मिश्र 
 संस्थापक संपादक -दुधवा लाइव पत्रिका
email: krishna.manhan@gmail.com


  

Apr 24, 2015

पांचवे बाघ जन्मोत्सव पर शहर में निकली विशाल रैली


पन्ना की जग जाहिर साख पांच साल में 35 बाघ 
जय हिन्द और बाघ संरक्षण के नारों से गूँज उठा पन्ना 
पन्ना, 16 अप्रैल 

बाघ पुर्नस्थाना योजना की पांचवी वर्षगांठ के अवसर पर आज मन्दिरों के शहर पन्ना में विशाल रैली निकाली गई. आज के ही दिन 16 अप्रैल 2010 को बाघिन टी - 1 ने अपनी पहली संतान को जन्म दिया था, इस अनूठी उपलब्धि की स्मृति में प्रति वर्ष 16 अप्रैल को बाघ जन्म दिवसोत्सव मनाया जाता है. इस वर्ष पहली बार जन्मोत्सव का भव्य समारोह पन्ना शहर के छत्रसाल पार्क में आयोजित हुआ और सुबह शहर के विभिन्न विद्यालयों के छात्र - छात्राओं व नागरिकों ने जन समर्थन से बाघ संरक्षण की अलख जगाने के लिए शहर में विशाल रैली निकाली. शहर की सडक़ें आज जय हिन्द और बाघ संरक्षण के नारों से गूँज रही थीं. 


आज सुबह 7 बजे से पन्ना शहर के छत्रसाल पार्क में छात्र - छात्राओं व नागरिकों का कारवां जुडऩे लगा था. स्कूली बच्चों के हांथों में बाघ व पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाली तख्तियां थी, जो बड़े ही उत्साह के साथ नारे लगा रहे थे. साढ़े सात बजे तक पार्क परिसर में एक हजार से भी अधिक स्कूली बच्चे व सैकडों की संख्या में पन्ना नगर के गणमान्य जन एकत्रित हो गये. यहां पर मौजूद नगर पालिका परिषद पन्ना के अध्यक्ष मोहनलाल कुशवाहा, जिला पंचायत अध्यक्ष रविराज सिंह यादव व नगर के प्रतिष्ठित नागरिक एवं वरिष्ठ चिकित्सक डा. विजय परमार ने हरी झण्डी दिखाकर रैली को रवाना किया. बाघ पुर्नस्थापना योजना के तहत पन्ना में जन्में बाघों की तस्वीरों वाले बड़े - बड़े बैनरों से सुसज्जित यह रैली छत्रसाल पार्क से कुमकुम टाकीज, गांधी चौक, कलेक्ट्रेट होते हुए अजयगढ़ चौराहा पहुंची. यहां से रैली बड़ा बाजार, बल्देव मंदिर होते हुए छत्रसाल पार्क में समाप्त हुई. यहां पर रैली में शामिल रहे छात्र - छात्राओं ने स्वल्पाहार किया और उन्हें पन्ना टाइगर रिजर्व के पांच साल के सफर की दास्तान भी सुनाई गई. 



राष्ट्रीय पर्व की तरह दिखा माहौल 
अपनी तरह की इस अनूठी रैली में राष्ट्रीय पशु बाघ के प्रति नौनिहालों में सम्मान और प्यार का भाव देखते ही बन रहा था. एक किमी. से भी लम्बी इस विशाल रैली में जय हिन्द और जय शेरखान के नारे गंूज रहे थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों यह बाघों के जन्म दिन की रैली न होकर राष्ट्रीय पर्व के उपलक्ष्य में निकली रैली हो. पन्ना टाइगर रिजर्व ने बीते पांच सालों में जो उपलब्धि हासिल की है उससे पन्ना का गौरव और सम्मान वापस लौटा है. हर किसी की जुबान में यह नारा गूंज रहा था कि पांच साल में 35 बाघ, बाघ शून्य का धोया दाग. इसी के साथ रैली में शामिल बच्चे व नागरिक यह भी कह रहे थे कि जो खोया था उसे पाया है, अब इसे संजोकर रखना है. 



