International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Mar 24, 2018

... कभी मौत सुनिश्चित हुआ करती थी इस मर्ज़ में


विश्व क्षय रोग दिवस 

महान वैज्ञानिक राबर्ट कोच ने पहचाना इस राक्षस बैक्टीरिया को जो जिम्मेदार है अनगिनत मौतों का... 

रॉबर्ट कोच (11 December 1843 – 27 May 1910) एक जर्मन वैज्ञानिक जिसने मौत की विभीषिकाओं को भेद डाला अपने अविष्कारों से, एक वक्त था जब भारत ही नही दुनिया के तमाम मुल्कों में कालरा, एंथ्रेक्स, और टीबी जैसी भयानक बीमारियां महामारी का रूप गढ़ती थी, गांव शहर और इलाके तबाह हो जाते थे, मानव सभ्यता का वह सबसे कठिन दौर रहा होगा, जब इंसान प्राकृतिक विभीषिकाओं से लड़कर खुद को सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में महसूस करने के बावजूद इन मौत के नुमाइंदों से लड़ पाने की कुंठा और शोक आदमियत के गरूर को यकीनन चकनाचूर कर रही होगी, ये वही आदमी था जिसने बारिश आग समंदर पहाड़ जंगल जानवर सब पर विजय पताका लहराई, पर नँगी आखों से ये न दिखने वाले जीवों से वह हार रहा था, इंसानी रिहाइशें ही नही सभ्यताओं को भी नष्ट किया इन सूक्ष्म जीवों ने जिन्हें वैक्टीरिया के नाम से जाना जाता है अब, रॉबर्ट कोच वही व्यक्ति है जिन्होंने पहली बार दुनिया को बताया कि तमाम बीमारियों से इन सूक्ष्म जीवों का नाता है, रॉबर्ट कोच एक दौर में कलकत्ता भी आए जब कॉलरा जैसी महामारी में गांव के गांव उजड़ रहे थे, टीबी, कालरा और एंथ्रेक्स बैक्टीरिया से होता है और किस किस्म के बैक्टीरिया से, यह बात दुनिया को रॉबर्ट कोच ने बताई... टीबी के बैक्टीरिया की खोज के लिए उन्हें 1905 में नोबल पुरस्कार से नवाजा गया, माइक्रोबायलॉजी के जनकों में से एक रॉबर्ट कोच ने इंसानियत को उन जीवों से लड़ना सिखाया जो आंखों से दिखाई नही देते और उनकी पहचान भी कराई, मानवीय इतिहास में टीबी कालरा जैसे बैक्टीरिया की खोज एक अद्वतीय घटना थी, यदि मैं खीरी जनपद की बात करूँ, तो बुजुर्गों की जुबानी हमारे गांव घर भी कॉलरा जिसे स्थानीय भाषा मे हैजा कहते थे न जाने कितनी लोगों की मौत का कारण बना, गोमती नदी के किनारे की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता भी लाल बुखार और हैजा जैसी बीमारियों से खत्म हो गई, विशाल भवनों की ज़मीदोज़ दीवारें और अवशेष आज भी गवाही देते है कि जैसे यहां मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी सिंधु घाटी सभ्यता रही हो, और कौन जाने की सिंधु घाटी जैसी सभ्यता भी तबाह हुई हो इन जीवाणु जनित महामारियों से....गोमती नदी के किनारे जंगलीनाथ भगवान के मंदिर के पास कोरहन जैसा समृद्ध गांव आज से तकबीरन 150 वर्ष पूर्व हैजा जैसी महामारी में खत्म हो गया, जो बचे वो इधर उधर जा बसे...गूगल अभी भी इस गाँव के वजूद को जिओ लोकेशन में दर्शा रहा है। .इन बीमारियों से ग्रस्त लोग और गांवो के नजदीक भी न जाते थे लोग क्योंकि ये छुआछूत की बीमारियां थी , यहां तक जनाजे को कंधा देने वाले लोग भी नही मिलते थे, और तो और परिजन जैसे तैसे मृत व्यक्ति को नदी आदि में प्रवाह के लिए ले जाते तो बीच मे पड़ने वाले गांव के लोग उन्हें गुजरने न देते की कही उस गांव में भी यह बीमारी न फैल जाए...अपृश्यता का इससे करुण उदाहरण क्या हो सकता है,और इससे सुखद भी क्या की इस छुआछूत को मिटा दिया उस जर्मन वैज्ञानिक ने इन महामारी फैलाने वाले जीवाणुओं की खोज करके, कहते है दुश्मन की तस्दीक़ हो जाए तो खतरा खुद ब खुद कम हो जाता है..



ये सब लिखने और कहने मायने सिर्फ ये है कि आज 24 मार्च को दुनिया टीबी दिवस मना रही है, एक ऐसी बीमारी जिसका नाम लेने से भी परहेज था लोगो को, भय की पराकाष्ठा वो इसलिए कि इस सफेद मौत का कोई इलाज नही था, तब तक वैज्ञानिक और दुनिया इसे आनुवंशिक बीमारी की तरह मानती थी, इसे कंजमशन भी कहते थे उस दौर में, भारत ने भी सेनिटोरियम खोले टीबी के मरीजों के लिए जहां पौष्टिक आहार और आबो हवा ही एक मात्र इलाज का जरिया थी, भवाली उत्तराखंड का सेनेटोरियम आज भी चल रहा है बावजूद इसके की अब टीबी लाइलाज नही, रॉबर्ट कोच ने जब टीबी बैसिलाई की खोज की और उसके संक्रामक होने के जरिए भी बताए तो बचाव की शुरुवात हुई, और फिर इसका इलाज भी खोज लिया गया..पेंसिलीन से लेकर अबतक बहुत ही बेहतरीन एंटीबायोटिक विकसित हो चुकी है मानवता में जो समूल नष्ट करने की कूबत रखती है इस घातक टीबी के जीवाणु को...

इस टीबी ने जॉन कीट्स, चेखव, कमला नेहरू से लेकर जयशंकर प्रसाद जैसीे शख्सियतों को मौत के आगोश में लिया, कायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की भी मृत्यु भी इसी लाइलाज भयानक बीमारी से हुई, और दे गई बंटवारे की त्रासदी भी, एक अलाहिदा मुल्क़ पाकिस्तान की आज़ादी में जो ज़ल्द बाज़ी जिन्ना ने दिखाई उसका एक बड़ा कारण यह टीबी की बीमारी भी थी, उनके निजी डाक्टर के मुताबिक उन्हें पता चल चुका था कि अब वह बहुत दिनों तक जीवित रहने वाले नही...

विश्व टीबी दिवस पर नमन रॉबर्ट कोच को जिन्होंने मानवता को मौत की इन भीषण विभीषिकाओं से आज़ाद किया।

सम्पादक की कलम से..... 
कृष्ण कुमार मिश्र 
मैनहन

एक चिड़िया की आत्मा



एक चिड़िया की आत्मा-

एक चिड़िया की आत्मा
अक्सर सवार हो जाती है-
मेरे ऊपर 
और उड़ा ले जाती है आसमान में
जहां सूरज अपनी प्रचण्ड किरणॊं से 
बरसाता रहता है आग
हवा में उड़ते हुए
वह मुझे दिखाती है
श्रीहीन पर्वत श्रेणियां
ठूंठ में तब्दील हो चुके मुस्कुराते जंगल
सूखी नदियां-नाले-जलाशय
मेड़ पर बैठा
हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुका किसान
जो टकटकी लगाए ताकता रहता है
आसमान की ओर, कि
कोई दयालु बादल का टुकड़ा
हवा में तैरता हुआ आएगा
और बुझा देगा उसकी
जनम-जनम की प्यास.
(२)
एक चिड़िया की आत्मा
अक्सर सवार हो जाती है मेरे ऊपर
और उड़ा ले जाती है मुझे
चिपचिपे-कपसीले बादलों के बीच
फ़िर हवा में तैरती हुई वह
मुझे दिखाती है वह
पी.दयाल और रोहित का घर
जहां एक बाल-कविताएं रच रहा होता है
तो दूसरा, चित्रों में भर रहा होता है-
रंग-बिरंगे रंग
फ़िर एक गौरैया,
चित्र के ऊपर आकर बैठ जाती है, अनमनी सी
फ़िर दूर उड़ाती हुई वह
मुझे दिखाती है-
सतपुड़ा के घने जंगल
पहाड़ॊं के तलहटी पर-
अठखेलिया खेलती- 
अल्हड़ देनवा-
सरगम बिखेरते झरने-
हल चलाते किसान-
कजरी गातीं औरतें
और, टिमकी की टिमिक-टिम पर
आल्हा गाती मर्दों की टोलियां
न जाने, कितना कुछ दिखाने के बाद
वह, मुझे छॊड़ जाती है वापस
अपने घर की मुंडेर पर 
मैं बैठा रहता हूं देर तक भौंचक....


