International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jan 29, 2011

यहाँ का नज़ारा अदभुत है, इन विशालकाय पक्षियों की मौजूदगी से !

©Krishna
खूबसूरत परिन्दों की रिहाईशगाह
शाहजहाँपुर (२८ जनवरी २०११) फ़करगंज जहाँ रिहाईश है सैकड़ों क्रौंच की, यह गाँव पड़रा-सिकन्दरपुर का मौजा है, जहाँ एक विशाल झाबर (वेटलैंड) में तकरीबन १५० से अधिक सारस पक्षी मौजूद है। और ग्रामीण इनका सरंक्षण करते हैं। फ़करगंज के निवासी हरीराम जिनका घर इसी विशाल तालाब के नज़दीक है, बताते है कि सुबह सुबह सारस की तादाद और बढ़ जाती है, मार्च के महीने में अत्यधिक संख्या में इस पक्षी का इस गाँव में इकट्ठा होने की बात भी हरीराम ने बताई।

चारो तरफ़, गेहूं, मटर, सरसों की फ़सलो से आच्छादित खेतों के मध्य यह विशाल तालाब जिसके छिछले पानी में सैकड़ों सारस की एक साथ मौजूदगी एक सुन्दर दृष्य प्रस्तुत करती है। 

यह स्थल एक पर्यटन स्थल का दर्जा ले सकता है, और हरीराम जैसे उत्साही व्यक्ति गाइड के पेशे से अपना गुजारा भी कर सकते है, यदि सरकार इस स्थान को कुछ सरंक्षण का दर्जा दे दे।

वन्य-जीव फ़ोटोग्राफ़र सतपाल सिंह बताते हैं कि वह इस स्थान पर कई बार आ चुके है, यहां के ग्राम प्रधान नरेन्द्र सिंह व अन्य ग्रामीण इन पक्षियों की सुरक्षा के प्रति सजग हैं।

उत्तर प्रदेश में स्टेट बर्ड का दर्जा हासिल कर चुका यह पक्षी अत्यधिक कीटनाशकों के प्रयोग के कारण, व फ़सलों में गन्ने की बहुलता की वजह से प्रभावित हुआ है, पटते तालाब, भी एक मुख्य कारण है, ऐसे हालातों में फ़करगंज के लोग और वहां का यह तालाब दोनों इस खूबसूरत पक्षी के लिए मुफ़ीद साबित हो रहे है। उनके जज्बे को सलाम।

दुधवालाइव डेस्क

Jan 28, 2011

...जारी है परिन्दों का व्यापार

उत्तर भारत में जारी है परिन्दों का व्यापार
शाहजहाँपुर में सड़कों पर खुलेआम बेची जा रही हैं लाल मुनिया

स्ट्राबेरी फ़िंच (रेड अवादवात)
अमन्डवा अमन्डवा (फ़ैमिली-एस्ट्रीडिडी) इस सुन्दर चिड़िया को स्ट्रावेरी फ़िन्च भी कहते है। यह आकार में तकरीबन १० से.मी. है, इस चिड़िया की प्राकृतिक मौजूदगी दक्षिण एशिया और मलेशिया में है।

आई०य़ू० सी०एन० की रेड लिस्ट में यह पक्षी कम से कम प्रासंगिकता के स्तर पर रखा गया हैं, चूंकि यह सामन्यत: पाया जाने वाला पक्षी है, इसलिए इसकी संख्या का निर्धारण नही किया गया। जैसे गौरैया की  सामन्यत: स्थानीय स्तर पर मौजूदगी ने लोगों को उसके बारे में सोचने की आवश्यकता नही महसूस की, और अचानक एक दिन जब वह हमारे बीच से गायब होने लगी तब हम विचलित हो गये और वह सारी कवायदे कर डालने का प्रयास भी करने लगे की आखिर यह चिड़िया कैसे बचाई जाए?


लाल मुनिया(स्ट्राबेरी फ़िंच) को वैक्सबिल भी कहते है क्योंकि इसकी चोच का रंग गहरा लाल  पुरानी सील की तरह होता है, पुरानी दुनिया के उष्ण कटिबन्धीय पक्षियों की शंक्वाकार चोंच का गहरा लाल रंग का होने के कारण ही इन्हे वैक्सबिल कहा गया। जोकि पुराने जबाने में इस्तेमाल की जाने वाली सील (मोम और तारपीन तेल को रंग में मिश्रित कर बनाया जाता है) के रंग की तरह होता है, के कारण इन पक्षियों को वैक्सबिल कहा जाता हैं। केवल इसी वैक्सबिल पक्षी के नर में यह खूबी होती है कि वह प्रजनन के समय और उसके बाद में अपने पूर्व रंग को प्राप्त कर लेता है। नर स्ट्राबेरी फ़िंच का सिर, शरीर का पृष्ठ भाग, पंख गहरे भूरे लाल रंग के होते है, और पूंछ काले रंग की एंव बचा हुआ शेष शरीर चमकीले व सफ़ेद रंग के गोलाकार धब्बों से आच्छादित होता है। नर स्ट्राबेरी फ़िंच प्रजनन काल व्यतीत हो जाने के बाद मादा की तरह रंग-रूप में समान दिखाई देता है। प्रजनन काल के अतरिक्त समय में ये पक्षी गहरे भूरे रंग के हो जाते है, पूंछ का निचला व ऊपरी हिस्सा गहरा लाल, और मादा के शरीर पर भी सफ़ेद रंग के धब्बे मौजूद होते है। 



यह स्ट्राबेरी फ़िंच (लाल मुनिया, रेड अवादवात) जिसको यह नाम स्ट्राबेरी के रंग की  तरह होने के कारण  मिला है, और इसके शरीर पर रंगीन धब्बे इसकी खूबसरती को और बढ़ा देते हैं और इसी खूबसूरती को कैद कर लेने की चाहत ने इन परिन्दों के वजूद पर सवालिया निशान लगा दिया हैं। कभी उत्तर भारत में खेतों, झड़ियों में सामन्यत: दिखाई दे जाने वाली यह चिड़िया अब गायब हो चुकी है, और जहाँ जहाँ यह मौजूद है वहाँ-वहाँ बहेलियों के जाल बिछे हुए हैं, चूकिं यह परिन्दा अभी गिद्धों या गौरैया की तरह दुर्गति को प्राप्त नही हुई है, इस लिए हमारा कथित वैज्ञानिक समाज इस पर विचार करना जरूरी नही समझता !



शाहजहाँपुर, खीरी, बहराइच, पीलीभीत, सीतापुर आदि जनपदों में धड़ल्ले से इस खूबसूरत परिन्दों का व्यापार किया जा रहा हैं। जीवों के प्रति मानव समाज की यह क्रूरता उनके अस्तित्त्व को मिटा रही है, यदि जल्द ही हमने अपने आस-पास की चीजों पर बारीकी से गौर नही किया तो तमाम तबाह होती चीजों को हम नज़रन्दाज करते जाएगे, जो जीव-जन्तुओं की विलुप्ति की दर को और रफ़्तार दे देगा।

संपादक की कलम से...
दुधवा लाइव डेस्क


Jan 20, 2011

छबीली और उसका नया घर !

 छबीली और उसके बच्चे
एक माँ....
...वह घर के नज़दीक एक कच्चे नाले में जा बैठी, बस कुछ देर ठहरने के बाद उसने मिट्टी खोदना शुरू कर दिया, जमीन पर जब एक छोटे गड्ढे की शक्ल उभर आई तब जाकर उसने साँस ली, और इत्मिनान से बैठ गयी सोने जैसे रंग वाली उस भुरभरी मिट्टी में, अपने चेहरे को उस मुलायम जमीन पर यूँ रख दिया जैसे किसी के कंधों ने उसे आसरा दिया हों, वह अब कुछ राहत महसूस कर रही थी। आज सुबह जब मैने उसे देखा और छबीली कह कर पुकारा (ये नाम इसे मेरी माँ ने दिया है, जो मोहल्ले में सर्वमान्य है) तो इसने हमेशा की तरह मेरी जानिब सिर उठाया, आज उसकी स्नेह भरी आँखें जिनमें आज कुछ दर्द लिपटा हुआ सा था, जिसे मैं समझ भी रहा था, फ़िर कुछ देर इसने अपने पेट को आसमान की तरफ़ किया और चुपचाप लेटी रही....इसकी यह क्रियायें यह समझा रही थी कि वह जननी होने का सुन्दर भाव पाने जा रही है, जो उसे माँ बना देगा....धरती पर प्रत्येक प्रजाति में सर्वश्रेष्ठ भाव-मातृत्व....जिसे पाकर वह जीव अपनी अदभुत क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए विभिन्न परिस्थियों में अपने उन अंशों का पालन-पोषण करती है और सुरक्षा भी...सुरक्षा से याद आया वह माँ अपने इस अंश की रक्षा लिए दुनिया के सबसे ताकतवर चीज से भी टकरा जाए और यकीन मानिए कि ईश्वर भी माँ के उस रूप को देखकर एकबारगी थर्रा जाए.....!

