डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 02, February 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 20, 2017

अरुण के आंचल में खुशबू का खज़ाना

Photo Courtesy:  http://arunachalforests.gov.in/

उगते सूरज का प्रदेश, सर्वाधिक क्षेत्रीय बोलियों वाला प्रदेश, भारत के तीसरा विशाल राष्ट्रीय पार्क (नाम्दाफा नेशनल पार्क ) वाला प्रदेश जैसे भारतीय स्तर के कई विशेषण अरुणाचल प्रदेश के साथ जुडे़ हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश के लिए जो विशेषण सबसे खास और अनोखा है, वह है, यहां उपलब्ण्ध सबसे अधिक आॅर्चिड विविधता।

आॅर्चिड - यानी एक ऐसी बूटी, जिसमें फूल भी दिखाई दें। इस नाते इन आॅर्चिड्स को हिंदी में हम पुष्पबूटी कह सकते हैं। जीवों में जैसे इंसान, वैसे वनस्पतियों में सबसे ऊंचा रुतबा है पुष्पबूटियों का।......पुष्पबूटियों की यह दुनिया इतनी बड़ी है... इतनी विशाल! इतने रंग, इतने आकार, इतनी गंध, इतने उपयोग कि जानने, समझने-समझााने में ही सालों निकल जायें। मोनोकोलाइडिन्स में सबसे बड़ा परिवार पुष्पबूटियों का ही है। 

अरुणचल प्रदेश: भारत में सर्वाधिक पुष्पबूटी विविधता का कीर्तिमान

नेशनल रिसर्च सेंटर फाॅर आॅर्चिड, सिक्किम की एक रिसर्च के मुताबिक, हमारी पृथ्वी पर पुष्पबूटियों के करीब एक हजार वंश हैं और 25-30 हजार प्रजातियां। भिन्न ताजा शोधों के आंकडे़ जरूर कुछ भिन्न हैं। ये कह रहे हैं कि बदलती जलवायु और मानवीय हस्तक्षेप के कारण पृथ्वी पर पुष्पबूटी प्रजातियों की संख्या घटी है। एक नया शोध पुष्पबूटी प्रजातियों की संख्या 20,000 बताता है। इसके हिसाब से भारत में मौजूदा पुष्पबूटी प्रजातियों की संख्या लगभग 1300 हैं। इनमें से 825 प्रजातियां अकेले पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों में पाई जाती हैं। इन 825 पुष्पबूटियों में से 622 पुष्पबूटियां अकेले अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती हैं। पूष्पबूटियों का पूरा खजाना है हमारा अरुणाचल प्रदेश। 

एक ताज़ा शोध मानता है कि भारत में अब 1150 पुष्पबूटी प्रजातियां शेष बची हैं। अरुणाचल में इनकी ताजा संख्या 601 है; भारत में मौजूद पुष्प बूटियों की कुल संख्या का करीब 52 प्रतिशत। इस आंकडे़ के हिसाब से भी भारत में सबसे अधिक पुष्पबूटी विविधता वाले प्रदेश का कीर्तिमान यदि किसी को हासिल है, तो वह है नाॅर्थ-ईस्ट स्थित अपना अरुणाचल प्रदेश - द आॅर्चिड पैराडाइज आॅफ इण्डिया। आप अरुणाचल को ’द आॅर्चिड किंग्डम आॅफ इण्डिया’ भी कह सकते हैं।

कभी तिपि आइये

जिज्ञासा होनी स्वाभाविक है कि आखिर क्या खास बात है, अपने अरुणाचल प्रदेश में कि पुष्पबूटियांे को सबसे ज्यादा प्यार अरुणाचल प्रदेश से ही है ?  अरुणाचल की मिट्टी, तापमान, आद्रता, ऊंचाई या और कुछ ? ये पुष्प बूटियां कौन सी हैं ? कितनी व्यवसायिक हैं ? कितनी सजवाटी हैं ? कितनी घरेलु अथवा औषधीय उपयोग की हैं ? किसके नाम व नामकरण का आधार क्या है ? यह जिज्ञासा भी होगी ही। मेरे मन में  भी है। वैसे आप चाहें, तो जंगलों की सैर करते हुए भी पुष्पबूटियों की तलाश कर सकते हैं, किंतु यदि हम उक्त सवालों का प्रमाणिक जवाब चाहते हैं, तो हमें  अरुणाचल प्रदेश स्थित आॅर्चिड रिसर्च एण्ड डेवल्पमेंट सेंटर अवश्य जाना चाहिए।
यह सेंटर अरुणाचल प्रदेश के ज़िला पश्चिमी कामेंग में तिपि नामक स्थान पर है। यह स्थान तेजपुर और बोमडिला के पास पड़ता है; गुवाहाटी से करीब 223 किलोमीटर दूर। तिपि से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर सेसा में स्थित आॅर्चिड सेन्चुरी जाना भी न भूलें।

1972 में स्थापित तिपि स्थित आॅर्चिड रिसर्च एण्ड डेवल्पमेंट सेंटर करीब 110 एकड़ में फैला है। इसमें 50 हजार से ज्यादा पुष्पबूटी पौधे हैं। इस केन्द्र में पुष्प बूटियों से संबंधित कई अलग-अलग स्थान हैं: स्पेशिज हाउसेस, आॅर्चिड ग्लास हाउस, नेचुरल आॅर्चिडा, आॅर्चिड हारबेरियम,  टिसु कल्चर लेबोरेट्री, हार्डनिंग यूनिट, आॅर्चिड म्युजियम आदि।इस शोध एवम् विकास केन्द्र के वैज्ञानिक अरुणाचल की इन 601 प्रजातिंयों को छह उप परिवारों में बांटते हैं; सूक्ष्म स्तरीय वर्गीकरण करना हो, तो अरुणाचल की पुष्पबूटियों को 17 ट्राइब्स, 24 सब ट्राइब्स और 111 वंश में बांटा जा सकता है। 

