International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Apr 30, 2011

अरे वे तो उसी के रंग में रंग गये !

एक पहेली-
जानवर और वृक्ष- एक जैसी शक्ल-ओ-सूरत !
वनस्पति और जन्तु जो ढल गये एक ही शक्ल-ओ-सूरत में आखिर कैसे और क्यों ? 
जवाब आप से चाहिए !

मदार के पौधे के इस गहरे हरे रंग के माँसल पत्ते पर पर यह कौन ? सा जीव है जिसकी वाह्य सरंचना हूबहू मदार के इस पत्ते की तरह है ! क्या आप बतायेंगे इस खूबसूरत रचना का नाम जिसे प्रकृति ने कभी गढा था ।


Photo by: © Krishna Kumar Mishra


 प्रकृति के इस रूप को पहचानिए और अपने एहसासातों को जरूर जाहिर करिए दुधवा लाइव के माध्यम से...वैज्ञानिक नज़रिए के अलावा प्रकृति की इस सुन्दर कृति की अतुलनीयता, साज-सज्जा, एवं अनकहे रहस्यों को परिभाषित अवश्य करें ।

हमें इन्तजार है आप की महत्वपूर्ण टिप्पड़ियों का !

 
दुधवा लाइव डेस्क




Apr 29, 2011

दुधवा राष्ट्रीय उद्यान : एक चित्र-कथा

दुधवा टाइगर रिजर्व
एक चित्र-कथा
--सतपाल सिंह 

दुधवा की दक्षिण सोनारीपुर रेन्ज में भारतीय गैंण्डा।

भारतीय गैण्डा

भारतीय गैण्डा

दुधवा के ग्रासलैड

दुधवा की गलियों में रेड जंगल फ़ाउल (जंगली मुर्गा)

रेड जंगल फ़ाउल (जंगली मुर्गा)

सुहेली नदी जो जीवन रेखा है दुधवा के जंगलों और उसके वन्य जीवों की।

साँझ में सुहेली का एक दृष्य

दुधवा में जंगली हाथी जो नेपाल और भारत के सीमावर्ती जंगलों में प्रवास करते है।


गजगामिनी

सठियाना रेन्ज में टूरिस्ट हट

दुधवा में रात्रि में पेट्रोलिंग करता भारतीय बाघ

हम इधर भी हैं!

जंगली सुअर

रात्रि का दृष्य: जंगली सुअर

अरे ये तो नाराज हो रहे है, और अपने जैकब्सन आर्गन का इस्तेमाल कर फ़ोटोग्राफ़र को परखने की कोशिश में है ।
(सभी तस्वीरें: © सतपाल सिंह- अप्रैल 2011)


सतपाल सिंह (वन्य-जीव फ़ोटोग्राफ़र, घूमना इनकी हॉबी है, नन्हे जीवों से लेकर विशाल जानवरों और धरती की सुन्दरता को कैमरे में कैद कर लेने की अदम्य इच्छा, जिला खीरी के मोहम्मदी में निवास, इनसे satpalsinghwlcn@gmail पर सम्पर्क कर सकते हैं। )

...हमें उनका नाम नही मालूम !


© कृष्ण कुमार मिश्र : अपने हिमालय का एक खूबसूरत फ़ूल जिसका अंग्रेजी नाम जरूर होगा पर हिन्दी ..?

एक प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिका की संपादिका के पत्र का जवाब ! ..जो संबधित है पक्षियों के हिन्दी नामों से !
 उन्होंने मांगे है पक्षियों के हिन्दी नाम...

महोदया
 पक्षियों के हिन्दी नाम असंभव है क्योंकि हिन्दुस्तानियों ने हिन्दी में कोई डेटाबेस तैयार ही नही किया, हम सब ने अंग्रेजों की उंगली पकड़ कर पड़ना सीखा.. ये बात आप को मालूम होनी चाहिए !..यहां पक्षियों के नाम क्या हर चीज के नाम कुछ मील चलने पर बदल जाते है, कृपया हिन्दी नाम खोजने के बजाए हिन्दी का अल्प-कालिक इतिहास देखिए और ये देखिए कि हमारी सरकारों ने हिन्दी के राष्ट्रीय करण में क्या क्या तीर मारें है! क्या हिन्दी में किसी भी एक विषय वस्तु का राष्ट्रीयकरण हुआ है.?..कोई लेखा जोखा तैयार किया गया है हमारे स्थानीय या पारंपरिक ज्ञान का...जबकि अंग्रेजी में प्रत्येक विषय पर अन्तर्राष्ट्रीय गष्ठियों में तमाम विषयों पर सेमिनार किए जाते है और फ़िर प्रोजेक्ट बनाकर उन पर कार्य...अभी हाल में ही अंग्रेजी में पक्षियों के नामकरण को वैश्विक स्तर पर सूचीबद्ध कर उनका संसोधन कर नये नामों की एक लिस्ट तैयार की गयी और उसे प्रत्येक देश के वैज्ञानिक संस्थानों में भेजा गया..ताकि आइन्दा से इसी सूचीबद्ध नामों से इन्हे पहचाना जाए.....अफ़सोस कि हमारे कुछ महान चिद्वानों ने बड़ी विषमताओं के बावजूद फ़टेहाल रहकर हिन्दी में साहित्य को लिखा जिसमें आप को विज्ञान, इतिहास व भूगोल आदि की झलकियां मिल सकत है, पर हमारे अमीर संस्थानों(सरकारी व निजी) ने इस सन्दर्भ में कोई कार्य नही किया, सिवाय अंग्रेजी में संकलित हमारे ही ज्ञान का अशुद्ध अनुवाद करने के ! साथ ही अपने आस-पास की मौजूदा परिस्थियों के लेखा-जोखा की कोई परवाह नही है...नतीजतन नई हिन्दी व अंग्रेजी भाषी पीढी १९४७ के बाद के भारत को कभी नही जान पायेगी....क्योंकि यहां सब उन  एक्स गोरे आकाओं के द्वारा तैयार बेहतरीन दस्तावेजों का ही दोहराव किया गया है बार बार...विभिन्न भौड़े तरीकों से...विभिन्न भाषाओं में.....अपने ज्ञान को अपनी भाषा में दस्तावेजीकरण का तरीका ही नही आता हमें या फ़िर हम सिर्फ़ नकल करना जानते है वो भी आउटडेटेट......काम करना नही.....।
डा० सालिम अली के अलावा कुछ अन्य लोगों ने यह प्रयास किया की पक्षियों के स्थानीय नामों का उल्लेख किया जाए...किन्तु वह अपूर्ण रहा।
भारत की सुन्दर विविधिता तो समझ आती है किन्तु ज्ञान का राष्ट्रीयकरण अपनी भाषा में न कर पाना यह समझ नही आता...अवश्य हमारी पीढी में कोई खामीं जरूर है..क्योंकि हम भेड़चाल का मज़ा लिए जा रहे है तकरीबन एक हज़ार साल से और हांकने वालों पर पूरे भरोसे के साथ...फ़िर वह चाहे गोरी चमड़ी हो या काली........!

