International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jan 22, 2015

पन्ना टाइगर रिजर्व को फिर मिला एक्टिव मैनेजमेन्ट अवार्ड


देश के सर्वश्रेष्ठ बाघ अयारण्यों में शामिल होने से बढ़ा गौरव 
समान मिलने से पार्क के अधिकारी, कर्मचारी व पन्नावासी हुए प्रफुल्लित 
पन्ना, मध्य प्रदेश , म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व को एक बार फिर एक्टिव मैनेजमेन्ट अवार्ड हासिल हुआ है. केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने आज नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में यह अवार्ड पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति को प्रदान किया. उत्कृष्ट प्रबंधन का यह समान मिलने से पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारी व कर्मचारी जहां प्रफुल्लित हैं, वहीं पन्ना जिले के लोग भी गौरव का अनुभव कर रहे हैं. 


उल्लेखनीय है कि उत्कृष्ट प्रबंधन, टीम वर्क और बाघ पुर्नस्थापना योजना को मिली शानदार सफलता से पन्ना टाइगर रिजर्व देश के सर्वश्रेष्ठ बाघ अयारण्यों में शामिल हो गया है. जिससे पन्ना ही नहीं अपितु समूचे प्रदेश का गौरव बढ़ा है. वर्ष 2009 में यहां पर बाघों का पूरी तरह से सफाया हो जाने के बाद बाघ पुर्नस्थापना योजना शुरू होने पर शासन द्वारा पन्ना टाइगर रिजर्व में आर.श्रीनिवास मूर्ति की पद स्थापना की गई थी. अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा सजग रहने वाले ईमानदार और निष्ठावान भारतीय वन सेवा के अधिकारी श्रीमूर्ति ने पन्ना टाइगर रिजर्व को एक नई पहचान और उसका पुराना गौरव वापस दिलाने के लिए जुनून की हद तक कार्य किया. उनकी मेहनत, लगन व निष्ठा देख पार्क के अधिकारी व मैदानी कर्मचारी भी प्रेरित हुए और एक ऐसी टीम तैयार हुई जिसने रात - दिन मेहनत करके पन्ना टाइगर रिजर्व को उस मुकाम तक पहुंचा दिया कि आज देश व दुनिया में उसकी चर्चा हो रही है, कामयाबी की गाथा सुनाई जा रही है. 



बाघों का खात्मा होने के बाद पन्ना टाइगर रिजर्व को फिर से आबाद करने की बड़ी चुनौती फील्ड डायरेक्टर श्री मूर्ति के सामने थी. शासन ने उनकी योग्यता व क्षमताओं को देखकर ही यहां पदस्थ किया था और वे इस कठिन परीक्षा में श्रेष्ठ अंकों के साथ न सिर्फ उत्तीर्ण हुए बल्कि कामयाबी की ऐसी मिशाल कायम कर दी कि पूरी दुनिया के बाघ विशेषज्ञों व वन्य जीव प्रेमियों का यहां तांता लगने लगा. लोग यहां आकर अध्ययन करते हैं और प्रबंधन के गुर सीखते हैं. क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति के कुशल नेतृत्व में बुन्देलखण्ड की धरती पन्ना टाइगर रिजर्व में मौजूदा समय 22 बाघ व बाघिन तथा शावक विचरण कर रहे हैं. यहां के जंगल में बाघों की दहाड़ व शावकों की किलकारी गूंजने लगी है, जिससे पन्ना का यह शानदार जंगल फिर से जीवंत हो उठा है. अब तो आलम यह है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में जन्में शावकों की दहाड़ विन्ध्यांचल के 10 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र में गूंज रही है. केन से सोन तक तथा केन से नर्वदा तक के विस्तृत कॉरीडोर में पन्ना के बाघों ने अपनी मौजूदगी दर्ज की है. 
पन्ना टाइगर रिजर्व के उप संचालक अनुपम सहाय ने जानकारी देते हुए बताया कि नेशनल टाइगर कन्जरवेशन अथार्टी के तत्वाधान में विभिन्न गतिविधियों के लिए अवार्ड दिए जाते हैं उनमें एक्टिव मैनेजमेन्ट अवार्ड भी है. हर चार साल में मूल्यांकन करने के बाद ही चयन किया जाता है. पन्ना टाइगर रिजर्व को लगातार दूसरी बार एक्टिव मैनेजमेन्ट अवार्ड मिला है जो अपने आप में उल्लेखनीय और बड़ी उपलब्धि है. पिछली बार वर्ष 2012 में यह अवार्ड पन्ना टाइगर रिजर्व को मिला था, जिसे क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने ही प्राप्त किया था. श्री मूर्ति के नेतृत्व में उनकी टीम के उत्कृष्ट प्रबंधन को भारत शासन ने पूरे देश के बाघ अयारण्यों में सर्वश्रेष्ठ मानते हुए एक्टिव पार्क मैनेजमेन्ट अवार्ड दिया है. जिससे पन्ना टीम में उत्साह और ऊर्जा का संचार हुआ है. उमीद है कि यह टीम आने वाले समय में कामयाबी के नये सोपान तय करेगी और इसी तरह से पन्ना टाइगर रिजर्व व बुन्देलखण्ड की धरा का गौरव बढायेगी. 


अरुण सिंह 
पन्ना टाइगर रिजर्व 
मध्य प्रदेश भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com

Jan 18, 2015

सड़क हादसे ने फिर ली एक तेंदुए की जान




पन्द्रह दिनों के भीतर तीन तेंदुओं की मौत 
जंगलों के मध्य से गुजरती भीरा मैलानी रोड पर हुआ यह हादसा 
संरक्षित वन क्षेत्रो में तेज रफ्तार वन्यजीवो के लिए साबित हो रही जानलेवा
  

मैलानी-खीरी, बीती मध्य रात्रि मैलानी-पलिया स्टेट हाईवे पर अज्ञात वाहन से टकराकर वयस्क नर तेंदुआ की दर्दनाक मौत हो गई। वन विभाग ने अज्ञात वाहन चालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। तेंदुआ के शव को पोस्टमार्टम के लिए आरवीआरआई भेजा गया है. सड़के पर फर्राटा भरते वाहनो की चपेट में आकर किसी लुप्तप्राय वन्यजीव की मौत की यह तीसरी प्रमुख घटना है। इसे पहले भी वाहनो से टकराकर मैलानी रेंज में दो बाघो की मौत हो चुकी है.

पुराने विवरण के अनुसार मैलानी रेंज अन्तर्गत कम्पार्ट नं. आठ में गोला-खुटार रोड पर किसी अज्ञात वाहन से टकराकर एक नर बाघ की मौत हो गई थी। इस बाघ को सड़क से लगभग 25 मी. दूर जंगल में पाया गया था। उस समय भी सड़क पर तेज रफ्तार के वन्यजीवो को खतरा बताया गया था। मैलानी-भीरा के मध्य 17 सितंबर की रात्रि पलिया की ओर से आ रही डी.सी.एम. की टक्कर से एक बाघिन की मौके पर ही मौत हो गई थी। इस घटना से सबक लेते हुए दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने रात्रि में मैलानी-भीरा के मध्य वाहनो की तेज गति पर अंकुश लगाते हुए मैलानी और भीरा में न सिर्फ चेकपोस्ट स्थापित किए थे बल्कि रात्रि में गुजरने वाले वाहनो के नंबर भी रिकार्ड में दर्ज किए जाने लगे थे। लेकिन इसके बावजूद बीती रात्रि तेज रफ्तार के कहर से वयस्क तेंदुआ की मौत हो गई.

