International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Jun 21, 2010

...तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!

 धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने
आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है। पूरी दुनिया मे आज योग की धूम-सी मची हुई है। अरे..आप भी सोच रहें होंगे कि वन्य जीव को समर्पित इस वेबसाइट पर अचानक बाबा रामदेव, धार्मिक चैनल और योग की बात भला कहां से आ गई। आपका सवाल वाजिब है, लेकिन आपके लिए ये जानना भी दिलचस्प होगा कि 5 हजार साल से जिस यौगिक आसनों को हम करते आएं है, उनमें से ज्यादातर आसन पशु-पक्षियों से सीखी गई है। प्राचीन यौगिक ग्रंथों में कहा गया है कि भगवान शिव योग के पहले प्रवक्ता यानी गुरु हैं। कहा ये भी गया है कि शिवजी को 84 लाख आसनों की जानकारी थी। आपको ये भी पता होगा कि हमारी प्राचीन मान्यताएं हैं कि इस धरती पर इतनी ही संख्या में करीब प्रजातियां या योनियां भी है- यानी 84 लाख छोटे-बड़े जीव-जंतु, कीट-पतंगे। साफ है हर आसन एक योनी से सीखी गई होगी।
   ऋषियों ने पाया कि हम मनुष्य बीमार पड़ते हैं तो डॉक्टरों या वैद्य के पास इलाज के लिए पहुंच जाते हैं, लेकिन ये पशु-पक्षियां भला कहां जाते हैं। बाद में गौर किया गया तो पाया गया कि पशु-पक्षियों की हर एक शारीरिक प्रक्रियां में उनकी सेहत का राज झुपा है। इसके साथ ही पशु-पक्षियों के उस विशेष भाव-भंगिमा को उनके ही नाम पर आसन का नाम दे दिया गया।
     आसनों में काफी प्रचलित ‘’अधोमुख श्वान आसन’’ की बात करते हैं। कुत्ता को संस्कृत में श्वान कहा गया है। अधो का अर्थ है नीचे और मुख का मतलब चेहरा। यानी अधोमुख श्वान मतलब कुत्ते की तरह मुख को नीचे करना।
       
तस्वीर ए
तस्वीर बी
पहली तस्वीर अधोमुख श्वान आसन की है और दूसरी तस्वीर से इस आसन की  उत्पत्ति की कहानी समझ में आ गई होगी। कुत्तों को इसतरह से करते आप बराबर देखते होंगे। खासतौर पर जब वो सो कर उठते है, इस प्रक्रिया से कुत्ते अपने पूरे बदन को एक्टिव कर लेते हैं।
अब कुत्ते की चर्चा हो गई और जंगल के राजा सिंह की ना हो तो फिर बात कुछ हजम नहीं होगी। दूसरे आसन की जो चर्चा करने जा रहा हूं वनराज को समर्पित है- सिंह-आसन। इस आसन में शेर की तरह चेहरे की भाव-भंगिमा बनाई जाती है और आवाज निकली जाती है।
                  
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अब शेर की साथ लगे हाथ हाथी दादा की भी चर्चा कर लेते हैं। योगियों को हाथियों के मुंह से पानी पीकर सूंढ़ से निकालने की प्रक्रिया भा गई।
यौगिक प्रैक्टिस में मुंह से पानी लेकर नाक से बाहर करने की ये क्रिया गजकरणी (गज मतलब हाथी) या शीतकर्म कपालभाति कहलाती है। ये क्रिया कपाल प्रदेश यानी सिर के अगले हिस्से की सफाई करती है। 

 अब काले खतरनाक बिच्छू के बारे में सोचकर भला किसका दिल कांप हीं जाएगा। एकबार बिच्छू काट ले तो हम-आप उठकर पानी पीने की नहीं सोच पाएंगे, लेकिन योगी ने उन बिच्छुओं से भी एक आसन ढूंढ़ निकाला। जरा नीचे की तस्वीरों में इस समानता को देखें।
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विषधरों की बात निकली है तो सांपों को भला कैसे भुलाया जा सकता है। सांप के फन फैलाते ही अच्छे-अच्छों की नींद उड़ जाती है, लेकिन इसी फनकार को जब आसन का रुप दे दिया जाता है तो ये आप के श्वसन-संस्थान से लेकर पाचन संस्थान को दुरस्त रखता है- जी हां.. बात हो रही है भुजंगासन की। भुजंग मतलब साप।

