International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Oct 19, 2018

झुंड से रास्ता भटक कर अल्हागंज में आ गया डेमोइसेल क्रेन


=पक्षी के पैर में कैमरा डिवाइस भी लगी है, उसे देखने को लग रही भीड़
=पक्षी के एक पैर में दो छल्ले पड़े हैं, दूसरे पैर में ट्रैकिंग डिवाइस लगी है

फोटो परिचय : शाहजहांपुर के अल्हागंज में बुधवार को पकड़े जाने के बाद डेमोइसेल क्रेन पक्षी का वन विभाग की टीम ने इलाज किया। 
यूपी के शाहजहांपुर जिले के छोटे से कस्बे अल्हागंज में एक डेमोइसेल क्रेन पक्षी अपने झुंड से अलग होकर आ गया है। यह साइबेरियन पक्षी है, जिसे स्थानीय भाषा में कुरंजा पक्षी भी कहा जाता है। हमेशा यह पक्षी 50-100 पक्षियों के ग्रुप में रहता है। जानकार बताते हैं कि अगर यह पक्षी अकेला है तो यह निश्चित तौर पर ग्रुप से अलग होकर रास्ता भटक गया है। इस पक्षी के एक पैर में डिवाइस लगी है, यह माइक्रो कैमरा भी हो सकता है। दूसरे पैर में दो छल्ले पड़े हैं। अल्हागंज निवासी नरेंद्र राघव ने बताया कि ऐसा लगता है कि पक्षी को उड़ने में दिक्कत हो रही है, वह 50-100 मीटर ही उड़ पा रहा है। 

अल्हागंज के विवेकानंद इंटर कालेज के खेल मैदान में मंगलवार सुबह कुछ लोगों ने पक्षी को दाना चुगते देखा था। चूंकि पक्षी पैरों में डिवाइस और रिंग पड़े थे, इसलिए लोगों की इस पक्षी में दिलचस्पी बढ़ गई। पक्षी को देखने वालों की भीड़ लग गई। मंगलवार को जब भीड़ बढ़ी तो पक्षी डर के कारण उड़ कर कहीं चला गया। पर दूसरे दिन बुधवार यानी 17 अक्टूबर 2018 की सुबह पक्षी दुबारा से विवेकानंद इंटर कालेज के खेल मैदान में आकर बैठ गया। उसे देखने के लिए फिर भीड़ लग गई। कुछ देर के बाद पक्षी फिर उड़ गया। पक्षी ज्यादा उड़ नहीं पा रहा है। वह मैदान के 100-150 मीटर के दायरे में ही देखा जा रहा है। पक्षी के पैर में कुछ परेशानी है। पक्षी बार-बार अपने उस पैर को उठा लेता है, जिसमें डिवाइस लगी है। डिवाइस पर टी-7 लिखा हुआ है। अल्हागंज में कुछ दिन पूर्व भी ऐसा ही एक पक्षी देखने को मिला था, परंतु वह उड़ गया था। पक्षी के पैरो में डिवाइस लगे होने के चलते कुछ लोगों ने पुलिस को 100 नंबर पर फोन किया था। पुलिस के पहुंचने से पहले ही क्षी अल्हागंज के फतेहपुर गांव की ओर उड़ गया। 
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जोधपुर और बीकानेर के गांवों में अधिक जाते हैं यह पक्षी
=पक्षियों पर शोध करने वाले लखीमपुर खीरी के निवासी केके मिश्रा ने बताया कि यह पक्षी साइबेरियन है। इसे डेमोइसेल क्रेन कहते हैं। उन्होंने बताया कि वल्र्ड वॉचर आर्गनाइजेशन इन पक्षियों के पैरों में डिवाइस लगा कर हमें इन्हें लोकेट करती रहती हैं। डिवाइस के जरिए ही पक्षियों के माइग्रेशन और रूट का पता लगता है। डेमोइसेल क्रेन पक्षी के बारे में यह जानकारी मिली है कि यह पक्षी राजस्थान के बीकानेर, जोधपुर के गांवों के तालाबों पर पानी पीने आते हैं। साइबेरिया से ईरान, अफगानिस्तान देशों से यह भारत आते हैं। डेमोइसेल क्रेन पक्षी छापर तालाब और घाना पक्षी विहार में ज्यादा आते हैं। केके मिश्रा बताते हैं कि अभी कुछ समय पहले यह डेमोइसेल क्रेन पक्षी लखीमपुर खीरी के भीरा इलाके में भी देखे गए थे। तब उन्होंने इन पक्षियों की तस्वीरें भी ली थीं। केके मिश्रा ने तस्वीरों को देखकर बताया कि अल्हागंज में जो डेमोइसल क्रेन पक्षी देखने को मिला है, उसके पैर में लगाई गई डिवाइस का वजन ज्यादा अधिक लग रहा है, इससे उसे दिक्कत लग रही है। 
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लखनऊ में प्राणी उद्यान भेजा जाएगा डोमाईजेल क्रेन पक्षी 
शाहजहांपुर। हिन्दुस्तान संवाद 
अल्हागंज में घायल अवस्था में मिले पक्षी का नाम डेमोइसेल क्रेन है, जोकि यूरो एशिया में पाया जाता है। उसके गले में पड़ी एल्यूमिनियम की रिंग पर एक नंबर पड़ा हुआ है। यह नंबर उसका कंट्री कोड बताता है। जिसे कैमरा कहा जा रहा है वह पीटीटी है, जिसका काम पक्षी का टै्रक रिकार्ड करना है। पक्षी किस दिशा व ऊंचाई पर इसकी जानकारी इस पीटीटी से पता चलती है। इसके साथ ही काले रंग का एक सोलर पैनल लगा है। जिससे टै्रक रिकार्डर चार्ज होता है। डीएफओ गोपाल ओझा ने कहा कि यह विदेशी पक्षी है, जो हमारे देश में मेहमान के रूप में आते हैं। शाहजहांपुर में इन पक्षियों के आना अच्छी बात है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वह प्रवासी पक्षियों को किसी तरह की हानि न पहुंचाएं। अल्हागंज में घायल पक्षी पक्षी का इलाज चल रहा है। जिसे कल दोपहर को फिर से डॉक्टर को दिखाया जाएगा। इसके बाद उसे लखनऊ में चिड़ियाघर के डायरेक्टर के पास भेज दिया जाएगा। जहां प्राणी उद्यान के अस्पताल में उसका उपचार चलेगा। 



रिपोर्ट: विवेक सेंगर - ब्यूरो प्रमुख हिन्दुस्तान, शाहजहांपुर 
साभार: हिन्दुस्तान-बरेली 

Oct 14, 2018

सरकार कर रही एनसीएपी को लागू करने में देरी, लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतराः ग्रीनपीस इंडिया

photo courtesy: Greenpeace India 

वायु प्रदूषण से निपटने के लिये 102 शहरों में से सिर्फ 36 शहरों की कार्ययोजना तैयार
नई दिल्ली। 12 अक्टूबर 2018। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 8 अक्टूबर 2018 को केन्द्र के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) को अधिसूचित करने की प्रस्तावना पर आयी एक अखबार की रिपोर्ट के बाद आत्म संज्ञान लेते हुए केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलकर तय समय-सीमा के भीतर योजना बनाकर पूरे देश में वायु प्रदूषण को राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक के अंदर लाने के लिये कहा है। ग्रीनपीस इंडिया उम्मीद करती है कि एनजीटी के इस आदेश के बाद जल्द ही एनसीएपी को अधिसूचित किया जायेगा।


ग्रीनपीस इंडिया के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया कहते हैं, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अदालत को योजना बनाने से लेकर उसे लागू करने तक हर कदम पर हस्तक्षेप करके यह सुनिश्चित करना पड़ रहा है कि लोगों के हितों की रक्षा हो। क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह बिना कोर्ट के हस्तक्षेप के नीतियों को लागू करे?”


