डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Sep 4, 2010

35 करोड़ दीजिएं, जंगल कटाइए या बाग-बगीचा !

फ़ोटो: © कृष्ण


पूरे प्रदेश का राजस्व लक्ष्य 315 करोड़
अकेले खीरी से वसूलेगें दसवां हिस्सा

लखीमपुर। प्राकृतिक रूप से हरे-भरे खीरी जिले पर राजस्व कमाने का बोझ बढ़ता जा रहा है। उदाहरण के लिए वन महकमे को वर्ष 2010-11 में मिले राजस्व लक्ष्य को देख लीजिए। शासन ने हुक्म सुनाया है कि दक्षिण खीरी और उत्तर खीरी 35 करोड़ का लक्ष्य पूरा करें। यह लक्ष्य उस समय दिया गया है, जब खीरी जिले के वन महकमे की पूरे साल में कुल 10 करोड़ रूपए की ही आय है। अब सवाल उठता है कि इस लक्ष्य को पाने के लिए क्या वन महकमे को जंगल कटवाने पड़ेगे या बाग। क्योकिं पिछले एक साल में वन विभाग की आय में ऐसी कोई बृद्धि नही दिखाई दे रही, जिसके बिनाह पर लक्ष्य प्राप्ति की बात कही जा सके।
आंकड़ो की बात करें तो खीरी जिला कुल छह लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसमें लगभग 4.90 लाख हेक्टेयर मैदानी इलाका है और दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा रिजर्व फारेस्ट है। वन विभाग को जंगलों से कोई खास कमाई नही होती है। जब कभी दैवीय आपदा आती है और जंगल में तबाही होती है तो वन विभाग जंगल की गिरी पड़ी लकड़ियों को नीलाम करता है। हां, सागौन और साखू के पेड़ों की नीलामी की बात छोड़कर। वन विभाग को जंगलों के अलावा जंगलीय क्षेत्र से गुजरने वाली नदियों के घाटों से कमाई होती है, लेकिन इन्हें दो साल के लिए एक बार नीलाम किया जाता है। जंगल के भीतर उगने वाले घास-फूस, जड़ी-बूटियों को नीलाम भी एक बार ही होता है। पूरे साल वन विभाग अवैध कटान करने वालों से जुर्माना वसूलता है, जो एक साल में 30 लाख रूपए से ज्यादा नही होता। राजस्व की वसूली वन्यजीवों के शिकार से भी होती है, लेकिन शिकार के अधिकतर मामले दबा दिए जाते हैं इसलिए इस मद से कोई खास नही मिलता। अब सवाल उठता है कि इस भारी-भरकम राजस्व की पूर्ति वन विभाग किन संसाधनों के जरिए करेगा। बस, विभाग के पास एक ही रास्ता है। वो ये है कि शासन के हुक्म को पूरा करने के लिए जंगल की हरियाली मिटाइ्र्र जाए या मैदानी इलाकों को पूरी तरह उजाड़ दिया जाए। वन विभाग के एक अफसर का कहना है कि  प्राकृ तिक रूप से हरे-भरे जिले को देखकर ही इतना बड़ा लक्ष्य थमा दिया गया है।

मिन्नत भी बेकार
वन विभाग के कई अधिकारियों ने बैठकों में बड़े लक्ष्य का रोना रोया, लेकिन हैरत की शासन के आला हाकिम कोई बात सुनने को तैयार नही हुए। बस एक ही आदेश, चाहे जैसे राजस्व कमाइए। लक्ष्य पूरा होना चाहिए।  


(गंगेश उपाध्याय* वाइल्ड लाइफ़ जर्नलिस्ट के तौर पर पिछले कई वर्षों से हिन्दुस्तान अखबार में लेखन, लखीमपुर खीरी में निवास, वन्य जीवन के महत्वपूर्ण मसलों पर तीक्ष्ण युवा तेवर! इनसे gangeshmedia@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

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