डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.6, no 10, October 2016, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Nov 1, 2016

हम ठहरे लक्ष्‍मीपति की छाती पर श्रीवत्‍सचिह्न देने वाले महर्षि भृगु की संतान

कृषि और कृष्‍ण की प्रकृति एक है...

तो राजलक्ष्‍मी को अगर सौ बार गरज है‍ कि अपने आने का संदेश उसे इन वधिरों तक, इन अंधों तक भी पहुँचाना है और वे अगर यह समझती हैं कि बिना इन तक संदेश पहुँचे उनके आने का कोई महत्‍व नहीं है, तो मैं कहता हूँ कि उन्‍हें उसी रूप में आना होगा, जो इनकी कल्‍पना में सरलता से उतर सके। ये डॉलर-क्षेत्र नहीं जानते, ये पौंड-पावना से सरोकार नहीं रखते, इन्‍हें मुद्रास्फीति का अर्थ नहीं मालूम, पर इतना समझते हैं कि कागदों का अंबार राजलक्ष्‍मी का शयन-कक्ष नहीं बना सकता। इनकी लक्ष्‍मी गेहूँ-जौ के नवांकुरों पर ओस के रूप में उतरती है, इनकी लक्ष्‍मी धान की बालियों के सुनहले झुमकों में झूमती है और इनकी लक्ष्‍मी गऊ के गोबर में लोट-पोट करती है उस लक्ष्‍मी के लिए वन-महोत्‍सव से अधिक कृषि-महोत्‍सव की आवश्‍कता है, कृषि महत्‍सव से अधिक कृषि-प्रयत्‍न की तथा कृषि-प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
जब तक इन देहातियों की लक्ष्‍मी नहीं आती, तब तक हमको भी इस लक्ष्‍मी से कुछ लेना-देना नहीं है। हमारे ऊपर वैसे ही अकृपा बनी रहती हैं, हम ठहरे लक्ष्‍मीपति की छाती पर श्रीवत्‍सचिह्न देने वाले महर्षि भृगु की संतान, समुद्रपायी अगस्‍त्‍य के वंशज और लक्ष्‍मी के धरती के निवास बेल की डाली छिनगाने वाले परम शैव, हम लक्ष्‍मी की सपत्‍नी के सगे पुत्र, हमें उनसे दुलार की, पुचकार की आशा नहीं, आकांक्षा नहीं। पर विमाता होते हुए भी माता तो हैं ही वे, कौशल्‍या से कैकेयी का पद बड़ा हुआ, तो थोड़ी देर के लिए इनका पद भी सरस्‍वती से बड़ा मान ही लेता हूँ, सो भी आज के दिन तो इनका महत्‍व है ही, ये भले ही उस महत्‍व को न समझें। इसलिए मैं अपना कर्तव्‍य समझता हूँ कि मैं अपनी इस विमाता को चेताऊँ कि जिनके चरणों की वे दासी हैं, उनकी सबसे बड़ी मर्यादा है, निष्किंचनता। सुनिए उन्‍हीं के मुख से और लक्ष्‍मी को ही संबोधित करके कही गई इस मर्यादा को… "निष्किचना वयं शश्र्वन्निष्किंचनजनप्रिया तस्‍मात्‍प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्‍यमे" (हम सदा से ही अकिंचन हैं और अकिंचन जन ही हमें प्रिय हैं, इसलिए धनी लोग प्राय: हमें नहीं भजते)।
निष्किंचन को चाहे आप 'हैव-नाट' कहिए चाहे खेतिहर किसान, परंतु कृषि और कृष्‍ण की प्रकृति एक है, प्रत्‍ययमात्र भिन्‍न है भगवान और कर्म से भारत के भगवान कृषिमय हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिए उनकी राजलक्ष्‍मी को उनका अनुगमन करना आवश्‍यक ही नहीं परमावश्‍यक है।
आज जो दिया टिमटिमा रहा है वह उसी लक्ष्‍मी की स्‍मृति में, उसी लक्ष्‍मी की प्रतीक्षा में और उसी लक्ष्‍मी की अतृप्‍य लालसा में। इस दिए की लहक में सरसों के वसंती परिधान की आभा है, कोल्‍हू की स्थिर चरमर ध्‍वनि की मंद लहरी है, कपास के फूलों की विहँस है, चिकनी मिट्टी की सोंधी उसाँस है,कुम्‍हार के चक्‍के का लुभावना विभ्रम है और कुम्‍हार के नन्‍हें-नन्‍हें शिशुओं की नन्‍हीं हथेलियों की गढ़न। इसमें मानव-श्रम का सौंदर्य है उसके शोषण की विरूपता नहीं। इसी में घट-घट व्‍यापी परब्रह्म की पराज्‍योति है, तथा स्‍वार्थ और परमार्थ की स्‍व और पर की, पार्थिव और अपार्थिव की, ताप और शीत की, नश्‍वर और अनश्‍वर की, नाश और अमरता की मिलन-भूमि एवं उनकी परम अद्वैत-सिद्धि है। भारतीय दर्शन जीवन का आभरण नहीं है, वह तो उसका प्राण है, आदि-स्रोत है और है अनंत महासागर, मानो इसी सत्‍य को जगाने के लिए ही दिया टिमटिमा रहा है।