हाँ तो बात हो रही थी छबीली की, छबीली  ने चार बच्चों को जन्म दिया, उसके प्रजाति के कुछ सदस्य उसके आस-पास बैठे हुए थे किसी सुरक्षात्मक घेरे की तरह...जिनमें कुछ उसके कुटम्ब के थे । बिना किसी हाइजीन के इस माँ ने जने थे अपने बच्चे....कोई नर्स नही, कोई दवा नही, कोई पेट फ़ाड़ने वाला सर्जन नही, बस उस ताकत के सहारे यह माँ झेल गयी सारा दर्द, जिसने उसे मातृत्त्व जैसे भाव का बोध कराया।  सच है ज्ञान से बड़ी ताकत कोई नही इस संसार में जो बोध कराती है सारी प्रजातियों को कि कैसे दुर्गम स्थलों, विपरीति परिस्थितियों, में जिन्दगी को रफ़्ता रफ़्ता आगे बढ़ाया जाए..जिसे जीन में पिरोई हुई उस ज्ञानमाला को इन्सटिंक्ट कह ले या प्रकृति प्रदत्त वृत्ति...जिसे इस्तेमाल करने के लिए किसी किताब, या गुरू की जरूरत नही और न ही किसी ट्रेनिंग सेन्टर की !...उस सुपर प्रोग्रामर के ये प्रोग्राम कभी विफ़ल नही होते और यही जिजीविषा तो जीने का कौशल देती है।



खैर छबीली के नन्हे बच्चों को देखने मुहल्ले के मानव-बच्चे इकट्ठा होने लगे, सब उसके नज़दीक जाते उसे छूते, सहलाते, वह कुछ नही बोलती, वह अपनी असीम पीड़ा को भूलकर अपने बच्चों को चाट रही थी जो स्नेह के साथ प्रकृति प्रदत्त हायजीन का एक बेहतर तरीका है बच्चों को संक्रमण से बचाने का।


...अब सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि आखिर धरती इसे गर्माहट दे देगी मगर आसमान से रहम की गुंजाइश नही थी, ठंड का मौसम, बारिश का डर, और कोहरे का गिरना जारी था, हम सब इसका घर पहले से बना देना चाहते थे, और उम्मीद थी कि कुछ और नन्हे इसमें आसरा लेगे, लेकिन आलस और व्यस्तता ने मामले को लम्बा कर दिया था, लेकिन अब हम सब इस काम को अंजाम देने में जुट गये, मुहल्ले के अमित उर्फ़ मौसा जी ने सुझाया कि पास के सरदार जी के प्लाट में कुछ सीमेन्ट के बने तख्ते रखे है, जो छत के रूप में प्रयोग किए जा सकते है, हम दोनों उस बाउंड्री से घिरे प्लाट में सीढ़ी लगाकर घुसे, और एक तख्ता बाहर निकाल लाए, अब उसे उस नाले के ऊपर रख कर देखा गया जहां छबीली ने जमीन खोद कर अपने बच्चों को जनने का स्थान चुना था, पर मुझे ये डर सता रहा था कि इस नाले पर पड़े इस सीमेन्ट के तख्ते पर यदि किसी जानवर ने पैर रख दिया तो यह टूट जाएगा और बच्चे दब जायेंगे...! अब इरादा बदल दिया गया पूर्व में छबीली की मां का घर पास की जिस दिवार के किनारे बनाया गया था वही पर उस तख्ते को कुछ ईंटों के सहारे रखा गया, इन कारगुजारियों को देखकर अब तक मुहल्ले के काफ़ी बच्चे इकट्ठे हो चुके थे और सभी अपना सहयोग भी दे रहे थे, बड़ी शिद्दत से।
अब सबसे कठिन काम था उसके बच्चों को उस कच्चे नाले से इस नये घर में लाना आखिरकार एक लड़के ने छबीली का एक बच्चा उठा लिया, जो छबीली और उसके बच्चों को कुछ देरे पहले सहला रहा था,  और चल दिया नव-निर्मित छबीली के घर की तरफ़ तो छबीली भी पीछे पीछे दौड़ पड़ी  तभी हमने  छबीली के शेष तीन बच्चों को उठाकर उसके नये घर में रख दिया, लेकिन छबीली अपने पहले बच्चे को उठाकर फ़िर उसी जगह रख आयी जहां उसने इन्हे जन्म दिया था, लेकिन जब वहां अन्य बच्चों को नही देखा तो वापस आकर अपने यहां मौजूद बच्चों को पाकर यही बैठ गयी, वह भ्रमित हो गयी थी, हमारी कारस्तानियों से जो उसके पक्ष में थी, खैर हमने उस बच्चे को जिसे वह पूर्व स्थान पर रख आयी थी वहां से उठाकर फ़िर उसके नये घर में रख दिया..अब वह उसे चाट रही थी...!
आज शाम को जब मैं रोज की तरह घर दूध लेकर वापस लौटा तो वह अपने बच्चों के पास अपने घर में बैठी थी..वह हमेशा की तरह दौड़ी तो पर वह भूखी-प्यासी मां उलझन में थी, जब तक उसे दूध निकाल कर दिया गया तब-तक वह अपने घरौंदें के दो चक्कर लगा आयी...यह था मातृतत्व का बोध और उसकी जिम्मेदारी।

अब हर सुबह शाम बच्चे और बड़े छबीली का घर और उसके बच्चे देखने आते है, दावत न देने का शिकवा भी करते है, उसे हमारी प्रजाति से कोई दिक्कत नही, बस यदि कोई उसकी प्रजाति का बन्दा उसके घर के आस-पास फ़टका तो समझो उसकी खैर नही.....अम्मा कहती है, कि यह सबक है कि हमेशा अपनी प्रजाति से होशियार रहो !

खैर यह प्रजाति हमारे साथ सदियों से रहती आयी है, इसे हमने पालतू बनाया, गुलाम भी, और मित्र भी, पर यह यहां वे स्वतन्त्र है, क्योंकि हम किसी को किसी पर निर्भर बनानें में विश्वास नही रखते हम उन्हे हक़दार बनाते हैं। 

हाँ एक बात और छबीली के घर पर सबकी राय से एक बोर्ड भी लटका दिया गया है, जिस पर लिखा है 
Home
Chhabily and her kids
Date of Birth- 18-01-2011
Shiv Colony Lakhimpur Kheri
निकट-ब्रेड फ़ैक्ट्री

कृष्ण कुमार मिश्र

Jan 16, 2011

घोला इलाके में तेंदुए की मौजूदगी बनी दहशत

कतर्नियाघाट में बाघ का शिकार बना मनुष्य*
 कहीं मानव-तेंदुए में बन न जाये टकराव के हालात
 कतर्निया घाट में हुई घटनाओं ने बढ़ाई लोगों की फिक्र
 दुधवा नेशनल पार्क की सठियाना रेंज से लगे घोला के गन्ना क्रय केंद्र के पास एक तेंदुए का मूवमेंट तेज हो गया है। दो दिन पहले तेदुएं ने यहां एक बकरी और कुत्ते को निवाला बनाकर लोगों में दहशत फैला दी थी।
घोला क्षेत्र से दुधवा नेशनल पार्क की सठियाना रेंज से चंद कदम दूर है। इसी रेंज से निकलकर आए एक तेंदुए ने इस क्षेत्र में कब्जा जमा लिया है। तेंदुआ यहां के खेतों में बराबर देखा जा रहा है। इससे लोग डरे हुए है, शुक्र है कि अभी तक तेंदुए ने किसी इंसान पर हमला नहीं किया है। लेकिन उसने एक बकरी और कुत्ते को अपना निवाला जरुर बना लिया है। इस बीच तेंदुआ के खेतों की तरफ देखे जाने की खबरें आ रहीं हैं। ग्रामीणों ने तेंदुए को  घोला गन्ना क्रय केंद्र के पास भी देखा का दावा किया है।
इस इलाके में तेंदुए का देखा जाना तो कोई बड़ी बात नही है, लेकिन हाल ही में कतर्निया घाट वन्य जीव विहार में हुई घटनाओं से लोग डरे हुए हैं।

कतर्निया इलाके में तीसरे दिन एक और इन्सान बना बाघ का निवाला

"कतर्निया घाट- शनिवार (०८-०१-२०११) की सुबह इस इलाके के लिए मनहूस खबर लाई, जंगल से सटे जमुनिहा गांव में रहने वाले  55 साल के बुजुर्ग जगमाल को बाघ ने अपना शिकार बना डाला, बुजुर्ग जगमाल शुक्रवार को बिछिया बाजार खरीदारी करने गये थे, रात देर तक जब जगमाल घर नही लौटे तो घर वालों ने तलाश शुरू की। रात में  जंगल में तलाश करना आसान नही था, सुबह पौ फटते ही जगमाल का अधखाया हुआ शव जंगल से बरामद हो गया। तीन दिन में ये दूसरी घटना थी, जिसमें बाघ ने एक इन्सान को अपना शिकार बनाया था।"


-एक साल पहले सब्लू को बनाया था निशाना
ठीक एक साल सात दिन पहले १० जनवरी २०१० को घोला गन्ना क्रय केंद्र के पास ही एक बाघ ने सबलू नाम के किशोर को खा गया था। फिर से जनवरी महीने में ही इसी इलाके में तेंदुए के मूवमेंट से लोगों के जेहन में दहशत तारी हो गयी है।
-आबादी के करीब घूम रहे तेंदुए को भी बना हुआ है खतरा