सुव्यवस्थित रैली को सभी ने सराहा 
जन समर्थन से बाघ संरक्षण का नारा बुलंद करने तथा जन - जन में जागरूकता लाने के लिए बाघ जन्मोत्सव पर निकली इस भव्य रैली की हर कोई सराहना कर रहा है. समूचे नगर का परिक्रमा करने के दौरान रैली में जिस तरह की व्यवस्थायें की गई थीं, उससे बच्चे व बड़े सभी उत्साहित और प्रफुल्लित थे. पन्ना टाइगर रिजर्व व वन विभाग के कर्मचारी रैली में शामिल बच्चों को ठंडा पानी उपलब्ध कराने हेतु जहां मुस्तैदी से डटे थे वहीं रैली में किसी भी तरह का व्यवधान उत्पन्न न हो इसके लिए नगर निरीक्षक सहित पुलिस बल भी रैली के आगे व पीछे साथ - साथ रहा. जिस मार्ग से यह रैली निकली लोग बड़ी उत्सुकता के साथ अपने घरों की छत व सडक़ के किनारे खड़े होकर देखा और तख्तियों में लिखे संदेश को ध्यान से पढ़ा. 



रैली में ये लोग रहे शामिल 
शहर में निकली बाघ जन्मोत्सव की यह रैली आज समूचे नगर वासियों के लिए कौतूहल और आकर्षण का केन्द्र रही. देश और दुनिया में शायद यह पहला ऐसा अवसर था जब बाघों के जन्म दिन की खुशी में इतनी भव्य और विशाल रैली निकली है. रैली का नेतृत्व पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति स्वयं कर रहे थे. उनके साथ विश्व प्रकृति निधि भारत नई दिल्ली के महासचिव रवि सिंह, उप संचालक अनुपम सहाय व विक्रम सिंह भी पूरे समय मौजूद रहे. रैली में महर्षि विद्या मन्दिर पन्ना के छात्र - छात्राओं व शिक्षकों की भूमिका अत्यधिक सराहनीय रही. जिला पंचायत पन्ना के युवा अध्यक्ष रविराज सिंह यादव पूरे उत्साह के साथ रैली में भागीदारी निभाई तथा पन्ना टाइगर रिजर्व व बाघों को पन्ना ही नहीं अपितु समूचे बुन्देलखण्ड का गौरव बताया. निश्चित रूप से यह रैली स्कूल बच्चों व पन्ना नगर वासियों के लिए अविस्मरणीय रहेगी. 

अरुण सिंह 
पन्ना-मध्य प्रदेश 
भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com

Apr 13, 2015

दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगलों में बसे थारू जनजाति की संस्कृति की अद्भुत प्रस्तुति


चंदनचैकी में रोशनी व बेटियां योजना का शुभारंभ
थारू महोत्सव में बेटियों को दी गईं साइकिलें
थारू संस्कृति ने लोगों का मनमोहा
थारूक्षेत्र चंदनचैकी से डीपी मिश्रा की रिपोर्ट ---
आदिवासी थारू जनजाति क्षेत्र के कस्बा चंदनचैकी में थारू महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इसमें प्रदेश के स्वतंत्र प्रभार मंत्री अरविंद सिंह गोप ने रोशनी और बेटियां योजना का शुभारंभ किया। महोत्सव में आदिवासियों को तमाम योजनाओ का लाभ भी दिया गया। इसके साथ ही रोशनी योजना से थारू ग्रामों में सौर ऊर्जा की लाइटों को लगवाने के साथ ही उनमें विकास कार्य शुरू करवाने का प्रावाधान शुरू किया। इसके अलावा डीहएम किंजल सिंह ने 10 विकलांगों को ट्राई साइकिलों के वितरण के साथ ही 124 छात्राओं में साइकिलों का वितरण किया गया। इसके अतिरिक्त पांच बच्चों को निकटवर्ती दोष के चलते उनमें चश्मों का वितरण किया गया। जबकि इससे पहले स्वतंत्र प्रभार मंत्री अरविंद सिंह गोप ने फीता काटकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इसके अलावा उन्होंने आपरेशन रोशनी व बेटियां का भी शुभारंभ किया। 