(विद्यानिवास मिश्र के निबन्ध संग्रह से साभार- जहां दीया टिमटिमा रहा है का एक अंश)

दीपोत्सव की तमाम शुभकामनाएं
दुधवा लाइव डेस्क।

Oct 9, 2016

सैक्रेड हार्ट डिग्री कालेज में मनाया गया वन्य प्राणी सप्ताह



सीतापुर (उत्तर प्रदेश ) सैक्रेड हार्ट डिग्री कॉलेज, सृष्टि नेचर क्लब एवं वन विभाग (सामाजिक वानिकी) सीतापुर द्वारा आयोजित वन्य जीव सप्ताह मनाया गया, सैक्रेड हार्ट डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल डेनी मैथ्यू, सैक्रेड हार्ट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एन्ड टेक्नालॉजी के प्रिंसिपल रेवरेंड साबू, जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ अरुण त्रिपाठी, रिसोर्स पर्सन वाइल्ड लाइफ कृष्ण कुमार मिश्र, उप प्रभागीय वनाधिकारी अमर बहादुर सिंगरौर, रेंजर आर सी यादव बिसवां, रेंजर आर सी वर्मा हरगांव, एवं सैकड़ों छात्र छात्राओं ने सहभागिता की।

अक्तूबर के प्रथम सप्ताह में सात दिनों तक सेक्रेड हार्ट डिग्री कालेज एवं सैक्रेड हार्ट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एवं टेक्नोलॉजी के छात्र छात्राओं ने सीतापुर वन विभाग के सहयोग से आयोजित नेचर कैम्प, पोस्टर एवं निबंध प्रतियोगिता में सहभागिता की, सात अक्तूबर को महाविद्यालय में सृष्टि नेचर क्लब व् सैक्रेड हार्ट डिग्री कालेज द्वारा  वन्य जीव सरंक्षण पर एक कार्यशाला का आयोजन हुआ, पर्यावरण एव वन्य जीवन पर ये जागरूकता कार्यक्रम का संचालन जंतु विज्ञान के प्रवक्ता डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी तथा उनके विभागीय सहयोगियों ने किया.

वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन की इस कार्यशाला में रिसोर्स पर्सन वाइल्ड लाइफ के तौर पर वन्य जीव विशेषग्य एवं दुधवा लाइव जर्नल के संस्थापक सम्पादक ने अपने व्याख्यान में जैव विविधिता के सरंक्षण पर जोर देते हुए कहा की एक बरगद और पीपल जैसे विशाल वृक्ष अपने आप में एक इकोसिस्टम होते है जहाँ न जाने कितनी प्रजातियाँ अपना जीवन चक्र संचालित करती हैं, उन्होंने कार्यशाला में उपस्थित छात छात्राओं को श्रीमती इंदिरा गांधी के बारें में प्रमुखता से बताया, की उन्होंने कैसे १९७२ में वाइल्ड लाइफ एक्ट बनाया, १९७३ में प्रोजेक्ट टाइगर, इमरजेंसी जैसी हलचल के समय भी वह प्रधानमंत्री होते हुए भी प्रकृति प्रेम को नही भूली और १९७६ में वन एवं पर्यावरण से सम्बंधित एक फेडरल डिपार्टमेंट की स्थापना की जो बाद में सन १९८५ में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के तौर पर स्थापित हुआ, साथ ही उत्तर प्रदेश में  एक फरवरी सन १९७७ को दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना करवाई, और इसी लिए श्रीमती इंदिरा गांधी को तब के अखबार लिखते थे की "ओनली वन मैन इन हर कैबिनेट", श्री मिश्र ने छात्र -छात्राओं को कहाँ की ऐसे महान व्यक्तित्व से प्रेरणा लें और जीवन में आगे बड़े ताकि देश और देश की माटी सदैव शस्य श्यामल रहे. 



कार्यक्रम में उप प्रभागीय वनाधिकारी अमरबहादुर सिंगरौर ने अपने वन्य जीवन के अनुभव साझा किए और इंदिरा गांधी के द्वारा ही लाये गए १९८० के फारेस्ट एक्ट की तारीफ़ की.

सैक्रेड हार्ट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एवं टेक्नोलॉजी के प्रिंसिपल रेवरेंड साबू ने छात्र छात्राओं को कल के वैज्ञानिक कहकर संबोधित किया, और उन्हें पर्यावरण के हित में कार्य करने की प्रेरणा दी.

सैक्रेड हार्ट डिग्री कोलेज के प्रिंसिपल डेनी मैथ्यू ने कार्यशाला में आये हुए अतिथियों को प्रतीक चिन्ह देकर समानित किया.

वन्य जीवन के सरंक्षण और संवर्धन के विषय पर छात्र छात्राओं ने अपने अपने वक्तव्य दिए और एक डिबेट का सुन्दर संचालन हुआ, विजई प्रतिभागियों को आयोजक समिति ने पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया.

