International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Dec 3, 2012

ये जज्बात जो हमें इंसान होने का सबूत देते है..

 एक वाकया नाजिर हुआ हमारे सलीम भाई के मार्फ़त जो अक्सर परिंदों और जानवरों के मसलों को सुर्खिया देते है अपनी कलम से ताकि सोये हुए इंसानी जज्बात जाग सके ऐसा ही वाकया परसों मोबाइल से उन्होंने बताया की किसी इंसानी शक्ल वाले हैवान ने एक कुतिया की आंते फाड़ डाली और वह तड़पती  रही, उसके पेट से आंते बाहर निकल आई और मिट्टी में सनती रही, किसी भी इंसानी दिल का पसीजना जाहिर था और उस जगह कुछ जिम्मेदार लोगों ने वो किया जो इंसानियत के ज़िंदा रहने का सिलसिला देती है, एक इंसानों के डाक्टर ने जितनी कुशलता से उस कुतिया का आपरेशन किया और उसे ठीक किया इससे ये जाहिर होता है की इंसानी कूबत कुछ भी करा सकती है, जो अपेक्षाए जानवरों के डाक्टर से की जाती है वह काम वे पशु-चिकित्सक कभी नहीं कर पाए और एक BAMS डाक्टर ने जो सराहनीय कार्य किया उसके जज्बे को दुधवा लाइव का सलाम ....तो पढ़िए ये वाकया  जो हमारे इंसान होने का सबूत देता है ....माडरेटर 

जानवर का दर्द देखकर तडफ़ उठे इंसानी दिल

पड़रिया तुला में एक कुतिया का किसी ने फाड़ डाला था पेट,

पेट से लटकती आंतें देखकर व्यापारियों व डाक्टरों ने रात को ही किया आपरेशन,

दूसरे दिन तेजी से सुधरी कुतिया की हालत, इलाज जारी।
लखीमपुर (खीरी)। जिले के पड़रिया तुला कस्बे में शुक्रवार को रब के बंदों ने जो किया, वह वाकई काबिले तारीफ है। कस्बे में आवारा घूमने वाले एक जानवर(कुतिया) को किसी ने पेट में चाकू मार दिया, जिससे उसके पेट से कई फिट आंत बाहर लटकने लगी। अपने जख्म को लिए ये जानवर बेबस तडफ़ रहा था। जानवर की पीड़ा देखकर यहां के प्राईवेट डाक्टर व व व्यापारियों ने उसके इलाज का संकल्प लिया रात को ही उस आवारा जानवर को अपने मिल गए, कुतिया के जख्मों को साफकर आंतो को सकुशल जोडऩे के बाद २४ घंटे से उस का इलाज कर रहे हैं। 

इंसान व जानवर में भले कोई रिश्ता न हो, लेकिन जानवर का दर्द देखकर इंसानी दिल भी तडफ़ उठते हैं। पड़रिया तुला में किसी ने एक कुतिया के पेट में गहरा चाकू मार दिया, जिससे कुतिया के पेट में चार इंच घाव के साथ पेट की आंते कट गईं और करीब पांच फिट तक आंत पेट से बाहर निकल कर लटकने लगीं। शाम को हुई इस घटना के बाद वह बेजुबान दर्द से तडफ़ता घूम रहा था, तभी कस्बे के व्यापारियों को उसका दर्द न देखा गया, व्यापारी कस्बे के चिकित्सक डा. सतेंद्र कुमार यादव के पास ले गए, इंसानों का इलाज करने वाले डाक्टर भी इस मंजर को देखकर सिहर उठे, उन्होनें व्यापारियों के आग्रह पर तुरंत ही इलाज करने की ठान ली। रात को ही उसका पेट की आंते साफकर कटी हुईं आंते सिल दी गई, और पेट पर भी टांके लगा दिए गए। रात भर उस बेजुबान को अपने पास रखकर सुबह दोबारा इंजेक्शन व दवाईयां दी गईं। अब उसकी हालत में तेजी से सुधार हुआ है। 


अब्दुल सलीम खान (संवेदनशील मसायल पर पैनी नजर, लेखन में अपने आस-पास के मानवीय मुद्दों को अपनी कलम से जाहिर करने की तमाम सफल कोशिशे, पत्रकारिता में एक दशक से अधिक समय से सक्रिय, खीरी जनपद के गुलरिया में निवास, इनसे salimreporter.lmp@gmail.com  संपर्क कर सकते हैं। )


Nov 11, 2012

आयुर्विज्ञान के पितामह धनवंतरी को नमन




इस स्वर्णिम आभा के जीव और इस औषधीय गुणों वाली वनस्पति के सहचर्य वाले इस चित्र के साथ जो प्रकृति और उसकी महत्ता को परिभाषित करता है, आयुर्विज्ञान के पितामह को नमन करते हुए महान चिकित्सा वैज्ञानिक धनवंतरी के जन्म दिवस पर आप सभी के स्वास्थ्य की मंगल कामनाओं के साथ राम के अयोध्या आगमन पर मनाये गए पर्व  दीवाली की भी तमाम अग्रिम शुभकामनाएँ....कृष्ण..


* दुधवा लाइव डेस्क

Oct 25, 2012

पीताम्बर एक अनोखा पुष्प !

ये है पीताम्बर  

एक वनस्पति जो अपने सुन्दर पुष्प के अतिरिक्त तमाम व्याधियों के मूलनाश की क्षमता रखती है ।

हाँ पीताम्बर एक प्रजाति जिसका पुष्प पीत वर्ण की अलौकिक आभा का प्रादुर्भाव करता है  हमारे मध्य, मानों साक्षात गुरूदेव बृहस्पति विराजमान हो इन मुकुट रूपी पुष्पगुच्छों पर,   और मधुसूदन स्वयं उपस्थित हो इस छटा  में! क्योंकि पीताम्बर कृष्ण का भी एक नाम है, इस पुष्प का पीत वर्ण सहज ही मन को शान्ति, विचारों में सात्विकता और मन में क्षमा का भाव स्थापित करता है।

वर्षा ऋतु में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों सुन्दर कीट पतंगों व तितलियों के जीवन चक्र के महत्वपूर्ण हिस्से का आरम्भ होता है-प्रजनन, वनपस्तियों में सुन्दर पुष्प खिलते है, तितलियां अपने लार्वा के स्वरूप को त्यागकर रंग-बिरंगे पंखों वाली परियों में तब्दील होती हैं, और तमाम कीट-पंतगे प्रकृति के रंगों में रंग कर उन्ही में अपने अस्तित्व को डुबोए हुए नज़र आते हैं, बरसात के अंत में प्रकृति अपने उरूज़ पर होती है, अजीब सूफ़ियाना माहौल होता है, प्रकृति में वनस्पतियों और जीवों के इस परस्पर मिलन का, एक दूसरे पर निर्भरता और सामजस्य जो अदभुत सा लगता है, मानों इन सभी प्राकृतिक प्रक्रियाओं का संचालन बड़े करीने से सुनियोजित ढग से किसी द्वारा चलाया जा रहा हो, बिना रंच मात्र त्रुटि किए हुए !

इसी सिलसिले में एक पीले रंग का सुन्दर पुष्प उगा लखीमपुर खीरी के मोहम्मदी तहसील के एक परगना में जिसे कस्ता के नाम से जानते हैं, यहाँ से गुजरती एक नहर के किनारों पर यह वनस्पति अपने पुष्पों के कारण एक पीली छटा सी विखेरती नज़र आती है इस बरसाती हरियाली के मध्य,  हाँ मैं बात कर रहा हूँ पीताम्बर की,  यह वनस्पति भारत भूमि में आई तो इसके औषधीय महत्त्व से भी हमारे लोग हुए और और इसके त्वचा रोगों पर असरकारक तत्वों को भी जान पाए, क्योंकि इसकी पत्तियों व् फूल का रस ग्राम-पाजटिव बैक्टीरिया पर बहुत असरकारक है। और पेट संबधी रोगों में भी यह रामबाण औषधि है, यह ई0 कोलाई बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है, इसके फंगल और बैक्टीरिया जनित बीमारियों के साथ साथ ब्लड शुगर व् मूत्र-संबधी बीमारियों  पर असर के कारण इसे तमाम देशो के स्थानीय समुदाय पीताम्बर के औषधीय गुणों से लाभान्वित होते रहे है। इस वनस्पति को विदेशी आक्रामक प्रजातियों के अंतर्गत रखा गया, लेकिन जहां की धरती इसे अपना ले तो फिर वह विदेशी कैसे हुई, फिर हर प्रजाति अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष शील है, और यदि प्रकृति में जीवन संघर्ष की दौड़  में कोई प्रजाति कुछ विशेष गुण अर्जित कर ले, तो यह उसका खुद का विकास है!

 उत्तर भारत के तराई में  कस्ता  गाँव में कैसे पहुंची यह प्रजाति, इसका अंदाजा भर लगाया जा सकता है, कि  किसी अन्य प्रादेशिक  समुदाय या किसी तीर्थ यात्री द्वारा लायी गयी फलियों से पीताम्बर उगाने की कोशिश  हो । और इसतरह अब पीताम्बर इस लखीमपुर खीरी के तराई की धरती का बाशिंदा हो गया अपने पुष्पित बालियों की पीली आभा का दृश्य स्थापित करने के लिए हमारे मध्य । 

इस बेलनाकार पुष्प गुच्छ वाली वनस्पति जो अपने आप में तमाम रंग बिरंगे कीट-पतंगों को रिहाइश और भोजन दोनों मुहैया कराता है, साथ ही आप के स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। दुनिया के तमाम देशों में पीताम्बर की पत्तियों और पुष्प के रस को साबुन में मिलाया जाता है, जो त्वचा के रोगों को दूर करता है और साथ ही त्वचा की दमक को बढाता भी है।

 इस प्रजाति को वैज्ञानिक  भाषा में सेना अलाटा कहते है, यह मैक्सिको की स्थानीय प्रजाति है, पीताम्बर फैबेसी परिवार का सदस्य है। यह वनस्पति ट्रापिक्स (उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र ) में 1200 मीटर तक के ऊँचें स्थानों में उग सकती है। आस्ट्रेलिया और एशिया में यह इनवेसिव (आक्रामक) प्रजाति के रूप में जानी जाती हैं। धरती के तमाम भूभागों में इसका औषधीय महत्त्व है। मौजूदा वक्त में यह प्रजाति अफ्रीका साउथ-ईस्ट एशिया, पेसिफिक आइलैंड्स और ट्रापिकल अमेरिका में पायी जाती है।

पीताम्बर जंगल के किनारों, परती नम-भूमियों, नदियों व् तालाबों के किनारों पर उगने वाली वनस्पति हैं, इसके बीज रोपने के कुछ ही दिनों में अंकुरित हो जाते है, एक बार एक पौधा तैयार हो जाने पर इसकी तमाम फलियाँ जो 50-60 बीजों का भंडार होती है, पकने के पश्चात जमीन पर गिरती है और एक ही वर्ष में यह प्रजाति वहां की जमीन पर अपना प्रभुत्व बना लेती है, सैकडों झाडियाँ एक साथ उग आती है। इसी कारण इसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है, और विदेशी भी? चूंकि यह उत्तरी-दक्षिण अमेरिका की स्थानीय प्रजाति है और इसने  अपने बड़े व् सुन्दर पीले पुष्प-गुच्छों वाली  बालियों के कारण मानव-समाज को आकर्षित किया और यही वजह रही की यह मनुष्यों द्वारा एक स्थान से दुनिया के दूसरे इलाकों में लाया गया, और साथ में आई इनकी खूबियाँ जिनमें औषधीय गुण प्रमुख है। 

पीताम्बर का पुष्प-गुच्छ 6-24 इंच लंबा, इसमें गुथे हुए पुष्पों का आकार 1 इंच  तक का होता है। इसके ख़ूबसूरत पुष्प-गुच्छ के वजह से ही इसे दुनिया के तमाम हिस्सों में कई नामों से जाना जाता है जैसे इम्प्रेस कैंडल, रोमन कैंडल ट्री, येलो कैंडल, क्रिसमस कैंडल, सेवन गोल्डन कैंडल बुश  साथ ही औषधीय गुणों के कारण भी लोगों ने इसे कई नाम दिए रिन्गवार्म बुश आदि।  पुष्पंन का वक्त सितम्बर-अक्टूबर है।

