डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 10, 2011

दुधवा नेशनल पार्क का एक यात्रा संस्मरण

 भारतीय बाघ: फ़ोटो ©सतपाल सिंह
दुधवा नेशनल पार्क में वो खुशनुमा पल 
दुधवा में बाघों की तादाद बढ़ी
तराई के घनों जंगलों में भी खूब दर्शन दे रहे हैं वनराज

 दुधवा नेशनल पार्क के जनक बिली अर्जुन सिंह जिनको शायद कौन नही जानता ? कुछ दिन पहले ही मैंने उनके बारे में पढ़ा तो ऐसा लगा कि बिली अर्जुन सिंह जिन्होने अपना सारा जीवन वन व वन्य जीवों के संरक्षण में समर्पित कर दिया। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिला के जंगल के एक हिस्से को संरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिलाने का कार्य बिली अर्जुन सिंह ने किया जिसे आज दुनिया दुधवा नेशनल पार्क के नाम से जानती है। ऐसी महान शख्सियत के बारे में पढ़कर आज मैं बहुत प्रभावित हुआ। बिली और जंगल के बारे में पढ़कर मुझे भी जंगल में जाने की रूचि हुई.. ।
दुधवा जंगल: फ़ोटो ©सतपाल सिंह

दुधवा जंगल की यात्रा का प्रस्ताव मिला तो बिली अर्जुन सिंह और उनके इस जंगल को देखने का मैने निश्चय किया। हमने शाम को पूरी तैयारी कर ली क्योंकि अगली सुबह जल्दी हमें निकलना था। हम चार दोस्त सतपाल सिह,रमाकान्त कुशवाहा , हरमनदीप सिंह और मैं । हम मोहम्मदी से अपनी गाड़ी  से सुबह के ३.३० बजे निकले। मैने  गाड़ी को ठीक तीन घण्टे बाद ६.३० बजे दुधवा नेशनल पार्क में पहुंचा दिया। ठंड बहुत थी और सर्द हवा की वो ठन्डी सुबह ने हमको हिला दिया था। जल्दी से सतपाल (जो वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर है  सौभाग्य से हमारे साथ था।) ने  हमे चलने के लिए कहा। हम उस समय कैंटीन में बैठे चाय का आर्डर देने वाले थे, कि सतपाल ने हमें तुरन्त चलने के लिए कहा पर हमने कहा पहले चाय पी लेते हैं, लेकिन सतपाल ने हमें चाय आकर पीने की सलाह दी उसने हमें बताया कि अगर चाय अभी पियगे तो शायद कुछ छूट सकता है। उसकी वह बात मुझे उस समय समझ में नही आयी पर जब हमारी गाड़ी  जंगल के लिए निकली  कुछ ही समय बीता बीता था कि हमें जंगल में टाइगर से साक्षात्कार हो गया, ऐसा हमने सोचा न था कि इतनी जल्दी १० मिनट के अन्दर टाइगर के दर्शन हो जायेंगे। हमारी गाड़ी रूट नं० १ पर चल रही थी और गाइड  हमें जंगल के बारे में कुछ पुरानी बाते बता रहा था, कि अचानक उसने हमें एक तरफ इशारा करके गाड़ी धीमी करने के लिए कहा, हमने देखा कि एक टाइगर  रोड क्रास करने जा रहा था, वह हमारी गाड़ी देखकर झाड़ी के पास बैठ गया। हम थोड़ा और करीब गये यह नजारा मेरे के लिए नया था। जिस्म में ठण्ड का अहसास कम होने लगा था। इतना रोचक और हैरतगंज नजारा पहले कभी नही देखा था। मुझे तो यकीन नही हो रहा था कि जंगल का शेर हमारे सामने बैठा है। फिर क्या था सतपाल ने अपने कैमरे से कई अदभुत दृष्य कैमरे में उतार लिये। कुछ क्षण बाद दूसरी गाड़ी आती देख टाइगर हमारी आंखो से ओझल हो गया। दूसरी गाड़ी में सवार पर्यटक हमसे पूछने लगे कि क्या था। हमने उन्हें बताया कि टाइगर था। यह सुनकर वह सब बगैर देखे ही खुश हो गये क्योंकि जंगल में लोग सबसे ज्यादा टाइगर को ही देखने आते है। ऐसा मेरा मानना था। हमने दोबारा गाड़ी को रूट नं० १ पर दौड़ा दिया। उस दिन  मैंने बहुत से वन जीव देखे जैसे स्पाटेड डियर  झुण्ड, दलदली (स्वाम्प डियर) हिरन बहुत से नये पक्षी और मगरमच्छ को भी देखा।  फ़िर हम सब वापस आकर कैंटीन में बातें कर रहे थे।
चीतल: फ़ोटो ©सतपाल सिंह
  हमें पता लगा कि आज की सुबह में दुधवा में सिर्फ हम लोगों को ही टाइगर के दर्शन हुए हैं।  कैंटीन में बैठे दूसरे पर्यटकों ने हमसे पूछा कि हमें टाइगर के दर्शन कैसे और कब हुए। हमनें उन्हें वह सारा वाकया बताया। यह सब सुनकर उनकी आंखो में चमक थी।  
...शाम के वक्त सुबह के अपेक्षा ज्यादा पर्यटक थे हम सब जंगल में सलूकापुर , सोनारीपुर, बाकेंताल और एस०डी० सिंह रोड घूमें। शाम को हम कुछ ज्यादा नही देख सके पर हमने कोशिश बहुत की कि हम दोबारा टाइगर को देखे पर शाम के वक्त की गाड़ियों का शोर अधिक होने के कारण शायद हम कामयाब नही हो सके। हम शाम को फ़िर दुधवा कैंपस  आ गये। हमने पता लगाया कि शायद किसी और पर्यटक को टाइगर दिखा हो पर ऐसा नही था। मैं बहुत खुश था, क्योंकि उस दिन सिर्फ हम लोग ही लकी पर्सन थे, जिन्हें टाइगर के दर्शन हुए। जंगल में एक दिन कैसे कट गया पता ही नही चला। ना घर की याद आयी न  अपने व्यवसाय की। शाम के ६.३० बज चुके था।  वह रात बहुत सर्द थी पर हमें टाइगर का गर्म कर देने वाला  नज़ारा याद था। 
फ़ोटो © सतपाल सिंह