पिछले पंद्रह दिनों में दुधवा टाइगर रिजर्व के कतरनिया घात में एक तेंदुए की मौत सड़क दुर्घटना में और एक तेंदुए को शिकारियों द्वारा मारे जाने की घटनाएं हुयी, और बीती रात फिर एक तेंदुए की जान मैलानी भीरा सड़क पर तेज गति वाहन ने ले ली.







मौजूदा घटना में प्राप्त विवरण के अनुसार मैलानी- भीरा के पलिया स्टेट हाईवे पर किशनपुर वन्य जीव विहार  क्षेत्र से सटे कोरियानी गांव के समीप रात्रि लगभग एक बजे सड़क के किनारे तेंदुआ का शव पड़ा होने की सूचना किशनपुर वन्य जीव विहार के चेकपोस्ट को किसी वाहन चालक ने दी.  सूचना मिलते ही मैलानी रेंज के वन क्षेत्राधिकारी डीएस यादव, किशुनपुर मैलानी रेंज के वीसी तिवारी, भीरा रेंज की प्रशिक्षु वन क्षेत्राधिकारी शोभिता अग्रवाल, दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक वीके सिंह, किशनुपुर के वार्डन कल्पनाथ गौतम सहित तमाम अधिकारियो ने मौके पर पंहुचकर मौका मुआयना करने के तेंदुए के शव को कब्जे में ले लिया।

प्रभागीय वनाधिकारी नीरज कुमार (दक्षिण खीरी) का कहना है कि सड़क पार करने के प्रयास में तेंदुआ संभवतः किसी हल्के वाहन से टकरा गया होगा। तेंदुए के सिर्फ मुंह में गंभीर चोटें आई हैं। तेंदुए के शव का पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम कराने वन क्षेत्राधिकारी शव को लेकर भारतीय पशु पक्षी अनुसंधान संस्थान (बरेली) गए हैं। मृत नर तेंदुआ की उम्र तीन से चार आंकी गई है। मैलानी रेंज में अज्ञात वाहन के विरूद्व मुकदमा दर्ज किया गया है। वन विभाग का कहना कि घटना की रात्रि गुजरे वाहनो का विवरण प्राप्त करके टक्कर मारने वाले वाहन चालक के विरूद्व कार्रवाई की जायेगी।





तेंदुआ की किसी अज्ञात वाहन से टकराकर मौत के समय से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि संभवतः तेंदुआ शिकार की तलाश में कोरियानी गांव की ओर आ रहा होगा। क्योंकि पिछले दिनो तेंदुआ कोरियानी गांव में कई बकरियों का शिकर कर चुका था। घटनास्थल को देखने से पता  चलता है कि तेंदुआ सड़क को पार करने के प्रयास में किसी वाहन से टकरा गया होगा। तेंदुआ का शव सड़क किनारे खाई में पड़ा होने पर सूचना देने वाले वाहन चालक ने रात्रि के अन्धेरे में कैसे देख लिया कि तेंदुआ खाई में किसी पेड़ के नीचे पड़ा है। इसके अलावा सड़क पर जिस स्थान पर तेंदुआ को टक्कर लगी थी, उसके मुंह से निकले खून पर आक्षिर मिट्टी किसने डाली ? इसेघटना को छिपाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। 


ज्ञातव्य है कि वाइल्ड लाइफ एक्ट 1972 के अनुसार सूर्यास्त से पहले और सूर्यास्त के बाद संरक्षित वन क्षेत्र में वाहनो की स्पीड 30 किमी. प्रति घंटा निर्धारित की गई है, लेकिन शायद ही कभी इस नियम का पालन दुधवा नेशनल पार्क वन क्षेत्र या संरक्षित क्षेत्र में होता हो. 

वन विभाग और राज्य एवं केंद्र सरकारों ने यदि कोइ कड़े कदम नहीं उठाये तो यह सड़क हादसे तराई में बहुत कम संख्या में बचे हुए तेंदुओं की प्रजाति को ख़त्म कर देंगे.



सुनील निगम 
मैलानी -खीरी 
suniljagran100@gmail.com

Jan 15, 2015

किसान के लिए क्या मुफीद होगा नया भूमि अधिग्रहण क़ानून ?

क्या जल जंगल जमीन कार्पोरेट की भेट चढ़ेंगे ?

काले अध्यादेशों, प्राकृतिक संपदाओं की कम्पनी लूट की खुली छूट और जन-प्रतिरोध  राष्ट्रीय अधिवेशन


 सन् 2014 के आखिरी हफ्ते में मौजूदा मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण के लिए एक अध्यादेश जारी किया। इस अध्यादेश के जरिए से सरकार और कम्पनीयों द्वारा भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और आसान हो जाएगी। क्योंकि इस अध्यादेश में सन् 2013 में बने हुए संशोधित भूमि अधिग्रहण कानून में जो थोडे़ बहुत जनपक्षीय प्रावधान थे, उसे भी खत्म कर दिया गया और साथ ही साथ 13 अन्य कानूनों जैसे वनाधिकार कानून 2006, वन संरक्षण कानून आदि के प्रावधानों को भी अध्यादेश के अन्तर्गत कर लिया गया, जिससे इन कानूनों में लोगों के लिए जो अधिकार सुरक्षित रखे गये थे उसे भी निष्प्रभावी कर दिया गया, यानि के सरकार व कम्पनी द्वारा व्यक्तिगत और सार्वजनिक ज़मीनों का जो अधिग्रहण/अतिक्रमण होगा उसके खिलाफ कोई कानूनी प्रक्रिया अब नहीं होगी। सरकार ने एक झटके में जल,जंगल,ज़मीन व खनिज पर लोगों के जो भी सीमित अधिकार सुनिश्चत थे उसे भी खत्म कर दिये।

मोदी सरकार ने जो जनविरोधी कदम उठाये है वो सरासर संविधान विरोधी हैं। भारतीय संविधान में अनु0 39बी में प्राकृतिक संपदाओं पर नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए जो प्रावधान हैं यह अध्यादेश उन प्रावधानों को खारिज करता है। कोई भी निर्वाचित सरकार न्यायोचित ढ़ग से ऐसा कृत्य नहीं कर सकती है, ऐसा अध्यादेश केवल विशेष परिस्थिति में या आपातकालीन स्थिति में ही जारी होता है। सरकार ने न तो संसद में और न जनता के सामने ऐसा कोई कारण दर्शाया है, तो फिर ऐसे अध्यादेश की ज़रूरत क्यों पडी़ ? यह सच्चाई देश की जनता के सामने लाना जरूरी है। और तो और मोदी सरकार ने इन्ही दिनों में संसदीय प्रक्रिया का उल्लंघन करके कई काले अध्यादेश जारी किए। 