पीताम्बर झाडी के रूप में उगता है, जिसकी ऊंचाई 4 मीटर तक हो सकती है। पत्तियाँ 50-80 से०मी० लम्बी होती हैं। पुष्प गुच्छ की शक्ल मोमबत्ती की तरह चमकीले पीले रंग की, और इसके बीजों की फलियाँ 25 सेमी लम्बी होती हैं। इसकी यही पंखनुमां फलियाँ पानी के बहाव द्वारा एवं जानवरों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती हैं। इस प्रकार यह ख़ूबसूरत प्रजाति इलाहिदा जगहोँ में अपना अस्तित्व बनाती है। पीताम्बर की फली पक जाने पर भूरे व् काले रंग की हो जाती है, और प्रत्येक फली में 50-60 चपटे त्रिकोंणनुमा बीज निकलते है।

बालियों में लगे दर्जनों पुष्पों  में काफी तादाद में पराग मौजूद होते है, वह तमाम तरह की प्रजातियों को आकर्षित करते है, जैसे तितलियाँ, कैटरपिलर, मख्खियों, और चीटियों  को, इन कीट-पतंगों को पीताम्बर के  विशाल पुष्प-गुच्छों  से  भोजन तो मिलता ही है साथ ही ये इनके निवास का स्थान भी बन जाते हैं। परागण  की ये प्रक्रिया इन्ही कीट-पतंगों द्वारा होती है यह एक तरह का सयुंक्त अभ्यास है, जीवन जीने का वनस्पति और जंतुओं  के मध्य। दोनों एक दूसरे से लाभान्वित होते हैं। 

पीताम्बर के इस पुष्प का औषधीय इस्तेमाल अस्थमा ब्रोंकाइटिस एवं श्वसन संबधी बीमारियों में किया जाता है। पत्तियों का रस डायरिया कालरा गैस्ट्राईटिस और सीने की जलन में उपयोग में लाते है।

इसका पुष्प, पत्तियाँ तथा जड़ में एन्टी-फंगल, एंटी-ट्यूमर  व् एंटी-बैक्टीरियल तत्व होते है, जिस कारण यह मानव व् जानवरों के विभिन्न रोगों में इस्तेमाल होता रहा है, दुनिया के तमाम भू-भागों में। ग्राम-पॉजटिव   बैक्टीरिया पर इसके रस का प्रभाव जांचा जा चुका है, यही वजह है की मनुष्य एवं जानवरों में होने वाली त्वचा संबधी व्याधियों में इसके इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है।


दुनिया के तमाम हिस्सों में स्थानीय समुदायों में पीताम्बर का अलग-अलग इस्तेमाल किया जाता है जिसमें रेचक (लक्जेटिव )  के रूप में तथा त्वचा रोगों में विशेष तौर से इसकी पत्तियों व् पुष्प का प्रयोग होता हैं, कुछ प्रमुख बीमारियों में पीताम्बर का उपयोग- एनीमिया, कब्ज, लीवर रोग, मासिक धर्म से जुडी बीमारियाँ, एक्जीमा, लेप्रोसी, दाद, घाव, सिफलिस गनोरिया, सोरियासिस, खुजली, डायरिया, पेचिश,   मूत्र-वर्धक, एवं त्वचा की सुन्दरता निखारने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।

पीताम्बर कृमिहर औषाधि के रूप में तथा जहरीले कीड़ों के काटने पर भी औषधि के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है, विभिन्न स्थानों पर इसका प्रयोग इन्सेक्टीसाइड, लार्वीसाइड के तौर पर भी होता है।

बसंत ऋतु के आख़िरी दिनों में पीताम्बर के बीजों की बुआई करना चाहिए नम भूमि में व् जहां सूर्य की किरणे सीधी आती हो।  फिर क्या है आप भी तैयार हो जाइए इस ख़ूबसूरत फूल को अपनी बगिया में उगाने के लिए जो सुन्दरता के साथ साथ आप और आप के पशुओं की बीमारियों में दवा के काम भी आयेगा।

 भारत जैसे उष्ण -कटिबन्धीय क्षेत्र में  जहां पर  कुपोषण, गरीबी, गन्दगी  और अशिक्षा जैसी तमाम दिक्कते मौजूद हों वहां त्वचा-रोगों की उपस्थिति अवश्यभामी है, त्वचा जैसा संवेदी और महत्वपूर्ण अंग में कुष्ठ आदि रोगों के लग जाने से मनुष्य का जीवन जीना दूभर हो जाता है, ऐसे में पीताम्बर के पुष्प पत्ती और जड़ के रस का लेपन त्वचा रोगों को समाप्त कर देता है,  उत्तर भारत के तराई जनपदों में वातावरण में अत्यधिक नमी और जल-भराव के कारण त्वचा रोगों का फैलाव  सबसे ज्यादा होता हैं, इसलिए पीताम्बर की यहाँ उपस्थिति जनमानस के स्वास्थ्य के लिए प्रकृति की अनुपम भेट है ।

बात सिर्फ पीताम्बर की नहीं हमारे आसपास तमाम वनस्पतियाँ व् जंतु रहते है, किन्तु हम उन्हें न तो जानना चाहते है और न ही उनकी उपस्थित के महत्त्व को खोजना और इस जिज्ञासा का अनुपस्थित  होना हमारे मानों में , हमारे मानव समाज के लिए ही अहितकर है, प्रकृति के मध्य सभी के अस्तित्व को स्वीकारना उनकी रक्षा करना और उनके महत्त्व को समझ ले तो फिर हमारी मनोदशाओं में जो  सकारात्मकता आयेगी  वह हमको और बेहतर बनायेगी साथ ही प्रकृति के सरंक्षण का कार्य खुदब-खुद हो जाएगा हमसे, हमारे इस बोध मात्र से !@



कृष्ण कुमार मिश्र 
(krishna.manhan@gmail.com)



References:

N. Ali-Emmanuel, M. Moudachirou, J.A. Akakpoc, Quetin-Leclercq, 2003. Treatment of bovine dermatophilosis with Senna alata, Lantana camara and Mitracarpus scaber leaf extracts, Journal of Ethnopharmacology 86 (2003) 167–171


Sule WF, Okonko IO, Joseph TA, Ojezele MO, Nwanze JC, Alli JA, Adewale OG, Ojezele OJ8, 2010.  In-vitro antifungal activity of Senna Alata Linn. Crude leaf extract, Pelagia Research Library Advances in Applied Science Research, 1 (2): 14-26

J.H. DOUGHARI* AND B. OKAFOR, 2007. Antimicrobial Activity of Senna alata Linn. East and Central African Journal of Pharmaceutical Sciences Vol. 10, 17-21


A. T. Oladele1, B. A. Dairo, A. A. Elujoba and A. O. Oyelami 2010. Management of superficial fungal infections with Senna alata (“alata”) soap: A preliminary report. African Journal of Pharmacy and Pharmacology Vol. 4(3), pp. 098-103, March 2010

OWOYALE, J A; OLATUNJI, G A; OGUNTOYE, S O, 2005. Antifungal and Antibacterial Activities of an Alcoholic Extract of Senna alata Leaves. J. Appl. Sci. Environ. Mgt. Vol. 9 (3) 105 - 107


Oct 14, 2012

तो फिर उसने पेड़ पर ही दम तोड़ दिया ?

टाइगर रिजर्व क्षेत्र में एक तेंदुए को मिली मौत
भारत-नेपाल सीमा पर कतरनिया घाट  वाइल्ड लाइफ  सेंक्चुरी  का मामला 
"अब्दुल सलीम खान  की  रिपोर्ट "

लखीमपुर। दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र के कतरनिया घाट वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी में एक तेंदुआ का शव पेंड़ पर लटका हुआ मिला है। मूर्तिहा वन रेंज में तेंदुआ का शव रोहिनी के पेंड़ में लटका हुआ था, शव की हालत देखकर अनुमान लगाया जा रहा है कि इसकी मौत  कई दिन पहले हुई होगी।

मूर्तिहा वन रेंज में शनिवार को फॉरेस्ट गार्ड बब्बन मिश्रा वाचरों के साथ गश्त पर थे, तभी टीम को जंगल में तेज बदबू आई, उन्होंने देखा कि एक रोहिनी के पेंड़ पर पांच फिट की ऊंचाई पर तेंदुए का शव लटका हुआ है, फॉरेस्ट गार्ड ने तत्काल वन अफसरों को सूचना दी। जिस पर डीएफओ कतर्निया वन्य जीव प्रभाग आरके सिंह व रेंज आफीसर पीएन राय ने मौके पर पहुंच कर शव का जायजा लिया। भारत-नेपाल सीमा पर बहराइच जिले में पडऩे वाले इस स्थान से पास का गांव सलारपुर व एसएसबी की चेक पोस्ट की दूरी एक से डेढ़ किमी है। 

दूसरा पहलू........
.....कितनी तडफ़ से आई होगी जंगल के राजा को मौत


फोटो- पेंड़ पर लटके शव के सामने खड़े वन-अधिकारी व्  कर्मचारी।


लखीमपुर। यूं तो वह जंगल का राजा कहलाता है, लेकिन उसकी आखिरत देखकर इंसानों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि अपने आखिरी समय पर पेंड़ पर फंसकर यह तेंदुआ मदद के लिए कितना तडफ़ा होगा। काश यह गश्ती दल उस रोज भी इधर से गुजर जाता जब अपनी जिंदगी बचाने के लिए इसको किसी की जरूरत थी।

वन महकमे के अफसरों की माने तो दुधवा रिजर्व एरिया के मूर्तिहा वन रेंज में रोहिनी के लगभग १२ फिट ऊंचे पेंड़ पर तेंदुआ चढ़ा होगा, लेकिन उतरते समय वह फंस गया। मौत की असली वजह तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल सकेगी, लेकिन अगर वजह पेंड़ में फंस कर मौत हो जाने की रही होगी तो वह मौत से पहले काफी दहाड़ा होगा, तब क्यों नही इस गश्ती टीम को वह आवाजें सुनाई दीं। कई दिनों तक तेंदुए ने जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ी होगी, और उम्मीद की होगी कि शायद कोई रहनुमा इधर से गुजर जाए और उसे जिंदगी बख्श दे। वन अफसर दावा कर रहे हैं कि इसकी मौत तीन से चार दिन पहले हुई है, जब कि शव की हालत बता रही है कि यह कितना पुराना हो चुका है। तेंदुआ का जहां शव मिला है वहां से नेपाल की सीमा महज दो किमी के करीब है, ऐसे में तेंदुए के साथ किसी अनहोनी से भी इनकार नही किया जा सकता।

क्या कहते हैं जिम्मेदार.......मूर्तिहा वन रेंज में मिले तेंदुआ का शव के मामले में प्रथम दृष्टया देखकर लगता है कि यह तेंदुआ पेंड़ पर चढ़ गया होगा, लेकिन उतरते समय पेंड़ की शाखाओं में फंस गया, वजन ज्यादा होने से यह निकल नही सका, जिससे इसकी मौत तीन से चार दिन पहले हुई होगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत की वजह और इसके नर या मादा होने की पुष्टि हो जाएगी।

"आरके सिंह, डीएफओ कतर्निया वन्य जीव प्रभाग"

अब्दुल सलीम खान 
salimreporter.lmp@gmail.com


Oct 8, 2012

बार्डर पर राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन की गणना शुरू


'माई गंगा माई डॉल्फिन अभियान में दो दिन में मिलीं ६९ सूंस 

 इंडो-नेपाल की गेरूआ व कौडिय़ाला नदी में शुरू हुई डॉल्फिन की गणना, व गणना के दौरान यूं उछलती मिलीं डॉल्फिन ।


भारत-नेपाल की सीमा पर बहने वाली गेरूआ व कौडिय़ाला नदी में भारत की राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन की गणना शुक्रवार को शुरूआत हो गई। पांच से सात अक्टूबर के बीच 'माई गंगा माई डॉल्फिन अभियान के तहत शुरू हुए इस गणना कार्यक्रम में पहले दिन टीम को ३९ डॉल्फिन इन नदियों में मिली हैं। वहीं दूसरे दिन बहराइच-खीरी के बार्डर पर बहने वाली घाघरा नदी में गैंगटिक डॉल्फिन की गणना की शुरूआत हुई, जिसमें टीम को ३० डॉल्फिन मिलने की पुष्टि हुई है। इस नतीजे से गणना में लगीं डब्ल्यूडब्ल्यूएफ व वन महकमें की टीमें काफी उत्साह में हैं।

गंगा नदी का बाघ कही जाने वाली डॉल्फिन को सूंस व हीहू? भी कहा जाता है। पिछले कुछ दशकों में तेजी से घट रही इनकी संख्या को देखते हुए चिंतित हुई सरकार व जिम्मेदार लोगों ने जब सर्वे कराया तो पता चला कि गंगा नदी में तीन दशक पहले तक छह हजार से ज्यादा डॉल्फिन थीं, लेकिन औद्योगिककरण की बाढ़ से इन नदियों में कचरा बढ़ा व जल प्रदूषण के चलते डॉल्फिन की संख्या में साल दर साल गिरावट आती गई। अब यहां महज दो हजार से भी डॉल्फिन के पाए जाने का अनुमान है।