घोला आबादी के करीब घूम रहे तेंदुए से जहां इंसानी जानों  को खतरा है, तो दूसरी तरफ तेंदुए के भी अनिष्ठ के बादल मंडरा रहे हैं। पिछले माह की २५/२६ दिसम्बर की रात दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सेंक्चुरी में एक तेंदुए को शिकारियों ने मौत के घाट उतार दिया था। इससे इस तेंदुए पर भी संकट मंडरा सकता है।

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 *कतर्निया घाट में बाघ का शिकार बने व्यक्ति की तस्वीर वीभत्स है। इस फोटो में बाघ ने शिकार का एक पैर खा लिया है।
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 अब्दुल सलीम खान (गुलरिया-खीरी)

Jan 13, 2011

लखीमपुर में बाघ ने ग्रामीण को बनाया निवाला

(लखीमपुर-खीरी) धौरहरा रेंज से सटे बार्डर इलाके के जंगल में लकड़ी काटने गए एक ग्रामीण को बाघ ने अपना निवाला बना लिया। घटना के बाद दुधवा नेशनल पार्क के फ़ील्ड डाइरेक्टर शैलेश प्रसाद समेत वन विभाग के तमाम अफ़सरों ने मौका मुआयना किया।

सुजौली वन रेंज के गांव दुर्गा  गौढ़ी निवासी दूबर (४५) मंगलवार को इलाके के जंगल में लकड़ी काटने गया था। तभी बाघ ने उसे दबोच लिया। दिनभर ग्रामीणों और वन विभाग की तलाश के बाद भी दूबर का क्षत विक्षत शव जंगल के पास से ही बरामद हुआ। घटना के बाद से ही बार्डर इलाके से धौरहरा के गांवों में दहशत फ़ैली हुई है। इधर वन विभाग ने सतर्कता बढ़ाते हुए टीमों को काम्बिंग के आदेश दिए हैं। धौरहरा में चौकसी बढ़ा दी गई है।

स्रोत: हिन्दुस्तान दैनिक

Jan 10, 2011

ग्वालदम- धरती का एक खूबसूरत हिस्सा

Photo by: Satpal Singh
 ग्वालदम, (चमोली, उत्तराखण्ड) की वादियों में फ़ोटोग्राफ़ी का लुत्फ़
बरेली फ़ोटो विजन क्लब का यात्रा-वृतान्त सुना रहा है एक नौजवान व  फोटोग्राफ़ी विधा का उत्साही शागिर्द जिनका मौलिक लेखन हुबहू दुधवा लाइव पर प्रकाशित किया जा रहा है,  इस यात्रा और उनके खूबसूरत पड़ावों के मंजरों की तस्वीरों को कैमरे में कैद किया वाइल्ड-लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र सतपाल सिंह ने, पेश है ग्वालदम से सचिन गौड़ की एक रोमांचकारी रिपोर्ट....

नवम्बर २०१० की २५ तारीख को फोटो विजन क्लब का काफिला मायावी हिरण (त्रिशूल पर्वत) का शिकार करने के लिए ग्वालदम के लिए निकला, कफिले में सात शिकारियों (फ़ोटोग्राफ़र्स) का दल था, दल के सदस्यों में डॉ पंकज शर्मा,श्री गोपाल शर्मा , दीपक घोष जी, संजय जयसवाल जी, श्री सुशील सक्सेना और सतपाल सिह जी सभी सीनियर शिकारियों के साथ में जूनियर शिकारी  सचिन गौड़ शिकार करने की ट्रेनिंग के लिए इस दल में शामिल हुआ था । सभी को समय की पाबंदियों के साथ चलना था, समय ६:३० पर हमारी गाड़ियॉ बरेली से ग्वालदम के लिए चल पडी, उस रोज इन्द्रदेवता भी अपनी माया दिखा रहे थे भीनी भीनी बरसात की फुहार हमारी गाडियों पर डाल रहे थे सभी मन से इन्द्र देव को मनाने का प्रयास कर रहे थे, हे देव हम पर दया करो हमारी यात्रा को कामयाब करो ताकि अपने लक्ष्य को पा सके इस तरह प्रार्थना करते हुए आगे बढ़ते ही जा रहे थे सभी को उम्मीद कम ही थी कि इन्द्रदेव मान जायेगें सुबह ८:१५ पर हमारा काफिला पंतनगर बाईपास पर रूका वहॉ पर सभी शिकारियों ने सुबह का नाश्ता लिया नाश्ते में चाय के साथ स्नैक्श सेम और दीपक घोष जी के लाये हुये मसाले चने का स्वाद लिया, ८:३० पर हमारा कारवॉ आगे अपनी मंजिल की ओर बढ़ चला अभी भी इन्द्रदेव का क्रोध बना हुआ था कुछ घंटे के सफर के बाद जैसे ही हमारी गाड़ियॉ हल्द्वानी में एन्टर हुई सभी के चेहरे खुशी से खिल उठे, इन्द्रदेव का क्रोध शान्त हुआ सूर्य देव की भी कृपा हम सब पर हुई सभी ने दोनो देवताओं को धन्यवाद किया|

शिकारी दल के सभी शिकारी अब काफी उत्सुक थे, उस मायावी हिरण तक पहुंचने के लिए १:४०मिनट पर हमारी गाडियॉ रानी खेत में पहुंच गई एकाएक उस मायावी स्वर्ण हिरण की झलक हम सभी को दिखी सभी का मन  था कि लंच लेने के बाद स्वर्ण हिरन का शिकार करेगें उस समय हिरन की झलक देख सभी लंच भूलकर उसे उसी समय शूट करने के लिए अपने अपने हथियार निकाल लिए जिसे जहॉ जगह मिली बही पोजीशन संभाल कर इमेशन लोड करने लगे सभी अपने साथ हर प्रकार का हथियार लाये थे कोई ७०-३०० एम०एम० की राईफल (कैमरा) लिए हुये था, कई हजार एम०एम० की मिशाइल से सूट कर रहा था, कोई कारवाईन से और मे अपनी एकनाली बन्दूक निकाल कर अपना मोर्चा संभाले हुये था, कोई भी शिकारी दल का सदस्य उस मायावी स्वार्ण हिरन को अपने हाथों से निकलने देना नहीं चाहता था, हर तरफ सभी ने मोर्चा बंदी कर रखी थी, हर तरफ से मायावी हिरन को शूट करने के लिए ट्रिगर दबाया जा रहा था सभी अपनी भरपूर कोशिश में लगे हुये थे  एक मेरी ही खुट्टल  बन्दूक से कोई फायर नहीं हो पा रहा था, शायद मुझे शिकार करने का अनुभव नहीं था मेरे पास अच्छे हथियार नहीं थे, जिसकी जानकारी मुझे फोटो विजन शिकारी दल में शामिल होकर मिली । 

