डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 02, February 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Sep 24, 2012

उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा पक्षियों का बसेरा तहस-नहस



स्टार्क पक्षी के हजारों घोसले कर दिए गये नष्ट


(लखीमपुर-खीरी) प्रवासी पक्षी ओपनबिल स्टार्क जिसे स्थानीय जनमानस पहाड़ी पक्षी या भाद के नाम से चिन्हित करता है। ये पक्षी लखीमपुर खीरी के सरेली गांव में तकरीबन १०० वर्षों से भी अधिक समय से अपना ठिकाना बनाये हुए है, खासतौर से प्रजनन काल का वक्त जून से नवम्बर तक।  इस चिड़िया ने इसी गांव में अपनी सन्तति को सैकड़ों वर्षों से जन्म दिया और खुले आसमान में उड़ जाने लायक हो जाने तक का समय यही गुजारा, यही की जमीन ने इसे भोजन मुहैया कराया और यही के पेड़ों ने इसे बसेरा दिया, इन्ही पेड़ों पर साल दर साल इस पक्षी ने अपने घोसले बनायें और उनमें अपनी सन्तति को जन्म दिया। लेकिन इस साल इस चिड़िया ने अपनी सन्तति को जन्मा तो लेकिन उन्हे आसमान में उड़ने लायक शहबाज़ नही बना पाई। इस बार किसी इन्सानी हरकत ने इनका आशियाना नही उजाड़ा बल्कि बन्दरों ने इनके घोसलों को तहस-नहस कर दिया।



इन पक्षियों को अतीत व् वर्तमान में इस गांव के लोगों द्वारा सरंक्षण मिलता रहा है , ग्रामीण इन्हें बरसात का सूचक मानते आये \
 
इस चिड़िया के नशेमन को इस तरह से बन्दरों ने बर्बाद किया कि एक सैकड़ों की तादाद में घोसले जिनमें अण्डे और बच्चे मौजूद थे जमीन पर गिर कर नष्ट हो गये, चिड़िया के बच्चों की गर्दने मरोड़ दी, या उनके सर धड़ से अलग कर दिए और दो रोज में ही हजारों जीवित पक्षियों का यह आशियाना कब्रगाह में तब्दील हो गया। आज उस जगह पर सिर्फ़ दो-चार परिन्दों के सिवा कुछ नही बचा...सिर्फ़ मुर्दा परिन्दों की लाशे इधर-उधर बिखरी है ।




आखिर एक प्रजाति के इस घर को पूरी तरह दूसरी प्रजाति के द्वारा इतने वीभत्स तरीके से नष्ट कर देना एक सवाल खड़ा करता है वन्य-जीवन के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए...इस विनाश ने तमाम सवाल छोड़ दिए है हमारे सामने ! आखिर ऐसा क्यों हुआ...




प्राकृतिक आवासों में शिकार और शिकारी सदियों से एक साथ रहते आये, और दोनो की निर्भरता भी एक दूसरे पर निश्चित है बावजूद इसके कि शिकार ने समूल एक साथ किसी प्रजाति को खत्म कर दिया हो ऐसे उदारहण नही मिलते और यह अप्राकृतिक भी है? फ़िर यह पक्षी बन्दरों का शिकार भी नही है!

इस पक्षी के आशियाने पर तमाम हमले होते रहे जैसे किसी सांप ने पेड़ों पर बने घोसले से अण्डें खा लिए..या फ़िर बाज ने इनके चूजों को शिकार बना लिया, पर ऐसा कभी नही हुआ कि किसी शिकारी ने एक साथ पूरी आबादी को ही खत्म कर दिया हों ? और यह संभव भी नही ...शिकारी के स्वभाव के अध्ययन पर जाये तो उनके एक इलाके होते है और शिकार को खाने की एक निश्चित मात्रा, इसलिए एक साथ तमाम शिकारी एक जगह पर इकट्ठा नही हो सकते और न ही एक शिकारी जीव एक साथ सैकड़ो शिकार को खा सकता है?


