International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Dec 31, 2013

पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह की तृतीय पुण्यतिथि पर उन्हें नमन


टाइगर मैन बिली अर्जन सिंह की याद में .....

कुंवर अर्जन सिंह जिन्हें लोग टाइगर मैन की संज्ञा देते है इस गुजर रहे साल और आने वाले नए वर्ष के पहले रोज यानी एक जनवरी सन २०१४ को बिली अर्जन सिंह की तृतीय पुण्य तिथि है, नव वर्ष के प्रथम दिन सन २०१० में बिली अर्जन सिंह का देहावसान हुआ और इसी रोज से दुधवाकेजंगलों की निगेहबानी करने वाले व्यक्ति के साथ साथ वो कवायदे भी ख़त्म हो गयी जो इस भ्रष्ट व्यवस्था पर सवाल करती थी.

उन्हें याद करने का जो हमारा मंसूबा है, वह तभी पूरा हो सकता है जब उनके मकसदों को हम आगे बढाए और लोग जान सके की बाघ और जंगल का नाता क्या है, बिली ने कहा था की “बाघ नहीं रहेगा तो जंगल नहीं बचेंगे और जंगल बारिश लाते है बिना बारिश के, शुद्ध हवा के इंसान भी नहीं रह सकता, जैसे मुसलमान का अल्लाह है, ईसाई का गाड है, वैसे जंगल का भगवान् शेर है” 

बिली अर्जन सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत के सयुंक्त प्रांत के गोरखपुर में पंद्रह अगस्त सन १९१७ में हुआ, उस वक्त इनके पिता जसबीर सिंह ब्रिटिश भारत के एक बड़े अफसर के तौर पर वहां तैनात थे, सन १९२३ में बिली के पिता बलरामपुर स्टेट के कोर्ट आफ वार्ड नियुक्त किये गए, और यही से बिली के जंगलों से रिश्ते की शुरूवात हुई, बारह वर्ष की आयु में इन्होने एक तेंदुए का शिकार किया और चौदह वर्ष की आयु में बाघ का और यह सिलसिला अनवरत चलता रहा लखीमपुर खीरी के जंगलों की उस रात तक जब बिली ने एक तेंदुए का शिकार किया तभी एक दूसरा तेन्दुआ जीप की लाईट के सामने से गुजर कर मर चुके तेंदुए की तरफ जा रहा था एक तेंदुए की आँखों की चमक देखी और दूसरे की आँखों की बुझी हुई चमक से बिली आहात हुए और उस रोज उन्होंने प्रतिज्ञा ली की प्रकृति के इन खूबसूरत जीवों को जिनका निर्माण मैं नहीं कर सकता तो इन्हें मारने का मुझे कोइ हक़ नहीं है.

बिली को पंद्रह साल की उम्र में फिलैंडर स्मिथ कालेज नैनीताल भेजा गया, जहां जिम कार्बेट ने शिक्षा ग्रहण की थी, इसके बाद इलाहाबाद में इन्होने शिक्षा ली, इन्हें आक्सफोर्ड भेजने की जो तैयारी की गयी थी, विश्व युद्ध शुरू हो जाने के कारण वह योजना साकार रूप न ले सकी, बिली ने ब्रिटिश इन्डियन आर्मी में स्वैच्छिक सेवा के तौर पर भारती ले ली, वर्मा और ईराक तक बिली ने ब्रिटिश भारतीय फौजों के साथ काम किया, पिता की मृत्यु की सूचना मिलने पर वह ईराक से वापस आये और फिर खेती करने के इरादे से खीरी के जंगलों की तरफ रूख किया खीरी के जंगल इनके लिए कोइ अपरिचित जगह नहीं थी, क्योंकि यहाँ बिली कभी अपने मित्रों के साथ शिकार पर आया करते थे,



जसबीर नगर से टाइगर हैवन तक का सफ़र 
सन १९४५ में वो खीरी आये और पलिया के निकट जमीन लेकर खेती करने लगे, इस जगह का नाम इन्होने अपने पिता के नाम पर रखा. एक बार भगवान् पियारी(हथिनी) पर सवार होकर बिली नार्थ खीरी के जंगलों में भ्रमण पर निकली तो सुहेली और नेवरा के मध्य जो स्थान दिखा उसकी रमणीयता ने बिली को प्रभावित किया. यह बात है सन १९४९ की और यही वह जगह थी जहां विश्व प्रसिद्द टाइगर हैवन का प्रादुर्भाव होना था! 
जंगल के मध्य इस जगह को बिली ने अपनी रिहाइश बनाई जो बाद में बाघों और तेंदुओं का घर बना. सन १९७१ में टाइगर हैवन  में दो नए मेहमान आये एक था प्रिंस जो तेंदुआ था और दूसरी थी एली एक कुतिया, यहीं से बिली अर्जन सिंह के प्रयोग की शुरूवात हुई की पालतू जानवरों को जंगल में दुबारा प्राकृतिक व् स्वछंद जीवन जीने के लिए ट्रेंड किया जाए, बाघ और तेंदुओं जैसे शिकारी जानवरों के साथ यह प्रयोग कितने खतरनाक और रोमांचित कर देने वाले थे. 

श्रीमती इंदिरा गांधी और कुंवर अर्जन सिंह 
श्रीमती इंदिरा गांधी के सौजन्य से बिली को दो तेंदुए भेंट के तौर पर मिले जूलियट और हैरियट बिली ने इनके नाम शेक्सपीयर के नाटक के पात्रों पर रखे, इन दोनों तेंदुओं को जंगल में वापस भेजने की बिली की कोशिश कुछ कारणों से आंशिक तौर पर सफलता मिली, हैरियट ने तो बच्चे भी दिए और वह भी जंगल में बिली के घर से दूर, यानी जहां वह पली बड़ी उस जगह को छोड़कर अपने प्राकृतिक आवास में चली गयी, लेकिन उसका व्यवहार अजीब था एक दिन वह अपने बच्चों के साथ टाइगर हैवन वापस आयी, अपने चिरपरिचित स्थान पर, बिली ने फिर उसे सुहेली के पार घने जंगलों में वापस भेजा. इन घटनाओं पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी जो बहुत विख्यात हुई इस फिल्म का नाम था “द लियोपर्ड कैन नाट चेंज्ड इट्स स्पाट्स”. सन १९७६ में इंग्लैण्ड के चिड़ियाघर से एक बाघिन के शावक को लाने की इजाजत मिली बिली अर्जन सिंह और यह वही बाघिन थी जो तारा के नाम से विख्यात हुई पूरी दुनिया में एवं डा. रामलखन सिंह की किताबों में कुख्यात हुई एक आदमखोर के तौर पर!
   

तारा-एक बाघिन 
बिली अर्जन सिंह जिस तारा को  सन १९७६ में इंग्लैण्ड के टाईक्रास जू से लाये थे, उसका नाम जेन था, वह एक रायल बंगाल टाइगर और साईबेरियन टाइगर का क्रास थी, जब इस बात की पुष्टि हुई तो अर्जन सिंह पर दुधवा के बंगाल टाइगर में  साइबेरियन जीन वाली तारा के जरिये आनुवांशिक प्रदूषण फैलाने का आरोप लगा. 

बिली ने तारा को टाइगर हैवन के प्राकृतिक जंगली माहौल में प्रशिक्षित करना शुरू किया, तारा बड़ी होती गयी, और बिली के अनुशासन की अनदेखी करने लगी, बिली यही तो चाहते थे की तारा अपने जंगली शिकारी स्वभाव को अपना ले, और यही हुआ एक दिन तारा दुधवा के बाघ के साथ चली गयी, बिली के लिए यह वैसे ही था जैसे एक पिता के लिए बेटी का ससुराल जाना, खुशी और गम दोनों एक साथ उपजते है तब! और बेटियां कहा रुकती है हमेशा अपने घर में! 

तारा ने कुछ महीनों बाद दो बच्चों को जन्म दिया, बिली लगातार तारा पर नज़र रखने की कोशिश करते की उनकी पाली हुई यह बाघिन दुधवा के जंगलों के खूंखार बाघों के बीच सुरक्षित है की नहीं, और तारा भी गाहे बगाहे अपने बचपन के घर टाइगर हैवन आ जाती....पर यह आने जाने का सिलसिला बहुत दिनों तक नहीं चला, तारा पूर्ण रूप से दुधवा के जंगल में अपनी जगह बना चुकी थी, तभी जंगल में मानव भक्षण की घटनाएं तेज हो गयी और आरोप तारा के सर लगाए जाने लगे. बिली के प्रयोग को यह सबसे बड़ा धक्का था, कई मानव मौतों के बाद तारा को मारने का  सरकारी फरमान जारी हुआ, और एक बाघिन मारी भी गयी जिसे तारा बताया गया? सच्चाई अभी भी समय के गर्भ में है! मानव भक्षण के दौरान कई टाइगर मार दिए गए अब चाहे वह मानव भक्षी हो या फिर न हो.

दुधवा में तारा की संतति 

खैर बिली साहब मुझसे अंत तक कहते रहे की तारा दुधवा के जंगलों में अपनी कई पीढ़ियों को जन्म देने के बाद प्राकृतिक मौत को प्राप्त हुई.
अभी हाल में दुधवा से बाघों के डी एन ए  सैम्पल लिए गए और उनकी जांच की गयी, जिसमे दुधवा के बाघों में साइबेरियन जीन की पुष्टि हुई?, इनका चेहरा बड़ा, चौड़ी धारियां और शरीर पर ज्यादा सफेदी अपेक्षाकृत बंगाल टाइगर के .....व्यवहारिक तौर पर बिली को जो सफलता मिली अपने प्रयोगों में वह वैज्ञानिक तौर पर भी लगभग पुष्ट हो गयी है, इसी के साथ बिली अर्जन सिंह दुनिया के पहले व्यक्ति हो गए जिन्हों ने बाघों के पुनर्वासन के कार्यक्रम में सफलता पाई.

जब राजकुमारी अमृतकौर ने अर्जन सिंह को बिली कहा...