पुष्पबूटी: तीन प्रमुख श्रेणियां

सुनहरी पीले आॅर्चिड को लें। यह ग्लेडिला स्पेशिज का आॅर्चिड है। इसके पौधे पर न पत्ती है, न क्लोरोफिल, मगर फूल हैं। ऐसे आॅर्चिड जैविक पदार्थों पर पैदा हो जाते हैं और जैविक पदार्थ से ही भोजन भी लेते हैं। ऐसे आॅर्चिड को हम जिस श्रेणी में रखते हैं, उसे 'सेप्रोफाइट्स कहते हैं।

.खूब उपजाऊ मिट्टी में पैदा होने वाले करीब 132 आॅर्चिड्स को 'टेरेस्टरियल' श्रेणी में रखते हैं। इनकी एक खास पहचान यह है कि इन पर खूब पत्तियां होती हैं। जैसे अरुणदिना ग्रेमेनिफोलिया। अरुणदिना ग्रेमेनिफोलिया को आप बैम्बू आॅर्चिड कह सकते हैं। 

'एपीफाइट्स' तीसरी श्रेणी है। पेड़ों के तने वाले उगने वाले आॅर्चिड.... वो क्या कहते हैं आप पुष्पबूटी... ओ यस, दूसरे आर्गेनिक मैटर पर उगने वाली पुष्पबूटियों को हम एपीफाइट्स कटेगरी मे रखते हैं। इनकी एक ही पहचान है कि इनकी जड़ें ऊपर की ओर निकली हुई होती हैं; जैसे सिम्बिडियम। इसकी खुशबू हवा में कुछ ऐसे फैल जाती है कि पता चल जाता है कि कहीं सिम्बिडियम का पौधा है। यहां के वांचू आदिवासी इन्हे रांगपु कहते हैं।

एपीफाइ्टस श्रेणी में शामिल - वंदा कोरुलिया और रेंन्थारिया इम्सकूलटियाना नाम की पुष्पबूटियां भारत सरकार के वन्य जीव संरक्षण कानून की धारा चार के अंतर्गत संरक्षित  हैं। ये दोनो ही दुर्लभ और सजावटी श्रेणी की पुष्पबूटियां हैं। नीले रंग वाला वंदा कोरुलिया खासकर, त्यौहार के मौके पर सजावट के काम आता है।

सबसे खास: लेडीज स्लीपर

अरुणाचल में एक से एक उपयोगी पुष्पबूटियां हैं। डेन्ड्रोबियम नोबिल का बीज रगड़कर ताजा घाव पर लगा लो, बहता खून रुक जाये। अरुणाचल के आदिवासी लिसोस्टोमा विलियमसोनी के पत्ते और तने का उपयोग हड्डी जोड़ने में करते हैं।

अरुणाचल की सबसे खास और पैतृक प्रजाति है -पेफियोपेउिलमण् महिलाओं की जूती के आकार की होने के कारण यह प्रजाति 'लेडीज स्लीपर' कहते हैं। यह प्रजाति अरुणाचल में भी सब जगह नहीं पाई जाती। दुर्लभ होने की वजह से लेडी स्लीपर को अरुणाचल से बाहर ले जाने पर रोक है।

अरुणाचल की पुष्पबूटियां भोजन भी हैं, सजावटी का सामान भी, दवा भी और गंध-सुगंध का खजाना भी। पुष्पबूटियों की व्यावसायिक खेतीे को बढ़ावा देने  तिपि का केन्द्र आजकल छह दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाता है। कभी अरुणाचल आयें, तो इस खुशबू खजाने से साक्षात्कार करना न भूलें।





अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-92
9868793799


गन्ने की एक प्रजाति जो बदल सकती है किसानों की तकदीर

गन्ना उपज एवम् चीनी परता में उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त करने हेतु शीघ्र पकने वाली प्रजाति को0शा0 08272 


सूर्य की किरणों से प्राप्त ऊर्जा तथा वायु मण्डल में व्याप्त हानिकारक कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को चीनी एवम् ऊर्जा में परिवर्तित करने की अपार क्षमता गन्ने की खेती में विद्यमान है। वर्तमान वैज्ञानिक युग में गन्ना खेती से प्राप्त गन्ना व इसके विभिन्न उत्पादों जैसे-अगौला आदि का उपयोग, चीनी, गुड़, एल्कोहल आधारित विभिन्न रसायनों के उत्पादन के साथ-साथ पशुओं हेतु हरा चारा, जीवन रक्षक एन्टीबायोटिक्स, प्लाईवूड, कागज, बायोफर्टिलाइजर एवम् विद्युत उत्पादन में किया जा रहा है। ब्राजील की तरह भारत सरकार द्वारा गन्ने से इथेनॉल उत्पादित करने वाली मिलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, फलस्वरूप वाहन व विभिन्न उद्योगों आदि से उत्सर्जित हो रही हानि कारक कार्बन डाईऑक्साइड गैस का सर्वाधिक उपयोग (कार्बन सिक्वेस्ट्रेषन) गन्ना फसल द्वारा प्रकाष संश्लेषण में किये जाने से प्रदूषणमुक्त वातावरण निर्मित करने में सहायता मिल रही है। 
गन्ना भारत वर्श की व्यवसायिक व एक प्रमुख नकदी फसल है जिसका चीनी उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान है। उ0प्र0 में अधिकांशत: पुरानी व अस्वीकृत प्रजातियाँ 25.38 प्रतिशत क्षेत्रफल में अभी भी आच्छादित हैं साथ ही अगेती प्रजातियों का क्षेत्रफल तीव्र गति से बढ़ रहा है जिसका प्रभाव गन्ने की औसत उपज व चीनी परता पर स्वतः परिलक्षित है। फलस्वरूप वर्श 2012-13 में 9.26 प्रतिशत अगेती प्रजातियों के क्षेत्रफल से औसत उपज 61.6 टन/हे0 तथा चीनी परता 9.18 प्रतिशत प्राप्त हुआ था जो वर्श 2015-16 में तीव्र गति से बढ़कर अगेती प्रजातियों का क्षेंत्रफल 34.47 प्रतिशत तथा प्रदेश की औसत उपज 66.46 टन/हे0 व चीनी परता 10.61 प्रतिशत पाया गया। अतः जल्दी पकने वाली प्रजातियों से गन्ना क्षेत्रफल आच्छादित करने से औसत उपज तथा चीनी परता में सार्थक वृद्धि प्राप्त हो रही है। 

राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश की औसत गन्ना उपज के साथ चीनी परता में उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त करने हेतु अगेती गन्ना प्रजातियों से 50 प्रतिषत क्षेत्रफल को आच्छादित करना आवष्यक है। पूर्व में विकसित शीघ्र पकने वाली प्रजातियाँं अधिक गन्ना उपज के साथ बहुपेड़ीय क्षमता विद्यमान न होने के कारण किसानों में लोकप्रिय नहीें हो सकीं। उ0प्र0 गन्ना शोध परिषद द्वारा गुणवत्ता प्रजनन पर विशेष बल देने के फलस्वरूप वर्तमान में विकसित की गयी जल्दी पकने वाली प्रजाति को0शा0 08272 में बहुपेड़ीय क्षमता के साथ गन्ना उपज एवम् चीनी परता में उत्तरोत्तर वृद्धि प्रदान करने के साथ ही रोग एवम् कीटों के आपतन के प्रति रोगरोधिता का गुण होने के कारण वर्ष 2011 में इस प्रजाति को सामान्य खेती हेतु सम्पूर्ण उ0प्र0 हेतु अवमुक्त किया गया। इस प्रकार जल्द पकने वाली प्रजातियों की शरद्कालीन बुवाई से प्राप्त उपज में बसन्तकालीन बुवाई की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत अधिक गन्ना उत्पादन प्राप्त होने के साथ ही 0.5 प्रतिशत अधिक चीनी परता भी प्राप्त किया जा सकता है। विपरीत परिस्थितियों (जल भराव, सूखा, पाला आदि) में शरद्कालीन गन्ना उत्तम सिद्ध हुआ है। सूखे की स्थिति प्रायः मई-जून के महीने में रहती है। इस समय तक शरद्कालीन गन्ने की जड़ें काफी गहराई तक पहुँच जाती हैं और अधिक पोषक तत्वों को अवशोषित कर सूखे से ज्यादा हानि नहीं होती है। बाढ़ की स्थिति प्रायः अगस्त-सितम्बर महीने में होती है तब तक गन्ने की फसल की अत्यधिक जड़ें जकणी होती हैं जिससे बाढ़ का कुप्रभाव कम पड़ता है।  
अतः शरद्कालीन बुवाई में को0शा0 08272 की खेती गहरे ट्रेन्च विधि द्वारा करने से किसान भाइयों को सवा गुना अधिक उत्पादन मिलने के साथ ही चीनी परता में वृद्धि प्राप्त होने से चीनी उत्पादन की लागत भी कम आयेगी। 

कृषकोपयोगी गुण
को0शा0 08272 में अगेती प्रजातियों के साथ ही मध्य देर से पकने वाली प्रजातियों की तरह माह अप्रैल तक पशुओं के चारे हेतु अत्यधिक हरा अगोला बना रहने के साथ ही चीनी परता में उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त होती है। उत्तर प्रदेश/उत्तर भारत की जलवायु के अनुसार व्यापक अनुकूलनशीलता विद्यमान होने के कारण प्रति गन्ना वजन के साथ-साथ चारे हेतु स्वादिष्ट व पौष्टिक अगोला माह अक्टूबर से अप्रैल तक बना रहता है। अतः किसान भाइयों को को0शा0 08272  द्वारा अधिकाधिक क्षेत्रफल में बुवाई करने से आम के आम गुठलियों के दाम अर्थात् पशुओं हेतु सुपाच्य हरा चारा (अगोला) मिलने के साथ ही प्रति गन्ना वजन में वृद्धि होते रहने के कारण गन्ना उपज में पेराई सत्र से प्रारम्भ (अक्टूबर) से ही अन्तिम सत्र तक (अप्रैल) गन्ना व चीनी उत्पादन में वृद्धि प्राप्त होती है (चि़त्र 1)। जमाव, ब्याँत एवम् मिल योग्य गन्नों की संख्या अच्छी रहने के साथ ही गन्ना मोटा एवम् ठोस रहता है। इस प्रकार अन्य प्रजातियों की तुलना में को0शा0 08272 प्रजाति के ब्याँत में एकरूपता पाये जाने के फलस्वरूप सभी मिल योग्य गन्ने लगभग एक समान मोटाई, लम्बाई व वजन के होते हैं। गन्ना मध्यम कड़ा होने के कारण गिरता नहीं है (चि़त्र 1)। 

प्रदेश की विभिन्न जलवायु में स्थित 14 चीनी मिलों में पोल प्रतिषत इन केन के विश्लेषणोपरांत प्राप्त मुक्त आँकड़ों से स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है कि जल्दी पकने वाली प्रजाति को0शा0 08272 में को0जे0 64 की तुलना में 3.03 प्रतिशत अधिक चीनी परता (पोल प्रतिशत इन केन) होने के साथ ही चीनी परते में उत्तरोत्तर वृद्धि प्रदान करने की आनुवंशकीय क्षमता विद्यमान है। फलस्वरूप चीनी मिलों में पेराई सत्र के प्रारम्भ (अक्टूबर 9.60 प्रतिशत पोल इन केन) से अन्त (मार्च 13.60 पोल प्रतिशत इन केन) तक उत्तरोत्तर चीनी परते में वृद्धि प्राप्त हो रही है।

 जल्द पकने वाली प्रजाति को0शा0 08272 के साथ प्रमाप को0जे0 64 का प्रदेश की विभिन्न चीनी मिलों के जोनल परीक्षण से प्राप्त दो वर्षों के औसत पोल प्रतिशत इन केन के आंकड़ों का तुलनात्मक विवरण में कोशा ०८२७२ एक बेहतर प्रजाति साबित हुई.