गोवर्धन यादव 

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१

07162-246651,9424356400


Mar 23, 2018

मिलिए सुनील दददा से...जिनके बेडरूम में रहते हैं पटटे पूत, गुटरगूं करने वाला कबूतर


=पत्नी की मौत के बाद अकेले रह गए सुनील दददा के जीने का सहारा बन गए पशु पक्षी
=हर पशु पक्षी की है अपनी अलग कहानी, जिसका कोई नहीं था, तब दददा ने दी जिंदगी

शाहजहांपुर।
मिलिए शाहजहांपुर जिले के खुदागंज में रहने वाले सुनील मिश्रा उर्फ दददा से। पत्नी की अरसा पहले मौत हो गई। अकेलापन था जिदंगी में तो उन्होंने अपना मन चिड़िया चिनगुनों में लगा लिया। बेडरूम में इनके पटटे पूत रहते हैं। कबूतर गुटरगूं करते हैं। बेडरूम से बाहर आते हैं तो गौरैया उनका इंतजार करती है। यह उन पशु पक्षियों के हमदर्द और खैरख्वाह हैं, जिनका सहारा कोई नहीं होता है। जो भी पशु पक्षी इनके घर में रहते हैं, सबकी अपनी कहानी है। इस कहानी का हीरों अगर कोई है तो वह अपने दददा हैं,जगत दददा...गौरैया वाले, कबूतर वाले, बुलबुल वाले, बंदर वाले, तोते वाले अपने दददा।

खुदागंज नगर में पशु पक्षी प्रेमी नाम से मशहूर सुनील मिश्रा उर्फ दद्दा किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। मगर उनकी यह पहचान उनके पक्षी प्रेम के नाते ही बनी है। सुनील मिश्रा खुदागंज के मोहल्ला साहूकारा में रहते हैं। इनके पिता जी पुलिस में कांस्टेबल थे। अब से लगभग 60 वर्ष पूर्व खुदागंज थाने में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने अपना निवास भी खुदागंज में बना लिया था। सुनील मिश्रा दद्दा का पालन-पोषण बहुत छोटे पर से खुदागंज में ही हुआ। परंतु दुर्भाग्यवश उनकी पत्नी का देहांत होने के बाद बीमारी के जाल में फंसने के कारण आर्थिक रुप से दद्दा परेशान रहने लगे। मात्र एक इलेक्ट्रॉनिक की दुकान के सहारे रोजी-रोटी चलाने का काम करते हैं। अपनी ईमानदारी व खुद्दारी के चलते उन्होंने कभी किसी से कोई मदद नहीं मांगी। 

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जिसका कोई नहीं, उसके दददा तो हैं यारों
खुद का परिवार के लिए दिनभर जद्दोजहद करने के बाद दद्दा कभी भी अपने पालतू पक्षियों व नगर में घूमने वाले आवारा पशु पक्षियों की चिंता में ही रहते। उन्हें कहीं भी कोई भी लाचार पशु या पक्षी सड़क पर मिल जाए तो वह तुरंत उसको उठाकर उसका पूरा इलाज व खाना-पानी की व्यवस्था अपने आवास पर करते हैं। जब पशु पक्षी स्वस्थ हो जाते हैं, तब उसको  पुन: छोड़ देते हैं, ताकि वह आजादी से फिर विचरण कर सकें। 

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सुनील मिश्रा का बेडरूम कम चिड़ियाघर ज्यादा
सुनील मिश्रा के मकान में पशु पक्षियों के रहने की कोई अलग व्यवस्था नहीं है। उन्होंने अपने कमरे में ही सभी निरीह पक्षियों को स्थान दे रखा है। उनके कमरे की शोभा उनका तोता पट्टे व कबूतर बढ़ा रहे हैं। बकौल सुनील मिश्रा लगभग 4 साल पहले सुबह टहलने के दौरान यह तोता पेड़ के नीचे गिरा पड़ा था, उड़ने में असमर्थ था, सुनील मिश्रा इसको वहां से ले आए और उसको खिला-पिलाकर स्वस्थ बना दिया। वहीं उनका कबूतर जिसको एक कुत्ते ने पूरी तरीके से चबा लिया था, वर्ष 2010 में यह कबूतर उनको खुदागंज की सड़क पर मरणासन्न अवस्था में पड़ा  मिला था, दद्दा आज भी इस कबूतर के दाना पानी की व्यवस्था अपने परिवार की तरह कर रहे हैं। वहीं अपने कमरे के ठीक आगे उन्होंने गौरैया के लिए खुला पिंजड़ा बैठने के लिए रखा है। वहीं पर दाने पानी की व्यवस्था कर रखी है, जिसे वह सुबह उठकर नित्य रूप से प्यार करते हैं। उनके आवास पर ही एक पेड़ पर तमाम बुलबुल आकर बैठती हैं। सुनील मिश्रा का यह पक्षी प्रेम मन को प्रफुल्लित करता है। सुनील गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने कई अस्वस्थ जानवरों का इलाज भी करवाया। 

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तब करंट से जख्मी बंदर की सेवा की
एक घटना दददा ने बताई, जिसमें लगभग 8 वर्ष पहले 11000 की बिजली लाइन से टकराकर बंदर झुलस गया था। सुनील गुप्ता उसको घर ले आए। लगभग 2 वर्ष तक उसकी सेवा की। उसके शरीर में कीड़े पड़ गए थे। 2 वर्ष बाद वह बंदर पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया, फिर अपने गंतव्य स्थल पर चला गया। सुनील मिश्रा हृदय के रोगी भी हैं। वह बताते हैं कि यह सब करने से उन्हें सुकून मिलता है और इन्हीं सभी पशु पक्षियों की दुआओं के चलते उनका परिवार व की बीमारी का इलाज हो रहा है। सुनील मिश्रा संग्रह की एक जीती जागती उदाहरण है उनके पास तमाम ऐसे चीजें आज भी उपलब्ध है जो नगर में खोजने पर भी नहीं मिलती। सुनील मिश्रा का यह जीव प्रेम वह मुश्किल ही देखने को मिलता है।


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साभार:-दैनिक हिन्दुस्तान, शाहजहांपुर
लेखक : रोहित सिंह का असली नाम तो विजय विक्रम सिंह है। वह हिन्दुस्तान में खुदागंज से प्रतिनिधित्व करते हैं। रोहित अमर उजाला में भी सेवाएं दे चुके हैं। रोहित बीपीएड हैंं। शाहजहांपुर के सुदूर खुदागंज की आर्थिक, सामाजिक मसलों को समय समय पर बेहद दमदार तरीके से उठाते हैं। रोहित बेहद संवेदनशील हैं। इनसे इनके मोबाइल फोन नंबर 7007620713 पर संपर्क किया जा सकता है।

Mar 22, 2018

विश्व टीबी दिवस- मौत का कहर बरपा है कभी इस बीमारी से..


