International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Sep 24, 2010

भाई हम तो द्विभाषिए हो चले!

हम द्वि-भाषिए होने की तरफ़ रूख कर रहें हैं:
क्या ये आप को पसन्द आयेगा:
 साथ में
दुधवा लाइव ई-पत्रिका का संक्षिप्त यात्रा वृतान्त

हम आप को बताना चाहते हैं, कि वन्य जीवन व पर्यावरण में हिन्दी की प्रथम ई-पत्रिका "दुधवा लाइव" (Founded January 2010) http://dudhwalive.com अब द्विभाषी होने की तरफ़ रूख कर रही है, इसके पीछे कुछ मलाल भी हैं और खुशी भी, वन्य जीवन की विधा में हिन्दी वालों की अनुपलब्धता, और अंग्रेजी का एकाधिकार! हमने तमाम प्रयासों के बावजूद अनुवाद का सहारा लेते हुए इसे प्रमुखता से पूर्ण रूप से हिन्दी को समर्पित किया है, परन्तु कन्टेन्ट की कमी, और अनुवाद का किरकिरापन हमें इसे द्विभाषी करने पर मज़बूर कर रहा है। इसका एक फ़ायदा अवश्य दिखाई दे रहा है, हम अपनी और अपने देश की बात इस वर्चुअल माध्यम से दुनिया के पटल पर जोरदार ढ़ग से रख सकेंगे। फ़िर हमारा आप सभी से अनुरोध है, कि वन्य जीवन व पर्यावरण की बात हम मुख्यत: अपनी ही भाषा में करे, इसके लिए हमें आप का सहयोग चाहिए।

हमने हिन्दुस्तान और दुनिया के तमाम प्रतिष्ठित लोगों से मशविरा किया, जिन्होंने वन्य जीव सरंक्षण में महारथ हासिल की है, इस सन्दर्भ में आई एफ़ एस और वन्य जीव फ़ोटोग्राफ़र व भारत सरकार के कई व्यक्तियों से सलाह ली कि आखिर दुधवा लाइव को हिन्दी के पथ पर ही अग्रसर करे या कोई अन्य विकल्प का सहारा लिया जाए। जो नतीजे मोबाइल मैसेज व फ़ोन द्वारा प्राप्त हुए, वो जरूर चौकाने वाले थे, किन्तु तर्क वाजिब था, कि वन्य जीवन पर हिन्दी में मटेरियल की कमी, आम आदमी का इस विधा से महरूम होना, और हिन्दी भाषी लोगों की अभी भी कम्प्यूटर व इन्टरनेट से दूरी!
उनके कान अभी भी इसी का हुक्म मानते हैं!

जो सबसे अहम बात है कि हमारे देश में जिनके हाथों में सत्ता है, जो पॉलिशियां बनाते है, उन्हे या तो हिन्दी आती नही, और आती भी है, तो वह हिन्दी पढ़ना या लिखना नही चाहते! अफ़ासोस कि इस मुल्क  का सरबरा ही हिन्दी नही जानता! अब ऐसे में अगर हमें अपनी बात उन कानों तक पहुंचानी हों जों अंग्रेजी सुनने के आदी हो चुके हैं या गुलाम! ...इस भाषा का अभी भी इस मुल्क में कॉलोनियल दौर का प्रभाव लोगों के दिमाग पर बाकी है, सो वे इसी की सुनते और मानते हैं! अब ऐसे में ये दुधवा लाइव टाइगर, और चीते की बात हिन्दी में करे तो भला कौन सुनेगा, फ़िर वो सुने भी क्यों, कि इस विधा में सरकार और कथित वन्य जीव सरंक्षक व शोधार्थियों को मिलने वाला पैसा भी उसी जमीन और उसी जबान के मालिकों द्वारा मिलता है, जो अंग्रेजी बोलते हैं! इस खैरात की खाने वाले तो अपने माथे उन्ही जबान वालों के सामने झुकायेंगे जो इन्हे पैसा देते हैं इनके तमाम किमियागिरी के उपकरण, जीप, और खाना उन्ही पैसो से पूरा पड़ता हैं।