पांच अक्टूबर २००९ राष्ट्रीय जलीय जीव का मिला दर्जा
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भारत सरकार ने डॉल्फिन  को बचाने के लिए इसे पांच अक्टूबर २००९ को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था। प्रदेश में अखिलेश सरकार ने इसे बचाने व इनकी वास्तविक तादात जानने में उत्सुकता दिखाई। इसी के चलते लोगों को जागरूक करने के लिए  डब्ल्यूडब्ल्यूएफ समेत वन विभाग व एनजीओ के माध्यम से २८०० किमी क्षेत्र में 'माई गंगा माई डॉल्फिन अभियान चलाया।

लखनऊ में विभागीय मंत्री ने की शुरूआत

तीन दिनी इस अभियान की शुरूआत लखनऊ में परिवहन मंत्री राज अरिदमन सिंह ने की। इसके साथ ही भारत नेपाल सीमा की सीमा पर बीने वाली गेरूआ नदी से गणना कार्यक्रम की शुरूआत हो गई।

मीठे पानी की रानी है डॉल्फिन

कौडिय़ा व गेरूआ नदी का पानी दूसरी नदियों की अपेक्षा काफी साफ व प्रदूषण रहित व मीठा है। इसलिए इन नदियों में इनका प्राकृतिक वासस्थल पाया जाता है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी दबीर हसन की अगुवाई में एलके स्टीफेंस अधिकारी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ समते छह सदस्सीय टीम इस अभियान में लगी रही। कि २० जून २००७ को हुई गणना में कुल ४८ डॉल्फिन मिली थीं। पहले दिन अभियान गिरिजापुरी के चौ.चरण सिंह बैराज के एक छोर पर खत्म हुआ। दूसरे छोर से  घाघरा नदी में अपने अभियान की शुरूआत करते हुए जालिम नगर डाबर घाट होकर सीतापुर की सीमा पर जाकर थमा।

.....तो ये है सूंस की गणना का तरीका

दबीर हसन बताते हैं कि डॉल्फिन की सामान्य चाल पौने पांच से पांच किमी प्रति घंटा होती है, इसलिए मोटरबोट को ७ से १० किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से लेकर चलते हैं, इस दौरान नदी में मौजूद डॉल्फिन पानी से बाहर सांस लेने के लिए हर तीन मिनट के करीब बाहर आकर उछलती है, इसी जम्प लेने के दौरान डॉल्फिन की गिनती होती जाती है।


गणना के साथ ही चला जागरूकता अभियान

नदी के किनारे रहने वाले मछुवारों से टीम ने कहा कि वह नॉयलान का जाल न इस्तेमान करें, क्यों कि यह जीव अंधा माना जाता है, डॉल्फिन अल्ट्रॉसॉनिक तरंगों से पानी में आगे का रास्ता तय करती है, लेकिन नायलान के जाल से ये तरंगे आरपार हो जाती है, जिससे यह जाल में फंस जाती है। नदी में मिलने वाली छोटी मछलियों को खाकर यह जीव नदी का संतुलन बनाए रखती है।
भारत के अलावा बंगलादेश, नेपाल, की नदियों में डॉल्फिन की खासी तादात पाई जाती है।

अब्दुल सलीम खान


Sep 30, 2012

तू कितनी अच्छी है, तू कितनी प्यारी है....मां


इंसान ही नही पक्षियों में भी रहता है  'मां का दिल



कोयल के बच्चे को 'चूगा' देकर कौए दे रहे जिंदगी

- ऐ मां...तुझसे प्यारी सूरत भगवान की सूरत क्या होगी-गुलरिया में कोयल के बच्चे को 'चूगा' देता कौआ।

अब्दुल सलीम खान
बिजुआ(लखीमपुर)।  'कौआ और कोयल, के स्वभाव व बोली में एक दूसरे से मुखालफत से दुनिया बावस्ता है, लेकिन इन पर एक मां की ममता भारी है, इनकी न सिर्फ स्वभाव व बोली एक दूसरे  से जुदा है, बल्कि इनकी फैमिली तक अलग अलग है। लेकिन यहां एक कोयल के बच्चे के लिए कौआ मां का फर्ज निभा रहा है। कौआ अपनी चोंच से कोयल के बच्चे को चूगा देकर मां का फर्ज निभा रहा है।

मां का दिल आखिर मां का ही है, वह न जाति देखता है और न ही वर्ग, उसे तो सिर्फ अपने बच्चे से ही प्यार है। देख लीजिए न गुलरिया गांव में मेरे घर पर हर रोज कोओं का झुंड (हाउस क्रो) अपने साथ एक कोयल (एशियन कोयल) के मादा चूजे को लेकर आता है, इस झुंड में शामिल दो कौए इस कोयल के बच्चे को अपनी चोंच से चूगा देते हैं। कभी एक कौआ अपनी चोंच में पानी भरकर लाता है तो दूसरा कौआ रोटी के टुकड़े का चूगा कोयल के बच्चे को देता है।



दोनो पक्षियों में है काफी भिन्नताएं।
कौआ व कोयल में काफी भिन्नतांए होती हैं, ये दो  अलग अलग प्रजातियां  हैं। कौवे  की फैमिली कर्वडी व जंतु वैज्ञानिक नाम कर्वस स्पलेन्डेन्स होता है, वहीं कोयल की फैमिली क्यूकूलिडी व जंतु वैज्ञानिक नाम यूडीनैमिष स्कोलोपेसियय होता है। प्रजातियों में विभिन्नता होने के बावजूद  और एक दूसरे से   रंग रूप में  विपरीत नजर आने वाले इन पक्षियों में मां की ममता में कोई बदलाव नही है।



"कोयल जिसे संस्कृत में कोकिला कहते है, मानव द्वारा  इतिहास के दस्तावेजों में यह पक्षी बहुत पहले से दर्ज है, खासतौर से  भारत  में ।  इसके व्यवहार का अध्ययन हजारों वर्ष पूर्व हमारे लोगों ने किया जिसका ख़ूबसूरत वर्णन वेदों से लेकर तमाम   लोक कथाओ एवं लोक गीतों में किया  गया है । इस पक्षी के ब्रूड पैरासिटिज्म की जानकारी भी थी उन्हें, यानी कोयल का अपने अंडो को कौओं  के घोसले में रख देना अर्थात कोयल की संतति को कौओ  द्वारा पालना (एक प्रजाति की संतति को दूसरी प्रजाति द्वारा पालना ) यह हुआ  brood parasitism.

दुनिया की सभी जातियों में मातृत्व का भाव सार्वभौमिक है, वह चाहे इंसान हो या फिर जानवर मातृत्व के मामले में जाति, वर्ग व कैटॉगरी मायने नही रखती। गुलरिया में दिखा यह नजारा वास्तव में मां की ममता का सबसे खूबसूरत पहलू है।"
-----केके मिश्रा, वन्यजीव प्रेमी
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अब्दुल सलीम खान( लेखक लखीमपुर खीरी जनपद के गुलारिया गांव से ताल्लुक रखते हैं जंगल व् जीवों के तमाम किस्सों की बेहतरीन किस्सागोई अपनी कलम के जरिए उत्तर प्रदेश के नामी अखाबारात में करते आये हैं। पेशा पत्रकारिता,   इनसे salimreporter.lmp@gmail.com  पर संपर्क  कर सकते हैं।   )




Sep 24, 2012

उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा पक्षियों का बसेरा तहस-नहस



स्टार्क पक्षी के हजारों घोसले कर दिए गये नष्ट


(लखीमपुर-खीरी) प्रवासी पक्षी ओपनबिल स्टार्क जिसे स्थानीय जनमानस पहाड़ी पक्षी या भाद के नाम से चिन्हित करता है। ये पक्षी लखीमपुर खीरी के सरेली गांव में तकरीबन १०० वर्षों से भी अधिक समय से अपना ठिकाना बनाये हुए है, खासतौर से प्रजनन काल का वक्त जून से नवम्बर तक।  इस चिड़िया ने इसी गांव में अपनी सन्तति को सैकड़ों वर्षों से जन्म दिया और खुले आसमान में उड़ जाने लायक हो जाने तक का समय यही गुजारा, यही की जमीन ने इसे भोजन मुहैया कराया और यही के पेड़ों ने इसे बसेरा दिया, इन्ही पेड़ों पर साल दर साल इस पक्षी ने अपने घोसले बनायें और उनमें अपनी सन्तति को जन्म दिया। लेकिन इस साल इस चिड़िया ने अपनी सन्तति को जन्मा तो लेकिन उन्हे आसमान में उड़ने लायक शहबाज़ नही बना पाई। इस बार किसी इन्सानी हरकत ने इनका आशियाना नही उजाड़ा बल्कि बन्दरों ने इनके घोसलों को तहस-नहस कर दिया।



इन पक्षियों को अतीत व् वर्तमान में इस गांव के लोगों द्वारा सरंक्षण मिलता रहा है , ग्रामीण इन्हें बरसात का सूचक मानते आये \
 
इस चिड़िया के नशेमन को इस तरह से बन्दरों ने बर्बाद किया कि एक सैकड़ों की तादाद में घोसले जिनमें अण्डे और बच्चे मौजूद थे जमीन पर गिर कर नष्ट हो गये, चिड़िया के बच्चों की गर्दने मरोड़ दी, या उनके सर धड़ से अलग कर दिए और दो रोज में ही हजारों जीवित पक्षियों का यह आशियाना कब्रगाह में तब्दील हो गया। आज उस जगह पर सिर्फ़ दो-चार परिन्दों के सिवा कुछ नही बचा...सिर्फ़ मुर्दा परिन्दों की लाशे इधर-उधर बिखरी है ।




आखिर एक प्रजाति के इस घर को पूरी तरह दूसरी प्रजाति के द्वारा इतने वीभत्स तरीके से नष्ट कर देना एक सवाल खड़ा करता है वन्य-जीवन के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए...इस विनाश ने तमाम सवाल छोड़ दिए है हमारे सामने ! आखिर ऐसा क्यों हुआ...




प्राकृतिक आवासों में शिकार और शिकारी सदियों से एक साथ रहते आये, और दोनो की निर्भरता भी एक दूसरे पर निश्चित है बावजूद इसके कि शिकार ने समूल एक साथ किसी प्रजाति को खत्म कर दिया हो ऐसे उदारहण नही मिलते और यह अप्राकृतिक भी है? फ़िर यह पक्षी बन्दरों का शिकार भी नही है!

इस पक्षी के आशियाने पर तमाम हमले होते रहे जैसे किसी सांप ने पेड़ों पर बने घोसले से अण्डें खा लिए..या फ़िर बाज ने इनके चूजों को शिकार बना लिया, पर ऐसा कभी नही हुआ कि किसी शिकारी ने एक साथ पूरी आबादी को ही खत्म कर दिया हों ? और यह संभव भी नही ...शिकारी के स्वभाव के अध्ययन पर जाये तो उनके एक इलाके होते है और शिकार को खाने की एक निश्चित मात्रा, इसलिए एक साथ तमाम शिकारी एक जगह पर इकट्ठा नही हो सकते और न ही एक शिकारी जीव एक साथ सैकड़ो शिकार को खा सकता है?


लेकिन पक्षियों के जिस विशाल कुनबे को बन्दरों ने जिस तरह से खत्म कर दिया वह अजीब सी घटना है। जबकि इन पक्षियों और इन बन्दरों के बीच शिकार और शिकारी का रिस्ता भी नही है? और बन्दरों के उत्पाती स्वभाव के बावजूद इस तरह की बरबादी जंगल के इतिहास में शायद ही दर्ज हो?

यकीनन इन बन्दरों के इस विनाशक व कुद्र स्वभाव के पीछे कोई मानव-जनित कारण है। इस गांव में इस बरबादी से रबरू होने जब मैं पहुंचा तो मन की गतिविधियां अराजक तौर पर गतिमान थी सवाल जवाब से बावस्ता नही हो पा रहे थे, लेकिन ग्रामीणों से बात करने के बाद राज जाहिर हुआ कि आखिर यह बन्दर इन परिन्दों की मौत का कारण क्योबन  गये....