मेरा साथी सतपाल सिह जो कि उम्र मे मुझसे छोटा था पर उसे शिकार का अनुभव मुझसे ज्यादा था  तब उसने मुझसे कहा मैदान में आकर कभी हार नहीं माननी चाहिए, आपके पास जो भी साधन है, उसका इस्तेमाल कर उसी से अच्छा काम करना चाहिए, सतपाल कि बात में दम था, और फिर  मैंने भी अपना इरादा पक्का कर लिया कि मैं अपनी एकनाली बन्दूक से उस मायावी हिरन का शिकार करके रहूगा ।
Photo by: Satpal Singh
मायावी हिरन हमसे लगभग २५० कि०मी० पर था, हब हमारा शिकारी दल लंच के लिए चलना  चाहता था सभी शिकारी रानी खेत होटल मून में लंच के लिए रूके । रात होने से पहले हम उसे कैद करने के लिए उत्सुक थे मै भी अपना छोटा पिंजरा (छोटा कैमरा) थामें हुये उसे कैद करने के लिए सावधान था, हमारी गाडियॉ धीरे-धीरे घाटियां पार करती हुई चली जा रही थी, घाटी से जब हमारा कारवॉ नीचे उतरा तब घाटी के बीच कोसानी बस्ती दिखाई दी, मानो स्वर्ग के दरवाजे पर आ गये हो, इस बार मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और हमने अपनी गाडी वहीं रूकवादी मैं उन लम्हों को अपने छोटे से पिंजरे(कैमरे) में कैद कर लेना चाहता था, उस स्वर्ग जैसी बस्ती में,  मेरे हाथ जो भी लगा मै उसे अपने छोटे से पिंजरे में कैद करता चला गया। तब मन में उत्सुख्ता जागी स्वर्ग दरवाजे पर पहुंचने पर मन मंत्र मुग्ध हो गया है जब हम स्वर्ग के अन्दर पहुंचेगे तब क्या होगा, हमारे और शिकारी साथी भी अपने बड़े-बड़े पिंजरे लेकर इधर-उधर उस खूबसूरत लम्हों को कैद करने के लिए अपनी-अपनी गाड़ियों से उतर कर दौड़ पडे जिसके जो हाथ लगा उसे अपने पिंजरे में कैद कर फिर हमारा कारवॉ निकल पडा अपनी मंजिल की ओर ३:२० पर हमें मायावी हिरण की फिर एक बार झलक दिखी, हमारे दल के साथी इतने करीब पहुंच कर उसे अपने हाथे से निकल कर जाने देना नहीं चाहते थे, उस तक पहुंचने का रास्ते से सभी शिकारी अंजाने थे कि उसके करीब कैसे जल्दी पहुंचा जाये क्योकि धीरे-धीरे शाम होने को आ रही थी, तब हमारे गाड़ी के ड्राईवर ने बताया साहब उस तक पहुंचने का एक रास्ता मुझे मालूम है, अगर आप कहो तो मैं आपको उसके कुछ करीब तक पहुंचा सकता हूं।
Photo by: Satpal Singh
सभी ने अपनी सहमति से ड्राईवर से कहा तुम हमें उसी रास्ते पर ले चलो, ड्राईवर ने कहा यहॉ से कुछ दूरी पर अनाशक्ति आश्रम नाम से जगह है, वहॉ से आप अपना शिकार बहुत करीब से शूट कर सकते हैं, शाम ४:१० मि० पर शिकारी दल अनाशक्ति आश्रम था, और मायावी हिरन हमारे काफी करीब था। एक बार फिर सभी ने अपने अपने हथियार बड़ी फुर्ती के साथ निकाल लिए ऒर अपनी पोजीशन संभाल कर खड़े हो गये और जैसे ही सभी ने अपनी मैगजीन लोड़ की, मायावी ने अपना रंग बदलना प्रारम्भ कर दिया। पहले गोल्ड,हल्का सुनहरा, दूधिया गुलाबी, गुलाबी और अंत में पूर्ण गुलाबी के साथ निलमा रंग के साथ हमारी आWखों से ओझल हो गया, धाम से  शिकारी दल ६:१० मि० पर गुवालदम के लिए निकल पडा । एक घंटे के सफर के बाद हमारा कारवॉ गुवालदम गैस्ट हाउस पर पहुंचा सभी ने अपने अपने कमरों में पहुचने के बाद सुबह का पलान किया।
Photo by: Satpal Singh
 ग्वालदम गैस्ट हाउस से वहॉ की बस्ती का रात का नजारा अति सुन्दर प्रतीत हो रहा था, कुछ देर रैस्ट करने के बाद सभी ने ९:०० बजे डिनर लिया, उसके बाद अपने अपने कमरे में आराम करने के लिए पहुंच गये सुबह २६.११.२०१० सतपाल सिंह और मैंने ५:०० बजे उठकर चाय पी और फ्रैश होकर हम दोनो ने अपनी गन चैक करके  फिर चल दिए शिकार करने ।
Photo by: Satpal singh
६:०० बजे वाकी सीनियर्स शिकारी साथी भी अपनी अपनी मिशाइल लोड कर अपने कमरों से निकल कर गाड़ी में बैठ चुके थे, और  सूर्य उगने से पहले हमारी गाड़ियॉ एक मोड पर रूकी वहॉ से मायावी हिरन की झलक कुछ-कुछ दिखने लगी थी सभी जल्दी जल्दी सूर्य की किरण आने से पहले अपनी पोजिशन संभाल चुके थे अब इन्तजार था मायावी हिरन को कुछ साफ देखने का और उसे अपनी एक नाली बंदूक से शूट करने का आज मैं पूर्ण रूप से तैयार था उसे कैद करने के लिए कुछ इन्तजार के बाद वह पल हम सबके सामने था, सूर्य देव अपनी लालिमा के साथ प्रकट हो रहे थे और वह स्वर्ण हिरन हमारी आंखों के सामने बड़े ही करीब था, कोई भी शिकारी अब उस मायावी को छोड़ना नहीं चाहता था, प्रकाश की तीव्र गति से भी तेज, सभी अपने हथियारो का प्रयोग कर रहे थे, और  हमनें उसे हर तरफ से घेर रहा था, कभी इधर से कभी उधर से और अंत में मैने अपनी एक नाली बन्दूक से उसका शिकार कर ही लिया उस दिन सभी शिकारी भागदौड़ में थक चुके थे सभी ने कहा अब तो हिरन घायल हो ही चुका है, कल जब चलेगें तब उसे पिंजरें कैद कर लें चलेगें अब यहॉ कही नहीं जायेगा सभी आराम कर कुछ देर बाद नाश्ता लेगें गैस्ट हाउस पहुंच कर सभी ने अपनी अपनी पसन्द का नाश्ता किया नाश्ते में मेरे मनपंसद आलू के पराठे थे खाकर मजा आ गया उसके बाद दोपहर को सभी ने आराम किया, शाम ४:०० बजे एक बार सभी शिकारी साथी बोले चलो एक बार उस मायावी हिरन को देख आये अब किस हाल में है, कही चकमा दे कर ओझल न हो गया हो वो सभी फिर उसी जगह पर फिर अपने अपने हथियार लेकर पहुंच गये एक बार फिर मायावी अपना रूप बदल रहा था हमारे हाथों निकलने का प्रयास कर रहा था, सभी ने एक बार फिर से अपने हथियारो से उसे फिर शूट करना शुरू कर दिया दो तीन घंटे तक शूट करने के बाद अब सन्तुष्ट थे कि अब ये कहीं नहीं जायेगा। उसके बाद सभी शिकारी साथी गैस्ट हाउस वापस आ गये २७ तारीख को हमारी बरेली के लिए वापसी थी इसलिए रात ही में पलान किया कि सुबह हम सबको गुवालदम से ८:०० बजे चलना था, रात में हम सबने खाना और चाय पी, और सुबह के नाश्ते का आडर दे दिया  रात मे  मॆने ऒर सतपाल ने योजना बनाई की सुबह ५:०० बजे उठकर  यहा के कुछ नजारे अपने पिंजरे में कैद कर अपने साथ ले जायेगें, २७.११.२०१० सुबह हमने उठकर चाय बिस्कुट का नाश्ता लिया और निकल पडे पिंजरा लेकर नजारे कैद करने एक घंटे में हम दोनों को जितना भी मिल सका, उसे कैदकर वापस आ गये ।

वापसी में हमारी गाडिया  सोमेश्वर के रास्ते होते हुये बैजनाथ के प्राचीन मन्दिर पहुंची मन्दिर की कला और नदी का किनारा मन्दिर को ऒर भी खूबसूरज दरशा रहा था, आकाश की नीलमा के साथ और भी सुन्दर प्रतीत हो रहा था, नदी में तैरती मछलियॉ भी हम सबको लुभा रही थी, मानों जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हों, सभी शिकारियो ने अपने-अपने पिंजरे निकाल कर बचे हुये सुन्दर, लम्हों को कैद करना शुरू कर दिया।

चलते लम्हात उन सुनहरे पलों को हम अपने छोटे से पिंजरे में कैद कर अपने घर की ओर बढ़े जा रहे थे ४:५० पर हमारा शिकारी दल रानीखेत पहुंचा वहॉ होटल पर हम सभी ने लंच लिया, उसके बाद कुछ शिकारियों ने  रानी खेत के आर्मी शॉप पर  खरीदारी की, उसके बाद हमारा कारवॉ वापस बरेली की ओर चल दिया, हल्द्वानी में मुझे रूकना था। इसीलिए मैने अपने शिकारी दल से कहा मेरा सफर  पर हल्द्वानी में विराम लेगा आगे आप मेरे बिना ही यात्रा करें काठगोदाम पर पहंचकर सभी ने एक बार फिर चाय और पकौड़ी नमकीन का स्वाद लिया, उसके बाद कारवॉ मुझे छोड़ कर वापस बरेली आ गया ।


सचिन गौड़ 
सेलुलर: 07599004278
फ़ोटो विजन क्लब (बरेली)
सतपाल सिंह, मोहम्मदी (खीरी)
email: satpalsinghwlcn@gmail

Jan 8, 2011

बाघ का अर्थशास्त्र

Photo by: Arunesh C Dave
बाघ संरक्षण का आर्थिक पहलू
आज भारत मे बाघो के संरक्षण को लेकर काफ़ी जागरूकता आ गयी है । और हर किसी के पास उनको बचाने के लिये एक अलग विचारधारा है । लेकिन देश मे इस दिशा मे  कार्य कर रहे अधिकांश प्रबुद्ध वर्ग एक विचार मे सहमत नजर आता है कि बाघो और आदमियो के बीच दूरी बनाना ही संरक्षण का एक मात्र उपाय है । इसी कड़ी में  आगे मेरे मित्र अजय दुबे जो  मध्यप्रदेश के एक अग्रणी पर्यावरण कार्यकर्ता है ने उच्च न्यायालय मे एक याचिका दाखिल कर राष्ट्रीय उद्यानो के कॊर क्षेत्र मे पर्यटन पर रोक लगाने की मांग की गयी है । इस याचिका के निर्णय से बाघो और राष्ट्रीय उद्यानो के आसपास रहने वाले वनवासियो के भविष्य पर गहरा असर पड़ सकता है । बाघो के संरक्षण के लिये उसके आर्थिक पक्ष पर भी गंभीर विचार करने की आवश्यकता है ।


आज भारत मे कान्हा बांधवगढ़ रणथमबौर जैसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानो के आस पास रहने वाले आदिवासियो के जीवन स्तर मे अच्छा सुधार हुआ है । बड़ी तादाद मे सैलानियो के आने से इन आदिवासियो को नये रोजगार प्राप्त हुए है गाईड से लेकर होटलो के कर्मचारी तक मे इनको बड़ी तादाद मे नौकरिया मिली हैं । इन ग्रामवासियो के लिये बाघ जीविकोपार्जन का आधार बन गया है । इसके अच्छे परिणाम बाघो के संरक्षण मे प्राप्त हुये हैं आज इन गावों के आसपास किसी भी तरह का शिकार आसान काम नही रहा । बाघो पर आधारित रोजगार होने के कारण ग्रामीण इनके संरक्षक हो गये है ।