कस्बे के परियोजना परिसर में मनाए जा रहे एक दिवसीय थारू महोत्सव में शुभारंभ प्रदेश के स्वतंत्र प्रभार मंत्री अरविंद सिंह गोप ने फीता काटकर किया। इसके बाद उन्होंने रोशनी और बेटियां योजना का भी शुभारंभ किया। इस मौके पर उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश की सराहना करते प्रदेश सरकार की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला और कहा कि प्रदेश सरकार के मुखिया आदिवासी ही नहीं सभी वर्गों का कल्याण चाहते हैं। प्रदेश मे इस समय विकास की गंगा बहाई जा रही है जो चुनाव पूर्व वायदे किए गए थे वह पूरे हो रहे हैं। राज्यसभा सांसद रविप्रकाश वर्मा ने कहा कि आदिवासियों के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार पर जोर दिया जा रहा है। आदिवासियों के उत्थान के लिए समाजवादी पार्टी जब जब सत्ता में आई है कार्य किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इस बार भी उनके उत्थान के लिए कल्याणकारी कार्य किए जा रहे हैं। कार्यक्र्रम को विधायक रामसरन, उत्कर्ष वर्मा, यशपाल चैधरी, धीरेंद्र मोहन, सपा जिलाध्यक्ष अनुराग पटेल, डीएम किंजल सिंह, सीडीओ नितीश कुमार आदि ने भी संबोधित किया। इससे पूर्व स्कूल के छात्र छात्राओं समेत आदिवासी महिला पुरुषों ने सरस्वती वंदना, गायन, नृत्य भी प्रस्तुत किया। महोत्सव मे बाहर से आए कलाकारों ने फिल्मी गीतों से समा भी बांधा। इसमें आदिवासी थारूओं को तमाम योजनाओं का लाभ भी दिया गया। 


महोत्सव में राज्यसभा सांसद रविप्रकाश वर्मा ने दस विकलांगों को ट्राईसाइकिल का वितरण किया। इसके साथ डीएम किंजल सिंह ने दस छात्राओं को भी साइकिल दीं। इसके बाद करीब 124 छात्राओं को साइकिलें बांटी गई।  इसके अतिरिक्त 10 गर्भवती महिलाओं के साथ ही 412 गर्भवती महिलाओं में पोषाहार किटों का वितरण करने के साथ ही 48 कुपोषित बच्चों को पोषाहार का वितरण किया गया। कार्यक्रम का संचालन बीएसए डॉ. ओपी राय ने किया। इसमें सपा किसान सभा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष रेहान खां, तृप्ती अवस्थी, विधानसभा अध्यक्ष एम फुरकान अंसारी, मोंटीपाल, लखवीर सिंह गोरे, एसडीएम नागेंद्र कुमार एबीएसए भरत वर्मा, बीडीओ तेजवंत सिंह, सीओ रामासरे सिंह, यूके सिंह समेत तमाम अधिकारी और गणमान्य लोग मौजूद रहे। 
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थारू महोत्सव के कार्यक्रम में पांच किलोमीटर दूर से आए एकलव्य माॅडल आवसीय विद्यालय के तमाम बच्चे पैदल चलकर जहां स्कूल से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे वहीं पैदल ही उनको कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भेज दिया गया। जिससे वह पांच किलोमीटर की दूरी तय करके अपने स्कूल परिसर तक पहुंचे । 
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थारू महोत्सव कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मंत्री अरविंद सिंह गोप व डीएम किंजल सिंह के जाने के बाद तमाम सरकारी अधिकारी व कर्मचारी अंग्रेजी शराब की दुकान व बीयर की दुकान के बाहर सुस्ती उतारते हुए दिखाई दिए।
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डी पी मिश्रा 
dpmishra7@gmail.com

Apr 8, 2015

जीवों से प्रेम की एक मिसाल और ....


