International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jul 30, 2011

...फ़िर सड़क पर मारी गयी एक बाघिन


 सड़क हादसे में एक बाघिन की मौत-
किशनपुर सैंक्चुरी व दक्षिण खीरी वन-प्रभाग से गुजरती मैलानी-भीरा सड़क पर हुआ ये हादसा-
 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (पलिया-खीरी)
दुधवा नेशनल पार्क के किशनपुर के जंगल के बीच से निकली भीरा-मेलानी रोड पर 30.07.2011 की रात में वाहन की टक्कर से साड़े तीन साल की किशोर बाघिन की दर्दनाक मौत शव पोस्टमार्टम के लिए आई.वी. आर. आई. बरेली भेजा गया. वाहन पीलीभीत में पकड़ा गया. चालाक मौका पाकर फरार हुआ।

दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल किशनपुर वन्यजीव विहार के जंगल से निकली मैलानी रोड पर बाघिन की वाहन की टक्कर में हुई मौत का प्रारम्भिक जांच के लिए तीन सदस्यीय पैनल का गठन किया गया है। इसमें विश्व प्रकृति निधि भारत के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी डा0 मुदित गुप्ता, राजकीय पशु चिकित्सालय के चिकित्साधिकारी डा0 जेबी सिंह एवं डा0 वीपी सिंह को नामित किया गया है। जांच के दौरान प्रथम दृष्टया वाहन से हुई टक्कर में कमर की हड्डी के टूटने से बाघिन की मौत होने का अंदाजा लगाया गया है। बाघिन के शव को यहां दुधवा मुख्यालय में डीप फ्रीजर में सुरक्षित रख दिया गया है तथा उसकी रखवाली में कर्मचारी तैनात किए गए हैं। शव को पोस्टमार्टम के लिए रविवार को सुबह आईबीआरआई बरेली भेजा जाएगा।

यहां बताते चले की खीरी-पीलीभीत-बहराइच के घने जंगलों से गुजरती हुई इन सड़कों पर न जाने कितने बाघ सड़क दुर्घटना का शिकार होते रहते है, साथ ही उन जीवों की चर्चा भी नही होती जो खतरे में पड़ी प्रजातियों से इतर हैं..।

Jul 27, 2011

दुधवा में तीन हाथियों की सरकारी हत्या?

दधवा में हाथियों की हत्या ?
अनियोजित विकास की बलिवेदी पर जंगल के जानवर और इंसान-

नेपाल सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के जनपद खीरी में स्थित विश्व विख्यात दुधवा नेशनल पार्क में अभी हाल ही में एक साथ तीन हाथियों की बिजली की हाई टेंशन तारों के कारण दर्दनाक मौत हो गयी। इस घटना में सबसे हृदयविदारक मौत उस गर्भवती हथिनी को मिली जिसकी कोख से अपरिपक्व बच्चा बिजली के तेज़ झटके लगने के कारण मां के पेट से बाहर आ गया। हाथियों के झुंड का गुस्सा रास्ते के जंगल में लगे हाईटेंशन पोल पर तब उतरा जब वे गांव में अपने भोजन की तालाश में गए थे। हाथी इन तारों की चपेट में आ गये और यह दर्दनाक हादसा घटित हो गया। इस घटना को हादसा कहें या फिर हत्या ? 

