डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 02, February 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Aug 25, 2012

बाढ़ ....क्योंकि नदियां कभी नही लौटती !

ये नदी नही एक गांव है, जो अब डूब चुका है।

बाढ़ की विभीषिका में बह रही है तराई की वन्य-संपदा- दुधवा राष्ट्रीय उद्यान प्रभावित

तराई के जंगल हुए जल-मग्न- जानवर बेहाल

इन्तजामियां कर रही है सिर्फ़ कागज़ी कवायदें-

लखीमपुर खीरी हिमालय की तराई का वह भूभाग है जहां तमाम नदियां इस जमीन पर कई रेखाये खींचती हैं! इन रेखाओं के बीच के हिस्सों को भरते हैं शाखू के विशाल जंगल, गन्ने की फ़सल और रिहाईशी इलाके। ...इनमें कुछ रेखायें मोटी तो कुछ बारीक है, लेकिन बारिश इन रेखाओं को अब सिर्फ़ मोटा नही करती बल्कि इन्हें बेडौल बना देती है, कही कही तो ऐसा लगता है जैसे किसी बच्चे ने स्याही गिरा दी हो ! जानते है ऐसा क्यो होता है? कहते हैं, "पानी अपना रास्ता खुद तलाश लेता है"! आखिर क्यो तलाशना पड़ता है पानी को रास्ता...जाहिर है उसे कही रोका जा रहा है, या फ़िर नदी के आगोश में शान्त बहने वाला पानी आज विकराल गर्जना करते हुए, अपने आवेग को बढाता हुआ जमीन पर इधर-उधर उमड़-घुमड़ कर सब कुछ तहस-नहस करने को आतुर क्यों है, उसके इस रौद्र रूप पे आप को यह नही महसूस होता कि उसे कही छेड़ा गया है, बांधा गया या फ़िर उसे रास्ता नही दिया जा रहा है, कुछ तो है जो वह नाराज है, अपनी धीमी, शान्त और कलरव की मधुर धुन करने वाला यह जल आज इतने आवेश में क्यों है? 

 सोचिए नदियों के किनारे जो मानों दो बाहें हों और अविरल बह रहे जल को बड़ी शिद्दत से समन्दर के आगोश में समर्पित कर देने को आतुर हों, आज बाहें (किनारे) खण्डित हो रही है- जगह जगह और जल धारायें इधर-उधर का रूख अख्तियातर करने को मानों विचलित हो रही हों! 

हमने नदियों पर बाधं बना कर उनकी निरन्तर बहने की प्रवत्ति को रोकने की कोशिश की, आप को बता दूं यदि किसी के स्वभाव और यानि प्रवत्ति से छेड़छाड़ की जाती है, तो फ़िर इसके दुष्परिणाम ही संभावित होते है, हमने इन नदियों के किनारे के जंगलों झाड़ियों, और घास के मैदानों को नष्ट कर दिया और वहा या तो खेती करना शुरू ए की या फ़िर रिहाईशी इलाके बना लिए, नतीजा सामने है, जो जंगल, वृक्ष, और घासें मिट्टी को जकड़े हुई थी वो जकड़न खत्म हो गयी और जल-धाराओं की विशाल ठोकरों ने किनारों को काटना शुरू ए कर दिया।

बाढ की विभीषिका ये शब्द बड़ा अजीब सा लगता है, कभी बाढ़ खुशहाली का सबब बनती थी, थोड़ी परेशानियों के साथ ! वजह थी बाढ़ के पानी के साथ आये वो तत्व जो जमीन को उपजाऊ बनते है, साथ ही उस पूरे भूभाग के तालाबों और कुओं को संचित करने का काम भी यह बाढ के पानी से ही था। नदियों के किनारे वाले भू-भाग को लोग केवल चरागाह के तौर पर इस्तेमाल करते थे, आज नदियों के किनारे क्या नदी के बीच में घर बना डाले लोगों ने और खेती करना शुरू कर दिया, किसी के दायरे में घुसना और फ़िर नुकसान होने पर मुआबजे की मांग, ये सब बड़ा अजीब है!