 रणा राम की आवाज पर दौड़े चले आते है ये जीव.… 


राजस्थान, पाली जिले के कानेलाव गांव के रणाराम खेतीहर मजदूर है। उन्होंने ने तो पशु-पक्षियों को नियन्त्रित करने के लिए प्रशिक्षण लिया है और ना ही वे उनके साथ रहे है। रणा प्यार की भाषा जरूर जानते है, तभी तो उनकी एक आवाज पर गांव के तालाब के कछुए दौड़े चले आते है।

संवेदनशील कछुए जो हल्की सा आहट पर अपने खोल में छिप जाते हैं, रणा के आते ही बेखौफ होकर चहलकदमी करने लगते हैं। इस दौरान काफी संख्या में ग्रामीण वहां मौजूद रहते है लेकिन कछुए उनसे नहीं डरते।


पांच साल की मेहनत

रणाराम बताते है कि ये सिलसिला करीब पांच साल पहले शुरू हुआ। एक सुबह वह गांव के आखरिया के निकट स्थित तालाब में रोटी लेकर गया तो उसकी आवाज सुनकर काफी कछुए बाहर आ गए। उसने हाथों से कछुओं को रोटी खिला दी। फिर तो एेसा सिलसिला चला जो अभी तक बरकरार है। अब तो तालाब में रहने वाले सारे कछुए उसके दोस्त बन गए।

गांव के बड़े तालाब में स्थिति ये है कि कछुए सुबह गांव के चौक की ओर स्थित किनारे पर उसका इंतजार करते हैं। अलसुबह वह घर से रोटियां बनाकर लाता है। जैसे ही तालाब किनारे पहुंचकर कछुओं को आवाज लगाता है तो तालाब में जगह-जगह से कछुए भागे चले आते हैं। कुछ ही देर में तालाब किनारे कछुए ही कछुए नजर आने लग जाते हैं।

दिनचर्या में हुआ शुमार

रणाराम मीणा नियमित रूप से घर से आठ से दस रोटी बनाकर लाता है और कछुओं को खिलाता है। कछुओं से उसकी दोस्ती का आलम यह है कि थोड़ी देर में तालाब किनारे कछुओं का झुण्ड लग जाता है। दोस्ती के इस अनूठे नजारे को देखने के लिए गांव के लोग भी एकत्र हो जाते हैं।

केवल रणा से प्रेम

रणा जब किसी काम से गांव से बाहर जाते हैं तो उनके बेटे या परिवार के अन्य सदस्य को जिम्मेदारी सौंप कर जाते हैं। हालांकि, उनका बेटा जब रोटी खिलाने जाता है तो कछुए तालाब से बाहर नहीं आते। वो तालाब के पानी में ही रोटी डालकर चला जाता है।

साभार: Kamal Jeet's Blog 

लोकतंत्र के सरमायेदारों की गिरफ़्त में भारत का अन्नदाता

Photo courtesy: Krishna Kumar Mishra 

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश व्हिप(चाबुक) और लोकसभा-राज्यसभा सांसद

- अनंत जौहरी 

66-A रद्द करने का निर्णय ऐसे समय में न्यायपालिका ने किया है जबकि पूरे देश में इस समय भूअधिग्रहण अध्यादेश के विरोध में जन-जन मुखर हो गया है। सामंती राज सत्ता का यह चरित्र रहा है कि वह जनता की न्याय पूर्ण आवाज़ को किसी प्रकार दबाता रहे। लोकतंत्र में हमारे संविधान में मूल अधिकारों में शामिल होने के पश्चात भी हमेशा प्रेस, आंदोलनों एवं व्यक्तियों द्वारा उठाई जन आवाज़ को रोका गया है। परंतु न्यायपालिका के हस्ताक्षेप से यह स्वतंत्रता वापस आती रही है। लेकिन हमेशा न्यायपालिका की छतरी का उपयोग उचित नहीं है।

सवाल यह है कि जिला मुख्यालयों, जंतर-मंतर और मशाल जुलूस पर उठती आवाज़ें केवल आवाज़ें ही बनकर रह गईं हैं, निर्णय में परिवर्तित नहीं हो पातीं। भगतसिंह ने असेम्बली में बम फेंका था कि ब्रिटिश राज के बहरे कान विरोध को सुनें लेकिन तब से आज तक ने राज्य ने ऐसे तरीके ढूँढ लिए हैं कि आवाज़ों का असर कम होता जा रहा है। राज्य थकाता है, निराश करता है।