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की वो पंक्तियां ...खूब फ़िट बैठती है मेरे उपरोक्त कथन पर ...आप भी नोट कर लीजिए...

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।

सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।


इति
कृष्ण कुमार मिश्र

Apr 23, 2011

पानी की जंग

Photo courtesy:  www.eco-asia.info
बांधों का मालिकाना हक हमारा है: मध्य प्रदेश

1-  बांधों के बकाये राजस्व की राशि 2007 तक 71 करोड़ 82 लाख 32 हजार पांच सौ सतहत्तर रूपये हैं बाकी।
2-   उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक नहीं किया राजस्व का भुगतान।
3-   हर साल लाखों घर होते हैं बेघर बाढ़ की तपिश मे।

 मध्य प्रदेश की जमीन पर बने उत्तर प्रदेश के आधा दर्जन बांधों के कारण पिछले कई दशक से मध्य प्रदेश हर साल बाढ़ से तबाही झेल रहा है। इन बांधों से मध्य प्रदेश को दोहरी मार पड़ रही है। एक तो यहां जमीनें खराब हो रही हैं और साथ ही बांधों के बकाये राजस्व की राशि 2007 तक 71 करोड़ 82 लाख 32 हजार पांच सौ सतहत्तर रूपये पहुंच चुकी है।

    मध्य प्रदेश सरकार को होने वाली इस राजस्व की क्षति की वसूली के लिये प्रदेश की सरकारों ने कभी पहल नहीं की जबकि दूसरी ओर एक बड़े रकबे में भूमि सिंचित करने और बकाया भू-भाटक कोई जमा न करने से उत्तर प्रदेश सरकार के दोनों हाथों में लड्डू हैं। ऐसा मानना है मध्य प्रदेश के बिहड़ों में बसने वाले उन हजारों बासिंदों का जो साल दर साल बांधों की पैबन्द में बाढ़ की तपिश के साथ घर से बेघर हो जाते हैं।

    इस बीच केन बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना पर भी सवालिया निशान उठ रहे हैं। इन बांधों के कारण मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ छतरपुर जिला अरसे से बाढ़ त्रासदी को झेल रहा है। जंगल और जमीन मध्य प्रदेश की है लेकिन उसका दोहन उत्तर प्रदेश कर रहा है। मध्य प्रदेश की आवाम का कहना है कि बांधों का मालिकाना हक हमारा है। गौरतलब है कि आजादी से पहले एकीकृत बुन्देलखण्ड में सिंचाई की व्यवस्था थी। लेकिन प्रदेशों के गठन के बाद मध्य प्रदेश को इन बांधों के कारण दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। बांधों का निर्माण तो मध्य प्रदेश की जमीन पर हुआ है लेकिन व्यवसायिक उपयोग उत्तर प्रदेश कर रहा है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में कुल 6 बांध निर्मित हैं जो उत्तर प्रदेश की सम्पत्ति हैं। लहचुरा पिकअप वियर का निर्माण सन् 1910 में ब्रिटिश सरकार ने कराया था। इसमें मध्य प्रदेश की 607.88 एकड़ भूमि समाहित है। तत्कालीन अलीपुरा नरेश और ब्रिटिश सरकार के बीच अलीपुरा के राजा को लीज के रकम के भुगतान के लिये अनुबन्ध हुआ था। आजादी के बाद नियमों के तहत लीज रेट का भुगतान मध्य प्रदेश सरकार केा मिलना चाहिए था लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई भुगतान नहीं किया। नियम कायदों के हिसाब से लहचुरा पिकअप वियर ग्राम सरसेड के पास है इसलिये 15.30 रूपया प्रति 10 वर्गफुट के मान से 607.88 एकड़ का 40 लाख 51 हजार 318 रूपया वार्षिक भू-भाटक संगणित होता है। इस लिहाज से सन् 1950 से बीते साल 2007 तक 23 करोड़ 9 लाख 25 हजार 126 रूपये की रकम उत्तर प्रदेश पर बकाया है। 

    इसी तरह पहाड़ी पिकअप वियर का निर्माण 1912 में ब्रिटिश सरकार ने कराया था। अनुबन्ध की शर्तों के मुताबिक दिनांक 01 अप्रैल 1908 से 806 रूपया और 1 अप्रैल 1920 से 789 रूपया अर्थात 1595 रूपया वार्षिक लीज रेट तय किया गया था। पहाड़ी पिकअप वियर के डूब क्षेत्र 935.21 एकड़ का वार्षिक भू-भाटक 62 लाख 32 हजार 875 रूपया होता है। यह राशि 1950 से आज तक उत्तर प्रदेश सरकार ने जमा नहीं की। इसके बकाये की रकम 35 करोड़ 52 लाख 73 हजार 875 रूपये पहुंच चुकी है। करोड़ों रूपयों के इस बकाया के साथ-साथ बरियारपुर पिकअप वियर का भी सालाना भू-भाटक 8 लाख 36 हजार 352 रूपया होता है। इस वियर को भी 1908 में अंग्रेजी हुकूमत ने तैयार कराया था। इसमें तकरीबन 800 एकड़ भूमि डूब क्षेत्र में आती है। इस तरह अगर 1950 से इस पिकअप वियर के डूब क्षेत्र की गणना की जाये तो यह रकम 4 करोड़ 76 लाख 72 हजार 64 रूपये होती है। 