 दुधवा में दूसरा दिन

गैंण्डा: फ़ोटो © सतपाल सिंह

 आज हम सब हाथी पर बैठकर गैण्डे को देखने के लिए निकले, कुछ समय बीतने के बाद हम आपस में कल की बाते कर ही रहे थे, कि हमें महावत जगरूप ने चुप होने के लिए कहा और एक तरफ इशारा किया और धीरे से कहा वह देखो टाइगर बैठे है। कानों में टाइगर नाम की आवाज सुनकर ही कान खड़े हो गये,नजारा ही ऐसा था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नही कर सकता था एक नही दो टाइगर हमारे ठीक सामने करीब ५० से ५५ फ़ीट की दूरी पर बैठे थे। सतपाल ने फोटो खींचना शुरु किया। हमने महावत को टाइगर के और करीब हाथी ले जाने को कहा जहां दोनो टाइगर बैठे थे। अब हम उनसे २० से २५ फ़ीट की दूरी पर थे। 

काफ़ी तस्वीरें खिंच जाने के बाद, अब हमें महावत ने वहां से चलने के लिए कहा क्योंकि यह अदभुत दृष्य दूसरे पर्यटको को भी देखने को मिले। हम वापस आगे बढ़े ही थे की हमें कुछ पर्यटक  मिले हमनें उन्हें बताया कि हमें वहां टाइगर देखने को मिले हैं। उन्होंने हमें साथ में चल के बताने के लिए कहा और हम तीनों हाथी लेकर एक बार फिर उसी जगह पर आ गये। ठीक उसी अवस्था में वह टाइगर अभी भी वहीं बैठे थे, मानो हमारा ही इंतजार कर रहे हों पर इस बार हमारे साथ दूसरें पर्यटक के बच्चे यह नजारा देखकर डर गये। वह सब आपस में बाते करने लगे। महावत ने उन्हें चुप होकर देखने के लिए कहा। थोड़ा शोर होने से अब टाइगर की नजर हम पर थी। तीनों हाथियों में से एक हथिनी टाइगर को देखकर उसकी ओर बडी और चिगाड़ने लगी इस पर टाइगर भी नाराज होकर जबाव में दहाड़ने लगा। हथिनी के साथ दूसरे हाथी भी टाइगर को देखकर चिंघाड़ने लगे। ऐसा दिल दहला देने वाले  दृष्य के कुछ हिस्से हमने कैमरे में कैद किये। जंगल में हाथी की चिगाड़ने और शेर के दहाड़ने से जंगल में आवाजें गूंज रही थी। दोनो टाइगर अब झाड़ियों के पीछे होते चले गये थे। आधे मिनट का यह दृष्य सच में दिल दहला देने वाला था। फिर हम सबने वहां से निकल जाने के बाद कुछ दूरी पर  गैण्डों को देखा। कुछ समय बाद हम सब  वापस आ गये। जंगल का दृष्य अदभुत था।  आज मैने सोचा की जंगल की लाइफ उन वन्य जीवों के लिए बहुत अच्छी है।  जिन्हें देखकर हम इंसान सुखद एहसास करते हैं।
फ़ोटो © सतपाल सिंह
आओं हम सब इन वन्य जीवों की रक्षा का संकल्प लें।
धन्यवाद!


हरभजन सिंह (लेखक पेशे से इलेक्ट्रानिक्स के व्यवसायी हैं, जिला खीरी के मोहम्मदी में निवास, वन्य जीवन के प्रति अभिरूचि, थियेटर व फ़िल्मों से जुड़ाव, बालीबुड़ में कई वर्षों का कार्यानुभव, इनसे मोबाइल 09580506763 पर सम्पर्क कर सकते हैं।  )

 (सभी चित्र  साभार सतपाल सिंह  वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र, इनसे satpalsinghwlcn@gmail.com पर सम्पर्क  कर सकते हैं )

2 comments:

anurag said...

God chooses the people who get to see the tiger in our terai forests.
Once a forest Ranger said to me "jungle mein sher sirf sheron ko dikhta hai"

marie muller said...

it was a very very good experience!!!
thanks for sharing good feelings and amazing photos!!!!

yes,once you see a tiger you never forget!!

i hope you and your friends could travel every inch of DUDHWA
so we can travel here with you!!!

Post a Comment

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

Featured Post

क्षमा करो गौरैया...

Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen  संस्मरण गौरैया और मैं -- (3) ....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी बात उस समय की है जब घर के नाम पर ...

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!