एक दौर था तो हमारे तराई के गांजर क्षेत्र के लोग इस बात के लिए तैयार रहते थे, कि अब थोड़े दिन शारदा मैया या घाघरा मैया (नदी) उफ़नायेंगी तो तैयारी पहले से कर लो, लोग नदियों की पूजा करते थे कि मैया अब लौट जाओ हमारे गांव से । 



आज नदियों का यह उफ़नाना सामान्य नही रहा, ये विकराल रूप धारण कर रही है, क्योंकि पहाड़ों पर कटते हुए जंगलों की वजह से, मैदानी क्षेत्रों में नदियों के किनारों पर खेती होने से, इन नदियों के भीतर सिल्ट और मिट्टी इकट्ठा होती जा रही है, नतीजतन इनकी गहराई समाप्त हो गयी, समतल होती नदियां, बिना किनारों के जब गुजरेगी हमारे मध्य से तो नतीजा क्या होगा?



बड़ी नदियों के अलावा अगर हम बात करे छोटी नदियों की, जो इन विशाल नदियों को पोषित करती रही है, तो हमने इन छोटी नदियों लगभग नष्ट कर दिया, इनके किनारो पर कब्जा कर लिया,  बदलती परम्परायें और विकास ने मानवीय सभ्यता को जो प्रभावित किया उसके चलते अब गांवों में लोग इन नदियों से मिट्टी नही निकालते अपने घर और घर के तमाम सामान को बनाने के लिए जो कभी बहुत जरूरी था। ये नदियां भी अपनी गहराई खो चुकी है, और किनारे सिकुड़ गये हैं। ये छोटी नदियां बारिश के अतिरिक्त भी पूरे वर्ष मनुष्य और जानवरों के लिए जल की उप्लब्धता बनाये रखती थी, और बड़ी नदियों की जलधारा को पोषित भी करती थी, ताकि वह सागर तक पहुंच सके।


नदी ने जो रास्ता एक बार अख्तियार कर लिया, फ़िर राह में कुछ भी हो, उसे तहस नहस करती हुई, वो आगे बढती रहती है, और दोबारा पीछे नही मुड़ती अपने छोड़े हुए मार्ग पर।  इन नदियों को इनका रास्ता मिल जाये इनके मुहाने और मीलों तक फ़ैली इनके किनारों की सरहदें फ़िर ये कभी नाराज़ नही होगी, सिर्फ़ बारिश के दिनों में उफ़नायेंगी, जिन इलाकों से गुजरेगी, वहां की मिट्टी को गीला और उपजाऊ बनाती हुई, जलाशयों को संचित करते हुए गुजर जायेगी...मानों जैसे हमें तोहफ़ा देने ही आई हों, इन्हे बचा ले हम क्यों कि ये कभी वापस नही लौटती- यह इनकी वृत्ति है! ..ये दोनों ही सन्दर्भों में सत्य है, नदियां वापस नही होती- जिस रास्ते पर रूख कर लिया उससे और अगर ये खत्म हो गयी तब भी...वापस नही लौ्टेगी, फ़िर हम किसी भागीरथ को खोजते फ़िरेगे ! इस इन्तज़ार में कि.....



एक और विडम्बना है, सरकारी कवायदे जिनका कोई मौजू परिणाम नही निकलता ! बन्धों के निर्माण के साथ ही बाढ की तबाही को और बढ़ा दिया गया।  अत्यधिक बाढ़ क्षेत्र और कम बाढ़ क्षेत्र से इतर करने के लिए बीच मे मिट्टी के बड़े बड़े बन्धे बना दिए गये ताकि पानी यही तक आकर रूक जाए, नतीजा यह हुआ कि जहां अधिक बाढ वाले इलाके थे, वो जल-मग्न हो गये, लोगों के घर और गांव डूब गये, जानवर और आदमी सड़कों पर बसर करते है,  इन बारिश के दिनों में, सबसे खराब बात तो यह है, कि एक तरफ़ तबाही दूसरी तरफ़ के लो्ग अमन चैन में, यह कौन सा तरीका है, बाढ़ से बचाव का। एक गौर बात जब ये बन्धें पानी के दबाव में टूटते है, तो उन इलाकों और तबाही मचती है, जो अभी तक सुरक्षित थे। पानी का आवेग इतना अधिक होता है कि इमारते डूबती ही नही धराशाही हो जाती है। 