    छतरपुर के पश्चिम में पन्ना जिले की सीमा से सटे गंगऊ पिकअप वियर का निर्माण 1915 में अंग्रेजी सरकार ने कराया था। जिसमें 1000 एकड़ डूब क्षेत्र है। 6 लाख 53 हजार 400 रूपया वार्षिक भू-भाटक के हिसाब से यह राशि 3 करोड़ 72 लाख 43 हजार 800 रूपये पहुंच जाती है लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने अन्य बांधों की तरह इस भू-भाटक राशि को भी आज तक जमा नहीं किया। छतरपुर एवं पन्ना जिले की सीमा को जोड़ने वाले रनगुंवा बांध का निर्माण 1953 में उत्तर प्रदेश सरकार ने कराया था। इसका डूब क्षेत्र भी तकरीबन 1000 एकड़ है। इस प्रकार से वार्षिक भू-भाटक 6 लाख 53 हजार 400 रूपये के हिसाब से पिछले 54 वर्षों में 3 करोड़ 52 लाख 83 हजार 600 रूपये होता है। इस राशि को भी उत्तर प्रदेश सरकार की रहनुमाई का इन्तजार है। वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश की सीमा को जोड़ने वाली उर्मिल नदी पर बांध का निर्माण कराया था। इसके निर्माण के बाद मध्य प्रदेश की 1548 हेक्टेयर भूमि डूब क्षेत्र में आ गयी। इसका सालाना अनुमानित भू-भाटक 9 लाख 86 हजार 176 रूपये बनता है। पिछले 12 साल में यह राशि 1 करोड़ 18 लाख 34 हजार 112 रूपये पहुंच चुकी है। छतरपुर में गरीबी और उत्तर प्रदेश की सम्पन्नता का कारण बने इन छः बांधों के कुल वार्षिक भू-भाटक की राशि वर्ष 2007 तक 71 करोड़ 82 लाख 32 हजार 577 रूपये पहुंची है पर उत्तर प्रदेश की सरकार समय के साथ बदलती रही और मध्य प्रदेश बाढ़ त्रासदी की चपेट में जल आपदा का शिकार बनता गया। हर बरसात में मध्य प्रदेश के गांवों को भीषण बाढ़ का सामना करने के साथ-साथ पलायन और रोजगार के लिये उत्तर प्रदेश के उद्यमी शहर गाजियाबाद और नोयडा में निर्भर रहने की जद्दोजहद में संघर्ष करना उनके जीवन यापन के हिस्सों का मुलम्मा है। इससे भी बड़ा खतरा यहां की जमीनों का बताया जाता है जिनमें हजारों एकड़ तक भूमि के ऊपर सिल्ट जमा होने से कृषि भूमि खराब हो रही है। उत्तर प्रदेश के इन अधिकांश बांधों की समय सीमा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इनसे निकलने वाली नहरों के रख-रखाव पर न ही सरकारों ने कोई ध्यान दिया और न ही जल प्रबन्धन के सकारात्मक समाधान तैयार किये हैं। रनगुंवा बांध से मध्य प्रदेश को अब पानी भी नहीं मिल पाता है। जल-जंगल और जमीन इन तीन मुद्दों के बीच पिसती उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की हांसिये पर खड़ी आम जनता की यह पीड़ा कहीं न कहीं उन बांध परियोजनाओं के कारण ही उपजी है। जिसने दो प्रदेशों के बीच वर्तमान में पानी की जंग और भविष्य में बिन पानी बुन्देलखण्ड के अध्याय लिखने की तैयारी कर ली है। 
बकौल धीरज चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि मध्य प्रदेश के बांधों का मालिकाना हक उत्तर प्रदेश का है। कहीं न कहीं एक पत्रकार की कलम के शब्द भी गाहे-बगाहे जब दो प्रदेशों के बीच जल-जमीन-जंगल के मालिकाना हक की बात बड़ी बेबाकी से लिखते हैं, तो यह कहना बिकाऊ खबर नहीं बल्कि जमीन की हकीकत है कि दोनों प्रदेशों की शासन सरकारों को ऐसी बांध परियोजनाओं पर पूर्ण विराम लगा देना चाहिए। जो जनता के करोड़ों रूपया विनाश की शर्त पर विकास के नाम में से खर्च होते हैं और उसके बदले मिलती है जल त्रासदी, जल संकट, पलायन और कर्ज  डूबे किसान। 

 आशीष सागर (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Apr 20, 2011

ढाक के तीन पात: बस कहावत ही जिन्दा रह जायेगी !


पलाश: © कृष्ण कुमार मिश्र
पलाश के फ़ूल !
(Butea monosperma)


(और भी है नाम- टेसू, झूला, ढाक-Bastard Teak, Parrot Tree


कुदरत के करिश्मों की फ़ेहरिस्त में एक खूबसूरत पुष्प जो खिलता है तो मानों आग सी लगी हो..हाँ मैं बात कर रहा हूं ढाक के तीन पात की यह कहावत उत्तर भारत के ग्रामीण अंचल में खूब प्रचलित है, ढाक, टेसू, झूला और पलाश यह एक ही वृक्ष के नाम है, जिसके मोटे व क्लोरोफ़िल से लबालब भरे हुए गहरे हरे पत्ते एक छतरीनुमा शक्ल में ढलते है और वृक्ष एक शीतल छतरी में तब्दील हो जाया करते है, किन्तु जब वक्त आता है पुष्प खिलने का यानि किसी भी जीव का सबसे बेहतरीन वक्त..जब वह अपनी प्रजाति के वजूद को मुस्तकिल करता है इस ग्रह पर यानी प्रजनन की वह प्रक्रिया जो फ़ूल खिलाती है...तब यह वृक्ष पूर्ण नग्न हो जाता है सारे मोटे व चैड़े पत्ते धराशाही हो जाते है बचती है सिर्फ़ सूखी सी दिखने वाली ऊबड़-खाबड़ काली-काली टहनियां और इन पर खिलते है लाल-लाल पुष्पों के अन-गिनत गुच्छे....इन बद-रंग टहनियों में खिले ये लाल सुर्ख रसीले पुष्प एक अलग ही आभा लिए होते है..यह है प्रकृति की सजीव पेन्टिंग जिसमें इस कला के सभी बेहतरीन तरीके खुद-बुद इस्तेमाल होते है, या यूँ कह ले की आलरेडी प्रोग्राम्ड होते है!