अंग्रेजी एक महत्वपूर्ण भाषा है, कदाचित इसके गौरव को दुनिया का कोई शख्स आँख नही दिखा सकता है, क्योंकि कभी इस भाषा के लोगों ने पूरी दुनिया पर राज ही नही किया बल्कि उस भू-भाग के सारे ज्ञान को निचोड़ कर अपनी भाषा में संकलित किया, आज हमे अपना इतिहास, भूगोल, विज्ञान, साहित्य सभी कुछ उनकी लाइब्रेरियों में तलाशना पड़ता है। ये विडंबना है कि हमने अपनी जबान को ही संमृद्ध नही बनाया, नतीजे हमारे सामने है, शुक्र है गूगल या अन्य कम्पनियों का जो मुफ़्त का स्थान देकर हिन्दी के उन्न्ययन ने में अप्रत्यक्ष रूप से हमारी मदद कर रही है, आज ब्लॉग के माध्यम से हमारी भाषा का गर्त में पड़ा ज्ञान हमारे लोगों के समक्ष है!

दुधवा लाइव को इनसे मिला प्रोत्साहन

बात बढ़ रही है, इस विषय पर तस्किरा कभी और! हाँ दुधवा लाइव के इस प्रयास को वन-अधिकारियों से लेकर हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने सराहा! इस फ़ेहरिस्त में  डॉ० राजेश गोपाल (IGF) इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स भारत सरकार, श्री क़मर क़ुरेशी वैज्ञानिक (WII) वन्य जीव संस्थान देहरादून भारत, वन्य जीव फ़ोटोग्राफ़र व सेन्ट्रल ज़ू ऍथार्टी से सम्बद्ध श्री हिमांशु जी, गोरखपुर में चीफ़ कन्जर्वेटर श्री एम०पी० सिंह जी, दुधवा के पूर्व डाइरेक्टर श्री जी०सी० मिश्र जी, वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन सोसॉइटी की निदेशिका व बाघ सरंक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बेलिन्डा राइट, ने दुधवा लाइव के प्रयासों की प्रशंसा की व भविष्य में आशिर्वाद व मार्गदर्शन का वायदा किया है।

 NDTV में कार्यरत एंव पत्रकारिता जगत में भारत में एक जानी मानी शख्सियत श्री रवीश कुमार जी ने दुधवा लाइव को हिन्दुस्तान में अपने गेस्ट कॉलम में जगह देकर हिन्दी भाषी क्षेत्र में चर्चित कर दिया।  , अन्तर्जाल पर स्थापित हिन्दी के पुराधाओं में छत्तीसगढ़ में रहने वाले समाजसेवी व साहित्यकार श्री शरद कोकास ब्लॉग महागुरू श्री बी० एस० पाबला जीहिन्दी मीडिया डॉट इन की निदेशिका शिवानी जी ने दुधवा लाइव के सन्दर्भ में लिखा "प्रकृति से इंसानियत को जोड़ने वाली एक शानदार साईट", छत्तीसगढ़ रायपुर से प्रकाशित हो रही पत्रिका उदन्ती की संपादिका डॉ० रत्ना वर्मा जी, मुम्बई से मैग्ना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डिग्निटी डॉयलाग की सहसंपादिका मीनू जैन जी का सुन्दर व सार्थक सहयोग प्राप्त हुआ।

ब्लॉग बोले:
 साइन्स ब्लागर्स एसोशिएसन के लेखक सलीम खान ने लिखा दुधवा लाइव की गौरया सरंक्षण की मुहिम पर पूरा एक लेख प्रस्तुत कर डाला।
परपंच ब्लॉग के आबिद रज़ा ने दुधवा लाइव की बातों को अपने पन्नों पर कुछ ऐसे लिखा "आओ बचाये इन नन्ही जानों को।"

गौरैया अभियान से जुड़ी कुछ प्रमुख खबरे:

दैनिक जागरण ने गौरैया बचाने के हमारी मुहिम को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया।

उदन्ती पत्रिका ने गौरैया के लिए दुधवा लाइव के प्रयासों को अपने पन्नों पर जगह दी।
हिन्दुस्तान में संपादकीय पृष्ठ पर रवीश कुमार जी ने कहा कि "गौरैया के बिना सूना घर आंगन"

