International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Mar 23, 2010

"सफरनामा-जहाँ काले नागों का बसेरा है, वहाँ एक घोंसला चिड़िया का था"

मयंक वाजपेयी* लखीमपुर के बस अड्डे पे खड़ी बस पे मै सीतापुर आने का इंतजार कर रहा था .मेरे सेलुलर पे घंटी आयी .देखा तो एक पत्रकार मित्र का फ़ोन था .मैंने हेल्लो कहा और उसने नया संबोधन दिया -गौरैया प्रणाम .और उत्तर में मै हंस  पड़ा .हम दोनों देर तक हँसते  रहे .ये हंसी कुछ जानी पहचानी थी .कुछ ऐसे ही मै तब भी हँसा था जब १२ वी के इम्तिहान में एक बार फेल होने के बाद पास होने का रिजल्ट मिला था .ऐसी ही हँसी शायद जख्मी योगेन्द्र यादव की भी थी जब कारगिल पे वो तिरंगा लहरा रहे थे .ऐसे ही शायद वो नौजवान भी हँसा होगा ...जब लाहौर के सेशन कोर्ट में उसने इन्कलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद का नारा लगाया होगा .
इतनी ही जोर की हंसी  आयी होगी खीरी की धरती के लाल राजनारायण को, जब उनको फांसी  बोली गयी थी .तभी तो उनका वजन बढ़ गया था ...आज मेरा भी वजन बढ़ गया था .हम भी एक अहम् काम कर वापस नौकरी पे लौट रहे थे .जी हां हम गारैया बचाने की अपील कर लौट रहे थे...! वो अजीब दिन था.अजीब सी हवा थी .मेरे जिस दोस्त ने मुझे गौरैया प्रणाम का संबोधन दिया ..वो सात दिनों से इस मुहिम में जुटे थे .गौरैया दिवस बीतने के बाद भी उनके भीतर एनर्जी बाकी  थी . ये पहला आदमी नहीं था जिसकी जुबान में गौरैया क़ी कुहुक बाक़ी थी ...लखीमपुर में पाँव  रखते ही जाने कितने मिले जो हमारे कारवां में शामिल हो चुके  थे .
मै गौरया दिवस मानाने क़ी कहानी सुनाने से पहले कुछ अपने संपादक यानी  के०के० के बारे में भी बताऊंगा .के०के० तो हिमालय का वो जोगी था जिसे मै गुफाओं से उतार लाया था .अपना ये वन्य जंतु प्रेमी उन महात्माओं के टाइप का था जो जंगल में बैठ कर तप करते है  ..उन तमाम सफ़ेद कलर वालों जैसा था जो एसी कमरों में बैठ कर ये तय करते थे, कि किसान क़ी फसल क़ी उपज कैसे बढाई जाये ...लेकिन पहली बार ये जोगी जनता के बीच आया था .यक़ीनन कुछ मागने नहीं ..अपने कासे से बहुत कुछ देने के लिए .उस दिन के०के० को जल्दी ज्यादा  ही थी .वाकई देर हो चुकी थी .मै, के०के० ,जनवार जी और डॉ दुबे निकल पड़े इस दिवस में शामिल  होने के लिए ..!फिर क्या हुआ ये आपको के०के० पहले ही बता चुके है .वहां से लौट कर मै वापस शहर आ गया .सोचा क़ि कुछ दोस्तों  से मिल लिया जाये .पर हमारे साथ तो गौरया भी चल रही है ,मुझे इसकी खबर न थी .लखीमपुर के कपूरथला के पास एक दोस्त का घर है  .वहा पंहुचा तो फिर वही किस्सा शुरू हो गया .आंटी  जी को मेरा टापिक कुछ जादा भा गया .बताया क़ि हमारे घर की छत पे बाबा जी दाने बिखेर देते थे .सवेरे के नाश्ते में सामने रख्खी भुजिया में से आधा हिस्सा गौरैया के लिए भी था ...ढेर सारी चिड़िया उसको देर तक टूंगती  थी .उस दिन जब बाबा जी हम सब को छोड़कर गए तो गौरैया को खबर नहीं लगी .बाबा जी रात के अँधेरे में हमसे दूर गए थे .तब गौरया शायद अपने बच्चों के संग सो रही होगी .अगली सुबह फिर आ गयी ,शोर सुनकर हम छत पे गए तो देखा क़ि गौरैया अपने अन्नदाता का इंतजार कर रही थी .पर कुछ देर में शायद उनको अहसास हो गया था क़ि अब शायद उनके लिए भुजिया प्लेट में नहीं बचाई जाएगी ...मेरा दोस्त और उनकी मां की  आंखे इस किस्से को कहते वक़्त गीली हो गयी .लम्बी सी सांस छोड़कर उन्होंने फिर कहा क़ि अच्छा हो क़ि गौरैया फिर लौट आये .वो आती है तो लगता है बुजुर्ग हमारे आसपास ही है .माहौल भारी हो चुका था .मैंने उनसे विदा ली .लौट के दूसरे मित्र से मिलने उसके अख़बार के दफ्तर पहुच गया .सोचा था क़ि टॉपिक बद्लूगा..पर मै दफ्तर में घुस बाद में पाया ..आवाज पहले आ गयी -मना आये गरगैया दिवस (हमारे इलाके में गौरया का एक नाम ये भी है ).मै सिर्फ मुस्कुरा सका .सामने मेज पे हिंदुस्तान अख़बार रखा था .
डॉ देवेन्द्र का लेख था -यही थे गौरया के घोसले .!
डॉ साहब में गौरैया को बचाने के बहाने सफेदपोशों को खूब नंगा किया था .सभ्यता ,संसकृति और शिक्षित होने का ढोल पीटने वालों का ढोल डॉ साहब ने अपने लेख में फोड़ दिया था .बहुतों को लगा क़ि डॉ साहब गौरया के लिए भी क्रांति की बात कर रहे थे .उन लोगों को ये खबर नहीं थी क़ि क्रांति की शुरुआत तो हो चुकी थी ...!
