International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

May 26, 2010

बेटा देकर जा रहा हूं भाई...खयाल रखना

आशीष त्रिपाठी* बेटा देकर जा रहा हूं भाई...खयाल रखना
विछोह
-छह संतानों के पिता किशन ने बच्चे की तरह पाला हाथी को
-दुधवा लाते वक्त फूट कर रोए थे किशन के बीवी और बच्चे
-रोज फोन पर पूछते हैं अपने बिछड़े सुमित का हाल-चाल



नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में...खुश रहना मेरे यार। राजेश खन्ना अभिनीत फिल्म हाथी मेरे साथी का यह गीत लोगों को भुलाए नहीं भूलता। इन दिनों आप दुधवा में देख सकते हैं कि ऐसे रिश्ते केवल फिल्मों में ही नहीं होते। यह रिश्ते यथार्थ भी हैं। लखनउ चिड़ियाघर से दुधवा भेजे गए बुजुर्ग हाथी सुमित के साथ किशन का ऐसा प्यार भरा रिश्ता है। यह बिछोह की घड़ियां हैं। किशन एक-दो दिन में ही सुमित को छोड़कर दुधवा से चले जाएंगे। इन दिनों उनका दिल जार-जार रोता है। दिन में कई-कई बार वह सुमित को सहलाते हैं, पुचकारते हैं। सुमित भी उनके कंधे पर सूंड़ रख देता है; इन दिनों किशन का गमछा नम रहता है आंखों को पोछते-पोछते। दुधवा में सुमित की देखरेख का जिम्मा महावत अयूब को दिया गया है। रोज ही किशन अयूब से कहते हैं, अपना बेटा देकर तुम्हे जा रहा हूं....खयाल रखना।
किशन कभी बरेली के बाशिंदे थे; सन 72 में लखनउ के चिड़ियाघर मंे उन्हें चारा कटर के रूप में नौकरी मिली। कुछ साल बाद ही चिल्ला के जंगल से पकड़ कर आया था सुमित। नन्हा हाथी। किशन बताते हैं कि बचपन से ही सुमित की आंखों में तकलीफ थी। किशन वैसे तो सन 74 से सुमित को देख रहे थे, लेकिन उसकी जिम्मेदारी उन्हें सन 88 में मिली; एक बार उससे प्यार का रिश्ता बना तो यह डोर मजबूत होती गई। जू कैंपस में रहने वाले उनके परिवार में एक सदस्य और जुड़ गया। बड़ा बेटा अनिल, उससे छोटा सुनील तो लगातार सुमित के संग रहते थे। किशन बताते हैं, सुनील तब दस-ग्यारह बरस का था। दोपहर में वह चुपचाप सुमित के पास चला जाता। सुमित उसे सूंड़ के सहारे माथे पर चढ़ा लेता। सुनील उसके उपर ही लेट जाता और पूरी-पूरी दोपहर दोनों न जाने क्या बातें करते रहते। उनमें भाई जैसा रिश्ता बन गया। इस तरह सुनील मेरा चौथा बेटा और सातवीं संतान बन गया। सुमित से बिछड़ने की सोच कर ही किशन भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं, वहां अनिल और सुनील सुमित के लिए आंसू बहा रहे हैं। उनकी मां मुन्नी देवी का बुरा हाल है। पूरा परिवार दिन में कई-कई बार फोन करके सुमित का हाल-चाल पूछता है। उनकी दोपहरें सुमित को थपकी देते कट रही हैं। अयूब उन्हें दिलाया दे, किशन को तसल्ली नहीं होती। उसके जिक्र के साथ ही किशन का गला रूंध जाता है। दुधवा इन दिनों बाप-बेटे के इस प्यार का साक्षी बना है। सुमित के नए महावत अयूब कहते हैं कि वह उनके इशारे भी समझने लगा है।

