International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Mar 24, 2018

... कभी मौत सुनिश्चित हुआ करती थी इस मर्ज़ में


विश्व क्षय रोग दिवस 

महान वैज्ञानिक राबर्ट कोच ने पहचाना इस राक्षस बैक्टीरिया को जो जिम्मेदार है अनगिनत मौतों का... 

रॉबर्ट कोच (11 December 1843 – 27 May 1910) एक जर्मन वैज्ञानिक जिसने मौत की विभीषिकाओं को भेद डाला अपने अविष्कारों से, एक वक्त था जब भारत ही नही दुनिया के तमाम मुल्कों में कालरा, एंथ्रेक्स, और टीबी जैसी भयानक बीमारियां महामारी का रूप गढ़ती थी, गांव शहर और इलाके तबाह हो जाते थे, मानव सभ्यता का वह सबसे कठिन दौर रहा होगा, जब इंसान प्राकृतिक विभीषिकाओं से लड़कर खुद को सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में महसूस करने के बावजूद इन मौत के नुमाइंदों से लड़ पाने की कुंठा और शोक आदमियत के गरूर को यकीनन चकनाचूर कर रही होगी, ये वही आदमी था जिसने बारिश आग समंदर पहाड़ जंगल जानवर सब पर विजय पताका लहराई, पर नँगी आखों से ये न दिखने वाले जीवों से वह हार रहा था, इंसानी रिहाइशें ही नही सभ्यताओं को भी नष्ट किया इन सूक्ष्म जीवों ने जिन्हें वैक्टीरिया के नाम से जाना जाता है अब, रॉबर्ट कोच वही व्यक्ति है जिन्होंने पहली बार दुनिया को बताया कि तमाम बीमारियों से इन सूक्ष्म जीवों का नाता है, रॉबर्ट कोच एक दौर में कलकत्ता भी आए जब कॉलरा जैसी महामारी में गांव के गांव उजड़ रहे थे, टीबी, कालरा और एंथ्रेक्स बैक्टीरिया से होता है और किस किस्म के बैक्टीरिया से, यह बात दुनिया को रॉबर्ट कोच ने बताई... टीबी के बैक्टीरिया की खोज के लिए उन्हें 1905 में नोबल पुरस्कार से नवाजा गया, माइक्रोबायलॉजी के जनकों में से एक रॉबर्ट कोच ने इंसानियत को उन जीवों से लड़ना सिखाया जो आंखों से दिखाई नही देते और उनकी पहचान भी कराई, मानवीय इतिहास में टीबी कालरा जैसे बैक्टीरिया की खोज एक अद्वतीय घटना थी, यदि मैं खीरी जनपद की बात करूँ, तो बुजुर्गों की जुबानी हमारे गांव घर भी कॉलरा जिसे स्थानीय भाषा मे हैजा कहते थे न जाने कितनी लोगों की मौत का कारण बना, गोमती नदी के किनारे की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता भी लाल बुखार और हैजा जैसी बीमारियों से खत्म हो गई, विशाल भवनों की ज़मीदोज़ दीवारें और अवशेष आज भी गवाही देते है कि जैसे यहां मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी सिंधु घाटी सभ्यता रही हो, और कौन जाने की सिंधु घाटी जैसी सभ्यता भी तबाह हुई हो इन जीवाणु जनित महामारियों से....गोमती नदी के किनारे जंगलीनाथ भगवान के मंदिर के पास कोरहन जैसा समृद्ध गांव आज से तकबीरन 150 वर्ष पूर्व हैजा जैसी महामारी में खत्म हो गया, जो बचे वो इधर उधर जा बसे...गूगल अभी भी इस गाँव के वजूद को जिओ लोकेशन में दर्शा रहा है। .इन बीमारियों से ग्रस्त लोग और गांवो के नजदीक भी न जाते थे लोग क्योंकि ये छुआछूत की बीमारियां थी , यहां तक जनाजे को कंधा देने वाले लोग भी नही मिलते थे, और तो और परिजन जैसे तैसे मृत व्यक्ति को नदी आदि में प्रवाह के लिए ले जाते तो बीच मे पड़ने वाले गांव के लोग उन्हें गुजरने न देते की कही उस गांव में भी यह बीमारी न फैल जाए...अपृश्यता का इससे करुण उदाहरण क्या हो सकता है,और इससे सुखद भी क्या की इस छुआछूत को मिटा दिया उस जर्मन वैज्ञानिक ने इन महामारी फैलाने वाले जीवाणुओं की खोज करके, कहते है दुश्मन की तस्दीक़ हो जाए तो खतरा खुद ब खुद कम हो जाता है..



ये सब लिखने और कहने मायने सिर्फ ये है कि आज 24 मार्च को दुनिया टीबी दिवस मना रही है, एक ऐसी बीमारी जिसका नाम लेने से भी परहेज था लोगो को, भय की पराकाष्ठा वो इसलिए कि इस सफेद मौत का कोई इलाज नही था, तब तक वैज्ञानिक और दुनिया इसे आनुवंशिक बीमारी की तरह मानती थी, इसे कंजमशन भी कहते थे उस दौर में, भारत ने भी सेनिटोरियम खोले टीबी के मरीजों के लिए जहां पौष्टिक आहार और आबो हवा ही एक मात्र इलाज का जरिया थी, भवाली उत्तराखंड का सेनेटोरियम आज भी चल रहा है बावजूद इसके की अब टीबी लाइलाज नही, रॉबर्ट कोच ने जब टीबी बैसिलाई की खोज की और उसके संक्रामक होने के जरिए भी बताए तो बचाव की शुरुवात हुई, और फिर इसका इलाज भी खोज लिया गया..पेंसिलीन से लेकर अबतक बहुत ही बेहतरीन एंटीबायोटिक विकसित हो चुकी है मानवता में जो समूल नष्ट करने की कूबत रखती है इस घातक टीबी के जीवाणु को...

इस टीबी ने जॉन कीट्स, चेखव, कमला नेहरू से लेकर जयशंकर प्रसाद जैसीे शख्सियतों को मौत के आगोश में लिया, कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की भी मृत्यु भी इसी लाइलाज भयानक बीमारी से हुई, और दे गई बंटवारे की त्रासदी भी, एक अलाहिदा मुल्क़ पाकिस्तान की आज़ादी में जो ज़ल्द बाज़ी जिन्ना ने दिखाई उसका एक बड़ा कारण यह टीबी की बीमारी भी थी, उनके निजी डाक्टर के मुताबिक उन्हें पता चल चुका था कि अब वह बहुत दिनों तक जीवित रहने वाले नही...

विश्व टीबी दिवस पर नमन रॉबर्ट कोच को जिन्होंने मानवता को मौत की इन भीषण विभीषिकाओं से आज़ाद किया।

सम्पादक की कलम से..... 
कृष्ण कुमार मिश्र 
मैनहन

1 comment:

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था