लेकिन पक्षियों के जिस विशाल कुनबे को बन्दरों ने जिस तरह से खत्म कर दिया वह अजीब सी घटना है। जबकि इन पक्षियों और इन बन्दरों के बीच शिकार और शिकारी का रिस्ता भी नही है? और बन्दरों के उत्पाती स्वभाव के बावजूद इस तरह की बरबादी जंगल के इतिहास में शायद ही दर्ज हो?

यकीनन इन बन्दरों के इस विनाशक व कुद्र स्वभाव के पीछे कोई मानव-जनित कारण है। इस गांव में इस बरबादी से रबरू होने जब मैं पहुंचा तो मन की गतिविधियां अराजक तौर पर गतिमान थी सवाल जवाब से बावस्ता नही हो पा रहे थे, लेकिन ग्रामीणों से बात करने के बाद राज जाहिर हुआ कि आखिर यह बन्दर इन परिन्दों की मौत का कारण क्योबन  गये....

मानव आबादी में नील-गाय की तरह बन्दरों का रूख इसका मुख्य कारण है, इन्सान नील-गाय को नियम-कानून और संवेदनाओं को ताक पर रखकर मारता और डराता आ रहा है, बावजूद इसके उसे बचपन से सिखाया जाता रहा कि जीव-हत्या पाप है, कम से कम तब तक जब तक उसकी जान का खतरा न बने वह जीव, बन्दरों को भी एक समुदाय पवित्र और पूज्य मानता रहा, कभी उसे भोजन देता और उसे मारना भी पाप समझा जाता रहा, लेकिन हालात बदल गये, जंगल काट दिए गये, परती भूमियां कृषि योग्य भूमि में तब्दील कर दी गयी नदी-नारों पर भी इन्सानी कब्जा, गांव की पुरानी बागे भी नदराद हो गयी और उनकी जगह ले ली कलमी आम की या अन्य टिम्बर योग्य प्रजातियों ने जहां कड़ा इन्सानी पहरा हर वक्रत मौजूद रहता है, फ़िर आप बताये जीव कहां जाए ? इनके बसेरों को हमने उजाड़ा और अब यह हमारे कथित बसेरों पर आ धमकते है, यह इनकी मजबूरी ही नही जिन्दा रहने की जरूरत है। लेकिन हम यह बिना सोचे यह चिल्लाना शुरू करते है कि यह बाघ, शेर, बन्दर या नील गाय हमारे इलाकों यानि रिहाईशी इलाकों में घुस आया है, जैसे जमीन पर सिर्फ़ इन्सानी हक हो और यह हक हम लिखवा कर ही पैदा हुए हों।



इन बन्दरों का रिहाईशी इलाकों में आना भी ऐसी ही घटना है, अब सुनिए इन्सानी हरकतों के किस्से, जिस गांव में बन्दरों की आवा-जाही बढ़ी वहां के लोगो ने शुरूवाती दौर में हवाई बन्दूक से इन जानवरों के जिस्म में लोहे के छर्रे धांस दिए या पटाखों से इन्हे डराया, फ़िर भी काम नही बना तो इन्हे ट्राली को जालनुमा बनाकर उसमें अनाज रखकर इन्हे धोखे से बन्द कर लिया, फ़िर इन्हे पकड़कर इनके हाथ-पैर बांध दिए और बोरों में भरकर इन्हे दूसरे इलाकों में जाकर छोड़ दिया, फ़िर यही सिलसिला अनवरत गति से जारी रहा, दूसरे गांव के लोगों ने भी ऐसा किया, और ऐसा करते वक्त इनके हाथ-पैर और चेहरे लहूलुहान होते रहे, कैद से अपने आपको छुड़ाने की छटपटाहट इन्हे और रक्त-रंजित करती गयी.....एक वाकया वहां के ग्रामीण ने बताया कि इस गांव के पास कुछ लोग बोरों में बन्दरों को बन्द कर छोड़ जाते है जिन्हे गांव के कुछ सहिष्ण लोग छुड़वा देते है, उन बंधे हुए बोरों से, किन्तु इन बन्दरों के बन्धे हुए हाथ पैर डर के कारण नही खोल पाते...एक दृष्टान्त ने तो मुझे रूला ही दिया कि एक बन्दरियां अपने बच्चे को लेकर पेड़ पर चढने की कोशिश कर रही थी लेकिन चढ नही पा रही थी जानते है क्यों, क्योंकि उस बन्दरियां के हाथ पीछे की तरफ़ बंधे हुए थे और बच्चा उसके पेट से चिपका हुआ था........मुझे अफ़सोस है कि इन्सान अपने गुलामी के दिनों को भूल गया जब मांये किसी और को बेच दी जाती थी और बच्चे किसी और को....! इन्सान इन्सान को गुलाम बनाता था ऐसे ही इन्सान इन्सान को बांधकर जहाजों में डाल देता था,  गुलाम महीनों भूख प्यास से तड़पते दूर देश के मुल्कों में बेचे जाते थे......