टीबी से बचाव ही टीबी का बेहतर उपचार (विश्व क्षय रोग दिवस, 24 मार्च पर विशेष आलेख) 

टीबी (क्षय रोग) एक घातक संक्रामक रोग है जो कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु की वजह से होती है। टीबी (क्षय रोग)  आम तौर पर ज्यादातर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह फेफड़ों के अलावा शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह रोग हवा के माध्यम से फैलता है। जब क्षय रोग से ग्रसित व्यक्ति खांसता, छींकता या बोलता है तो उसके साथ संक्रामक ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई उत्पन्न होता है जो कि हवा के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है। ये ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई कई घंटों तक वातावरण में सक्रिय रहते हैं। जब एक स्वस्थ्य व्यक्ति हवा में घुले हुए इन माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई के संपर्क में आता है तो वह इससे संक्रमित हो सकता है। क्षय रोग सुप्त और सक्रिय अवस्था में होता है। सुप्त अवस्था में संक्रमण तो होता है लेकिन टीबी का जीवाणु निष्क्रिय अवस्था में रहता है और कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। अगर सुप्त टीबी का मरीज अपना इलाज नहीं कराता है तो सुप्त टीबी सक्रिय टीबी में बदल सकती है। लेकिन सुप्त टीबी ज्यादा संक्रामक और घातक नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार विश्व में 2 अरब से ज्यादा लोगों को लेटेंट (सुप्त) टीबी संक्रमण है।  सक्रिय टीबी की बात की जाए तो इस अवस्था में टीबी का जीवाणु शरीर में सक्रिय अवस्था में रहता है, यह स्थिति व्यक्ति को बीमार बनाती है। सक्रिय टीबी का मरीज दूसरे स्वस्थ्य व्यक्तियों को भी संक्रमित कर सकता है, इसलिए सक्रिय टीबी के मरीज को अपने मुँह पर मास्क या कपडा लगाकर बात करनी चाहिए और मुँह पर हाथ रखकर खाँसना और छींकना चाहिए।

टीबी (क्षय रोग) के लक्षण

1) लगातार तीन हप्तों से खांसी का आना और आगे भी जारी रहना।
2) खांसी के साथ खून का आना।
3)  छाती में दर्द और सांस का फूलना।
4) वजन का कम होना और ज्यादा थकान महसूस होना।
5) शाम को बुखार का आना और ठण्ड लगना।
6) रात में पसीना आना।

टीबी (क्षय रोग) के प्रकार

1) पल्मोनरी टीबी (फुफ्फुसीय यक्ष्मा) - अगर टीबी का जीवाणु फेफड़ों को संक्रमित करता है तो वह पल्मोनरी टीबी (फुफ्फुसीय यक्ष्मा) कहलाता है। टीबी का बैक्टीरिया 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में फेंफड़ों को प्रभावित करता है।  लक्षणों की बात की जाए तो आमतौर पर सीने में दर्द और लंबे समय तक खांसी व बलगम होना शामिल हो सकते हैं। कभी-कभी पल्मोनरी टीबी से संक्रमित लोगों की खांसी के साथ थोड़ी मात्रा में खून भी आ जाता है। लगभग 25 प्रतिशत ज्यादा मामलों में किसी भी तरह के लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। बहुत कम मामलों में, संक्रमण फुफ्फुसीय धमनी तक पहुंच सकता है। जिसके कारण भारी रक्तस्राव हो सकता है। टीबी एक पुरानी बीमारी है और फेफड़ों के ऊपरी भागों में व्यापक घाव पैदा कर सकती है। फेंफड़ों के ऊपरी में होने वाली टीबी को कैविटरी टीबी कहा जाता है। फेफड़ों के ऊपरी भागों में निचले भागों की अपेक्षा तपेदिक संक्रमण प्रभाव की संभावना अधिक होती है।  इसके अलावा टीबी का जीवाणु कंठनली को प्रभावित कर लेरींक्स टीबी करता है।

2) एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) - अगर टीबी का जीवाणु फेंफड़ों की जगह शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित करता है तो इस प्रकार की टीबी एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) कहलाती है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी पल्मोनरी टीबी के साथ भी हो सकती है। अधिकतर मामलों में संक्रमण फेंफड़ों से बाहर भी फैल जाता है और शरीर के दूसरे अंगों को प्रभावित करता है। जिसके कारण फेंफड़ों के अलावा अन्य प्रकार के टीबी हो जाते हैं। फेंफड़ों के अलावा दूसरे अंगों में होने वाली टीबी को सामूहिक रूप से एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) के रूप में चिह्नित किया जाता है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) अधिकतर कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों और छोटे बच्चों में अधिक आम होता है। एचआईवी से पीड़ित लोगों में, एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) 50 प्रतिशत से अधिक मामलों में पाया जाता है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) को अंगों के हिसाब से नाम दिया गया है। अगर टीबी का जीवाणु केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है तो वह मैनिंजाइटिस टीबी कहलाती है। लिम्फ नोड (लसिका प्रणाली, गर्दन की गंडमाला में) में होने वाली टीबी को लिम्फ नोड टीबी कहा जाता है। पेराकार्डिटिस तपेदिक में ह्रदय  के आसपास की झिल्ली (पेरीकार्डियम) प्रभावित होती है। पेराकार्डिटिस तपेदिक में पेरीकार्डियम झिल्ली और ह्रदय के बीच की जगह में फ्लूइड (तरल पदार्थ) भर जाता है। हड्डियों व जोड़ों को प्रभावित करने वाली टीबी हड्डी व् जोड़ों की टीबी कहलाती है। जनन मूत्रीय प्रणाली को प्रभावित करने वाली टीबी जेनिटोयूरिनरी टीबी (मूत्रजननांगी तपेदिक) कहलाती है। इसके अलावा भी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर विभिन्न प्रकार की एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (इतर फुफ्फुसीय यक्ष्मा) करता है।    


ड्रग रेजिस्टेंस टीबी के प्रकार
1) मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी- इस प्रकार की ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फस्र्ट लाइन ड्रग्स का टीबी के जीवाणु  (माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस) पर कोई असर नहीं होता है। अगर टीबी का मरीज नियमित रूप से टीबी की दवाई नहीं लेता है या मरीज द्वारा जब गलत तरीके से टीबी की दवा ली जाती है या मरीज को गलत तरीके से दवा दी जाती है और या फिर टीबी का रोगी बीच में ही टीबी के कोर्स को छोड़ देता है (टीबी के मामले में अगर एक दिन भी दवा खानी छूट जाती है तब भी खतरा होता है) तो रोगी को मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी हो सकती है। इसलिए टीबी के रोगी को डॉक्टर के दिशा निर्देश में नियमित टीबी की दवाओं का सेवन करना चाहिए। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फस्र्ट लाइन ड्रग्स आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन जैसे दवाओं का मरीज पर कोई असर नहीं होता है क्योंकि आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन का टीबी का जीवाणु (माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस) प्रतिरोध करता है।
2) एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी- इस प्रकार की टीबी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी से ज्यादा घातक होती है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजीस्टेंट टीबी में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी के उपचार के लिए प्रयोग होने वाली सेकंड लाइन ड्रग्स का टीबी का जीवाणु प्रतिरोध करता है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फस्र्ट लाइन ड्रग्स आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन के साथ-साथ टीबी का जीवाणु सेकंड लाइन ड्रग्स में कोई फ्लोरोक्विनोलोन ड्रग (सीप्रोफ्लॉक्सासिन, लेवोफ्लॉक्सासिन और मोक्सीफ्लोक्सासिन) और कम से कम एक अन्य इंजेक्शन द्वारा दी जाने वाली ड्रग (अमिकासिन, कैनामायसिन और कैप्रीयोमायसिन) का प्रतिरोध करता है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का रोगी द्वारा अगर सेकंड लाइन ड्रग्स को भी ठीक तरह और समय से नहीं खाया जाता या लिया जाता है तो एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की सम्भावना बढ़ जाती है। इस प्रकार की टीबी में एक्सटेंसिव थर्ड लाइन ड्रग्स द्वारा 2 वर्श से अधिक तक उपचार किया जाता है। लेकिन एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का उपचार सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।