लोकतांत्रिक संविधान में यह व्यवस्था है कि ऐसी आवाज़ों को निर्णय में बदला जाए। इसीलिए व्यापक और प्रभावशाली अभिव्यक्ति को निर्णय में बदलने के लिए “निर्णय की स्वतंत्रता” का प्रावधान संविधान में रखा गया है। जिसे इस समय बाधित कर दिया गया है।

हमारे मूल संविधान में राजनैतिक दलों को निर्णय का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। परंतु आज निर्णय सत्ताधारी दल ही लेता है और अधिकतर सारे विपक्षी दल इसका विरोध करते हैं। संविधान में तो “राजनैतिक दल” यह शब्द ही नहीं है। संविधान निर्माता ज़रूर यह जानते थे कि आगे आने वाले समय में राजनैतिक दल एकाधिकारी प्रवृत्ति से ग्रसित हो जाऐंगे। शायद उन्हें पश्चिम के पूँजीवादी लोकतंत्र से यह सीख मिली हो।

मूल संविधान के अनुसार विधान सभा, लोक-सभा में हमारे चुने हुए प्रतिनिधि को अपने विवेक और मतदाता के मतानुसार निर्णय लेने का ‘अधिकार था’ परंतु संविधान के विरोधाभासों का इस्तेमाल करते हुए राजनैतिक दलों ने अपने अधिकार निरंतर बढ़ाए, दल-बदल कानून लाकर सर्वसम्मति से सभी राजनैतिक दलों ने सांसद और विधायकों के ‘निर्णय के अधिकार’ को पूरी तरह से छीन लिया। उन्हें पार्टी का गुलाम बना दिया। राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के धकाते जाने से आज लगभग सभी पार्टियों में सुप्रीमो ही निर्णय लेते हैं। इस प्रकार संविधान प्रदत्त निर्णय का अधिकार जन प्रतिनिधि से छीनकर लगभग सभी पार्टियों के सुप्रीमो के पास चला गया है।

दल-बदल कानून उस समय लाया गया जब आया राम-गया राम का खेल चल रहा था। हॉर्स ट्रेडिंग (घोड़ा ख़रीद) हो रही थी। 1984 में पहली बार लाए गए दल-बदल कानून में 35% सांसद या विधायक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी बनाकर गयाराम हो सकते थे, ऐसा कानून बना। उस समय आयाराम-गयाराम के विरूद्ध जन भावना बन गई थी। इस अवसर का फायदा उठाते हुए चालाकी से ऐसा संविधान संशोधन लाया गया कि अगर कुछ प्रतिनिधि न्याय के पक्ष में जनहित का निर्णय लेना चाहें तो पार्टी सुप्रीमो के निर्णय की इच्छा के विरूद्ध जाने से सदन की सदस्यता खो देंगे। यह भय और लालच की तकनीक थी जिसे सभी दलों ने इस्तेमाल किया, लेकिन सन 2004 में इस 33% के समूह को और कमज़ोर करने के लिए दोबारा संशोधन लाया गया और व्हिप(चाबुक) को और मज़बूत बनाया गया जिससे कि पार्टी निर्णय के विरोध में जाने की कोई हिम्मत न कर सके और यह व्यवस्था अगर बनी रही तो देश में कभी एक व्यक्ति की तानाशाही कायम हो जाएगी।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह संभव नहीं था कि संशोधन में ऐसी व्यवस्था बनाई जाती कि आयाराम-गयाराम लोकतंत्र विरोधी कुचेष्टा न कर पाए। जिससे मतदाता की अभिव्यक्ति और सांसद की निर्णय की स्वतंत्रता क़ायम रह सके।

शायद एक ऐसी व्यवस्था आज भी बिना कानून बदले बनाई जा सकती है। राजनैतिक दल के कार्यकर्ता के श्रम और पार्टी के फंड का किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए बड़ा योगदान होता है। इसलिए ऐसा व्यावहारिक प्रबंध किया जाए कि जब अविश्वास का प्रस्ताव या कोई ऐसी परिस्थिति बने जिसमें मत-विभाजन होने पर सरकार गिर जाए तभी व्हिप का प्रयोग किया जाए। ऐसी व्यवस्था से बहुमत से चुनी हुई एकदलीय या बहुदलीय सरकार अपदस्थ नहीं होगी।