रेडियो दुधवा लाइव डेस्क 

Sep 20, 2016

खुल गए गाँव के नैन...





अद्भुत सौंदर्य 

----------------------------------------
खुल गई भोर की खिड़की 
फैला ऊपर  वितान  नीला, 
झरने लगीं  सुनहरी किरणें 
खुल गए गाँव के नैन अधखुले। 
        पीपल, बरगद की छाँव तले 
        आना  जाना  दिन  रैन  चले, 
        हरी दूब पर बिखरे ओस के मोती 
        घूम- घूम  पगडंडी  के  पाँव चले। 
उगे फ़सलों की चंचल काया 
झूमा  रही  पेड़ों  की  छाया , 
पंछी चहके शोर सजा शाखों पर 
सोई  दुनिया उनींदी  जाग  उठी। 
         कमल   खिला  तालाब   में 
         फूल   खिले  क्यारी  क्यारी, 
         अद्भुत   सौंदर्य  ठहरे- ठहरे 
         लगते मनभावन सुबह सबेरे। 
खुल गई भोर की खिड़की 
फैला  ऊपर  वितान नीला, 
झरने  लगीं  सुनहरी  किरणें 
खुल गए गाँव के नैन अधखुले। 

                     
- सुजाता प्रसाद
स्वतंत्र रचनाकार, शिक्षिका (सनराइज एकेडमी) - दिल्ली
sansriti.sujata@gmail.com

Sep 13, 2016

पावर सेक्टर को कोयला से इतर अक्षय ऊर्जा पर ध्यान केन्द्रित करने की जरुरत : ग्रीनपीस इंडिया





ऩई दिल्ली। 6 सितंबर 2016। आज दिल्ली के होटल ले मेरिडियन में हो रहे ‘इंडियन कोल - सस्टेनिंग द मोमेंटम’ नामक एक कॉन्फ्रेंस में, जहाँ कोयला और ऊर्जा मंत्रालय ने हिस्सा लिया, वहीं ग्रीनपीस इंडिया ने भी अपना प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया। ग्रीनपीस ने प्रदूषण फैलाने, व वैश्विक जलवायु परिवर्तन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले, इस कोयला उद्योग को जारी रखने पर सवाल उठाए, और ऊर्जा मंत्रालय को याद दिलाया कि अक्षय ऊर्जा ही भविष्य के लिये सबसे टिकाऊ और स्वच्छ माध्यम है, जिसमें देश की ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने की क्षमता है।


ग्रीनपीस इंडिया के कैंपेनर सुनिल दहिया ने कहा, “इस समय हमें एक असफल इंडस्ट्री को बचाने की कोशिश करने के बजाय, भविष्य के लिये नयी संभावनाओं को तलाशने में ध्यान देना चाहिए। यदि ऊर्जा सेक्टर विकास के साथ अपनी गति बनाए रखना चाहे, तो इसे खुद को बदलना होगा। प्रधानमंत्री ने देश के लिये महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा लक्ष्यों को रखा है जिन्हें पाने के लिये ऊर्जा क्षेत्र में निवेश व ध्यान दोनों केंद्रित करना होगा। भविष्य के हिसाब से यही सुरक्षित उपाय है, न कि हर कीमत पर कोयले को जारी रखने की सोच, जो  देश के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिये एक खतरा बन चुका है।”


दिसंबर 2015 में, ग्रीनपीस इंडिया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पेरिस जलवायु परिवर्तन कॉन्फ्रेंस में  की गयी घोषणा का स्वागत किया था, जिसमें उन्होंने 2022 तक 175 गिगावाट ऊर्जा अक्षय स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य रखा था। इस आईएनडीसी घोषणा से पहले भी, प्रेस सूचना ब्यूरो से जारी आधिकारिक विज्ञप्तियों में विभिन्न सरकारी संस्थाओं द्वारा अक्षय ऊर्जा के प्रति उत्साह दिखाया जाता रहा है। लेकिन एक विपरीत विंडबना में इसी सामानंतर सरकार कोयला में भी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है और थर्मल पावर प्लांट को लगाने की योजना बना रही है।


दहिया आगे कहते हैं, “स्वयं ऊर्जा मंत्री पीयुष गोयल के अनुसार, हमारे पास कोयला और बिजली का पहले से ही सरप्लस है। ऐसे मे सरकार को कोयला आधारित बिजली परियजोनाओं की बजाय अपने प्रयास भारत के अक्षय ऊर्जा की संभावनाओं को बढ़ाने में लगाना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है जिससे  हम लोगों के स्वास्थ्य को, खत्म होते जंगल को, वन्यजीव और जीविका के साधनों को बचाते हुए, देश की ऊर्जा जरुरतों को पूरा कर सकते है, और वैश्विक जलवायु परिवर्तन को रोकने की कोशिश में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।”