हमको लगने लगा था क़ि जीत सामने है .मंजिल करीब है .इस बीच दुधवा लाइव पर  विवेक भाई  ने दस्तक दे दी थी .विवेक भाई ने बहुत साल पहले भीरा के इलाके में हुए अग्निकांड को कवर किया था .उसकी हेडिंग लगी थी -न चिड़िया चहकी और न मुर्गे ने दी बांग.!उस दिन विवेक भाई क़ि खबर मेरी समझ में नहीं आयी थी .लेकिन आज विवेक ने जो लिखा वो मेरे जेहन में घर कर गया था .विवेक भाई ने हम सब को रुला दिया .हम सब उनसे परिचित है .वह  भी रुलाते तो खूब है //आज शायद वो भी रोये थे .! अगर वो कोई कहानी लिखते तो शायद दुसरे रो पड़ते लेकिन ये कहानी तो थी नहीं ..वो सच था जिसे कहने के लिए विवेक होना जरुरी है और हर कोई विवेक हो नहीं सकता ! इसलिए दुनिया के खोखले नियमों और सड़े हुए सिस्टम क़ि बदबू को अपने जेहन में भरे बगैर विवेक ने गौरया की वापसी की ईमानदारी से दुआ की थी .
धीरे धीरे रात गहरा गयी .हमारी बातों से गौरया अभी भी नहीं गयी थी .रात को थक कर मै सो गया था ..सपने में भी गौरैया मेरा पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ रही थी .सपने में मैंने देखा क़ि शायर अहमद फराज ने मुझे गौरैया के बारे में कुछ लिखकर दिया है ...मै अपने दफ्तर में बैठा उसे पढ़ ही रहा था क़ि डॉ एससी मिश्रा के स्कूटर का हार्न बज गया और मेरी आंख खुल गयी .डॉ मिश्रा हमारे वाई डी कालेज में राजनीति शास्त्र पढ़ाते है .उनके हार्न क़ि आवाज के संग अहमद फराज के लेख की गौरैया तो उड़ गयी लेकिन डॉ मिश्रा ने उसे एक बार फिर डॉ देवेन्द्र के अहाते में बिठा दिया था .उन्होंने इतवार क़ि चर्चा ही गौरया के संग किया था ...फिर ढेर सारे  लोग शामिल हो गये और फिर गौरया दिवस की गोष्ठी शुरू हो गयी ...!
मुझे याद आ गयी २० मार्च की सुबह .मुझे जल्दी जागना था .मोबाइल पर अलार्म भी ६ बजे का था .बजा भी लेकिन नीद नहीं टूटी .वजह थी आदत .तमाम बुरी आदतों के साथ देर रात तक जागना और सुबह देर से जागने की आदत है मेरी.पर उस दिन नीद नहीं आयी.मुझे के०के० का वो आदेश याद आया की सवेरे सात बजे आना है .मै नहीं जग पाया .जगा तो ९ बज चुके थे .सीधे बस अड्डे की ओर भागा .जल्दी लखीमपुर पहुंच जाना था .उस दिन जब मै सो रहा था तो लगा कि कोई गारैया मेरे रूम के पंखे से टकरा कर गिर गयी है .मै हडबडाहट में कई बार जागा.फिर सोया ...उस दिन लगा कि यार ये गौरैया कहां से मेरे सपनों में आ रही है .बस वो दिन है और आज का दिन है ...गौरया सपनो से जा ही नहीं रही .कभी कभी इन्सान ऐसा झूठ भी बोलता है जो पकड़ में आ जाये ..मै दुआ करता हू क़ि आप भी मेरा एक झूठ पकड़ ले क़ि मै गौरिया के सपनो में आने से ऊब रहा हूं ..!सच ये है क़ि वो हमेशा आये और पंखे उसे देख के ठहर जाये ..एसी उसे देखकर बंद हो जाये ..पक्के मकानों में भी धन्नी निकल आये ..और रोशन दान पे उसका बसेरा फिर आबाद हो जाये ...और शायद उसके बाद डॉ दुबे को अपनी  बिटिया को ये बताना नहीं पड़ेगा क़ि एन फॉर नोज ही नहीं नेस्ट भी होता है ..!और शायद उस दिन डॉ मुन्नव्वर राना को ये नहीं लिखना पड़ेगा क़ि -मुहब्बत बहुत सी बातें बुनियादी बताती है ..जो परदादी बताती थी ,वो ही दादी बताती है ..जहां पे आज काले नागों का बसेरा है ,वहां एक घोसला चिड़िया का था दादी बताती है ...!आमीन !
 मयंक वाजपेयी* ( लेखक अमर उजाला दैनिक अखबार सीतापुर में पत्रकार हैं, कविता और मानवीय मुद्दों पर लेखन, आंदोलनी विचारधारा से हैं। इनसे mayankbajpai.reporter@gmail.com संपर्क कर सकते हैं। )

3 comments:

  1. अलख जगाये रखें..इस दिशा में अनेक प्रयासों की आवश्यक्ता है.

    --

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

    ReplyDelete
  2. ham ek baar fir kahenge ki tum bahut aage jaooge mere dost

    ReplyDelete
  3. मै भी‌ लखीमपुर खीरी से हूँ मित्र, एक बहनोई सीतापुर मे हैं। बता नही सकता यहाँ अमरीका मे बैठ कर लखीमपुर का नाम सुन कर कैसा लग रहा है। मेरा निवास नई-बस्ती मे है। अलख जलाये रखिये।

    ReplyDelete

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था