जब कान्हा से बाघिन को पन्ना स्थानांतरित करने का आदेश दिया गया तब स्थानीय ग्रामवासियो ने हड़ताल कर दी और राष्ट्रीय उद्धान का प्रवेशद्वार बंद कर दिया  अधिकारियो को उन्हे समझाने के लिये कड़ी मशक्क्त करनी पड़ी । ग्रामवासियो का तर्क था कि यदि कान्हा से बाघो को कही और भेजा जायेगा तो बाघ कम हो जायेंगे और पर्यटको का आना भी कम हो जायेगा इससे वे बेरोजगार हो जायेंगे ।

 इसके अलावा भी बाघो की एक झलक की तलाश मे घूमते पर्यटक जंगल पैट्रोलिंग का काम भी करते हैं । प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानो के चितपरिचित बाघो की अनुपस्थिती मालूम पड़ जाती है और किसी बाघ के १०-१५ दिनो तक नजर ना आने पर किसी भी बाघ की तलाश चालू हो जाती है एवं किसी बाघ के घायल नजर आने पर वनविभाग तक खबर पहुंच जाती है और उस बाघ को तत्काल चिक्त्सीय सहायता मिल जाती है । वनविभाग पर भी अंकुश बना रहता है और उसके द्वारा बरती किसी भी लापरवाही की सूचना तत्काल मीडिया तक पहुच जाती है । चाहे कान्हा मे शिकारियो के फ़ंदे मे फ़सी बाघिन हो या बांधवगढ़ मे झुरझुरा बाघिन की मौत हो यदी ये मामले पर्यटको की निगाह मे नही आये होते तो वनविभाग कब का इन्हे गुमनामी के अंधेरे मे दफ़न कर चुका होता ।


लेकिन कोर क्षेत्र मे पर्यटन का दूसरा पहलू भी है जिसको लेकर अजय दुबे जैसे लोगो की चिंता वाजिब भी है । राष्ट्रीय उद्यानो के कुछ चुनिंदा क्षेत्रो मे वाहनो की संख्या अत्यधिक बढ़ गयी है जिससे वन्य प्राणियो के आवास क्षेत्र मे खलल पड़ने लगा है एक एक बाघ के दिख जाने पर दसियो गाड़िया उसके पीछे लग जाती हैं और उनके व्यहवार मे परिवर्तन नजर आने लगा है इससे बचना भी जरूरी है व्यहवार मे परिवर्तन आने के घातक परिणाम भी हो सकते है बचपन से ही पर्यटको के आदी हो चुके बाघो मनुष्य से दूरी बनाये रखने की स्वभाविक प्रवुत्ती छोड़ देते है हाल ही मे बांधवगढ़ के ताला गांव मे एक बाघिन अपने शावको के साथ घुस आती है और सामना होने उसने आदमियों पर हमला करना भी प्रारंभ कर दिया है । ऐसे शावको के बड़ा होने पर उनका व्यहवार कैसा होगा इसका अदांजा लगाना कठिन नही है । हालांकि वनविभाग ने इसके लिये कदम उठाए हैं और वाहनो की संख्या कॊ नियंत्रित करने का प्रयास किया है । पर एक बात और भी है जिस पर ध्यान दिया जाना अत्यंत आवश्यक है बाघ पर्यटन का लाभ कुछ चुनिंदा उन गांवो को ही मिल रहा है जिनमे  प्रवेश द्वार है राष्ट्रीय उद्यानो से लगे शेष गांव इससे अछूते है ।

राष्ट्रीय उद्यानो से लगे गांवो मे रहना हम शहरियों को रोमांचकारी लग सकता है पर उन ग्रामीणो को नही जो उनमे निवास करते हैं खेतो की उजड़ी फ़सल या किसी गाय का मारा जाना उसके भी उपर प्रियजनॊ की मौत इन मे से हर एक कारण किसी को भी बाघ का हत्यारा बना सकती है मुझे या आपको भी यदि इससे हमारे बच्चो को भूखा सोना पड़े या बच्चे ही ना रहे पर यह बात जुदा है हम और आप इस परेशानी से दूर हैं यदी आप पंचम बैगा के पिता होते जो हाल ही मे बांधवगढ मे बाघिन के हमले मे मारा गया है तो शायद आप बाघ संरक्षण के बारे मे सोच भी  नही सकते थे खासकर तब जब उस जंगल से आपको धेला भी नही मिलता हो यह बात ठीक है कि मुंबई या दिल्ली की आराम दायक जिंदगी मे बाघो पर बात करने के लिये पैसा नही लगता और यदि लग भी जाये तो फ़िर भी हमारा अस्तित्व इससे प्रभावित नही होता है  लेकिन यह बात जंगल से लगे गांव मे करना बेमानी है और वह भी तब जब इस जंगल से गांववालो को कुछ मिलना ही नही हो । किसी सम्मेलन मे कम्प्यूटर पर  या मीडिया मे बाघ संरंक्षण की बाते करना अलग बात है और  खेत मे मचान मे बैठ कर  वन्यप्राणियो को भगाने के लिये हल्ला करना , सुबह उठकर हुआ नुकसान जांचना , या अपने मरे हुए पशु को देखना  और हर नुकसान से आपके जीवन पर इसके पड़ने वाले  प्रभाव को झेलना अलग बात है |

मुख्य सवाल जो आज मुह बाये खड़ा है वह यह है कि क्या कोर क्षेत्र मे पर्यटन रोकने से गांव वालो को आर्थिक नुकसान होगा , यदि यह पर्यटन चालू रहे तो बाघो उनके रहवास क्षेत्र व्यहवार और पर्यावरणतंत्र को कितना नुकसान होगा , पर्यटन रोकने से बाघो की सुरक्षा मे क्या कॊई कमी आयेगी और क्या लाभ मिलना बंद हो जाने से ग्रामीण फ़िर बाघ विरोधी हो जायेंगे , क्या कोर क्षेत्र मे पर्यटन बंद होने के बाद वनविभाग वहां बखूबी ??? काम करता रहेगा

जो भी व्यक्ती भारत की कानून व्यवस्था से वाकिफ़ है वह यह जानता है कि किसी भी प्रकरण को मनचाहे जज तक पहुचाने की व्यवस्था हो ना हो अनचाहे जजो से दूर ले जाने की व्यवस्था तो है ही ऐसे मे जिस भी जज के पास यह प्रकरण जायेगा वह पर्यावरण का कितना जानकार है हितैषी है या नही और ऐसी अन्य कई बाते हैं जिनकी चर्चा करने पर जेल भी हो सकती है और मै अरूंधती राय की तरह पहुंच वाला आदमी भी नही हूं । अतः मै यही कह सकता हूं कि इस प्रकरण के फ़ैसले मे पर्यावरण की हार तो है ही पर कुछ जीत भी है किसी भी व्यवस्था के अनूरूप चलने पर भी मुख्य समाधान तो दूर ही है ।



मुख्य बात तो यह है कि बाघो के संरक्षण मे संरक्षित वनो से लगते हर गांव को जोड़ना होगा   और जोड़ने का मतलब यह नही कि उनको भाषण पिलायें या कंबल बाटे य क्रिसमस मनायें मतलब यह है कि उनको उस जंगल से ऐसा लाभ होना चाहिये कि वे अपने नुकसान को नजर अंदाज कर सके पहले यह नुकसान प्राक्रुतिक जंगल से मिलने वाले भोजन से पूरा हो जाता था पर अब हमने जीवन शैली को मोड़ दिया है और फ़ल और फ़ूलदार पौधो को खत्म कर दिया है और तो और उन्ही जंगलो मे सदियो से रहते आये वनवासियो का जंगल से अधिकार भी समाप्त कर दिया है ऐसे मे नुकसान की पूर्ती केवल पर्यटन से पूरी हो सकती है मुवाअजो की थाल न कभी सजी है और न कभी सज पायेगी । और शहरी धनकुबेरो होटल मे वनवासी नौकर हो सकता है संतुष्ट नही ।


 क्यों न जंगल की सीमा से लगते हर गांव मे एक सुंदर विश्राम ग्रह बनाया जाय जिसका मालिकाना हक ग्राम वासियो का हो और उस हिसाब से ही प्रवेश निर्धारित हो क्यो ना जंगल मे जाने वाली हर जिप्सी एक अलग वनवासी परिवार की हो क्यों न गॊरूमारा राष्ट्रीय उद्धान की तरह हर शाम बाहर निकलने वाले वाले पर्यटको को अलग अलग गांवो से बाहर निकाला जाय और हर उस गांव मे वनांचल का नाच दिखाया जाय और प्रवेश शुल्क से इसकी राशी वसूली जाय और क्यो ना लाभ हर उस गांव को मिले जिसे जंगल से नुकसान होता है । और तो और क्यों न जंगल मे जगह जगह मधुमक्खी पालन किया जाय जब सुंदरवन मे लोग इसके लिये जान की बाजी लगाने को तैयार है तो हमारे पास तो करॊड़ो एकड़ वनभूमी है । हालांकि यह बात भी सही है कि उत्पादन वनमंडल की वनभूमी शहरी लोगो का सागौन साल उगाती है आदिवासियो वन्यप्राणियो और मधुमक्खियों के भोजन स्त्रोत सेमल बेल जामुन आंवला इमली करौंदा जाम आम कटहल गंगाइमली बेर मुनगा  महुआ  सल्फ़ी चिरईजाम पीपल बरगद नीम पलाश यह सब पौधे उत्पादन वनमंडल के क्षेत्र मे उगाये नही जाते और राष्ट्रीय उद्धानो मे शायद किसी ने रोक लगा रक्खी है कि ना काटो ना लगाओ खैर साहब कहा सुना माफ़ करना फ़ैसला भी सामने आ जायेगा और नतीजा भी




अरूणेश दवे (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

Jan 6, 2011

कवर्धा में बाघ की हत्या

क्या सिर्फ एक बाघ मरा है... 