  अर्जन सिंह  का नाम बिली उनकी बुआ राजकुमारी अमृतकौर का दिया हुआ है, राजकुमारी अमृत कौर महात्मा गांधी की निकटस्थ और आजाद भारत की प्रथम महिला स्वास्थ्य मंत्री बनी, बिली ब्रिटिश भारत की बड़ी रियासत कपूरथला से ताल्लुक रखते है, इनके दादा राजा हरनाम सिंह और परदादा राजा रंधीर सिंह थे.
सन १९२४ में बिली का परिवार नैनीताल गया छुट्टिया मनाने और ये लोग बलरामपुर रियासत के स्टैनली हाल में ठहरे, जहां बिली ने पहली बार जिम कार्बेट को देखा, बिली के प्रेरणा स्रोतों में जिम कार्बेट के अलावा ऍफ़ डब्ल्यू चैम्पियन रहे जो एक वन अधिकारी थे, उनकी किताब “विद अ कैमरा इन टाइगर र्लैंड एंड द जंगल इन सन लाईट एंड शैडो” ने बहुत प्रभावित किया बिली को.


एक मुलाक़ात के दौरान बिली अर्जन सिंह ने मुझसे कहा की तुम तो लिखते हो, ये लिखो की उनके पिता जसबीर सिंह  ब्रिटिश भारत में पहले भारतीय डिप्युटी कमिश्नर थे लखनऊ में, इस बात को आज पहली बार मैं लिख रहा एक बेहतरीन उद्दरण के साथ, एक किताब है “द मेन हू रूल्ड इंडिया” इसके दुसरे खंड में एक फिलिप नाम के अंग्रेज ने कहा है की जसबीर सिंह मेरे पहले डिपुटी  कमिश्नर थे, वो एक फिलासफर, और अच्छे इंसान थे सन १९४५ में उनकी मृत्यु हो जाने पर मुझे ऐसा लगा की मैंने अपने पिता को खो दिया.

पद्मश्री से पद्मभूषण 

बिली साहब को सन १९७५ में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया, सन १९७६ में विश्व प्रकृति निधि द्वारा गोल्ड मैडल दिया गया, सन २००४ में बाघ सरक्षण में उनकी महत्त्व पूर्ण भूमिका होने के कारण वन्य जीवन के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला जे. पाल गेटी अवार्ड मिला. सन २००६ में बिली अर्जन सिंह पद्मभूषण सम्मान से भारत सरकार ने नवाजा, इसी वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार में मुलायम सिंह ने बिली को यश भारती से भी सम्मानित किया. वन्य जीव सरंक्षण में कुंवर् अर्जन सिंह को मिले पुरस्कारों की फेहरिस्त इतनी लम्बी है की कहा जाता है की वन्य जीवन में काम करने वाले बिली ऐसे व्यक्ति है पूरी दुनिया में की इनसे ज्यादा पुरस्कार किसी को नहीं मिले अब तक! 


इन्डियन वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य होने के साथ साथ अर्जन सिंह दुधवा के अवैतनिक वन्य जीव प्रतिपालक रहे जीवन पर्यंत, नार्थ खीरी के विशाल जंगलों को दुधवा राष्ट्रीय उद्यान बनवाने का श्रेय बिली अर्जन सिंह को है, नतीजतन तराई के जंगलों में बाग़ तेंदुओं के अतरिक्त जीव जंतुओं की अनगिनित प्रजातियां सरक्षित हो सकी.

सन २०१० के पहले दिन कुंवर अर्जन सिंह का देहावसान उनके जसबीर नगर के निवास पर हुआ, बाघों का रखवाला और जंगल की निगहबानी करने वाला चला गया, पर अपने बहुत सारे अनुभव हमें दे गए बिली साहब उनके बनायी हुई डगर जो जंगल और उनमे रहने वाले बाघों के सरक्षण की तरफ जाती है उस डगर पर हमारी उगली पकड़कर हमें खडा भी कर दिया है उन्होंने अब हमारी जिम्मेदारी है की उनके सपनो को हम पूरा करे ताकि तराई के जंगलों में बाघ तेंदुए और जंगल सभी कुछ महफूज रह सके.


कुंवर अर्जन सिंह ने अपने वन्य जीवन के अनुभवों को लिखा वो तमाम किताबों के रूप में हमारे बीच मौजूद है. 
तारा ए  टाइग्रेस 
एली एंड द बिग कैट 
प्रिंस आफ कैटस 
टाइगर टाइगर! 
टाइगर हैवन
द लीजेंड आफ द मैनईटर   
ए टाइगर स्टोरी 
वाचिंग इंडियाज वाइल्डलाइफ़ 

बिली अर्जन सिंह पर लिखी गयी कुछ प्रसिद्द किताबें 
आनरेरी टाइगर 
टाइगर वाला 
टाइगर आफ दुधवा 

बिली अर्जन सिंह के बाघों एव तेंदुओं के साथ किए गए प्रयोगों पर बनी फ़िल्में 
टाइगर टाइगर 
द लेपर्ड कैन नाट चेंज्ड इट्स स्पाट्स 
फायर इन थाइन आईज  



सम्पादक की कलम से !

      







कृष्ण कुमार मिश्र 
(editor.dudhwalive@gmail.com)




Dec 20, 2013

आखिरकार.. मानव जंगलों में भागकर अपनी जान बचा रहा था !

Photo Courtesy: NASA

प्रकृति के विनाश की पुरजोर कोशिशो में  लगा मानव और इन भयावह हालातों पर वेदनाओं की बेहतरीन अभिव्यक्ति की राम सिंह यादव ने अपनी कलम से..... कुछ इस तरह की हम जिस बुनियाद पर कायम है उसे ही नस्तेनाबूत किए जा रहे है !।. संपादक 
*********

अरे ओ, कलम के देवताओं
सुना है तुम इतिहास लिखते हो ?
वर्तमान को शिक्षा देते हुए
भविष्य का आईना दिखाते हो ?

क्या यह हकीकत है
कि तुम वो देवता हो, जो दुनिया बचाते हो ?

हाँ शायद ये सच है
पालने से लेकर मृत्यु शैयया पर लेटा-मानव
तुम्हारी लिखी इबारतों का
अनुसरण करता है।
तुम्हारी लिखी धुरी पर
उसका चक्र पूरा होता है।।

तुम लिखते हो,
भगवान का स्वरूप ऐसा है........
वो मान लेता है।।
तुम लिखते हो,
मुजफ्फर नगर दंगा इसने कराया
पांच सौ कोस दूर बैठा अनजान मानव,,,,,,,,
विरोधी सम्प्रदाय वालों को मारने लगता है। 

  
तुम लिखते हो,
विकास का स्वरूप ऐसा है
चैड़ी सड़कें, गगनचुंबी अट्टालिकाएं,
सीमेन्ट और डामर से पटे ऊसर मैदान......
रोशनी से नहाते शहर.......
आह व्यावसायिक मानव का, खूबसूरत और नयनाभिराम सपना.......।।।।


पर क्या तुमने लिखा........
भूमिजल खत्म होने का मुख्य कारण ??
क्या तुम लिखोगे ?
दस मंजिल ऊपर रहने वाला
कृत्रिम बिजली खत्म होने पर
दो सौ फीट गहरा पानी कैसे पीयेगा ??

  

क्या तुमने लिखा,
झूठे विज्ञापनों के दम पर
क्षणिक स्वच्छता दिखाने वाले............
लाइफबाय, लक्स, हार्पिक, विम, रिन,
लइजाल, क्लीनिक प्लस वगैरह वगैरह ने.......
नालियों और नदियों का क्या हश्र किया ????

अब इस पानी में कोई 
मछली नही है
जो मच्छरों के लार्वा को खा सके
और मानव को डेंगू से बचा सके..........

अब इस रासायनिक जल में मरे हुये
असंख्य जीवों से उत्पन्न.....
मानव कवलित करने वाली
मीथेन आदि गैसो का साम्राज्य है ।।




क्या तुमने लिखा,,,,,,
उत्तराखण्ड त्रासदी के जिम्मेदार
मानव निर्मित सैकड़ों बांध........ 
जो असंख्य लहलहाते पेड़ों को 
काट कर हो रहे थे...........
हास्यास्पद था देखना
काल का ग्रास बना मानव......
जंगलों मे भागकर
जान बचा रहा था ।।।


क्या तुमने लिखा ?
जापान का अंजाम देख कर भी
लालची नेताओं द्वारा एटमी करार का महिमा मंडन.........
किस भविश्य को परिलक्षित कर रहा है ????

   


क्या तुमने लिखा ???
सद्दाम से लेकर लादेन तक ??
सीरिया, इराक, अफगानिस्तान,
रूस, जापान, ईरान, लीबिया, वियतनाम,
कोरिया या पाकिस्तान........
इन बिके पत्रकारों के दिखाते झूठ पर ????


क्या तुमने लिखा ???
सभ्यताओं को नष्ट करना
और उसके पीछे छिपा
साम्राज्यवाद का लक्ष्य ???

क्या तुमने लिखा ???
एटम बम, जैविक-रासायनिक हथियार,
ड्रोन इत्यादि का प्रयोग किसने किया ??

   

क्या तुमने लिखा ???
किसने हथियारों की होड़ बढाई ??
किसने अंतरिक्ष से लेकर अंटार्टिका तक
पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद किया ??
किसने पेप्सी जैसे पेयों से
बच्चों तक को कैंसर बांटे ???

अब तो हद हो चुकी......
तुम्हारी लेखनी की अब जरूरत नही........
मानव दूसरी प्रकृति बना रहा.......
हार्प प्रोग्राम से हैयान तो शुरूआत मात्र थी......