हम न तो इतिहास से कुछ सीख रहे है और न ही बर्बरता की अपनी नियति में फ़र्क ला पा रहे है, मानवता के लिए ही नही सारी धरती की और धरती पर बसने वाली प्रजातियों के लिए यह खतरानाक है।


मैं यहां सिर्फ़ यही कहना चाहता हूं कि इन बन्दरों की इस दशा के बाद इनकी मनोदशा में क्या तब्दीली आई होगी..अगर आप के साथ यह सब किया जाए तो कैसे बन जायेंगे आप?, शायद इस गांव के परिन्दों के इस आशियाने को उजाड़ने में इनकी यही मनोदशा का ही परिणाम रहा होगा, और इस मनोदशा की उत्पत्ति का कारण हम ही हैं, यह घटना  साबित करती  है कि इन परिन्दों को  बंदरों द्वारा उजाड़ने का कारण अप्रत्यक्ष रूप से हमारी मानव बिरादरी है, नाकि ये बन्दर- ये तो सिर्फ़ माध्यम है..निमित्त मात्र...!
 (तबाही के मंजर से आप सभी को नाज़िर नही करा रहां हूं क्योंकि वह बहुत वीभत्स है। साथ ही अपने शोध पत्रों का समावेश यहां पर नही कर पाया सन्दर्भ में जो भविष्य में उनका संकलन वेब-पत्रिका में अवश्य करूंगा, इनकी इस सुन्दर आबादी व् व्यवहार का जिक्र मैने अपने शोध कार्य के दौरान विश्व पटल पर तमाम पत्र-पत्रिकाओं और वैज्ञानिक जर्नल्स के माध्यम से  किया है।)


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थोड़ा परिचय हो जाए इस सुन्दर और सीधे स्वभाव वाले पक्षी का, यह ओपेनबिल्ड स्टार्क(Openbilled Stork) जिसका वैज्ञानिक नाम एनॉस्टामस ओसीटेन्स (Anastomus oscitans)है,  जो सिकोनिडी (Ciconiidae) फ़ैमिली के अन्तर्गत है। यह पक्षी भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान, चीन, वियतनाम, थाईलैण्ड, श्रीलंका आदि देशों में रहता है, और अपने प्रवास काल में 1500 कि०मी० से अधिक तक की दूरी तय कर लेता है, जून से नवम्बर तक भारत में इसका प्रजनन काल का समय है, जहां ये पक्षी सामुदायिक तौर पर हजारों घोसले बनाते हैं और अण्डे देने से लेकर बच्चों के वयस्क हो जाने तक का समय अपने इसी प्रजनन स्थल पर गुजारते है, इसके बाद ये पक्षी भोजन की तलाश में मीलों दूर तितर-बितर हो जाते है, सबसे खास बात यह है कि ये पक्षी अपने प्रजनन काल के समय फ़िर उसी स्थल पर वापस होते है जहां उसने पिछले वर्ष घोसले बनाये थे, यह प्रक्रिया साल दर साल चलती है, जब तक उन्हे उस स्थान पर अनुकूल परिस्थियां मिलती रहती हैं, यानि घोसले बनाने के लिए वृक्ष, आस-पास में तमाम जल स्रोत मौजूद हों। इनका मुख्य भोजल घोघा (Pila) है। सफ़ेद-काले पंखों वाला यह स्टार्क पक्षी जिसकी तांगे लम्बी व गुलाबी रंग लिए होती हैं, बड़ी चोंच जिसका रंग काला होता है, इसकी चोच के मध्य रिक्त स्थान होने के कारण ही इसे ओपनबिल कहते है, और यह चोंच का आकार इसे इसका भोजन पकड़ने में सहायता करता है।