 भुजंगासन
विषधरों की बात हो गई तो अब उनके शत्रुओं की बात हो जाए। साप का जन्म-जन्मांतर का दुश्मन है मोर।  मोर के नाम पर काफी प्रचलित जो आसन है वो है-
मयूरासन: इस आसन में मोर की तरह दोनों हाथों की हथेलियों से संतुलन बनाया जाता है। पाया गया है कि मयूरासन हाथों को शक्ति और मानसिक एकाग्रता देने के साथ आपकी पाचन शक्ति को इतनी दुरस्त करता है कि आप कुछ भी पचा सकते हैं।


                 
        
पशु-पक्षियों के नामों पर कुछ और आसनों की बानगी को कुछ और तस्वीरों के जरिए समझें-
बकासन – बक मतलब बगुला
      

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राज कपोत आसन- कपोत यानी कबूतर और राजकपोत-कबूतरों का राजा।


              
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शलभासन- शलभ मतलब पतंगा


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इस तरह से देखें तो ये फेहरिस्त बढ़ती चली जाएगी। मछली पर मत्स्यासन, पक्षियों के राजा गरुड़ पर गरुड़ासन। गाय पर गौमुखासन। मतलब ये श्रृंखला खत्म नहीं होने वाली। योग की महत्ता को हम लोग भली-भांति जानते हैं, लेकिन आपने देखा कि इन आसनों के मूल प्ररेणा स्तोत्र कौन हैं। हमारे और आपके आस-पास रहने वाले ये निरीह और भोले-भाले पशु और कलरव करती पक्षियां। तो अगली बार आप जब इन पशु-पक्षियों से दो-चार होंगे तो धन्यवाद कहना ना भूलिएंगा, जिनकी वजह से आसनों का एक विज्ञान विकसित हुआ। अरे.. अब सोच क्या रहें हैं.. चलिए सापों की तरफ फन फैलाने वाले भुजंगासन को लगाएं।

(धीरज वशिष्ठ* लेखक एक योग इंस्ट्रक्टर और स्वतंत्र पत्रकार हैं, भागलपुर ( बिहार ) में शुरुआती पढ़ाई.. इतिहास से आनर्स करने के बाद अप्रैल 2004 में भारतीय जनसंचार संस्थान  ( IIMC ) नई दिल्ली में रेडियो-टीवी जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा, जी न्यूज, जनमत, लाइव इंडिया, न्यूज 24 जैसे चैनलों में 5 साल काम करने के बाद अब योग से पूरी तरह से जुड़ चुके हैं। दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन, योग विज्ञान में डिप्लोमा के लिए अध्ययन जारी है, इनसे आप dheerajvashistha@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं। )






photo courtesy: fitsugar dot com

12 comments:

  1. अच्छी जानकारी दी..यही सत्य है!

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  2. काफी अच्‍छा लगा, दरअसल हम सबकुछ प्राकृति से ही सीखते हैं या सीख सकते हैं, यह अलग बात है कि हम कोशिश नहीं करते हैं। इस विषय की जानकारी देने के लिए धन्‍यवाद।

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  3. Very Interesting article indeed, great to read the analogies made between yoga postures(asanas) and living beings around us, mother nature always has its ways to heal, yoga is one and wildlife were always the best examples to learn this.

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  4. कृष्‍ण जी, आपकी वेबसाइट व ब्‍लाग पर अनियमित रूप से आना होता है. मैं आपके प्रयास का प्रशंसक हूं और सच में कई बार ईर्ष्‍या भी होती है मैं ऐसा क्‍यूं नहीं कर पा रहा हूं. आपके प्रयासों की प्रशंसा ही नहीं समर्थन व सराहना करता हूं. सादर

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  5. many of us know the importance of nature in our life, but all we need is someone to remind us these importance and the article serves the purpose very well. It is really interesting to read these facts. I would thanks dheeraj ji for writing such interesting article. And would never forget to thanks nature (तो अगली बार आप जब इन पशु-पक्षियों से दो-चार होंगे तो धन्यवाद कहना ना भूलिएंगा).

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  6. the article is extremely interesting .the photographs are amazing and click instantly. i really appreciate your effort .

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  7. yah article example ke saath reallly bahut intresting laga , iske liye aapko dhanywad

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  8. Aapke vichar sahi hai. Par iska shreya to un yogi ko dena hoga jinhone is ko dekha, parkha aur jeevan shaili hi bana dala.Guru GorakshNath ji ek aise hi yogi the.

    R.K.Upadhyay

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  9. Very Interesting. I knew about some of them but seeing comparative analogous pictures side by side is easily perceptible.

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  10. Many of us know about Yoga but Dheeraj Ji has presented it nicely with example. Definitely many things to learn from YOU.

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  11. Lovely Post, we have to learn something from it...

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  12. धन्यवाद धीरज जी!
    सुन्दर पोस्ट है।

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