सुनील आगे कहते हैं, “हम लोग देख रहे हैं कि सरकार लगातार पर्यावरण से जुड़े कानून कमजोर करके और प्रदूषण फैलाने वाले कंपनियों के हित में नीतियों में बदलाव कर रही है।”


आम लोगों और मीडिया के काफी दबाव के बाद पर्यावरण मंत्रालय ने अप्रैल में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के ड्राफ्ट को लोगों की प्रतिक्रिया के लिये अपने बेवसाइट पर सार्वजनिक किया था। लेकिन पांच महीने बीत जाने के बावजूद अभी तक कार्यक्रम को लागू नहीं किया जा सका है। वायु प्रदूषण की खराब स्थिति पर सवाल उठाने पर राज्य और केन्द्र सरकार एक-दूसरे पर उंगली उठाने लगते हैं। दूसरी तरफ पर्यावरण मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय दोनों ही प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक ईकाईयों और थर्मल पावर प्लांट के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। दोनों ने मिलकर थर्मल पावर प्लांट के लिये जारी उत्सर्जन मानकों को लागू करने की समय सीमा को पांच साल और बढ़ाने की अनुमति दे दी।

एनजीटी ने 8 अक्टूबर 2018 को अपने आदेश में कहा है कि एनसीएपी को अंतिम प्रारुप देने में थोड़ी प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी वर्तमान वायु प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए इस कार्यक्रम को लागू करने की गति बेहद धीमी है। एनजीटी ने ऑब्जर्व किया है कि 102 शहरों में से सिर्फ 73 शहरों की कार्ययोजना ही जमा हो सकी है। इसमें से भी 36 शहरों की ही कार्ययोजना तैयार है, 37 शहरों की योजना अभी भी अपूर्ण है और 29 शहरों ने अभी तक अपना कार्ययोजना जमा ही नहीं किया है। (सितंबर 2018 तक)। एनजीटी ने आदेश में इस बात को साफ-साफ कहा गया है कि वाहनों की संख्या को, औद्योगिक ईकाईयों के प्रदूषण को नियंत्रित करने  और वायु गुणवत्ता को मानकों के भीतर लाने की तत्काल जरुरत है।


सुनील कहते हैं, “यह जानना सुखद है कि पर्यावरण मंत्री वायु प्रदूषण की वजह से देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि खराब होने को लेकर चिंतित हैं लेकिन यह चिंता तब तक ठोस नहीं मानी जायेगी जब तक कि एनसीएपी को योजनाबद्ध तरीके से तत्काल लागू नहीं किया जाए । यह निराशाजनक है कि पर्यावरण मंत्री आराम से अपनी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल दे रहे हैं और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को लागू करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। उनके दावों के हिसाब से एनसीएपी को बहुत पहले लागू हो जाना चाहिए था। बहुत सारे खबरों के हिसाब से इसकी समय सीमा 5 जून और 15 अगस्त 2018 ही तय था।”


अब केन्द्र सरकार को एनसीएपी में सारे राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों द्वारा तैयार कार्ययोजना को मिलाकर उसे लागू करना होगा। इसके लिये पर्याप्त बजट भी आंवटित करना होगा। ग्रीनपीस इंडिया उम्मीद करती है कि एनजीटी के हस्तक्षेप के बाद जल्द ही केन्द्र सरकार इस कार्यक्रम को लागू करने की दिशा में पहल करेगी और देशभर में वायु प्रदूषण की वजह से लोगों के स्वास्थ्य पर उतपन्न खतरा कम होगा।

Avinash Kumar, Senior Media Specialist,  avinash.kumar@greenpeace.org

Oct 12, 2018

दुधवा में तीन हजार तोते बरामद, तीन शिकारी गिरफ्तार


दुधवा जंगल से तीन हजार तोतों का शिकार करने वाले तीन आरोपियों को मुखबिर की सूचना पर पहुंची वन विभाग की टीम ने धर दबोचा। मौके से टीम को तोतों से भरे छह लोहे के पिंजड़े भी मौके से बरामद हुए। सभी आरोपियों को पलिया की सिंगहिया स्थित रेंज लाया गया, जहां से मेडिकल के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। पकड़े गये तीन आरोपियों में दो उत्तराखंड व एक पीलीभीत का निवासी है। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड निदेशक ने बताया कि पलिया वन रेंज के रेंजर दिनेश बडोला को सूचना मिली कि मैलानी रेंज पीलीभीत बस्ती के मार्ग मोहरीना जंगल में कुछ शिकारी तोतों का शिकार कर रहे हैं। सूचना मिलते ही रेंजर दिनेश बडोला वन दरोगा विजेन्दर सिंह, वन रक्षक हरवेन्दर सिंह व आकाश खरवार आदि टीम के साथ मौके के लिये रवाना हो गये।
टीम ने मौके से पहले वाहन को रोक लिया और आरोपियों को पकड़ने के लिये पैदल चल पड़े। टीम को देख शिकारियों ने भागने का प्रयास किया लेकिन उन्हें घेर कर धर दबोचा गया। वन टीम को मौके से लोहे के छह पिंजड़ों में विभिन्न प्रजाति के करीब तीन हजार तोते बरामद हुए। पिंजड़ों में कैद तोतों के साथ तीनों आरोपियों को टीम पलिया वन रेंज ले आई। पूछताछ में आरोपियों ने अपने नाम सन्नी पुत्र जंग बहादुर निवासी जिला पीलीभीत, राकेश पुत्र बलदेव व विल्सन पुत्र रामलाल निवासी मझौला फार्म खटीमा उत्तराखंड का होना बताया है। तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया है

साभार: हिन्दुस्तान, लखीमपुर-बरेली 

वायु प्रदूषण और वनस्पतियाँ



-डाॅ0 दीपक कोहली-

मानव के जीवित रहने के लिए जिस तरह भूमि, जल एवं वायु आवश्यक है, उसी तरह वनस्पतियाॅ और अन्य प्राणी भी जरूरी है। प्राकृतिक जीवन का यह सम्पूर्ण तन्त्र एक विशाल मशीन की भांति है जिसमें छोटे से छोटा पेंच और पुर्जा उसके सुचारू कार्य-संचालन के लिए बड़े अवयवों की भांति ही महत्वपूर्ण है। जरा सी खराबी से सारी मशीन और उसकी प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है। इसी प्रकार प्रकृति का भी हर जीव अर्थात पेड़-पौधे, प्राणी कीट-पतंगे, पक्षी आदि सभी प्रकृति के आवश्यक एवं अपरिहार्य अंग हैं। किसी भी कारण पौधों या प्राणियों को कोई नुकसान पहुॅचता है तो इसके दुष्परिणाम सृष्टि के सारे क्रिया-कलापों में महसूस किये जाते हैं।