     

मानव का अनंतमि लालच.......
स्वयं मानव सम्यता के लिये,
दो गज जमीन पर खत्म होने जा रहा।।

   

क्या तुम लिख सकोगे ??????
प्रकृति के विरूद्ध अजेय सम्यताएं............
आज समंदर की गहराईयों
या परतों में दबी कहानियां सुना रही हैं।।।।।।। 
वन क्रान्ति-जन क्रान्ति 
**********

लेखक: राम सिंह यादव 
संपर्क: yadav.rsingh@gmail.com 

Dec 6, 2013

दुधवा नेशनल पार्क में बाघ ने गैंडा बच्चे को मौत के घाट उतारा

Image Courtesy:  greater one-horned rhino with baby via Shutterstock & planetsave.com

विश्व की इकलौती है दुधवा गैंडा पुनर्वास परियोजना

-दुधवा नेशनल पार्क से डीपी मिश्र

लखीमपुर-खीरी। यूपी के मात्र दुधवा नॅशनल पार्क के सोनारीपुर वनरेंज के ककराहा जंगल में बाघ ने चौदह माह के गैंडा बच्चे को मार डाला है। इस सूचना से पार्क प्रशासन में हड़कम्प मच गया है। मौके पर पहुंचे डिप्टी डायरेक्टर ने घटना स्थल का निरीक्षण किया। तीन डाक्टरों के पैनल ने शव  का पोस्टमार्टम किया है। इसके बाद शव  को दफन कर दिया गया। इस घटना से दुधवा के 32 सदस्यीय गैंडा परिवार की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है।

दुधवा नेशनल पार्क के सोनारीपुर वनरेंज के तहत 27 वर्गकिमी के जंगल में सौरउर्जा से संरक्षित इलाका में विश्व की एकमात्र गैंडा पुनर्वास परियोजना चल रही है। इसमें 33 सदस्यीय गैंडा परिवार स्वछंद कर रहा है। बीते दिवस बाघ ने मादा गैंडा ‘सदा‘ के चैदह माह के फीमेल बच्चे पर हमला करके उसे मौत के घाट उतार दिया। हाथी से गैंडों की मानीटरिंग में जंगल गई टीम को गैंडा के बच्चे का क्षत बिछत षव ककराहा के जंगल में पड़ा दिखाई दिया। बाघ द्वारा गैंडा के बच्चे का षिकार किए जाने की मिली सूचना पर पार्क प्रषासन में हड़कम्प मच गया। दुधवा नॅशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर बीके सिंह, बेलरायां वार्डन एके श्रीवास्तव, सोनारीपुर रेंजर एमके शुक्ला आदि मौके पर पहुंच गए और घटना स्थल का निरीक्षण किया। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के गैंडा विशेषज्ञ रूचिर की देखरेख में डब्ल्यूटीआई के डाक्टर सौरभ सिंघई, डाक्टर नेहा सिंघई और राजकीय पषु चिकित्साधिकारी डाक्टर राजेष निगम ने क्षत बिछत गैंडा के बच्चे के षव का पोस्टमार्टम किया। डाक्टरों की टीम ने बच्चे की उम्र लगभग चैदह माह बताई है। बाद में वार्डन एके श्रीवास्तव ने अपनी देखरेख में षव को दफन करा दिया। 

इससे पहले इसी साल 9 जनवरी को बाघ ने ककराहा क्षेत्र के जंगल में मादा गैंडा पावित्री के एक माह के बच्चे को मार डाला था। और 29 जनवरी को दुसाहसी बाघ ने फिर से मादा गैंडा पावित्री पर हमला करके मौत के घाट उतार दिया था। जबकि इससे पहले 10 दिसम्बर 2012 में बाघ ने दीपा नामक मादा गैंडा पर हमला करके उसे बुरी तरह से घायल कर दिया था। बाघ द्वारा गैंडों पर किए जाने वाले ताबड़तोड़ हमलों के कारण गैंडों के लिए अब संरक्षित जंगल उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया है, साथ ही गैंडा परिवार की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। दुधवा नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर बीके सिंह ने बताया कि इस घटना का गंभीरता से गैंडों को सुरक्षा बढ़ा दी गई है साथ ही स्टाफ को सतर्कता बरतने और लगातार निगरानी करने के आदेश दिए गए हैं।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
dpmishra7@gmail.com

Dec 5, 2013

ग्रामीणों ने महान जंगल पर जताया अपना अधिकार


अमिलिया निवासियों ने सामुदायिक वनाधिकार को पाने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की

सिंगरौली5 अगस्त 2013। महान जंगल पर अपने अधिकार के लिए आंदोलनरत स्थानीय लोगों ने अपने संघर्ष को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए महान जंगल पर वनाधिकार कानून 2006 के तहत अधिकार लेने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। ग्राम स्तरीय वन अधिकार समिति अमिलिया ने उप-खंड स्तरीय समिति तथा अनुविभागीय अधिकारी वनाधिकार समिति सिंगरौली से वनाधिकार कानून के तहत महान जंगल के बारे में जानकारी और दस्तावेजों की मांग की है।
वन अधिकार समिति अमिलिया के अध्यक्ष हरदयाल सिंह ने इस संबंध में अनुविभागीय अधिकारी वनाधिकार समिति सिंगरौली के पास आवेदन देकर वन अधिकार अधिनियम 2 के नियम 12(4) के अनुसार जानकारीअभिलेख एवं दस्तावेज की अधिप्रमाणित प्रति के लिए अनुरोध किया है। 
अमिलिया ग्राम वनाधिकार समिति ने उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति को लिखे पत्र में मांग की है कि उन्हें वे कागज मुहैया कराये जायें जो उनका महान जंगल पर निर्भरता को साबित करता हो तथा जिससे उन्हें वनाधिकार कानून को हासिल करने में मदद मिले।
ग्राम वनाधिकार समिति के इस कदम से महान जंगल क्षेत्र में कोयला खदान आवंटन के दूसरे चरण की पर्यावरण मंजूरी के लिए प्रयासरत राज्य सरकार व महान कोल लिमिटेड को झटका लगा है। इस कोयला खदान के आने से अमिलिया सहित 14 गांवों के लोगों की जीविका खतरे में पड़ जायेगी।
महान संघर्ष समिति की सदस्य तथा ग्रीनपीस की सीनियर अभियानकर्ता प्रिया पिल्लई सामुदायिक वनाधिकार के दावे के लिए शुरू की गयी कानूनी प्रक्रिया को अमिलिया के गांव वालों के संघर्षों की जीत बताती हैं। वे कहती हैं कि ग्रामीण सामुदायिक वनाधिकार की पहचान के लिए दावा कर सकते हैं। पहली चरण के अंतर्गत ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति द्वारा उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति से संबंधित कागजात की मांग की गई हैजिसमें सभी तरह के ऐतिहासिक दस्तावेज होते हैं जिससे उनके दावे को साबित करने में मदद मिलती है
सामुदायिक वनाधिकार दावे की प्रक्रिया
ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति द्वारा  उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति को वनाधिकार कानून के तहत जंगल का नक्शानिस्तार पत्र और वन संसाधन की योजना से जुड़े अन्य दस्तावेजों की मांग से संबंधित पत्र  भेजा गया है। उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति द्वारा सारी सूचनाओं के मुहैया करा देने के बाद ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति अमिलिया जरुरी कागजातों के साथ  सामुदायिक वनाधिकार दावे के लिए फॉर्म भरेगी। इसके बाद फॉर्म को ग्राम सभा द्वारा जांची जाएगी। जांच के बाद फॉर्म को उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति को सौंप दिया जाएगा और फिर अंत में फॉर्म जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाले जिला स्तरीय समिति में भेजा जाएगा। जिला स्तरीय समिति सामुदायिक वनाधिकार के दावे को स्वीकार कर अमिलिया ग्राम सभा को इस संबंध में पत्र प्रदान करेगी।
    वनाधिकार समिति अमिलिया के अध्यक्ष हरदयाल सिंह उम्मीद जताते हैं कि उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति जल्द ही सारे कागजात को मुहैया करा देगी जिससे सामुदायिक वनाधिकार दावे की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। वे कहते हैं कि ये दस्तावेज हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इससे हमें अपने महान जंगल पर सामुदायिक अधिकार के दावे को मजबूती प्रदान होगी। मेरा पूरा गांव महान जंगल पर निर्भर है जिसे कोयला खदान के लिए देना प्रस्तावित है। महान संघर्ष समिति मेरे गांव में वनाधिकार कानून को लागू करवाने के लिए प्रयासरत है
हरदयाल सिंह महान संघर्ष समिति के सदस्य भी हैं। महान संघर्ष समिति ने मांग की है कि जल्द से जल्द सारे दस्तावेज मुहैया कराये जायें जिससे वनाधिकार कानून के उल्लंघन को रोका जा सके।

(पृष्ठभूमि)
महान जंगल
प्राचीन साल जंगल वाला महान के क्षेत्र को कोयला खदान के लिए देना प्रस्तावित है। इस कोयला खदान को पहले चरण का निकास मिल चुका है लेकिन दूसरे चरण के निकास के लिए पर्यावरण व वन मंत्रालय ने 36 शर्तों को भी जोड़ा है। इन शर्तों में वनाधिकार कानून 2006 को लागू करवाना भी है। महान जंगल पर 14 गांव प्रत्यक्ष तथा करीब 62 गांव अप्रत्यक्ष रुप से जीविका के लिए निर्भर हैं। महान में कोयला खदान के आवंटन का मतलब होगा इस क्षेत्र में प्रस्तावित छत्रसालअमिलिया नोर्थ आदि कोल ब्लॉक के लिए दरवाजा खोलनाजिससे क्षेत्र के लगभग सभी जंगल तहस-नहस हो जायेंगे।

महान संघर्ष समिति
महान जंगल पर जीवोकोपार्जन के लिए निर्भर पांच गांवों (अमिलिया, बंधोराबुधेरसुहिरा तथा बरवांटोला) के ग्रामीणों ने महान कोल लिमिटेड (एस्सार व हिंडाल्को का संयुक्त उपक्रम) को प्रस्तावित कोयला खदान का विरोध तथा अपने वन अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक संघर्ष करने के लिए महान संघर्ष समिति का गठन किया है। अब समिति वनाधिकार कानून 2006 के तहत जंगल पर अपना अधिकार पाने के लिए प्रयासरत है।

 अविनाश कुमार, ग्रीनपीस 
avinash.kumar@greenpeace.org 

Nov 24, 2013

A Gift From an Ornitholist


उरूज़ साहिद ( पक्षी वैज्ञानिक ) ने  दुधवा लाइव पत्रिका  के लिए  यह तस्वीर भेंट की है, यह उनकी स्वनिर्मित तस्वीर उरूज साहिद कम्प्युटर की भी विधाओं की आला दर्जे की मालूमात रखते हैं.

