International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Mar 15, 2010

तू कब आयेगी

 रेखा सिन्हा*  कल मेरे एक परिचित का एस एम एस आया,तो मुझे उसके और उस जैसी कई और जो उसके साथ मेरे घर आती थी, उनकी याद आ गयी। बात
कोई बीस साल पहले की है, जब मैं अपने घर के बरामदे में बैठी चाय पी रही होती, तब ये कब आकर मेरे पास बैठ जाती मुझे पता ही नही चलता। कभी तो बिना पूंछे मेरी नमकीन की प्लेट में हिस्सा बटाने लगती। छुट्टी के दिन मैं जब देर से उठने का इरादा कर सोती तो ये जल्दी आ जाती और मुझे ढ़ूढने लगती। और जब मैं नही दिखती तो इनका शोर शुरू हो जाता। बरबस मुझे उठना पड़ता, कई बार तो बहुत बुरा लगता कि अपने ही मर्जी से अपने घर में सो नही सकते। जब मैं उदास और अकेले होती तो इनका आना अच्छा लगता कि चलो कोई तो है जो बिना नागा मेरा हाल लेने आता है। बदले में उसे क्या चाहिए, बस मेरे खाने का तिनका भर हिस्सा, इससे ज्यादा वह खा भी नही सकती क्योंकि उसका पेट ही छोटा सा था, छोटी गोल आँखें, भूरी-काली रंगत, कहीं-कहीं सफ़ेद होने का अहसास। अपने सिर को थोड़ा झुकाते हुए, जब वह मुझे टुकुर-टुकुर ताकती तो लगता बहुत कुछ कहना चाहती है, लेकिन दूसरे पल फ़ुर्र हो जाती और छज्जे पर बैठकर मुझे निहारने लगती। मैं उसकी किस्मत से रस्क करती कि वह जब चाहे हवा में उड़ सकती है, और जहाँ चाहे वहाँ पहुंच सकती है। अपनी सहेलियों के साथ उसका खेल मुझे याद आता है। एक दूसरे के पंख में चोंच घुसा कर  छेड़ना और उड़ जाना। हाँ मैं उसकी तरह गौरैया बन जाना चाहती थी। उसकी तरह स्वतंत्र उड़ान भरना चाहती थी। समय के साथ मैं उस घर से दूर होती गयी, पहले तो पढ़ाई के सिलसिले में फ़िर नौकरी के। बीच-बीच में जब भी घर जाना होता, मेरी सुबह उसी के साथ होती। फ़िर दस बरस पहले विवाह हुआ। अब गाहे-बगाहे उस घर जाने का अवसर आता है। अभी तीन बरस पहले घर गयी तो फ़िर उसकी याद आयी। लेकिन सुबह न वह आई और न उसकी सहेलियाँ। मुझे उम्मीद थी की जैसे मेरा बेटा मेरे साथ आया है। वैसे ही उसका बेटा या बेटी हमें जरूर मिल जायेंगे। लेकिन मेरी उम्मीद पूरी नही हुई। मैं छत पर देख आयी कि शायद दिख जाय लेकिन एक भी गौरैया नही दिखी। मैंने सोचा था कि अपने बेटे के साथ बैठकर उन्हे चावल खिलाऊंगी। मैने अपने पाँच वर्ष के बेटे को छत पर रखा एक बड़ा सा मिट्टी का बर्तन दिखाया, जो सूखा पड़ा था। मैने उसमें पानी भरा और चावल के कुछ दाने वहीं जमीन पर रख दिये, शायद मेरा निमंत्रण उन्हे मिल जाए। बेटे ने बड़ी मासूमियत से पूंछा- मम्मी इस पॉट में फ़ूल लगाओगी। मैने कहा नही बेटा, गौरैया को भी प्यास लगती है, ये पानी उसके लिए रखा है। जब वह आसमान में उड़ कर थक जायेगी, तो यहाँ आकर पानी पियेगी और दाना चुगेगी। दो दिन रहकर मैं वापस लखनऊ लौट आयी और व्यस्त हो गयी अपनी दिनचर्या में। रविवार को छत की सफ़ाई करने लगी तो देखा कि पिछली दीपावली में रंगोली के बीच में रखने के लिए जो टेराकोटा का पॉट मैं लायी थी, उसमें पानी भरा रखा है। खरीदते समय ये पॉट मुझे इस लिए भा गया था क्योंकि इसमे मिट्टी की बनी और रंगी हुईं चार चिड़ियाँ भी लगी हुईं थी। पास में ही खिड़की की ग्रिल से टेराकोटा का पाँच दियों का समूह लटका था। इसमें बाती और घी नहीं बल्कि चावल भरे थे। मैने बेटे को बुलाकर पूंछा तो उसने कहा- मम्मी तुम बनारस वाले घर में गौरैया ढ़ूढ़ रही थी न, मैने यहाँ उसके लिए खाना और पानी रख दिया है।....देखना उसको हमारा इनवीटेशन जरूर मिलेगा। मैं बेटे का मुँह देखती रही और दिल को सकून पहुंचा कि चलो अगली पीढ़ी में गौरैया को बुलाने की चाहत पैदा हो गयी है। और वह इसके लिए प्रयास कर रही है। दिल से दुआ निकली, हे! भगवान कुछ ऐसा करो कि गौरैया मेरे बेटे का इनवीटेशन कबूल कर ले!

(धन्यवाद लखीमपुर के  के०के० मिश्रा को जिन्होंने मुझे विश्व गौरैया दिवस २० मार्च में भागीदारी के लिए एस एम एस किया और मेरी स्मृतियों को ताज़ा कर दिया। अब तक मेरी छत पर पानी और चावल रखा है, जो मैं कुछ दिन पर बदल देती हूँ। मैं किसी दिन चौकना चाहती हूँ, जब दियें में रखे सारे चावल खत्म हो जायें।)

रेखा सिन्हा (लेखिका जर्नलिज्म के क्षेत्र में पिछले बीस वर्षों से सक्रिय हैं, एक प्रतिष्ठित अखबार में पत्रकारिता, उत्तर प्रदेश की राजधानी में निवास, इनसे rekhapankaj@hotmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

4 comments:

  1. रेखा जी बहुत दिनों के बाद लगा कि कोई संवेदनाओं को इस तरह भी जगा सकता है ..दुआ करता हू कि आपके बेटे का निमंतन स्वीकार हो

    ReplyDelete
  2. Respected Rekha ji,

    Gauraiya bachao muhim me aap ke judne par apko many-many thanks. Is misson par apki sahbhagita se hum sabhi un logo ki hausla-afjai hui hai jo "GAURAIYA BACHAO" muhim me jor-shor se jute hai. Umeed hai ki aage bhi apka Sahyog isi tarah milta rahega.

    Rishabh Tyagi (Beauro Cheif-Rastriya Sahara)
    E-mail : rishabh.lakhimpur@gmail.com

    ReplyDelete
  3. गोरिय्या बचाओ मुहीम के लिए आपको धन्यवाद

    ReplyDelete
  4. गोरिय्या बचाओ मुहीम के लिए आपको धन्यवाद

    ReplyDelete

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था