दिल में समाई थी बस इंदिरा
चिड़ियाघर में हथिनियां तो बहुत आईं पर सुमित का दिल बस इंदिरा ही जीत सकी। किशन बताते हैं कि जवानी में सुमित को गुस्सा कुछ ज्यादा ही आता था। दो महावतों को तो उसने कई बार पटका। आखिरकार उसे सुमित को संभालने का जिम्मा मिला। दोनों के बीच प्यार का रिश्ता बना तो सुमित धीरे-धीरे सुधरता गया। उसने कभी किशन पर सूंड़ नही उठाई। कई हथिनियों पर भी उसने आक्रमण किया। बस इंदिरा ही ऐसी थी जिसकी जगह सुमित के दिल में बन गई थी। रोशनी जाने के बाद सुमित इंदिरा की आहट से पहचान लेता था। वह भी अक्सर अपनी मौजूदगी का अहसास सुमित का माथा सहला कर कराती थी। दोनों बरसों तक साथ रहे। बिना किसी टकराव-मनमुटाव के। इंदिरा की मौत के बाद सुमित अकेला पड़ गया।


खाई में लगा दी थी छलांग
गुस्से में सुमित ने अपना बहुत नुकसान किया। तकरीबन पचास साल की जिंदगी में तीन बार उसने अपना पैर तोड़ लिया। दो बार महावतों पर गुस्सा होकर हमला किया। घबराए महावतों ने हाथी बाड़े की परिधि पर खुदी खाई में छलांग लगा दी तो पीछे से सुमित भी कूद पड़ा; एक बार पिछला बायां पांव टूटा तो दूसरी बार अगला। पिछले पांव की चोट तो आज तक उसे दर्द देती है। खडे़ होने या बैठने में सुमित को तकलीफ होती है। तीसरी दुर्घटना में सुमित को दिखना बंद हो चुका था। वह अचानक गडढे में गिर कर बुरी तरह जख्मी हुआ।

हजारों शादियों में बाराती बना सुमित
शायद आपने इतनी बारातें नहीं देखी होंगी। जी हां, प्राणि उद्यान से आए सुमित ने वहां हजारों शादियां देखीं। खास बाराती के रूप में उनमें शामिल हुआ। विशेष रूप से बन गए पुए और पकवान खाए। कहीं-कहीं तो उसकी पूजा भी हुई। बाइस साल तक उसके संगी-साथी रहे किशन बताते हैं कि बारातों या विशेष आयोजनों के लिए प्राणि उद्यान में हाथियों की बुकिंग होती है। तय वक्त पर हाथी वहां लेकर जाना होता है। सन 74 से 2008 तक सुमित ने न जाने कितनी शादियां बतौर खास मेहमान अटैंडकीं, वह बारात की शान होता था।

आशीष त्रिपाठी ( लेखक हिन्दुस्तान अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है, फ़िलवक्त मुराबाद में ब्यूरो चीफ़ के पद पर कार्यरत, पत्रकारिता जगत में पूरे एक दशक में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करवाई है, इनसे ashish.tripathi@livehindustan.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

8 comments:

  1. anuradha TripathiMay 26, 2010 at 10:30 PM

    nice,touching story. a place with simple people and simple love for animals!!!!!
    very well written Ashish.

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  2. in these times that we are so busy and we cannot even look at the stars .. its so good to our hearts read this stories,, know these people!!
    i love to com e here and read!!!

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  3. आशीष भैया मजा आ गया !
    बेजुबानो को देखने और उनकी संवेदनाओ को बहुत करीब से समझने का मौका दिया होगा दुधवा ने आपको !
    अपने भी उन संवेदनाओं को आम लोगो तक पहुचाया है !
    बधाई भैया !
    दुधवा को भूलना मत !
    लखीमपुर को भूलना मत
    और हम को भी कभी मत भूलना .....!
    आपका छोटा भाई ...
    मयंक

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  4. Ashish Ji
    The journalistic fraternity psrticularly the sprouting buddies must learn to have a keen observation and matching language to put those obsservations into simple yet effective words.
    Very, very nice and heart-touching story. Presentation is all the more appealing!
    Deo Kant Pandey

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  5. bhai sahab
    dudhwa ke bejubano ki bhasha ko parkha hai aapne ,,mahaj kuch dino me hi aap lmp ki tamam khubiyon ko apni kalam se bayan kar gaye

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  6. amitabh says
    good story. well done ashish ji.

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