International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Jan 20, 2011

छबीली और उसका नया घर !

 छबीली और उसके बच्चे
एक माँ....
...वह घर के नज़दीक एक कच्चे नाले में जा बैठी, बस कुछ देर ठहरने के बाद उसने मिट्टी खोदना शुरू कर दिया, जमीन पर जब एक छोटे गड्ढे की शक्ल उभर आई तब जाकर उसने साँस ली, और इत्मिनान से बैठ गयी सोने जैसे रंग वाली उस भुरभरी मिट्टी में, अपने चेहरे को उस मुलायम जमीन पर यूँ रख दिया जैसे किसी के कंधों ने उसे आसरा दिया हों, वह अब कुछ राहत महसूस कर रही थी। आज सुबह जब मैने उसे देखा और छबीली कह कर पुकारा (ये नाम इसे मेरी माँ ने दिया है, जो मोहल्ले में सर्वमान्य है) तो इसने हमेशा की तरह मेरी जानिब सिर उठाया, आज उसकी स्नेह भरी आँखें जिनमें आज कुछ दर्द लिपटा हुआ सा था, जिसे मैं समझ भी रहा था, फ़िर कुछ देर इसने अपने पेट को आसमान की तरफ़ किया और चुपचाप लेटी रही....इसकी यह क्रियायें यह समझा रही थी कि वह जननी होने का सुन्दर भाव पाने जा रही है, जो उसे माँ बना देगा....धरती पर प्रत्येक प्रजाति में सर्वश्रेष्ठ भाव-मातृत्व....जिसे पाकर वह जीव अपनी अदभुत क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए विभिन्न परिस्थियों में अपने उन अंशों का पालन-पोषण करती है और सुरक्षा भी...सुरक्षा से याद आया वह माँ अपने इस अंश की रक्षा लिए दुनिया के सबसे ताकतवर चीज से भी टकरा जाए और यकीन मानिए कि ईश्वर भी माँ के उस रूप को देखकर एकबारगी थर्रा जाए.....!

हाँ तो बात हो रही थी छबीली की, छबीली  ने चार बच्चों को जन्म दिया, उसके प्रजाति के कुछ सदस्य उसके आस-पास बैठे हुए थे किसी सुरक्षात्मक घेरे की तरह...जिनमें कुछ उसके कुटम्ब के थे । बिना किसी हाइजीन के इस माँ ने जने थे अपने बच्चे....कोई नर्स नही, कोई दवा नही, कोई पेट फ़ाड़ने वाला सर्जन नही, बस उस ताकत के सहारे यह माँ झेल गयी सारा दर्द, जिसने उसे मातृत्त्व जैसे भाव का बोध कराया।  सच है ज्ञान से बड़ी ताकत कोई नही इस संसार में जो बोध कराती है सारी प्रजातियों को कि कैसे दुर्गम स्थलों, विपरीति परिस्थितियों, में जिन्दगी को रफ़्ता रफ़्ता आगे बढ़ाया जाए..जिसे जीन में पिरोई हुई उस ज्ञानमाला को इन्सटिंक्ट कह ले या प्रकृति प्रदत्त वृत्ति...जिसे इस्तेमाल करने के लिए किसी किताब, या गुरू की जरूरत नही और न ही किसी ट्रेनिंग सेन्टर की !...उस सुपर प्रोग्रामर के ये प्रोग्राम कभी विफ़ल नही होते और यही जिजीविषा तो जीने का कौशल देती है।



खैर छबीली के नन्हे बच्चों को देखने मुहल्ले के मानव-बच्चे इकट्ठा होने लगे, सब उसके नज़दीक जाते उसे छूते, सहलाते, वह कुछ नही बोलती, वह अपनी असीम पीड़ा को भूलकर अपने बच्चों को चाट रही थी जो स्नेह के साथ प्रकृति प्रदत्त हायजीन का एक बेहतर तरीका है बच्चों को संक्रमण से बचाने का।