वायुमण्डल में पाई जाने वाली समस्त गैसें एक निश्चित अनुपात में होती हैं। कुछ अवांछनीय तत्वों के प्रवेश से इस अनुपात में असन्तुलन आ जाता है तो यह जीवधारियों के लिए घातक हो जती हैं। इस असन्तुलन को ’वायु-प्रदूषण’ की संज्ञा दी गई है। जल और मृदा प्रदूषण की अपेक्षा वायु प्रदूषण विशेष हानिकारक होता है, क्योंकि यह क्षेत्रीय नहीं जोता और कोई भी जीव अधिक समय तक श्वांस लेना रोक नहीं सकता है। मनुष्य एवं जन्तुओं की अपेक्षा वनस्पतियों वायु प्रदूषण के प्रति कई गुना संवेदनशील होती हैं।

पौधों में हानिकारक प्रभाव डालने वाले विषाक्त पदार्थों में सल्फर डाई-आॅक्साइड, नाइट्रोजन डाईआॅसाइड, ओजोन, क्लोरीन, फ्लोरीन, अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाॅइड, परआॅक्सी एसिटल नाइट्रेट प्रमुख हैं। ये सभी प्रदूषक वनस्पतियों के विकास तथा प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में व्यवधान उत्पन्न करते हैं। धूल, धुॅआ सूर्य के प्रकाश को पत्तियों तक पहुॅचने नहीं देते तथा रन्ध्रों को बन्द कर देते हैं। जिस कारण पौधा कार्बन डाई- आक्साइड ग्रहण नहीं कर पाता एवं परिणामस्वरूप प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अवरूद्ध जो जाती है तथा पौधे भोजन की कमी से सूखने एवं नष्ट होने लगते हैं।

प्रदूषक वनस्पतियों को कई प्रकार से क्षति पहुॅचाते हैं जिसमें ऊतक-क्षय, पर्ण-हरित की कमी, पत्तियों को जल्दी झड़ जाना एवं पत्तियों के शीघ्र परिपक्व होने से नीचे की ओर मुड़ना प्रमुख हैं। कोशिकाओं के मर जाने से पत्तियों में ऊतक क्षय के लक्षण प्रदर्शित होते हैं। सल्फर डाईआॅक्साइड, फ्लोराइड, ओजोन, परआॅक्सीएसिटिल नाइट्रेट आदि प्रदूषक सभी प्रकार के हरे ऊतकों को नुकसान पहुॅचाते हैं।
सल्फर डाई आॅक्साइड के प्रभाव से चैड़ी पत्तियों में क्रम रहित, द्विपृष्ठी तथा शिराओं के मध्य में सफेद से लेकर लाल भूस रंग, पर्णहरित की कमी तथा ऊतकक्षय एक साथ देखे जा सकते हैं। नाइट्रोजन डाई आॅक्साइड के कारण भी प्रदूषण अपेक्षाकृत अधिक होने से ऐसे ही लक्षण पैदा होते हैं। इसकी अधिक मात्रा होने पर पत्तियाॅ जल्दी झड़ने लगती है।                                                                                                                                                              

फ्लोराइड प्रदूषण के कारण कुछ विशेष प्रकार के लक्षण दिखायी देते हैं। पत्तियों के किनारे जले हुए से तथा रंग लाल होता है। किनारे के ऊतक क्षतिग्रस्त तथा मरे हुए होते हैं और उनके पास पर्णहरित की कमी भी दिखाई देती है। कुछ पौधों में ऊतकक्षय वाले हिस्से सड़कर गिर जाते हैं। पौधों की पत्तियाॅ छोटी होने लगती हैं। टहनियाॅ फैलने लगती हैं, फल कम लगते हैं और सड़ने भी लगते हैं।
ओजोन से भी पत्तियों पर विशेष प्रकार के लक्षण परिलक्षित होते हैं। ऊपरी सतह पर लाल भूरे रंग के धब्बे और लाल एवं सफेद क्षेत्र बन जाते हैं। द्विपृष्ठी ऊतकक्षय के क्षेत्र भी बनते है और पत्तियाॅ शीघ्र ही परिपक्व हो जाती हैं।  
  परआॅक्सी एसीटल नाइट्रेट से मध्योत्तर कोशिकाएॅ नष्ट हो जाती हैं। पत्तियों की नीचे वाली सतह चमकीली, चाॅदी या ताॅबे के रंग की हो जाती हैं। कुछ में ये लक्षण दोनों पृष्ठों पर होते हैं। पौधे प्रौढ़ होने लगते हैं।
इन लक्षणों के आधार पर वातावरण में प्रदूषक विशेष की उपस्थिति बताई जा सकती है। जलवायु, मृदा, जीव-जन्तु तथ मनुष्य आदि घटकों के असामान्य होने पर भी पौधे कुछ इस प्रकार के लक्षण प्रदर्शित करते हैं जिससे यह कहना कठिन हो जाता है कि क्षति के लक्षण प्रदूषण के कारण ही हैं। इसीलिए प्रदूषण के स्रोत की जानकारी होना आवश्यक हैं पौधों में प्रदूषकों की मात्रा के विश्लेषण के आधार पर प्रदूषकों की उपस्थिति का पता लगाया जा सकता है। केवल क्षति के लक्षणों के आधार पर निर्णय करना गलत हो सकता है।
प्रदूषक पौधों को दो प्रकार से प्रभावित करते हैं- प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष प्रभाव दो प्रकार के होते हैं- तीक्ष्ण और दीर्घकालीन। तीक्ष्ण क्षति वह है जिसमें कोशिका भित्तियाॅॅ असन्तुलित हो जाती हैं जिससे कोशकीय पदार्थ समाप्त हो जाता है और कोशिकायें मर जाती हैं। अधिक प्रदूषण में थोड़ी देर रहने पर ये लक्षण 24 घण्टे के भीतर ही देखे जा सकते हैं।
दीर्घकालीन लक्षण पौधों में सामान्य कोशकीय क्रियाओं के प्रभावित होने पर उत्पन्न होते हैं। पत्तियों में शनैः-शनैः पर्णहरित कम हो जाता है तथा अन्त में वह रंगहीन हो जाती है तथा तीक्ष्ण क्षति जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। पत्तियों का जल्दी झ़ड़ जाना भी दीर्घकालीन लक्षण है, जो अल्प प्रदूषण में अधिक समय तक रहने से भी दिखाई देता है।
अप्रत्यक्ष प्रभावों में पौधों की कार्यकीय तथा जैव रासायनिक क्रियाओं में अवांछनीय परिवर्तन आते हैं जिससे पौधों की वृद्धि और विकास रूक जाता है तथा उत्पादन एवं प्रजनन पर भी प्रभाव पड़ता है। पौधे में अन्य कोई संश्लेषण की क्षमता कम होने लगती है और उपज घट जाती है। पौधों की अन्य कार्यकीय एवं जैव रासायनिक क्रियायें जैसे- श्वसन, वाष्पोत्सर्जन, रन्ध्र क्रियाएं तथा एन्जाइमों पर भी वायु प्रदूषकों का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। परागकणों और पराग नलिका के विकास पर भी सल्फर डाई आक्साइड का बुरा असर पड़ता है।                                                                                                                                                                               
पौधों पर विभिन्न प्रकार के वायु प्रदूषकों का हानिकारक प्रभाव अलग-2 प्रकार का होता है, और पौधों की प्रतिक्रयायें भी भिन्न-भिन्न होती हैंः- 
सल्फर डाई आॅक्साइड, सल्फर युक्त प्राकृतिक संसाधनों जैसे-कोयला और खनिज तेल जलाने से पैदा होती है। ताप-विद्युत केन्द्र, पैट्रोलियम रिफाइनरी तथा खाद कारखाने इसके मुख्य स्रोत हैं। यह पौधों में मुख्यतः रन्ध्रों द्वारा पादप ऊतकों में पहुॅचती है और कोशिका-भित्ति की सतह पर जल सम्पर्क होने पर इससे गन्धक के अम्ल सल्फ्यूरस एसिड तथा सल्फ्यूरिक ऐसिड बन जाते हैं। इसलिए कोशिका रस की अम्लीयता (पीएच मान) बढ़ जाती है। क्लोरोफिल-ए सल्फर डाई आक्साइड के प्रभाव से फीयोडाटीन में बदल जाता है। इस क्रिया को ’फीयोफाइटोनाइजेशन’ कहते हैं जिसमें पर्णहिरित के अणुओं से मैग्नीशियम आयन अलग हो जाते हैं। इससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण की क्षमता नष्ट हो जाती है।