 उरूज साहिद का फेसबुक पता है- https://www.facebook.com/uruj.shahid

दुधवा लाइव डेस्क*

Nov 22, 2013

…अब महान जंगलों से गूँज रही है आवाज

लोगों के संघर्ष को आवाज देता रेडियो संघर्ष
सीजीनेट की सहायता से ग्रीनपीस ने शुरू किया सामुदायिक मोबाईल रेडियो
विधानसभा चुनावों के समय लोगों को मिली आवाज
 नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के चुनावी मौसम में सभी राजनीतिक दलों के नेता अपनी घोषणाएँ और वादे मीडिया के सहारे लोगों तक पहुंचाने में लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के महान जंगल क्षेत्र (सिंगरौली) में लोग अपनी आवाज और सरोकार नेताओं और अफसरों तक पहुंचाने के लिए सामुदायिक रेडियो जैसे नये माध्यम का सहारा ले रहे हैं। महान जंगल क्षेत्र में सीजीनेट स्वर की सहायता से ग्रीनपीस ने रेडियो संघर्ष के नाम से एक नये सामुदायिक मोबाईल रेडियो की शुरुआत की है। सदियों से अपनी जुबान बंद रखने वाले इस क्षेत्र के लोगों को रेडियो संघर्ष ने अपनी आवाज उठाने का माध्यम दे दिया है। चार महीने के सफल परिक्षण के बाद रेडियो संघर्ष को औपचारिक रुप से शुरू कर दिया गया है।
आम लोगों की आवाज
सिंगरौली जिले में बुधेर गांव की रहने वाली अनिता कुशवाहा को अपने विभाजित जमीन की रसीद और कागजात नहीं मिले हैं। अनिता ने रेडियो संघर्ष में फोन करके शिकायत दर्ज कराया है। उसने अपने गांव के पटवारी का नाम और मोबाईल नंबर भी रिकॉर्ड कराया। साथ ही, रेडियो संघर्ष के लोगों से अपील किया है कि वे इस मामले में उसकी मदद करें।

अनिता एक उदाहरण भर है। भ्रष्टाचारपानीबिजलीबीपीएल में गड़बड़ी से लेकर जंगल पर अपने अधिकार तक गांव के लोग अपनी हर समस्या को रेडियो संघर्ष के माध्यम से दर्ज करवा रहे हैं। रेडियो संघर्ष को महान जंगल क्षेत्र के गांवों में आम आदमी की समस्याओं को उठाने वाले उपकरण के रुप में लोकप्रियता मिल रही है। इसका उद्देश्य स्थानिय प्रशासननीति-निर्धारक तथा गांव वालों के बीच एक सेतु की तरह काम करना है।

ग्रीनपीस की अभियानकर्ता प्रिया पिल्लई कहती हैं, देश के सुदूर इलाकों में रहने वाले  आदिवासियों और समाज के शोषित तबकों की आवाज कभी नीति-निर्धारकों के पास नहीं पहुंच पाती। रेडियो संघर्ष दोनों को एक संचार माध्यम मुहैया करा रहा है। रेडियो संघर्ष एक ओर जहां लोगों को जागरुक करने का काम कर रहा है वहीं दूसरी तरफ नीति-निर्धारकों को सीधे आम लोगों की आवाज में उनकी समस्याओं के बारे में जानने का मौका भी दे रहा है। महान में रेडियो संघर्ष के आरंभ होने के बाद से लोग अपने अधिकार (वनाधिकार कानूनग्रामसभा मे अधिकारको लेकर जागरुक हुए हैं। अब वे अपने क्षेत्र में निष्पक्ष और सही तरीके से कानूनों को लागू करवाने के लिए खड़े हो रहे हैं

मिस कॉल करें और आवाज रिकॉर्ड कराएं, सुनें
रेडियो संघर्ष नागरिक पत्रकारिता को नये आयाम दे रहा है। इसके माध्यम से गांव वाले अपनी समस्याओं को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। गांव वालों को एक नंबर दिया गया है जिसपर उन्हें मिसकॉल देकर अपनी आवाज रिकॉर्ड करानी होती है। यह एक बहुत ही आसान उपकरण है। 09902915604 पर फोन कर मिस कॉल देना होता है। कुछ सेकेंड में उसी नंबर से फोनकरने वाले को फोन आता है। फोन उठाने पर दूसरी तरफ से आवाज सुनायी देती है- अपना संदेश रिकॉर्ड करने के लिए दबाएंदूसरे का संदेश सुनने के लिए दबाएं। रिकॉर्ड किए गए संदेश को मॉडरेटर द्वारा चुना जाता है जिसे उसी नंबर पर कॉल करके सुना जा सकता है। साथ हीचुने हुए संदेशों कोपर भी अपलोड किया जाता है।

जूलाई से अब तक रेडियो संघर्ष के पास रोजाना छह से सात कॉल एक दिन में आते हैं। अभी तक 572 कॉल्स आ चुके हैं जिनमें कुछ खाली मैसेज वाले भी शामिल हैं। इनमें 49.5% कॉल्स वनाधिकार कानून के उल्लंघन, 32.8% कॉल्स घूस मांगे जाने की शिकायत को लेकर है। 10.3% कॉल्स गांव वालों की मूलभूत समस्याओं मसलनसड़कराशन कार्डबीपीएल कार्डअस्पतालस्कूलपानीबिजली आदि की समस्याओं को लेकर है। 7.6% कॉल्स विस्थापन पर भी है। सबसे ज्यादा फोन कॉल्स मैसेज को सुनने के लिए आ रहे हैं। अभी तक 3545 लोगों ने संदेश सुनने के लिए कॉल किया है। रोजाना औसतन 34 कॉल्स मैसेज सुनने वालों के आते हैं।

      इसके लिए 25 लोगों को बतौर नागरिक पत्रकार प्रशिक्षण भी दिया गया है। ये नागरिक पत्रकार लोगों को कॉल करने तथा अपनी शिकायत दर्ज कराने में मदद करते हैं। अमिलिया गांव के विरेन्द्ग सिंह भी उन 25 लोगों में से एक हैं। वे कहते हैं कि मैं लोगों को अपनी बात रिकॉर्ड करने के साथ-साथ दूसरों की समस्याओं को सुनने में भी मदद करता हूं। जंगल के महुआ पेड़ों की अवैद्य मार्किंग हो या फिर ग्राम सभा में पारित फर्जी प्रस्ताव हर मामले में विरेन्द्र गांव वालों को रेडियो संघर्ष में अपनी आवाज रिकॉर्ड कराने में मदद करते हैं

पृष्ठभूमि
विरेन्द्र महान संघर्ष समिति के भी सदस्य हैं। 11 गांव के लोगों द्वारा बनी यह समिति महान जंगल पर  अपने वनाधिकार लेने के लिए आंदोलनरत हैँ। महान जंगल को महान कोल लिमिटेड (एस्सार व हिंडाल्को का सुंयक्त उपक्रम) को कोयला खदान के लिए आवंटित करना प्रस्तावित है। रेडियो संघर्ष की टीम महान संघर्ष समिति के साथ काम कर लोगों को वनाधिकार कानून के बारे में जागरुक कर रही है। रेडियो संघर्ष की टीम ने महान संघर्ष समिति के साथ मिलकर 11 गांवों में यात्रा का आयोजन किया था। इस दौरान लोगों को सामुदायिक रेडियो के बारे में प्रशिक्षित भी किया गया।

महान जंगल
प्राचीन साल जंगल वाला महान के क्षेत्र को कोयला खदान के लिए देना प्रस्तावित है। इस कोयला खदान को पहले चरण का निकास मिल चुका है लेकिन दूसरे चरण के निकास के लिए पर्यावरण व वन मंत्रालय ने 36 शर्तों को भी जोड़ा है। इन शर्तों में वनाधिकार कानून 2006 को लागू करवाना भी है। महान जंगल पर 14 गांव प्रत्यक्ष तथा करीब 62 गांव अप्रत्यक्ष रुप से जीविका के लिए निर्भर हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार इन गांवों में 14,190 लोग जिनमें 5,650 आदिवासी समुदाय के लोग हैं प्रभावित होंगे। महान में कोयला खदान के आवंटन का मतलब होगा इस क्षेत्र में प्रस्तावित छत्रसाल, अमिलिया नोर्थ आदि कोल ब्लॉक के लिए दरवाजा खोलना, जिससे क्षेत्र के लगभग सभी जंगल तहस-नहस हो जायेंगे।

सौजन्य से-
अविनाश कुमार, ग्रीनपीस 
avinash.kumar@greenpeace.org

Nov 21, 2013

रसिन बाँध पर मछलियों के सौदागरों का कब्ज़ा


रसिन बांध से किसानों को पानी नहीं, होता है मछली पालन !

बुंदेलखंड से आशीष सागर दीक्षित  रिपोर्ट- 


चित्रकूट। बुंदेलखंड पैकेज के 7266 करोड़ रुपए के बंदरबांट की पोल यूं तो यहां बने चेकडेम और कुंए ही उजागर कर देते हैं, लेकिन पैकेज के इन रुपयों से किसानों की जमीन अधिग्रहण कर बनाए गए बांध से किसानों को सिंचाई के लिए पानी देने का दावा तक साकार नहीं हो सका। चित्रकूट जनपद के रसिन ग्राम पंचायत से लगे हुए करीब एक दर्जन मजरों के हजारों किसानों की कृषि जमीन औने-पौने दामों में सरकारी दम से छीनकर उनको सिंचाई के लिए पानी देने के सब्जबाग दिखाकर पैकेज के रुपयों से खेल किया गया। 


उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के मातहत बने चैधरी चरण सिंह रसिन बांध परियोजना की कुल लागत 7635.80 लाख रुपए है, जिसमें बंदेलखंड पैकेज के अंतर्गत 2280 लाख रुपए पैकेज का हिस्सा है, शेष अन्य धनराशि अन्य बांध परियोजनाओं के मद से खर्च की गई है। बांध की कुल लंबाई 260 किमी है और बांध की जलधारण क्षमता 16.23 मि. घनमीटर है। वहीं बांध की ऊंचाई 16.335 मीटर और अधिकतम जलस्तर आरएल 142.5 मीटर, अधिकतम टापस्तर आरएल 144 मीटर बनाई गई है। इस बांध से जुड़े नहरों की कुल लंबाई 22.80 किमी आंकी गई है। 


किसानों के लिए प्रस्तावित बुंदेलखंड की 2 फसलों रवी और खरीफ के लिए क्रमशः 5690 एकड़, 1966 एकड़ जमीन सिंचित किए जाने का दावा किया गया है, लेकिन एक किसान नेता के नाम पर बने इस रसिन बांध की दूसरी तस्वीर कुछ और ही है। जो कैमरे की नजर से बच नहीं सकी। जब इस बांध की बुनियाद रखी जा रही थी तब से लेकर आज तक रह-रहकर किसानों की आवाजें मुआवजे और पानी के विरोध स्वरों में चित्रकूट मंडल के जनपद में गूंजती रहती है। अभी भी कुछ किसान इस बांध के विरोध में जनपद चित्रकूट में आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनकी कहना हैं कि न तो हमें मुआवजा दिया गया और ना ही खेत को पानी। उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड पैकेज से बने रसिन बांध मे किसानों की जमीन लेकर मुआवजा नहीं मिलने के चलते वर्ष 2012 को रसिन के ही बृजमोहन यादव ने अपनी बहन के ब्याह की चिंता में आत्महत्या कर ली थी। उसकी जमीन अन्य किसानों की तरह डूब क्षेत्र में थी। किसान आत्महत्या होने के एक माह पूर्व योजना आयोग उपाध्यक्ष मोटेक सिंह आहलूवालिया बुंदेलखंड दौरे पर रसिन बांध को देखने आए थे। गर्मी के दिनों में इस बांध को भरने के लिए सिंचाई विभाग के आला-अधिकारियों ने बांध को भरा दिखाने के चक्कर में जनरेटर लगाकर टैकरों के माध्यम से पानी भरा था और आहलूवालिया जी को भरा हुआ बांध दिखाकर चलता कर दिया। जबकि इलाहाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच 76 पर 8 सैकड़ा किसान उनसे मिलने की कवायद में अपनी गुहार के साथ सड़क जाम किए थे, पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। ठीक एक महीने बाद बृजमोहन यादव की खुदकुशी और रसिन नहर के पहली ही बरसात में बह जाने से इस बांध की बुनियाद पर ही सवाल खड़े हो चुके हैं। 



संवाददाता द्वारा 28 अक्टूबर 2013 को बांध को देखा गया तो रसिन बांध के मेन फाटक के उत्तर दिशा में बनी नहर के टेल तक पानी नहीं था। इस डैम में कुल 5 फाटक हैं जो इसी नहर की तरफ खुलते हैं। किसानों को इस बांध में जमीन जाने के बाद सिंचाई के लिए पानी भले ही न मिला हो, लेकिन सरकार को इससे मछली पालन का पट्टा उठाने के नाम पर राजस्व जरूर मिलने लगा है। बुंदेलखंड पैकेज के 7266 करोड़ रुपए इसी तरह ललितपुर और चित्रकूट में चेकडैम और कुएं बनाकर उड़ा दिए गए तो वहीं वन विभाग भी इससे पीछे नहीं रहा। इस विभाग में भी फतेहगंज थाना क्षेत्र की ग्राम पंचायत डढ़वामानपुर में पैकेज की धनराशि से किसानों की जमीन की सिंचाई के लिए 15 ड्राई चेकडैम का निर्माण कार्य 2471.18 हैक्टेयर व 39 हैक्टेयर जमीन पर 468200 रुपए की लागत से कराया गया है। कोल्हुआ के जंगल में बने इन 15 चेकडैमों की हालत बदसूरत ही नहीं बल्कि बेरंग भी है जो किसानों के लिए सींच का साधन नहीं भ्रष्टाचार की बानगी बनकर रह गई है। बुंदेलखंड पैकेज के रसिन बांध का माडल भी कुछ इसी तर्ज पर है।  



आशीष दीक्षित सागर 
ashishdixit01@gmail.com


Nov 17, 2013

खतरे में है भारतीय राष्ट्रीय पक्षी


उपेक्षा के कारण देश में सिमट रही है मोरों की दुनिया

-देवेंद्र प्रकाश मिश्र

वन्यजीव-जंतुओं की जब कोई प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर खड़ी हो जाती है तब भारत में उसके संरक्षण के प्रयास एवं उपाय शुरू किए जाते हैं। राजा-महाराजाओं के शिकार के शौक से जब बाघों की दुनिया सिमट गई तब उसके संरक्षण के कार्य शुरू किए गए। एक सदी पूर्व चीता भारत की धरती से गायब हो चुका है। अब बाघ, शेर, तेंदुआ, हाथी, गैंडा तथा गिद्धों को बचाने के साथ ही जब राजकीय पक्षी सारस के अस्तित्व पर संकट गहराया तब उसको संरक्षण देने के उद्देश्य से गणना कराई है। लेकिन भारत का राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर‘ अभी भी सरकारी उपेक्षा का शिकार है जिससे मोरों की संख्या में भी गिरावट आने लगी है। इसके बाद भी मोरों को संरक्षण देने के लिए भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई रणनीति तैयार नहीं की गई है। निकट भविष्य में मोरों की भी दुनिया सिमट सकती है, इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। 


भारत का राष्ट्रीय पक्षी बने हुए मोर को 50 साल पूरे हो रहे हैं। सन् 1963 में राष्ट्रीय पक्षी का गौरव हासिल करने वाले मोर की घटती संख्या आजादी के पहले से भी आधी रह गई है। सालों से वयंजीवों से प्रेम करने वाले अथवा वयंजीवों के लिए कार्य करने वाले लोग मोर की घटती संख्या पर शोर मचाते रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी आवाज ‘नक्कार खाने में तूती की आवाज‘ बनकर रह गई हैं। हालांकि मोरों की सिमट रही दुनिया को संज्ञान में लेकर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के सेक्शन 43 (3) (अ) और सेक्शन 44 में बदलाव की बात शुरू कर दी है। लेकिन यह भी सोचनीय हैं कि राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा हासिल होने के बाद भी अब तक देश में कभी मोरों की गिनती के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। साल 2008 में भारतीय वयंजीव संस्थान देहरादून (डब्ल्यूआईआई) ने मोर के महत्व को देखते हुए इनकी गणना की योजना बनाकर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजी थी, परन्तु धन को लेकर हुई आनाकानी से गणना का प्रस्ताव फाइलों में कैद होकर गायब हो गया। 


सृष्टि कंजरवेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अनूप गुप्त, उपाध्यक्ष ज्ञानी हरदीप सिंह कहते हैं कि मोर  प्रत्येक भारतीय की भावना से जुड़ा है, भगवान श्रीकृष्ण से भी मोर पंख जुड़ा हुआ है और राष्ट्रीय पक्षी होने का तात्पर्य है कि राष्ट्रीय धरोहर और यह बात सभी को समझानी होगी। सरकार को सख्ती से मोर संरक्षण के लिए कार्य करने चाहिए और ‘सेव टाइगर‘ की तरह ‘सेव पीकाक‘ अभियान भी सरकार को छेड़ना चाहिए। लेकिन जब मोरों की गिनती ही नहीं हुई है तो हम कैसे उनके संबंध में बात कर रहे हैं। सोसाइटी के ही डायरेक्टर डा0 वीके अग्रवाल (रिटायर डिप्टी सीएमओ) एवं डा0 नवीन सिंह का मानना है कि लोगों में भ्रम है कि मोर के खून से घुटनों की मालिश की जाए तो गठिया ठीक हो सकता है उससे आर्थराइटिस ठीक हो सकती है लेकिन ऐसा है नहीं, यह केवल अंधविश्वास है ज्यादातर लोग इसका मांस खाने के लिए शिकार करते हैं।


  पीपुल फार एनीमल्स के खीरी प्रतिनिधि केके मिश्र बताते हैं कि मोर अपनी खूबसूरती के कारण मारा ही जाता है साथ ही इसके पंखों का व्यवसायिक प्रयोग अवैध शिकार को बढ़ावा दे रहा है। संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में खीरी जिले में सर्वाधिक मोर मितौली के पास करनपुर ग्राम एवं मुरईताजपुर के पास पाए गए। अन्य तमाम जगहों पर मोरों की संख्या में गिरावट पाई गई है। श्री मिश्र ने बताया कि भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रति आस्था रखने वाले लोग इनका संरक्षण करते हैं। लेकिन निज स्वार्थ में लोग इनका शिकार करने से परहेज नहीं करते हैं।


भारत की मानव जाति की आस्था और धार्मिक रूप से जुड़े मोर कभी गावों के किनारे खेत, खलिहान और बागों में रहते थे, और यह जंगलों मे भी बहुतायत में पाए जाते थे। गावों के बढ़ते विकास, बदलते परिवेश और आधुनिकीकरण के चलते ग्रामीण क्षे़त्रों से बागों का सफाया हो गया, जंगलों का विनाश अंधाधुंध किया गया, जंगलों को काटकर खेती की जाने लगी है। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि मोरों की दुनिया भी सिमटने लगी है। गांव के किनारे के बाग और विशालकाय पेड़ मोरों के रैन बसेरा हुआ करते थे। पेड़ों के कट जाने और बागों का सफाया होने के कारण घोषला बनाना और अंडा देना उनके लिए मुश्किल भरा काम हो गया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि उनकी वंशबृद्धि की रफ्तार में खासी कमी आयी है। इसके अतिरिक्त फसलों में कीटनाशक दवाओं के प्रयोग का अधिक बढ़ गया है जिसका बिपरीत असर खेत, खलिहानों में दाना चुगने वाले मोरों पर भी पड़ा है। उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में कभी भारी संख्यां में मोर दिखायी देते थे जो देशी-विदेश्ी पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्रविन्दु हुआ करते थे। लेकिन अब प्राकृतिक आपदा बाढ़ आदि के साथ मानवजनित कारणों के चलते जंगलों के वातावरण में परिवर्तन हुआ तो धीरे-धीरे मोरों की संख्या में गिरावट आने लगी है। स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि जंगल के जिन क्षेत्रों में जहां कभी मोर झुंड में दिखायी देते थे, अब इक्का-दुक्का ही मोर दिखायी देते हैं, और गावों के किनारे शाम को गूंजने वाली मोरों की मधुर आवाज गायब हो गयी है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे खूबसूरत पक्षी मोर के संरक्षण के लिए समय रहते प्रयास नहीं किए गए तो भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोरों की दुनिया भी किताबों के पन्नों में सिमट जाएगी। 






-देवेंद्र प्रकाश मिश्र
dpmishra7@gmail.com
(लेखक वाइल्डलाइफर और स्वतंत्र पत्रकार है)

Oct 9, 2013

मैक्सिको से आयी प्रेमलता !