व्हिप(चाबुक) का प्रयोग न होने से प्रत्येक बिल, कानून एवं बजट आदि में प्रतिनिधि के निर्णय की स्वतंत्रता भी क़ायम रहेगी। इसके साथ ही यह व्यवस्था भी बनाई जाए कि मतदान गोपनीय न हो। ऐसा होने से संबंधित प्रतिनिधि का मतदाता जान सकेगा कि उसके प्रतिनिधि ने किसके हित में निर्णय लिया है। क्योंकि राजनैतिक दलों के अंदर निरंतर जन विरोधी निहित स्वार्थ अधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं। जो लोकतंत्र को ही समाप्त कर देंगे।

व्हिप शब्द असंसदीय घोषित होना चाहिए क्योंकि व्हिप(चाबुक) का उपयोग घोड़े को निर्देश देने, तेज़ चलने या दंड देने के लिए होता है।

नोट : सन्नद्ध लोकसभा-राज्यसभा में आने वाले बिलों पर निर्णय लेनेके लिए मतदाता अपने-अपने क्षेत्र में सभी पर्टियों के प्रतिनिधियों को कहें कि हमें इस बिल संशोधन क़ानून में निर्णय लेने के लिए पार्टी व्हिप जारी ना करे, जिससे कि जनहित, न्यायहित में हम स्वतंत्र होकर अपने विवेक से निर्णय ले सकें और यह मतदान पारदर्शी हो जिससे हम अपने मतदाता के हमारे प्रति उठे अविश्वास को भी दूर कर सकें। ऐसा करने से किसी भी पार्टी का कोई अहित नहीं होने वाला है और यह अधिकार पार्टी के पास सुरक्षित है, कि वह व्हिप जारी करे या ना करे, और सांसद यह भी कहें कि वे चाहते हैं कि इस बार से ही पार्टियाँ व्हिप(चाबुक) जैसे अपमान जनक शब्द का प्रयोग हमारे लिए न करें, कोई दूसरा शब्द चुन लें।



अनंत जौहरी ( लेखक मूलत: किसान हैं, किसान अधिकार मंच के माध्यम से अन्नदाता की आवाज बुलंद करते आ रहे हैं, देश -विदेश में किसानों के हितों की बात पर चर्चा-परिचर्चा, मध्य प्रदेश के अनूपपुर से ताल्लुक, इनसे  kisan.adhikar@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं. )

Mar 31, 2015

भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ और भूमि अधिकार के लिए आन्दोलन की रणनीति

2 अप्रैल, डिप्टी स्पीकर हॉलकंस्टीट्यूशन क्लबदिल्ली


वर्ष 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करके मोदी की अगुवाई वाली वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया जो अब लोक सभा में पास होकर भूमि अधिग्रहण बिल का रूप ले चूका है. अध्यादेश के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक देश की जनता इसके विरोध में आन्दोलन कर रही है. यह बिल सरकार को देश के किसानों से बिना उनके अनुमति के ज़मीनें छीनकर कम्पनियों को देने की ताकत प्रदान करता है. केवल ज़मीन ही नही बल्कि सरकार देश का पानीदेश की बिजलीदेश के खनिज संपदा और देश की जनता का श्रम सबकुछ कंपनियों को सस्ते में उपलब्ध कराने की जुगत में है ताकि उनके (कंपनियों) के लिए कम लागत विनिर्माण (Low Cost Manufacturing) की गारंटी हो सके तथा वे इस देश में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सकें. इसे ही देश की वर्तमान सरकार तेज गति से विकास बता रही है और प्रधान मंत्री मेक इन इंडिया का नाम दे रहे हैजिस मेक इन इंडिया की दुनिया में श्रम कानून लागू नही होंगे और मजदूरों पर कंपनियों का पूर्ण नियंत्रण होगा. दुसरे शब्दों में भारत में संविधान का राज नही होगा बल्कि कंपनीयों का राज होगाजो देश की जनता के लिए गुलामी के एक नए दौर की शुरुआत होगी.  

