डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Sep 15, 2010

केवलादेव घाना- जो कभी पक्षियों की कत्लगाह थी!

केवलादेव नेशनल पार्क भरतपुर राजस्थान भारत:

११ सितम्बर २०१०, भरतपुर राजस्थान: केवलादेव नेशनल पार्क, ये जगह कभी राजा-महराजाओं की शैरगाह, व शूटिंग ग्राउंड हुआ करती थी, सन १९५६ में इसे पक्षी विहार का दर्जा हासिल हुआ, और भारत सरकर ने  1971  में इसे पूर्ण सरंक्षित वन्य क्षेत्र घोषित किया। वैसे भरतपुर राजपरिवार के लोगों को वन्य-जीव अधिनियम १९७२ के बनने तक इस पक्षी विहार में पक्षियों का कत्ल करने की इजाजत मिली हुई थी। यह पक्षी विहार आज से लगभग २५० वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया, इस वेटलैंड के निर्माण व संवंर्धन का मकसद मात्र शिकार के लिए हुआ, जहां भारत के विदेशी शासकों को आमंत्रित किया जाता था, अपनी प्राकृतिक संपदा के दामन को बारूद से दागदार कराने के लिए! भरतपुर के महाराजा सूरजमल (१७२६ से १७६३) ने बनगंगा व गम्भीर नदियों के संगम पर एक बांध का निर्माण कराया। जिसकी वजह से यह प्राकृतिक स्थल जलमग्न होने लगा और इस पथरीली जमीन पर हरियाली फ़ैल गयी, नतीजतन पक्षियों की यह पसंदीदा जगह बनी, खासतौर से जलीय पक्षियों की। यहां भरतपुर के महाराजा द्वारा प्रत्येक वर्ष भारत के वायसराय के सम्मान में शिकार का आयोजन बड़ी धूमधाम से किया जाता था। इस जगह पर खूबसूरत पक्षियों को लार्ड कर्जन से लेकर लार्ड लिंलिथिगो ने अपनी बन्दूकों से हजारों पक्षियों को मार गिराने का निकृष्ट कार्य किया,  जिसे बड़े गर्वीलेपन के साथ हमारे भारतीय राजाओं ने इस पक्षी विहार में पत्थरों में अंकित किया है, कि उनके किस गोरी चमड़ी वाले विदेशी मेहमान, या विदेशी शासक ने उनकी जमीन पर उनकी संपत्ति पर भरण पोषण करने वाले इन सुन्दर निरीह जीवों का कत्लेआम किया। अपने ही दामन पर विदेशी बारूद से सुराक कराने वाले राजा-महराजाओं की यह शर्मसार कर देने वाली कहानियां अंकित है शिलालेखों पर!,  भरतपुर के इस पक्षी बिहार में, जहाँ आज हजारों की तादाद में ये रंग-बिरंगे देशी-विदेशी पक्षी अपना पसंदीदा घर मानते है, जिन्हे शायद यह नही मालूम कि उनके पूर्वजों की मौत की कहानी यहां बड़े बड़े पत्थरों पर बड़ी शान से कुरेदी गयी!   




सन १९०२ से सन १९६४ई० तक की पक्षियों के कत्लेआम की फ़ेहरिस्त यहां मौजूद है, बड़े बड़े शिला-लेखों पर, कहते है सलीम अली साहब ने सन १९६४ में यहां पर शिकार पर प्रतिबंध लगवाया! इस दौरान एक शिकार के दौरान सबसे अधिक ४२७३ पक्षियों का कत्ल किया गया, जिसे अंजाम देने वाला व्यक्ति था, भारत का तत्कालीन वायसराय लार्ड लिंलिथिगो(१९३८)! यहां राजकुमारों के जन्मदिवसों पर हजारों चिड़ियों की जान पर बन आती थी, निर्दयता की यह करूण कहानी थी हमारे उस भारत के दौरान! 