मैक्सिकन वाइन

एक फूल जो डायबिटीज जैसी बीमारी में फायदेमंद है.

कोरल वाइन: जिसे क्वींस क्राउन या लव वाइन भी कहते है, एक मैक्सिकन लता है, जो अपने गुलाबी फूलों के लिए जानी जाती है, यह सुर्ख गुलाबी सुन्दर पुष्प गुच्छ ही कारण बने, इस प्रजाति के फैलाव का, इंसान के प्रकृति की इस सुन्दर आभा को इंसानी दिमाग की रूमानियत ने इसे धरती के तमाम भागों में खिलने का मौक़ा दिया, और अब इस प्रजाति ने लोगों के बगीचों से बाहर निकल कर अपनी खुद की जमीन तैयार कर ली, इन खिले हुए फूलों का नज़ारा गाहे-बगाहे आप सड़क के किनारों, नदियों के आस-पास, और पारती पडी भूमियों पर उग आये झुरमुटों में भी देख सकते है, यह कुछ इस तरह से है की जैसे इंसान अपने शौक के लिए तमाम जीव-जंतुओं को दुनिया के कई हिस्सों से लाकर पालता है और गुलामों की तरह उस जीव या वनस्पति पर अपना एकाधिकार कायम करता है, ताकि अपने ही समाज में वो इन अजब चीजों का प्रदर्शन कर खुद को अव्वल साबित कर सके, पर प्रकृति तो स्वतंत्र और स्वछंद होती है और उसमे इतनी कूबत भी होती है की वह किसी भी परिस्थित में कही भी जीवन को जीवंत बना ले, प्रकृति कभी कैद में नहीं रह सकती, उसमें मौजूद सभी जीवधारियों में अपने जीव-द्रव्य के विस्तार की अकूत ताकत होती है, इसका उदाहरण है रईसजादों द्वारा लाये गए विदेशी प्रजाति के कुत्ते और बगीचों के लिए विदेशी नस्ल के पौधे!

 आज वे विदेशी कुत्तों और विदेशी पौधों की तमाम प्रजातियाँ सड़कों पर और सड़कों के किनारे आप सब से बावस्ता हो जायेंगी! प्रकृति का यही गुण उसे सर्वव्यापी बनाता है कठिन से कठिन हालात में भी. कुछ ऐसी ही कहानी रही है इस फूल की, यह मैक्सिको देश की प्रजाति भारत में किसी शौक़ीन अफसर या राजा-महराजा के द्वारा लाई गयी होगी और इस खूबसूरती ने बगीचों की चारदीवारियों को तोड़ कर आजाद धरती को अपना आशियाना बना लिया, और इन विदेशी प्रजातियों ने महलों की कैद से अलाहिदा जब खुद की जमीन तलाशी तो इन्हें विदेशी आक्रामक प्रजातियों के अमले में दर्ज किया जाने लगा, भला धरती भी कही भेद करती है तेरे मेरे में, और न ही उसके लिए ये भौगोलिक रेखाएं मायने रखती है, जिसे इंसानों ने खींचा. जिस प्रजाति को धरती ने अपना लिया हो फिर वह काहे की विदेशी या देशी! धरती के आगोश में सभी बराबर है बस उन प्रजातियों में कूबत हो अपनी जगह में मुस्तकिल होने की.   

जब पहली बार २२ मई २०१३ को इन गुलाबी पुष्पों को देखा लखनऊ के काल्विन तालूकेदार्स कालेज के कैम्पस के किनारे एक झुरमुट में तमाम प्रजातियों की हरियाली के मध्य गुलाबी फूलों की मालाओं की लडियां, तो कौतूहल बस इसे सेलफोन कैमरे में कैद कर लिया की चलो इत्मीनान से इस फूल से जान पहचान की जायेगी.

यह पालीगोनैसी परिवार से है जिसका वैज्ञानिक नाम एंटीगोनन लेप्टोपस है, यह मैक्सिको की एक लता है जो अब उष्ण-कटिबंधीय देशों में अपनी ख़ूबसूरती बिखेर रही है, भारत में भी इसने अपनी जमीन तलाश ली है, और तमाम पहले से मौजूद वनस्पतियों के बीच घुल मिल गयी है. इस फूल की कहानी भी फूलों के शौक़ीन लंबरदारों के बगीचों की कैद से बाहर आने की है, और अब यह वनस्पति अपना फैलाव खुली जमीनों पर कर चुकी है, 

इस प्रेम लता की खासियत यह है की यह अन्य प्रजातियों के मध्य कमजोर मिट्टी में भी उग जाने की क्षमता रखती है, इसके मुलायम तने से निकली छल्लेदार प्रतानें इसे झाड़ियों दरख्तों और दीवारों पर ऊचाई तक ले जाती है जहां इसे पर्याप्त मात्रा में सूरज की रोशनी हासिल हो सके, इसके फूलों की सूरत जितनी ख़ूबसूरत है उससे कही ज्यादा इसकी शीरत! 

लव वाइन या प्रेम लता के फूलों में डायबिटीज जैसी बीमारी को ठीक करने के तत्व मौजूद है, अभी तक इसके फूलों को खाने के तौर पर विभिन्न देशों में उपयोग में लाया जाता रहा है, पास्ता में इन फूलो का विशेष महत्त्व है, साथ ही इसके बीजों को भून कर उनके छिलके उतार कर खाने में प्रयुक्त होता है, और इसकी जड़ और पत्तियों का प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता रहा, प्रेम लता की जड़ के रस का इस्तेमाल दर्द निवारक व् सूजन दूर करने में व् पत्तियों का  रस खांसी, फ़्लू और सूजन दूर करने में किया जाता है,

लव वाइन के पुष्पों की सुन्दरता के साथ साथ इस वनस्पति के औषधीय गुण हमारे लिए अत्यधिक उपयोगी है, बशर्ते हम इस वनस्पति को अपने आस-पास उगने का मौक़ा दे और इसे सरंक्षण प्रदान करे बजाए इसके की इसे  विदेशी आक्रामक प्रजाति मानकर इसकी खूबियों को नकार दे.

उत्तर भारत में इस सुन्दर फूलों वाली वनस्पति को लखनऊ के काल्विन तालूकेदार्स कालेज की चारदीवारी के बाहर प्राकृतिक तौर पर उगा हुआ देखा है, इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय पार्कों, उद्यानों, जंगलों व् गाँव देहात में इसे नहीं देखा गया, मायने साफ़ है की सजावटी फूलों के तौर पर लाई गयी इस प्रजाति की अपनी जमीन तैयार करने की अभी शुरूवात भर है.

तो चलिए फिर इन फूलों से दोस्ती की जाए !


कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com

(आजकल फूलों से दोस्ती की जा रही है)














Oct 2, 2013

रस्सियों वाला जंगली पौधा !


रस्सी वाला जंगली पौधा- यूरेना लोबाटा 
(एक खूबसूरत फूल की कहानी)

फूल इंसानी चेहरों की तरह होते हैं, बस शक्लें पहचानने का हुनर हो तो इन फूलों को देखकर बताया जा सकता है की ये पौधा किस प्रजाति का है, किस परिवार से ताल्लुक रखता है, और इसका नाम क्या है! फूल सुन्दर ही होते हैं, जाहिर है इंसानी चेहरे भी इन फूलों की तरह ही है जो सुन्दर ही होते है फिर वह चाहे अफ्रीकी हो, अमरीकी हो या भारतीय बस नजरिया खूबसूरत हो, फूलों को देखने की तरह का! तो फूलों के चेहरों की किताब पढने और उन्हें समझने की इस फेहरिस्त में एक नए फूल से परिचित कराता हूँ आप सभी को, ये नन्हा सा गुलाबी फूल मेरे घर के पास के उस खुले मैदान में खिला, इसकी आमद उन तमाम प्रजातियों के मध्य अभी नयी है, ये नया सदस्य मेरी निगाह में और उत्तर भारत की तराई जनपदों में अभी भी यह प्रजाति वन्य जीवन से सम्बन्धित सरकारी विभागों में भी दर्ज नहीं है, नतीजतन इसकी पहचान और इसकी खूबियों से परिचय करना मुझे और अच्छा लगा, एक नई जानपहचान ! 

जब इस फूल को पहली बार देखा तो लगा अरे! यह तो गुलहड की हूबहू छोटी प्रतिकृति है, बस यही वजह रही इससे पूरी तरह बावस्ता हो जाने की, जाहिर था यह गुलहड जैसा है तो मालवेसी कुल से ताल्लुक रखता होगा.  इसका अंगरेजी नाम है "सीजरवीड" महान सीजर पर इसका नाम क्यों पडा यह बात अभी तक पुख्ता नहीं है, जबकि यह रोमन राजाओं से बिलकुल कोई सम्बन्ध नहीं रखता. 