चि़त्र 1 - को0शा0 08272- ए- गन्ना की खड़ी फसल, बी-. ठोस गन्ना, सी- मध्यम कड़ा पोरी।

जल्द पकने वाली प्रजाति को0शा0 08272 से उत्तर भारत की पूर्व में सर्वोत्तम अगेती प्रजाति को0जे0 64 की तुलना में प्राप्त तीन वर्षीय आंकड़ों से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि को0शा0 08272 की बुवाई से किसानों की उपज में 62.94 प्रतिषत की सार्थक वृद्धि प्राप्त होगी 

चीनी उद्यमियों को को0शा0 08272 की पेराई के प्रारम्भ में ही लगभग 10 प्रतिशत (नवम्बर) चीनी परता प्राप्त होने के साथ-साथ पेराई के अन्तिम समय (मार्च) में लगभग 12.5 प्रतिषत चीनी परता प्राप्त होने से प्रदेश की औसत उपज तथा चीनी परता में सतत् वृद्धि प्राप्त होने की अपार सम्भावनायें विद्यमान हैं। अतः शरद्कालीन बुवाई में इस प्रजाति के गन्नों से लगभग एक चौथाई अधिक गन्ना उत्पादन के साथ ही चीनी परता में 0.5 यूनिट की अतिरिक्त वृद्धि प्राप्त होगी।
  

मध्यम रेशा प्रतिशत होने के कारण इस प्रजाति में रोग एवम् कीटों के आपतन के प्रति रोग एवम् कीटरोधिता विद्यमान होने के फलस्वरूप इस प्रजाति से आच्छादित गन्ना के खेतों की मिट्टी (मृदा) स्वस्थ बनी रहती है तथा पर्यावरण के प्रति अनुकूलता भी पायी जाती है। अतः उपरोक्त गुणों के कारण षीघ्र पकने वाली अगेती प्रजाति को0शा0 08272 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश के किसानों में दिनों दिन लोकप्रिय हो रही है। 

को0शा0 08272 में पेड़ी व्यवहार के प्रति श्रेश्ठ आनुवंशीय गुण विद्यमान होने के कारण पूर्व में लोकप्रिय शीघ्र पकने वाली प्रजाति को0जे0 64 की तुलना में 59.96 प्रतिशत अधिक पेड़ी उत्पादन प्राप्त होता है । इसी प्रकार चीनी मिलों को कोशा0 08272 की पेराई करने से माह नवम्बर में लगभग 10.50 प्रतिषत चीनी परता प्राप्त होगा। माह जनवरी तक चीनी परता में इस प्रकार इस प्रजाति की पेड़ी से उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त होगी 

खादीय सुझाव

अगेती प्रजातियों/गन्ने की किन्हीं प्रजातियों से अधिकतम् गन्ना उत्पादन लेने हेतु शरद्काल में 200 कि0ग्रा0 नत्रजन, 80 कि0ग्रा0 फास्फोरस तथा 60 कि0ग्रा0 पोटाश के साथ ही बोरान (बोरेक्स) 10-15 कि0ग्रा0/हे0 की दर से देना आवश्यक है। खेत में हरी खाद अथवा सड़ी प्रेसमड से प्राप्त मैली के साथ-साथ सूक्ष्म तत्वों जैसे- जिंक एवम् सल्फर की आपूर्ति हेतु 25 कि0ग्रा0/हे0 की दर से जिंक सल्फेट बुवाई के समय देना लाभकारी होता है। नत्रजन के अतिरिक्त सभी उर्वरकों (फास्फोरस, पोटाश, बोरान, जिंक, सल्फर) को बुवाई के पूर्व ट्रेन्च अथवा कूँड़ों में बुरकाव करने के उपरान्त पैरों से मिट्टी गिराने के उपरान्त दो-दो ऑँख के साथ पर्याप्त नमी में बुवाई करना लाभदायक होता है। सिंचाई की सुविधा विद्यमान होने पर 1/5 भाग नत्रजन की मात्रा बुवाई के समय तथा शेष नत्रजन की मात्रा जमाव के उपरान्त (3-4 पत्तियों से युक्त पौधों की अवस्था) सिंचाई के बाद ओट आने पर बुरकाव करना अधिकतम् गन्ना उपज प्राप्त करने में हितकर सिद्ध होगा। गन्ना उपज एवम् चीनी परता में उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त करने के लिये माह जून तक नत्रजन की टाप ड्रेसिंग करना अति आवश्यक है। जुलाई के प्रथम सप्ताह में शूट/टॉप बोरर का आपतन होने की दशा में कार्बोफ्यूरान 3 जी0 25 से 30 कि0ग्रा0/हे0 की दर से बुरकाव कर कूँड़ों पर मिट्टी चढ़ा देने से अधिकतम् उपज व चीनी परता प्राप्त होगा। 