मानव आबादी में नील-गाय की तरह बन्दरों का रूख इसका मुख्य कारण है, इन्सान नील-गाय को नियम-कानून और संवेदनाओं को ताक पर रखकर मारता और डराता आ रहा है, बावजूद इसके उसे बचपन से सिखाया जाता रहा कि जीव-हत्या पाप है, कम से कम तब तक जब तक उसकी जान का खतरा न बने वह जीव, बन्दरों को भी एक समुदाय पवित्र और पूज्य मानता रहा, कभी उसे भोजन देता और उसे मारना भी पाप समझा जाता रहा, लेकिन हालात बदल गये, जंगल काट दिए गये, परती भूमियां कृषि योग्य भूमि में तब्दील कर दी गयी नदी-नारों पर भी इन्सानी कब्जा, गांव की पुरानी बागे भी नदराद हो गयी और उनकी जगह ले ली कलमी आम की या अन्य टिम्बर योग्य प्रजातियों ने जहां कड़ा इन्सानी पहरा हर वक्रत मौजूद रहता है, फ़िर आप बताये जीव कहां जाए ? इनके बसेरों को हमने उजाड़ा और अब यह हमारे कथित बसेरों पर आ धमकते है, यह इनकी मजबूरी ही नही जिन्दा रहने की जरूरत है। लेकिन हम यह बिना सोचे यह चिल्लाना शुरू करते है कि यह बाघ, शेर, बन्दर या नील गाय हमारे इलाकों यानि रिहाईशी इलाकों में घुस आया है, जैसे जमीन पर सिर्फ़ इन्सानी हक हो और यह हक हम लिखवा कर ही पैदा हुए हों।



इन बन्दरों का रिहाईशी इलाकों में आना भी ऐसी ही घटना है, अब सुनिए इन्सानी हरकतों के किस्से, जिस गांव में बन्दरों की आवा-जाही बढ़ी वहां के लोगो ने शुरूवाती दौर में हवाई बन्दूक से इन जानवरों के जिस्म में लोहे के छर्रे धांस दिए या पटाखों से इन्हे डराया, फ़िर भी काम नही बना तो इन्हे ट्राली को जालनुमा बनाकर उसमें अनाज रखकर इन्हे धोखे से बन्द कर लिया, फ़िर इन्हे पकड़कर इनके हाथ-पैर बांध दिए और बोरों में भरकर इन्हे दूसरे इलाकों में जाकर छोड़ दिया, फ़िर यही सिलसिला अनवरत गति से जारी रहा, दूसरे गांव के लोगों ने भी ऐसा किया, और ऐसा करते वक्त इनके हाथ-पैर और चेहरे लहूलुहान होते रहे, कैद से अपने आपको छुड़ाने की छटपटाहट इन्हे और रक्त-रंजित करती गयी.....एक वाकया वहां के ग्रामीण ने बताया कि इस गांव के पास कुछ लोग बोरों में बन्दरों को बन्द कर छोड़ जाते है जिन्हे गांव के कुछ सहिष्ण लोग छुड़वा देते है, उन बंधे हुए बोरों से, किन्तु इन बन्दरों के बन्धे हुए हाथ पैर डर के कारण नही खोल पाते...एक दृष्टान्त ने तो मुझे रूला ही दिया कि एक बन्दरियां अपने बच्चे को लेकर पेड़ पर चढने की कोशिश कर रही थी लेकिन चढ नही पा रही थी जानते है क्यों, क्योंकि उस बन्दरियां के हाथ पीछे की तरफ़ बंधे हुए थे और बच्चा उसके पेट से चिपका हुआ था........मुझे अफ़सोस है कि इन्सान अपने गुलामी के दिनों को भूल गया जब मांये किसी और को बेच दी जाती थी और बच्चे किसी और को....! इन्सान इन्सान को गुलाम बनाता था ऐसे ही इन्सान इन्सान को बांधकर जहाजों में डाल देता था,  गुलाम महीनों भूख प्यास से तड़पते दूर देश के मुल्कों में बेचे जाते थे......



हम न तो इतिहास से कुछ सीख रहे है और न ही बर्बरता की अपनी नियति में फ़र्क ला पा रहे है, मानवता के लिए ही नही सारी धरती की और धरती पर बसने वाली प्रजातियों के लिए यह खतरानाक है।


मैं यहां सिर्फ़ यही कहना चाहता हूं कि इन बन्दरों की इस दशा के बाद इनकी मनोदशा में क्या तब्दीली आई होगी..अगर आप के साथ यह सब किया जाए तो कैसे बन जायेंगे आप?, शायद इस गांव के परिन्दों के इस आशियाने को उजाड़ने में इनकी यही मनोदशा का ही परिणाम रहा होगा, और इस मनोदशा की उत्पत्ति का कारण हम ही हैं, यह घटना  साबित करती  है कि इन परिन्दों को  बंदरों द्वारा उजाड़ने का कारण अप्रत्यक्ष रूप से हमारी मानव बिरादरी है, नाकि ये बन्दर- ये तो सिर्फ़ माध्यम है..निमित्त मात्र...!
 (तबाही के मंजर से आप सभी को नाज़िर नही करा रहां हूं क्योंकि वह बहुत वीभत्स है। साथ ही अपने शोध पत्रों का समावेश यहां पर नही कर पाया सन्दर्भ में जो भविष्य में उनका संकलन वेब-पत्रिका में अवश्य करूंगा, इनकी इस सुन्दर आबादी व् व्यवहार का जिक्र मैने अपने शोध कार्य के दौरान विश्व पटल पर तमाम पत्र-पत्रिकाओं और वैज्ञानिक जर्नल्स के माध्यम से  किया है।)


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थोड़ा परिचय हो जाए इस सुन्दर और सीधे स्वभाव वाले पक्षी का, यह ओपेनबिल्ड स्टार्क(Openbilled Stork) जिसका वैज्ञानिक नाम एनॉस्टामस ओसीटेन्स (Anastomus oscitans)है,  जो सिकोनिडी (Ciconiidae) फ़ैमिली के अन्तर्गत है। यह पक्षी भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान, चीन, वियतनाम, थाईलैण्ड, श्रीलंका आदि देशों में रहता है, और अपने प्रवास काल में 1500 कि०मी० से अधिक तक की दूरी तय कर लेता है, जून से नवम्बर तक भारत में इसका प्रजनन काल का समय है, जहां ये पक्षी सामुदायिक तौर पर हजारों घोसले बनाते हैं और अण्डे देने से लेकर बच्चों के वयस्क हो जाने तक का समय अपने इसी प्रजनन स्थल पर गुजारते है, इसके बाद ये पक्षी भोजन की तलाश में मीलों दूर तितर-बितर हो जाते है, सबसे खास बात यह है कि ये पक्षी अपने प्रजनन काल के समय फ़िर उसी स्थल पर वापस होते है जहां उसने पिछले वर्ष घोसले बनाये थे, यह प्रक्रिया साल दर साल चलती है, जब तक उन्हे उस स्थान पर अनुकूल परिस्थियां मिलती रहती हैं, यानि घोसले बनाने के लिए वृक्ष, आस-पास में तमाम जल स्रोत मौजूद हों। इनका मुख्य भोजल घोघा (Pila) है। सफ़ेद-काले पंखों वाला यह स्टार्क पक्षी जिसकी तांगे लम्बी व गुलाबी रंग लिए होती हैं, बड़ी चोंच जिसका रंग काला होता है, इसकी चोच के मध्य रिक्त स्थान होने के कारण ही इसे ओपनबिल कहते है, और यह चोंच का आकार इसे इसका भोजन पकड़ने में सहायता करता है।


 प्रजनन से पूर्व ये पक्षी जोड़े बनाते है, चार से पांच अण्डे एक घोसले में पाये जाते है, नर व मादा दोनो मिलकर अपनी सन्तति का पोषण व सुरक्षा करते हैं।   

अपने शोध के दौरान जो मैने देखा यह प्रजाति मानव प्रजाति के लिए बहुत लाभदायक हैं, इन पक्षियों के द्वारा हेल्मिन्थीज से होने वाली बीमारियों पर नियन्त्रण इन पक्षियों द्वारा होता है, चूकिं ये घोघा को मुख्य आहार के रूप में लेते है, और घोघा (Mollusca) मुख्य वाहक होता है हेल्मन्थीज (mainly Trematode) का, जिसके कारण मानव समुदाय  व उनके पालतू जानवरों में तमाम भयानक बीमारिया पनपती हैं जैसे सिस्टोसोमियासिस, आपिस्थोराचियासिस, सियोलोप्सियासिस व फैसियोलियासिस (लीवरफ्लूक) जैसी होने वाली बीमारियां जो मनुष्य व उनके पालतू जानवरों में बुखार, यकृत की बीमारी पित्ताशय की पथरी, स्नोफीलियां, डायरिया, डिसेन्ट्री आदि पेट से संबंधित बीमारी हो जाती हैं।

प्लेटीहेल्मिन्थस संघ के परजीवियों से होने वाली बीमारियों पर यह पक्षी नियंत्रण रखता है  चूंकि इन परजीवियों का वाहक घोंघा (मोलस्क) होता है जिसके द्वारा खेतों में काम करने वाले मनुष्यों और जलाशयों व चारागाहों में चरने व पानी पीने वाले वाले पशुओं को यह परजीवी संक्रमित कर देता है। और इस घोघे को यह स्टार्क पक्षी खाता है नतीजतन यह इन परजीवियों जो घोघा में मौजूद होते है उनकी तादाद पर नियन्त्रण रखता है।

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कृष्ण कुमार मिश्र ( वन्य जीव सरंक्षण, अपनी परंपरा और इतिहास को संजोने की जुगत, लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।)


Sep 16, 2012

बिखरता हिमालय





 जल जंगल जमीन- जो बुनियादी हैं! उन्हें ही तहस नहस किया जा रहा है-

विकास बनाम विनाश




मानव सभ्यता की हम बात करते रहते हैं. कितने दशक बीत गये, बीतते जा रहे हैं. कहते हैं. इतिहास खुद को दुहराता है. उसी कि राह हम देख रहे हैं. समाज के बनने बिगड़ने के हम साक्षी बनते रहते हैं. यह बनना बिगड़ना क्या है, यह समझ पाना कठिन होता जा रहा है. क्योंकि जिसे हम ‘बनना’ कहते हैं, वह दूसरे के दृष्टि में बनना ही हो ऐसा आवश्यक नहीं है. बनना शब्द रचनात्मक पहल को दर्शाता है.



    इस बनने और बिगड़ने की परिभाषाओं को भी समझना चाहिये.किसी बसी-बसाई या बनी हुई सभ्यता को बिगाड़कर किसी नई चीज़ का निर्माण उसी पर करना इसे बनना कहना या मानना चाहिये कि बिगड़ना! यह तय कर पाना कठिन हो रहा है. सारी मान्यताएं,अवधारणाएं और पैमाने बदल गये हैं. ये बदलाव भी इतनी तेजी से हो रहे हैं, कि मौलिकताओं को टिका पाना कठिन होता जा रहा है. जो मौलिक है, वो उन्हें पुराना लगता है और पुराना अर्थात उसका नवीनीकरण होना ही चाहिये, नवीनीकरण कैसे होना चाहिये, तो कहते हैं, कि विकास हो!! विकास कैसे हो!? तो एक ही रास्ता उन्हें समझ में आता है, कि जो उनकी दृष्टि में विकास है?.



 ---अनियोजित विकास



           इस विकास का लाभ एक बहुत ही छोटे तबके को हुआ है, जो बड़ी तेज़ी से विकसित हुआ है. सवा अरब के हिंदूस्तान में यह समृद्धि ज़्यादा से ज़्यादा तीस करोड़ लोगों तक पहुँची बताई जा रही है, इसके बाद के तीस करोड़ लोग संघर्ष के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं, और आखिरी साठ करोड़ लोग अपने मनुष्य होने के स्वयं के अस्तित्व को तलाश रहे हैं. हमारे वनवासी भाई पहले ही बड़े बाँधों के नाम पर उजाड़े जाते रहे हैं और अब बड़ी पूँजी के नाम पर उन्हें बेदखल किया जा रहा है. तिजोरियों वाला इंडिया अलग देश है और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता और नक्सलवाद से जूझता हिन्दूस्तान एक अलग देश है और दोनों ही के बीच एक लम्बी, गहरी और चौड़ी खाई है.



गाँधी विचार की प्रासंगिकता-



          इन सब बातों को हम सोचते हैं, तो गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में जो कहा है, वह ध्यान आता है, कि “मनुष्य कि वृत्तियाँ चंचल हैं. उसे शरीर को जितना ज़्यादा दिया जाये, उतना ज़्यादा माँगता है. ज़्यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता. भोग भोगने से भोग कि इच्छा प्रबल होती जाती है.” वे यह भी कहते हैं, कि “सभ्यता वह आचरण है, जिससे आदमी अपना फर्ज़ अदा करता है. फर्ज़ अदा करने के मायने हैं, नीति का पालन करना. नीति का पालन करने का मतलब है, अपने मन और इंद्रियों को बस में रखना. ऐसा करते हुए हम स्वयं को पहचानते हैं. यही सभ्यता है. इससे जो उल्टा है, वो बिगाड़ करने वाला है. समझना यही है कि यह सभ्यता दूसरों का नाश करने वाली और खुद नाशवान है.”       ......