ये बन्धे मानव समाज में आपसी वैमनस्य का कारण भी बनते है, जब बन्धे के उस तरफ़ के लोगों के गांव घर डूब जाते है, तो वह कोशिश करते है, कि बन्धे को काट दिया जाए ताकि पानी दूसरी तरफ़ चला जाए और उनकी फ़सले और घर् बरबाद होने से बच जाए, इस वजह से बन्धे के दोनों तरफ़ के लोग आपस में लड़ते है।

जानवरों का प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बोध हमसे अधिक है, बारिश के शुरूवात में ही नदियों का गन्दला होता पानी, उसके बेग में जरा सी भी हुई तब्दीली वो भांप लेते है, और कोशिश करते है कि नदी जब रौद्र रूप ले तो अपना बचाव कर सके, लेकिन हमने उनके घरों से भी छेड़छाड़ की नतीजतन वो अपने कथित प्राकृतिक आवासों में भी अपने को बचा पाने में अक्षम हो रहे है।

कुल मिलाकर इस अनियोजित विकास और क्षणिक लाभ के लिए प्रकृति से छेड़ छाड़ मानव सभ्यता को इतना प्रभावित कर देगी कि हम कुछ नही कर पायेगे !

हो सके तो नदियों के सिकुड़ते किनारों को रोक ले, इनके मार्गों को इनकी गहराई इन्हे फ़िर से दे सके तो एक बार फ़िर नक्शे पर ये खूबसूरत सर्पिल रेखायें दमकती हुई, भागती हुई सागर से मिलन को आतुर, दिखाई देगी ।



कृष्ण कुमार मिश्र
krishna.manhan@gmail.com

11 comments:

Anonymous said...

भइया आपके जितना अनुभव तो नहीं और ना ही शब्दकोष है पर जो सोचता हूं वो बोलना अच्छा लगता है क्योंकि चुप रहेने खुद की गलती और मिलने वाले अनुभव से वन्चित रहे जाऊँगा।
प्रकृति के साथ इन्सान जो भी कर रहा है सब गलत कर रहा है कुछ खास मौको पर वृक्षा रोपण करते हैं लोग तो वही रोज़ कई हरे भरे पेड़ लोग हंसकर काट रहे हैं।
प्रकृति में इस असंतुलन का ज़िम्मेदार इन्सान है और इस असंतुलन का हरजाना प्रकृति इन्ही से लेगी। रहेगी तब भी और नहीं रहेगी तब भी दोनों ही दशाओं में इन्सान खुद को तबाही तक ले जाएगा।
कभी वन्य जीवों से तो कभी प्रकृति की शक्तियों से
सिर्फ कहेने को है कि इन्सान बुद्धिजीवी है।
कहेना तो बहुत कुछ है पर अपनी ही प्रजाति को क्या कहूं? मैं भी इनमें से एक हूं।
तृटियों के लिये क्षमा करिएगा।

Anonymous said...

kuch saal pahele tehesil wale bahut bechain the,karan pata laga ki baar(flood) nahi aaiye thi, aur jis din aa gayi thi us din tehseel walon ki kushi kya haal tha yeh aap samaj hi sakte hain...In sab ki wajah flood relief fund ka paisa tha jo kahan jaata hain?Hum sab jaante hai iska kaise bandar baat ho jaata. Har saal flood ki wajah se adhikari suspend hote aur october tak bahaal ho jate hain.Hum to kewal Dua kar sakte Ki GOD HELP THOSE HELPLESS PEOPLES WHO'RE VICTIM OF FLOOD-GOD IS OUR ONLY HOPE!