देश की जनता शाशकों के जन विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त मंशा को पहचानने लगी,यही कारण है कि अध्यादेश के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक भारत की जनता भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ देश के सभी हिस्सों में लगातार सड़कों पर प्रतिरोध आन्दोलन कर रही है. इस मुद्दे पर जनता के जुझारू प्रतिवाद ने संसद के विपक्षी पार्टियों को भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करने के लिए बाध्य कर दिया हैऔर बीते 17 मार्च को संसद में विपक्ष के सांसदों में ने साथ मिलकर के भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च भी किया है. विपक्षी पार्टियों द्वारा किये जा रहे विरोध के कारण ही सरकार इस बिल को राज्य सभा में लाने का सहस नही दिखा पा रही है.

इस अध्यादेश ने भूमि के प्रश्न को एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है. देश की जनता भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने की मांग के साथ-साथ भूमिहीनों के लिए भू अधिकार की मांग को भी प्रमुखता से उठा रही है. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द करने की मांग पर देश भर के जनांदोलनों और ट्रेड यूनियनों ने मिल कर अध्यादेश के विरोध में 24 फ़रवरी को संसद मार्ग पर विशाल रैली आयोजित की थी जिसकी धमक संसद में भी सुनाई पड़ी और सरकार को अध्यादेश में कुछ बदलाव का ड्रामा भी करना पड़ा था.

वर्तमान में भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने और भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार सुनिश्चित करने के लिए पुरे देश में जन प्रतिरोध खड़ा हो रहा है और जगह-जगह से जुझारू प्रतिवादों और आन्दोलन की ख़बरें आ रही हैं. पुरे भारत में जन संगठन और ट्रेड यूनियन अपने-अपने इलाकों में आन्दोलन को और अधिक तीखा करने के लिए लोगों के सामने बिल के जन विरोधी चरित्र को रखते हुए हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं,तथा पुरे देश में जगह-जगह शहीदी दिवस (23 मार्च) को भू-अधिकार दिवस के रूप में मनाया गया है. भूमि अधिग्रहण बिल रद्द हो यह आन्दोलनों की फौरी मांग है लेकिन भू-अधिकार और विशेष तौर पर भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार के मुद्दे को भूमि अधिग्रहण बिल विरोधी आन्दोलन के केंद्र में रखा गया हैऔर यह आन्दोलन अध्यादेश रद्द हो जाने के बाद भी भू-अधिकार के प्रश्न पर आगे भी जारी रहेगा. आने वाले दिनों में भूमि अधिकार और श्रम अधिकारों के सवाल पर भूमि अधिग्रहण नहीभू-अधिकार चाहिएनारे के साथ जन संगठनों और ट्रेड यूनियनों के संयुक्त नेतृत्व में जन अभियान चलेगा.  

भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने और सबके लिए और खास कर भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार की लड़ाई को आगे बढ़ाने हेतु व्यापक और दूरगामी रणनीति तैयार करने के हेतु विचार विमर्श करने के लिए 2 अप्रैल 2015 को एक सम्मलेन आयोजित किया गाया है और उसी दिन सायं 4-6 बजे तक राजनितिक पार्टी के प्रतिनिधियों/सांसदों के साथ भी इस मुद्दे पर मीटिंग आयोजित होगी. जिसमे भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में संघर्ष करने वाले सभी संगठनों के प्रतिनिधि सादर आमंत्रित हैं. मीटिंग में मेधा पाटकर, अशोक चौधरी, हन्नान मौला, अतुल अंजान, डॉ सुनीलम, राकेश रफीक, भूपेन्द्र सिंह रावत एवं अन्य साथी शामिल होंगे.

रोमा, संजीव, मधुरेश, श्वेता, कृष्णा प्रसाद, वीजू कृष्णन, प्रताप, सत्यम, मीरा, रागीव
 समन्वय समिति की ओर से  (For Coordinating Committee)

Contact : 9818905316, 9958797409, 9911528696

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग: