डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 04, April 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Nov 17, 2013

खतरे में है भारतीय राष्ट्रीय पक्षी


उपेक्षा के कारण देश में सिमट रही है मोरों की दुनिया

-देवेंद्र प्रकाश मिश्र

वन्यजीव-जंतुओं की जब कोई प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर खड़ी हो जाती है तब भारत में उसके संरक्षण के प्रयास एवं उपाय शुरू किए जाते हैं। राजा-महाराजाओं के शिकार के शौक से जब बाघों की दुनिया सिमट गई तब उसके संरक्षण के कार्य शुरू किए गए। एक सदी पूर्व चीता भारत की धरती से गायब हो चुका है। अब बाघ, शेर, तेंदुआ, हाथी, गैंडा तथा गिद्धों को बचाने के साथ ही जब राजकीय पक्षी सारस के अस्तित्व पर संकट गहराया तब उसको संरक्षण देने के उद्देश्य से गणना कराई है। लेकिन भारत का राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर‘ अभी भी सरकारी उपेक्षा का शिकार है जिससे मोरों की संख्या में भी गिरावट आने लगी है। इसके बाद भी मोरों को संरक्षण देने के लिए भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई रणनीति तैयार नहीं की गई है। निकट भविष्य में मोरों की भी दुनिया सिमट सकती है, इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। 


भारत का राष्ट्रीय पक्षी बने हुए मोर को 50 साल पूरे हो रहे हैं। सन् 1963 में राष्ट्रीय पक्षी का गौरव हासिल करने वाले मोर की घटती संख्या आजादी के पहले से भी आधी रह गई है। सालों से वयंजीवों से प्रेम करने वाले अथवा वयंजीवों के लिए कार्य करने वाले लोग मोर की घटती संख्या पर शोर मचाते रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी आवाज ‘नक्कार खाने में तूती की आवाज‘ बनकर रह गई हैं। हालांकि मोरों की सिमट रही दुनिया को संज्ञान में लेकर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के सेक्शन 43 (3) (अ) और सेक्शन 44 में बदलाव की बात शुरू कर दी है। लेकिन यह भी सोचनीय हैं कि राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा हासिल होने के बाद भी अब तक देश में कभी मोरों की गिनती के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। साल 2008 में भारतीय वयंजीव संस्थान देहरादून (डब्ल्यूआईआई) ने मोर के महत्व को देखते हुए इनकी गणना की योजना बनाकर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजी थी, परन्तु धन को लेकर हुई आनाकानी से गणना का प्रस्ताव फाइलों में कैद होकर गायब हो गया। 


सृष्टि कंजरवेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अनूप गुप्त, उपाध्यक्ष ज्ञानी हरदीप सिंह कहते हैं कि मोर  प्रत्येक भारतीय की भावना से जुड़ा है, भगवान श्रीकृष्ण से भी मोर पंख जुड़ा हुआ है और राष्ट्रीय पक्षी होने का तात्पर्य है कि राष्ट्रीय धरोहर और यह बात सभी को समझानी होगी। सरकार को सख्ती से मोर संरक्षण के लिए कार्य करने चाहिए और ‘सेव टाइगर‘ की तरह ‘सेव पीकाक‘ अभियान भी सरकार को छेड़ना चाहिए। लेकिन जब मोरों की गिनती ही नहीं हुई है तो हम कैसे उनके संबंध में बात कर रहे हैं। सोसाइटी के ही डायरेक्टर डा0 वीके अग्रवाल (रिटायर डिप्टी सीएमओ) एवं डा0 नवीन सिंह का मानना है कि लोगों में भ्रम है कि मोर के खून से घुटनों की मालिश की जाए तो गठिया ठीक हो सकता है उससे आर्थराइटिस ठीक हो सकती है लेकिन ऐसा है नहीं, यह केवल अंधविश्वास है ज्यादातर लोग इसका मांस खाने के लिए शिकार करते हैं।


  पीपुल फार एनीमल्स के खीरी प्रतिनिधि केके मिश्र बताते हैं कि मोर अपनी खूबसूरती के कारण मारा ही जाता है साथ ही इसके पंखों का व्यवसायिक प्रयोग अवैध शिकार को बढ़ावा दे रहा है। संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में खीरी जिले में सर्वाधिक मोर मितौली के पास करनपुर ग्राम एवं मुरईताजपुर के पास पाए गए। अन्य तमाम जगहों पर मोरों की संख्या में गिरावट पाई गई है। श्री मिश्र ने बताया कि भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रति आस्था रखने वाले लोग इनका संरक्षण करते हैं। लेकिन निज स्वार्थ में लोग इनका शिकार करने से परहेज नहीं करते हैं।


भारत की मानव जाति की आस्था और धार्मिक रूप से जुड़े मोर कभी गावों के किनारे खेत, खलिहान और बागों में रहते थे, और यह जंगलों मे भी बहुतायत में पाए जाते थे। गावों के बढ़ते विकास, बदलते परिवेश और आधुनिकीकरण के चलते ग्रामीण क्षे़त्रों से बागों का सफाया हो गया, जंगलों का विनाश अंधाधुंध किया गया, जंगलों को काटकर खेती की जाने लगी है। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि मोरों की दुनिया भी सिमटने लगी है। गांव के किनारे के बाग और विशालकाय पेड़ मोरों के रैन बसेरा हुआ करते थे। पेड़ों के कट जाने और बागों का सफाया होने के कारण घोषला बनाना और अंडा देना उनके लिए मुश्किल भरा काम हो गया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि उनकी वंशबृद्धि की रफ्तार में खासी कमी आयी है। इसके अतिरिक्त फसलों में कीटनाशक दवाओं के प्रयोग का अधिक बढ़ गया है जिसका बिपरीत असर खेत, खलिहानों में दाना चुगने वाले मोरों पर भी पड़ा है। उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में कभी भारी संख्यां में मोर दिखायी देते थे जो देशी-विदेश्ी पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्रविन्दु हुआ करते थे। लेकिन अब प्राकृतिक आपदा बाढ़ आदि के साथ मानवजनित कारणों के चलते जंगलों के वातावरण में परिवर्तन हुआ तो धीरे-धीरे मोरों की संख्या में गिरावट आने लगी है। स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि जंगल के जिन क्षेत्रों में जहां कभी मोर झुंड में दिखायी देते थे, अब इक्का-दुक्का ही मोर दिखायी देते हैं, और गावों के किनारे शाम को गूंजने वाली मोरों की मधुर आवाज गायब हो गयी है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे खूबसूरत पक्षी मोर के संरक्षण के लिए समय रहते प्रयास नहीं किए गए तो भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोरों की दुनिया भी किताबों के पन्नों में सिमट जाएगी। 






-देवेंद्र प्रकाश मिश्र
dpmishra7@gmail.com
(लेखक वाइल्डलाइफर और स्वतंत्र पत्रकार है)

1 comments:

Anonymous said...

This is a very regretted news that our Indian govt. failed to ensure the secure future of our national bird the peacock. This beautiful bird glorified our Indian forests with its call and courtship display during mansoon. We have to ponder over the conservation of peacocks as it is also maintain balance in our natural system. - Uruj Shahid

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