अतः को0शा0 08272 में विद्यमान आनुवंशकीय विशेषता का दोहन प्रदेश के किसानों एवम् चीनी उद्यमियों के हित मेें करने हेतु इस प्रजाति से अधिकतम् गन्ना क्षेत्रफल आच्छादित करना राष्ट्रीय हित में है। 



डा0 राम कुशल सिंह, 
गन्ना शोध संस्थान, शाहजहाँपुर।

(Dr. Ram Kushal Singh
Head, Center for Sugarcane Biotechnology 
Sugarcane Research Institute
(U P Council of Sugarcane Research)
SHAHJAHANPUR - 242001, U. P., INDIA
Contact: +91 9415527526



Feb 15, 2017

आइये, हम खुद लिखें एक निर्मल कथा


सरकारें जब करेंगी, तब करेंगी… आइये! हम अपनी नदी की एक निर्मल कथा खुद लिखें। उसकी कार्ययोजना बनायें भी और उसे क्रियान्वित भी खुद ही करें। हां! सिद्धांत न कभी खुद भूलें और अन्य किसी को न भूलने दें। नदी निर्मलता एक दीर्घकालिक काम है। ऐसे दीर्धकालिक कामों की कार्ययोजना, चार चरणों की मांग करती हैं: समझना, समझाना, रचना और सत्याग्रह। हो सकता है कि कभी कोई आपात् मांग सत्याग्रह को पहले नंबर पर ले आये या कभी कोई तात्कालिक लक्ष्य इस क्रम को उलट-पलट दे; लेकिन सामान्य क्रम यही है। 


पहला चरण: समझना

नदी प्रदूषण मुक्ति असरकारी कार्ययोजना का सबसे पहला काम है अक्सर जाकर अपनी नदी का हालचाल पूछने का। यह काम अनायास करते रहें। अखबार में फोटो छपवाने या प्रोजेक्ट रिपोर्ट में यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट लगाने के लिए नहीं, नदी से आत्मीय रिश्ते बनाने के लिए। यह काम नदी और उसके समाज में उतरे बगैर नहीं हो सकता। नदी और उसके किनारे के समाज के स्वभाव व आपसी रिश्ते को भी ठीक-ठीक समझकर ही आगे बढना चाहिए। नदी जब तक सेहतमंद रही, उसकी सेहत का राज क्या था ? यह समझना भी बेहद जरूरी है। ठीक से कागज पर चिन्हित कर लें कि नदी को कौन-कौन, कितना, कहां-कहां और किस तरीके व वजह से प्रदूषित कर रहा है। नदी, खेती, धरती, पेयजल, सेहत, आमदनी, समाज और संस्कार पर प्रदूषण के प्रभावों को एक बार खुद जाकर ठीक आंखों से देख-समझ लें। 

दूसरा चरण: समझाना

खुद समझकर दूसरे को समझाने के लिए जरूरी है कि कम से कम एक श्रमनिष्ठ कार्य हम खुद अपने लिए तय करें। उसे सबसे पहले उनके बीच करें, जिनकी जिंदगी सीधे नदी से जुङी है। लोगों में जिज्ञासा जगाने और प्रेरित करने का इससे कारगर औजार कोई और नहीं हैं। जिज्ञासा जब जवाब की मांग करने लगें, तब जो खुद को ठीक से समझ आ गया हो, उन्हे समझायें। खुद भी उनसे समझने का भाव कभी खोयें नहीं। ग्राम सरपंच से संवाद करें, लेकिन पंचों से ज्यादा और निजी संवाद करें। इस पूरी प्रक्रिया में अपने लिए तय किया श्रमनिष्ठ काम साधना की तरह जारी रखें। 
प्रेरणा में जितनी अहम् भूमिका अध्यात्मिक शक्तियों की होती हैं, उतनी हमारे खुद द्वारा किए श्रमनिष्ठ काम की भी। हमारा श्रमनिष्ठ काम और नदी के साथ व्यवहार का हमारा स्वानुशासन उन्हे अनुशासित होने को प्रेरित करेगा। जो स्वानुशासित नहीं, वह दूसरे को नियंत्रित नहीं कर सकता; प्रदूषक को तो कदापि नहीं। जिस दिन लोग नदी से अपने रिश्ते और अपने जिंदगी पर उसके असर का पाठ ठीक से याद कर लेंगे; उनकी जिंदगी में नदी के प्रति व्यवहार का अनुशासन स्वतः आना शुरु हो जायेगा। नदी प्रदूषण मुक्ति के लिए भी वे स्वतः ही लामबंद हो जायेंगे। 

सत्याग्रह की तैयारी : एक बार लामबंद हो गये लोगों को सिर्फ बात से बांधे नहीं रखा जा सकता। इस लामबंद शक्ति को चार तरह के काम में जिम्मेदारी से लगाने की जरूरत होती है। एक, नदी के प्रति स्वानुशासन; दूसरा, जो कुछ घट रहा है, उसकी निगरानी करना और तीसरा, रचना के श्रमनिष्ठ और सामुदायिक काम। ये तीनों काम हमेशा नहीं किए जा सकते। यदि हम इन तीनों में से कोई न कोई एक काम हमेशा नहीं दे सके, तो लामंबद हाथ जल्द ही बिखर जायेंगे…हम निराश होंगे और नदी भी।

व्यवहार का स्वानुशासन: स्वानुशासन का पहला काम, दूसरे काम की स्वयमेव तैयारी है। अपने स्तर पर हर शहरी कम से कम इतना तो पक्का कर ही सकता है कि सीवेज की पाइप लाइनों में शौच का पानी ही जाये; नहाने-धोने और बर्तन मांजने का रसायन नहीं। काॅलोनी नई हो, तो व्यक्तिगत या सामुदायिक सेप्टिक टैंक अपनायें। सीवेज पाइप, पानी के बाजार और पाॅली कचरे को कहें-’नो’। 