सच्चाई तो यह है कि इस घटना को महज एक हादसा मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। क्या कारण है कि हाथी जैसे विशालकाय जानवर सहित जंगल में पाये जाने वाले तमाम तरह के दुर्लभ वन्य जन्तु जो कि देश की अमूल्य धरोहर हैं, इसी तरह से विभिन्न हादसों का शिकार होकर मारे जा रहे हैं। अभी पिछले साल पश्चिम बंगाल के जलपाई गुड़ी जिले में रेल की चपेट में आकर एक साथ सात हाथियों की मौत हो गयी थी। उनके शरीर के परखच्चे रेल की पटरियों पर इस तरह से छितराकर बिखर गये थे, मानो वे गीदड़ या गधे जैसे किसी छोटे जानवर के शरीर हों। इसी तरह से उत्तराखण्ड स्थित राजाजी नेशनल पार्क में देहरादून जाने के लिये बिछाई गयी रेल लाईन पर आये दिन हाथियों की मौत होती रहती है। यह सब घटनाऐं तब घटित हो रही हैं जब देश के ऐसे तमाम संरक्षित वनक्षेत्रों में विभिन्न टाईगर और हाथी प्रोजेक्टों के तहत इन्हें बचाने के नाम पर हर वर्ष करोड़ों अरबों रुपया पानी की तरह बहाया जाता है। इसलिये इन वन्यजीवों की हादसों में होने वाली हर मौत एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ती है। इन हत्याओं को महज हादसा कहकर पर्दे के पीछे छुपाया नहीं जा सकता।

उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क को ही लें तो 1978 में इसकी स्थापना के समय से ही कहा जा रहा है कि पार्क के अन्दर और इसके इर्दगिर्द बसे थारू आदिवासी गांवों के लोगों को अगर खदेड़ दिया जाये तभी यहां के बाघ और हाथी जैसे जंगली जानवरों को बचाया जा सकता है। हाथियों और बाघों के संरक्षण के लिये बनाये गये तमाम प्रोजेक्टों में इस बात पर खास ज़ोर दिया जाता है कि संबंधित वनक्षेत्रों से वहां बसे लोगों को हटा दिया जाये, तभी वन्य प्राणीयों को बचाया जा सकेगा।  क्या ऐसा कर देने से इस बात की गारंटी ली जा सकती है कि जंगलों के अंधाधुंध कटान के कारण ये जीव बिजली की तारों और जंगल में सरपट दौड़ने वाली रेलों की चपेट में आकर नहीं मरेंगे ?

यह वनविभाग और तथाकथित वन्यजन्तु प्रेमियों द्वारा बड़े पैमाने पर फैलाया गया ऐसा सफेद झूठ है, जिसे बाहरी शहरी समाज भी सच के रूप में स्वीकार करता है। जबकि सच ये है कि आज देश के जंगलों और उसमें रहने वाले वनाश्रित समुदायों की दयनीय स्थिति की सबसे बड़ी जिम्मेदार सरकारें हैं, जिन्होंने विकास का पैमाना केवल अभिजात वर्ग व मध्यम वर्ग को ही ध्यान में रखकर तय किया है। जंगल दुधवा का हो या राजाजी का वन्यजीवों को अगर बचाना है तो इस बात का जवाब तो सरकारों को देना ही होगा कि जिस जंगल में वनाश्रितों की मौजूदगी को अपराध के रूप में देखा जाता है, उसमें से गुज़र कर आखिर हाईटेंशन तारें क्यों जा रही हैं? जा भी रहीं हैं तो आखिर कहां? क्या जंगल में बिछाई गयी इन लाईनों से जंगल में बसे गांवों को बिजली मुहैया कराई जा रही है या बड़े-बड़े प्रोजेक्टों को व कारखानों को? जंगल के अन्दर के गांवों की स्थिति का अगर जायज़ा लिया जाये तो इन तमाम गांवों में बिजली की व्यवस्था न होने के कारण सूरज के डूबते ही इनकी जि़न्दगी अंधेरे में डूब जाने की वजह से एकदम ठहर जाती है। रोशनी भर के लिये भी इन्हें बिजली मुहैया नहीं कराई जाती। दुधवा में किसी भी संचार कम्पनी का टावर न होने की वजह से ये सभी गांव बाहर की दुनिया के संवाद संपर्क से भी कट जाते हैं। विकास के नाम पर बिछाये गये इन बिजली के तारों और रेल लाईनों का विरोध किया जाये तो इन्हीं वन्य जन्तु प्रेमियों और सरकारों द्वारा तुरन्त उसे विकास विरोधी होने की संज्ञा से नवाज़ दिया जायेगा।