एक तरफ हम अपनी सुविधाओं के लिये प्राकृतिक संसाधनों को दोहन कर आराम के साधन जुटा रहे हैं, तो दूसरी तरफ लाखों लोग अपनी भूमि और आजीविका के संसाधनों से वंचित हो रहे हैं, इसलिये हमें भी यह समझ में आना चाहिये कि असली विकास हम किसे कहेंगे!! वह जो सभी लोगों को सम्मान भरी आजीविका दे और प्रकृति के साथ सामंजस्य से जीना सिखाये या फिर वह जो कुछ लोगों के लोभ-लाभ के लिये निसर्ग-मानव के सम्पोषित प्रयासों को समूल नष्ट कर दे!!?? हमारी सभ्यता हमें सिखाती आई है, जितने हम प्रकृति से जुड़े रहेंगे उतने ही हम सम्पोषित स्वरूप में रहेंगे. हमनें फिर किया भी वही. जब तक हमारा प्रकृति से सामंजस्य था, तब तक किसी प्रकार का असंतुलन नहीं था. सभी प्राकृतिक संसाधन – जल, जंगल और ज़मीन हमारे साथ और हमारे लिये थे. परंतु बाद में हमने यह महसूस किया कि प्रकृति जो हमसे अभिन्न थी, उससे हमें अलग कर दिया गया है और उस पर अधिकार और मालिकाना हक जताना शुरु हुआ, अब वो प्राकृतिक संसाधन कुछ ही लोगों के हाथ में जा रहे हैं.



सही एवं स्वमानी आजीविका आयोजन – जल, जंगल, ज़मीन, तकनीक, श्रम और मानव प्रेरणा पर स्थानीय लोगों के नियंत्रण और अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से उसके असरदार इस्तेमाल पर निर्भर करता है. परंतु विकास के नाम पर किये जाने वाले ज़्यादतर हस्ताक्षेप स्थानीय संसाधनों को ऐसी विशाल और केंद्रीकृत संस्थाओं के हवाले कर देते हैं, जिनकी ना लोगों के प्रति जवाबदेही होती है और ना ही उनकी ज़रूरतों के प्रति समझ होती है.



    जिस प्रक्रिया में से थोड़े से लोगों के हाथ में सत्ता एवं सम्पत्ति का संकेंद्रण होगा और व्यापक स्तर पर लोग अपनी जीविकोपार्जन के साधन से बेदखल कर दिये जायेंगे, वह कैसे स्वीकार की जा सकती है? उद्योग के विकास के नाम पर बड़े व भारी उद्योगों की ही चर्चा क्यों होती है? उद्योग के विकास का अर्थ ग्रामीण उद्योग का विकास क्यों नहीं हो?



   उत्तरप्रदेश में भट्टापरसोल तथा आछेपुर गाँव, बिहार में मुज़फ्फरपुर के निकट मरा गाँवमहाराष्ट्र के रत्नागिरी जिला के जैतापुर गाँव तथा देश के अन्य कई गाँवों में भूमि अधिग्रहण कानून के तहत बड़े उद्योगों द्वारा किसानों पर अत्याचार किया गया.  इसे सरकार ने अनदेखी कर दिया है. पश्चिम बंगाल में सिंगूर तथा नंदीग्राम में बहुत पहले ही किसानों की भूमि छीन लेने की कार्यवाही भूमि अधिग्रहण कानून के तहत की गई, जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई. फिर भी इसका क्रम टूट नहीं रहा है. शासनकर्ताओं ने मान लिया है, कि इस देश का उद्योगीकरण करने के लिये भारी उद्योगों का निर्माण करना ज़रूरी है, जो बड़े उद्योगों कि इकाईयों द्वारा ही सम्भव है.



नदियां और जंगल-

इसी प्रकार के तथाकथित विकास का शिकार पिछले काफी अरसे से उत्तराखंड भी हो रहा है. उत्तराखंड हिमालय के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों युक्त इलाका ही नहीं वरन एक करोड़ मनुष्यों का घर भी है. जल, जंगल और ज़मीन जैसे प्राथमिक संसाधन उत्तराखंड के अलावा देश के बड़े हिस्से को सदियों से जीवन दे रहे हैं. यहाँ से निकलने वाली नदियों का पानी दिल्ली के साथ – साथ देश के नौ राज्यों के अलावा बांग्लादेश तक फैले करोड़ों लोगों की प्यास बुझा रहा है. यहाँ के वन इन तमाम जीवनदायिनी नदियों सहित हज़ारों जलधाराओं के उद्गम और जलग्रहण क्षेत्रों की नाज़ुक पारिस्थितिकी को टिकाये हुए हैं. वनों से ही स्त्रोतों वा नदियों में पानी है. इतना ही नहीं यहाँ के वन हिमालय की नाज़ुक भूसंरचना की उथल- पुथल रोकने के साथ ही पर्वतीय ग्रामीण अर्थतंत्र का आधार भी हैं. आज भी प्राकृतिक जंगल बचे हैं, तो इसलिये कि यहाँ की 80% आबादी जीविकोपार्जन के लिये प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वनों पर निर्भर हैं. हिमालयी आबादी और प्राकृतिक संसाधनों का यह ताना- बाना उत्तराखंड में प्राकृतिक संसाधनों और आबादी के रिश्तों को प्रगाढ़ करने वाली प्रक्रियाओं का परिणाम है और उसे बनाये रखने की ज़िम्मेवारी लोगों और सरकार की है. हमारी सरकारें इस समझ को लगातार नज़र अंदाज़ करतीं आ रहीं हैं. अब तक जो विकास नीतियाँ बनाई गईं हैं, उनमें न हिमालय बचाने की हिमायत है और नही लोगों को समृद्ध करने का ज़रिया. पर्यावरण संरक्षण के नाम पर स्थानीय लोगों की सदियों पुरानी वनाधारित जीवनशैली को समाप्त कर अभयारण्यों और वन्यजीव विहारों का विस्तार किया जा रहा है. वन संरक्षण के नाम पर पर्वतीय गाँवों की वेनाप और ग्राम समाज की भूमि को वन विभाग के अधीन कर दिया गया है. इससे 93% भूमि राज्यके कब्ज़े में आ गई है. जबकि 64% वन क्षेत्र पहले ही वन विभाग के अधीन है. इस भूमि के आधे हिस्से में भी वन नहीं है.



        ग्रामीण अर्थतंत्र की रीढ़ और सामूहिक वन प्रबंध की मिसाल वन पंचायतों को विश्व बैंक के कर्ज़ से चल रही संयुक्त वन प्रबंध योजना के हवाले कर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया है. प्राकृतिक वनों का ह्रास हो रहा है. वनों में प्रतिवर्ष आग लगने की घटनाएँ बढ़ रहीं हैं. इसके अलावा प्रतिवर्ष हज़ारों हेक्टेयर वनक्षेत्र एवं वनावरण बड़ी परियोजनाओं के कारण नष्ट हो रहे हैं. परिणामस्वरूप जलग्रहण क्षेत्रों में भूक्षरण की गति तेज़ हुई है और उनकी जल ग्रहण क्षमता में कमी आई है, और हिमालयी नदियों में बाढ़, भूस्खलन व पारिस्थितिकी बदलावों की गति तेज़ हुई है, जिससे यहाँ के नाज़ुक पर्वत ही नहीं वरन उनसे निकलने वाली हिमानी पोषित एवं गैर हिमानी वर्षा पोषित नदियों का अस्तित्व खतरे में है.



         हिमालयी नदियों का संकट और भी गहरा है. भूमंडलीय तापमान में वृद्धि और मानवीय गतिविधियों के हिमरेखा तक पहुँच जाने के कारण हिमालयी नदियों के जलस्रोत ग्लेशियर अपना प्राकृतिक स्वरूप खो रहें हैं. इनके सिकुड़ने की गति तेज़ हो गई है. बर्फ पिघलने से ग्लेशियर झील में तब्दील हो रहें हैं और निचली घाटियों में आने वाली बाढ़ का कारण बन रहे हैं.



अब तक उत्तराखंड हिमालय के विकास का जो मॉडल सामने आया है, उसमें दशकों से स्थानीय गाँवों को रोशन करने वाली थल- पिथोरागढ़, आरे- बागेश्वर, मसूरी तथा रामगाड़ नैनीताल जैसी विद्युत परियोजनाओं की अनदेखी कर कुछ लोगों की ऊर्जा की भूख मिटाने के लिए विकास के नाम पर हिमालय की पारिस्थितिकी को रौंदने वाली टिहरी जैसी परियोजनाओं को प्राथमिकता देने वाली विकास नीति आई है. इसके तहत उत्तराखंड की नदियोंको सुरंगों और बाँधों में समाने और अति संवेदनशील पहाड़ों को खोखला करने का काम शुरु हो गया है.

नदियों का कत्ल कर रही परियोजनायें



         सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार गंगा, यमुना, टौंस से लेकर काली तक उत्तराखंड की लगभग सभी बड़ी नदियों पर बिजली उत्पादन हेतु लगभग 600 परियोजनाएँ निर्माणाधीन अथवा प्रस्तावित हैं. जिसमें नदियों की अविरल धाराओं को बाँध कर और संवेदनशील पहाड़ों को खोखला कर नदियों के जल को लम्बी लम्बी सुरंगों में डाला जा रहा है अथवा डाला जाएगा. हक़ीक़त यह है, कि इनसे लोगों तथा देश को कोई दीर्घकालीन लाभ नहीं मिलने वाले हैं. इन नदियों के किनारे सदियों में विकसित हमारी समूची नदी घाटी सभ्यता विलुप्त हो सकती है. इसकी शुरुआत टिहरी से हो चुकी है. फिर भी दर्जनों बाँध निर्माणाधीन और प्रस्तावित हैं. सुरंगों के माध्यम से कार्यांवित होने वाली परियोजनाओं से अनेक गाँवों का अस्तित्व खतरे मे पड़ने वाला है. चमोली जिले में सुरंग आधारित विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना से चॉई गाँव का विध्वंस, बागेश्वर में सुडिंग गाँव और उत्तरकाशी जिले में पाला गाँव के अस्तित्व का संकट इसके नवीनतम उदाहरण हैं. इसके अलावा अनेक बस्तियाँ विस्थापन के कगार पर हैं और अनेक बस्तियों के साथ – साथ उनके खेत, जंगल और उनसे जुड़े जीविका के साधन समाप्त हो रहे हैं, जिनकी कोई भरपाई नहीं होने वाली है. निरंकुश सरकारें लोगों की आस्था और आजीविका के आधारों को नष्ट करने पर जुटी हुई हैं.



         इस प्रकार उत्तराखंड की नदियों के लिए दो तरह के खतरे साफ नज़र आ रहे हैं. जिनके घातक परिणाम हो सकते हैं, इसकी शुरुआत हो चुकी है. जिसे निम्न रूप में देखना उचित होगा- पहला जल विद्युत परियोजनाओं के अंतर्गत नदियों में बनने वाले बड़े बाँध और सुरंगों के दुष्परिणामों के रूप में. दूसरा उत्तराखंड हिमालय की जीवन रेखा कही जाने वाली गैर हिमालयी वर्षा पोषित नदियों में निरंतर पानी की कमी के दुष्प्रभावों के रूप में सामने आईं हैं.





                                                

रूपल अजबे ( गाँधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली में शोध सहायक के तौर पर कार्यरत, महात्मा के जीवन-दर्शन को मुसलसल जारी रखने की कवायदों में मशरूफ़, हिन्दी-उर्दू अदब  के मुख्य नगरों में से एक नगर इन्दौर से ताल्लुकात रखती हैं, क्रान्तिकारी विरासत, इनसे सम्पर्क rupalajbe@gmail.com पर कर सकते हैं। )






                                            







Aug 25, 2012

बाढ़ ....क्योंकि नदियां कभी नही लौटती !