टीबी की जांच कैसे की जाती है
टीबी के लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर द्वारा रोगी को टीबी को जांचने के लिए कई तरह के टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है जो निम्न है-

1) स्पुटम/अन्य फ्लूइड टेस्ट- इस टेस्ट में मरीज के बलगम/अन्य फ्लूइड की लैब में प्रोसेसिंग होने के बाद स्लाइड पर उसका स्मीयर बनाया जाता है फिर उसकी एसिड फास्ट स्टैंनिंग की जाती है। स्टैंनिंग के बाद में स्लाइड पर टीबी के जीवाणु की माइक्रोस्कोप के जरिए पहचान की जाती है। माइक्रोस्कोप द्वारा बलगम की जांच में 2-3 घंटे का समय लगता है। इस जांच के आधार पर डॉक्टर रोगी का इलाज शुरू कर देता है। लेकिन विभिन्न कारणों की वजह से इसमे गड़बड़ी की आशंका होती है। इसलिए सैंपल का  प्रोसेसिंग के समय पर ही लोएस्टीन जेनसेन मीडिया पर कल्चर लगाया जाता है। इसके बाद सैंपल से इनोक्यूलेटेड कल्चर को इनक्यूबेटर में 37 डिग्री सेल्सियस पर रख देते हैं। इस जांच में 45 दिन या उससे अधिक समय लग सकता है।  

2) स्किन टेस्ट (मोन्टेक्स टेस्ट)- इसमे इंजेक्शन द्वारा दवाई स्किन में डाली जाती है जो 48-72 घंटे बाद पॉजिटिव रिजल्ट होने पर टी.बी. की पुष्टि होती है। लेकिन इस टेस्ट में बीसीजी टीका लगे हुए और लेटेंट टीबी संक्रमण का भी पॉजिटिव रिजल्ट आ जाता है।

3) लाइन प्रोब असे- यह एक रैपिड ड्रग संवेदनशीलता टेस्ट है। इस टेस्ट के जरिए टीबी के जीवाणु के फर्स्ट लाइन ड्रग्स (आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन) के प्रतिरोध से जुडी जेनेटिक म्यूटेशन की पहचान 1-2 दिनों में कर ली जाती है जिसकी वजह से मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की भी पहचान हो जाती है।

4) जीन एक्सपर्ट टेस्ट- नवीनतम तकनीक जीन एक्सपर्ट एक कार्टिरेज बेस्ड न्यूक्लिक एसिड एम्फ्लिफिकेशन आधारित टेस्ट है। जीन एक्सपर्ट द्वारा महज दो घंटे में बलगम द्वारा टीबी का पता लगाया जा सकता है। साथ ही इस टेस्ट में जीवाणु के फर्स्ट लाइन ड्रग रिफाम्पिसिन के प्रतिरोध से जुडी जेनेटिक म्यूटेशन तक की भी पहचान कर ली जाती है जिसकी वजह से मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की भी पहचान हो जाती है।

टीबी का उपचार
टीबी के जीवाणुओं को मारने के लिए इसका उपचार करने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। टीबी के उपचार में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली दो एंटीबायोटिक्स आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन हैं, और उपचार कई महीनों तक चल सकता है। सामान्य टीबी का उपचार ६-९ महीने में किया जाता है। इन छह महीनों में पहले दो महीने आइसोनियाजिड, रिफाम्पिसिन, इथाम्बुटोल और पायराजीनामाईड का उपयोग किया जाता है। इसके बाद इथाम्बुटोल और पैराजिनामाइड ड्रग्स को बंद कर दिया जाता है बाकी के ४-७ महीने आइसोनियाजिड और रिफाम्पिसिन का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही टीबी के इलाज के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन इंजेक्शन का भी उपयोग किया जाता है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में फर्स्ट लाइन ड्रग्स का प्रभाव खत्म हो जाता है इसके लिए सेकंड लाइन ड्रग्स का उपयोग किया जाता है जिसमे सीप्रोफ्लॉक्सासिन, लेवोफ्लॉक्सासिन, मोक्सीफ्लोक्सासिन, अमिकासिन, कैनामायसिन और कैप्रीयोमायसिन इत्यादि एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जाता है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का इलाज २ साल तक चलता है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का इलाज डॉक्टर की विशेष देखरेख में थर्ड लाइन ड्रग्स द्वारा किया जाता है। एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का इलाज दो वर्ष से अधिक समय तक चलाया जाता है।  एक्सटेनसिवली ड्रग रेजिस्टेंस टीबी अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है।       

टीबी की रोकथाम
1)  क्षय रोग की रोकथाम और नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से शिशुओं के बैसिलस कैल्मेट-ग्यूरिन (बीसीजी) का टीकाकरण कराना चाहिए  बच्चों में यह 20% से ज्यादा संक्रमण होने का जोखिम कम करता है।
2)  सक्रिय मामलों के पता लगने पर उनका उचित उपचार किया जाना चाहिए। टीबी रोग का उपचार जितना जल्दी शुरू होगा उतनी जल्दी ही रोग से निदान मिलेगा।
3)  टीबी रोग से संक्रमित रोगी को खाँसते वक्त मुँह पर कपड़ा रखना चाहिए, और  भीड़-भाड़ वाली जगह पर या बाहर कहीं भी नहीं थूकना चाहिए।
4)   साफ-सफाई के ध्यान रखने के साथ-साथ कुछ बातों का ध्यान रखने से भी टीबी के संक्रमण से बचा जा सकता है।
5)   ताजे फल, सब्जी और कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, फैट युक्त आहार का सेवन कर रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। अगर व्यक्ति की रोक प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी तो भी टीबी रोग से काफी हद तक बचा जा सकता हैं।

लेखक
ब्रह्मानंद राजपूत, दहतोरा, आगरा (पूर्व प्रोजेक्ट ट्रेनी, राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ रोग संस्थान एवं अन्य मायकोबैक्टीरियल रोग, आगरा)
(Brahmanand Rajput) Dehtora, Agra

युद्ध और शांति के बीच जल

अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस -2018 पर विशेष 

( प्रख्यात पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक श्रृंखला)

प्रस्तुति : अरुण तिवारी

यह दावा अक्सर सुनाई पड़ जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा। मुझे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रही कि इस बारे में दुनिया के अन्य देशों से मिलने वाले संकेत क्या हैं ? मेरे मन के कुछेक सवालों का उत्तर जानने का एक मौका हाल ही में मेरे हाथ लग गया। प्रख्यात पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह, पिछले करीब ढाई वर्ष से एक वैश्विक जलयात्रा पर हैं। इस यात्रा के तहत् वह अब तक करीब 40 देशों की यात्रा कर चुके हैं। यात्रा को  'वर्ल्ड पीस वाटर वाॅक' का नाम दिया गया है। मैने श्री राजेन्द्र सिंह से निवेदन किया और वह मेरी जिज्ञासा के संदर्भ में अपने वैश्विक अनुभवों को साझा करें और वह राजी भी हो गए। मैने, दिनांक 07 मार्च, 2018 को सुबह नौ बजे से गांधी शांति प्रतिष्ठान के कमरा नंबर 103 में उनसे लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं श्री राजेन्द्र सिंह जी से हुई बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश :

भाग एक : क्या जल विश्व युद्ध की शुरुआत हो चुकी ?