संसद का शीतकालीन अधिवेशन 23 दिसम्बर 2014 को खत्म हुआ, जिसमें इन विषयों पर संसद में बहस चल रही थी। लेकिन धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर सरकार की हटधर्मितापूर्ण रवैए के कारण बार-बार संसद का सत्र बाधित होता रहा और जिसके कारण भूमि अधिग्रहण कानून के संशोधनों पर दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा पूरी नहीं हो पायी थी। ऐसी परिस्थिति में सरकार को अगले सत्र के लिए इंतज़ार करना चाहिए था जो कि 2 महीने बाद बजट सत्र शुरू होना है। बजट सत्र संसद के सबसे लम्बा सत्र होता है जो लगभग 3 महीने चलता है। जिसमें इन संवेदनशील मुद्दों पर पूरी बहस हो सकती है। 

लेकिन सरकार ने शीतकालीन सत्र खत्म होने के एक हफ्ते के अन्दर ही इन काले अध्यादेशों को जारी किया। यह संसदीय प्रणाली की घोर अवमानना है, जिससे देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती नज़र आ रही हैं। एक तरह से इन अध्यादेशों से सरकार जानबूझ कर एक राजनैतिक अराजकता की स्थिति पैदा कर रही हंै, और जनता का ध्यान मूल समस्याओं जैसे महंगाई, बेरोजगारी, भू-अधिकार, भ्रष्टाचार से हटाने की साजि़श कर रही है।

इन परिस्थितियों से देश के करोडो़ं आम नागरिक, प्रगतिशील समाज, न्यायविदों और विपक्षी राजनैतिक दलों में हड़कम्प मच गया, सभी के लिए एक ही चिन्ता का विषय है कि मोदी सरकार के शासनकाल में केवल 7 महीने के अन्दर ही देश के संवैधानिक ढ़ाचे पर शासक दल का आक्रमण शुरू हो गया है और इसके चलते हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था अब खतरे में पड़ गयी है। 

भारत एक बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और बहुवर्गीय राष्ट्र है और शासकीय स्तर पर एक बहुराज्यीय संघ है। भारतीय संविधान इन विविधता और बहुलता को एकताबद्ध रखने का एक बुनियादी आधार हैं, यह महज़ एक दस्तावेज़ नहीं हैं, बल्कि लाखों करोडो़ं देशवासियों को एक जुट रखकर एक सशक्त राष्ट्रनिर्माण की प्राण है। अतः भारतीय संवैधानिक ढ़ाचे की छेड़खानी और इसकी अवमानना राष्ट्रहित के खिलाफ है। दरअसल मोदी सरकार प्रजातांत्रिक राष्ट्र व्यवस्था जिसमें सभी नागरिकों की सुरक्षा निहित है, उसे तोड़कर एक ऐसी व्यवस्था कायम करना चाहते है, जिसमें सिर्फ देशी और विदेशी कम्पनीयों (कारपोरेट) के निहित स्वार्थों की पूर्ति की जाएगी, साथ ही साथ इन कम्पनीयों के राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक तावेदार फलेंगे-फूलेंगे और आम जनता बेहाल।  कम्पनीयों के दबाव के चलते मोदी सरकार को जल्द से जल्द यह काम पूरा करना है और इसीलिए देशी-विदेशी बड़ी कम्पनीयों की आवभगत देश-विदेश में जोरो-शोरो से चल रही हैं। 


इस तरह से भारतीय गणराज्य फिर से गुलामी के दौर में पंहुच जायेगा। इन काले अध्यादेशों को जारी करके मोदी सरकार ने अपनी मंशा को साफ कर दिया, और अब मौजूदा सरकार के चरित्र के बारे में कोई भ्रम की गुंजाईश नहीं हैं। भले ही इस सरकार ने अपने चुनावी वादों में आम लोगों को अच्छे दिन लाने के बड़े-बडे़ सपने दिखाये थे, अब केवल पूंजीपतियों और इजा़रेदारों के लिए ही अच्छे दिन आएगें। अब कम्पनीयों को देश की प्राकृतिक संपदाओं को लूटने की खुली छूट मिलेगी और विकास के नाम पर बडे़-बडे़ कर्ज मुहैया कराये जायेंगे जिसका सारा बोझ आम जनता के कन्धों पर होगा और इनका हाल बदतर से बदतर होता जाएगा।

देश के तमाम मेहनतकश किसान, मज़दूर, कर्मचारी, लघुउद्यमी, छोटे व्यापारी, दस्तकारों, मछुवारे, रेहडी़ व पटरी वाले और इसके सर्मथक प्रगतिशील तबकों के लिए यह एक अति चुनौतीपूर्ण दौर हैं। अब शासकीय कुचक्र के खिलाफ संघर्ष के अलावा कोई और विकल्प नहीं है, बीच-बचाव करने का अब कोई सुराग भी नहीं बचा। इस जनविरोधी व्यवस्था के खिलाफ एक निर्णायक जनसंघर्ष ही एक मात्र विकल्प है। जिसमें तमाम शोषित, पीडि़त और प्रगतिशील शक्तियां एकजुट होकर एक नई राजनैतिक प्रक्रिया को जन्म देंगे। ऐसी प्रक्रिया जो लोकहितकारी और जनपक्षीय व्यवस्था की स्थापना करेगी। आज तमाम विरोधी पार्टियां भी जो ज्यादात्तर अब तक उदारीकरण नीति को ही अनुसरण कर रही थी, उनके अस्तित्वों में भी खतरा पैदा हो गया और वे भी अब एकजुट होने की कोशिश कर रहे है और जनसंघर्ष के साथ भी संवाद कर रहे है।

 हालांकि ये निश्चित नहीं है कि राजनैतिक दलों में से कितने दल लंबे समय तक जनसंघर्ष के साथ में चलेंगे लेकिन फिर भी एक उम्मीद तो जागी कि कुछ दिन तक ये संवाद तो जारी रहेंगे और मज़बूत भी होगे, वक्त का तकाज़ा भी यही हैं। जनसंघर्षों के लंबे समय से जुडे़ हुए संगठनों ऐसी परिस्थिति में स्वाभाविक रूप से करीब आ रहे हैं, और सामुहिक चर्चा की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अलग-अलग जगहों में अलग-अलग तरीके से अपनी मांगों को लेकर प्रक्रियाएं चल रही हैं। इन अलग-अलग प्रक्रियाओं को एक साॅझा मंच में समाहित होना हैं, ताकि अपनी संघर्षों और विचारों को और मजबूत करें। अलग-अलग रहकर अब लम्बे समय तक संघर्ष को जारी रखना सम्भव नहीं है। फिलहाल सबके लिए सबसे अहम मुद्दा इन काले अध्यादेशों को खत्म करना है। इस जनविरोधी व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए यह पहली कड़ी है।