ग्रीनपीस इंडिया ने कोयला आधारित अर्थव्यवस्था से हटने की जरुरतों पर ध्यान आकर्षित करवाते हुए कोल सेक्टर से जुड़ी गंभीर चिंताओं की तरफ भी इशारा किया। उदाहरण के लिये सरकार को घने वन क्षेत्र वाले इलाके को कोयला खनन से बचाने के लिये एक पारदर्शी अक्षत नीति लाने की जरुरत है। आरटीआई से मिली सूचना के विश्लेषण के आधार पर ग्रीनपीस को पता चला है कि 825 में से 417 कोयला ब्लॉक नदी क्षेत्र में आते हैं। इन जगहों पर खनन से निश्चित ही देश के साफ जल स्रोत पर असर पड़ेगा।


ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट ‘ट्रेशिंग टाइगरलैंड’ में यह तथ्य भी सामने आया था कि कोयला खनन की वजह से हजारों हेक्टेयर जंगल, बाघ, हाथियों व अन्य जीवों के निवास पर खतरा मंडरा रहा है। वहीं एक और रिपोर्ट ‘आउट ऑफ साईट’ में दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में वायु प्रदुषण की एक बड़ी वजह थर्मल पावर प्लांट का होना पता चला था। कोयला पावर प्लांट से निकलने वाले वायु प्रदुषण से 2012 में भारत में 80000 से 1.15 लाख लोगों के समयपूर्व मृत्यु होने का आकलन किया गया है।


इसी साल जून में निवेशकों के लिये ग्रीनपीस द्वारा जारी एक ‘फाइनेंस ब्रिफिंग’ में यह बताया गया था कि पानी की कमी की वजह से कोल कंपनियों को 2,400 करोड़ का घाटा हुआ और कोयला में निवेश एक खराब सौदा साबित हो रहा है।


दहिया अंत में कहते हैं, “भारत में कोयला सेक्टर को बढ़ावा देना निरर्थक है और इसका असर समाज के कई हिस्सों पर होगा मसलन वन समुदाय और किसान से लेकर शहर में रहने वाले लोगों और उर्जा क्षेत्र में सक्रिय निवेशकों और अन्य साझेदारो तक।”


ग्रीनपीस इंडिया ने उर्जा मंत्रालय से यह मांग की है कि वह पेरिस समझौते में शामिल अक्षय ऊर्जा के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में ठोस पहल करे। संस्था ने पर्यावरण मंत्रालय से भी यह उम्मीद की है कि वह कोयला खनन और थर्मल पावर प्लांट्स को दिए जा रहे क्लियरेंस पर रोक लगाए, अक्षय श्रेणी के वन क्षेत्र की पहचान करे और वर्तमान में चल रहे पावर प्लांट्स पर वायु प्रदूषण को रोकने के लिये जारी मानकों का कठोरता से पालन करवाये।


अविनाश  कुमार 
avinash.kumar@greenpeace.org

Aug 30, 2016

’’केन-बेतवा लिंक बुंदेलखण्ड को बाढ़-सुखाड़ में फंसाकरमारने का काम है।’’

जलपुरुष ने तोड़ी चुप्पी

प्रस्तोता: अरुण तिवारी

’’यह सरकार सुनती नहीं, तो हम क्या बोलें ?’’

’’विकेन्द्रित जल प्रबंधन ही बाढ़-सुखाड़ मुक्ति का एकमात्र उपाय है।’’

’’रचना ही वह विकल्प है, जो समता की लड़ाई में गरीबों को आगे लेकर आयेगा।’’
.........................................................................................................

प्र. सुना है कि पानी के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार आजकल आपके मार्गदर्शन में काम रही है ?

उ. मेरा सहयोग तो सिर्फ तकनीकी सलाहकार के रूप में है। वह भी मैं अपनी मर्जी से जाता हूं। 

प्र. उ. प्र. सरकार अपने विज्ञापनों में आपके फोटो का इस्तेमाल कर रही है। ऐसा लगता है कि आप अखिलेश सरकार से काफी करीबी से जुड़े हुए हैं। पानी प्रबंधन के मामले में क्या आप सरकार के कामों से संतुष्ट हैं ? 

उ. कुछ काम अच्छे जरूर हुए हैं। लेकिन सरकार के प्लान ऐसे नहीं दिखते कि वे राज्य को बाढ़-सुखाड़ मुक्त बनाने को लेकर बनाये व चलाये जा रहे हों। बाढ़-सुखाड. तब तक आते रहेंगे, जब तक कि आप पानी को ठीक से पकड़ने के काम नहीं करेंगे।

प्र. क्या अच्छे काम हुए हैं ?

उ. उ.प्र. सरकार ने महोबा में बिना किसी ठेकेदारी के 100 तालाबों के पुनर्जीवन का काम किया है। महोबा की चमरावल नदी और झांसी की गांधारी नदी के पुनर्जीवन का काम भी शुरु कर दिया है। नदी के मोड़ों पर डोह यानी कुण्ड तथा नदी के बेसिन में तालाब, चेकडैम आदि बनाने का काम शुरु हो गया है।

प्र. उ. प्र. सरकार ने वाटर रिसोर्स ग्रुप नामक किसी आस्टेªलियाई विशेषज्ञ संस्था के साथ मिलकर हिण्डन नदी पुनर्जीवन की भी कोई योजना बनाई है ?