तो यह मजमून था पलाश (Butea monosperma) का जिसका नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, यह Fabaceae परिवार का सदस्य है। ब्यूटिया नाम ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री  (26 May 1762 – 8 April 1763) John Stuart, 3rd Earl of Bute के नाम पर पड़ा ब्यूट स्कॉटलैंड का छोटा द्वीप है, जॉन स्टूआर्ट नेचुरलिस्ट भी थे और अवकाश प्राप्ति के बाद उन्होंने अपना जीवन वनस्पति विज्ञान को समर्पित कर दिया, इनके नाम पर एक जीनस का नाम रखा गया जिसे Stuartia कहते है, इसके अन्तर्गत Theaceae कुल के पुष्प वाले पौधे आते है, यह कुल  की वनस्पति एशिया में पायी जाती है।


पलाश भारतीय उप-महाद्वीप एंव दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है। जिसमें विभिन्न देश शामिल है- वियतनाम, थाईलैंड, क्म्बोडिया, मलेशिया, लाओस, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान में पलाश मौजूद है। यह प्रजाति इस भू-भाग की देशी प्रजाति है। 


धीमी रफ़्तार से वृद्धि करने वाला यह वृक्ष १५ मीटर तक लम्बाई में बढ़ सकता है, इसकी लकड़ी पानी के भीतर खराब नही होती, इसलिए इसका इस्तेमाल कुएं बनाने में उसकी नीवं में रखी जाने वाली नेवार (गोलाकार लकड़ी की नींव) में किया जाता रहा, यह वृक्ष प्राकृतिक रूप से लाख का बेहतरीन उत्पादक है, क्योंकि लाख का कीड़ा अपना जीवन चक्र इस वृक्ष पर पूरा करता है। चारकोल का निर्माण भी पलाश के वृक्ष से होता है, होली के त्योहार में पलाश यानी टेसू के पुष्पॊ से ही प्राकृतिक लाल रंग प्राप्त किया जाता था।


पलाश का खिलना और होली का रंग-


खीरी जनपद में कई वर्षों के अध्ययन में मैने पाया कि यह वृक्ष मार्च के प्रथम सप्ताह में पुष्पित होता है, और अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक फ़ूल खिलने की प्रक्रिया चलती है, जनपद के कई भू-भागों में १०-१५ दिन के अन्तर में पुष्पन होता, फ़ूल खिलने की पक्रिया वृक्ष की आयु व वातावरण एंव आनुवशिंक कारणों से प्रभावित होती है। होली का त्योहार भी इसी माह की किसी तारीख में पड़ता है, पलाश के प्राकृतिक रंग और उनके खिलने का वक्त और होली के रंग की यह तुकबन्दी हमारे पूर्वजों ने खूब की।


रविन्द्र नाथ टैगोर को पलाश अति-प्रिय थे, और उन्होंने शान्तिनिकेतन में पलाश के वृक्षों का सरंक्षण किया। उनकी कविताओं में भी इस पुष्प का वर्णन मिलता है।


प्लासी का युद्ध तो आप सभी को मालूम होगा, हाँ यह जगह बंगाल के नादिया जनपद में भागीरथी नदी के किनारे एक छोटे से गाँव का नाम है, जो बंगाली में पोलाश (टेसू) के ही  नाम पर इस गांव का नाम पलाशी (प्लासी) पड़ा।


समुदायों के जीवन यापन का जरिया था पलाश-
उत्तर भारत के गंगा-गोमती के मैदानी क्षेत्रों में पलाश के जंगलों की बहुतायात थी, शाखू के जंगलों से आच्छादित खीरी जनपद में गावों के मध्य परती भूमियों पर मीलों पलाश के जंगल हुआ करते थे। कालान्तर में प्राकृतिक जंगलों के विनाश के बाद सागौन आदि के प्लान्टेशन ने पलाश को जंगलों से बाहर खदेड़ दिया, और ग्रामीणों ने खेती के लिए जमीनों का इस्तेमाल करने के लिए इसे गांवो से बाहर कर दिया, नतीजतन अब कही-कही सड़कों के किनारे या बची हुई परती भूमियों पर यह वृक्ष दिखाई दे जाते है, यह हाल सिर्फ़ तराई के खीरी जनपद का ही नही बल्कि पूरे अवध क्षेत्र के अलावा उत्तर भारत में लोगों ने इस खूबसूरत पुष्प वाले वृक्ष का सफ़ाया कर डाला है। याद रहे यह वृक्ष पूरे के पूरे समुदायों के जीवन यापन का जरिया भी हुआ करता था, इसके पत्तों से समारोहों में भोजन के लिए प्लेटे तैयार की जाती थी, वृक्ष से चमड़े का कार्य करने वाले टेनिन और रंगीन लाख जैसी बहुमूल्य वस्तु के निकालने का कार्य, चारकोल उत्पादन में   
कार्यरत लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हुई।  


धार्मिक रीति-रिवाजों में पलाश-


यज्ञ्योपवीत से लेकर विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना में प्रयुक्त होता है पलाश, जनेऊ संस्कार में पलाश की तीन-पत्तो सहित टहनी को हाथ में लेकर यह संस्कार वेद-मन्त्रों द्वारा पूरा किया जाता है। स्वामी जगन्नाथ की अप्रैल के महीने में होने वाली पूजा में पलाश के पुष्पों की अनिवार्यता है, साथ ही शिव-पूजा में भी पलाश के पुष्पों की महिमा वर्णित है धार्मिक पुस्तकों और व्याख्यानों में।


औषधीय महत्व- पेट संबधी बीमारियों में उपयोगी।


..कुछ ऐसे उजड़े पक्षियों का नशेमन-


पलाश के पुराने वृक्षों में तमाम खोहें बन जाती है, जिनमें पक्षी अपने घोसले बनाते है, खासतौर से उत्तर भारत के तराई जनपदों में तोतों की कई प्रजातियों की बहुतायात थी, कारण साफ़ था कि उनका बसेरा इन पलास के जंगलों में हुआ करता था, और उनके घोसलों के लिये बेहतरीन जगह देते थे ये पलाश के बूढ़े वृक्ष। किन्तु अब जनसख्या वृद्धि के साथ साथ इन्सान के बहसीपन ने इन जंगलों को उजाड़ कर अपने खेत बना डाले ...और इसी के साथ उजड़ गये इन खूबसूरत परिन्दों के घरौन्दें। तोतों के अतिरिक्त वे सभी चिड़ियों की प्रजातियां प्रभावित हुई जिनकी वृत्ति में पेड़ की खोह(Tree hole) में घोसले बनाना शामिल है..कहते है किसी को नष्ट करना हो तो तो उसका घर ही उजाड़ दो..कुछ ऐसा ही हो रहा इस ग्रह पर जहां मानव विनाशक की भूमिका में है..जाने-अनजानें..!! आदमी की इन बेज़ा कारगुजारियों पर परिन्दों की तरफ़ से एक शेर पूरी तरह प्रासंगिक है-


जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
देखना ये है कि अब आग किधर लगती है

ब्रिटिश-भारत के पुराने दस्तावेजों में जब पलाश के जंगलों की बहुतायात थी तब पक्षियों में तोतो की अत्यधिक तादाद का जिक्र मिलता है, साथ ही अन्य कई खतरे में पड़ी पक्षी प्रजातियों का जो आशियाना बनाती थी इन वृक्षों पर।

लखीमपुर खीरी में गदर के वक्त पलाश के जंगलों में विद्रोहियों ने अग्रेजों को कैद कर रखा था, खीरी (मोहम्मदी) जनपद के सहायक डिप्टी कमिश्नर कैप्टन पैट्रिक ओर के पत्रों में पलाश के घने जंगलों का जिक्र मिलता है। साथ ही मेरे पास अवध की बड़ी रियासत महमूदाबाद के राजा का एक चित्र मौजूद है जो सन १९५५ में उनके ईराक जाने से पहले का है, वह खीरी जनपद के मितौली-मैनहन गांव में रियाया से मिलने आये थे, हाथी पर सवार अपने मुलाजिमों और रियाया के साथ उस चित्र में चारो-तरफ़ पलाश के वृक्ष मौजूद है, किन्तु अब उस जगह पर तमाम इमारतों के सिवा कुछ नही बचा।

हैविटेट बदलने की साथ प्रजातियों में भी फ़ेरबदल हुए, नतीजतन मनुष्य के अतिरिक्त अब यहां प्रकृति की कोई अन्य सुन्दर कृति नही दिखाई देती है....यह भयानक है और चेतावनी भी.....!

एक खूबसूरत फ़ूल की कथा व्यथा...जो शनै: शनै: हमसे दूर हो रहा है।



कृष्ण कुमार मिश्र (लेखक को अपने आस-पास मौजूद प्रकृति की उन कृतियों का लेखा-जोखा तैयार करते रहने की आदत है, जो हमारे सह-जीवी है, और उनके महत्व को बतलाने की मुसलसल कोशिश करते रहने की सनक, ताकि उन्हे सरंक्षित करने का सन्देश हमारे दिलों में पैबस्त हो सके। इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं )

Blossom of Joy


A click by  the author during the visit. The picture depicts the blossoms, river, boating and birds

Blossom of Joy

National Cherry Blossom Festival in Washington, DC


Tired of being inside the house watching the snow, I desperately wanted to go out and feel some fresh air. While the whole America is screaming 'spring is here', we are still witnessing the snow. However, The annual Cherry Blossom Festival came as a blessing in disguise for me. I am used to the busy roads, chaos of people, and lots of social activities, while I was in India.  But its been a couple of months since I moved to the mesmerizing United States of America. The sad thing about this season is, it snows too much and one hardly sees people outside the houses. Its like, the heaps of white mountains everywhere, with carpeted snow on the roads, parks, balconies! 

After hibernating for the whole winter season, I came to know about the Cherry Blossom Festival to be held in Washington DC.  I could not stop my temptation for it and went there to witness it. I realized how beautiful nature can be. With high rise buildings, a flowing river and flying birds, the site of cherry blossom festival is just feast for eyes. I understood the importance of hibernating for few months and then getting exposed to awesomeness.


Cherry blossom
What is cherry blossom Festival?

Cherry Blossom Festival is an annual two week festival that begins on the last Saturday of March and ends in a fortnight. It symbolises the start of spring Nation wide. The festival is celebrated in the Nation capitol, Washington DC. Events like blossom Kite festival, sushi/sake celebrations, classes about cherry blossoms, bike tour of tidal basins, exhibits of photography, sculpture, animation, and various cultural performances, rakugo, kimono fashions shows, dance, singing, martial arts, rugby union tournament and many are held. 

If you are wondering why you are listening to few Japanese words, let me tell you one interesting point about cherry blossoms.The Cherry blossoms stands for the blossoming of cherry trees.These cherry trees were gifted by Japan to United States in the year 1912. A total of 3020 trees of 12 varieties were imported from Japan and were planted in the avenues in Washington DC. But the roots of spreading cherry trees go back to early 19th century. However, In a ceremony on March 27, 1912, First Lady Helen Herron Taft and Viscountess Chinda, wife of the Japanese ambassador, planted the first two of these trees on the north bank of the Tidal Basin in West Potomac Park. So, the Japanese influence is still visible during the Cherry blossom festival.

visitors enjoying the cultural Performances
It was fun to see people from different cultures, ethnics and countries at one place and enjoying the beauty. Now talking about the events, let me tell you that the fun doesn't stop with rugby union. Other events like 10 mile run, arts and performances through out the fortnight, cultural exchange and fire works also take place. The most awaited event is the Sakura Matsuri-Japanese Street Festival, the largest Japanese Cultural Festival in the United States. It is witnessed by herds of people every year. I myself was stuck in traffic jam amidst thousands of enthusiastic tourists sprawling to witness the blossom. It is believed that annually more than 700,000 people visit Washington DC to witness the festival. I am lucky to be one of them this year.

Next time, when you plan to visit USA, make sure your trip falls during the Cherry Blossom Festival, for it is one of its kind and a-never-miss opportunity in lifetime. 




Swathi Karamcheti

Swathi Karamcheti is an enthusiastic journalist who is aiming at changing the face of News. Since childhood, Swathi has been a leader and a winner in academics. An MPhil graduate from a reputed B-School in India and a Silver Medalist, her ambition has been clear and has been successful in achieving everything that she wanted.  She was chosen as a youngleader by UNDP twice and represented her nation, India, in various conferences and seminars. She is a writer, producer, onscreen presenter and an orator, who is confident about what she does. People call her a walking encyclopedia and a knowledge sharer. She was always rewarded with promotions and incentives at her work place and is still applauded by the organization she worked with. She is now pursuing PhD in Development Media and is looking forward to bring awareness in the world through her programs and promos. She may be reached at swathikaramcheti@gmail.com

Apr 12, 2011

मंगल पाण्डे के बलिदान दिवस पर पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने वालों को मिला सम्मान

 अमर शहीद मंगल पाण्डे बलिदान दिवस 8 अप्रैल 2011 
1-   तो फिर देश को चाहिये एक और मंगल पाण्डे 
2-   क्रान्तिकारी पाण्डे की लम्बाई थीं 9 फुट 2.5 इंच 
3-  आशीष सागर को मिला बुन्देखण्ड सूचना अधिकार व पर्यावरण संरक्षण एवार्ड