प्र. - इस वक्त जो मुद्दे अंतर्राष्ट्रीय तनाव की सबसे बड़ी वजह बनते दिखाई दे रहे हैं, वे हैं - आतंकवाद, सीमा विवाद और आर्थिक तनातनी। निःसंदेह, संप्रदायिक मुद्दों को भी उभारने की कोशिशें भी साथ-साथ चल रही हैं। स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली ताक़ते अपनी सत्ता को निवासी-प्रवासी, शिया-सुन्नी, हिंदू-मुसलमां जैसे मसलों के उभार पर टिकाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में यह कथन कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा; आगे चलकर कितना सही साबित होगा ?

उ. - पूरी दुनिया में वाटर वार की यह जो बात लोग कह रहे हैं; यह निराधार नहीं है। पानी के कारण अतंर्राष्ट्रीय विवाद बढ़ रहे हैं। विस्थापन, तनाव और अशांति के दृश्य तेजी से उभर रहे हैं। ये दृश्य, काफी गंभीर और दर्द भरे हैं। पिछले कुछ वर्षों मंे पानी के संकट के कारण खासकर, मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से विस्थापन करने वालों की तादाद बढ़ी है। विस्थापित परिवारों ने खासकर यूरोप के जर्मनी, स्वीडन, बेल्जियम पुर्तगाल, इंग्लैण्ड फ्रांस, नीदरलैण्ड, डेनमार्क, इटली और स्विटज़रलैंड के नगरों की ओर रुख किया है। अकेले वर्ष 2015 में मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से करीब 05 लाख लोग, अकेले यूरोप के नगरों में गये हैं। जर्मनी की ओर रुख करने वालों की संख्या ही करीब एक लाख है। जर्मनी, टर्की विस्थापितों का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, यूरोप के नगरों की ओर हुए यह अब तक के सबसे बड़े विस्थापन का आंकड़ा है।

गौर करने की बात है कि विस्थापित व्यक्ति, रिफ्यूज़ी का दर्जा हासिल करने के बाद ही संबंधित देश में शासकीय कृपा के अधिकारी बनता है। अंतर्राष्ट्रीय स्थितियां ऐसी हैं कि विस्थापितों को रिफ्यूज़ी का दर्जा हासिल करने के लिए कई-कई साल लंबी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। परिणाम यह है कि जहां एक ओर विस्थापित परिवार, भूख, बीमारी और बेरोज़गारी से जूझने को मज़बूर हैं, वहीं दूसरी ओर जिन इलाकों विस्थापितों  वे विस्थापित हो रहे हैं; वहां क़ानून-व्यवस्था की समस्यायें खड़ी हो रही हैं। सांस्कृतिक तालमेल न बनने से भी समस्यायें हैं। 

यूरोप के नगरों के मेयर चिंतित हैं कि उनके नगरों का भविष्य क्या होगा ? विस्थापित चिंतित हैं कि उनका भविष्य क्या होगा ? पानी की कमी के नये शिकार वाले इलाकों के लेकर भावी उजाड़ की आशंका से चिंतित हैं। 17 मार्च को बाज्रील की राजधानी में एकत्र होने वाले पानी कार्यकर्ता चिंतित हैं कि अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे, उरुग्वे जैसे देशों ने 04 लाख, 60 हज़ार वर्ग मील में फैले बहुत बड़े भूजल भण्डार के उपयोग का मालिकाना अगले 100 साल के लिए कोक कोला और स्विस नेस्ले कंपनी को सौंपने का समझौता कर लिया है। भूजल भण्डार की बिक्री का यह दुनिया में अपने तरह का पहला और सबसे बड़ा समझौता है। इस चैतरफा चिंता ने मिलकर भिन्न समुदायों और देशों के बीच तनाव और अशांति बढ़ा दी है। 

आप देखिए कि  20 अक्तूबर, 2015 को टर्की के अंकारा में बम बलास्ट हुआ। 22 मार्च को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस मनाया जाता है। 22 मार्च, 2016 को जब बेल्ज़ियम के नगरों में वाटर कन्वेशन हो रहा था, तो बेल्ज़ियम के ब्रूसेल्स में विस्फोट हुआ। शांति प्रयासों को चोट पहुंचाने की कोशिश की गई। उसमें कई लोग मारे गये। 19 दिसम्बर, 2016 को बर्लिन की क्रिश्चियन मार्किट में हुए विस्फोट में 12 लोग मारे गये और 56 घायल हुए। यूरोपियन यूनियन ने जांच के लिए विस्थापित परिवारों को तलब किया। ऐसा होने पर मूल स्थानीय नागरिक, विस्थापितों को शक की निगाह से देखेंगे ही। शक हो, तो कोई किसी को कैसे सहयोग कर सकता है ? 

विस्थापितों को शरण देने के मसले पर यूरोप में भेदभाव पैदा हो गया है। पोलेण्ड और हंगरी ने किसी भी विस्थापित को अपने यहां शरण देने से इंकार कर दिया है। चेक रिपब्लिक ने सिर्फ 12 विस्थापितों को लेेने के साथ ही रोक लगा दी। यूरोपियन कमीशन ने इन तीनों के खिलाफ का क़ानूनी कार्रवाई शुरु कर दिया है। ब्रूसेल्स और इसकी पूर्वी राजधानी के बीच, वर्ष 2015 के शुरु में ही सीरियाई विस्थपितों को लेकर लंबी जंग चल चुकी है। इटली और ग्रीक जैसे तथाकथित फ्रंटलाइन देश, अपने उत्तरी पड़ोसी फ्रांस और आॅस्ट्रेलिया को लेकर असहज व्यवहार कर रहे हैं। कभी टर्की और जर्मनी अच्छे संबंधी थे। जर्मनी, विदेशी पर्यटकों को टर्की भेजता था। आज दोनो के बीच तनाव दिखाई दे रहा है। यूरोप के देश अब राय ले रहे हैं कि विस्थापितों को उनके देश वापस कैसे भेजा जाये। अफ्रीका से आने वाले विस्थापितों का संकट ज्यादा बढ़ गया है। तनाव और अशांति होगी ही।

प्र. - इस तनाव और अशांति के मूल में पानी ही है। यह बात साबित करने के लिए आपके पास क्या तथ्य हैं ?

उ. - यह साबित करने के लिए मेरे पास तथ्य ही तथ्य हैं। दक्षिण अफ्रीका के नगर - केपटाउन के गंभीर हो चुके जल संकट के बारे में आपने अख़बारों में पढ़ा ही होगा। संयुक्त अरब अमीरात के पानी के भयावह संकट के बारे में भी खबरें छप रही हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व जल विकास रिपोर्ट में आप जल्द ही पढ़ेंगे कि दुनिया के 3.6 अरब लोग यानी आधी आबादी ऐसी है, जो हर साल में कम से कम एक महीने पानी के लिए तरस जाती है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पानी के लिए तरसने वाली ऐसी आबादी की संख्या वर्ष 2050 तक 5.7 अरब पहुंच सकती है। 2050 तक दुनिया के पांच अरब से ज्यादा लोग के रिहायशी इलाकों में पानी पीने योग्य नहीं होगा। मैं सबसे पहले यहां सीरिया के बारे में कुछ तथ्य रखूंगा।....................... 