नाइट्रोजन के आॅक्साइडों में नाइट्रिक आक्साइड एवं नाइट्रोजन डाई आक्साइड द्वारा पौधों को सबसे ज्यादा हानि पहुॅचाई जाती है। ये स्वचलित वाहनों एवं रिफाइनरियों से निकलती हैं। नाइट्रोजन डाई आक्साइड में पौधों की कम सान्द्रता मे लम्बे समय तक रहने पर किसी प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं। इनकी अधिक सन्द्रता के कारण थोड़े समय में ही हानि के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं। इसके कारण जीव-द्रव्य भार में 25 प्रतिशत की कमी आ जाती है। नाइट्रोजन डाई आक्साइड की अधिक सान्द्रता के परिणामस्वरूप पौधों की पत्तियों की ऊपरी सतह पानी को सोखकर फूल जाती है तथा कुछ समय पश्चात् ऊतक क्षय हो जाता है। इसके कारण अवांछनीय परिवर्तन आते हैं जिससे पौधों की वृद्धि और विकास रूक जाता है तथा उत्पादन एवं प्रजनन पर भी प्रभाव पड़ता है। पौधों में अन्य कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। प्रयोगों से यह भी ज्ञात हुआ है कि पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्षमता कम होने लगती है और उपज घर जाती है। पौधों की अन्य कार्यकीय एवं जैव रासायनिक क्रियायें जैसे-श्वसन, वाष्पोत्सर्जन, रन्ध्र और पराग नलिका के विकास पर भी सल्फर डाई आक्साइड का बुरा असर पड़ता है।

प्रकाश रासायनिक प्रदूषकों में ओजोन सबसे विषैला प्रदूषक है। प्राथमिक प्रदूषक सूर्य के प्रकाश एवं आद्रता की उपस्थिति में आपस में क्रिया कर ओजोन का निर्माण करते हैं। ओजोन के प्रभाव से पत्तियों के रन्ध्र धीरे-2 बन्द होने लगते हैं और उनके गैस-विनमय पर प्रभाव पड़ता है। रन्ध्र पूर्णतः बन्द होने के पूर्व ही ओजोन की अधिक मात्रा ऊतकों तक पहुॅच जाती है। ओजोन आक्सीकरण की क्षमता अधिक होने से भी पादप क्रियायें प्रभावित होती हैं।  

परआॅक्सीनाइट्रेट द्वितीय प्रदूषक है, जो कि स्वचलित वाहनों द्वारा उत्पन्न प्राथमिक प्रदूषकों के वायुमण्डल में कुछ रासायनिक एवं प्रकाश रासायनिक क्रियाओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। पौधों की पुरानी पत्तियों की अपेक्षा नई पत्तियाॅ इस के प्रति संवेदनशील होती हैं।                                                                                                                                                                                                                     
निलम्बित कणाकार (सस्पेन्डेट पार्टिकल्स) के उत्सर्जन को वनस्पति के सन्दर्भ में हानिकारक नहीं माना जाता है। जब तक कि ये अत्यधिक विषैले न हों तथा इनका अत्यधिक जमाव न हो। स्रोत के निकट सीमेंट फैक्ट्री द्वारा उत्सर्जित क्षारीय कणाकार (एल्केलाइन पार्टिकल्स) पौधों को क्षति पहुॅचाता है। सीमेन्ट के कण पत्तियों के ऊपर मोटी पर्त बना लेते हैं। जिसके कारण प्रकाश के अवशोषण में बाधा पहुॅचती है, परिणामस्वरूप स्टार्च का निर्माण नहीं हो पाता। चूने के कण भी पत्तियों के ऊपर कड़ा आवरण बना लेते है, जिसके कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में बाधा पहुॅचती है और पौधा अपनी क्षमता एवं दृढ़ता खो देता है। इसके अतिरिक्त धूल के कण भी पत्तियों के रन्ध्रों को बन्द कर देते हैं तथा पत्तियों में ऊतक क्षय के लक्षण उत्पन्न हो जाते है। लेड की अधिक मात्रा भी वनस्पतियों को प्रभावित करती है। मार्गों के किनारे पायी जाने वाली वनस्पतियों में लेड की उपस्थिति के लक्षण आसानी से दिखायी पड़ते हैं। गैसीय फ्लोराइड की अपेक्षा कणाकार फ्लोराइड कम हानिकारक होता है। फ्लोराइड कणाकार आसानी से ऊतक में नहीं पहुॅच पाते किन्तु पत्तियों मंे इनका जमाव चरने वाले पशुओं के लिए हानिकारक होता है।     
इस प्रकार स्पष्ट है कि वायु प्रदूषण वनस्पतियों के लिए अत्यन्त घातक है। वनस्पतियों पर पड़ने वाले प्रदूषकों केे प्रतिकूल प्रभाव से मानव जाति भी प्रभावित होती है। प्रदूषकांे से वनस्पतियों की रक्षा करने हेतु प्रदूषक तत्वों को वातावरण में कम से कम किए जाने के अथक प्रयास किए जाने चाहिए। ताकि हम अपनी वानस्पतिक जैव विविधता को संरक्षित कर सकंे।                                                                                        

 डाॅ0 दीपक कोहली- लेखक वन्य जीव सरंक्षण के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश शासन में  उप सचिव के पद पर वन एवं वन्य जीव विभाग में कार्यरत हैं, निवास राजधानी लखनऊ में इनसे आप ईमेल के जरिये deepakkohli64@yahoo.in पर अथवा पत्राचार के माध्यम से 5/104, विपुल खण्ड, गोमती नगर लखनऊ पिन कोड 226010 पर सम्पर्क कर सकते हैं.
         

गिर के जंगलों से दुखद समाचार

      भारत के एकमात्र सिंहों { बब्बर शेरों } के प्रश्रय स्थल गिर के जंगलों से पिछले कुछ दिनों से बहुत ही दुखी कर देने वाले समाचार आ रहे हैं । गिर के जंगलों के एक भाग में रहने वाले 26 सिंहों के एक परिवार में पालतू पशुओं और कुत्तों में होने वाली एक प्राणान्तक बिमारी के वाइरस के संक्रमण से कुछ ही दिनों में उन 26 सिंहों में से 23 कालकलवित हो गये उनमें से केवल अब केेेवल 3 सिंह बचे हैं ,लेकिन अगर समय  रहते उन्हें भी कहीं अन्यत्र स्थानांतरित नहीं किया गया तो उनके भी बचने की सम्भावना कम ही है । 
        मनुष्यजनित कृत्यों ,बढ़ती आबादी ,गरीबी , मनुष्य के हवश , और लालच से वनों के अत्यधिक दोहन की वजह से वनों का क्षेत्रफल लगातार सिकुड़ता जा रहा है , प्रदूषण से प्राकृृृतिक जलश्रोत ,जो वन्य जीवों की प्यास बुझाते थे , वे प्राकृृृतिक जलश्रोत भी अत्यधिक प्रदूषित होने से वन्य जीवों की प्यास बुझाने लायक नहीं रहे । इन कारणों से वन्य जन्तुओं के विचरण क्षेत्र ,भोजन और पानी की समस्या बढ़ती ही जा रही है ,जिससे वन्य प्राणी सघन वन क्षेत्रों से मानव बस्तियों की तरफ आने को बाध्य होते हैं ,जहाँ मनुष्यों द्वारा उनकी जान का खतरा तो रहता ही है ,पालतू पशुओं जैसे कुत्तों ,सूअरों, गाय,बैलों ,भैंसों आदि से भी उनके रोग संक्रमित होने का खतरा बना रहता है । पशु वैज्ञानिकों के अनुसार गिर के उक्त दुखद घटना में भी सिंहों को वही पालतू पशुओं से रोग संक्रमित होने की संभावना है ,जिसमें कुछ ही दिनों में 26 में से 23 सिंहों की अकाल मृत्यु हुई है ।

           पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार आधुनिक मानव द्वारा सम्पूर्ण विश्व के जंगलों  ,नदियों  ,पहाड़ों , प्राकृृृतिक जलश्रोतों का जिस हिसाब से दोहन और प्रदूषण हो रहा है ,अगर इसमें भविष्य में भी कोई सुधार नहीं हुआ तो सम्भव है, उससे 2050 तक इस दुनिया से समस्त वन्य जीवों  का विलुप्त हो जाना निश्चित है । यह स्थिति बहुत ही चिन्तनीय व दुखदाई है । हमारी पृथ्वी , हमारा पर्यावरण और हम सभी जीव-जन्तु ,जिसमें मनुष्य जाति भी सम्मिलित है ,साथ रहकर ही इस पृथ्वी को हर तरह से जैविक विविधताओं से सम्पन्न ,शोभायमान और गुंजायमान बनाए हुए हैं ।

       उस दुनिया की कल्पना करें ,जिसमें सिर्फ मनुष्य अकेला ही जीवित और विचरण करता हो ,उसमें बहुविविध चिड़ियों का गुंजन ,तितलियों की इंद्रधनुषी रंगों की छटा , हरे-भरे स्तेपी में कुलांचे भरते बिभिन्न जातियों के हिरणों के झुंड , जंगलों की हरियाली , श्वेत बर्फ से लदी पहाड़ों की आह्लादित करने वाली दुग्धित धवल चोटियां ,कल-कल करती नदियाँ , पहाड़ों से गिरने वाले श्वेत ,फेनिल झरने , रंग-विरंगे पुष्पों से जगह-जगह आच्छादित मैदान ,पर्वत और घाटियाँ और उस पर विविध रंगों से सज्जित मकरंद चूसतीं तितलियों ,भौंरों और छोटी चिड़ियों के झुंड आदि न रहें ,सभी धीरे -धीरे मनुष्य जनित क्रियाकलापों के दुष्प्रभाव से विलुप्त हो जायें तो इस स्थिति की वीरान पृथ्वी की कल्पना करना भी डरावना लगता है ।

           इसलिए मानव जाति को ,जो इस पृथ्वी का सबसे विकसित प्राणी है , को इस पृथ्वी से इन वन्य जीवों के बसेरों यथा पेड़ों ,वनों ,पहाड़ों ,झीलों ,झरनों ,नदियों ,सपाट मैदानों , समुद्रों आदि के संरक्षण के लिए अपने स्तर पर गंभीर और ईमानदार कोशिश करनी ही चाहिए । अन्यथा प्रकृति ,पर्यावरण के तेजी से क्षरण के साथ-वन्य जीवों का भी विलुप्तिकरण बहुत ही तेजी से हो रहा है , भारत के गिर के जंगलों में बचे हुए सिंहों का एकमुश्त मृत्यु होना इसी की एक कड़ी है ,ज्ञातव्य है कि ये सिंह कभी समस्त भारत भर में विचरण करते थे ।

-निर्मल कुमार शर्मा , ' गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण ' , गाजियाबाद   7-10-18  

Jun 9, 2018

जहरीली हवा से मुक्ति के 13 रास्ते


वायु प्रदूषण से मुक्ति संभवः अमरीकी विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट ने सुझाए वायु प्रदूषण से निपटने के 13 तरीकेअगर सुझाव पर अमल हुआ तो देशभर में 40% कम हो जायेगा वायु प्रदूषण

नई दिल्ली। 30 मई 2018 अमेरिका की लुसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी (एलएसयू) की एक नयी रिपोर्ट में उन 13 उपायों के बारे में बताया गया है जिससे देश में वायु प्रदूषण को 40 फीसदी तक कम किया जा सकता है। साथ हीहर साल होने वाली लाख लोगों को मौत से बचाया जा सकता है। इन 13 उपायों को अपनाकर सर्दियों के समय दिल्ली सहित उत्तर भारत के पीएम 2.5 स्तर को 50 से 60 फीसदी तक कम भी किया जा सकता है।

इस रिपोर्ट में प्रदूषण के विभिन्न कारणों से निपटने के लिये बनी नीतियों का विश्लेषण किया गया है जिसमें थर्मल पावर प्लांट (चालूनिर्माणाधीन और नये पावर प्लांट)मैन्यूफैक्चरिंग उद्योगईंट भट्ठीघरों में इस्तेमाल होने वाले ठोस ईंधनपरिवहनपराली को जलानाकचरा जलानाभवन-निर्माण और डीजल जनरेटर का इस्तेमाल जैसी बातें शामिल हैं।

ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया का कहना है, “हम लोग पहली बार विस्तृत और व्यावहारिक नीतियों को सामने रख रहे हैं जिससे सर्दियों में उत्तर भारत के वायु प्रदूषण को घटाकर आधा कम किया जा सकता है। हम पर्यावरण मंत्रालय से गुजारिश करते हैं कि वे इन उपायों को स्वच्छ वायु के लिये तैयार हो रहे राष्ट्रीय कार्ययोजना में शामिल करे और पावर प्लांट के लिये दिसंबर 15 में अधिसूचित उत्सर्जन मानकों को कठोरता से पालन करे। साथ ही अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कठोर मानकों को लागू करके प्रदूषण नियंत्रित करे।

रिपोर्ट के लेखक होंगलियांग जेंग कहते हैं, “हमारे शोध बताते हैं कि थर्मल पावर प्लांट के उत्सर्जन को कम करकेऔद्योगिक ईकाइयों के उत्सर्जन मानको को मजबूत बनाकर और घरों में कम जिवाश्म ईंधन जलाकर,ईंट भट्टियों को जिग-जैग पद्धति में शिफ्ट करके तथा वाहनों के लिये कठोर उत्सर्जन मानक लागू करके वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है। हालांकि 13 उपायों के साथ-साथ एक व्यापक योजना बनाकर ही वायु प्रदूषण को 40 फीसदी तक कम किया जा सकता है और हर साल होने वाले लाख लोगों की मौत से बचा जा सकता है।


रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले कारकों से निपटने के लिये थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों के कठोर उत्सर्जन मानकों को लागू करने के बाद ही वायु प्रदूषण के स्तर में कमी लायी जा सकती है। इसलिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्ययोजना को मज़बूत बनाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा मांगे गए जन सुझावों के रूप में सीविल सोसाइटी संगठनोंकार्यकर्ताओं,वकीलों और अन्य विशेषज्ञों द्वारा दिये गए सुझावों में भी थर्मल पावर प्लांट के उत्सर्जन मानको को कठोरता से लागू करने की मांग की गयी थी।