सन १९८१ में भरतपुर पक्षी विहार का नाम केवलादेव नेशनल पार्क में परिवर्तित किया गया, और इसे पूर्ण सरंक्षित क्षेत्र का दर्जा प्राप्त हुआ। केवलादेव नाम पड़ने की पीछे कारण हैं, इस सेंक्चुरी के अन्तर्गत मौजूद भगवान शिव का मन्दिर जिनका एक नाम है "केवलादेव"




सन १९८५ में UNESCO द्वारा इसे World Heritage Site का दर्जा प्राप्त हुआ। आज पूरी दुनिया में भरतपुर अपनी पक्षी वोविधता के लिए मशहूर है।  २९ वर्ग किलोमीटर में फ़ैला यह सरंक्षित क्षेत्र भारत में एक मात्र स्थान था, जहां साइबेरियन क्रेन आया करती थी, और दुनिया में तीसरा। किन्तु सन २००१ के बाद यहां साइबेरियन क्रेन नही आती। वजह हजारों मील की यात्रा के दौरान पड़ने वाले पड़ाओं का मानव द्वारा विनाश, और इन खूबसूरत पक्षियों का शिकार, जिस वजह से सन २००१ के बाद ये अपने गतंव्य तक आजतक नही पहुंच पाये।

सन २००१ में बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री द्वारा आयोजित IBCN Workshop में केवलादेव नेशनल पार्क में मैं इस वर्कशाप का हिस्सा था। उस दौरान मुझे एक जोड़ा साइबेरियन क्रेन देखने का अवसर प्राप्त हुआ था। मैं और मेरे तमाम साथी आखिरी गवाह बन गये थे इस पक्षी की आमद की, इसके बाद फ़िर कभी यह पक्षी भरतपुर में नही देख गया।


केवलादेव घाना में पक्षियों की कुल ३८० प्रजातियां पायी जाती हैं, जिनमें २१८ प्रजातियां विदेशी पक्षियों की हैं, चीन, योरोप, रूस, व पश्चिम एशिया के भू-भागों से यहां आती हैं। १६२ प्रजातियां स्थानीय हैं जो पूरे वर्ष केवलादेव घाना में ही रहती है। यहां के नम-भूमिं व सुन्दर उपवन में मानसून के दिनों १७ प्रजातियां अपने घोसले बनाती हैं, १०,००० से १५,००० घोसलें इन पक्षियों के देखे जा सकते हैं। प्रत्येक वर्ष ३०,००० से ४०,००० चूजें इस प्रजनन स्थल पर अण्डों से निकलते हैं।
मेरी यात्रा:
९ सितम्बर की सुबह मैं लखीमपुर से भरतपुर जाने के लिये, गोला-गोकरननाथ, मोहम्म्दी होते हुए शांहजहांपुर पहुंचा, जहां कार की सर्विस कराने में पूरा दिन बीत गया। मन में बड़ी अभिलाषा थी की शाहजहांपुर की शहीदों की पवित्र भूमिं पर माथा टेक आऊं पर समयाभाव की वजह से राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक की उन शहीद स्थलियों पर नही पहुंच सका जहा उन भारत माँ के सपूतों को सुपुर्द-ए-खाक किया गया था। मोहम्मदी से मेरे साथ मेरे मित्रवत छोटे भाई सतपाल सिंह मेरे साथ थे। हम शाम को तकरीबन सात बजे शाहजहांपुर से रवाना हुए भरतपुर राजस्थान के लिए, पूरी रात हम ड्राइव करते रहे गंगा-यमुना की द्वाब में काली रात, काली सड़के और आवारा हवायें बस यही एहसास था हमारे साथ, बरेली, बदायूं,  मथुरा होते हुए सुबह चार बजे हम भरतपुर में थे। लेकिन मुझें जयपुर तक का सफ़र तय करना था, वहाँ मुझे एक मित्र से मुलाकात करनी थी, हालात बड़े अजीब हो रहे थे, लेकिन जाना तो निश्चित था! ११ सितम्बर का पूरा दिन जयपुर की सड़कों पर गुजरा, रात होते ही शरीर जवाब दे चुका था, होटल में आकर रात कैसे गुजर गयी पता नही चला! सुबह हम फ़िर वापस हो लिए जयपुर से भरतपुर की तरफ़ NH8 पर, दोपहर होते-होते हम केवलादेव पक्षी विहार के सामने थे।

 समयभाव था, सो जल्दी जल्दी सुन्दर चिड़ियों के इस घर को देखने की आतुरता मन में आ रही थी, वहां कार्यरत WWF के वैज्ञानिक से भी मिलना था, परन्तु बस एक रिक्शा लेकर हम निकल पड़े घाना की सैर पर! रिक्शा पुलर का नाम था सरदार कल्लू सिंह, उसे अभी ज्यादा वर्ष नही हुए थे, हल्की फ़ुल्की ट्रेनिंग और पर्यटकों से जो भी उसने सीखा था उसे बता कर वह हमें रोमांचित करना चाह रहा था, हम हो भी रहे थे! पर जल्द ही मैं उससे अनौपचारिक हो गया, जैसी की मेरी आदत है! अब क्या था कल्लू सिंह को भी मज़ा आ रह था, हम रिक्शे के बजाए पैदल ज्यादा चलना पसन्द कर रहे थे। कल्लू सिंह को भी आराम, फ़िर क्या इस वन की छोटी बड़ी बातें, पर्यटकों का हाल सब कुछ बता रहे थे कल्लू सिंह, तब तलक हम मित्रवत हो चुके थे। 

 कल्लू सिंह के एक ज्ञान पर मुझे भी खुशी हुई ब्लैक नेक्ड स्टार्क में नर मादा की पहचान उसके रंग और आकार से करना मुश्किल होता है, बस आँख का रंग ही यह फ़र्क जाहिर कर सकता है! कल्लू सिंह ने बताया कि साहब नर की आँखे नीली, और मादा की पीली होती है, अब साहब नीला रंग ऐसा है जो दूर से देखकर ही पता लगता है, सुन्दर नीली नीली आँखे.....बोला...साहब किसी लड़की से कहता हूं प्रकृति में नर ज्यादा खूबसूरत होते है तो वह नाराज हो जाती है! मुझे यह बात खूब जंची आप को भी बता दूं, एनीमल किंगडम में किसी भी प्रजाति के नर को ले लीजिए, वह मादा से कई गुना खूबसूरत मिलेगा! 


Painted Storks यह पक्षी मुझे सदैव लुभाता रहा है, अपने रंग रूप से, इत्तफ़ाक से इस वक्त इसका प्रजननकाल था सो सैकड़ों पेन्टेड स्टार्क वृक्षों पर अपने घोषलों में मौजूद थे, आपस में कोर्टशिप करते हुए, या पंख साफ़ करते हुए, एक जगह से दूसरी जगह उड़ान भरते हुए। हमने उनकी तस्वीरे उतारने में कोई कोर-कसर बाकी नही रखी...पंखों के पिछले हिस्से पर लाल लाल रंग मानों किसी ने पेन्ट किया हो! इसी रंग की इस छटा के कारण इसका नाम पेन्टेड स्टार्क  पड़ा।

इसके अलावा ब्लैक हेडेड आइबिस, डार्टर भी इस हेरोनरी में दिखाई दिए।


केवलादेव मन्दिर के दर्शन के बाद हम अजगर की खोज में थे पर रास्ते में भरतपुर स्टेट का एक पुराना कुआं दिखाई दिया, अपने पुरातत्व प्रेम को मैं रोक नही पाया और कुए भीतर झांकने लगा, कुछ देर मेरा मन वही बैठ कर सुस्ताने का हुआ, चारों तरफ़ पीपल बरगद के वृक्ष, अतुलनीय सुन्दरता जो शीतलता से सरोबार थी! मैं बैठ गया तभी मेरे साथी को एक खजूर के पेड़ पर Rufous Treepie के बच्चे दिखाई दिए! फ़िर क्या था उन्हे कैमरे में कैद कर लेने की कवायद चलती रही.......