इसी संदर्भ में कुछ प्रमुख जनसंगठनों ने मिलकर दिल्ली में 23-24 जनवरी 2015 को एक  दो दिवसीय् राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित करना तय किया हैं। हालांकि वर्तमान परिस्थिति के दबाव के चलते और जरूरत को देखते हुए यह सम्मेलन जल्दी में आयोजित किया जा रहा है। लेकिन कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा प्रमुख जनसंगठनों के प्रतिनिधिगण इसमें शामिल रहें, ताकि कुछ रणनीतिक और फौरी फैंसले लिए जा सके और आगे बढ़ सकें। निश्चित रूप से यह प्रयास यही खत्म नहीं होगा बल्कि राज्य व क्षेत्रों में ऐसे अधिवेशन/सम्मेलन का आयोजन किया जायेगा। ताकि एक निश्चित समय में सभी आन्दोलनकारी संगठन सामुहिक रूप से एक राष्ट्रीय जनान्दोलन खडा़ कर सकेगें ऐसा जनान्दोलन जो इस जनविरोधी व्यवस्था को चुनौती दे सकें।
इतिहास गवाह है कि भारत में पिछले 250 वर्षों में औपनिवेशिक काल में तथा आजा़द भारत में भी बार-बार ऐसे जनान्दोलन की रचना हुई और शासक वर्ग को धवस्त भी किया गया, लेकिन यह भी सच्चाई है कि हर बार जो भी नई व्यवस्था आयी वो भी लोगों को शोषण मुक्त नहीं कर पायी और ऐतिहासिक अन्याय जारी रहा। क्योंकि सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ जनसंघर्ष और प्रगतिशील राजनैतिक शक्तियां विघटीत होती गयी और सत्ताधारियों को अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चलाने की छूट मिलती चली गयी। इस बार जनसंघर्षकारी संगठनों को और भी जागरूक होकर संगठित संघर्ष को चलाना होगा ताकि जनसंघर्ष अपनी मंजिल तक पंहुच सके।
                         

रोमा 
romasnb@gmail.com

प्रिया पिल्लई ने स्काईप से ब्रिटिश सांसदों को संबोधित किया



अपनी आवाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने से महान, सिंगरौली के ग्रामीणों में खुशी की लहर
नई दिल्ली, 14 जनवरी 2015। ग्रीनपीस इंडिया की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई ने महान के लोगों की आवाज को वैश्विक मंच पर पहुंचाने की अपनी प्रतिबद्धता को दिखाते हुए आज ब्रिटिश संसद में उपस्थित सांसदों को संबोधित किया। यह उस समय हुआ है जब भारत सरकार ने दो दिन पहले ही उनके भाषण में बाधा डालने की कोशिश करते हुए उन्हें  लंदन के लिये उड़ान भरने से रोक दिया था।
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए प्रिया  ने कहा, “मैं यहां महान के लोगों का प्रतिनिधित्व करने और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिये जारी  संघर्ष के बारे में बात करने के लिये हूं।  आज मैं आपसे बात कर रही हूं क्योंकि एस्सार एनर्जी लंदन स्थित कंपनी है। मैं विकास चाहती हूं। यह विकास सभी लोगों सहित महान के लोगों तक भी पहुंचे इसी प्रेरणा के साथ मैं हर रोज काम करती हूं। मैंआपलोगों से आग्रह करती हूं कि आपलोग  एस्सार एनर्जी पर अपने प्रभाव का  इस्तेमाल करके महान में चल रहे पर्यावरण और मानव अधिकारों के उल्लंघन को बंद करने में मदद करें क्योंकि महान केन्द्रीय भारत के बचे-खुचे महत्वपूर्ण साल जंगलों में से एक है जिसे सिर्फ 14 सालों के कोयले  भंडार के लिये खत्म किया जाना है
प्रिया को लंदन स्थित एस्सार एनर्जी और उसके महान जंगल को खत्म करने की विनाशकारी योजना केबारे में बात करने के लिये ब्रिटिश संसद के ऑल पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप (एपीपीजी) द्वारा आमंत्रित किया गया था। ब्रिटिश सांसद प्रिया के लंदन न आने की वजह से निराश थे क्योंकि महान जैसे संवेदनशील मुद्दे को स्काईप कॉल से नहीं समझा जा सकता है। हालांकि वे विडियो कॉंफ्रेंसिंग के  लिये तैयार हो गए क्योंकि उन्होंने मुद्दे की अहमियत को समझते हुए  महान में लंदन स्थित एस्सार के कार्यों को जानना जरुरी समझा।
इस मुद्दे पर बोलते हुए लेबर पार्टी सांसद और  इंडो-ब्रिटिश एपीपीजी के अध्यक्ष विरेन्द्र शर्मा ने कहा, “प्रिया पिल्लई की कथित नजरबंदी चिंताजनक  बात है। लोकतंत्र में आंदोलन करने तथा सरकार पर सवाल उठाने की आजादी होनी  चाहिए। मुझे अपने भारतीय विरासत पर गर्व है। मेरा जन्म दुनिया के सबसे  बड़े लोकतंत्र में हुआ लेकिन किसी भी तरह की नाहक नजरबंदी राष्ट्र के लिये  शर्मनाक है

इस तरह के सरकारी उत्पीड़न की शिकार प्रिया अकेली नहीं है। महान के ग्रामीण जो लंदन जाने की योजना  बना रहे थे उन्हें भी स्थानीय पुलिस द्वारा पुछताछ का सामना करना पड़ा।  महान वन क्षेत्र की अनिता कुशवाहा ने कहा, “हमलोगों को बहुत गर्व है कि पहली बार हमारी समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया। हमलोग पूरी  दुनिया को बताना चाहते हैं कि इस कथित विकास से किसे फायदा पहुंचना है। हमारे लिये महान जंगल संरक्षक, भगवान, अन्नदाता है और हम इसे एस्सार के फायदे के लिये बर्बाद नहीं होने देंगे। अनिता उन ग्रामीणों में शामिल हैं जिन्हें लंदन जाना था।

प्रिया को देश छोड़ने से रोके जाने के तीन दिन बाद भी ग्रीनपीस अभी तक गृह मंत्रालयविदेश मंत्रालय और भारतीय हवाई अड्डा प्राधिकरण को किये अपने शिकायत पर जवाब की प्रतिक्षा कर रहा है।
सरकार के ऑफलोडिंग को सही साबित नहीं कर पाने पर टिप्पणी करते हुए प्रिया ने कहा,  “मुझे देश से बाहर जाने से रोके जाने की घटना एक सटीक मामला है कि कैसे सारे संबंधित मंत्रालय  एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए इस घटना को  कानून के तहत सही साबित करने में विफल हो गए हैं। कब सरकार से कोई इसकी जिम्मेदारी लेते हुए कहेगा कि, 'मैंने आदेश दिया?' इस कठोर नीति के बावजूद हम भारत के लोगों और पर्यावरण की रक्षा के लिये अपने आंदोलन को जारी रखेंगे"।

अविनाश कुमार 
ग्रीनपीस 
avinash.kumar@greenpeace.org

Jan 10, 2015

व्यंग तो दुनिया की तमाम बुराइयों को खुशनुमा अंदाज़ में दिखाने और सुनाने का तरीका मात्र है

देखना है बन्दूक और कलम की जंग में आखिर जीतता कौन है?