ये नदी नही एक गांव है, जो अब डूब चुका है।

बाढ़ की विभीषिका में बह रही है तराई की वन्य-संपदा- दुधवा राष्ट्रीय उद्यान प्रभावित

तराई के जंगल हुए जल-मग्न- जानवर बेहाल

इन्तजामियां कर रही है सिर्फ़ कागज़ी कवायदें-

लखीमपुर खीरी हिमालय की तराई का वह भूभाग है जहां तमाम नदियां इस जमीन पर कई रेखाये खींचती हैं! इन रेखाओं के बीच के हिस्सों को भरते हैं शाखू के विशाल जंगल, गन्ने की फ़सल और रिहाईशी इलाके। ...इनमें कुछ रेखायें मोटी तो कुछ बारीक है, लेकिन बारिश इन रेखाओं को अब सिर्फ़ मोटा नही करती बल्कि इन्हें बेडौल बना देती है, कही कही तो ऐसा लगता है जैसे किसी बच्चे ने स्याही गिरा दी हो ! जानते है ऐसा क्यो होता है? कहते हैं, "पानी अपना रास्ता खुद तलाश लेता है"! आखिर क्यो तलाशना पड़ता है पानी को रास्ता...जाहिर है उसे कही रोका जा रहा है, या फ़िर नदी के आगोश में शान्त बहने वाला पानी आज विकराल गर्जना करते हुए, अपने आवेग को बढाता हुआ जमीन पर इधर-उधर उमड़-घुमड़ कर सब कुछ तहस-नहस करने को आतुर क्यों है, उसके इस रौद्र रूप पे आप को यह नही महसूस होता कि उसे कही छेड़ा गया है, बांधा गया या फ़िर उसे रास्ता नही दिया जा रहा है, कुछ तो है जो वह नाराज है, अपनी धीमी, शान्त और कलरव की मधुर धुन करने वाला यह जल आज इतने आवेश में क्यों है? 

 सोचिए नदियों के किनारे जो मानों दो बाहें हों और अविरल बह रहे जल को बड़ी शिद्दत से समन्दर के आगोश में समर्पित कर देने को आतुर हों, आज बाहें (किनारे) खण्डित हो रही है- जगह जगह और जल धारायें इधर-उधर का रूख अख्तियातर करने को मानों विचलित हो रही हों! 

हमने नदियों पर बाधं बना कर उनकी निरन्तर बहने की प्रवत्ति को रोकने की कोशिश की, आप को बता दूं यदि किसी के स्वभाव और यानि प्रवत्ति से छेड़छाड़ की जाती है, तो फ़िर इसके दुष्परिणाम ही संभावित होते है, हमने इन नदियों के किनारे के जंगलों झाड़ियों, और घास के मैदानों को नष्ट कर दिया और वहा या तो खेती करना शुरू ए की या फ़िर रिहाईशी इलाके बना लिए, नतीजा सामने है, जो जंगल, वृक्ष, और घासें मिट्टी को जकड़े हुई थी वो जकड़न खत्म हो गयी और जल-धाराओं की विशाल ठोकरों ने किनारों को काटना शुरू ए कर दिया।

बाढ की विभीषिका ये शब्द बड़ा अजीब सा लगता है, कभी बाढ़ खुशहाली का सबब बनती थी, थोड़ी परेशानियों के साथ ! वजह थी बाढ़ के पानी के साथ आये वो तत्व जो जमीन को उपजाऊ बनते है, साथ ही उस पूरे भूभाग के तालाबों और कुओं को संचित करने का काम भी यह बाढ के पानी से ही था। नदियों के किनारे वाले भू-भाग को लोग केवल चरागाह के तौर पर इस्तेमाल करते थे, आज नदियों के किनारे क्या नदी के बीच में घर बना डाले लोगों ने और खेती करना शुरू कर दिया, किसी के दायरे में घुसना और फ़िर नुकसान होने पर मुआबजे की मांग, ये सब बड़ा अजीब है!

एक दौर था तो हमारे तराई के गांजर क्षेत्र के लोग इस बात के लिए तैयार रहते थे, कि अब थोड़े दिन शारदा मैया या घाघरा मैया (नदी) उफ़नायेंगी तो तैयारी पहले से कर लो, लोग नदियों की पूजा करते थे कि मैया अब लौट जाओ हमारे गांव से । 



आज नदियों का यह उफ़नाना सामान्य नही रहा, ये विकराल रूप धारण कर रही है, क्योंकि पहाड़ों पर कटते हुए जंगलों की वजह से, मैदानी क्षेत्रों में नदियों के किनारों पर खेती होने से, इन नदियों के भीतर सिल्ट और मिट्टी इकट्ठा होती जा रही है, नतीजतन इनकी गहराई समाप्त हो गयी, समतल होती नदियां, बिना किनारों के जब गुजरेगी हमारे मध्य से तो नतीजा क्या होगा?



बड़ी नदियों के अलावा अगर हम बात करे छोटी नदियों की, जो इन विशाल नदियों को पोषित करती रही है, तो हमने इन छोटी नदियों लगभग नष्ट कर दिया, इनके किनारो पर कब्जा कर लिया,  बदलती परम्परायें और विकास ने मानवीय सभ्यता को जो प्रभावित किया उसके चलते अब गांवों में लोग इन नदियों से मिट्टी नही निकालते अपने घर और घर के तमाम सामान को बनाने के लिए जो कभी बहुत जरूरी था। ये नदियां भी अपनी गहराई खो चुकी है, और किनारे सिकुड़ गये हैं। ये छोटी नदियां बारिश के अतिरिक्त भी पूरे वर्ष मनुष्य और जानवरों के लिए जल की उप्लब्धता बनाये रखती थी, और बड़ी नदियों की जलधारा को पोषित भी करती थी, ताकि वह सागर तक पहुंच सके।


नदी ने जो रास्ता एक बार अख्तियार कर लिया, फ़िर राह में कुछ भी हो, उसे तहस नहस करती हुई, वो आगे बढती रहती है, और दोबारा पीछे नही मुड़ती अपने छोड़े हुए मार्ग पर।  इन नदियों को इनका रास्ता मिल जाये इनके मुहाने और मीलों तक फ़ैली इनके किनारों की सरहदें फ़िर ये कभी नाराज़ नही होगी, सिर्फ़ बारिश के दिनों में उफ़नायेंगी, जिन इलाकों से गुजरेगी, वहां की मिट्टी को गीला और उपजाऊ बनाती हुई, जलाशयों को संचित करते हुए गुजर जायेगी...मानों जैसे हमें तोहफ़ा देने ही आई हों, इन्हे बचा ले हम क्यों कि ये कभी वापस नही लौटती- यह इनकी वृत्ति है! ..ये दोनों ही सन्दर्भों में सत्य है, नदियां वापस नही होती- जिस रास्ते पर रूख कर लिया उससे और अगर ये खत्म हो गयी तब भी...वापस नही लौ्टेगी, फ़िर हम किसी भागीरथ को खोजते फ़िरेगे ! इस इन्तज़ार में कि.....



एक और विडम्बना है, सरकारी कवायदे जिनका कोई मौजू परिणाम नही निकलता ! बन्धों के निर्माण के साथ ही बाढ की तबाही को और बढ़ा दिया गया।  अत्यधिक बाढ़ क्षेत्र और कम बाढ़ क्षेत्र से इतर करने के लिए बीच मे मिट्टी के बड़े बड़े बन्धे बना दिए गये ताकि पानी यही तक आकर रूक जाए, नतीजा यह हुआ कि जहां अधिक बाढ वाले इलाके थे, वो जल-मग्न हो गये, लोगों के घर और गांव डूब गये, जानवर और आदमी सड़कों पर बसर करते है,  इन बारिश के दिनों में, सबसे खराब बात तो यह है, कि एक तरफ़ तबाही दूसरी तरफ़ के लो्ग अमन चैन में, यह कौन सा तरीका है, बाढ़ से बचाव का। एक गौर बात जब ये बन्धें पानी के दबाव में टूटते है, तो उन इलाकों और तबाही मचती है, जो अभी तक सुरक्षित थे। पानी का आवेग इतना अधिक होता है कि इमारते डूबती ही नही धराशाही हो जाती है। 

ये बन्धे मानव समाज में आपसी वैमनस्य का कारण भी बनते है, जब बन्धे के उस तरफ़ के लोगों के गांव घर डूब जाते है, तो वह कोशिश करते है, कि बन्धे को काट दिया जाए ताकि पानी दूसरी तरफ़ चला जाए और उनकी फ़सले और घर् बरबाद होने से बच जाए, इस वजह से बन्धे के दोनों तरफ़ के लोग आपस में लड़ते है।

जानवरों का प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बोध हमसे अधिक है, बारिश के शुरूवात में ही नदियों का गन्दला होता पानी, उसके बेग में जरा सी भी हुई तब्दीली वो भांप लेते है, और कोशिश करते है कि नदी जब रौद्र रूप ले तो अपना बचाव कर सके, लेकिन हमने उनके घरों से भी छेड़छाड़ की नतीजतन वो अपने कथित प्राकृतिक आवासों में भी अपने को बचा पाने में अक्षम हो रहे है।

कुल मिलाकर इस अनियोजित विकास और क्षणिक लाभ के लिए प्रकृति से छेड़ छाड़ मानव सभ्यता को इतना प्रभावित कर देगी कि हम कुछ नही कर पायेगे !

हो सके तो नदियों के सिकुड़ते किनारों को रोक ले, इनके मार्गों को इनकी गहराई इन्हे फ़िर से दे सके तो एक बार फ़िर नक्शे पर ये खूबसूरत सर्पिल रेखायें दमकती हुई, भागती हुई सागर से मिलन को आतुर, दिखाई देगी ।



कृष्ण कुमार मिश्र
krishna.manhan@gmail.com

Aug 24, 2012

दुधवा में रेलगाड़ी से टकराया मगरमच्छ

 रेल दुर्घटना में मगरमच्छ घायल-

(दुधवा-पलिया) २३ अगस्त को शाम के वक्त दुधवा-पलिया रेलमार्ग पर एक मगरमच्छ की रेलगाड़ी से टकरा कर घायल होने खबर मिली है, बताया जा रहा है, कि इस घटना में मगरमच्छ के शरीर का पिछला हिस्सा  ट्रेन से टकराया जिसमें उसकी पूंछ धड़ से अलाहिदा हो गयी। सूत्रों द्वारा ज्ञात हुआ है, कि दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन द्वारा स्थानीय वेटनरी डाक्टर से उसका इलाज कराया जा रहा है। 

दुधवा जंगल से होकर गुजरने वाली रेलवे लाइन जो कभी ब्रिटिश भारत में इस लिए निर्मित कराई गयी थी ताकि तराई की अकूत जंगल संपदा का दोहन किया जा सके। शाखू के जंगलों से इमारती लकड़ी के इस कारोबार को तब बन्द किया गया जब इसे संरक्षित क्षेत्र का दर्जा मिला, और सन १९७७ में नेशनल पार्क बनने से पूरे इलाके से कटान बन्द कर दिया गया और वन्य जीवों व वन संपदा के सरंक्षण के प्रयास शुरू किए गये।

यह एक मात्र दुर्घटना नही इससे पूर्व न जाने कितने बाघ, हाथी और अन्य वन्य जीव रेल दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं। इसके बावजूद सरकारे कोई ठोस कदम नही उठा रही हैं। गौरतलब ये है, कि इतने विशाल जंगल में इतनी लम्बी रेललाइन पर कब कौन जानवर रेल से टकराकर मरा इसकी जानकारी भी बाहर नही निकल पाती, यानि इन जानवरों की मौत का कोई सही लेखा-जोखा भी नही है, बस मीडिया या स्थानीय लोगों के अतिरिक्त रेल-यात्रियों द्वारा कोई जानकारी मिलती है, वही रिकार्ड्स में दर्ज है।


वन्य-जीव प्रेमियों द्वारा रेलवे लाइन हटाने की बावत तमाम प्रयास किये जा चुके हैं, यदि इस जंगल से तेज रफ़्तार रेलगड़ियां यूं ही गुजरती रही तो तराई में पाये जाने वाले दुर्लभ जीव-जन्तु की प्रजातियां  मुसलसल पटरियों पर अपनी जान गवाती रहेंगी।

दुधवा लाइव डेस्क

Aug 17, 2012

आदिवासियों एवं बाघों का मुकदमा कैलाशपति की अदालत में

शिव पार्वती की अदालत में बाघ और आदिवासी

आदिवासियों की वकालत कर रहे है नंदी महराज तो बाघों की तरफ़ से वकील है पार्वती के शेरू-