जननिगरानी तंत्र का विकास: दूसरे काम के रूप में जननिगरानी तंत्र विकसित करें। यह जननिगरानी तंत्र ही एक दिन नदी प्रदूषण का नियंत्रक बनकर खङा हो जायेगा। यह समाज से भी नदी की सुरक्षा सुनिश्चित कर देगा और सरकार से भी। इसके लिए उसे सतत् प्रशिक्षित, प्रेरित व प्रोत्साहित करें। जननिगरानी की भूमिका निभाना एक जिम्मेदारी भी है और हकदारी भी। हकदारी और जिम्मेदारी एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनो एक-दूसरे के बगैर नहीं आती। इन दोनो के आते ही काम के लिए जरूरी संसाधन लोग खुद जुटा लेते हैं। व्यक्ति आधारित अभियान व्यक्ति पर निर्भर करते हैं। एक बार हकदारी और जिम्मेदारी का सशक्त और वैचारिक तंत्र बना देने के बाद व्यक्ति न रहे, तो काम रुकता नहीं। यही लक्ष्य रहना चाहिए।

खैर! जरूरी है कि निगरानी से आये तथ्यों को हम प्रचारित करें। लोगों को उन पर अपनी प्रतिक्रिया करने दें। प्रतिक्रिया देने वालों को चिन्हित करते जायें और उन प्रतिक्रियाओं को कहीं दर्ज करते जायें। देखियेगा ! प्रतिक्रिया हमारे कार्य को सत्य के आग्रह की दिशा में मोङ देगी और प्रतिक्रिया देने वाले ही एक दिन हमारे सत्याग्रह के साथी बन जायेंगे। यह वह वक्त होगा, जब पक्ष और विपक्ष..दोनो का स्पष्ट दिखने शुरु हो जायेंगे। सकरात्मक और आशावादी भाव खोये बगैर विपक्ष से ईमानदार और खुला संवाद तेज कर दें। विपक्ष से बंद कमरे में किया छोटा सा संवाद भी संदेह और टूटन पैदा करता है। पक्ष को प्रेरित, प्रोत्साहित और जोङकर रखें। उसके निजी सुख-दुख में साथ दिखें। संघर्ष अवश्यंभावी हुआ, तो वह आपके साथ दिखेगा। अंततः नदी भी निर्मल होगी और समाज भी। रचना उसका स्वभाव बन जायेगा और संघर्ष में सफलता हासिल लेना उसका संकल्प।

तीसरा चरण: रचना बने सातत्य की सारथी

ध्यान रखें कि प्रचार, सत्याग्रह यानी संघर्ष का पहला साथी है। किंतु रचना कार्य में इसे अंतिम साथी बनाना चाहिए। जब तक रचना कार्य पूर्ण न हो जाये, उससे पूर्व किया गया प्रचार, रचना का पहला शत्रु साबित होता है। अतः इस बाबत् संयम और सावधानी बरतें। अक्सर कार्यकर्ता प्रचार मोह में इतना फंस जाते हैं कि कार्य शुरु बाद में होता है, रुकावटें उनका रास्ता रोककर पहले खङी हो जाती हैं। इसीलिए भी रचना के काम राजमार्ग के किनारे नहीं, पगडंडी के छोर पर करने चाहिए। 
बरगद अपने नीचे जल्दी किसी पौधे को पनपने नहीं देता और राजमहल अपने परिसर में उसकी इजाजत के बगैर लगाये सुंदर से सुंदर फूल को भी अपनी अवमानना मानता है। अनुकूल अवसर का इंतजार करें। सातत्य खोयें नहीं। कोई करे न करे, हम अपना श्रमनिष्ठ काम करते रहें। 

सामुदायिक स्तर पर सबसे पहले वह काम करें, जो अल्पकालिक हो, समुदाय ने खुद तय किया हो और उसे सीधे सकरात्मक लाभ देता हो। हो सकता है कि नदी प्रदूषण के कारण हैंडपम्प के पानी में चढ़ आई बदबू और और फैल रहे फ्लोरोसिस का इलाज, पहला काम बन जाये। हो सकता है कि नदी की बीमारी ने किसी गांव को बेरोजगार कर दिया हो, उसे रोजगार देना पहली जरूरत हो। बेहतरी और जरूरत के इस पहले काम को किसी भी हालत में असफल नहीं देना है। इसकी तैयारी चाकचैबंद रहे। 

इसके बाद हम देखेंगे कि काम का प्रवाह इतनी तेजी से बह निकलेगा कि उसे संभालने के लिए हमें कई ईमानदार हाथों को अपनी भूमिका में लाना पङेगा। फिर धारा स्वयमेव असल काम की ओर मुङ जायेगी। सबसे ज्यादा कष्ट महसूस कर रही नदी किनारे की आबादी के क्षेत्र में तालाबों, बरसाती नालों, बागीचों, चारागाहों, वन आदि को ठीक ठाक करने में लगें। बरसाती नालों में आने वाले कचरे को नदी में आने से पहले ही रोक देने के लिए जीवाणु, बांस, वनस्पति, पत्थर आदि की सहायता से शोधन का प्राकृतिक संयंत्र बना दें; बिना बिजली, बिना रसायन! 