शार्ली एब्दो एक फ्रांसीसी साप्ताहिक पत्रिका जो मशहूर है अपने व्यंगात्मक कार्टून्स के लिए सारी दुनिया में, उस पत्रिका  के पेरिस स्थित कार्यालय में कट्टरपंथी आतंकवादियों ने १२ लोगों को मार दिया, ये बन्दूक की कलम से दुश्मनी में कौन जीतेगा ये तो जाहिर है, पर क्या व्यंग के लिए क़त्ल कर देना उचित है, क्या अहिंसात्मक कार्यवाहिया नहीं की जा सकती, व्यंग के खिलाफ, परन्तु सच्चाई तो ये है की व्यंग तो दुनिया की तमाम बुराइयों को खुशनुमा अंदाज़ में दिखाने और सुनाने का तरीका मात्र है, और यह व्यंग न हो तो लोगों में कितनी नीरसता आ जायेगी, यहाँ गौर तलब यह है व्यंग ने महाभारत करा दी...काश द्रौपदी के उस व्यंग को दुर्योधन ने गले न लगाया होता तो कुरु वंश बच जाता नष्ट होने से...

हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं में देखे तो प्रत्येक जाती धर्म व्यवस्था और सरकार के अलावा व्यक्तियों पर वह तंज़ कसे गए है की हँसते हँसते स्वास लेना मुश्किल हो जाए, फिर ये हंसाने वालों की ह्त्या क्यों? और पत्रकारिता जगत में यह अब तक की सबसे बड़ी ह्रदय विदारक घटना पर तमाम लोग आखिर चुप क्यों है, सवाल अगर भावनाओं के आहत होने का है, मान्यताओं के टूटने का डर है, तो यह निराधार है, बापू के शब्दों पर गौर करे तो धर्म व्यक्ति का निजी मसला होता है और इस निजी मसले को कोइ बाहर वाला कैसे प्रभावित कर सकता है, हमारे अंतर्मन को भेदना संभव है क्या जबतक हम इजाजत न दे....

शार्ली एब्दो ने दुनिया के तमाम धर्मों पर व्यंगात्मक लेख कार्टून्स बनाए और इस पत्रिका का विरोध भी होता रहा किन्तु ह्त्या कर देना वह भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिपाहियों की, ये क्या उस व्यंग और ह्त्या के तराजू में संतुलन लाता है?

दुनिया के तमाम देशों में व्यंगात्मक कलाकृतियों कार्टून्स और लेखों पर शोरगुल हुआ और सियासत भी पर विरोध का यह ह्त्या जैसा घृणित कार्य करने वाले लोग सिर्फ और सिर्फ अपने धर्म को बदनाम करते है.

...हम तो सर इकबाल की उस नज़्म को पढ़ते सुनते बड़े हुए है जिसमे उन्होंने कहा की ...मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना......शायद अब कोइ मायने नहीं रह गए इन शब्दों के लोगों के ज़हन में.....

दुनिया भर के लोगों ने शार्ली एब्दो पर हुए हमले के विरोध में कुछ रेखाये खींची है, हम चाहते है आप इन्हें देखे ही नहीं बल्कि इस हास्य पर जो मातम के मौके पर है अपनी राय भी दे....

#सम्पादक की कलम से  


  



















Image Credits: Various Sources on the Web 

Dudhwa Live Desk-


कतरनियाघाट वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी में एक तेंदुए की मौत



इस तरह तो विलुप्त हो जाएगा तराई के जंगलों से तेंदुआ 

शिकार और सड़क दुर्घटनाओं के कारण तेंदुए की संख्या बहुत कम हो चुकी है तराई के जंगलों में 


बहराइच-मिहीपुरवा (Katarniaghat Wildlife Sanctuary), सड़क दुर्घटना मे मादा तेदुअा की मौत,कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के मोतीपुर रेन्ज के खपरा वन चोकी के पास एन एच ७३० पर नानपारा लखीमपुर मार्ग पर सुबह ११ बजे अज्ञात वाहन की ठोकर से मादा तेदुए की मोत हो गयी जिसकी आयु लगभग डेढ़ वर्ष है.

 सुबह ११ बजे वन्यजीव प्रतिपालक विनय कुमार श्रीवास्तव बहराइच से लखीमपुर जा रहे थे तभी रास्ते मे भीड़ देखकर गाड़ी देखकर रोका तो देखा कि सड़क पर तेदुए की मौत हो गयी, इसकी सूचना वन क्षेत्राधिकारी खुर्शीद आलम खान मोतीपुर को देकर तत्काल बुलाया गया, मौके पर वनदरोगा रमाशकर सिह,राम व्रक्ष राव,वन रकक्षक शिव कुमार शर्मा ,परिक्रमादीन,पचंमलाल वनदरोगा आदि कर्मियों के साथ खपरा वन चौकी पर पहुंचे, वहां से तेदुए का शव मोतीपुर रेन्ज कैम्पस लाया गया, जहां डाक्टरों का पैनल पोस्टमार्टम करेगा।

इससे पहले भी हो चुकी हैं तमाम मौते इस खूबसूरत जीव तेंदुए की 

 इससे पूर्व सड़क दुर्घटना मे १९ अक्टूबर २०१४ को नर तेदुए की मौत, ६/०७/१३ को नर तेदुए की मौत, ४/१२/०७ को नर टाईगर्स की मौत हो चुकी है. सड़क की दोनो तरफ क्लीर व्यू न होने से सड़क पर चलने वाले वाहनो को जंगल से निकलने वाले जानवर नही दिखाई पड़ते है,यदि सड़क के दोनो तरफ २० मीटर तक झाड़ियो की सफाई करा दी जाये तो दूर से आने वाले वाहनो के ड्राइवर को जनावर दिखाई आसनी से पड़ सकते है और वन क्षेत्र मे वाहन की गति ३० किमी प्रति घन्टा निर्धारित कर रखा है परन्तु इस पर कोई अमल नही करता है, इस वजह असमय जानवरो की मौत हो रही है.

दुधवा लाइव डेस्क 

Jan 9, 2015

शार्ली एब्दो को सलाम...



जीसस शार्ली....

फ्रेंच मैगजीन शार्ली एब्दो के इस अंक में काले हुरूफ़ है जो की कई भाषाओं में है जिनमे लिखा जी'सस शार्ली ....(मैं शार्ली हूँ)


अगला अंक बुधवार को फिर होगा जारी.....

फ्रांस की एक साप्ताहिक मैगजीन जो दुनिया के तमाम मसलों पर बड़े तीखे तंज़ कसने में मशहूर रही, फिर चाहे वह राजीनीति हो या धर्म, इस साप्ताहिक मैगजीन ने कैथोलिक, दक्षिणपंथ और इस्लाम आदि धर्मों पर तीखे    अंदाज़ में कंटेंट प्रकाशित किए, कार्टून, लेख व् जोक्स के तौर पर, विवादों में रही यह पत्रिका सन १९६९ में शुरू हुई और १९८१ में बंद हुई, १९९२ में फिर इसकी शुरुवात हुई जो जारी है अनवरत तमाम आरोप प्रत्यारोपों के बावजूद. प्रत्येक बुधवार को प्रकाशित होने वाली शार्ली एब्दो, सन  २०१५ के पहले महीने के पहले बुधवार को अपने प्रकाशन के रोज़, कट्टरपंथियों के हमले का शिकार हुई, प्रोफेट मोहम्मद के कार्टून और उन्हें पत्रिका का गेस्ट एडीटर बनाकर पेश करने के लिए.
 अभी पिछले दिनों एक अंक में शार्ली एब्दो में मरियम और जीसस पर  भी व्यंगात्मक कार्टून जारी किया था.