वैसे तो बनस्पति विज्ञान में इसका नाम "यूरेना लोबाटा" है और इसकी उत्पत्ति का स्थल एशिया ही बताया गया है, किन्तु यह प्रजाति जंगलो, नदियों के किनारों, नम भूमियों आदि में स्वत: उगती है, वैसे तो यह दुनिया में उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों में गोलार्ध के दोनों हिस्सों में पाया जाता है. इसकी खेती ब्राजील, कांगो व् अफ्रीका के कुछ स्थानों में की गयी, वजह थी इससे निकालने वाला खूबसूरत सफ़ेद रंग वाला व् मजबूत रेशा जो रस्सी, कपडे बनाने में इस्तेमाल होता है. इससे ये रेशा बिलकुल उसी तरह निकालते है, जैसे भारतीय किसान सनई और पटसन से रेशे निकालते है, फूल खिल जाने पर इन पौधों को काट लिया जाता है, फिर किसी तालाब में पानी में डुबोकर रखा जाता है ताकि इन पौधों में सडन शुरू हो जाए, फिर कुछ दिनों बाद इन्हें पानी से निकालकर पौधों के तने से रेशे निकाल लिए जाते है, जिनसे रस्सियाँ बनाई जाती है, और रेशे उतारा हुआ तना जो सफ़ेद रंग का होता है, उसे सुखा कर जलौनी लकड़ी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

यहाँ गौरतलब यह है की अब उत्तर भारत में न तो सनई-पटसन बोया जाता है, और न ही प्राकृतिक रूप में उगा यह यूरेना लोबाटा से रेशे निकाल कर रस्सियाँ बनाई जाती है, प्लास्टिक ने इस प्राकृतिक काटन की जगह ले ली, नतीजतन गाँवों में रस्सियाँ बनाने का चलन ख़त्म हो गया और साथ ही ख़त्म हो गयी वह विधा और देशी औजार जिससे बड़े-बूढ़े रस्सियाँ बटा(बनाना) करते थे. और इन सूत(काटन) की रस्सियों का ख़त्म होना हमारे पालतू जानवरों, बैल, गाय, भैस आदि के लिए एक अंतहीन पीडादायक सजा बन गयी, क्योंकि इन जानवरों की नकेल अब इस मुलायम सुतली के बजाए प्लास्टिक की रस्सियों की डाली जाती है, जिसकी खुरदरी रगड़ इनके कोमल अंग को रोज घायल करती है.




यूरेना लोबाटा जंगली माहौल में कई वर्षों तक पुष्पित होता रहता है, जब इसकी खेती की जाती है तो रेशों के लिए इसे एक वर्ष में ही काट लिया जाता है, यह ऊंचाई में ५ से ७ फीट तक लंबा होता है इसके तने से तमाम शाखाएं निकलती है. इसके गुलाबी पुष्प जिसमे गुलहड की भाति पांच दल होते है और उसी तरह का परागकणों से लदा पुंकेसर. इसे उगने के लिए धूप, गर्म मौसम व् नम भूमियाँ चाहिए, भारत की तराई में यह जुलाई-अगस्त में उगता है और सितम्बर के महीने में इसमें पुष्प आने लगते है, अक्टूबर के अंत तक इसके कांटेदार फल पककर जमीन में गिरते है और इनके करीब से गुजरने वाले जीव-जन्तुओं में यह फल चिपक जाते है जो इस प्रजाति को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते है, यही जरिया है इस प्रजाति का अपने बीजों के प्रकीर्णन का.

इसके फूलों के खिलने का समय भी बड़ा अद्भुत है, सूरज के निकलने से पहले भोर में ही यह फूल खिलते है और ज्यों ही सूरज आसमान पर चढ़ कर अपनी किरणे बिखेरना शुरू करता है, यूरेना लोबाटा अपने पुष्पों को ढकने की ताकीद कर देता है, और दोपहर होने से पहले इसके पुष्पों के पुष्प दल बंद हो जाते है, मानों अपने नाजुक अंगों को धूप से बचाने की कवायद हो यह. यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है, की इन फूलों की खूबसूरती वही निहार सकता है जो सूरज के आने के साथ ही जग जाए, और इन फूलों का रस वही जीव ले सकता है जो सुबह सुबह सक्रीय होता हो, खिले हुए फूलों की यह बहुत अल्प अवधि ! शायद प्रकृति का इस में भी कोइ राज हो.

यूरेना लोबाटा का एक हम शक्ल भाई भी है फ्लोरिडा में बस फर्क इतना है की इसका पुष्प कुछ बड़ा होता है जिसे सीशोर मेलो कहते है. वैसे आप को बता दूं की भारत में किसानों द्वारा उगाया जाने वाला पटसन भी इसी परिवार से सम्बन्ध रखता है यानी माल्वेसी कुल से. पटसन के पुष्प जिन्हें बचपन में मैंने अपने खेतों में देखा वह बिलकुल यूरेना लोबाटा की तरह ही थे बस आकार में वह काफी बड़े थे.

यूरेना लोबाटा काटन के अतिरिक्त तमाम औषधीय गुणों से भरा हुआ है, इसकी जड़ व् पत्तियां कई बीमारियों को दूर करने में कारगर है, और दुनिया के तमाम देशों में इसका पारम्परिक इस्तेमाल होता है, इसकी जड़ व् पत्तियों का चूर्ण डायबिटीज, पेट की बीमारियों, दर्द निवारक के तौर पर प्रयोग में लाई जाती है, जड़ व् पत्तियों से बनी पुल्टिस का प्रयोग सूजन कम करने में भी किया जाता है. इसकी पत्तियों व् जड़ से बने काढ़े का इस्तेमाल बुखार, पेट दर्द, मलेरिया, गनोरिया आदि में करते है, सर्प दंश में भी और घाव हो जाने पर यूरेना लोबाटा की पत्तियों और जड़ की पुल्टिस का इस्तेमाल कई देशों में किया जाता है.

तो फिर इतनी खासियतों वाले इस पौधे को आप भी खोजे कही अपने आस-पास शायद गुलाबी फूलों से लदा यह पौधा कही दिख जाए. 

अपने आस-पास की प्रकृति में मौजूद जीवों से जान-पहचान बढ़ाना बहुत प्राचीन सिलसिला रहा है इंसानी दिमाग का और उसने प्रकृति के इन तमाम रहस्यों को इन्ही पेड़-पौधों और जंतुओं से सीखा है, आज बहुत से  कलुषित इंसानी मसले इतना पैबस्त हो गए है इंसान के दिमाग में की उसे फुर्सत ही नहीं है इस प्रकृति को निहारने की नतीजतन वह वंचित हो रहा है प्रकृति में मौजूद आनंद और सुख से.

यह लेख डेली न्यूज एक्टीविस्ट (लखनऊ) अखबार में दिनांक ४ अक्टूबर २०१३ को सम्पादकीय पृष्ठ पर रस्सी वाला जंगली पौधा- यूरेना लोबाटा शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ है, 
(अपडेट : ४ अक्टूबर २०१३ )

कृष्ण कुमार मिश्र  
(आजकल फूलों से दोस्ती की जा रही है)
krishna.manhan@gmail.com






 

Sep 30, 2013

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Sep 5, 2013

दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में हथिनी ने दिया बच्चे को जन्म



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पलियाकलां:खीरी। दुधवा नेशनल पार्क के पालतू हाथी परिवार की हाथिन चमेली ने एक नर बच्चे को जन्म दिया है। इससे पार्क परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई है। सूचना पर दुधवा के डीडी वीके सिंह ने मौके पर जाकर उसके स्वास्थ्य आदि की जानकारी महावत से करने के बाद नवजात बच्चे का नाम विनायक रखा है। चमेली को सन 2008 में आसाम के जल्दापारा पार्क से यहां लाया गया था।


आसाम के जल्दापारा पार्क से सन 2008 में पांच हाथियों को लाकर दुधवा नेशनल पार्क के पालतू हाथी परिवार में इनको शामिल किया गया था। इनमें शामिल हाथिन चमेली को सुलोचना के साथ ड्यूटी पर लगाया गया था। इन दिनों चमेली दुधवा की सोठियाना रेंज में तैनात थी और कैमा चौकी पर रहकर गैंडा क्षेत्र की निगरानी में लगाई गयी थी। बीते दिवस उसने एक नवजात बच्चे को जन्म दिया है। इसकी सूचना पर दुधवा नेशनल पार्क के डीडी वीके सिंह ने मौके पर जाकर चमेली के स्वास्थ्य की जानकरी लेकर उसे आधा किलो लड्डू खिलाने के साथ ही पूरे स्टाफ में लड्डू बांटकर खुशी जताई। उन्होंने बताया कि कैमा चौकी में गणेश का मंदिर है इसलिए नर बच्चे का नाम विनायक रख दिया गया है। उन्होंने कहा कि बीते दिवस ट्रेन से कटकर जंगली हाथी की हुई मौत की भी भरपाई इस बच्चे के जन्म से हो गई है। डीडी ने बताया कि चमेली और उसके बच्चे का विशेष ध्यान रखने के निर्देश दिए गए हैं। विनायक के जन्म के बाद अब दुधवा के पालतू हाथी परिवार की संख्या 17 हो गई है। नवजात हाथी शिशु के आगमन की सूचना से पूरे पार्क परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई है।



देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
पलिया- दुधवा नेशनल पार्क 
dpmishra7@gmail.com 

Sep 2, 2013

गुलाब से चमेली की खुशबू आये...और नीम में हो मिठास...!