सुनील कहते हैं, “एलएसयू के शोघ ने एकबार फिर वही बातें दुहराई है जिसकी मांग देश के लोग बहुत लंबे से समय से कर रहे हैं जिसमें थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों के लिये कठोर उत्सर्जन मानक बनाया जाना भी शामिल है। हालांकि पर्यावरण मंत्रालय लगातार थर्मल पावर प्लांट को उत्सर्जन मानकों के लिये छूट देने की कोशिश में है। दिसंबर 2015 में पर्यावरण मंत्रालय ने थर्मल पावर प्लांट को दो सालों के भीतर उत्सर्जन मानकों को पूरा करने की अधिसूचना जारी की थीजिसे अब वे अवैद्य तरीके से पांच साल और बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के ड्राफ्ट में भी मंत्रालय ने विभिन्न सेक्टरों जैसे थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य को शामिल नहीं किया है।

सुनील अंत में कहते हैं, “इस रिपोर्ट में शामिल नीतियों के विश्लेषण से भारत के स्वच्छ वायु आंदोलन को बड़ी मदद मिलेगी। अगर पर्यावरण मंत्रालय लोगों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है तो उसे जल्द से जल्द राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में क्लीन एयर कलेक्टिव के सुझावों के साथ-साथ एलएसयू द्वारा इस रिपोर्ट में शामिल 13 उपायों को भी शामिल करना चाहिएजिससे सच में भारत की हवा को साफ बनायी जा सके।


For further details-
Avinash Kumar, Greenpeace India, avinash.kumar@greenpeace.org ; +91 8882153664
Sunil Dahiya, Greenpeace India, sdahiya@greenpeace.org; +91 9013673250
Professor Hongliang Zhang, Author of Report- hlzhang@lsu.edu

वानर शिशु के आँसू




                                                                            

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भारत के एक जंगल में बंदरों की एक अनोखी प्रजाति मकाका सिलेंस पाई जाती है। उस प्रजाति के अब अधिकतम लगभग 4000 बन्दर ही रह गए, कहे जाते हैं और वे सब भी विलुप्त होने के कगार पर खड़े है। 

एक दिन एक मदारी उस प्रजाती के नन्हे से बंदर को उठाकर उस जंगल से रवाना हो गया। मदारी ने उस नन्हे वानर को घर न ले जा कर पैसों की तात्कालिक ज़रूरतों के दबाव में शहर के चिड़ियाघर में बेच दिया। चिड़ियाघर में आने के बाद वह वानर घर से बिछड़ने के कारण दुःख और घबराहट में चीखने - चिल्लाने लगा, लेकिन उसका दुःख और दर्द किसी ने नहीं सुना। दूसरी तरफ उस जंगल में नन्हे वानर के परिवार में मातम छाया हुआ था। 

हर चिड़ियाघर में सुबह और शाम दो मीटिंग ही जीवों को खाना खिलाया जाता है। उस चिड़ियाघर में दिन के वक्त रमन जीवों को खाना खिलाता तो रात के वक्त अमित जो की बुज़ुर्ग था वह खाना खिलाता। रमन थोड़ा गड़बड़ आदमी था, वह नन्हे वानर का केला उसे खिलाने के बजाय खुद खा जाता था और वह नन्हा वानर कुछ न कर पाता सिवाय भूखे रहने के। शाम के वक्त जब अमित की बारी आती तो वह उस नन्हे वानर को केला खिलाने जाता था। उस वानर को देखते ही वह चकित सा रह जाता था, वह देखता था की नन्हे वानर का हाल अधमरा सा होता जा रहा है। वह देखते ही समझ गया की इस नन्हे वानर के खाने में ज़रूर कोई लापरवाही की जा रही है। वह उसे सारा केला खिला दिया और नन्हे वानर को अमित अच्छा लगने लगा था क्योंकि अमित ने उसे सारा केला खिला दिया और अब वह नन्हा वानर ठीक लग रहा था लेकिन उस नन्हे वानर का हाल बेहाल देखकर अमित का मन आत्मग्लानि से भरा पड़ा था। वह सोच रहा था की “हम इंसान कैसे होते जा रहे हैं, जीवों का खाना भी नहीं छोड़ रहे हैं, हम इंसानियत भूलते जा रहें हैं। हम इंसान ही अब अपनी गलती सुधर सकतें हैं।” अमित ने तुरंत चुपके से नन्हे वानर को चिड़ियाघर के पिंजड़े से निकालकर अपने झोले में छिपा लिया और वहां से निकल गया बिना किसी के नज़र में आए और इस काम में नन्हे वानर ने भी अमित का साथ दिया और शांति से उसके झोले में बैठा रहा। 

अमित उस वानर को अपने घर ले जा कर उसके हुलियानुसार अपने कम्प्यूटर पर उसके बारे में सर्च करने लगा, काफी सर्च करने के बाद उसे उस जगह का पता चल गया जहाँ पर उस नन्हे वानर की प्रजाती पाई जाती है और वह जगह पूरी दुनिया में एक थी, वह भारत में स्थित थी और उसका नाम भी उसमे अंकित  था। अमित बिना वक्त ज़ाया किए नन्हे वानर के संभावित स्थान के लिए उस नन्हे वानर के साथ निकल पड़ा। वह रास्ते भर यही मना रहा था कि बस इस नन्हे वानर का समूह मिल जाए तो मेरा यहाँ आना सफल हो जाएगा। उस नन्हे वानर को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह बूढ़ा व्यक्ति उसे कहाँ ले जा रहा है लेकिन फिर भी वह नन्हा वानर उसपर विश्वास किए शांति से बैठा हुआ था। नन्हे वानर के संभावित स्थान से चार किलोमीटर पहले ही अमित ने नन्हे वानर जैसे कुछ वानरों को देखा उन्हें देखते ही उसने नन्हे वानर को उन्हें दिखाया, उन्हें देखते ही नन्हे वानर ने उनकी ओर हाँथ फेंका। नन्हे वानर को हाँथ फेंकता देख अमित समझ गया कि वह सही गजह आया है और अमित फॉरन अपने वाहन से उतरकर नन्हे वानर को जमीन पर छोड़ दिया। छूटते ही नन्हा वानर अपने वानरी समूह के पास दौड़ पड़ा। यह सब देखकर अमित की आँखों में बिछड़े परिवार से मिलन सुख के आँसू सहसा निकल पड़े।



-वैशम्पायन चतुर्वेदी

कक्षा :- X-C, सेंट जॉन्स स्कूल, डी.एल. डब्लू., वाराणसी -221005

निवास :- 3/16, कबीर नगर, दुर्गाकुंड, वाराणसी-221005

Cell : 9415389731


Mar 24, 2018

... कभी मौत सुनिश्चित हुआ करती थी इस मर्ज़ में


विश्व क्षय रोग दिवस 

महान वैज्ञानिक राबर्ट कोच ने पहचाना इस राक्षस बैक्टीरिया को जो जिम्मेदार है अनगिनत मौतों का... 