 दुनिया में जब भी जेहाद के नाम पर बम दागे गए लोगों का क़त्ल किया गया, तब तब इस पत्रिका ने कट्टरपंथियों के विरोध में और उनकी कथित मान्यताओं पर व्यंग किए और इसके लिए इस पत्रिका को पहले भी निशाना बनाया गया सन २०११ में और शार्ली एब्दो के कार्यालय पर बम फेका गया, नतीजतन शार्ली एब्दो ने नए ठिकाने से दुनिया को बड़े बड़े मसलो और दिक्कतों को अपने अंदाज़ से झकझोरने की कोशिश की ताकि लोगों की मानवीय संवेदनाएं प्रखर रहे और मुखर भी बजाए की मानवता कट्टरपंथ की नापाक हरकतों से बिखर जाए........



पत्रिका ने तमाम आतंकवादी संगठनों के आकाओं के भी कार्टून्स प्रकाशित किए, दुनिया के किसी भी हिस्से में जब जब इस तरह की मिलीशिया ने मानवता के खिलाफ खून बहाया, शार्ली एब्दो ने उसे बड़े ही उम्दा ढंग से दिखाया दुनिया को कार्टून के जरिए, संवेदनाओं को जगाने की इस कोशिश में शार्ली एब्दो को जो कीमत चुकानी पडी इस बार उसे लौटाया नहीं जा सकता पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह सिलसिला जारी रहेगा...शार्ली एब्दो पत्रकारिता के प्रकाश स्तम्भ के तौर पर रोशन रहेगा कलम के सिपाहियों को रास्ता दिखाने के लिए हमेशा हमेशा ......


दुधवा लाइव मैगजीन शार्ली एब्दों पर हुए हमले की निंदा करते हुए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कट्टरपंथ और फिरकापरस्ती के विरोध में शार्ली एब्दो के साथ है. इस नृशंस हत्याकांड में मारे गए लोगों को दुधवा लाइव की तरफ से भाव भीनी श्रद्धांजली.....




दुधवा लाइव डेस्क 

Jan 4, 2015

एक अजगर जिसे कर दिया गया दर-बदर



कैमासुर गाँव (लखीमपुर-खीरी)  सुबह तकरीबन १० बजे मिली सूचना के मुताबिक़ जिला मुख्यालय से १० किमी की दोर्री पर स्थित गाँव कैमासुर में एक अजगर की मौजूदगी की बात कही गयी, "दुधवा लाइव टीम" ने मौके पर जाकर खबर के पुख्ता होने की पुष्टि की, ग्रामीण काफी भयभीत व् आक्रोशित थे, पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में कर रखा था, वन विभाग के लोग मूक दर्शक बने हुए थे, मंजर अजीब था, ग्रामीण लाठी डंडे, हसिया, भाला लिए हुए झाड़ियों को पीट रहे थे. 



दुधवा लाइव के संस्थापक कृष्ण कुमार मिश्र व् अन्य पत्रकार साथियों के साथ ग्रामीणों को यह बताने की सफल कोशिश की अजगर से किसी तरह का कोई नुकसान नहीं और न ही यह जहरीला है, आखिरकार ग्रामीणों ने साउथ खीरी वन विभाग की मदद के लिए आगे आये, और आस पास रहने वाली जन-जाती के लोगों को भी बुलवाया गया,  जिन्हें वन्य जीवन का अनुभव है, दुधवा लाइव प्रोजेक्ट के सदस्यों ने लोगों को अजगर पर किसी तरह के धार दार हथियार का इस्तेमाल करने से मना किया, और जीव के प्रति सहिष्णुता बरतने की भी गुजारिश की.



कुछ जागरूक ग्रामीणों ने उस अजगर को तमाम कवायदों के बाद एक जूट के बोरे में कैद कर वन विभाग को सौप दिया ताकि उसे खीरी के किसी सुरक्षित जंगल में छोड़ा जा सके.

दरअसल एक ग्रामीण के मकान के पिछले हिस्से में मौजूद आम की पुरानी बाग़, जिसमे तमाम तरह की झाड़ियाँ उगी थी और वे पूरी तरह से कई प्रकार की बेलों से ढकी हुई थी, इन्ही बेलों के नीचे की भुरभरी व् नाम मिट्टी में रहता था ये अजगर, यकीनन इसकी प्रजाति के अन्य सदस्यों की मौजूदगी भी यहाँ संभव है, पिछले तीन दिनों में हुई बारिश के बाद सूरज की चमक ने इस सांप को भी धूप सेकने के लिए मजबूर कर दिया, नतीजतन यह अजगर जमीन से निकलकर मंदिर नुमा आकृति की झाड़ियों पर चढ़कर बैठ गया. ग्रामीणों की नज़र में आने के बाद इसे यहाँ से हटाने या मार देने की बात कही जाने लगी. और यही वजह रही इसके इस आवास से इसके निष्कासन की.  



दुधवा लाइव के संस्थापक कृष्ण कुमार मिश्र ने बताया की यह भारतीय अजगर है जिसका नाम पाइथन मालुरस है, इसे ब्लैक टेल्ड पाइथन या इंडियन रॉक पाइथन भी कहते है,यह तीन मीटर तक लंबा हो सकता है, यह बहुत अच्छा तैराक, वृक्षों पर चढ़ने का कौशल, व् नम भूमियों में निवास  खासतौर पर किसी तालाब या नदी के किनारे, चलने में सुस्त और सामन्यता: यह हमलावर नहीं होता भले इस पर हमला हो रहा हो, इसके इसी व्यवहार से इसका शिकार आसानी से हो जाता है, देश व् विदेश में इसकी खाल व् मांस की तस्करी इसके शिकार की वजह है, यह १०० से अधिक अंडे देता है, एक अजगर की उम्र १५ वर्ष से भी अधिक हो सकती है, और भोजन के लिए यह पक्षियों, स्तनधारी छोटे जीवों, चूहे आदि  व् मेढक आदि का भी शिकार करता है. भारतीय वन्य जीव अधिनियम १९७२ के तहत अज़गर को सेड्युल १ के तहत सरक्षित श्रेणी में रखा है, इसका शिकार पूर्णतया प्रतिबंधित है और इसके सरंक्षण पर विशेष बल दिया जा रहा है, आई यूं सी एन ने इसे खतरे में पड़ी प्रजातियों के नज़दीक की श्रेणी में रखा हुआ है.