बांदा ब्यूरो - अमर शहीद मंगल पाण्डे के बलिदान दिवस पर आज एक दिवसीय राष्ट्रीय विचार गोष्ठी का आयोजन जनपद में आयोजित किया गया। अमर शहीद मंगल पाण्डे 154वी पुन्य तिथि पर होटल सारंग बैंकेट हॉल सभागार में इस राष्ट्रवादी विचार गोष्ठी का आयोजन देश प्रदेश के प्रबुद्ध समाज सेवियों एवं गणमान्य नागरिकों के साथ-साथ चित्रकूट धाम मण्डल बांदा के उप पुलिस महानिरीक्षक श्री एस0के0 माथुर के विशिष्ट आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली से आये हुए वरिष्ठ समाज सेवी एवं गांधी वादी मार्गदर्शक श्री एस0के0 राय द्वारा किया गया। अन्य प्रमुख उपस्थित जनों में डॉ0 कुलदीप प्रोफेसर गुरू तेगबहादुर मेडिकल कालेज दिल्ली, राजीव देश पाण्डे निदेशक बैंक ऑफ महाराष्ट्र, नगर पालिका अध्यक्ष राजकुमार राज ने मंच में विशिष्ट अतिथि की भूमिका निभाई। मंच का संचालन कार्यक्रम संयोजक श्री उमाशंकर पाण्डे, अमर शहीद क्रान्तिकारी मंगल पाण्डे फाउण्डेशन द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत अतिथियों के परिचय सत्र से की गयी। तत्पश्चात् क्रान्तिकारी मंगल पाण्डे की अमर प्रतिमा पर पुष्प माला पहनाकर मण्डल के उप पुलिस महानिरीक्षक श्री एस0के0 माथुर ने श्रद्धांजलि अर्पित की। अन्य प्रबुद्धजनों व अतिथियों ने 21 दीप प्रज्जवलित कर मंगल पाण्डे को भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम के अगले सत्र में उप पुलिस महानिरीक्षक एस0के0 माथुर द्वारा शहीद मंगल पाण्डे के सन्दर्भ में कहा गया कि क्रान्ति क्रान्तिकारियों के दिल में पैदा हुई और वह चिंगारी भड़काने का काम देश के पहले क्रान्तिकारी 1857 के वीर योद्धा मंगल पाण्डे द्वारा शुरू की गयी। जिसने न सिर्फ ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ फंेकने के अध्याय की प्रथम शुरूआत की बल्कि भारत में और सैकड़ों क्रान्तिकारी खुद बलिदान होकर तैयार कर दिये। आज फिर चौतरफा देश भ्रष्टाचार, जातिवाद, आतंकवाद जैसी समस्याओं से घिरा है और कहीं न कहीं मंगल पाण्डे जैसे वीरों की युवाओं के बीच आवश्यकता है। हमे अपने बच्चों व युवा पीढ़ी के अन्दर राष्ट्रवाद की भावना पैदा करनी होगी। सेवा सबसे कठिन कार्य है अच्छा करने वाले कार्यकर्ताआंे को आलोचनाओं से डरना नहीं चाहिऐ अपना कार्य राष्ट्रहित में आगे बढ़ाते रहना चाहिऐ। 


  श्री डी0आई0जी0माथुर ने कहा कि मंगल पाण्डे के पूरे खानदान को अंग्रेजों ने जिन्दा जला दिया था। मंगल पाण्डे जैसा राष्ट्रभक्त जिसने यह जानते हुए कि मेरी फांसी होगी उन अंग्रेजों से लोहा लिया जिनके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था। आज पुनः देश को प्रगति के रास्ते पे ले जाने के लिये हमे मिलकर विवेक से सोंचकर राष्ट्र के उत्थान के लिये कार्य करना होगा। देश प्रेम से बड़ा कुछ नहीं है।

    राजीव देश पाण्डे ने अपने सम्बोधन में कहा कि ऐसे क्रान्तिकारियों के आयोजन से समाज को एक नई सोंच और दिशा मिलती है। दिल्ली से आये डॉ0 कुलदीप ने कहा कि मंगल पाण्डे एक व्यक्ति नहीं एक विचाराधारा थी और उसके अनुपालन की अब एक बार फिर नितान्त आवश्यकता है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए उमाशंकर पाण्डे ने कहा कि विश्व मानव के विकास का मार्ग ऐसे अमर बलिदानियों के द्वारा प्रशस्त होता है। जिन्होंने कभी कुछ अपने लिये सोंचा ही नहीं। गौरतलब है कि मंगल पाण्डे भारत का एक मात्र ऐसा क्रान्तिकारी था जिसकी लम्बाई 9 फुट 2.5 इंच थी। इस बात का खुलासा लेखक अमृतलाल नागर की पुस्तक गदर के फूल में किया गया है और इस व्यक्ति के परिवार को बेरहमी के साथ ब्रिटिश अधिकारियों ने मौत के हवाले कर दिया था।

कार्यक्रम के दौरान डी0आई0जी0 बांदा एस0के0 माथुर एवं अन्य के द्वारा बुन्देलखण्ड के कर्मवीर बनकर विशिष्ट क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों का सम्मान किया गया जिनमें सर्वप्रथम योगगुरू श्री प्रकाश साहू, शूटर रामेन्द्र शर्मा, सूचना अधिकार एवं पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले आशीष सागर, पानी के प्रहरी सुरेश रैकवार, बाल गोविन्द त्रिपाठी, अनवर भाई, अनीष चौरसिया, शनि कुमार (साइंस रिसर्च क्लब), डॉ0 विमला शर्मा (सी0एम0एस0 बांदा), बुन्देलखण्डी लोककला संरक्षक रमेश पाल को स्मृति चिन्ह एवं सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री एस0के0 राय ने अपने उद्बोधन में बताया कि इस समय वे देश की दस हजार स्वैच्छिक संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनमें से मंगल फाउण्डेशन एक है और वह बुन्देलखण्ड के प्रत्येक गरीब नागरिक को आत्मनिर्भर बनते हुए देखना चाहते हैं। कार्यक्रम में इस अवसर पर पंकज सिंह परिहार महोबा, कृपाशंकर दुबे, शशांक शुक्ल, राजेश पाण्डे, बालकृष्ण पाण्डे, शिवेन्द्र तिवारी, अरूण निगम, लोकेन्द्र सिंह, आदित्य सिंह, उदय भान पाण्डेय, इम्त्याज खान, राधाकृष्ण बंदेली, सलीम बांदवी, बाबूलाल गुप्ता, लालू दुबे, , प्रेम प्रकाश शुक्ल, अजीत सिंह दिल्ली, कैप्टन सूर्यप्रकाश, प्रोफोसर बाबूलाल शर्मा, के0के0 भारती, संजय गुप्ता सहित शहर के गणमान्य जन के बीच कु0 लक्ष्मी पाण्डे के गीत एवं पूर्व सांसद भीष्मदेव दुबे को एक मिनट का मौन के बाद कार्यक्रम की समाप्ति हुई ।