 यूकेलिप्टस बनाम "नींबू वाली यूकेलिप्टस"

गुलाब से चमेली की खुशबू आये...और नीम में हो मिठास... कुछ ऐसा ही घटित हुआ मेरे साथ जब कुछ वर्ष पहले अपने साथियों के साथ मैं बैठा था जिले की सबसे मुख्य प्रशासकीय स्थल में, जी हाँ हमारे शहर लखीमपुर खीरी की कलेक्ट्रेट, जहां साहिब बहादुरों के दफ्तरों की जद में एक कैंटीन है , कभी यहीं चाय पीने का सिलसिला रोज दर रोज होता था हमारा, एक रोज जमीन पर पड़े एक पत्ते को उठाकर यूं की आदतन नाक के पास ले गया तो मामला चौकाने वाला था, उस पत्ते से नींबू जैसी खुशबू, दिमाग ने जीवन भर के पढ़े लिखे का लेखा जोखा एक पल में नाप-तौल डाला सूरत मिलाने वाले साफ्टवेयर की तरह, पर कही कोइ जानकारी नहीं, परिणाम शून्य! मैं चुपचाप वहां से चला आया बिना किसी को कुछ बताए, और वनस्पति विज्ञान के रहस्यों के परदे पलटने लगा, आखिर पता चल गया की यह नीबू सी खुशबू यूकेलिप्टस में कैसे ? 

इस तरह प्रकृति की एक और अनजान पहेली से बावस्ता हुआ मैं, दरअसल यूकेलिप्टस की आदिम जमीन आस्ट्रेलिया महाद्वीप है, इसकी ७०० से ज्यादा प्रजातियाँ मौजूद है धरती पर, ब्रिटिश उपनिवेशों के दौरान यह प्रजाति दुनिया के तमाम भू-भागों में ले जाई गयी, विभिन्न  मानवीय जरूरतों एवं आकर्षण के कारण, जिनमे भारत का नीलगिरी क्षेत्र में ब्रिटिश उपनिवेश के समय यूकेलिप्टस का पौधारोपण शुरू किया गया था, इसकी पत्तियों से निकाला गया तेल "नीलगिरी तेल" के नाम से मशहूर हुआ. वैज्ञानिक विवरण में जाए तो यह एन्जिओस्पर्म है, और दुनिया का सबसे बड़ा एन्जियोस्पर्म (आवृतबीजी) यूकेलिप्टस ही है. इसका नाम यूकेलिप्टस कैसे पडा यह भी रोचक जानकारी है, लैटिन भाषा में यू के मायने होते है "पूरी तरह से" या "अच्छे से" और "केलिप्टस" के मायने है "ढका हुआ". यूकेलिप्टस के पुष्प खिलने से पहले एक गोल ढक्कन नुमा सरंचना में बंद होते है, और जब पुंकेसर वृद्धि करते है तो यह कैप नुमा ढक्कन निकल जाता है और पीले-सफ़ेद व् लाल रंग पुष्प खिल उठते हैं. यूकेलिप्टस झाडी नुमा और लम्बे वृक्षों के रूप में देखे जा सकते है, भारत में तमिलनाडू की नीलगिरी पहाड़ियों पर  राज्य के जंगलात के एक अफसर सर हेनरी रोह्ड्स मॉर्गन ने सन १८३० में यूकेलिप्टस का वृक्षारोपण करवाया वजह थी चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूरों को जलाऊ लकड़ी मुहैया कराना, बाद में यही से नीलगिरी तेल का उत्पादन शुरू हुआ इन यूकेलिप्टस के वृक्षों से.

यूकेलिप्टस के वैश्विक इतिहास को देखे तो सबसे पहले ब्रिटिश साम्राज्य के नेवी कैप्टन जेम्स कुक जो एक महान नेवीगेटर थे जिन्होंने प्रशांत महासागर की तीन साहसिक यात्राएं की और आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड और हवाई जैसे विशाल व् छोटे द्वीपों से तमाम जानकारियाँ हासिल की जो इससे पहले कोइ नहीं कर पाया था, इन्ही यात्राओं में यूकेलिप्टस दुनिया की नज़र में आया और इसका नामकरण हुआ. जेम्स कुक के साथ सन १८७७ में जोसेफ बैंक और डैनियल सोलैंडर ने यूकेलिप्टस का नमूना अपने साथ लाए पर तब तक इसका नामकरण नहीं हुआ था. जेम्स कुक की तीसरी यात्रा के दौरान डेविड नेल्सन यूकेलिप्टस का नमूना लाए और उसे ब्रिटिश संग्रहालय लन्दन में रखा गया जिसका नामकरण फ्रेंच वैज्ञानिक चार्ल्स लुईस एल हेरीटियर ने "यूकेलिप्टस आब्लिकुआ"
के नाम से किया.

यूकेलिप्टस के तीन वर्ग है जिनमे दो कोरंबिया और अन्गोफोरा है, इन्हें यूकेलिप्टस या गम ट्री भी कहते है, क्योंकि इनके तने की छाल को कही से भी काट दिया जाए तो वहां से गम या गोंद निकलना शुरू हो जाता है, यूकेलिप्टस के कोरंबिया जाती में छिपा है लखीमपुर शहर के इस इकलौते वृक्ष का रहस्य जिसमें नीबूं जैसी खुसबू आती है.

कोरंबिया सिट्रिओडोरा यही नाम है, लैटिन के सिट्रिओडोरस के मायने ही होते है नींबू वाली सुंगध, यूकेलिप्टस की इस प्रजाति का जिसका एक नमूना हमारे जनपद में मौजूद है, किन्तु खीरी जनपद के लोगों की नज़र में यह प्रजाति अभी तक दर्ज नहीं है, शायद यह पहली बार महके हमारे लोगों के बीच जो अभी तक परिचित नहीं हुए इस खूबसूरत महक वाली प्रजाति से  .....

 यूकेलिप्टस की यह प्रजाति जिससे सिट्रेनेला तेल प्राप्त होता है, जिसके तमाम औषधीय गुण है, बुखार, जुकाम व् शरीर में दर्द के लिए यह पारंपरिक तौर पर इस्तेमाल होता आया है, साथ ही यह तेल मच्छर निरोधक के तौर पर इस्तेमाल होता है, इस तेल को कई कंपनिया मच्छर निरोधक क्रीम व् तेल में इस्तेमाल कर रही है. यूकेलिप्टस की इस प्रजाति से शहद का उत्पादन भी किया जाता है क्योंकि इनके पुष्पों में परागकणों की अधिकता के कारण मधुमख्खी को बहुतायात में परागरस मिलता है.

इस तेल में एंटी-फंगल व् एंटी-बैक्तीरियल गुण होते है, सूजन व् दर्द में इसका प्रयोग लाभकारी है, कीटरोधी होने के कारण बायो-पेस्टीसाइड के तौर पर भी इसका प्रयोग होता है, परफ्यूम इंडस्ट्री में इसकी बेहतरीन खुसबू के कारण यह यूकेलिप्टस की प्रजाति की बेहद मांग है. इसके विशाल लम्बे वृक्ष टिम्बर में यूकेलिप्टस  की अन्य प्रजातियों से ज्यादा बेहतर माने जाते है. कागज़ व् प्लाई वुड उद्योग में भी यूकेलिप्टस का इस्तेमाल किया जा रहा है.


वैसे तो तराई में यह विदेशी प्रजाति आजादी से पूर्व ही वन विभाग द्वारा अन्य प्रजातियों के साथ लाई गयी, शाखू के वनों का जो सफाया किया गया उस रिक्त जगह इस विदेशी प्रजाति से भर देने की एक कोशिश थी, यूकेलिप्टस की तमाम प्रजातियों के साथ ये नींबू वाली यूकेलिप्टस भी थी, और था सागौन दोनों ही प्रजातियाँ इस तराई की धरती के लिए नई थी, पर सही से यह नहीं कहा जा सकता की उत्तर भारत में यह नींबू वाली प्रजाति कब रोपी गयी. १९६२ में उत्तर प्रदेश में वन विभाग द्वारा बहुतायात में यूकेलिप्टस की कई प्रजातियों का वृक्षारोपण किया गया. भारत में मौजूदा वक्त में यूकेलिप्टस की लगभग २०० प्रजातियाँ मौजूद है. आम जनमानस में यूकेलिप्टस की यह प्रजाति नहीं मौजूद है, लोग टिम्बर के लिए अन्य यूकेलिप्टस की प्रजातियाँ रोपित करते आये हैं.

आम जनमानस से यह प्रजाति रूबरू नहीं हो पाई, और तराई के लोग इस जादू जैसी बात से भी बावस्ता नहीं हो पाए, नहीं तो हर कोइ चौक जाता यूकेलिप्टस से नींबू की खुशबू आते देख ! और इस तरह यह छुपी रही तराई के जंगलों में. यकीनन किसी वन-अधिकारी या निवर्तमान साहिब बहादुर ने इसे इस कचहरी के मध्य लगवाया होगा.

उम्मीद है अब इस खुशबूदार प्रजाति को आप सब भी उगायेगे अपने आस-पास पानी सोखने वाले वृक्ष के रूप में मशहूर यूकेलिप्टस की यह प्रजाति जिसके पत्तों और गोंद में मौजूद सिट्रेलाल मच्छरों के अतिरिक्त तमाम हानिकारक कीटों से दूर रखेगा, इसकी पत्तियों के धुंए से अपने मवेशियों को भी जहरीले कीटों से बचाया जा सकता है, साथ ही इसका तेल खुशबू के लिए और अन्य औषधीय प्रयोगों में लाया जा सकता है. कृषि में  जैविक-कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. चूंकि नींबू वाले यूकेलिप्टस की लम्बाई ६० मीटर तक हो सकती है, इसलिए यह टिम्बर के लिए भी बहुत उपयोगी है.

इसतरह नींबू वाले इस यूकेलिप्टस की यह कहानी, और इसकी मन को तरोताजा कर देने वाली गंध दोनों आप सभी को सुन्दर एहसास कराएंगी.....इस यकीन के साथ आपका कृष्ण!

यह लेख डेली न्यूज एक्टीविस्ट (लखनऊ)अखबार में दिनांक ३ सितम्बर २०१३ को सम्पादकीय पृष्ठ पर  "यूकेलिप्टस बनाम नींबू वाला यूकेलिप्टस" शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ है, 
(अपडेट: ४ अक्टूबर २०१३ )




कृष्ण कुमार मिश्र (हर जगह, हर डगर, हर जीव, हर वनस्पति, नदी, जंगल .....सभी में खुद को खोजने और स्थापित करने की मुसलसल कोशिश....!!! संपर्क-  krishna.manhan@gmail.com)



विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था