अरुण तिवारी
146, सुंदर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली - 110092
9868793799

बातचीत का अगला हिस्सा, भाग - 02 में 
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Mar 20, 2018

राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम

राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम को तत्काल लागू करने की उठी मांग, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन


ऩई दिल्ली। 20 मार्च 2018। मंगलवार को कई बार प्रदूषण की वजह से बंद किये गए और अब वायु प्रदूषण के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन चुके बदरपुर पावर प्लांट के सामने पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने पर्यावरण मंत्रालय से राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम (National Clean Air Program) को सार्वजनिक करने और सभी प्रदूषण के कारकों  को इस योजना में शामिल करने की मांग की, जिससे आगामी तीन सालों में 35 प्रतिशत प्रदूषण को कम करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल किया जा सके।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने थर्मल पावर प्लांट को प्रदूषण की एक बड़ी वजह बताते हुए कोयले से दूरी बढ़ाने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की मांग की।

वहीं दूसरी तरफ मुंबई में भी वाशी पुल पर भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने एक बड़ा सा बैनर लहराकर ‘मुंबई क्लिन एयर नाउ’’ की मांग की।

प्रदर्शन में शामिल पर्यावरण कार्यकर्ता रितेश द्विवेदी ने कहा, “हम लोग वायु प्रदूषण की वजह से काफी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं , जिसे आसानी से सही कदम उठाकर ठीक किया जा सकता है। हम यहां इसलिए हैं क्योंकि हमने इस स्थिति को बहुत बर्दाश्त कर लिया है और अब हम इस स्थिति को बदलते हुए देखना चाहते हैं । यह बदलाव तभी आएगा  जब सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास को सार्वजनिक मंच पर रखा जाएगा , जिससे हमें पता चल सके कि हम किस तरफ बढ़ रहे हैं। हम लोग यहां खड़े होकर उन लाखों लोगों के साथ एकजुटता जता रहे हैं जो वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से पीड़ित हैं।”

ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट एयरपोक्लिप्स 2 में यह बताया गया है कि देश के 280 शहरों में, जहां वायु प्रदूषण की गुणवत्ता का डाटा उपलब्ध था उनमें से 80 प्रतिशत शहर की हवा गंभीर रुप से प्रदूषित हो चुकी है, 4 करोड़ 70 लाख बच्चे पूरे देश में इससे प्रभावित हैं और 58 करोड़ लोगों की हवा की गुणवत्ता को जांचने के लिये कोई कदम ही नहीं उठाया गया है।

राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम को तुरंत लागू करने की जरुरत है, ऐसा न हो कि यह भी थर्मल पावर प्लांट के लिये बने उत्सर्जन मानकों की अधिसूचना की तरह सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह जाये और जमीनी स्तर पर उसको लागू ही नहीं किया जाये। उत्सर्जन मानकों की अधिसूचना को पर्यावरण मंत्रालय ने साल 2015 में जारी किया था और थर्मल पावर प्लांट से अगले दो साल में इसपर अमल करके प्रदूषण को कम करने को कहा था, लेकिन अभी तक एक भी पावर प्लांट ने इस अधिसूचना को पूरी तरह से लागू नहीं किया है।

राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, इससे यह चिंता उठती है कि फिर कैसे इस कार्यक्रम में लोगों की साझेदारी को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

मुंबई और दिल्ली के प्रदर्शन पर बात करते हुए ग्रीनपीस इंडिया के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया कहते हैं, “हम यह संदेश देना चाहते हैं कि इस देश के लोग वायु प्रदूषण के खिलाफ एकजुट हैं और अपने जीने के अधिकार के लिये संघर्षरत हैं। हम यह नहीं होने देंगे कि कुछ प्रदूषण फैलानी वाली कंपनियों के हितों की रक्षा के लिये आम लोगों के स्वास्थ्य पर संकट उत्पन्न हो जाये। राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम में भी बड़े प्रदूषक अपना प्रदूषण कैसे कम करेंगे, इस पर कोई चर्चा नहीं की गयी है, जो दिखाता है कि सरकार अभी भी थर्मल पावर प्लांट जैसे प्रदूषकों से निपटने के लिये गंभीर नहीं है। अगर सरकार इस समस्या से निपटने के लिये गंभीर है तो उसे तुरंत राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम को सार्वजनिक करके उसे लागू करने के लिये जल्द-से-जल्द कदम उठाने की जरुरत है।”

अविनाश कुमार
ग्रीनपीस इंडिया
avinash.kumar@greenpeace.org

शाहजहांपुर में मिला कूबड़ वाला कटहवा कछुआ



कछुए की खास बातें
=कूबड़ वाले कछुए को हिन्दी में कटहवा और वैज्ञानिक नाम निल्ससोनिया है
=गंगा नदी में इन्हीं कटहवा कछुओं को डाला जाता है, क्योंकि यह मांसाहारी हैं
=सड़ीगली लाशों को खाकर गंगा की सफाई करने में सबसे मददगार है कटहवा
=कटहवा को पालने पर पाबंदी है, पकड़े जाने पर सात साल की सजा का प्रावधान

फोटो : शाहजहांपुर में खन्नौत नदी से मिला कूबड़ वाला दुर्लभ प्रजाति का कछुआ।
शाहजहांपुर। 
कूबड़ वाला कछुआ बहुत ही काम है। इस कछुए को हिन्दी में कटहवा कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम निल्ससोनिया है। इसे कटहवा इसलिए कहते हैं कि क्योंकि मांसाहारी होने के कारण यह कछुआ सख्त से सख्त से हडडी को पलक झपकते काट देता है। इस कछुए को गंगा सफाई के लिए बेहद मुफीद माना जाता है, इसीलिए इस कटहवा कछुए के अंडे संरक्षित कर उसमें से निकलने वाले कछुओं को गंगा में छोड़ा जा रहा है। शाहजहांपुर में जो कूबड़ वाला कछुआ बरामद किया गया है, दरअसल वह कूबड़ किसी बीमारी के चलते ही निकला है। कछुओं के संरक्षण पर काम करने वाली संस्था के सदस्यों ने इस बात पर चिंता जताई है कि कटहवा कछुओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। संस्था के सदस्य भास्कर दीक्षित ने आशंका जताई है कि इस कूबड़ वाली बीमारी के चलते भी कटहवा कछुआ की संख्या कम हो रही है। फिलहाल यह कछुआ अब वन विभाग ने कब्जे में ले लिया है।
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500 रुपए में शिकारी से खरीदा रामबली ने
शाहजहांपुर में खन्नौत नदी से मछली के शिकार के दौरान जाल में एक कछुआ फंस गया था। कछुआ का वजन करीब पंद्रह किलोग्राम है। कछुआ की पीठ पर काफी बड़ा कूबड़ उभरा हुआ था। इस कछुआ के पीठ पर उभरे कूबड़ को लोग शिवलिंग मान कर दर्शन कर रहे थे। इस कछुआ को लालपुल मोक्षधाम के चौकीदार रामबली ने शिकार से खरीदा है, चौकीदार ही कछुआ को संरक्षित रखे हुए था। रामबली ने बताया कि शुक्रवार दोपहर में एक शिकारी ने खन्नौत नदी में जाल फेंका, मछलियों के साथ में जाल में एक कछुआ भी फंस गया। शिकारी मछलियों और कछुआ को लेकर लालपुल मोक्षधाम के सामने से जा रहा था, तभी मोक्षधाम के चौकीदार रामबली और पप्पू ने शिकारी के हाथ में कछुआ देख कर रोका। रामबली ने शिकारी से कछुआ को पांच सौ रुपए में खरीद लिया। इसके बाद रामबली कछुआ को मोक्षधाम के बगीचे में ले आया। वहीं उसके भोजन आदि का इंतजाम किया।
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वन विभाग के अफसर आकर ले गए कछुआ
शनिवार को शाहजहांपुर के लालपुर मोक्षधाम जाकर वन विभाग के अफसरों ने कछुआ को रामबली से कब्जे में ले लिया। रामबली ने पहले तो कछुआ देने से इनकार कर दिया था, लेकिन वन विभाग के अफसरों ने कार्रवाई करने की बात कही तो रामबली ने तुरंत ही कछुआ उनकी सुपुर्दगी में दे दिया। इस मामले में डीएफओ ने बताया कि कछुआ उनके संरक्षण में है। उच्चाधिकारियों के निर्देश का इंतजार है। हालांकि इसके आगे डीएफओ ने कुछ भी नहीं बताया, लेकिन माना जा रहा है कि कछुआ या तो नदी में छोड़ दिया जाएगा या फिर कछुआ को लखनऊ के कुकरैल स्थित संरक्षण में भेजा जा सकता है।
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पालने पर पाबंदी है कटहवा कछुआ को
कटहवा कछुआ कोई साधारण कछुआ नहीं है। इस कटहवा कछुआ को अगर किसी के पास से बरामद किया जाता है तो उस पर उसी धारा में मुकदमा दर्र्ज किया जाता है, जिस धारा में टाइगर की बरामदगी पर होता है। इस कछुआ को रखने या पालने वाले को सात साल तक की सजा का भी प्रावधान है। अन्य सामान्य प्रजाति के कछुओं को पालने और रखने पर कोर्ई पाबंदी नहीं है। लेकिन कटहवा को पाला तो जेल भी जाना पड़ सकता है। 
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गोंडा में कई साल पहले मिला था कूबड़ वाला कटहवा
फोटो : भास्कर दीक्षित
कछुओं के संरक्षण के लिए विश्व के 17 देशों में काम करने वाली संस्था टर्टल सर्वाइवल एलायंस संस्था के तराई इलाके के कोआर्डीनेटर भास्कर दीक्षित बताते हैं कि नदियों में लगातार कटहवा कछुआ कम होता जा रहा है। बताया कि कई साल पहले गोंडा की एक नदी में कम वजन के इसी तरह के कूबड़ कछुआ उन्हें मिला था। भास्कर दीक्षित का मानना है कि कूबड़ किसी बीमारी के चलते ही कटहवा कछुआ में निकल रहा है। उन्होंने संभावना जताई है कि बीमारी के चलते भी कटहवा कछुओं की तादाद कम हो रही है। उन्होंने कहा कि यह शोध का विषय है। बताया कि कटहवा कछुआ नदियों की सफाई में सबसे लाभकारी जीव है। बताया कि इस कछुआ को संरक्षित करने पर जोर दिया जा रहा है। इस कछुआ को गंगा सफाई अभियान में भी इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि यह मांसाहारी है, यह सड़ीगली लाशों को खाकर नदी को साफ करता है।
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साभार : दैनिक हिन्दुस्तान, शाहजहांपुर संस्करण
दिनांक: 18 मार्च 2018
लेखक : विवेक सेंगर, शाहजहांपुर में हिन्दुस्तान अखबार के ब्यूरोचीफ हैं। दैनिक जागरण, अमर उजाला में भी वह सेवाएं दे चुके हैं। मानवीय संवेदनाओं से जुड़े मसलों को जोरशोर से उठाते हैं। जल, जंगल और जमीन के मसलों पर गहरी पकड़ रखते हैं। इनकी खबरों का अंदाज आम आदमी की आमबोलचाल जैसा रहता है।
viveksainger1@gmail.com