दुधवा लाइव के कलमकार व सहयोगी:
हम सब चल रहे हैं एक साथ

हमारे लेखकों में अरूणेश दवे रायपुर छत्तीसगढ़,  देवेन्द्र प्रकाश मिश्र पलिया खी्री, डॉ० प्रमोद पाटिल महाराष्ट्र, आदित्य रॉय अहमदाबाद गुजरात, सलीम गुलरिया बिजुआ खीरी, धीरज वशिष्ठ नई दिल्ली, फ़िल डेविस ग्रेट ब्रिटेन, धर्मेन्द्र खण्डाल रणथम्बौर राजस्थान, कैप्टन सुरेश सी शर्मा नई दिल्ली, सीजर सेनगुप्त मुम्बई, सुशान्त झा (जर्नलिस्ट) रिषि रंजन काला (आज तक टुडे) नई दिल्ली, डॉ मैरी मुलर (Marie Muller) सॉओ पॉलो ब्राजील, हिन्दी के कथाकार डॉ० देवेन्द्र लखीमपुर, विवेक सेंगर (ब्यूरो हिन्दुस्तान दैनिक खीरी), प्रशान्त पाण्डेय(ब्यूरो ई०टीवी० खीरी) , सुबोध पाण्डेय(हिन्दुस्तान दैनिक), गंगेश उपाध्याय(हिन्दुस्तान दैनिक), मनोज शर्मा,(लाइव इंडिया), महबूब आलम पलिया, रिषभ त्यागी  (ब्यूरो राष्ट्रीय सहारा), श्यामजी अग्निहोत्री (ब्यूरो सहारा समय), विजय मिश्रा( राष्ट्रीय सहारा), मनोज मिश्र (ब्यूरो दैनिक जागरण खीरी) पूर्णेश वर्मा (दैनिक जागरण खीरी),  ब्रजेश द्विवेदी (दैनिक जागरण शाहजहाँपुर) मयंक बाजपेयी (हिन्दुस्तान  दैनिक)  सर्वेश कटियार (हिन्दुस्तान दैनिक मितौली), राजन शुक्ला (अमर उजाला मितौली) एस पी सिंह (राष्ट्रीय सहारा मितौली) रमेश शुक्ल (दैनिक जागरण कस्ता), अमित बाजपेयी (हिन्दुस्तान दैनिक कस्ता), सतपाल सिंह वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र मोहम्मदी खीरी, रागिनी रोजी रोटी संस्था लखीमपुर, रामेन्द्र जनवार समाज सेवी/लेखक,  आशीष त्रिपाठी (ब्यूरो हिन्दुस्तान मुरादाबाद),  चारू चंचल शोध छात्रा लखीमपुर,  रेखा सिन्हा राष्ट्रीय सहारा लखनऊ, डॉ सत्येन्द्र दुबे प्रवक्ता युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर, अमित गुप्ता मितौली समाजसेवी, उमेश श्रीवास्तव धौरहरा खीरी के अलावा हमारे स्थानीय मित्रों ने अपने विचारों को लेखों के माध्यम से हमारे साथ साझेदारी की।  पत्रकार व वन्य जीव प्रेमियों की लम्बी फ़ेहरिस्त हैं जिन्होंने दुधवा लाइव का सहयोग व पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं, हम उनके सदैव आभारी हैं।

 सूचना प्रसार के प्रमुख माध्यमों का योगदान

हिन्दी के प्रमुख अखबारों, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, डेली न्यूज एक्टीविस्ट, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा के अतिरिक्त आकाशवाणी व इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल्स ने दुधवा लाइव को प्रमुखता से प्रकाशित/प्रसारित कर वन्य जीवन के महत्व तक जन जन तक पहुंचानें में हमारी निरन्तर मदद कर रहे हैं। भारत में जल संपदा पर जागरूकता फ़ैलाने का भागीरथी प्रयास कर रहा  इंडिया वाटर पोर्टल ने दुधवा लाइव को अपने पृष्ठों पर विशेष स्थान दिया है। मराठी अखबार लोकप्रभा ने अपने पन्नों पर दुधवा लाइव व उसके लेखों को जगह दी, साथ ही, सीतापुर के आई टी के छात्रों ने सीतापुर येलोपेजेज डॉट कॉम के शीर्ष पर दुधवा लाइव को स्थान प्रदत्त किया। इसके अतिरिक्त कई विदेशी अंग्रेजी बेवसाइट व ग्रुप्स ने दुधवा लाइव के कन्टेन्ट्स का अनुवाद किया गया व वेबपेजेज पर उस महत्व पूर्ण जानकारी का प्रदर्शन भी किया।

