International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Mar 1, 2010

पड़ोसी देश भी तुला है, बाघों का वजूद मिटाने में!

महबूब आलम* "दुधवा के बाघ बन सकते हैं इतिहास" भारत ही नहीं पूरे विश्व की चिंता का विषय बने बाघ का अस्तित्व खीरी के दुधवा टाईगर रिर्जव में खतरे में प़डता जा रहा है। नेपाली शिकारी दुधवा के बाघों का बड़े पैमाने पर शिकार कर रहे हैं। अभी हाल ही में खीरी के सीमावर्ती मित्र राष्ट्र नेपाल के कस्बा धनगढ़ी में पकड़े गए शिकारियों से यह बात एक बार फिर सामने आई है। पकड़े गए शिकारियों के पास से दो बाघों की खालें बरामद की गई थीं। यह कोई पहला मामला नहीं था जो नेपालियों द्वारा बाघों के शिकार की पुष्टि कर रहा हो इससे पूर्व भी कई बार नेपाली लोगों को पकड़ा गया है, जिसमें उन्होने दुधवा से बाघों का शिकार करने का खुलाशा किया है। पकड़ के बाद सामने आए मामले तो सिर्फ बानगी हैं। हकीकत यह है कि नेपाली समय-समय पर बराबर बाघ के शिकार कर रहे हैं और उन्हें रोकने वाला वन विभाग का अमला नाकाम है। किसी शिकारी के पकड़े जाने पर दो-चार दिन तो हर स्तर पर हो-हल्ला मचता है लेकिन फिर सब शांत।
   नेपालियों द्वारा किया जाने वाला बाघ का शिकार यूं हीं जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बाघ दुधवा के म्यूजियम में ही सिमट कर क्षेत्र के लिए एक कहानी बन जाएगा। नेपालियों के बढ़ते दबाव से निपटने के लिए स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर आज तक जो भी कुछ किया गया उसे पूरी तरह से सफल नहीं कहा जा सकता है। परिणाम है कि ‘‘ टाईगर प्रोजेक्ट ‘‘ को भी कोई सफलता हासिल नहीं हुई है। टाईगर प्रोजेक्ट दुधवा में वर्ष 1987 में शुरू हुआ था। इसको करीब 23 वर्ष हो चुके हैं। इस 23 वर्ष में समय-समय पर विभिन्न विधियों से हुई गणना को देखा जाए तो आंकड़े सौ और एक सौ छह के फेर में ही फसें हुए हैं। किसी गणना में बाघों की गिनती सौ पहुंच जाती है तो किसी में एक सौ छह। इन आंकड़ों को दिखाकर पार्क प्रशासन अपनी पीठ ठोंक लेता है जैसे उसने बाघों की संख्या में कोई बड़ा इजाफा कर डाला हो। जब कि टाईगर प्रोजेक्ट स्थापना से पहले यहां के हालात कुछ और थे। यहां के बाघ अनगिनत संख्या में शहर की सीमा तक विचरण करते थे। बाघ देखा जाना उस समय आम बात हुआ करती थी। जानकारों की मानें तो दुधवा में करीब दो सौ बाघ हुआ करते थे। फिर 23 सालों चले टाईगर प्रोजेक्ट के बाद एक सौ और एक सौ छह की गिनती दिखाकर अपनी पीठ थपथपाना अपने मुंह मिंयां मिठठू बनने जैसा ही लगता है। पार्क की यह गिनती नेपालियों द्वारा बाघ के शिकार की घटनाओं को धड़ल्ले से अंजाम दिए जाने के बाद खुद ही सवालों के घेरे में आ गई है। खैर जो भी हो लेकिन अब असल सवाल यह है कि जो बाघ बचे रह गए हैं उन्हें बचाने के लिए गम्भीरता से कुछ किया जा रहा है? या सिर्फ कागजी  कवायद ही जारी है? इसका जवाब तलाशने पर पता चलता है कि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर सब कुछ जानते हुए भी लोग मौन हैं। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक ओर तो सरकार  पूरे देश में बाघों को बचाने के लिए टी0वी0. रेडियो. अखबारों में ‘‘ सेव द टाईगर ‘‘ के नारे देकर उन्हे बचाने के लिए क्रांति छेड़े हुए है, वहीं दूसरी ओर दुधवा नेशनल पार्क के बाघ आए दिन नेपालियों का शिकार बन रहे हैं। आखिर दुधवा नेशनल पार्क के बाघों को बचाने के लिए चुप्पी क्यों? इस पर वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञों की माने तो यह एक अंतर्राष्ट्रीय विषय है, और इसमें नेपाल राष्ट्र की सरपट वन-नीति काफी हद तक जिम्मेदार है। नेपाल सरकार ने अपने वनों और नेशनल पार्को की सुरक्षा फौजों के हवाले कर दिया है। जिससे भारतीय वनों पर नेपालियों का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। नेपाली शिकारियों से निपटने के लिए स्थानीय पार्क प्रशासन नेपाल के सीमावर्ती जिले कैलाली के अधिकारियों के साथ समय-समय पर होने वाली मैत्री बैठकों में अपनी बात रखता है और नेपाल इसमें सहयोग का आश्वासन भी देता है पर अमल नहीं करता। बाघों को बचाने के लिए जरूरत है अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवाहारिक वन-नीति की। फिलहाल जो भी हो लेकिन लम्बे अर्से से नेपालियों का शिकार हो रहे दुधवा के बाघों की संख्या अब इतनी नहीं रह गई है, कि वो सालों किसी नीति के बनने का इन्तजार कर सकें, उन्हें जरूरत है, तत्काल किसी ठोस कार्यवाही की जिससे वह इतिहास के पन्नों में सिमटने से बच सकें।
                                                
                                                   

महबूब आलम (लेखक एक प्रतिष्ठित अखबार से जुड़े हुए हैं, वन व वन्य-जीवों के सरंक्षण के मसलों पर लेखन कर रहे हैं, ये खीरी जनपद में दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में रहते हैं, इनसे m.alamreporter@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)
                                                                                                    


2 comments:

  1. आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.nice

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  2. Atul Saxena, Dehradun.March 6, 2010 at 2:54 PM

    Bharat main adhikansh logon ki samvednayen lagbhag shoonya ho chuki hain, adhiktar log apne faayde/nuksaan se alag kam hi soch paate hain, phir ye to baat tiger ko bachaane ki hai. asli zarurat to logon ko tigers se jodne ki hai, Rashtriya Parkon ke aaspaas ki abadi ko kai kaarno se restrict kar diya jaata hai, yadi unka koi pashu tigers maar dete hai to compensation bahut kam milta hai, janwar fasal barbad kar de to uska koi compensation nahi milta ya kam milta hai aise mein logon ka pashu/pakshiyon se mann se jud pana sambhav nahin hai. jab tak locals nahin judenge tab tak sarkaren kuchh nahin kar sakti, unhe to waise bhi ek baar sarkar banani hai banane ke baad agli baar ke liye vote jutane hain.

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