©dudhwalive.com
छत्तीसगढ़ में कवर्धा से 80 किलोमीटर दूर पंडरिया के ग्राम अमनिया में जहां बाघ को मौत के घाट उतारा गया है वह इलाका अचानकमार व कान्हा नेशनल पार्क के गलियारे का जोड़ता है। पिछले दिनों जब वन्य प्राणी बोर्ड की बैठक हुई थी तब इस क्षेत्र में मौजूद एक खदान से खनन किए जाने के प्रस्ताव पर भी विचार-विमर्श किया गया था।  हालांकि बोर्ड के दो सदस्यों ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया था।  सदस्यों के विरोध के बाद भी यहां खदान से खनन किए जाने की कार्रवाई को लेकर फाइल आगे बढ़ रही थी लेकिन बाघ की मौत ने माइनिंग लीज के प्रस्ताव पर फिलहाल  मिट्टी डाल दी है।  इधर इलाके में बाघों की मौजूदगी को नजरअंदाज करने वाले अफसरों की भी घिग्गी बंध गई है। 

गौरतलब है कि 19 दिसंबर 2010 को पंडरिया के अमनिया गांव के पास एक बाघ का शव पाया गया था। प्रारंभिक जांच-पड़ताल के बाद विभाग के अफसरों ने इस शव को लकड़बघ्घे का शव बताया था लेकिन जब रायपुर के वरिष्ठ अफसर मौके का मुआयना पहुंचे तब इस बात की पुष्टि हुई कि शव किसी बाघ का ही है। इस शव के मिलने के बाद विभाग के अफसरों की सिट्टी-पिट्टी गुम है। पिछले दिनों जब राजधानी में वन्य प्राणी बोर्ड की बैठक हुई थी तब वन अफसरों ने बोर्ड के सदस्यों के सामने रेंगाखार इलाके में मौजूद एक खदान के खनन का प्रस्ताव रखा था। कांग्रेस विधायक टीएस सिंहदेव एवं बसपा विधायक सौरभ सिंह जो बोर्ड के सदस्य हैं ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया था। सदस्यों का कहना था कि रेंगाखार इलाके में बाघों की मौजूदगी देखी गई है और यह इलाका अचानकमार अभ्यारण्य व कान्हा नेशनल पार्क के गलियारे को जोड़ता है। फलस्वरूप यहां मौजूद खदान के खनन को मंजूरी देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। बोर्ड के सदस्यों के द्वारा किए गए विरोध के बाद भी खनन संबंधी मामले में एक फाइल मंत्रालय के गलियारों में दौड़ लगा रही थी। लेकिन बाघ की मौत के बाद फिलहाल मामला ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है। इधर इस मामले में माइनिंग लीज की तरफदारी करने वाले अफसरों की सिट्टी-पिट्टी भी गुम हो गई है। खबर है कि इस मामले में अफसर अपनी चमड़ी बचाने में लगे हुए है। हालांकि लापरवाहीपूर्वक काम करने के चलते कवर्धा के डीएफओ एके श्रीवास्तव ने नेउर कक्ष क्रमांक 475 के वन कर्मी धनुष सिंह ठाकुर और बीट गार्ड बीके गंजीर को निलंबित कर दिया है। लेकिन इस निलंबन के बाद भी कुछ सुगबुगाते हुए सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या बाघ की मौत के लिए केवल ग्रामीण और निचले स्तर पर कार्यरत वन अमला ही जिम्मेदार है?

मुआवजे की लचर प्रक्रिया
वन विभाग के ही जिम्मेदार अफसरों का यह मानना है कि मुआवजे की लचर प्रक्रिया के चलते भी ग्रामीण जानवरों को मौत के घाट उतारते हैं। जिस किसी भी ग्रामीण का मवेशी मारा जाता है यदि उसे तत्काल ही मुआवजा दे दिया जाए तो वह हिंसक जानवर को ठिकाने लगाने के उपायों को अमल में नहीं लाता। अन्यथा ग्रामीण यह मानता है कि जब हिंसक जानवर उसके एक मवेशी को मार चुका है तो फिर वह उसके दूसरे जानवरों पर भी हमला करेगा ही। अन्य मवेशियों को बचाने के लिए ही शिकार हो चुके जानवर पर जहर घोलने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। कवर्धा के अमनिया ग्राम में घटित हुई घटना में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। जिस बाघ की मौत हुई है उसने 25 से 30 नवंबर के बीच दो बैलों और एक गाय को अपना शिकार बनाया था। ग्रामीणों ने अन्य जानवरों के बचाव के लिए बाघ को ठिकाने लगाने का काम किया।

टाइगर अभ्यारण्यों में पद रिक्त
पिछले दिनों जब विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित किया गया था तब बसपा विधायक सौरभ सिंह ने वन मंत्री विक्रम उसेंडी से टाइगर अभ्यारण्यों में रिक्त पदों के संबंध में जानकारी चाही थी। श्री सिंह के लिखित प्रश्न के उत्तर में वनमंत्री ने बताया था कि इंद्रावती, उदंती-सीतानदी और अचानकमार अभ्यारण्यों के 420 पदों में से 219 पद पूरी तरह से खाली है। विभाग के अफसर भी दबी जुबान से यह मानते हैं कि मैदानी स्तर पर अमले की कमी के चलते जंगली-जानवरों की सुरक्षा ठीक ढंग से नहीं हो पा रही है। कवर्धा में जिस बाघ की मौत हुई है उसकी भनक भी वहां मौजूद बीट गार्ड को काफी देर से हुई थी। जब शव से दुर्गंध उठने लगी तब जाकर मामले का खुलासा हुआ।

एक ही जगह पर जमे अफसर
अब से कुछ अरसा पहले गोदाबर्मन के एक प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जो वन अफसर जिस काम के लिए पदस्थ किया जाएगा उसे वही काम करना होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की सीधे-सीधे अवहेलना हो रही है। नियमानुसार प्रतिनियुक्ति में नियुक्त किये गये किसी भी अफसर की पदस्थापना तीन सालों के भीतर अन्यंत्र हो जानी चाहिए लेकिन छत्तीसगढ़ में इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा है। विभाग में प्रदीप कुमार पंत, आरके सिंग, प्रकाशचंद्र पांडे सहित अनेक अफसर ऐसे हैं जो वन विभाग के बजाए अन्य जगहों पर कार्य कर रहे हैं। वन विभाग का ही धड़ा ऐसे अफसरों की प्रतिनियुक्ति को लेकर खासा नाराज है।   धड़े के जिम्मेदार लोग यह मानते है कि कतिपय अफसर अपनी पदस्थापना अन्य मलाईदार विभागों में इसलिए भी चाहते है क्योंकि वन विभाग की रौनक घट गई है। दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थ अफसर यह मानते है कि वन सेवा का काम काफी दबावों के बीच होता है। ऐसे में यदि कोई प्रतिनियुक्ति पर चला जाता है तो वह सीधे-सीधे सत्ता के करीब पहुंचकर मुख्यधारा में शामिल हो जाता है। अफसर मानते हैं कि बड़े पैमाने पर की गई प्रतिनियुक्ति के चलते ही जंगल में आग लगने, जानवरों के मारे जाने और अवैध कटाई के प्रकरणों में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2008 से लेकर वर्ष 2010 तक अवैध शिकार के लगभग 45 प्रकरण सामने आ चुके हैं। दूरस्थ अंचलों में पदस्थ अफसरों का एक बड़ा वर्ग जंगलों की कटाई और अवैध शिकार के लिए बेगारी को भी एक कारण मानता है। नाम न छापने की शर्त पर कुछ अफसरों ने बताया कि जिलों में पदस्थ वनमण्डाधिकारियों का अधिकांश समय महात्मा गांधी राष्टीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत संचालित किए जाने वाले कामों में ही बरबाद हो रहा है। अफसरों का अधिकांश समय आडिट रिपोर्ट बनाने में ही जाया हो रहा है। अफसरों का कहना है कि  जब तक वे बेगारी करते रहेंगे तब तक वनों और वन्य प्राणियों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रहेगी।
.भोजन की कमी 
वन्य प्राणी बोर्ड से जुड़े एक सदस्य का मानना है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में ‘सिंग’ और खुरवाले जानवरों की कमी हो गई है। नील गाय अब सरगुजा के आसपास ही नजर आती है तो चीतल व सांभर के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। बारहसिंघा तो प्रदेश में है ही नहीं। जानवरों की कमी के कारण ही बाघ पालतू जानवरों को उठाकर जंगल ले आता है। सामान्य तौर पर बाघ जिस जानवर को अपना भोजन बनाता है उसे वह दो-तीन दिनों तक बड़े चाव से खाता है।  अब से कुछ अरसा पूर्व जब बाघ ग्रामीणों के मवेशियों को उठाकर ले जाया करता था तब शिकारी उसका शिकार किया करते थे लेकिन अब ग्रामीण ही उसे ठिकाने लगा देते हैं। वन्य प्राणी बोर्ड के एक सदस्य टीएस सिंहदेव बाघों को बचाने के लिए की जा रही कवायद के बीच छत्तीसगढ़ में एक बाघ की मौत को काफी दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि जब तक वाइल्ड लाइफ का सेटअप पूरी तरह से अलग नहीं होगा तब तक अवैध शिकार के मामलों में बढ़ोत्तरी होती रहेगी। कुछ ऐसे ही विचार सौरभ सिंह के भी है। श्री सिंह का कहना है कि जब तक रिक्त पदों पर भर्ती नहीं की जाएगी तब तक अवैध शिकार के प्रकरण उजागर होते रहेंगे। छत्तीसगढ़ में वैसे भी बाघों की संख्या काफी कम है। यदि विभाग के लोग मुस्तैद होते तो यह घटना टाली जा सकती थी।