दूसरी अगर हम देखें तो लखीमपुर खीरी और पीलीभीत में यहां से गुज़रकर जाने वाली शारदा नदी पर विशालकाय बांध और हाईडल प्रोजेक्ट बना दिये गये हैं। जिनके कारण हजारों हैक्टेअर लोगों की खेती, निवास और सामुदायिक इस्तेमाल की ज़मीनें डूब में आकर गर्क हो गयीं हैं। इसके कारण भारत-नेपाल सीमा के जंगलों में होने वाली हाथियों की आवाजाही पर भी गहरा असर पड़ा है। जबकि हिमालय पर्वत श्रंखला की तलहटी शिवालिक पहाडि़यों से लेकर तराई जंगलों का जम्मू से लेकर भूटान तक इनमें मौजू़द जंगली हाथियों का यह पूरा क्षेत्र कारीडोर है। जो कि ऐतिहासिक काल से जंगली हाथियों द्वारा अपने आने जाने के लिये इस्तेमाल किया जाता रहा है। हाथी अपने सामाजिक झुंड में भोजन की तलाश में इस कारीडोर में हजारों मील की यात्रा अपनी अनुवांशिक यादाश्त के सहारे करते हैं। इस तरह से एक हाथी को कम से कम 60 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की ज़रूरत होती है, जिसमें वे निर्बाध विचरण कर सकें। लेकिन आज़ादी के बाद पिछले 60 सालों में इस पूरे कारीडोर में शहरों का विस्तार, शारदा-गंगा जैसी नदियों से नहरों का विस्तार, इन पर बिजली परियोजनाओं का विस्तार और लगातार बढ़ते घने ट्रेफिक के चलते अब हाथियों के लिये इन नदियों और शहरों को पार करके जंगलों में विचरण करना बहुत मुश्किल काम हो गया है। यही कारण है कि अपने प्राकृतिक विचरण क्षेत्र छिन जाने से वे लगातार हिंसक होते जा रहे हैं। जिसका खामियाजा भी उच्च मध्यम या उच्च वर्गीय उस शहरी समाज को या सरकारों को नहीं भुगतना पड़ता जिनके अन्धे लालच के कारण ये सब परियोजनायें लगाईं जाती हैं, बल्कि इसका नुक्सान भी जंगल क्षेत्रों में तमाम जंगली जानवरों के साथ सहअस्तित्व बनाकर सदियों से जंगलों में रहने वाले उस वनाश्रित समाज को होता है, जिन्होंने हमेशा जंगल की रक्षा करके प्राकृतिक संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है और जिन्हें कभी भी सरकारों द्वारा देश की गरीब जनता पर थोपे गये इस तथाकथित विकास का लाभ नहीं मिलता। सरकारें जो कि विकास के नाम पर वनों का अंधाधुंध दोहन करने में लगी हुयी हैं, इस दोहन की शुरुआत भी यहां पर वैश्विक पूंजीवाद को बढ़ावा देने के लिये अंग्रेजों ने की थी। अंग्रेज सरकार ने वनों राजस्व कमाने का ज़रिया बनाकर वनविभाग जैसे भ्रष्ट विभाग को जन्म दिया, जोकि वनों, वन्य प्राणियों और वनों में ऐतिहासिक काल से रहने वाले वनसमुदायों को भी बरबाद करने का सबसे बड़ा दोषी है।