.........अमर शहीद क्रान्तिकारी
मंगल पाण्डे फाउण्डेशन, बांदा

वन विभाग की गुलामी से आजाद हुए सुरमा व गोलवोझी के थारू



सुरमा एवं गोलवोझी (दुधवा-खीरी) से देवेन्द्र प्रकाश मिश्र की रिपोर्ट

जिलाधिकारी समीर वर्मा ने वनाधिकार कानून के तहत सूरमा ग्राम के 289 निवासियों को उनकी जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र देकर इतिहास रच दिया। सूरमा हिन्दुस्तान का पहला ग्राम वन गया है जिसे नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व क्षेत्र के बीच में आबाद होने के बावजूद वनाधिकार कानून का लाभ दिया गया है।
दुधवा नेशनल पार्क के मध्य आबाद ग्राम सूरमा में आयोजित किए गए शिविर में जिलाधिकारी समीर वर्मा ने केन्द सरकार के ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 के तहत 289 थारू परिवारों को उनके घर, खेत और खलिहान के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र दिया। श्री वर्मा ने सवसे पहले घुरका को प्रमाण पत्र दिया तो पूरा पंडल तालियों की गड़गड़ाहट से मुंज उठा। इसके वाद डीएम ने वेचेराम, श्रीमती रूपा देवी, सतीश कुमार, पिरथी, विल्लो फत्ते आदिको प्रमाण पत्र देते हुए कहा कि प्रयास करके एक साल के भीतर वनाधिकार कानून को लागू कराया गया है। उन्होंने कहा कि प्रमाण पत्र ठीक तरह से देख ले अगर कोई त्रुटि है तो वतादे उसे ठीक करा दिया जाएगा। श्री वर्मा ने सभी से वन एवं वन्यजीव संरक्षण व सुरक्षा में पूरा सहयोग दिए जाने की अपील की। उन्होंने वताया कि सूरमा ग्राम अम्वेडकर ग्राम विकास योजना में चयनित है शीघ्र ही विकास के कार्य शुरू कराए जाएगें। डीएम समीर वर्मा ने ग्राम सूरमा में 289 थारू परिवारों को 625,477 हेक्टैयर वन भूमि के मालिकाना हक के अधिकार पत्र दिए। इसमें आवास के लिए 32,637 हेक्टैयर एवं कुषि हेतु 592,84 हेक्टैयर जमीन के अधिकार पत्र अिए गए हैं। डीएम समीर वर्मा ने वताया कि दिए गए अधिकार पत्रों के अनुसार जमीन को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर दिया गया है। 23 साल की लम्वी लड़ाई लड़ने के बाद मिली सफलता के वाद सूरमावासियों में खुशी की लहर दौड़ गई है। सूरमा को आजाद कराने की लड़ाई में अग्रणी भूमिका में रहे राष्ट्ीय वन जन श्रमजीवी मंच के कार्यकर्ता रजनीश ने इसे सत्य की जीत बताते हुए डीएम समीर वर्मा एवं जिला समाज कल्याण अधिकारी राजेश कुमार आदि के प्रति आभार जताया। वनाधिकार राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य रामचन्द्र राना ने कहा कि जबतक सूरमा के सभी लागों को उनका अधिकार नहीं मिल जाता है संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि अव बन विभाग द्वारा किए जाने वाले उत्पीडन और शोषण का करारा जवाव दिया जाएगा।

दुधवा नेशनल पार्क की उत्तर सोनारीपुर वनरेंज के जंगल में आवाद ग्राम गोलवोझी में शिविर लगाकर डीएम समीर वर्मा ने जिले में इतिहास बनाते हुए अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 के तहत थारू परिवारों को उनके मालिकाना हक का अधिकार पत्र दिए। गोलवोझी में वितरित किए कुल 58 अधिकार पत्र के तहत 47,842 हेक्टैयर जमीन परउनको मालिकाना हक दिया गया है। इसमें आवास के लिए 3,588 हेक्टेयर तथा कृषि की 40,245 हेक्टेयर वन भूमि पर मालिकाना हक दिया गया है। डीएम समीर वर्मा ने कहा कि सामुदायिक अधिकारों के लिए शीघ्र ही दावा फार्म भरवाए जाएगें। उन्होंने थारूजनों से वन एवं वंयजीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण के कार्यो में सक्रिय सहयोग दिए जाने की अपील की। अधिकार पत्र मिल जाने के बाद घने जंगल के बीच बेवशी वाला जीवन गुजारने वाले थारू परिवारों के लिए नए युग की शुरूआत का सूरज उदय हुआ है।  अधिकार पत्रों पर राज्य सरकार की ओर से जिलाधिकारी समीर वर्मा, जिला समाज कल्याण अधिकारी राजेश कुमार, दुधवा नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर संजय पाठक ने हस्ताक्षर किए हैं। शिविर में एसडीएम अृतलाल शाहू, सीओ विवेक चन्द्रा, दुधवा पार्क वार्डन ईश्वर दयाल, बीडीओ नागेन्द्र मोहन त्रियाठी, तहसीलदार अशोक कुमार, नायव तहसीलदार केपी सिंह, जिला सूचना उप निदेशक आईए मसूदी एटीएस के अधीक्षक यूके सिह आदि अधिकारी उपस्थित रहे।

दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन के लिए 08 अप्रैल 2011 का दिन जहां काला अध्याय साबित हुआ वहीं थारूग्राम सूरमा आजाद हो गया, गोलबोझी के थारूओं का बनभूमि पर मालिकाना हक के अधिकार पत्र मिल गए। इसके चलते बनाधिकार कानून को लागू करने में अड़ंगा डालने वाले दुधवा के अधिकारियों के प्रयासों को करारा झटका लगा है। जबकि बनाधिकार कानून के तहत मिली विजय पर पूरे थारूक्षेत्र में खुशी का माहौल है और क्षेत्रवासी दीवाली मना रहे हैं।