मुस्तैद है वन अमला
मैं यह नहीं मानता कि वन अमला मुस्तैद नहीं है। जहां तक अफसरों की प्रतिनियुक्ति का सवाल है तो मैं यह बताना चाहूंगा कि  वन सेवा से जुड़े अफसरों के लिए भी प्रतिनियुक्ति का नियम बना हुआ है। कुछ अफसर राज्य में सेवा देते हैं तो कुछेक की नियुक्ति दीगर राज्यों में होती है। हां यह सही है कि जंगलों  की कटाई से जानवर प्रभावित होते हैं। जब जानवरों को उनके अनुकूल वातावरण नहीं मिलता तो वे गांवों और कस्बों की ओर दौड़ लगाते हैं।
रामप्रकाश
पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ  

कुछ तथ्य ऐसे भी
0 भारतीय वन्य प्राणी संस्था देहरादून द्वारा वर्ष 2008 में किए गए सर्वे के मुताबिक देश में कुल 1411 बाघ शेष हैं जबकि छत्तीसगढ़ में बाघों की कुल संख्या 26 बताई गई है।
0 नक्सलवाद के चलते प्रदेश के इंद्रावती अभ्यारण में शेरों की गिनती का काम नहीं हो पाया है।
0 1972 के वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत बाघ को अनुसूची एक में शामिल किया गया है। पहली बार बाघ का शिकार या उसके अंगों की तस्करी करने पर तीन से सात वर्ष तक जेल और 50 हजार से लेकर दो लाख तक जुर्माने का प्रावधान तय किया गया है। दूसरी बार शिकार करने में सजा का अधिकतम समय सात वर्ष और जुर्माना पांच से पचास लाख निर्धारित है।
0 बिलासपुर जिले के अचानकमार अभ्यारण्य में शेरों की गिनती के लिए कैमरा लगाए जाने की तैयारी की गई थी लेकिन यह काम फाइलों में ही कहीं खोकर रह गया है।


राजकुमार सोनी(लेखक छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित अखबार हरिभूमि में वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेखन की तमाम विधाओं में दखल, छत्तीसगढ प्रदेश की राजधानी में निवास, इनसे soni.rajkumar123@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।

Jan 4, 2011

बंजर जमीनों की निगेहबानी कौन करे ?

बाघ और उनके आवास 
 अब न प्राकृतिक जंगल हैं और न ही परती भूमियां जो घर हुआ करती थी हजारों किस्म के जीवों का........
 
©Krishna K Mishra
जनपद खीरी हिमालय की तराई का एक विशाल भू-भाग, जहाँ छोटी-बड़ी नदियों का जाल इस धरती पर विभिन्न प्रकार की जैव-विविधिता को पोषित करता है, यही विशाल नदियों और स्थानीय नदियों की तलहटियों में उगे वृक्षों, झाड़ियों और विशाल घासों ने वन्य जीवन को सुन्दर ठिकाने प्रदान किए, और यही वजह थी कि वन्य जीव एक स्थान से दूसरे स्थानों तक इन्ही नदियों के किनारों की झाड़ियों की ओट लेकर एक जंगल से दूसरे जंगल तक विचरण किया करते थे, साथ ही परती पड़ी भूमि जो घास के मैदान हुआ करते थे जंगली व पालतू पशुओं के लिए पोषण का बेहतरीन जरिया थे और मांसभक्षी बाघ, तेन्दुआ, भेड़िया, एंव सियार जैसे जानवरों के लिए ये सब्जीखोर पशु आहार के रूप में उपलब्ध थे,  बाघ और तेन्दुओं जैसे खूबसूरत माँसभक्षी जानवरों के लिए खीरी जनपद की भौगोलिक व प्राकृतिक स्थितियां एक दम अनुकूल थी। किन्तु मौजूदा अनियोजित विकास ने इन नदियों के किनारों की जैव-विविधिता को नष्ट कर दिया, साथ ही परती भूमियां कृषि व औद्योगिक ईकाइयों की भेट चढ़ गयी। 

सबसे गौर तलब बात यह कि खीरी ही नही ब्रिटिश-भारत में जंगलों का अन्धाधुन्ध कटान किया गया, और उनकी जगह एक ही प्रजाति के वनों का रोपण हुआ, नतीजा प्राकृतिक व जैव-विविधता वाले जंगल समाप्त हो गये, साथ ही भारत की आजादी के उपरान्त तकरीबन दो दशकों तक जंगलों का बेदर्दी से सफ़ाया किया गया, ताकि सरकार रेवन्यु मिल सके  और भारत के विभिन्न भू-भागों से लाकर गरीब जनों को इन भूमियों पर बसाया जा सके, भू-दान आन्दोलन आदि इसकी एक मिसाल है, आज उन वनों की जगहों पर रिहाइशी इलाके या कृषि भूमियां हैं। 

यदि किसी प्रजाति को नष्ट करना हो तो उसका घर उजाड़ दो, मानव अपनी महत्वाकाक्षाओं के चलते इस अनियोजित विकास में सभी के घर उजाड़ देना चाहता है, किन्तु क्या एसा करके वह अपना अकेला घर इस ग्रह पर बचा सकेगा!

हम आदिवासियों को खदेड़ कर बाघ बचाना चाहते है! क्या जहां जहां ऐसा किया गया वहां बाघ बच पाये? जंगल आदिवासी का घर है और जीव को अपने घर से प्रेम होता है, वह कभी नही चाहेगा कि उसका घर या उसके घर की को चीज नष्ट हो, पर आदिवासी और जंगल के मध्य समन्वय स्थापित करने में हम असफ़ल रहे, कानून किसी समस्या का हल नही हो सकता। फ़िर मौजूदा वनों में आदिवासियों या इन वनों के आस-पास रह रहे लोगों से वन व वन्य प्राणियों के प्रति संवेदना की उपस्थिति हो यह सोचना वेवकूफ़ी है, क्योंकि कोई भी बाग-वान बिना फ़लोम वाली बाग को बचाने में अभिरूचि नही दिखायेगा, यदि वह पागल नही है तो? आज के वन जो मुख्यत: इमारती लकड़ी के लिए रोपे गये, शाखू, सागौन आदि, जिनमें विविधिता का अभाव है, केवल एक वृक्ष प्रजाति ही मौजूद है, ऐसे जंगल में न तो पक्षियों की विविधता मौजूद होगी और न ही कीटों की.......फ़ल दार व औषधीय वृक्षों के अभाव ने मनुष्य का वनों के प्रति आकर्षण समाप्त कर दिया। हां जहां महुआ आदि के वृक्ष मौजूद है वहां के वनों में आदिवासी को वह अधिकार प्राप्त नही जिससे वह इन प्राकृतिक स्रोतों से अपनी जीविका चला सके।

हमें परती भूमि, नदियों व तालाबों के आस-पास के छोटे-छोटे वन-समूहों को दोबारा विकसित करना होगा, ताकि यह जंगल-झाड़िया व खुले मैदान शिकार और शिकारी (prey &predator)  को आश्रय प्रदान कर सके व जीवों के आवागमन में कारीडोर का कार्य भी।  

यदि हम बाघ के आवास और उसके भोजन को सुरक्षित रख सके तो ही यह प्रजाति हमारी धरती पर जीवित रह सकेगी अन्यथा सारी कवायदे बेवकूफ़ाना साबित होगी, शिकार एक समस्या है, पर उससे भी बड़ी समस्या है इस प्रजाति के नष्ट होते आवास और आहार।

जब वास्तविक जंगल और उसमेम प्रचुर मात्रा में जीव जन्तु होगे तो आहार श्रंखला में समन्वय स्थापित रहेगा। नतीजतन मानव-जानवर के मध्य में टकराव की संभावना भी समाप्त हो जायेगी। अतीत में सारे धर्म प्रचारक यानि रिषि-मुनि जगलों में निवास करते थे किन्तु किसी साधु को बाघ या शेर खा गया हो ऐसे वृतान्तों का जिक्र नही मिलता।
ग्यारहवीं सदी में महमूद गजनवी के साथ भारत आये विद्वान अलबरूनी ने अपनी पुस्तक में गंगा की तलहटी में गैन्डों को सामान्य तौर से मवेशियों की तरह विचरण करते देखा, आज उसी गंगा की तलहटी में गैन्दे क्या गाय-भैंस के चरने या विचरण करने के लिए जगह नही बची...हम अनियोजित विकास को बन्द कर दे, बेहतर नतीजे खुद-ब-खुद हमारे सामने होंगें।

हम प्राकृतिक वन, नदियां, जलाशय और परती-जलीय-नम भूमियों को सरंक्षित कर ले तो धरती की जैव-विविधता पल्लवित होती रहेगी।
कुदरती जंगल होंगे, उनमें फ़ूल और फ़ल होंगे तो चिड़िया भी चहचहाएंगी और मोर भी नाचेंगे, यकीन मानिए आदमी इन फ़ल-फ़ूलों से सुसज्जित जंगलों की सुरक्षा भी करेगा और उसकी बढ़ोत्तरी में सहयोग भी देगा....नही तो सिर्फ़ टिम्बर उगाने से आम आदमी जो कभी निर्भर था इन प्राकृतिक वनों पर, इन लकड़ी के लठ्ठों की निगेहबानी नही करेगा ! 