उ. हां, अभी हिण्डन किनारे के किसान, उद्योगपति और सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर चेतना जगाने का काम कर रहे हैं। जानने की कोशिश कर रहे हैं कि हिण्डन पुनर्जीवन के लिए आपस में मिलकर क्या-क्या काम कर सकते हैं। नदी के दोनो तरफ के सभी शहरों और गांवों में एक प्रदर्शनी लगाई जा रही है।

हमने सरकार से कहा है कि नदी का इसका हक़ कैसे मिले; इसके लिए काम हो। लोगों में भी इसकी समझ बने। सरकार कह रही है कि यह काम करेंगे। अब करेंगे कि नहीं; इसकी प्रतीक्षा है। 

प्र. जब मालूम हो कि हिण्डन के शोषक, प्रदूषक व अतिक्रमणकर्ता कौन हैं, तो उन पर सीधी कार्रवाई करने की बजाय, प्रदर्शनी, डाक्युमेन्टेशन, नेटवर्किंग में जनता की गाढ़ी कमाई का धन बर्बाद करने को क्या आप जायज मानते हैं ? 

उ. समाज में नदी की समझ, नदी पुनर्जीवन की तरफ बढ़ने का ही काम है। सरकार ने सहारनपुर में पांवधोई नदी øहिण्डन की सहायक नदी} के दोनो ओर कब्जे हटाने का काम किया है। 54 परिवारों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई है। कई उद्योगांे के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है।

प्र. केन-बेतवा को लेकर उमा भारती जी की जिद्द को लेकर आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?

उ. केन-बेतवा लिंक बुंदेलखण्ड के लिए एक अभिशाप साबित होगा। यह बुंदेलखण्ड को बाढ़-सुखाड़ में फंसाकर मारने का काम है। इससे इलाके में बाढ़-सुखाड़ घटने की बजाय, बढ़ेगा। 

प्र. मगर सरकार के लोग तो कह रहे हैं कि केन-बेतवा नदी जोड़ विरोधी बातांे का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

उ. वे यह कैसे कह सकते हैं ? प्रो. जी. डी. अग्रवाल, प्रो. आर. एच. सिद्दिकी, श्री परितोष त्यागी और रवि चोपड़ा जैसे देश के चार नामी वैज्ञानिकों और मैने मिलकर केन-बेतवा नदी जोड़ का ज़मीनी वैज्ञानिक अध्ययन किया था। उसी अध्ययन के आधार पर केन-बेतवा नदी जोड़ का काम दस साल से रुका पड़ा है; नहीं तो इसे लेकर राज्य-सरकारों के बीच का एग्रीमेंट तो 15 साल पहले ही हो गया था। उन्हे समझना चाहिए कि बाढ़-सुखाड़ मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है पानी का विकेन्द्रित प्रबंधन।

प्र. किंतु आपने तो उमाजी की जिद्द के खिलाफ कोई बयान दिया हो या मुहिम शुरु की हो; ऐसा मैने ऐसा नहीं सुना।

उ. अरे, हम तो पिछले 15 साल से नदी जोड़ परियोजना का विरोध कर रहे हैं। बतौर सदस्य, राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी की बैठकों में भी नदी जोड़ परियोजना का खुलकर विरोध किया था। अब लगता है कि केन्द्र की यह सरकार तो संवेदनहीन सरकार है, तो संवेदनहीन के बीच में क्या बोलना। अपनी ऊर्जा लगाने को कोई मतलब नहीं। यूं भी मैं खिलाफ मोर्चाबंदी नहीं करता। मैं सिर्फ सरकारों को सजग करने का दायित्व निभाता हूं। जन-जोड़ अभियान चलाकर मैं यही दायित्व निभा रहा हूं।

प्र. लेकिन मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते तो आपने गंगा-यमुना को लेकर खूब मोर्चाबंदी की थी। क्या मोदी जी के आते ही नदियों के सब मसले सुलझ गये; नदी के शोषण, अतिक्रमण, प्रदूषण व पानी के व्यावसायीकरण संबंधी सब चुनौतियां खत्म हो गईं ?

उ. नहीं, इस मोदी शासनकाल में तो ये सभी मुद्दे और भी गंभीर हो गये हैं। कांग्रेस शासन गंगा को मां नहीं कहता था, लेकिन उन्होने लोहारी-नाग-पाला परियोजना रद्द की; भागीरथी इको संेसटिव ज़ोन घोषित किया; गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर मां जैसा सम्मान दिया। गंगा को लेकर उनकी कथनी-करनी में उतना अंतर नहीं था, जितना मोदी सरकार की कथनी-करनी में है। कांग्रेस सरकार में नदी का समाज बोलता था, तो सरकार सुनती थी। यह सरकार सुनती ही नहीं, तो हम क्या बोलें ?

प्र. कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस शासन के समय आपकी गंगा निष्ठा और थी और मोदी शासन के समय कुछ और ? 

