डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 6, 2011

यहाँ कैसे हासिल हों इन्हें तालीम का कानूनी हक ?


यहां कैसा लागू हो शिक्षा का कानूनी अधिकार!
- टांगिया गांव में न स्कूल है, न टीचर
- दिन फसलो को बचाने में गुजारते हैं बच्चे अपना वक्त

टांगिया-बिजुआ। दुधवा के संस्थापक विली अर्जन सिंह ने जंगल के बाघो के बचाने के बाबत कहा करते थे कि बाघ अगर वोट देते तो उनकी भी सुनी जाती। लेकिन टांगिया समुदाय के लोग इन्सान है, और वोट भी देते हैं , फिर क्यों खामोश है इनकी आवाज। ६० के दशक में जब टांगिया खीरी लाये गये तो वह निरक्षर थे, तब से इनकी एक पीढ़ी गुजर गयी, अगर कुछ युवाओं को छोड़ दें तो दूसरी पीढ़ी अशिक्षा का कलंक लिए जिन्दा है, अब तीसरी पीढ़ी भी तैयार हो रही है, लेकिन शिक्षा उनके लिए जरूरी नही बन सकी। ये हालात तब हैं जब देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो चुका हो। लेकिन टांगिया गांव के  लिए ये अधिनियम सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गये हैं। इस गांव में ६-१४ वर्ष के ८० बच्चे हैं, जिन्हें आज भी किसी अध्यापक का इन्तजार है। जंगल के भीतर स्कूल बनाने में वन महकमा अडग़ां है। शिक्षा विभाग ने अनौपाचारिक केन्द्र के जरिए इन बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था, लेकिन अब केन्द्र भी ठप है। ऐसे में इन बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिया जाना वाकई बड़ा सवाल बन गया है। 


पल्हनापुर वन टांगिया गांव के बच्चों के लिए स्कूल और किताबें किसी ख्वाब के माफिक  है। ६-१४ वर्ष के लगभग ८० बच्चे शिक्षा अधिनियम के तहत शिक्षित होने के हकदार हैं। टांगिया गांव से ६ किमी दूर पल्हनापुर के प्राथमिक विद्यालय में कुछ बच्चों के नाम जरूर पंजीकृत हैं। लेकिन ६ वर्ष के इन नौनिहालों के लिए ६ किमी जंगल का सफर तय करना आसान नहीं है। लेकिन फिर भी कुछ बड़े बच्चे जान जोखिम में डाल स्कूल का सफर तय करते हैं।
टांगिया विकास समिति के अध्यक्ष रामचंद्र बताते हैं कि वन महकमे ने वर्षो पहले गांव के बच्चों को शिक्षित करने के लिए एक केन्द्र खोला था। जिसे बाद में बंद कर दिया गया। वहीं हाल ही में शिक्षा विभाग की तरफ से चलाया जा रहा अनौपचारिक केन्द्र भी बंद है। 



खेतो की रखवाली में कटता है बच्चों का वक्त
जब उम्र पढ़ाई की है, तब इन्हे स्कूल नही नसीब है, इस गांव के बच्चों का दिन स्कूल के बजाय अपने खेतों की रखवाली में जाता है, गांव खेत सब जंगल में है, इसलिए खेतो में बंदरो का जमावड़ा रहता है, ये मासूम सवेरे से शाम खेतो में पड़ी फूस की झोपडिय़ों में गुजारते हैं।


पूरे कुनबे में नही हुआ कोई ग्रेजुएट
इसे विडम्बना नही तो और क्या कहेंगे ,टांगिया बिरादरी के ४०७ लोगों के इस कुनबे में कोई स्नातक नहीं है। गांव के तीन लोग प्राइवेट तौर पर स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं।


अब्दुल सलीम खान (लेखक युवा पत्रकार है, वन्य-जीवन के सरंक्षण में विशेष अभिरूचि, जमीनी मसायल पर तीक्ष्ण लेखन, खीरी जनपद के गुलरिया गाँव में निवास, इनसे salimreporter.lmp@)gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

4 comments:

ंाीजंत ेंपाी said...

यह है हमारे देश में सरकारी तंतर की कार्यशैली ा

pr said...

यह बताता है कि हमारे देश में सरकारी योजनाओं का क्‍या हाल हैा

akhtar said...

यह बताता है कि हमारे देश में सरकारी योजनाओं का क्‍या हाल हैा

PAWAN said...

is se sarkaar ki yojnao ki pol khulti ha

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