आदिवासी जनजाति थारूक्षेत्र में आबाद ग्राम सूरमा देश का पहला ग्राम बन गया जो नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बसे होने के बाद भी उसे बनाधिकार कानून का लाभ मिला और सूरमा में आबाद 340 दावेदारों में से 289 थारूओं को वनभूमि पर मालिकाना हक मिल गया है। हालांकि थारूओं को यह सफलता एक लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद मिली है। वर्षों से भारत-नेपाल सीमावर्ती जंगल के बीच आवाद थारू ग्राम सूरमा को 1978 में जब थारू क्षेत्र के 37 ग्रामों में से 35 ग्राम राजस्व में शामिल कर लिए गए तव उसे यह कहकर राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं दिया गया कि यह दुधवा नेशनल पार्क की सीमा के भीतर है। इसी श्रेणी में गोलबोझी को भी शामिल कर लिया गया। सन् 1980 में सूरमा गाम के लोग अपना हक पाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 23 साल तक चली कानूनी दावपेंचों की लड़ाई में हाईकोर्ट ने सन् 2003 में सूरमावासियों के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। इस पर दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने सूरमा को उजाड़ने के लिए तमाम असफल प्रयास किए। इस बीच सन् 2008 में केन्द सरकार ने ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 लागू कर दिया। इस ऐतिहासिक वनाधिकार कानून को लागू करने में दुधवा पार्क प्रशासन लगातार अड़गे डालता रहा। सूरमावासियों का उनका हक दिलाने के लिए राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच व उसके स्थानीय घटक संगठन थारू आदिवासी महिला किसान मंच ने सन् 2002 में सघर्ष की राह पकड़ी और वनाधिकार पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। इसमें सरकार द्वारा गठित वनाधिकार राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य रामचन्द्र राना ने थारू क्षेत्र की समस्याओं एव वन विभाग द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न को प्रमुखता से शासन तक पहुंचाया जिसका परिणाम यह निकला कि शासन के निर्देश पर वनाधिकार कानून के तहत सूरमा एवं गोलबोझी के निवासियो के वनभूमि पर मालिकाना हक देने के लिए पिछले साल दावा फार्म भरे गए। जांच पड़ताल की प्रक्रिया के वाद आज आठ अप्रैल को सूरमावासियों को वनभूमि पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद सूरमा वन विभाग की गुलामी से आजाद हो गया है। इसके साथ ही वनाधिकार की लड़ाई में साथ रहे थारू ग्राम गोलबोझी के निवासियों को को भी जमीन का मालिकाना हक मिल गया है। मालूम हो कि वनभूमि में रहने के कारण सूरमा एवं गोलबोझी ग्राम के निवासियों को सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का न लाभ मिल रहा था और न ही गांव में सरकारी स्कूल खुल सके थे। यहां तक गांव के निवासी पक्का घर नहीं वना सकते थे। इसके कारण इन गावों के सैकड़ो परिवार आजाद भारत में गुलामी वाला नारकीय जीवन गुजारने को विवश थे। घर, खलिहान, खेत की जमीन पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद आज से सूरमा व गोलवोझी में आजादी का नया सूरज उदय हो गया है। वनाधिकार कानून कानून के हथियार से मिली सफलता को लेकर पूरे थारू क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है थारू इस जीत की खुशी में थारू क्षेत्र में दीवाली मनाई जा रही है। जबकि दुधवा पार्क प्रशासन के हौसले पस्त हैं।

क्या है वनाधिकार कानून-
अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं 2007 के तहत वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी को काबिज भूमि पर खेती का अधिकार, सामुदायिक अधिकार चाहे किसी नाम से ज्ञात हो इसमें राजाओं एवं जमींदारों के दौरान प्रयुक्त अधिकार शामिल हैं, गौण वन उत्पाद, चारागाहों, जलाशयों, गृह और आवास तथा कोई ऐसा पारम्परिक अधिकार जिसका यथास्थिति, वन निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों या अयं परम्परागत वन निवासियों द्वारा रूढ़िगत रूप से उपयोग किया जा रहा हो। कानून में सबसे महत्वूपर्ण अधिकर यह है भी है कि जो अनुसूचित जनजातियों और अयं परम्परागत वन निवासियों के 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व किसी भी प्रकार की वन भूमि से पुर्नवास के वैध हक प्राप्त किए बिना अवैध रूप से बेदखल या विस्थापित किया गया हो उसे वनाधिकार का लाभ देने का प्राविधान अधिनियम में दिया गया है। जिसका खुला उल्लंघन दुधवा नेशनल पार्क के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है।



क्या हैं केन्द्र और प्रदेश सरकार के शासनादेश
वनाधिकार कानून लागू किए जाने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के पत्र फाइल संख्या 7-12/2010 दिनांक 21-06-2010 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 की धरा 02 (ख) के अंतर्गत राष्ट्रीयय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने का आदेश दिया गया है। इसी आदेश के क्रम में उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (वन अनुभाग 2) के पत्र संख्या 273/14-2-2010 दिनांक 11-10-2010 के शासनादेश में कहा गया है कि राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने हेतु कार्यवाही की जानी है। पुनर्स्थापना के पूर्व राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में अधिकारों से सम्वंधित सभी औपचारिकताएं पूरी करने तक कोई बेदखली एवं पुनर्स्थापना अनुमन्य नहीं है। केन्द्र और प्रदेश की सरकार जहां वनाधिकार कानून को लागू करवाने में गंभीर है वहीं दुधवा के अधिकारी शासनादेशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं और वनाधिकार कानून को लागू करवाने में अड़ंगे डालकर थारूओं के साथ अन्य परम्परागत वन निवासियों को उजाड़ने की साजिश जरूर कर रहें हैं। इसके कारण पूरे थारू क्षेत्र के निवासियों में रोष फैल गया है।

 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र, (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, मौजूदा वक्त में हिन्दुस्तान दैनिक के पलिया में संवाददाता, वन्य-जीव सरंक्षण पर लेखन, अमर उजाला में कई वर्षों तक पत्रकारिता, आप पलिया से ब्लैक टाइगर नाम का अखबार निकाल रहे हैं, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। )

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था