कृष्ण कुमार मिश्र ( स्वतंत्र पत्रकारिता-लेखन, अध्यापन, वन्य-जीवन का अध्ययन व सरंक्षण,  युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर में  दो वर्षों  (2001-2002)तक जन्तु-विज्ञान प्राध्यापक के तौर पर कार्यानुभव, विश्व-प्रकृति निधि के पांडा न्युजलेटर, न्युजलेटर फ़ॉर बर्डवाचर्स, आदि में वैज्ञानिक लेखन  के अतिरिक्त  हिन्दुस्तान दैनिक लखनऊ में कई वर्षों तक "प्रदेश के रंग" कॉलम में प्रदेश के इतिहास व वन्य-जीवन पर नियमित लेखन, हिन्दुस्तान दैनिक लखीमपुर-लखनऊ में दुधवा डायरी कॉलम  के प्रवर्तक,सहारा समय साप्ताहिक में खीरी जनपद से रिपोर्टिंग, जनसत्ता, डेली-न्युज एक्टिविस्ट, प्रभात खबर, डिग्निटी डॉयलॉग, उदन्ती आदि पत्र।पत्रिकाओं में लेखन के साथ-साथ पर्यावरण व वन्य-जीव सरंक्षण में अलख जगाते रहने की हर मुमकिन कोशिश, एशियन ओपनबिल्ड स्टॉर्क  पर शोध कार्य, लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Jan 2, 2011

रहे न रहे हम महका करेंगे...........

बिली अर्जुन सिंह को भूल गया दुधवा प्रशासन
-देवेन्द्र प्रकाश मिश्र

वन्य जीव संरक्षकों की दुनिया की जानी मानी महान विभूति तथा दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना में अग्रणी एवं महती भूमिका निभाने वाले पदमश्री बिली अर्जुन सिंह आज के ही दिन यानी एक जनवरी 2010 को दुनिया से अलविदा करके पंचतत्व में विलीन हो गए थे। यह विडम्बना ही कही जाएगी कि क्षेत्र के वाइल्ड लाइफरों समेत वयंजीव संरक्षण का ढिंढोरा पीटने वाले एनजीओ के अगुवाकारों ने ही नहीं वरन् दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने भी स्वर्गीय बिली अर्जुन सिंह को साल भीतर ही भुला दिया। इसका प्रमाण यह है कि क्षेत्र में कहीं भी उनकी याद में कोई कार्यक्रम किसी ने आयोजित करने की जहमत नहीं उठाई है।

उल्लेखनीय है कि 15 अगस्त 1917 को देश के पंजाब सूबे में कपूरथला स्टेट के जसवीर सिंह के घर में अर्जुन सिंह पैदा हुए थे। गोरखपुर तथा मेरठ में ग्रेजुएट की शिक्षा ग्रहण करने के बाद अर्जुन सिंह ब्रिटिश सत्ता में नजदीकियां होने से वह फौज में भर्ती हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजी सेना की ओर से वर्मा देश में जाकर बतौर आर्मी कैप्टन युद्ध लड़ा था। इसके बाद देश की आजादी से पहले ही अर्जुन सिंह ने फौज की नौकरी छोड़ दी थी। इससे पूर्व अपने कुछ रिश्तेदारों के बुलावे पर अर्जुन सिंह खीरी के जंगल में शिकार करने आए थे तब उन्होंने बारह वर्ष की अल्पायु में बाघ का शिकार किया था। मगर फिर शिकार करने के बाद उनका हृदय परिवर्तन हो गया और खीरी के घने जंगलों के अलावा संपूर्ण प्रकृति के वह प्रेमी हो गए उन्हें वयंजीवों एवं पक्षियों में खासकर बाघ से बेहद प्रेम हो गया। फौज में वह एयरफोर्स में जाना चाहते थे लेकिन उनकी इच्छा के आगे कद आ गया। यह इच्छा पूरी न हो पाने के कारण वह टाइगर्स कंजरवेशन की दूसरी इच्छा पूरी करने के लिए स्वतंत्रता के बाद वह खीरी के पलिया थाना क्षेत्र के तहत जंगल की रसिया पर उन्होंने टाइगर हैवन के नाम से आशियाना बनाकर रहने लगे। केन्द्रीय सरकार में पहुंच और प्रधानमंत्री स्वर्गीय इन्दिरा गांधी से नजदीकियां होने के कारण पर्यावरण प्रेमी बिली अर्जुन सिंह को विलायत से लाई गई तारा नामक बाघिन को पालने पोसने के लिए श्रीमती गांधी ने ही उन्हें सौंपा था। इस बीच दो फरवरी 1977 को दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना कराने में बिली अर्जुन सिंह का खासा महत्वपूर्ण योगदान रहा। इनके प्रयासों से ही 1984 में गैंडा पुर्नवास परियोजना तथा वर्ष 1988 में बाघ संरक्षण परियोजना की भी शुरूआत हुई थी। यूपी, खीरी और दुधवा को दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर एक सम्मानजनम स्थान दिलवाने में बिली ने अहम भूमिका अदा की थी। उन्होंने दुधवा की ख्याति को ब्रिटेन, इंग्लैंड आदि दुनिया के अन्य देशों तक पहुंचाया। हैरियट और जूलियट नामक नर तथा मादा तेंदुआ को अपने आवास पर पाल पोसकर बड़ा किया था।



बिली अर्जुन सिंह को टाइगर कंजरवेशन के लिए किए गए उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए 1979 में देश के अलंकरण पदमश्री उपाधि से विभूषित किया गया। सन् 2005 में अमेरिका के विश्वस्तरीय पालगेटी एवार्ड से भी उन्हें नवाजा गया था। इससे पूर्व 1977 में विश्व में विश्वजीव कोष से गोल्डन आर्क पुरस्कार मिला। 1989 में ईएसएसओ सम्मान, 2003 में सेंक्चुरी एमआरओ लाइफ टाइम सर्विस सम्मान, सन् 2005 में यश भारती सम्मान से भी उनको नवाजा गया था।

बिली अर्जुन सिंह द्वारा वन्य जीव तथा बाघ संरक्षण पर दि लीजेंड आफ मैनइटर टाइगर, टाइगर हैवन, वाचिंग इंडियाज वाइल्ड लाइफ, तारा दे टाइग्रेस, प्रिंस, आफ कैटस, बायोग्राफी इंडियंस वाइल्ड लाइफ आदि पुस्तकें भी लिखी जो विश्व स्तर पर खासीर प्रसिद्ध हुई। ब्रिटिश लेखक डफ हर्टडेविस द्वारा बिली के जीवन पर लिखी गई पुस्तक आनरेटी टाइगर-द लाइफ आफ बिली अर्जुन सिंह भी खासी चर्चित रही। बीते साल एक जनवरी को बिली अर्जुन सिंह ने जब इस दुनिया से अलविदा कहा था। तब उनके अंतिम दर्शनों के लिए देश विदेश से उनके नाते रिश्तेदारों के साथ ही क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी तथा सूबे के वन विभाग के उच्चाधिकारी यहां आए थे। दुधवा नेशनल पार्क के कर्मचारियों ने सीमा पर उनकी शव यात्रा को सलामी भी दी थी। लेकिन यह विडम्बना की बात है कि एक साल ही बीता है कि क्षेत्रीय लोगों ने उनको भुला दिया यहां तक दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने प्रथम पुण्यतिथि पर बिली को याद नहीं किया और न ही वाइल्ड लाइफर होने का दंभ भरने वालों समेत वयंजीव संरक्षण के नाम पर चला रहे एनजीवों के अगुवाकारों द्वारा कोई कार्यक्रम आयोजित किया गया। इससे लगता है कि क्षेत्र की महान विभूति बिली अर्जुन सिंह को यहां के लोगों ने भुला दिया है। ‘दुधवा लाइव‘ परिवार बिली अर्जुन सिंह की प्रथम पुण्यतिथि पर श्रद्धाजंलि अर्पित करता है।

-देवेन्द्र प्रकाश मिश्र
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, अमर उजाला से काफ़ी समय तक जुड़े रहे है, वन्य-जीव संरक्षण के लिए प्रयासरत, दुधवा टाइगर रिजर्व के निकट पलिया में रहते हैं। आप इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था