...अब सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि आखिर धरती इसे गर्माहट दे देगी मगर आसमान से रहम की गुंजाइश नही थी, ठंड का मौसम, बारिश का डर, और कोहरे का गिरना जारी था, हम सब इसका घर पहले से बना देना चाहते थे, और उम्मीद थी कि कुछ और नन्हे इसमें आसरा लेगे, लेकिन आलस और व्यस्तता ने मामले को लम्बा कर दिया था, लेकिन अब हम सब इस काम को अंजाम देने में जुट गये, मुहल्ले के अमित उर्फ़ मौसा जी ने सुझाया कि पास के सरदार जी के प्लाट में कुछ सीमेन्ट के बने तख्ते रखे है, जो छत के रूप में प्रयोग किए जा सकते है, हम दोनों उस बाउंड्री से घिरे प्लाट में सीढ़ी लगाकर घुसे, और एक तख्ता बाहर निकाल लाए, अब उसे उस नाले के ऊपर रख कर देखा गया जहां छबीली ने जमीन खोद कर अपने बच्चों को जनने का स्थान चुना था, पर मुझे ये डर सता रहा था कि इस नाले पर पड़े इस सीमेन्ट के तख्ते पर यदि किसी जानवर ने पैर रख दिया तो यह टूट जाएगा और बच्चे दब जायेंगे...! अब इरादा बदल दिया गया पूर्व में छबीली की मां का घर पास की जिस दिवार के किनारे बनाया गया था वही पर उस तख्ते को कुछ ईंटों के सहारे रखा गया, इन कारगुजारियों को देखकर अब तक मुहल्ले के काफ़ी बच्चे इकट्ठे हो चुके थे और सभी अपना सहयोग भी दे रहे थे, बड़ी शिद्दत से।
अब सबसे कठिन काम था उसके बच्चों को उस कच्चे नाले से इस नये घर में लाना आखिरकार एक लड़के ने छबीली का एक बच्चा उठा लिया, जो छबीली और उसके बच्चों को कुछ देरे पहले सहला रहा था,  और चल दिया नव-निर्मित छबीली के घर की तरफ़ तो छबीली भी पीछे पीछे दौड़ पड़ी  तभी हमने  छबीली के शेष तीन बच्चों को उठाकर उसके नये घर में रख दिया, लेकिन छबीली अपने पहले बच्चे को उठाकर फ़िर उसी जगह रख आयी जहां उसने इन्हे जन्म दिया था, लेकिन जब वहां अन्य बच्चों को नही देखा तो वापस आकर अपने यहां मौजूद बच्चों को पाकर यही बैठ गयी, वह भ्रमित हो गयी थी, हमारी कारस्तानियों से जो उसके पक्ष में थी, खैर हमने उस बच्चे को जिसे वह पूर्व स्थान पर रख आयी थी वहां से उठाकर फ़िर उसके नये घर में रख दिया..अब वह उसे चाट रही थी...!
आज शाम को जब मैं रोज की तरह घर दूध लेकर वापस लौटा तो वह अपने बच्चों के पास अपने घर में बैठी थी..वह हमेशा की तरह दौड़ी तो पर वह भूखी-प्यासी मां उलझन में थी, जब तक उसे दूध निकाल कर दिया गया तब-तक वह अपने घरौंदें के दो चक्कर लगा आयी...यह था मातृतत्व का बोध और उसकी जिम्मेदारी।

अब हर सुबह शाम बच्चे और बड़े छबीली का घर और उसके बच्चे देखने आते है, दावत न देने का शिकवा भी करते है, उसे हमारी प्रजाति से कोई दिक्कत नही, बस यदि कोई उसकी प्रजाति का बन्दा उसके घर के आस-पास फ़टका तो समझो उसकी खैर नही.....अम्मा कहती है, कि यह सबक है कि हमेशा अपनी प्रजाति से होशियार रहो !

खैर यह प्रजाति हमारे साथ सदियों से रहती आयी है, इसे हमने पालतू बनाया, गुलाम भी, और मित्र भी, पर यह यहां वे स्वतन्त्र है, क्योंकि हम किसी को किसी पर निर्भर बनानें में विश्वास नही रखते हम उन्हे हक़दार बनाते हैं। 

हाँ एक बात और छबीली के घर पर सबकी राय से एक बोर्ड भी लटका दिया गया है, जिस पर लिखा है 
Home
Chhabily and her kids
Date of Birth- 18-01-2011
Shiv Colony Lakhimpur Kheri
निकट-ब्रेड फ़ैक्ट्री

कृष्ण कुमार मिश्र

7 comments:

  1. ओह! कितने प्यार से लिखा है आपने ये लेख. हम जब छोटे थे और रेलवे कालोनी में रहते थे, तब कोई भी कुतिया बच्चे देती थी, तो मेरी अम्मा उसके लिए सौंठौरा बनाती थी. तीन दिन तक दिया जाता था और फिर खिचड़ी. वो ऐसा सभी कुतिया माओं के लिए करती थीं.
    आज भी हमारी गली में रहने वाली एक काली कुतिया जब भी बच्चे देती है, सभी लोग उसकी तीमारदारी में जुट जाते हैं. अगर ये प्रजाति सदियों से हमारी दोस्त रही है, तो मनुष्य के अंदर भी उसके लिए स्नेह है.

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  2. Wow!!!!! Really Written by Heart!!! Krishna Kumar ji, You writing ability and skill is excellent. I love............ this heart-touching story- Sorry a real Experience.
    Bhasker Dixit

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  3. new year starting with a birth!!
    new lives!!

    hope!!
    yes
    its very good!!!
    very good u wrote this!

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  4. very tired in dog...but in that time gives milk to puppies......

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  5. nice posts..
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