उ. नहीं ऐसी बात नहीं है। गंगा के प्रति मेरे मन का दर्द पहले से अब ज्यादा है। झूठ को झूठ सिद्ध करने के लिए कभी-कभी थोड़ा इंतजार करना पड़ता है। दूसरों के बारे में तो मैं नहीं कहता, मैं इंतजार ही कर रहा हूं। यह भी कह सकते हैं कि तैयारी कर रहा हूं।

प्र. क्या तैयारी कर रहे हैं ? 
उ. समय आयेगा, तो उसका भी खुलासा करुंगा।

प्र. कहीं ऐसा तो नहीं कि आई बी रिपोर्ट के बाद प्राप्त अनुदान के अनुचित उपयोग और खातों की जांच के जरिए एनजीओ सेक्टर की मुश्कें कसने के लिए जो कोशिश मोदी सरकार ने की है; यह सन्नाटा.. यह चुप्पी उसी कार्रवाई के डर के कारण हो ?

उ. राजेन्द्र सिंह पर किसी दान-अनुदान, जांच या रिपोर्ट का कोई दबाव नहीं है। राजेन्द्र सिंह एक स्वैच्छिक कार्यकर्ता है, जिसे अपना साध्य मालूम है। साध्य को साधने के लिए जो साधन चाहिए, वह उसकी शुद्धि का पूरा ख्याल रखता है।

प्र. मैं आपकी व्यक्तिगत बात नहीं कर रहा; फण्ड आधारित पूरे एनजीओ सैक्टर की बात कर रहा हूं। 

उ. हां, यह सही है कि बीते दो सालों में कोई हलचल नहीं है, लेकिन आपको याद होगा कि बीती पांच मई को हमने चुप्पी तोड़ी। देशभर से लगभग सात हजार लोग संसद मार्ग पर पहुंचे। जल सुरक्षा को लेकर सरकार को आगाह किया।

आपकी यह बात भी सही है कि मोदी जी की सरकार ने समाज में एक डर पैदा कर दिया है। अपनी तानाशाही दिखाकर संवेदनशील लोगों को भी भयभीत करने की कोशिश की है। जो डर से नहीं माने, उन्हे लोभ-लालच में फंसाने की कोशिश कर रही है। लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसे पैदा किया डर, ऐसे लोभ का वातावरण ज्यादा दिन नहीं टिकता। भारत के लोगों ने ज़मीन के मसले पर लड़कर सरकार को झुकने को मज़बूर किया। देखना, पानी के मसले पर भी लोग खड़े होंगे।

प्र. जो समाज, अपनी समाज व प्रकृति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियांे के प्रति लापरवाह दिखाई दे रहा है; ऐसा समाज अपनी हकदारी के लिए खड़ा होगा, आपकी इस उम्मीद का कोई आधार तो होगा ?

उ. समाज को दायित्वपूर्ण बनाने के लिए वातावरण निर्माण की एक प्रक्रिया होती है। वह प्रक्रिया उद्देश्य के साथ-साथ उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग में रुकावट पैदा करने वाली शक्तियों को पहचानकर शुरु की जाती है। ऐसी शक्तियां पिछली केन्द्र सरकार में भी थी, इस केन्द्र सरकार में भी हैं। लेकिन पिछली सरकार में दूसरी तरह की शक्तियां थीं, इस सरकार में दूसरे तरह की हैं। ऐसी शक्तियों के खिलाफ लड़ने वाले लोग अभी बिखरे हुए हैं। सरकार ने भी उन्हे बिखेरने का काम किया है। वे अब जुड़ने भी लगे हैं।

ज़मीन के मसले पर तरुण भारत संघ श्री पी.व्ही. राजगोपाल जी के संघर्ष से जुड़ा, तो पानी के काम में पी. व्ही., निखिल डे, मेधा जी समेत देश के कई प्रमुख संगठन अब आपस में जुड़ रहे हैं।

प्र. कहीं यह एकजुटता संगठनों द्वारा अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए तो नहीं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस शासन के समय आपकी गंगा निष्ठा और थी और मोदी शासन के समय कुछ और ? 

उ. नहीं ऐसी बात नहीं है। किसी व्यक्ति या संगठन का अस्तित्व का अस्तित्व कभी महत्वपूर्ण नहीं होता; महत्वपूर्ण होता है दायित्व की पूर्ति। यह एकजुटता अपने दायित्व की पूर्ति के लिए है।

जहां तक गंगा की बात है, तो गंगा के प्रति मेरे मन का दर्द  अब पहले से भी ज्यादा है। किंतु झूठ को झूठ सिद्ध करने के लिए कभी-कभी थोड़ा इंतजार करना पड़ता है। दूसरों के बारे में तो मैं नहीं कहता, मैं इंतजार ही कर रहा हूं। यह भी कह सकते हैं कि तैयारी कर रहा हूं।

प्र. क्या तैयारी कर रहे हैं ? 

उ. समय आयेगा, तो उसका भी खुलासा करुंगा।
प्र. क्या आप भाजपा विरोधी हैं ?

