डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Sep 5, 2010

एक बाघ के पीछे पड़े हैं तमाशबीन!

एक खूबसूरत बाघ को बचाने की सिफ़ारिश क्या आप संग हैं!
इन्सान और बाघ के मध्य एक खेल जिसमें हार बाघ की होना निश्चित है, या तो उसे चिड़ियाघर में कैद या इन्सानों द्वारा मौत! यहां आम और सरकारी इन्सान में मैं विभेद नही कर रहा! हम किसी जानवर की समस्या को न तो समझने की कोशिश करते है और न ही उसे मौका देते है उसके ही घर में सकून से रहने का! आखिर में मीडिया जुटती वैज्ञानिक और कथित वन्य जीव प्रेमी मैदान में हाजिर होते है और छपास के नशे को ग्रहण कर संतुष्टि की सांस लेते है! नतीजा जस का तस!
आखिर क्यों जंगल से बाहर आते है ये जानवर
यदि आते है तो हर्ज क्या! क्यों हल्ल मचता है, उनके लिए तो सारी जमीन एक सी है, फ़िर वह जंगल हो या खेतखलिहान! हम एतिहात के बजाए उस जीव के पीछे पड़ जाते है तमासबीन की तरह, उसे आक्रोशित करते है, और उसे अपराधी बनाते जाते है जब तक कि उसकी ईह-लीला समाप्त न हो जाए!

पीलीभीत के जंगलो से निकले इस टाइगर के बारे  में एक्सपर्टो की राय से मै इतफाक नहीं  रखता क्योकि  न तो यह जख्मी है न ही इसके  दन्त ,पंजा , नाख़ून  टुटा  हुए है  न ही टाइगर  बुढ़ा हो  कर लाचार है | ये टाइगर दो  या तीन  साल  का  बच्चा  है  जो  अपनी  माँ  अलग हुआ  है | इसको देख  कर  बड़ा  गर्व  होता है कि दुधवा  में इतना सुंदर वा बलिष्ठ टाइगर भी है हांलाकि इसने ८ लोगो को गलती  से  मारा  है,  लेकिन W .T .I . की टीम पिछले २ महा  से इसके पीछे  लगी हुई है  न  ही इसको बेहोस कर पा रही  न ही जंगलो  में  खदेड़  पा रही  है । जबकि टाइगर  ओर  W .T .I . की टीम का कई बार अमना सामना हुआ  है  फिर  भी W .T .I . की टीम हर  बार
   असफ़ल ही रही  वो टीम तो अपनी फोटो खिचवाने  में ही लगी हुई है  | W .T .I . की टीम की असफलता को देख कर ग्रामीणों  में आक्रोश बढता जा रहा है अगर इससे टाइगर  के  साथ  कोई अनहोनी घटना घाट  गई  तो इस की सारी जिमेदरी W .T .I . की टीम की होगी ।
  टाइगर  के  साथ  कोई अनहोनी घटना घटी तो दुधवा को बहुत बड़ा नुकसान होगा | अगर वन विभाग इस टाइगर बचाना है तो वो अपने एक्सपर्टो को बुला कर टाइगर बेहोस करे या  जंगलो  में  खदेड़ कर  इस की जान बचाई जा सके | इस टाइगर के सुधरने  के संकेत  भी साफ दिखाई दे रहे है, क्योकि लगातार पिछले कुछ  दिनों जंगली सुअरों या और जानवरों  का शिकार भी कर रहा है


मनोज शर्मा ( लेखक की वन्य जीवन पर आधारित खबरों में विशेष अभिरूचि, कई टी वी चैनल्स में कार्यानुभव, मौजूदा समय में लाइव इडिया न्यूज के लखीमपुर खीरी में संवाददाता हैं, जंगलों से घिरे मैलानी कस्बे में निवास। इनसे manojliveindia@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

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कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

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देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

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भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
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