रॉबर्ट कोच (11 December 1843 – 27 May 1910) एक जर्मन वैज्ञानिक जिसने मौत की विभीषिकाओं को भेद डाला अपने अविष्कारों से, एक वक्त था जब भारत ही नही दुनिया के तमाम मुल्कों में कालरा, एंथ्रेक्स, और टीबी जैसी भयानक बीमारियां महामारी का रूप गढ़ती थी, गांव शहर और इलाके तबाह हो जाते थे, मानव सभ्यता का वह सबसे कठिन दौर रहा होगा, जब इंसान प्राकृतिक विभीषिकाओं से लड़कर खुद को सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में महसूस करने के बावजूद इन मौत के नुमाइंदों से लड़ पाने की कुंठा और शोक आदमियत के गरूर को यकीनन चकनाचूर कर रही होगी, ये वही आदमी था जिसने बारिश आग समंदर पहाड़ जंगल जानवर सब पर विजय पताका लहराई, पर नँगी आखों से ये न दिखने वाले जीवों से वह हार रहा था, इंसानी रिहाइशें ही नही सभ्यताओं को भी नष्ट किया इन सूक्ष्म जीवों ने जिन्हें वैक्टीरिया के नाम से जाना जाता है अब, रॉबर्ट कोच वही व्यक्ति है जिन्होंने पहली बार दुनिया को बताया कि तमाम बीमारियों से इन सूक्ष्म जीवों का नाता है, रॉबर्ट कोच एक दौर में कलकत्ता भी आए जब कॉलरा जैसी महामारी में गांव के गांव उजड़ रहे थे, टीबी, कालरा और एंथ्रेक्स बैक्टीरिया से होता है और किस किस्म के बैक्टीरिया से, यह बात दुनिया को रॉबर्ट कोच ने बताई... टीबी के बैक्टीरिया की खोज के लिए उन्हें 1905 में नोबल पुरस्कार से नवाजा गया, माइक्रोबायलॉजी के जनकों में से एक रॉबर्ट कोच ने इंसानियत को उन जीवों से लड़ना सिखाया जो आंखों से दिखाई नही देते और उनकी पहचान भी कराई, मानवीय इतिहास में टीबी कालरा जैसे बैक्टीरिया की खोज एक अद्वतीय घटना थी, यदि मैं खीरी जनपद की बात करूँ, तो बुजुर्गों की जुबानी हमारे गांव घर भी कॉलरा जिसे स्थानीय भाषा मे हैजा कहते थे न जाने कितनी लोगों की मौत का कारण बना, गोमती नदी के किनारे की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता भी लाल बुखार और हैजा जैसी बीमारियों से खत्म हो गई, विशाल भवनों की ज़मीदोज़ दीवारें और अवशेष आज भी गवाही देते है कि जैसे यहां मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी सिंधु घाटी सभ्यता रही हो, और कौन जाने की सिंधु घाटी जैसी सभ्यता भी तबाह हुई हो इन जीवाणु जनित महामारियों से....गोमती नदी के किनारे जंगलीनाथ भगवान के मंदिर के पास कोरहन जैसा समृद्ध गांव आज से तकबीरन 150 वर्ष पूर्व हैजा जैसी महामारी में खत्म हो गया, जो बचे वो इधर उधर जा बसे...गूगल अभी भी इस गाँव के वजूद को जिओ लोकेशन में दर्शा रहा है। .इन बीमारियों से ग्रस्त लोग और गांवो के नजदीक भी न जाते थे लोग क्योंकि ये छुआछूत की बीमारियां थी , यहां तक जनाजे को कंधा देने वाले लोग भी नही मिलते थे, और तो और परिजन जैसे तैसे मृत व्यक्ति को नदी आदि में प्रवाह के लिए ले जाते तो बीच मे पड़ने वाले गांव के लोग उन्हें गुजरने न देते की कही उस गांव में भी यह बीमारी न फैल जाए...अपृश्यता का इससे करुण उदाहरण क्या हो सकता है,और इससे सुखद भी क्या की इस छुआछूत को मिटा दिया उस जर्मन वैज्ञानिक ने इन महामारी फैलाने वाले जीवाणुओं की खोज करके, कहते है दुश्मन की तस्दीक़ हो जाए तो खतरा खुद ब खुद कम हो जाता है..



ये सब लिखने और कहने मायने सिर्फ ये है कि आज 24 मार्च को दुनिया टीबी दिवस मना रही है, एक ऐसी बीमारी जिसका नाम लेने से भी परहेज था लोगो को, भय की पराकाष्ठा वो इसलिए कि इस सफेद मौत का कोई इलाज नही था, तब तक वैज्ञानिक और दुनिया इसे आनुवंशिक बीमारी की तरह मानती थी, इसे कंजमशन भी कहते थे उस दौर में, भारत ने भी सेनिटोरियम खोले टीबी के मरीजों के लिए जहां पौष्टिक आहार और आबो हवा ही एक मात्र इलाज का जरिया थी, भवाली उत्तराखंड का सेनेटोरियम आज भी चल रहा है बावजूद इसके की अब टीबी लाइलाज नही, रॉबर्ट कोच ने जब टीबी बैसिलाई की खोज की और उसके संक्रामक होने के जरिए भी बताए तो बचाव की शुरुवात हुई, और फिर इसका इलाज भी खोज लिया गया..पेंसिलीन से लेकर अबतक बहुत ही बेहतरीन एंटीबायोटिक विकसित हो चुकी है मानवता में जो समूल नष्ट करने की कूबत रखती है इस घातक टीबी के जीवाणु को...

इस टीबी ने जॉन कीट्स, चेखव, कमला नेहरू से लेकर जयशंकर प्रसाद जैसीे शख्सियतों को मौत के आगोश में लिया, कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की भी मृत्यु भी इसी लाइलाज भयानक बीमारी से हुई, और दे गई बंटवारे की त्रासदी भी, एक अलाहिदा मुल्क़ पाकिस्तान की आज़ादी में जो ज़ल्द बाज़ी जिन्ना ने दिखाई उसका एक बड़ा कारण यह टीबी की बीमारी भी थी, उनके निजी डाक्टर के मुताबिक उन्हें पता चल चुका था कि अब वह बहुत दिनों तक जीवित रहने वाले नही...

विश्व टीबी दिवस पर नमन रॉबर्ट कोच को जिन्होंने मानवता को मौत की इन भीषण विभीषिकाओं से आज़ाद किया।

सम्पादक की कलम से..... 
कृष्ण कुमार मिश्र 
मैनहन

एक चिड़िया की आत्मा



एक चिड़िया की आत्मा-

एक चिड़िया की आत्मा
अक्सर सवार हो जाती है-
मेरे ऊपर 
और उड़ा ले जाती है आसमान में
जहां सूरज अपनी प्रचण्ड किरणॊं से 
बरसाता रहता है आग
हवा में उड़ते हुए
वह मुझे दिखाती है
श्रीहीन पर्वत श्रेणियां
ठूंठ में तब्दील हो चुके मुस्कुराते जंगल
सूखी नदियां-नाले-जलाशय
मेड़ पर बैठा
हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुका किसान
जो टकटकी लगाए ताकता रहता है
आसमान की ओर, कि
कोई दयालु बादल का टुकड़ा
हवा में तैरता हुआ आएगा
और बुझा देगा उसकी
जनम-जनम की प्यास.
(२)
एक चिड़िया की आत्मा
अक्सर सवार हो जाती है मेरे ऊपर
और उड़ा ले जाती है मुझे
चिपचिपे-कपसीले बादलों के बीच
फ़िर हवा में तैरती हुई वह
मुझे दिखाती है वह
पी.दयाल और रोहित का घर
जहां एक बाल-कविताएं रच रहा होता है
तो दूसरा, चित्रों में भर रहा होता है-
रंग-बिरंगे रंग
फ़िर एक गौरैया,
चित्र के ऊपर आकर बैठ जाती है, अनमनी सी
फ़िर दूर उड़ाती हुई वह
मुझे दिखाती है-
सतपुड़ा के घने जंगल
पहाड़ॊं के तलहटी पर-
अठखेलिया खेलती- 
अल्हड़ देनवा-
सरगम बिखेरते झरने-
हल चलाते किसान-
कजरी गातीं औरतें
और, टिमकी की टिमिक-टिम पर
आल्हा गाती मर्दों की टोलियां
न जाने, कितना कुछ दिखाने के बाद
वह, मुझे छॊड़ जाती है वापस
अपने घर की मुंडेर पर 
मैं बैठा रहता हूं देर तक भौंचक....