सोख्ता पिट, गांव का ठोस कचरा, कम पानी और बिना रसायन की ज्यादा मुनाफे की जैविक खेती… तमाम काम इस रास्ते मे मददगार हो सकते हैं। यदि नदी गर्मियों में सूखी रहती है, तो नदी के भीतर मोङों पर कुण्ड बनायें। नदी किनारे पर छोटी वनस्पति और पंचवटी के इतने बीज फेंके कि घोषित किए बगैर ही वह सघन हरित क्षेत्र में तब्दील हो जाये। ये हरियाली नीलगायों को बसेरा देकर हमारे खेतों में जाने से रोक देगी। कुण्डों में रुका पानी मवेशी पीयेंगे। बच्चे नदी में किलकारियां मारना सीख जायेंगे। नदी की उदासी मिटने लगेगी। अब नदी को दी दवाई असर करने लगेगी। जलकुंभी प्रमाण है कि नदी का पानी ठीक से चल नहीं रहा। उसे निकाल फेंके। रुके पानी को चला दें। नदी के भीतर कचरा खाने वाले बङे जीव और छोटे जीवाणुओें की लंबी सफाई फौज तैनात कर दें। नदियों में काॅलीफाॅर्म का बढता आंकङा कह रहा है कि मल नियंत्रण भी छोटी चुनौती नहीं। 

चौथा चरण : सत्याग्रह हो अंतिम साधना

सत्याग्रह का पहला और सबसे जरूरी काम है – सत्य का आग्रह करना। दूसरा काम है – जो कुछ पहले मौजूद है, उसमें से उचित प्रावधाानों को निकालकर लागू करा देना। 

कृषि क्षेत्र भी नदी प्रदूषण का दोषी है। नदी किनारे के मठ-मंदिर और आश्रमों की जिम्मेदारी प्रेरक व नियंत्रक..  दोनो की है। वे अपनी जिम्मेदारी से चूक गये हैं। अतः उनसे स्वानुशासन व जिम्मेदारी के निर्वाह का आग्रह करना ही होगा। अब मूर्ति विसर्जन से नदी खुश नहीं है। यह सत्य को कहना ही पङेगा। नगरपालिका और उद्योगों को भी नदी का दुश्मन मानकर हम उनसे बात करने से भी परहेज करते हैं। भूल जाते हैं कि बात करने से बात बनती है। समझें कि इनकी समस्या क्या है ? हो सकता है कि लाभ के साथ शुभ का कोई संयोग बैठ जाये। हो सकता है कि हम उन्हे कोई समाधान दे सकें; वरना् अंतिम समाधान तो है ही: उद्योग, मल और शोषक नदी से दूर जायें तथा रसायन खेती से।

मनरेगा के तहत् तालाबों के पुनरोद्धार पर कई अरब रुपया सिर्फ उचित जगह और उचित डिजायन के अभाव में बेनतीजा साबित हुआ है। यह न होने दें। सही डिजायन और सही जगह के चुनाव में सहयोग करें। ग्राम पंचायत को नदी प्रदूषण मुक्ति के काम में लगाने की उ. प्र. शासन की एक अच्छी योजना है। पिछले 15 वर्ष के दौरान भूजल संचयन को लेकर कितने ही शासनादेश जारी हुए हैं। सपा के पिछले शासनकाल के दौरान जारी तालाबों की कब्जा मुक्ति और प्राकृतिक स्वरूप में लौटाने की कितनी शानदार अधिसूचना है! राष्ट्रीय हरित ट्रिब्युनल ने बिल्डरों द्वारा की जा रही भूजलनिकासी को नियंत्रित करने और यमुना में ठोस कचरा डंप होने पर लगाम लगाने को लेकर अच्छे फैसले दिए हैं। कभी इन सब को तलाशकर लागू करा दें। बस! आप देखेंगे कि यहीं से नदी की निर्मल कथा लिखने और बांचने…दोनो का काम स्वतः फैल जायेगा। क्या हम करेंगे ?


अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-92
9868793799

Feb 5, 2017

पीहर वृक्ष दान परम्परा की खीरी जनपद से हो रही है शुरुआत

पर्यावरण को संवर्धित करने की एक नई मुहिम- पीहर वृक्ष दान परम्परा।

दिनांक 6 फरवरी सायं गोला के गौरी बैंक्विट हाल में दुधवा लाइव अंतराष्ट्रीय जर्नल द्वारा श्री गोकरन सेवा समिति के सहयोग से पीहर वृक्ष दान परम्परा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें कन्या को 7 पौधे जनपद के गणमान्य व्यक्तियों द्वारा सौंपे जायेंगे, और इस आशा के साथ की वह सही जगह रोपित हो, पल्लवित हो और फिर एक दिन विशाल वृक्ष बने जिस पर सैकड़ों पक्षी अपना बसेरा बना सकें।
दुधवा लाइव के संस्थापक, वन्य जीव विशेषज्ञ कृष्ण कुमार मिश्र ने बताया कि, वह 6 वर्ष पहले शुरू की गई अपनी मुहिम गौरैया बचाओ जन-अभियान की तरह पीहर वृक्ष दान परम्परा की मुहिम को भी जन अभियान बनाने के प्रयास में हैं, ताकि मानव सभ्यता में पर्यावरण संतुलन बना रहे और पारिस्थिकी तंत्र के सभी फैक्टर्स में समन्वय स्थापित हो, उन्होंने कहा कि वृक्ष, जंगल और पशु पक्षी सुरक्षित होंगे तो मानव सभ्यता भी सुरक्षित रहेगी, वन और वन्य प्राणियों के सरंक्षण में ही मानव कल्याण का रहस्य छुपा है।

कार्यक्रम के आयोजक पर्यावरण प्रेमी  मदन चंद मिश्र की देख रेख में गोला स्थित कार्यक्रम स्थल में एक मंच जो पुष्प वाटिका से सुसज्जित होगी पर जनपद के महत्वपूर्ण व्यक्तियों व् कन्या के घर वालों द्वारा वृक्ष दान के कार्यक्रम का आयोजन होगा, उसके पश्चात शास्त्रीय संगीत व् लोक संगीत के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे जिनमे जल जंगल जमीन की महत्ता को गीतों के माध्यम से प्रसारित किया जाएगा।
जनपद में यह अपनी तरह की अनूठी परम्परा की शुरुवात होगी, जिसमें वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ वी पी सिंह, हिंदी प्रवक्ता डॉ सत्येंद्र दुबे, सौजन्या संस्था की संस्थापिका डॉ उमा कटियार, शिव कुमार गौड़, एवं वन विभाग के लोग तथा नगर के पर्यावरण प्रेमी मौजूद रहेंगे।
दुधवा लाइव डेस्क 