कुलमिलाकर एक खूबसूरत जीव की जिन्दगी ग्रामीणों व् जागरूक लोगों के प्रयास से सुरक्षित रही, अब इसका जीवन इस बात पर निर्भर करता है की साउथ खीरी वन प्रभाग के लोग इसे इसके प्राकृतिक आवास वाली परिस्थितियों में छोड़ेगे या किसी भी जंगल में किसी भी स्थान पर रिहा कर देंगे, साथ ही गौरतलब यह भी है की उस नए स्थान पर यह अपने आप को अनुकूलित कर पायेगा या नहीं .......

दुधवा लाइव डेस्क 


Jan 3, 2015

आखिर वह लौट आया!

बाघ पन्ना - 123 
 नये साल में पन्ना टाइगर रिजर्व को मिली अनूठी सौगात 
बाहर गया नर बाघ 10 माह बाद फिर आया वापस 
जन समर्थन से बाघ संरक्षण का यह जीवंत उदाहरण 
पन्ना, मध्य प्रदेश-भारत 
मेहनत और ईमानदारी से किये गये प्रयास कभी विफल नहीं होते. म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व की बाघ पुर्नस्थापना योजना ने यह साबित कर दिया है. वर्ष 2009 में यह टाइगर रिजर्व बाघ विहीन हो चुका था, लेकिन पांच साल में ही यह बाघों की नर्सरी के रूप में विकसित हो गया है. यहां जन्में बाघ समूचे बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जंगलों में न सिर्फ विचरण कर रहे हैं, अपितु विकसित और सामर्थवान बनकर पुन: पन्ना टाइगर रिजर्व में वापस भी लौट रहे हैं. जन समर्थन से बाघ संरक्षण का जीवंत उदाहरण अब यहां देखने को मिल रहा है. 


उल्लेखनीय है कि फरवरी 2014 में पन्ना टाइगर रिजर्व के 6 अर्ध वयस्क नर बाघ अलग - अलग दिशाओं में रिजर्व क्षेत्र से बाहर निकल गये थे. इनमें से एक नर बाघ पन्ना - 121 के संग्रामपुर अयारण्य में रहने की पुष्टि हुई है. जबकि दूसरा नर बाघ पन्ना - 123 बाहरी इलाकों में पूरे 10 माह तक विचरण करने के उपरान्त अपने आप पन्ना टाइगर रिजर्व में वापस लौट आया है. वापस लौटे इस नये बाघ ने चन्द्रनगर वन परिक्षेत्र को अपना ठिकाना बनाया है. इस इलाके में बाघिन टी - 2 की दूसरी संतान मादा बाघ पन्ना - 222 अपनी टेरीटोरी बनाकर एकाकी जीवन बिता रही थी. लेकिन वापस लौटे नर बाघ पन्ना - 123 ने इस बाघिन से मुलाकात होने के बाद उसे जीवन संगिनी के रूप में अंगीकार कर लिया है.

 इस तरह से छतरपुर जिले का चन्द्रनगर वन परिक्षेत्र जो बाघों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित इलाका माना जाता रहा है वहां पर बाघ परिवार पूर्ण रूप लेकर आबाद हो रहा है. मालुम हो कि वर्ष 2012 में भी इसी तरह नर बाघ पन्ना -112 उत्तरी - पूर्वी दिशा में पार्क से बाहर निकलकर वापस आ गया था जो बाद में बाघिन टी - 4 के साथ जोड़ा बनाकर बाघों की वंशवृद्धि में अपना योगदान दिया था. 

 पन्ना टाइगर रिजर्व के चन्द्रनगर रेन्ज में बाघिन पन्ना - 222 के पास बैठा बाघ पन्ना - 123 

नये साल में पन्ना टाइगर रिजर्व को मिली इस अनूठी सौगात की जानकारी देते हुए क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने आज बताया कि यह सब इसलिए संभव हो रहा है क्यों कि पन्ना टाइगर रिजर्व के बाहरी क्षेत्रों में स्वच्छन्द विचरण करने वाले बाघ जन समर्थन के कारण सुरक्षित हैं. श्री मूर्ति ने बताया कि बाघिन टी - 1 के साथ पूर्व में एक शावक देखा गया था लेकिन अब उसके साथ दो शावक दिखने लगे हैं. इस प्रकार आज की स्थिति में पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की संया 23 हो गई है. 

अरुण सिंह 
पन्ना टाइगर रिजर्व, मध्य प्रदेश, भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com


Jan 1, 2015

तराई के जंगलों के मसीहा थे बिली अर्जन सिंह


वन्य जीवन की विधाओं के पितामह को श्रद्धांजली 
 शिकारी से वन्य जीव सरंक्षक बनने की दास्तान 

१५ अगस्त सन १९१७ को जन्मे बिली अर्जन सिंह जो ब्रिटिश भारत की कपूरथला रियासत के राजकुमार थे और लखनऊ के प्रथम भारतीय कलेक्टर जसवीर सिंह के छोटे पुत्र, नैनीताल में प्राथमिक शिक्षा, स्नातक इलाहाबाद  से और फिर ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी, द्वितीय विश्व युद्ध में वर्मा व् अफ्रीका में हिस्सेदारी यह शुरुवात थी अर्जन सिंह के जीवन की जबकि उनकी जिंदगी के असली मकसद को नियति ने अभी पोशीदा कर रखा था.

बिली का बचपन सयुंक्त प्रांत की बलरामपुर स्टेट में गुजरा वजह थी की अंग्रेज सरकार ने वहां के राजा के अक्षम होने के कारण बिली के पिता जसवीर सिंह को कोर्ट ऑफ वार्ड नियुक्त किया था. बलरामपुर रियासत  में बिली ने १३ वर्ष की आयु में पहला शिकार किया वह तेंदुआ था और १४ वर्ष की आयु में एक बाघिन का। … कभी खीरी के जंगलों में भी वह अपने राजकुमार मित्रों के साथ शिकार के लिए आये थे. और शायद तभी यहां के जंगलों ने उस शिकारी का मन मोह लिया और उसने निश्चय किया होगा की कभी यहाँ बस जाया जाए। .... 


… और यह शुरुवात हुई जब वह सं १९४६ में लखीमपुर खीरी के पलिया कलां गाँव में पहुंचे उस मीटरगेज रेलवे से जो खीरी के जंगलों से शाखू के वृक्षों को काटकर रेलवे पटरी बिछाने में इस्तेमाल की जाती थी, की ढुलाई के लिए बिछाई गयी थी। . 

उस वक्त पलिया के निकट एक जमीन खरीदकर उन्होंने खेती करने का निश्चय किया और उस जगह का नाम उन्होंने अपने पिता के नाम पर रखा "जसवीर नगर". सन १९५९ में बिली अपनी माँ द्वारा भेजी गयी हथिनी से खीरी के जंगलों में घूम रहे थे तभी उन्हें सुहेली व् नेवरा नदी के मिलान पर वह जगह दिखाई दी जो बहुत सुन्दर और चारो तरफ से जंगलों से घिरी हुई थी और यही जगह बाद दुनिया में "टाइगर हावेन के नाम से मशहूर हुई"

बिली अर्जन सिंह ने जंगल के मध्य इस जगह पर एक घर बनाया जहां वो वन्य जीवों के साथ रहे अपने जीवन के अंतिम समय तक और इस जगह पर ही दुनिया का पहला सफल प्रयोग हुआ बाघ व् तेंदुओं का उनके प्राकृतिक आवास यानी जंगलों में पुनर्वासन का.