गोवर्धन यादव 

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१

07162-246651,9424356400


Mar 23, 2018

मिलिए सुनील दददा से...जिनके बेडरूम में रहते हैं पटटे पूत, गुटरगूं करने वाला कबूतर


=पत्नी की मौत के बाद अकेले रह गए सुनील दददा के जीने का सहारा बन गए पशु पक्षी
=हर पशु पक्षी की है अपनी अलग कहानी, जिसका कोई नहीं था, तब दददा ने दी जिंदगी

शाहजहांपुर।
मिलिए शाहजहांपुर जिले के खुदागंज में रहने वाले सुनील मिश्रा उर्फ दददा से। पत्नी की अरसा पहले मौत हो गई। अकेलापन था जिदंगी में तो उन्होंने अपना मन चिड़िया चिनगुनों में लगा लिया। बेडरूम में इनके पटटे पूत रहते हैं। कबूतर गुटरगूं करते हैं। बेडरूम से बाहर आते हैं तो गौरैया उनका इंतजार करती है। यह उन पशु पक्षियों के हमदर्द और खैरख्वाह हैं, जिनका सहारा कोई नहीं होता है। जो भी पशु पक्षी इनके घर में रहते हैं, सबकी अपनी कहानी है। इस कहानी का हीरों अगर कोई है तो वह अपने दददा हैं,जगत दददा...गौरैया वाले, कबूतर वाले, बुलबुल वाले, बंदर वाले, तोते वाले अपने दददा।

खुदागंज नगर में पशु पक्षी प्रेमी नाम से मशहूर सुनील मिश्रा उर्फ दद्दा किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। मगर उनकी यह पहचान उनके पक्षी प्रेम के नाते ही बनी है। सुनील मिश्रा खुदागंज के मोहल्ला साहूकारा में रहते हैं। इनके पिता जी पुलिस में कांस्टेबल थे। अब से लगभग 60 वर्ष पूर्व खुदागंज थाने में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने अपना निवास भी खुदागंज में बना लिया था। सुनील मिश्रा दद्दा का पालन-पोषण बहुत छोटे पर से खुदागंज में ही हुआ। परंतु दुर्भाग्यवश उनकी पत्नी का देहांत होने के बाद बीमारी के जाल में फंसने के कारण आर्थिक रुप से दद्दा परेशान रहने लगे। मात्र एक इलेक्ट्रॉनिक की दुकान के सहारे रोजी-रोटी चलाने का काम करते हैं। अपनी ईमानदारी व खुद्दारी के चलते उन्होंने कभी किसी से कोई मदद नहीं मांगी। 

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जिसका कोई नहीं, उसके दददा तो हैं यारों
खुद का परिवार के लिए दिनभर जद्दोजहद करने के बाद दद्दा कभी भी अपने पालतू पक्षियों व नगर में घूमने वाले आवारा पशु पक्षियों की चिंता में ही रहते। उन्हें कहीं भी कोई भी लाचार पशु या पक्षी सड़क पर मिल जाए तो वह तुरंत उसको उठाकर उसका पूरा इलाज व खाना-पानी की व्यवस्था अपने आवास पर करते हैं। जब पशु पक्षी स्वस्थ हो जाते हैं, तब उसको  पुन: छोड़ देते हैं, ताकि वह आजादी से फिर विचरण कर सकें। 

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सुनील मिश्रा का बेडरूम कम चिड़ियाघर ज्यादा
सुनील मिश्रा के मकान में पशु पक्षियों के रहने की कोई अलग व्यवस्था नहीं है। उन्होंने अपने कमरे में ही सभी निरीह पक्षियों को स्थान दे रखा है। उनके कमरे की शोभा उनका तोता पट्टे व कबूतर बढ़ा रहे हैं। बकौल सुनील मिश्रा लगभग 4 साल पहले सुबह टहलने के दौरान यह तोता पेड़ के नीचे गिरा पड़ा था, उड़ने में असमर्थ था, सुनील मिश्रा इसको वहां से ले आए और उसको खिला-पिलाकर स्वस्थ बना दिया। वहीं उनका कबूतर जिसको एक कुत्ते ने पूरी तरीके से चबा लिया था, वर्ष 2010 में यह कबूतर उनको खुदागंज की सड़क पर मरणासन्न अवस्था में पड़ा  मिला था, दद्दा आज भी इस कबूतर के दाना पानी की व्यवस्था अपने परिवार की तरह कर रहे हैं। वहीं अपने कमरे के ठीक आगे उन्होंने गौरैया के लिए खुला पिंजड़ा बैठने के लिए रखा है। वहीं पर दाने पानी की व्यवस्था कर रखी है, जिसे वह सुबह उठकर नित्य रूप से प्यार करते हैं। उनके आवास पर ही एक पेड़ पर तमाम बुलबुल आकर बैठती हैं। सुनील मिश्रा का यह पक्षी प्रेम मन को प्रफुल्लित करता है। सुनील गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने कई अस्वस्थ जानवरों का इलाज भी करवाया। 

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तब करंट से जख्मी बंदर की सेवा की
एक घटना दददा ने बताई, जिसमें लगभग 8 वर्ष पहले 11000 की बिजली लाइन से टकराकर बंदर झुलस गया था। सुनील गुप्ता उसको घर ले आए। लगभग 2 वर्ष तक उसकी सेवा की। उसके शरीर में कीड़े पड़ गए थे। 2 वर्ष बाद वह बंदर पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया, फिर अपने गंतव्य स्थल पर चला गया। सुनील मिश्रा हृदय के रोगी भी हैं। वह बताते हैं कि यह सब करने से उन्हें सुकून मिलता है और इन्हीं सभी पशु पक्षियों की दुआओं के चलते उनका परिवार व की बीमारी का इलाज हो रहा है। सुनील मिश्रा संग्रह की एक जीती जागती उदाहरण है उनके पास तमाम ऐसे चीजें आज भी उपलब्ध है जो नगर में खोजने पर भी नहीं मिलती। सुनील मिश्रा का यह जीव प्रेम वह मुश्किल ही देखने को मिलता है।


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साभार:-दैनिक हिन्दुस्तान, शाहजहांपुर
लेखक : रोहित सिंह का असली नाम तो विजय विक्रम सिंह है। वह हिन्दुस्तान में खुदागंज से प्रतिनिधित्व करते हैं। रोहित अमर उजाला में भी सेवाएं दे चुके हैं। रोहित बीपीएड हैंं। शाहजहांपुर के सुदूर खुदागंज की आर्थिक, सामाजिक मसलों को समय समय पर बेहद दमदार तरीके से उठाते हैं। रोहित बेहद संवेदनशील हैं। इनसे इनके मोबाइल फोन नंबर 7007620713 पर संपर्क किया जा सकता है।

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था