Anonymous said...

kuch saal pahele tehesil wale bahut bechain the,karan pata laga ki baar(flood) nahi aaiye thi, aur jis din aa gayi thi us din tehseel walon ki kushi kya haal tha yeh aap samaj hi sakte hain...In sab ki wajah flood relief fund ka paisa tha jo kahan jaata hain?Hum sab jaante hai iska kaise bandar baat ho jaata. Har saal flood ki wajah se adhikari suspend hote aur october tak bahaal ho jate hain.Hum to kewal Dua kar sakte Ki GOD HELP THOSE HELPLESS PEOPLES WHO'RE VICTIM OF FLOOD-GOD IS OUR ONLY HOPE!

Anonymous said...

Kuch saal pahele tehesil wale bahut bechain the,karan pata laga ki baar(flood) nahi aaiye thi, aur jis din aa gayi thi us din tehseel walon ki kushi kya haal tha yeh aap samaj hi sakte hain...In sab ki wajah flood relief fund ka paisa tha jo kahan jaata hain?Hum sab jaante hai iska kaise bandar baat ho jaata. Har saal flood ki wajah se adhikari suspend hote aur october tak bahaal ho jate hain.Hum to kewal Dua kar sakte Ki GOD HELP THOSE HELPLESS PEOPLES WHO'RE VICTIM OF FLOOD-GOD IS OUR ONLY HOPE!

Archana said...

बहुत ही झकझोरने वाला चिंतन...

वाणी गीत said...

नदियों के पुनर्विकास के लिए उपयोगी सुझाव !
शहरों में तो लोगों ने नालों तक को नहीं छोड़ा !

Devendra Prakash Mishra said...

bahut he achchha

Anonymous said...

Really an appreciable article read after a long time this kind of stuff for mindset is needed more.
Once again thanking you.

rupal ajabe said...

main samajh nhi pa rhi hoon k aapki taaref karun ya is sachchai par koft karun!!!!! par aapki bhavnaao ki kadra karti hoon agar media har tarah se itni sajeedagi apni khabaron mein le aaye to baat ban jaye aur ye maanveey jadtaaein khatma ho jaaein!! aapne apne lekh mein baandho ka zikra kiya hai..... in baandho ka dushparinaam hum haal hi mein dekh chuke hein uttarkaashi mein jo hua badal fatne se nadi mein paani badha to maneri bhali jal vidyut pariyojana se bhagirathi ka paani turant chhodana pada nadi k bahaav mein tezi aayi aur uttarkashi ka shahar ko jodne wala mukhya pul baha kar le gayi apne sath....... ya sachchai hai k prakriti k sath chhed chhad ki to wah badla to zaroor legi hi.. nadi ka swabhavik roop bigaad diya hai to wo kahaan jayegi!!! aur fir aaj k samay mein to humein bhageerath bhi nhi mil sakta kyon ki aaj k samay mein itna purushaarth hi kahaan hai manushya mein!! hum apne se baahar kisi k liye soch hi nhi paa rhe hein to doosre k liye kya kuchh karenge!! baharhaal bahut bahut shukriya lekh k liye!! aur shubhkaamnaaein bhi.... isi tarah zimmedaari k sath likhte rahenge isi aasha k sath

Surya Prakash said...

KK You write very well Keep it up. Good Luck.
SP

आशीष सागर said...

हो सके तो नदियों के सिकुड़ते किनारों को रोक ले, इनके मार्गों को इनकी गहराई इन्हे फ़िर से दे सके तो एक बार फ़िर नक्शे पर ये खूबसूरत सर्पिल रेखायें दमकती हुई, भागती हुई सागर से मिलन को आतुर, दिखाई देगी ।
Wish u Krashna Kumar ji.....

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