उ. मेरा किसी पार्टी से कोई विरोध नहीं। जो भी सरकार पानी प्रबंधन की दिशा में कुछ अच्छा काम करने की इच्छा प्रकट करती है, मैं उसके साथ सहयोग को हमेशा तैयार रहता हूं। महाराष्ट्र में जिस सरकार के साथ मिलकर मैने ’जलायुक्त शिवार’ योजना पर काम किया, वह भाजपा दल के नेतृत्व वाली ही सरकार है। लातूर को फिर से पानीदार बनाने का काम भी हम इसी सरकार के साथ मिलकर कर रहे हैं। जलायुक्त शिवार का मतलब ही है, बेपानी जगह को फिर से पानीदार बनाना। 

प्र. भारत की राजनैतिक पार्टियों में सबसे ज्यादा नंबर किसे देंगे ?

उ. भारत की मुख्य राजनैतिक पार्टियों में फिलहाल कोई पार्टी ऐसी नहीं, जिसे देश की परवाह हो; जो देश की जनता-जर्नादन के प्रति संवेदनशील हो।

प्र. विकल्प क्या है ?

उ. रचना; रचना ही वह विकल्प है, जो समता की लड़ाई में गरीबों को आगे लेकर आयेगा। लेकिन उसमें अरविंद केजरीवाल जैसे कार्यकर्ताओं से बचना होगा, जो रचना की शक्ति को अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते।


अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-92
amethiarun@gmail.com
9868793799

Aug 22, 2016

ये वृक्ष गाज़ा पट्टी हैं, जहाँ पक्षी हैं शरणार्थी...



जैव-विवधिता के इन अति संवेदनशील जगहों के प्रति कितने संवेदनशील हैं वन्य-जीव प्रेमी ?
इन्दौर रेलवे स्टेशन के बाहर पेड़ो पर सुबह और शाम चीलों तथा सुग्गों( तोता) का विशाल जमघट लगा होता है। इन्हे देखकर आप शायद किसी शरणार्थी शिविर के बारे में सोच सकते है। एक पेड़ पर इनकी संख्या,,घनत्व के लिहाज से गाजा पट्टी से तुलना करने पर विवश करता है।
मानवीय हलचल वाले क्षेत्र में इतनी संख्या में इन्हे देखना,,, आश्चर्य में डाल देता है। हो सकता है ज्यादातर पक्षी प्रेमी अंग्रेजो ने इस बात का ख्याल नही रखा होगा की,,आज जहाँ पटरी बिछाने जा रहे हैं,,,वो इनके इलाके हैं ।ये स्टेशन बनने तथा अन्य विकास से भविष्य में अपने ही इलाके में शरणार्थी बन सकते हैं।
ये सिर्फ पेड़ नही है,,,बल्कि एक शरणार्थी शिविर है,,,अगर गलती से कभी कट गए,,तो हम सोच नही सकते कितना दु:खद परिणाम,,इन परिंदो के साथ होगा। अवास विनाश( Habitat loss) का कितना व्यापक प्रभाव इन परिंदो के वंश पर पड़ेगा,,,हम कतई सोच नही सकते। विकास के नाम पर इन पेड़ो के कटाई के बाद विस्थापन का कितना मार इन पक्षियों को झेलना पड़ेगा,,,कल्पना करना मुश्किल है।
जंगल में ऊँचे पेड़ो पर अनेकों शिकारी पक्षी का नजर आना आम बात है। फाल्गुन में पलाश( टेशु/ ढाक) के पेड़ पर छोटे पक्षियों का मजमा आम बात है,,,इसी तरह सीमर के पेड़ पर फूल आने के बाद वह हर वर्ग के परिंदो के लिए क्लब बन जाता है। परन्तु स्टेशन के चिल्लम- पौं से दुर यह सामान्य लगता है।
ब्रज( मथुरा- आगरा एंव आस-पास) में भी इतने मोर किसी एक पेड़ या घर पर नजर नही आते हैं,,,जबकि वहाँ मोर घरेलू पक्षी के जैसा है। कौआ,,मैना से ज्यादा मोर नजर आता है।
इन पेड़ो का महत्व तो आखिरी उम्मीद,,,आवास के जैसा हो चला है। इन्हे तो अब विरासत वृक्ष ( Heritage tree) घोषित कर देना चाहिए,,इनके महत्व के कारण ।
अरावली में थोड़ा सा भी उत्खन्न होता है,,,कहीं कुदाल- फावड़ा चलता है तो दिल्ली- NCR के हरित सिपाही( पर्यावरण प्रेमी) तन जाते हैं,,, अखबारों में खबरें आने लगती है । हरित न्यायालय का डंडा भूमाफिया,,,ठेकेदारों,,,, निर्माणकर्ताओं पर चलने लगता है। जबकि वहाँ पक्षियों से भी छोटे जीवों ,,,कीटों,,,चूहों,,, तितलियों,,तथा अन्य सरीसृपों एंव झाड़ियों का वास्ता होता है। एक तरह के कार्बन सिंक एंव जैवविविधता हावी होता है।
इंदौर रेलवे प्रशासन को रेलवे के हरित अभियान के तहत या अपने दरियादिली के नाते इन वृक्षों के समीप ही,,उसी प्रजाती के नए वृक्ष लगा दें,,,ताकि भविष्य में इनकी बढती संख्या के बोझ को उठा सके। स्टेशन पर हरियाली भी बढेगा,,, मुसाफिरों के लिए भी भीषण गर्मी में आश्रय होगा,,, वैश्विक तापन के निवारण में भी एक छोटा कदम होगा।