 प्रजनन से पूर्व ये पक्षी जोड़े बनाते है, चार से पांच अण्डे एक घोसले में पाये जाते है, नर व मादा दोनो मिलकर अपनी सन्तति का पोषण व सुरक्षा करते हैं।   

अपने शोध के दौरान जो मैने देखा यह प्रजाति मानव प्रजाति के लिए बहुत लाभदायक हैं, इन पक्षियों के द्वारा हेल्मिन्थीज से होने वाली बीमारियों पर नियन्त्रण इन पक्षियों द्वारा होता है, चूकिं ये घोघा को मुख्य आहार के रूप में लेते है, और घोघा (Mollusca) मुख्य वाहक होता है हेल्मन्थीज (mainly Trematode) का, जिसके कारण मानव समुदाय  व उनके पालतू जानवरों में तमाम भयानक बीमारिया पनपती हैं जैसे सिस्टोसोमियासिस, आपिस्थोराचियासिस, सियोलोप्सियासिस व फैसियोलियासिस (लीवरफ्लूक) जैसी होने वाली बीमारियां जो मनुष्य व उनके पालतू जानवरों में बुखार, यकृत की बीमारी पित्ताशय की पथरी, स्नोफीलियां, डायरिया, डिसेन्ट्री आदि पेट से संबंधित बीमारी हो जाती हैं।

प्लेटीहेल्मिन्थस संघ के परजीवियों से होने वाली बीमारियों पर यह पक्षी नियंत्रण रखता है  चूंकि इन परजीवियों का वाहक घोंघा (मोलस्क) होता है जिसके द्वारा खेतों में काम करने वाले मनुष्यों और जलाशयों व चारागाहों में चरने व पानी पीने वाले वाले पशुओं को यह परजीवी संक्रमित कर देता है। और इस घोघे को यह स्टार्क पक्षी खाता है नतीजतन यह इन परजीवियों जो घोघा में मौजूद होते है उनकी तादाद पर नियन्त्रण रखता है।

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कृष्ण कुमार मिश्र ( वन्य जीव सरंक्षण, अपनी परंपरा और इतिहास को संजोने की जुगत, लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।)


3 comments:

Archana said...

बेहद दुखद स्थिती..सच में दोषी हम ही हैं...अपनी सुख -सुविधा जुटाने में इतने व्यस्त कि किसी भी हद तक जा सकते हैं...
हमारे किये का परिणाम भुगतना ही होगा आज ये पक्षी शिकार हुए हैं...कल को हम भी होंगे ही....

rupal ajabe said...

zaroori jaankaari k sath zimeedaari ka ehsaas karwane k liye shukriya!!!! par ye baat bhi humein dhyaan mein rakhni hi hogi ki, manushya ke kiye-dhare ka poora hisaab-kitaab prakriti achchhe tareeke se rakhti hai aur dheere-dheere humse badle leti hi hai....... jo is roop mein hamaare saamne aate hein!!!! par mujhe afsos aur koft dono hi hota hai ki, humein ab in baaton par aashcharya bhi hona band ho gaya hai.... jaise saari samvedanaaein humne hamaari khatm kar di hein jaanboojhkar......

Anonymous said...

It was very bad. Mishra ji after reading the whole story I am sorry to say that I have nothing to say.

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Satpal Singh,LIIPC,IIPC Bronze
Wildlife & Nature Photographer

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