रेडियो में दुधवा लाइव का प्रसारण  


आकाशवाणी गोरखपुर ने दुधवा लाइव द्वारा चलाये गये "गौरैया बचाओ जन-अभियान को प्रमुखता से अपने समाचारों में पेश किया।



विभिन्न टी वी चैनल्स ने दुधवा लाइव ई-पत्रिका द्वारा चलाई गयी मुहिमों को प्रसारित कर हमारे प्रयासों को सार्थकता प्रदान की।
दुधवा लाइव ई-पत्रिका के प्रकाशित लेख व जिक्र को आप नुकूश-ए-कतरन ब्लॉग पर देख सकते हैं!
भाषा की समृद्धता पर टिकी हैं हमारी निगाहें:

हम भाषा के आलोचक नही है, दुनिया की तमाम भाषाओं और बोलियों में ज्ञान के अथाह भण्डार है और हम जरूरत के मुताबिक उस भाषा को सीखते व समझते है, पर यदि हम अपनी ही भाषा में संसार का न सही अपना ही ज्ञान समेट ले तो आने वाली पीढ़ियों को अपने ही ज्ञान के लिए कैम्ब्रिज या आक्सफ़ोर्ड के पुस्तकालय नही खंगालने पड़ेगें! 
दुधवा लाइव अब नये रूप में आप सभी को हिन्दी के साथ अंग्रेजी लेखों का प्रकाशन करेगी, ताकि अंग्रेजी भाषी लोगों व उनके पास मौजूद जानकारियों को हम अपने डोमेन में समेट सके! यह हमारी विवशता नही, आवश्यकता है! 
हम अपनी बोली और अपनी भाषा में अपने आस-पास की जानकारियों का संकलन करने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे, बशर्ते आप सभी का स्नेह व सहयोग प्राप्त होता रहे।

आप सभी के विचार आमन्त्रित हैं!

धन्यवाद
सस्नेह
मॉडरेटर
दुधवा लाइव ई-पत्रिका
http://dudhwalive.com
 

7 comments:

  1. अरुणेश दवेSeptember 24, 2010 at 6:54 PM

    समयोचित कदम आज के समय मे भारत के पर्यावरण को बचाने मे अनेक दूसरे देशो के लोग भी योगदान दे रहे है ऐसे मे दुधवा लाइव के आंग्ल भाषा मे उपलब्ध होने पर भारत की पर्यावरणीय समस्यांये उन तक आसानी से पहुच सकेगी और अनेकॊ गैर हिन्दी भाषाई भारतीय लेखको के विचार भी हम तक पहुच सकेंगे ।

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  2. kyaa baat hai bhai. aapne sath toh achchhe logon ki poori fauj khadee hai. kami kis baat ki hai? fir bhi jo ban sakega, mai sahayog karoonga. yah mera farz hai.

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  3. निश्चित तौर पर आप, हिन्दी भाषा में वन्य जीवन को समर्पित इस ई-पत्रिका द्वारा आने वाली पीढ़ियो के लिए संदर्भ तैयार कर रहे हैं।

    अंतर्राष्ट्रीय परिवेश हेतु द्विभाषी होने की ओर बढ़ रहे कदमों का स्वागत है। हमेशा की तरह यथाशक्ति सहयोग हेतु तत्पर हैं हम भी।

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  4. mrigank shekhar upadhyaySeptember 25, 2010 at 12:25 AM

    aap ka tark sarvatha sahi h ham aapke sath hai kyounki yah ek sarthak pahal hai

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  5. वन्य जीवन पर मिश्र जी का यह ब्लॉग एक अनूठा ब्लॉग है । यह इस दिशा मे रुचि के लिये सतत प्रयास रत हैं इस दौर में यदि दुधवा लाइव द्वैभाषिक होने जा रहा है तो यह बहुत अच्छी बात है इसलिये कि बहुत से लोग अभी भी हिन्दी में वाया अंग्रेज़ी आना ही पसन्द करते है ।

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  6. लगता है पीपली लाईव के नामकरण का आईडिया दुधवा लाईव से मिला

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  7. hona chahiye bhae......
    kyoki muje hindi me type krna nhi aaya abi tk.....
    :-(

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विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
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धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
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