  रास्ते में कुछ धुरंधर भी मिले मोटे शरीर और मोटे व लम्बे लेन्स वाले...वन्य जीवन की इस विधा में जिसके पास जितना भारी लेन्स वह उतना बड़ा तीरंदाज यकीन न हो तो कभी महसूस करके देख ले, बड़े लेन्स वाला सीना फ़ुलाकर गुर्राने के अन्दाज में आप की तरफ़ देखेगा भले ही बाद में वह आप के ज्ञान के आगे  पीलू बन जाए! भरतपुर में पीलू वृक्ष की एक प्रजाति भी है, और कदम के वृक्षों की मौजूदगी ब्रज-भूमि का एहसास करा जाती है।

वहां से लौटते वक्त ब्लैक नेक्ड स्टार्क के ठिकाने पर हम गये पर शायद वह कही बाहर गयी थी, लेकिन उसके ठिकाने पर Rose ring parakeet के दर्शन हो गये जोड़े में थे जनाब, अब डाल पर बैठी इस उड़ने वाली हरियाली को कौन तस्वीरों में उतारना नही चाहेगा.......
वापसी में तमाम सारे जैकाल (सियार) सड़कों पर मड़राते दिखे, नीलगाय भी और बन्दर भी! एक जगह मानीटर लिजार्ड और सियार की एक साथ मौजूदगी ने मन को मोह लिया। पुराने वृक्ष की जड़ पर विराजमान यह प्राचीन जीव और उसके ऊपर से छलांग लगाते सियार  महोदय! कुछ विविध रंगों से सजे Tortoise beetles और कुछ Larvae भी मिले जिनके शरीर पर किसी सर्वश्रेष्ठ चित्रकार के ब्रश का कमाल स्पष्ट झलक रहा था।

 एक जर्मन नवयुवक जिसने मुझसे कैन्टीन का पता पूंछा, मैं आदत से बाज नही आया मैने कहा शायद आप को असमान्य लगे पर मुझे एडोल्फ़ हिटलर बहुत पसन्द है...वह भी मुस्करा दिया...उसकी शक्ल में मैं हिटलर की सर्व-श्रेष्ठ मानव प्रजाति के दर्शन करने की कोशिश कर रहा था और भारत के ब्राह्मणों से उसकी शक्ल का मिलान भी!

सबसे सुखद खबर यह है, कि भरतपुर सैंक्चुरी में मौजूदा कलेक्टर भरतपुर व सैंक्चुरी  के डी०एफ़०ओ० की बदौलत पानी आ गया है, अब पक्षियों के अलावा यहां रह रहे सभी जीवों की मौज हैं।
बस इतनी ही कहानी मिल पायी इस वन में शेष बाद में!


कृष्ण कुमार मिश्र ( लेखक वन्य जीवन के अध्ययन व सरंक्षण को आम जन तक पहुंचानें की तमाम देशी  व अनौपचारिक कवायदों में व्यस्त हैं, यायावरी की सनक, आस-पास की सभी चीजों को जान समझ लेने की एकाधिकार की भावना! लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)










सभी तस्वीरें साभार: सतपाल सिंह (संपर्क: satpalsinghwlcn@gmail.com)


4 comments:

marie muller said...

krishna ji
very amazing article,,,storks,,
good trip u had!!

i think after reading this article everybody wanna run to keoladeo!!!

so interesting info!!
and
satpal singh ji
wonderful work at the camera!!!!

बी एस पाबला said...

बहुत ही खूबसूरत, सटीक चित्र। फोटोग्राफ़ी कमाल की है।
विवरण भी सहज प्रभावित

इस अभ्यारण्य को देखने की इच्छा पुन: प्रबल हो गई

वैसे यह सत्य है कि एनीमल किंगडम में किसी भी प्रजाति के नर को ले लीजिए, वह मादा से कई गुना खूबसूरत मिलेगा!
अब यह बात तो रिक्शा चलाने वाला भी जानता है :-)

Neha Mishra said...

best part of the story is about kallu singh. and the best picture is of that black animal.....

Anonymous said...

Outstanding photos by Satpal ji and very well written article by kk mishra hi that inspire us to live with natural world forever! , Bharatpur is heaven indeed for birds. ...
Uruj Shahid

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