मात्र राजस्व कमाने के लालच से ब्रिटिशकाल से सरकारों द्वारा ज़ारी इस प्रक्रिया से वन लगातार सिकुड़ते चले गये और हाथी जैसा विशालकाय जीव एक जगह सिमटकर कैद होता चला गया। इसमें जो रही सही कसर थी वो वनविभाग ने पूरी कर दी। हर दस साल में बनायी जाने वाली कार्ययोजनाओं के तहत हजारों हजार पेड़ एक-एक जंगल से काटना तय करके जंगलों को शमशान में तब्दील किया जाना आज भी जारी है। पिछले 70 सालों में ही प्राकृतिक जंगलों का इस तरह से सर्वनाश करके महज व्यवासियक पेड़ों के जंगल में तब्दील कर दिया गया है जिसकी कहानी वन विभाग द्वारा ही बनाये गये तमाम वर्किंग प्लान बयान करते हैं। इस तरह से एकप्रजातीय पेड़ों का लगाना और प्राकृतिक जंगलों का सर्वनाश एक ही समय में साथ-साथ किये जाते रहे और हाथियों के लिये जंगल में खाने के लिये कुछ भी नहीं छोड़ा गया। नतीजतन वे भोजन की तलाश में गांवों और बस्तियों की ओर रुख करने लगे। देखा जाए तो जंगलों के भीतर लगातार बढ़ रहा मानव व वन्यजन्तुओं के बीच का द्वन्द्ध सरकारों द्वारा थोपे गये तथाकथित विकास व वनविभाग द्वारा जंगलों में बड़े पैमाने पर की गयी लूट का ही नतीजा है। बड़े-बडे़ तथाकथित पर्यावरणविद तथा वनवैज्ञानिक जिसका सारा दोष वनाश्रित समुदायों के सर पर मढ़ते हैं और उन्हें वनक्षेत्रों से खदेड़ देना ही एकमात्र इलाज मानते हैं। घटते जंगलों और लगातार दूषित होते पर्यावरण को बचाने के लिये जब सोच आई तो इसकी ठेकेदारी भी उन्हीं लोगों ने ले ली जिन्होंने 1972 में वन्य-जन्तु संरक्षण अधिनियम आने के पूर्व खानदानी शौक के तहत शेर, चीता, बाघ, हिरण, पाड़ा आदि सभी तरह के दुर्लभ वन्यजन्तुओं का बेशुमार शिकार किया। इसमें सबसे उल्लेखनीय नाम है बिली अर्जन सिहं का जिसे देश का सबसे बड़ा पर्यावरण विद् माना जाता है। इन्होनें महज़ 10 साल की उम्र में बाघ का शिकार किया था और दुधवा में एक बाघिन को पालतू तक बना कर कैद कर के अपने फार्म हाउस में रखा था। यहीं व्यक्ति 1972 के वन्य जन्तु संरक्षण अधिनियम बन जाने के बाद सबसे बड़ा बाघ प्रेमी बन गया। और दुधवा के अंदर 400 एकड़ से भी उपर भूमि पर अवैध दख़ल किया। जिसके उपर बसपा सरकार ने दो साल पहले जांच कर 250 एकड़ भूमि को जब्त करने के निर्देश भी ज़ारी किए है। इसी व्यक्ति ने यहां पर ग़रीब थारू आदिवासीयों के आवागमन व भारत से नेपाल को जोड़ने के लिए बिछाई गई रेलवे लाईन को सन् 1980 में उखड़वा डाला। इसी लाबी द्वारा इस टकराव को कम करने का एकमात्र रास्ता जंगल को मानव रहित कर देने के में खोज लिया। इस काम को पूरा करने के लिये करोड़ों के बजट बनाकर सरकारों से व विदेशी ऐजेंसियों से करोड़ों-अरबों रुपया तो हड़प लिया गया, लेकिन इस कसरत से न तो वन्य जन्तु बचे और न ही जंगलों में रहने वाला इन्सान। सन् 2006 में वनाधिकार कानून के आ जाने के बाद भी यह लाबी आज भी वनाश्रितों को 10 लाख रू0 का लालच देकर जंगल छोड़ने के लिये विवश करने की कोशिशों में लगी हुई है। जबकि वनाधिकार कानून के आने के बाद जंगलों में पीढि़यों से बसे तमाम आदिवासियों और अन्य परंपरागत वननिवासियों को उनकी जोत की, निवास की, इसके अलावा गलत प्रक्रिया में जाकर तमाम छिनी हुई ज़मीनों पर मालिकान हक स्थापित किया जाना है और सामुदायिक अधिकारों के तहत तमाम जंगल से प्राप्त होने वाली वनोपज, सामुदायिक इस्तेमाल की ज़मीनों पर भी अधिकारों का पुनस्र्थापन किया जाना है।