आज जहाँ ये पेड़ है वहाँ न पटरी है,,न रेलवे भवन,,,बल्कि आस- पास छोटी गाड़ियाँ,,अाटो खड़े नजर आते हैं,,, इसलिए किसी विकास परियोजना को भी बाधित नही कर सकता है।
अब समय इंदौर के निवासियों के लिए है की वो इन नन्हें जीवों के लिए क्या कर सकते है। वर्षो से देखते होगें,,गुजर जाते होगें,, कुछ समय के लिए रोमांच, फिर अपनी राह। पक्षियों का कोई नागरिक समाज( Civil society) और दवाब समूह( Pressure Group) नही हो सकता जो पक्षीहित याचिका( जनहित याचिका) दायर करे या अदालत में अर्ज दाखिल करे,,और,,रेल प्रशासन को इस तरह संवेदनशील कर सके।
बिना आपके साकारात्मक दखल के बेहतर परिणाम का उम्मीद संभव नही है। पक्षियों के पास दाव पर लगाने के लिए कुछ भी नही है,,,सिवाय बेदखली है। इसी इंदौर रेलवे स्टेशन पर मध्य- प्रदेश शासन वन विभाग द्वार प्लेटफार्म न०-1पर मुसाफिरों से अपील किया गया है कि " वन प्राणियों की सुरक्षा करें और इनाम पाए" वहाँ गुप्त सूचना देने और उसके नाम की गोपनीयता तक का बात कहा गया है।
पेड़ जरूर नागरिक क्षेत्र( Civil area) में है,,,पर पक्षियों का क्या उड़कर जंगल के तरफ भी जा सकते हैं,,,वापस उसी पेड़ पर आशियाना। अगर यह पेड़ वन में होता और इनके जीवन को खतरा होता,,,,कोई माँस ,,चमड़ा या अन्य उद्देश्य के लिए पकड़ता तो क्या वन विभाग के अधिकारी नही कार्यवाई करते।
सलमान खान पर जिन चिंकारा के शिकार का आरोप है,,वो भी वन में नही बल्कि मानवीय रिहायशी क्षेत्र में रहते हैं। पर वे उन कानून में आते हैं,,जिनमें दंड का प्रावधान है।
वन जीव अधिनियम- 1972 के प्रावधान में भी,,तोता का उल्लेख है ,,चील तो बाहर होगा नही। शायद बहुत से लोग इस बात से अंजान होगें की भारत में तोता को भी घर में पाल नही सकते हैं,,पिंजरे में डाल नही सकते हैं,,,यह भी कानूनन अपराध है।
निश्चित रूप से यह क्षेत्राधिकार के अतिक्रमण का मामला लग सकता है । राज्य सरकार( वन विभाग) ,, केन्द्र सरकार( रेल मंत्रालय) के समन्वय और पर्यावरण प्रेमी के स्नेहक की भूमिका से शीघ्रता से इनके भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है।
ऐसा दृश्य मालवा में सिर्फ इंदौर का ही नही है,,बल्कि उज्जैन तथा कई अन्य जगहों, पर भी है। वास्तव में देश के कई रेलवे स्टेशनों पर हम इन स्थितिओं से दो चार होते हैं।
यह केवल संयोग है की,,,सारे फोटो इन्दौर रेलवे स्टेशन से जुड़े है। खाली दिमाग शैतान का होता है,,,अब मानना मुश्किल हो रहा है,,, क्योंकि सारे फोटो खाली समय में लिया गया है,,,रेल के इंतजार में ।
अब अगर इन पर हम कोई पहल न करें तो। जब जब पेड़ कटेगें,, स्टेशन के पास बैठे पक्षी यही गाते नजर आ सकते हैं।

परदेशिओं से न अँखियां मिलना,,,,परदेशिओं को है एक दिन जाना।
सच ही कहा है पंक्षी इनको ,,रात को ठहरे तो उड़ जाए दिन को

आज यहाँ तो कल वहाँ है ठिकाना ।

प्यार से अपने ये नही होते,,,ये पत्थर है,,ये नही रोते।

इनके लिए न आँसू बहाना।


गौतम कुमार सिंह "ललित विजय" ( लेखक दक्षिण एशिया के मसायल के शोधार्थी है, भूगोल, रसायन व् पत्रकारिता जैसे विषयों से गहरा नाता, वन्य जीवन का अध्ययन व् यायावरी  इनके प्रमुख शौक हैं, फिलवक्त भारतीय सिविल सर्विसेज की तैयारी, दिल्ली में निवास, इनसे gautam_chemistry@rediffmail.com पर संपर्क कर सकते हैं 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

Featured Post

क्षमा करो गौरैया...

Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen  संस्मरण गौरैया और मैं -- (3) ....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी बात उस समय की है जब घर के नाम पर ...

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!