बिली अर्जन सिंह ने लखीमपुर खीरी के इन जंगलों के महत्त्व और इनकी खासियतों को पूरी दुनिया को बताया नतीजतन यहां तक पहुँचने की तमाम कठिनाइयों के बावजूद देश विदेश के वन्य जीव विशेषज्ञ फिल्ममेकर्स फोटोग्राफर यहाँ आये और उन्होंने बिली की अनुभवों को साझा किया सारी दुनिया से और यहीं से शुरुवात हो गयी खीरी के जंगलों की प्रसिद्धि की.

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड भारत की फाउंडर मेंबर श्रीमती एन राइट ने सबसे पहले बिली को एक तेंदुएं के बच्चे को दिया जिसकी मान का शिकार बिहार में कही किसी शिकारी ने कर दिया था इस आर्फन लियोपार्ड बेबी को बिली ने टाइगर हावेन में पाला और इसे नाम दिया प्रिंस। प्रिंस की परवरिश टाइगर हावेन के जंगली माहौल में हुई और वह खीरी के जंगलों में पुनर्वासित हुआ पर इस जीव को आस पास के लोगों ने डर की वजह से जहर दे दिया। फिर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री ने बिली को तो मादा तेंदुए दिए जो हैरियट और जूलियट कहलाये। जर्मनी की एंजेलिया सर्वाइवल कंपनी ने हैरियट पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई जिसमें यह साबित हुआ की हैरियट ने जंगल में अपने को सफलता पूर्वक पुनर्वासित कर लिया और उसने खीरी के जंगल के नर तेंदुए से मिलान के बाद बच्चे भी दिए यह सब उस डॉक्यूमेंट्री में कैद हुआ जिसे देखकर दुनिया का हर वन्य जीव विशेषज्ञ अच्चभित सा था.

सन १९७६ में तारा यानी इंगलैंड के टाइक्रास जू से लाई गयी वह बाघिन बच्ची जेन, जिसे बिली अर्जन सिंह ने टाइगर हावेन में प्रशिक्षित किया और यह बाघों के पुनर्वासन का प्रयोग सफल हुआ सं १९८० के आते आते तारा यहां के जंगलों में रहने वाले बाघों से घुल मिल गयी थी , तारा की भी संताने हुई और इस बात का खुलासा जेनेटिक साइंस के माध्यम से हुआ जब दुधवा के बाघों में साइबेरियन गईं पाया गया चूंकि तारा चिड़ियाघर की पैदाइश थी और वह साइबेरियन नस्ल के बाघ का क्रास थी, इस तरह दुधवा दुनिया का पहला जंगल बना जहां बाघों की दो नस्ले मौजूद हैं, रॉयल बंगाल टाइगर और साइबेरियन, प्रकृति में अडाप्टेशन का यह बेहतरीन नमूना है.

यहां यह भी बताना जरूरी है अर्जन सिंह का नाम बिली क्यों पड़ा, दरअसल बिली की बुआ राजकुमारी अमृत कौर जो महात्मा ग़ांधी की शिष्या और भारत की प्रथम महिला स्वास्थ्यमंत्री थी इन्होंने ही अर्जन सिंह को बिली कहाँ और आज अर्जन सिंह पूरी दुनिया में बिली अर्जन सिंह के नाम से प्रसिद्द है.

बिली सेन्ट्रल वाइल्ड लाइफ बोर्ड के मेंबर रहे और आजीवन दुधवा नेशनल पार्क के आनरेरी वार्डन भी, भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सहायता से इन्होने खीरी के जंगलों को सरक्षित किया और भारत सरकार ने इसे २ फरवरी सन १९७७ को नेशनल पार्क का दर्जा अब यह खीरी के जंगलों का हिस्सा दुधवा नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है, टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुवात के बाद दुधवा नेशनल पार्क में खीरी जंगल की एक और सैंक्चुरी जिसे किशनपुर वन्य जीव विहार कहते है से जोड़कर यहां टाइगर प्रोजेक्ट की शुरूवात  में इसमें पड़ोसी जनपद बहराइच की कतर्नियाघाट वन्यजीव विहार को भी जोड़ दिया गया, इस तरह दुधवा नेशनल पार्क, दुधवा टाइगर रिजर्व बना.

बिली के प्रयासों के लिए उन्हें भारत सरकार ने पद्म श्री, पद्म भूषन सम्मानों से नवाजा, वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड ने स्वर्ण पदक से और वन्य जीवन व् पर्यावरण के क्षेत्र में नोबल कहे जाने वाले पुरस्कार "पॉल गेटी" से बिली को विभूषित किया गया. सन २००६ में उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने बिली को यश भारती सम्मान से सम्मानित किया।

बिली अर्जन सिंह ने तराई के जंगलों का जो इतिहास अपनी किताबों में लिखा वह अतुलनीय है, टाइगर टाइगर, टाइगर हावेन, तारा- ए टाइग्रेस, प्रिंस ऑफ़ कैट्स, द लीजेंड्स ऑफ़ द मैनईटर्स, एली इन द बिग कैट्स, ए टाइगर्स स्टोरी, अर्जन सिंह'स टाइगर बुक, वाचिंग इंडियाज वाइल्ड लाइफ। बिली की बायोग्राफी एक ब्रिटिश अंग्रेज पत्रकार डफ हार्ट डेविस ने लिखी जिसका नाम है "ऑनरेरी टाइगर" इस किताब को पारी दुनिया के वन्य जीव प्रेमियों के मध्य बहुत सराहना मिली।



बिली अर्जन सिंह और उनका वह टाइगर हावेन अब किताबों में और लोगों के जहाँ में किस्से बनकर पैबस्त है, दुधवा की स्थापना करवाने वाला यह व्यक्ति और इनकी वह प्राकृतिक प्रयोगशाला टाइगर हावेन दुनिया भर के वन्य जीव प्रेमियों के लिए तीर्थ स्थल है 

१ जनवरी २०१०, बिली अर्जन सिंह का देहावसान हुआ, आज बिली अर्जन सिंह की नामौजूदगी दुधवा की आबो हवा में महसूस होती है, सुहेली अब धीमी रफ़्तार में बहने लगी है, बारहसिंघा अपना वजूद खो रहे है, बाघ मारे जा रहे है, जंगल काटे, पर अब कोई नहीं है जो दुधवा के दर्द को बयान करे और लड़ाई लड़ सके इन्तजामियां से इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ। दुधवा के जंगलों के इस संत की  छठवीं  पुण्य तिथि पर उन्हें नमन.…

( यह लेख डेली न्यूज एक्टीविस्ट अखबार में सम्पादकीय पृष्ठ पर १ जनवरी २०१५ को प्रकाशित हो चुका है)

कृष्ण क़ुमार मिश्र 
संस्थापक - दुधवा लाइव 
लखीमपुर खीरी 
krishna.manhan@gmail.com
editor.dudhwalive.com



विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था