इस धरती पर गौरैया के रहने का मतलब ?



    . ( 20 मार्च ,विश्व गौरैया दिवस )


             "गौरैया"...यह नाम सुनते ही प्रायः हम बचपन की यादों में खो जाते हैं ,जहाँ माँ घर के आंगन में रखी लकड़ी की चौकी ( तखत) पर सुबह-सुबह अभी-अभी बना गर्म-गर्म चावल , नमक मिला कर मांड़ के साथ या अरहर की दाल के साथ देतीं थीं ..तभी आँगन में खपरैले मकान के मुंडेर पर बैठीं "कई गौरैयां"  कुछ ही दूरी पर आकर एक अत्यन्त मधुर आवाज़ में और एक बेहद ही भावनात्मक भाव भंगिमा में उसी चौकी पर या कुछ ही दूरी पर ( एक दम नजदीक) आकर बैठ जातीं थीं ....मानो कह रहीं हों.." हमारा हिस्सा...?"
                 .......और तब तक मधुर आवाज़ में चीं...चीं...करती रहतीं थीं जब तक उनके सामने पके हुए चावल के कुछ दाने दे न दिए जाँय । वह क्या सुन्दर और मनभावन दृश्य था..!,जिसकी छवि अभी भी मानस-पटल पर छाई हुई है । वह दाना अपने मुँह में दबाकर गौरैंयों की जोड़ियाँ कमरे के दरवाजे के उपर ऊँचाई पर लगी कड़ियों में सुरक्षित जगह में बनाये अपने घोसले में फुर्र से उड़ जाती थीं, जहाँ उनके दो या तीन नन्हें बच्चे अपना मुँह खोले तेज आवाज में चीं..$$..चीं..$$ की तेज आवाज में लगातार आवाज लगाकर अपनी नन्हीं माँ से मानो कह रहे होते थे कि ,"मम्मी बहुत जोर की भूख लगी है..जल्दी खाना दो "अक्सर वे इस क्रम में अपना हिस्सा माँगने के लिए घोसले से बाहर अपनी चोंच खोले,उनका मासूम चेहरा झाँकता दिखाई दे जाता था..।
               अब शहरों में हर आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस घरों में वो दृश्य सदा के लिए दुर्लभ हो गया है , घर-आँगन की जीवन्तता का प्रतीक वो बचपन की यादें अब सपना बन कर रह गईं हैं । हमारे तथाकथित आधुनिक विकास ,हवस ,लालच , अत्यधिक पाने की होड़ आदि गलाकाटू प्रतियोगिता ने "गौरैया रानी" को विलुप्ति के कगा़र पर ला खड़ा कर दिया है ।
                अब गौरैयां मनुष्यजनित कुकर्मों की वजह से शहरों की बात छोड़िए गाँवों में भी नहीं दिख रहीं हैं । आधुनिक सूचना के संवाहक बने हरेक हाथ में मोबाईल फोनों के लिए जगह-जगह घरों-मकानों-अस्पतालों आदि के ऊपर लगे ऊँचे-ऊँचे टावरों से निकलने वाली उच्च क्षमता की वेव तरगें ,जो गौरैया से कई हजार गुना बड़े मनुष्य को भी उनके तीव्र बीम के सामने आ जाने पर मूर्छित करने की क्षमता रखने वाली तरंगें "गौरैया रानी" के लिए सबसे बड़ी "भष्मासुर" साबित हुई हैं ।
                  गाँवों में हम प्रायः देखते थे ,कि बाजरा जब पकने को होता था, उनमें चमकीले दाने दिखने शुरु होते थे ,तब "गौरैंयों का झुँड" खेतों में उन बाजरे की बालियों पर आने लगते थे , जो उनका सबसे मनपसंद भोजन था । उस समय के किसान भी उन्हें भगाने के लिए टीन के कनस्तर पीटकर शोर मचाते थे गुलेल और मिट्टी के डले भी उनको भगाने के लिए प्रयोग किए जाते थे । प्रायः वे इससे खेत के एक भाग से उड़कर दूसरे भाग में जाकर अपना भर पेट मनपसंद खाना खाने में सफल रहतीं थीं । अब सुना है , गाँव का "आधुनिक किसान" बाजरे की बालियों में दाना आने से पूर्व ही उनपर अत्यन्त घातक  "कीटनाशक-जो गौरैयानाशक" भी होता है ,का छिड़काव पूरे खेत की फसल पर अत्यधुनिक स्प्रे मशीनों से कर देता है ।
              हम अक्सर आज से लगभग पचास साल पूर्व प्रातःकाल गाँव के सभी बच्चे और बड़े लोग गंगा नदी में स्नान करने जाते थे । वहाँ का दृश्य भी बड़ा नयनाभिराम होता था । उस समय गंगा जी ( उस समय हम सभी गाँव के लोग गंगा को "गंगा जी" ही आदरभाव से बोलते थे ) एक तरफ हम लोग गंगा जी के एकदम नीले, पारदर्शक , स्वच्छ ,निर्मल जल में नहा रहे होते थे ।
             दूसरी तरफ घर से ले आई गईं पूड़ियों और उबले नमकीन चने और हलुए को कुछ लोग स्नान करके गंगातट पर बनी मचानों खा रहे होते और वहीं चिड़ियों का झुँड ,जिनमें अक्सर कौवे , कबूतर , फाख्ते , गौरैया आदि-आदि भी अपने हिस्सा पाने के लिए धमा-चौकड़ी मचाये रहती थीं । अक्सर ये सारी चिड़ियाँ कुछ खाकर वहीं कुछ दूर पर गंगा का स्वच्छ पानी भी पीटर कपनी प्यास भी बुझा लेतीं थीं ।
             आज भयंकर प्रदूषण की वजह से गंगा यमुना या किसी भी भारतीय नदी का पानी "पीना" तो छोड़िये "नहाने" या "छूने" की हिम्मत नहीं है ,इतना नाले जैसा "काला" ,"सड़ा","बदबूदार" और "बजबजाता" है । उसको चिड़ियाँ क्या अपनी प्यास बुझा सकतीं हैं ?
            "तथाकथित" आधुनिक "विकास" के नाम पर शहरों की सड़कों को चौड़ी करने के नाम पर सैकड़ों साल पुराने चिड़ियों के स्थाई बसेरे हरे-भरे लाखों पेड़ों को अतिनिर्दयतापूर्वक अत्याधुनिक मशीनों से रातो-रात काट डाले जाते हैं । तथाकथित आधुनिक जीवन शैली की परिचायक पचास-पचास मंजिली इमारतें कुछ ही महीनों में बड़ी-बड़ी लिफ्ट मशीनों की मदद से खड़ी कर दी जातीं हैं ,अत्यन्त खेद है कि इन अत्याधुनिक गगनचुंबी इमारतों में एक भी गौरैया के घोसले बनाने की जगह नहीं होती ।