Jan 3, 2017

कुंवर बिली अर्जन सिंह की पुण्यतिथि पर दुधवा नेशनल पार्क में बाघ सरंक्षण पर कार्यशाला




दुधवा नेशनल पार्क। पलिया - खीरी। पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह की पुण्यतिथि पर दुधवालाइव डॉट कॉम द्वारा बिली की स्मृति में वन्य जीव सरंक्षण व् दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना में बिली का योगदान विषय पर दुधवा नेशनल पार्क के आडिटोरियम में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें लखीमपुर के कानपुर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की, ये सभी छात्र बेस्ट बॉयो क्लासेज़ संस्था के तहत दुधवा नेशनल पार्क और टाइगर मैन बिली अर्जन सिंह पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट के साथ वहां उपस्थित हुए, ज्यूरी द्वारा चयनित रिपोर्ट्स में नेहा वर्मा, स्नेहा वर्मा, देवेंद्र भार्गव की रिपोर्ट्स को चुना गया, कार्यक्रम में मुख्य अतिथि दुधवा नेशनल पार्क के बेलरायां डिवीजन के एस डी ओ नरेंद्र उपाध्याय ने हॉल में उपस्थित विद्यार्थियों व् वन्य जीव प्रेमियों को नेशनल पार्क, सैंक्चुरी, बायोस्फीयर रिजर्व में क्या फ़र्क है इस पर विस्तार से चर्चा की, साथ ही बिली द्वारा बाघ व् तेंदुओं के पुनर्वासन के प्रयोग की सराहना की। श्री उपाध्याय ने बिली की बाघिन तारा, तेंदुआ- प्रिंस, जूलिएट व् हैरिएट के बारे में भी बताया और बिली के साथ रहे, उन्होंने कहा कि इन जीवों पर बनी फिल्म नई पीढ़ी को देखना चाहिए, ताकि लोग वन्यजीवन के महत्व को समझ सके। 



कार्य शाला की अध्यक्षता कर रहे पलिया के पूर्व ब्लाक प्रमुख गुरप्रीत सिंह जॉर्जी ने कुंवर अर्जन सिंह के संस्मरणों को सुनाया जिसमे जीवों और जंगलों के प्रति उनकी दीवानगी का ज़िक्र किया, और दुधवा टाइगर रिजर्व से गुजरने वाली सुहेली नदी की सिल्ट के कारण हुई दुर्दशा पर भी चिंता व्यक्त की। इस कार्यक्रम के संयोजक वन्य जीव विशेषज्ञ कृष्ण कुमार मिश्र ने बिली को श्रद्धांजलि देते हुए सभी को बताया कि बिली साहब कपूरथला स्टेट के राजकुमार थे और द्वतीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में उन्होंने हिस्सा भी लिया था, उन्हें  बाघों और तेंदुओं के सरंक्षण के लिए पद्मश्री, पद्मभूषण, व् पॉल गेटी जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चूका हैं, श्रीमती इंदिरा गांधी और बिली के मध्य खीरी के जंगलों के बाघों और उनकी सुरक्षा के लिए पत्राचार का जो सिलसिला कायम था उसी के चलते बिली के अनुभवों और उनकी मांग पर श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1977 में दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना की। 



कार्यक्रम में सभी सहभागी विद्यार्थियों के लंच की व्यवस्था वन्य जीव प्रेमी संजय नारायण की.

कार्यशाला में जीव विज्ञान प्रवक्ता बृजेंद्र प्रताप सिंह, पत्रकार प्रशांत पांडेय, अब्दुल सलीम, रोटेरियन विजय महेन्द्रा, देवेंद्र चौधरी ने बिली अर्जन को श्रद्धांजलि दी और उनके वन्य जीव सरंक्षण के कार्यों को नई पीढ़ी द्वारा आगे बढ़ाने का संदेश दिया। 


बिली अर्जन सिंह का देहावसान 94 वर्षबकी आयु में एक जनवरी 2010 को हुआ था।

कार्यक्रम के अंत में के के मिश्र ने दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन एवं स्टाफ को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कार्यशाला में सहयोग व् सहभागिता के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया. 

दुधवा लाइव डेस्क 

Dec 9, 2016

रूपक डे बने उत्तर प्रदेश के प्रमुख मुख्य वन सरंक्षक


बीसवीं सदी के आखिर में रूपक डे दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर के पद पर भी रहे है आसीन.

9 दिसम्बर -लखनऊ:  आई ऍफ़ एस  डॉ. रूपक डे को उत्तर प्रदेश का नया प्रमुख मुख्य वन संरक्षक  बनाया गया है। जबकि उमेन्द्र शर्मा को मुख्य वन्य जीव सरंक्षक का कार्यभार दिया गया है, एक बार फिर रूपक डे को उत्तर प्रदेश के प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ़ फारेस्ट के पद की अहम् जिम्मेदारी सौंपी गयी है, विदित हो की रूपक डे उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क के भी फील्ड डायरेक्टर के पद पर तैनात रहे हैं, उनकी अभिरुचियों में वन्य जीव सरंक्षण के साथ साथ लेखन और फोटोग्राफी प्रमुख  हैं .

दुधवा लाइव डेस्क 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

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क्षमा करो गौरैया...

Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen  संस्मरण गौरैया और मैं -- (3) ....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी बात उस समय की है जब घर के नाम पर ...

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!