आदिवासियो ने दूर दूर तक फ़ैले बांझ इमारती जंगलो में, वन विभाग के कोप से बचे हुये एक्का दुक्का फ़ल और फ़ूलदार पेड़ो से एकत्रित स्वादिष्ट फ़ल फ़ूलों और पत्तियो के चढ़ावे के साथ शिवगणो के प्रमुख नंदी जी की पूजा की। प्रसन्न होकर नंदी प्रकट हुये, आदिवासियो ने बिलखते हुये अपनी व्यथा सुनाई- "इन बाघो ने जीना हराम कर दिया है। पहले ही इन बाघो को बचाने के नाम पर हमारा जंगल में प्रवेश बंद कर दिया गया है। उसके बाद अब हमको  विस्थापित किया जा रहा है। उपर से ये बाघ हमारी सुंदर सुंदर गायो को मार के खा जाते हैं वो अलग। हमारे उपर भी हमला कर मार देते हैं, और तो और ऐसा होने पर शहरी बाघ प्रेमी खुश होते हैं। कि अच्छा मारा साले को, जंगल में घुसते हैं। ’हे नंदी’ शहरी पर्यावरणविदो और खदान पतियो को हम ही दुश्मन लगते हैं, आप हमारी रक्षा करें।

  इन सब बातो को ( खास कर सुंदर गायो वाली ) सुनकर नंदी के नथुने फ़ड़क उठे। वे तुरंत आदिवासियो का प्रतिनिधी मंडल लेकर कैलाश की ओर चल पड़े। यह खबर सुनते ही बाघो ने भीमाता पार्वती की वीआईपी ड्यूटी मे लगे अपने साथी के मार्फ़त अपने प्रतिनिधी मंडल को भी भेजा
कोलाहल सुन, चैन से सो रहे भोलेनाथ बाहर आये। नंदी ने बाघो पर आरोपो की झड़ी लगा दी,  सुंदर गायो के विषय पर तो वे बेकाबू ही हो गये थे। माता का प्राईवेट बाघ शेरू भी पीछे न था बोला- "ये आदिवासी बाघों को जहर दे देते हैं। गलती से कोई बाघ इनके गांव पहुच जाये तो लाठियो से पीट कर मार देते हैं। यहां तक की चैन से प्रेमालाप भी करने नही देते। पर्यटको की जिप्सी लेकर पीछे पड़ जाते हैं,  चोर शिकारियो तस्करो की मदद करते हैं वो अलग।"


भगवान शंकर बोले- "आदिवासियों, मै तुम्हारी कोई मदद नही कर सकता। बाघ राष्ट्रीय पशु है और तुम  राष्ट्रीय नागरिक तो छोड़ो नागरिक भी नही हो।  अगर तुम शहर जा कर झुग्गी में बस जाओ। तब तुम भारत के नागरिक बन जाओगे।  मैं तुमको ३ रूपये वाला सस्ता चावल, बच्चो को मध्यान भोजन बस्ता कापी और लड़कियों को साईकिल आदि दिलवा दूंगा। जंगल में रहोगे तो ताड़्मेटला जैसे जला दिये जाओगे और विपक्ष का नेता तो क्या मैं भी दस दिन तक वहां पहुच नही पाउंगा।" फ़िर भगवान ने कुछ नरम पड़ते हुये कहा- "बेटा सलवा जुड़ूम और नक्सलवाद की चक्की से बाहर निकलो और शहर जाकर झुग्गीवासी बन जाओ।" वहां कम से कम न्यूज चैनल वाले भी आते हैं,  मीडिया तुम्हारी तकलीफ़ें देश को बतायेगा।"



घर गांव जंगल छोड़ने की बात सुनते ही दुखी आदिवासी  आखों में पानी भर गिड़गिड़ाये


आदिवासी बैरी और बाघ है प्यारा ।
कहो प्रभु अपराध हमारा ॥


प्रभु कुछ कहते उसके पहले ही पीछे से मां दुर्गा बोल उठीं- "जब भगवान ही न्याय न करें तो नेताओ को दोष देने का क्या फ़ायदा। प्राणनाथ मुझे आप से ऐसी उम्मीद न थी। आज से अपना खाना खुद ही बनाईयेगा बता देती हूं।" प्रभु धीरज रख बोले- "प्रिये, अपनी इस हालात के जिम्मेदार भी ये  लोग हैं। जब इनके जंगल कट रहे थे तो क्या इनकी अकल घांस चरने गयी थी। क्यों लगने दिया  अपने जंगलो में सागौन, नीलगिरी और साल के पेड़, अपने साथ साथ वन्यप्राणियो को पर्यावास भी खत्म होने दिया।" नंदी ने अपील की- "प्रभु तब ये लोग अंजान थे। इन्हे नही पता था कि इससे क्या हो जायेगा।" प्रभु ने कहा- "अब तो अकल आ गयी है न,  देखो एक अन्ना के खड़े होने से सरकार थर थर कांपने लगती है। तो जब करोड़ो आदिवासी खड़े हो जायेंगे फ़िर क्या उनकी अकल ठिकाने नहीं आयेगी। पर नहीं, इनमे से जिसको नेता होने का आशीर्वाद देता हूं। दिल्ली जाकर सुरा, सुंदरी के मजे मारने लगता है। इनकी तो मै भी मदद नही कर सकता।"


इस पर माता ने सिफ़ारिश की - "अगर आप मुझसे तनिक भी प्रेम करते हैं, तो कुछ तो कीजिये।" प्रभु ने मुस्कुराते हुये जवाब दिया- " जैसे नेतागण भ्रष्टाचारियो के दिल में राज करते हैं। वैसे ही आप भी मेरे मन पर राज करतीं है। मै आशीर्वाद देता हूं कि आज से कुछ साल बाद, जब देश में भुखमरी की हालत आयेंगे। तब यूरोप और अमेरिका के वैज्ञानिक गहन शोध करके, यह पता लगायेंगे कि भारत में जो इमारती लकड़ी के प्लांटेशन हैं, अब वो किसी काम के नहीं है। और उनके बदले फ़ल और फ़ूलदार पेड़ लगाने से देश को को भोजन तथा पशुओं को चारा मिल सकता है। जिससे देश की भुखमरी दूर की जा सकती है। तब मनमोहनी नीतियो से कंगाल हो चुके भारत को, वर्ल्ड बैंक अरबो रूपये का कर्ज देकर इस काम को करवायेगा। तब ये आदिवासी रहेंगे तो मजदूर ही। लेकिन कम से कम जंगल के शुद्ध वातावरण में रह पायेंगे ।  बाघ और  उसकी  प्रजा के लिये भी उनमे भरपूर भोजन होगा और वे  उनमे चैन से जी पायेंगे।"

नंदी अभी तक सुंदर गायो वाली बात भुला न पाये थे- "बोले इन बाघो का  क्या है प्रभु ये तो इमारती  पेड़ो के जंगलो मे भी रह लेते हैं।"  इस पर प्रभु ने मुस्कुराते हुये पूछा- "कभी सागौन और नीलगिरी के पत्ते खाये हैं क्या  बेटा। माता के हाथ का स्वादिष्ट खाना खा खा कर तुम जमीनी हकीकतों से अनजान हो। आज शहर में रहने वाली गाय और इमारती जंगलो में रहनी वाली गायो का दूध एक समान क्यों है? मियां नंदी अमूल बेबी का खिताब तुमको मिलना चाहिये, राहुल गांधी को नहीं। फ़जीहत से बचने नंदी ने टी वी पर इंडिया टीवी लगाया और सारे शिव गण प्रभु के लंका दौरे की सच्चाई सुनने मे मगन हो गये ।


अरूणेश दवे लेखक व्यंगकार है, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लेखन, छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में निवास, इनसे aruneshd3@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।



Aug 5, 2012

सरचु में हो रहा है मरमोट का शिकार


टूरिज्म की भेंट चढ़ रहे है, ये खूबसूरत जीव-
सरचू में हो रहा है, मरमोट (Marmot) का शिकार-

(लाहोल-स्पिति-हिमाचल प्रदेश) मनाली से तकरीबन 222 कि०मी० दूर स्थित पहाड़ों से घिरे मैदानी भाग जिसे सरचु के नाम से जानते है, वहाँ मनाली आदि स्थानों से टूर-ट्रेवल का काम करने वाले लोग टेन्टिंग कैम्प का आयोजन करते है, जिसमें मनाली के स्थानीय कर्मचारी बहुतायात में कार्य करते है, इन वादियों में मरमोट जैसा खूबसूरत जानवर रहता है जो खरगोश से आकार में बड़ा होता है, इसे जमीन पर रहने वाली गिलहरी भी कहते है, वन्य जीव सरंक्षण के मानकों में इसे सेड्यूल प्रथम श्रेणी का सरंक्षण प्राप्त है, बावजूद इसके टेन्टिंग की व्यवस्था करने वाले लोग जो पूरे सीजन यहां प्रवास करते है, इनके द्वारा इसका धड़ल्ले से शिकार किया जाता है, चौकाने वाली बात यह है, कि स्थानीय लोग इसका बिल्कुल शिकार नही करते है, और हिमाचल-लद्दाख के बार्डर पर स्थिति इस जगह पर मानव जनसख्या घनत्व भी बहुत कम है, मरमोट बिलों मे रहते हैं, और टेन्टिंग का काम करने वाले लोग सुबह के बाद जब शैलानी यहां से चले जाते है, तब बिलों के पास बड़े पत्थर लेकर बैठते है, मरमोट प्रकृति से सुस्त प्राणी है, और जब वह बिल से बाहर निकलता है, तो पत्थर की चोट से उसे मार देते है, ये लोग उसके मांस का स्वयं इस्तेमाल करते है, साथ ही शैलानियों को भी इसके मांस की तमाम खूबियां बताकर उन्हे भी इसका मांस खाने के लिए आकर्षित करते हैं। 

टेन्टिंग कैम्प-सरचु



इस इलाके का वन-विभाग एवं सरंक्षण में कार्य कर रही संस्थायें भी मरमोट के हो रहे इस क्रूर शिकार को अनदेखा कर रही है, सूत्रों से ज्ञात हुआ है, कि सरचु में टेन्टिंग कैम्प का आयोजन करने वाली ट्रेवल कम्पनियां वन-विभाग को मोटी रकम मुहैया कराती है, टेन्टिंग कैम्प के आयोजन की अनुमति प्राप्त करने के लिए।

प्रदीप सक्सेना
pdpsaxena@gmail.com

Aug 1, 2012

बाघों का कोरजोन जंगल बन जाएगा शिकारियों का शरणगाह

हिंदुस्तान में बाघों की सिमटती दुनिया के प्रति गंभीर होकर सुप्रीम कोर्ट ने देश की प्रदेश सरकारों को टाइगर रिजर्व के ‘कोरजोन‘ जंगल का ‘बफरजोन‘ वनक्षेत्र बढ़ाए जाने का आदेश दिया है, साथ में कोरजोन में पर्यटकों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी है। यह फैसला स्वागत योग्य है, लेकिन इस व्यवस्था से क्या बाघों की वंशवृद्धि को कोई फायदा पहुंचेगा? इस बात पर सवाल उठना लाजिमी है। वह भी इस वजह से कि बाघों के संरक्षण के लिए भारत सरकार ने सत्तर के दशक में बाघों के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया था। इसके बाद भी बाघों की संख्या अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी घटती जा रही है। यह प्रोजेक्ट टाइगर की असफलता ही कही जाएगी कि राजस्थान के सारिस्का नेशनल पार्क और पन्ना नेशनल पार्क मध्य प्रदेश में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया उसके बाद बाघों की संख्या तो नहीं बढ़ सकी वरन् दोनों नेशनल पार्कों से बाघ जरूर गायब हो गए। प्रोजेक्ट टाइगर भी क्यों असफल हो रहा है इसकी समीक्षा किसी भी स्तर पर नहीं की गई है। तो क्या बफरजोन बढ़ा देने से बाघ अपना कुनबा बढ़ा पाएगें? इसपर संदेह होना लाजिमी है। दूसरी बात यह है कि विभिन्न कारणों के चलते बाघ जंगल के अपने प्राकृतिक वासस्थलों में न रुककर वह जंगल के बाहर आकर अपना रैन बसेरा बना लेते हैं, जहां उनके अवैध शिकार की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। जरूरत है व्यवस्थाएं इस तरह की जंगल के भीतर होनी चाहिए जिससे बाघ बाहर न आएं, तभी वह सुरक्षित रह सकते हैं और उनकी वंशवृद्धि भी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बाघों के प्राकृतिक वासस्थल यानी ‘कोरजोन’ जंगल में पहले से ही मानव की दखलंदाजी पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाया ही था अब पर्यटकों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी है। जबकि इससे पूर्व कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश के अनुपालन में उत्तर प्रदेश की सरकार ने दुधवा नेशनल पार्क में बाघों की हिफाजत और वंशवृद्धि के लिए नार्थ एवं साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन एवं जिला शाहजहांपुर की खुटार रेंज तथा जिला बहराइच के कतर्निया घाट वन्यजीव प्रभाग के जंगल के ‘दुधवा टाइगर रिजर्व’ का बफरजोन वनक्षेत्र घोषित कर दिया है। इसके पीछे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि बाघों के रहने और घूमने का क्षेत्रफल बढ़ेगा ही साथ में उनका संरक्षण भी वाजिब ढंग से हो सकेगा। उधर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में पर्यटक जंगल में प्रवेश न कर सके, इसकी तैयारी में भी वन विभाग जुट गया है। अगर पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगाई जाती है तो इससे सरकार को ही पर्यटन व्यवसाय से होने वाले राजस्व की क्षति होगी। जबकि जंगल के भीतर क्या सही और क्या गलत हो रहा है इसकी जानकारी अब बाहर नहीं आ पाएगी। इससे वंयजीवों को कम और वन प्रवंधन में लगे स्टाफ को फायदा अधिक होगा। अभी तक यह था कि लोगों की आवाजाही से जंगल में चल रही गतिविधियों की जानकारी बाहर तक आ जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। इस तरह जंगल के भीतर वन विभाग का जंगलराज हो जाएगा।


यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क में सन् 1988 से प्रोजेक्ट टाइगर चलाया जा रहा है। दुधवा में जब इसे शुरू किया गया था तब दुधवा के आंकड़ों में यहां बाघों की संख्या 76 थी। उस समय जंगल और समीपवर्ती गन्ना के खेतों मे आमरूप से बाघ दिखाई देते थे एवं बाघों द्वारा मानव की हत्या करने या फिर मवेशियों को मारने की घटनाएं भी बहुतायत में होती थीं। अब बाघों की संख्या 110 बताई जा रही है, तो जंगल में ही वनराज बाघ के दर्शन दुर्लभ हैं, यह बात अलग है कि अब बाघ अक्सर खेतों में दिखाई देते हैं। अब तक दुधवा में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ पर करोड़ों रुपया खर्च किया जा चुका है फिर भी बाघ अपने प्राकृतिक वासस्थल में रहने के बजाय बाहर खेतों में डेरा जमाए रहते हैं।

अंगे्रजी शासन काल में जिस किसी भी विधि से ग्रामीणों के सहयोग से बन प्रवधंन किया जाता था तब जंगल का संरक्षण भी होता था और वंयजीव-जंतु भी बहुतायत में पाए जाते थे। बदले परिवेश में आजाद हुए भारत में फारेस्ट मैनेजमेंट की विधियां बदलती गई साथ ही समीपवर्ती ग्रामीणों को वन प्रवंधन के कार्यों से अलग कर दिया गया। यहां तक उनको पूर्व में वन उपज आदि की दी जाने वाली सुविधाओं को बंद कर दिया गया है, इसके कारण समीपवर्ती ग्रामीणों का जंगल से भावात्मक लगाव खत्म हो गया साथ ही उनका वंयजीवों के प्रति रहने वाला संवेदनशील व्यवहार  भी क्रूरता में बदल गया है। पिछले दस साल से दुधवा के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर रूपक डे द्वारा तैयार पंचवर्षीय ‘फारेस्ट मैनेजमेंट प्लान’ पर वैज्ञानिक विधि से वन प्रवंधन का कार्य किया जा रहा है। पांच साल में फारेस्ट मैनेजमेंट प्लान कितना सफल रहा अथवा असफल, इसकी समीक्षा या मूल्यांकन किए बगैर उसे पुनः पांच सल के लिए लागू किया जाना ही स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। केवल ‘प्रोजेक्ट टाइगर‘ की बात की जाए तो इसकी असफलता की कहानी जग जाहिर भी हो चुकी है कि पूरे देश के नेशनल पार्कों में चल रहा प्रोजेक्ट टाइगर बाघों को संरक्षण देने में नाकाम्याब ही रहा है। अब अगर जंगल में पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगा दी जाएगी तो देशी-विदेशी पर्यटक जंगल में स्वच्छंद घूमने वाले दुर्लभ प्रजाति के वयंजीवों को न देख सकेंगे और न ही उनके संबंध में ज्ञानवर्धक जानकारी ही मिल पाएगी साथ ही वह प्राकृकि वनस्पतियों से भी वह अंजान ही रहेंगे। इसके अतिरिक्त कोरजोन में मानव अथवा पर्यटकों की आवाजाही पर पावंदी लगा दिए जाने से जंगल के अंदर शिकारियों और वन मफियाओं को अपना शरणगाह बनाने में आसानी रहेगी। इससे वंयजीवों के अवैध शिकार को बढ़ावा मिलेगा। अभी तक जंगल के भीतर मानव की अधिक दखलंदाजी तो नहीं है वरन् पर्यटकों के आने-जाने के कारण वन अपराधी जंगल के अंदर रहकर सुनियोजित अपराध नहीं कर पाते हैं। लेकिन अगर जंगल के भीतर घुसने में ही रोक लगा दी गई तो बन अपराधियों को एक तरह से जंगल के भीतर अपराध करने का अपरोक्ष लाइसेंस मिल जाएगा। यह स्थिति वंयजीवों के लिए कतई हितकर नहीं कही जा सकती है।

दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र के वंयजीवप्रेमी सवाल उठते हैं कि कागजों में लिखापढ़ी करके दुधवा टाइगर रिजर्व का वफरजोन जंगल बढ़ा दिया गया है, इससे वन्यजीवों को फायदा क्या पहुंचेगा? जबकि भौगोलिक परिस्थितियां तो वहीं है। बाघ अपने प्राकृतिक वासस्थल यानी कोरजोन में न रूककर जंगल के समीपवर्ती खेतों में आकर रहते हैं। दुधवा में फारेस्ट मैनेजमेंट के जो कार्य चल रहे हैं उनमें ही कहीं न कहीे कोई कमी है उसी का परिणाम है कि बाघ समेत अन्य वन्यजीव जंगल के बाहर भाग आते हैं। प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारिययों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए इससे जंगल में चारा की कमी हो गई है। परिणाम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आने को विवश हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे-पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है।
दुधवा का कोरजोन हो या फिर बफरजोन का जंगल हो उसके प्राकृतिक चारागाह सिमट गए हैं, इससे जगल में वनस्पति आहारी वंयजीवों को जहां नर्म घास यानी चारा उपलव्ध नहीं है। वहीं प्राकृतिक तालाबों अथवा जलश्रोतों का रखरखाव ऐसा है कि उनकी गहराई कम हो जाने के कारण गर्मियों में वयंजीवों को पानी के लिए जंगल के बाहर आने को बिवश होना पड़ता हैं। मानसून सीजन में नदियों की बाढ़ वन ही नहीं वरन् वंयजीवों को बुरी तरह से प्रभावित करती है। दुधवा का हरा-भरा जंगल सूखने लगा है और बाढ़ की विभीषिका अब राजकीय पशु बारहसिंघों के जीवन चक्र पर विपरीत प्रभाव डालने लगी है। जिसके कारण दुधवा नेशनल पार्क में बारहसिंघा कठिन दौर से गुजर कर अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसी तरह वनराज बाघ भी अपनी सल्तनत जंगल को छोड़कर बाहर आने को बिवश हैं। जंगल चाहे कोरजोन का हो अथवा बफरजोन का, उसमें अगर वंयजीवों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था नहीं है तो उसका जंगल होना या न होना एक समान है।

भारत में बाघों की दुनिया सिमटती ही जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि पिछले कुछेक सालों में मानव और बाघों के बीच शुरू हुआ संघर्ष। बढती आवादी के साथ प्राकृतिक संपदा एवं जंगलों का दोहन और अनियोजित विकास वनराज को अपनी सल्तनत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो या फिर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्, उड़ीसा आदि प्रदेशों के जंगल हों उसमें से बाहर निकलने वाले बाघ चारों तरफ अक्सर अपना आतंक फैलाते रहते हैं और वेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाघ और मानव के बीच संधर्ष क्यों बढ़ रहा है? और बाघ जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। वैसे भी पूरे विश्व में बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय वन क्षेत्र के बाहर आने वाले बाघों को गोली का निशाना बनाया जाता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जव भारत की घरा से बाघ विलुप्त हो जाएगें। प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व का बफरजोन वनक्षेत्र बढा़ देना केवल समस्या का समाधान नहीं है। अब जरूरत इस बात की है कि जंगल के भीतर चाहे वह कोरजोन हो या फिर बफरजोन का वनक्षेत्र हो उसमें ऐसी व्यवस्थाएं की जानी चाहिए जिससे न वन्यजीव चारा-पानी के लिए बाहर आएं और न ही बाघ जंगल के बाहर आने को विवश न हो सकें।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार, अब तक तमाम बड़े अखबारों में पत्रकारिता, दुधवा के वन्य जीवन पर विशेष लेखन, इनसे dpmishra7@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।

May 31, 2012

Springtime

SPRINGTIME

Spring is the most beautiful season of the year. It is flamboyant, cheerful, joyous & happy season of the year. Many poets describe spring as the queen of all seasons. After a dull, lifeless, colorless cold season, spring brings life in the world. Everyone wakes up from their hibernation & open their eyes with lot of hope & happiness. Animals get busy to bring new life in the world, plants & trees start to bloom with colorful flowers & leaves and gradually they grow fruits. It is such a vibrant season, which brings happiness to everyone’s mind.

In our human world, we welcome spring with many festivals. All over the world, almost every country celebrates spring in their own style & rituals. Here, I will discuss about some of the well known spring festivals of the world.

In the Northern hemisphere, officially spring starts from 1st of March. In East Asia, spring begins on 4th of February and lasts for 3 months. In the Southern hemisphere, in countries like South Africa, Australia & New Zealand, spring traditionally begins on 1st of September.

In India, the most popular & colorful festival of spring is Holi. This most vibrant festival falls on a full moon day during the month of March. Holi is associated with Lord Krishna. On this occasion, the people sprinkle colored water and powders on one & all.

Bihu is another spring festival of India in the Assam Province. This is truly a regional festival, which brings a sense of solidarity & unity among the people of this region. Bihu is a festival to celebrate fertility. Rangoli Bihu is a combination of Spring, New Year & Agriculture festival. The first day of Rangoli Bihu is known as Gori Bihu. Household cattle’s get special attention & they are decorated with colorful garlands made of flowers & they are given good food.

In China, the spring festival is widely known as Chinese New Year. The festival is celebrated grandly across the country with various cultural activities & firework shows. Dragon & Lion dancing are the most common activities during the Chinese New Year.

In Japan, they celebrate spring on the 18th of March with 1000 men dressed as Samurai Warriors & they take out procession from the Nikko Toshogu shrine.

In Romania, Martisor is an old celebration at the beginning of spring on 1st of March. Decorative ribbons made of red & white strings are offered by most of the people on this day. It is believed that, the one who wears the red & white string will be strong & healthy for the year to come.

Easter is the most famous Christian festival. This is a celebration of life and resurrection of Christ. On Good Friday, alters are stripped & candles extinguished to represent the darkness of the grave. On Easter, light springs from darkness & it is believed that, Christ rises from the tomb. In Orthodox Churches shortly before midnight, all the lights are extinguished and the crowded Church becomes dark & silent. Everyone holds an unlit candle. The Priest lights the paschal candle, which has been ritually blessed and inscribed with the year. He then lights the candles of those people nearby to him, who in turn light the candles of their neighbors, until the Church is filled with light and the Priest starts to sing. Egg is one of the symbols of this festival since they represent new life and potential. Eggs are dyed red during this festival.

Spring Equinox is one of the four great solar festivals of the year. Day and night are equal, poised & balanced. Spring Equinox is sacred to dawn. Just as the dawn is the time of new light so, the vernal equinox is considered as the time of new life too.

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My name is MOUSUMI PAL & I am a housewife. At present, I am residing in Romania. I am a trained Primary Teacher & taught in a school in New Delhi, India. I was attached with a social service organization in India & I served the poor & underprivileged people.

email: babia1@hotmail.com



Apr 5, 2012

एक बार फ़िर विविध भारती में दुधवा लाइव

रेडियो में दुधवा लाइव

20 मार्च सन 2012 को दुधवा लाइव पर प्रकाशित एक लेख जो गौरैया दिवस से संबधित है का प्रसारण आकाशवाणी के विविध भारती के कार्यक्रम जिज्ञासा में श्री यूनुस जी द्वारा किया गया। 




यह प्रसारण 24 मार्च 2012 को शनिवार रात सात पैंतालीस पर और रविवार को यही कार्यक्रम सुबह सवा नौ बजे पुन: प्रसारित हुआ।



सन 2010 में रेडियों में दुधवा लाइव के लेखों और गौरैया सरंक्षण के प्रयासों का प्रसारण यहां सुन सकते हैं।


विविध भारती के कार्यक्रम ऑनलाइन सुनने के लिए यहां क्लिक करें।

दुधवा लाइव डेस्क

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था