              आज कितनी दुखद स्थिति है कि हम मनुष्य प्रजाति अपने स्वार्थ ,लालच और हवश के वशीभूत होकर इस अदना ,भोली ,निश्छल , नन्हीं-मुन्नी , पारिवारिक सदस्या "गौरैया रानी " का कंक्रीट का जंगल बनाकर "घर" छीन लिया ,तथाकथित विकास के नाम पर लाखों पेड़ों की अंधाधुंध कटाई करके उनका "आश्रय" छीन लिया , फसलों पर कीटनाशकों का प्रयोग करके उनको "भूखा" रखने या खाकर मरने को बाध्यकर दिया , प्राकृतिक श्रोतों नदी ,तालाबों को अत्यन्त प्रदूषित कर उसके पानी को पीने से उन "मासूम परिंदों" को "प्यासे" मरने को बाध्य कर दिया , आकाश में मोबाईल टावरों से अति तीव्र रेडिएशन तरंगों को सर्वत्र भेजकर उन "भले-नन्हें प्रणियों" को मुक्त गगन में विचरण पर रोक लगा दिया ।
                जरा सोचिए अगर यह प्रतिबंध मनुष्य पर लगा दी जाय , खाने पर ,पीने पर ,घर बनाने पर ,घूमने-फिरने पर तो , मनुष्य जैसा बड़ा प्राणी ( औसत वजन 60 किलोग्राम)  कितने दिन इस धरती पर अपने को जीवित रख पायेगा ? यह नन्हीं "गौरैया रानी" तो 8 या 9 ग्राम वजन की है , इतने प्रतिबंधों के बाद इन्हें "विलुप्त होना " ही इसका हश्र हो रहा है तो , इसमें आश्चर्य की क्या बात है ?
               एक सर्वमान्य तथ्य है कि बाघ बचेंगे तो जंगल के सभी जीव बचेंगे । इसी प्रकार अगर हमारी पारिवारिक नन्हीं सदस्या आज हमारे कुकर्मों की वजह से विलुप्ती के कग़ार पर खड़ी है और संभव है कुछ दिनों में मारीशस के "डोडो" पक्षी की तरह विलुप्त हो जाय और हमारी भावी पीढ़ी ,हमारे बच्चे अपनी किताबों में इसका फोटो देखकर पहचानें कि यह "गौरैया" नाम की एक "चिड़िया" इस धरती पर हमारे घरों में ही अपना घोसला बनाकर  हमारे साथ रहती थी ,साथ-साथ खाना थी और अपने बच्चे पालती थी ,तो हमारी संतानें हमें हमारे इस जघन्य और अक्षम्य अपऱाध के लिए कभी माफ नहीं करेंगी ।
               अभी भी समय है कि हम इस 85% से 90% तक विलुप्त हो चुकी इस  चिड़िया(गौरैया)  के विलुप्ती के कारणों का अतिशिघ्रता से निराकरण करें । वैज्ञानिकों को ऐसे सूचनातंत्र का विकास करना चाहिए कि दूरस्थ व्यक्ति से संवाद भी हो और यह प्रकृति के इस अनुपम जीव पर भी कुछ दुष्प्रभाव न पड़े , नदियों ,तालाबों का पानी प्रदूषण मुक्त करने का कार्य तीव्र और युद्धस्तर पर हो ,हरे-भरे पेड़ों को जहाँ तक संभव हो कम से कम काटा जाय , सही मायने में वृक्षारोपण और उनका पालन हो ,वृक्षारोपण के नाम पर केवल नाटक न हो , घरों में इन नन्हीं चिड़िया के घोसले के लिए अवश्य स्थान छोड़ा जाय ।
                अगर वास्तव में गौरैयों को बचाने के लिए वर्तमान सरकारें और देश के संवेदनशील लोग अगर गंभीर हैं ,तो जैसे बाघों को बचाने के लिए देश में जगह - जगह शिकारियों से मुक्त "बाघ अभयारण्य" बनाये गये हैं ,वैसे ही शहरों से दूर किसी वन्य प्रान्तर में , जहाँ की आबादी अत्यन्त विरल हो ,परन्तु हो, (क्योंकि गौरैया मानव बस्ती के पास ही रहना पसंद करतीं हैं ), के पाँच-सात वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को मोबाईल टावरों और मोबाईल रेडिएशन से एकदम मुक्त क्षेत्र बनाये जाँय ।( क्योंकि गौरैयों के विलुप्तिकरण का सबसे बड़ा कारण मोबाईल टावरों से निकलने वाली ये घातक रेडिएशन किरणें ही हैं )। उसके साथ ही किसी बड़े कीटनाशकों से मुक्त एक स्वच्छ  प्राकृतिक जल स्रोत की भी व्यवस्था हो ताकि ये नन्हें परिन्दे भीषण गर्मी में अपनी प्यास बुझा सकें ।
              अगर नहीं तो आज जिन वजहों से गौरैया प्रजाति विलुप्त हो रहीं हैं कुछ सालों में मनुष्य प्रजाति भी विलुप्त हो जायेगी । तब केवल इस पृथ्वी पर दिवारों के दरारों में छिपे झिंगुरों और तिलचट्टों की प्रजातियों की क्रंदन करतीं आवाजें रह जायेंगीं ...बहुत.. बहुत... अफ़सोस...।
           तब , इस पूरे ब्रह्माण्ड के अरबों ,खरबों निहारिकाओं ,तारों ,ग्रहों ,उपग्रहों की विशाल वीराने में जीवन के स्पंदन से युक्त इस धरती से "जीवों" का यूँ विलुप्त होना ..अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण और अत्यन्त विषादपूर्ण घटना होगी ।
             परन्तु , ...निराशा के अंतिम क्षणों में ही.....आशा की किरण भी अचानक आती है ..। आइये हम सभी पृथ्वीवासी यह प्रतिज्ञा करें ,कि हम अपने घर की इस "नन्हीं पारिवारिक सदस्या" को विलुप्त नहीं होने देंगे ..। सभी इस पुनीत कार्य में सहयोग करें..तो यह "नन्हीं जान" क्यों नहीं बच सकती ..?

-निर्मल कुमार शर्मा ,"गौरैया संरक्षण " , गाजियाबाद
nirmalkumarsharma3@gmail.com

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
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धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था