 तथ्य बताते हैं कि जंगलों में लगातार हो रही बेजु़बान वन्यजन्तुओं की मौतों के लिये शासन, प्रशासन, वनविभाग व पूर्व की सरकारें और इनकी बनायी गयी नीतियां  ही जिम्मेदार हैं, ना कि स्थानीय लोग। आज ये भ्रष्ट तंत्र अपने आप को और थोपे गये विकास को जंगल से हटाकर प्रबंधन की जिम्मेदारी वनसमुदायों को सौंप दें तो वन्यजन्तु भी जि़न्दा रह सकेंगे, जंगल भी बच जाएगें और जंगलों पर निर्भरशील लोग भी।

अगर सरकार हाथीयों के प्रति इतनी ही चिंतिंत है तो क्यों इन हाई टेंशन तारों को नहीं हटाया जाता? क्यों नहीं दिल्ली से देहरादून जोड़ने वाली रेल लाईन की पटरी जो कि राजाजी नेशनल पार्क के अंदर से होकर जाती है को उखाड़ा जाता? जबकि देहरादून जाने के अनेको साधन उपलब्ध है। यह इसलिए नहीं किया जा सकता चूंकि दिल्ली व देहरादून के अभिजात वर्ग इस सुविधा को इस्तेमाल करते हैं व उनका मानना है रेल लाईन के बगैर तो वे दिल्ली से कट जाएगें।  लेकिन वहीं दूसरी इन्हीं वनों में पीढ़ीयों से रहने वाले व वनविभाग के आने से पहले रहने वाले नूरआलम, नूरजमाल, जहूर हसन जैसे हज़ारों वनगुजरो को हटाये जाने की बात क्यों होती है जबकि इनकी मौजूदगी से ही राजाजी पार्क में आज भी हाथीयों के झुंड़ भी नज़र आते हैं। जहां वनगुजरों  ने अपने जानवरों के लिए पानी की बावलीयां बनाई हुई है वहीं पर हाथीयों के झुंड़ भी जाकर अपनी प्यास बुझाते हैं। जबकि इसी पार्क के अंदर पानी की बावलीयों बनाने के लिए पार्क प्रशासन पर करोडो रूपये का घोटाला करने का आरोप है, ये बावलीयां काग़ज पर तो मौजूद है लेकिन जंगल में इनका कहीं अता पता नहीं है। 

दरअसल जंगलों, वन्यजीवों और वनाश्रित समुदायों सभी के लिये सरकारों द्वारा विकास का जो पैमाना तय किया गया है वही सिरे से गलत है और घातक सिद्ध हो रहा है। विकास के इस माडल को अमली जामा पहनाने के नाम पर वन्य जन्तुओं की ही नहीं बल्कि जंगल क्षेत्रों बसे हुए समुदायों की भी हत्यायें की जा रही हैं। अगर हमें अपने जंगल, वन्यजन्तुओं, वनाश्रित समुदायों और अपने पर्यावरण को बचाना है तो हमें मिलकर विकास की इस अवधारणा को ही चुनौती देनी होगी, जोकि गैर बराबरी के सिद्धांत पर टिकी हुई है।




 रोमा  (लेखिका राष्ट्रीय वनजीवी श्रमजीवी मंच की संस्थापक सदस्यों में एक हैं। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र कैमूर लखीमपुर खीरी के तराई क्षेत्र , शिवालिक  इलाकों व  उत्तराखंड  में  सक्रिय हैं। उन्होंने राज्य में वनाधिकार कानून को लागू कराने के लिए दलित और आदिवासी महिलाओं को गोलबंद करने में खास भूमिका निभाई है। वनाधिकारो  को  लागू  करने  के  आन्दोलन  पर  सोनभद्र  में  2007  में  उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया था  लेकिन  उन्हें  राज्य  सरकार  द्वारा  बरी  किया  गया, अभी  वे वनाधिकार कानून पर अमल के लिए बनी राज्य  स्तरीय  निगरानी   समिति की विशेष आमंत्रित सदस्य हैँ।  रोमा 2010 में भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की तरफ से वनाधिकार कानून की समीक्षा के लिए बनाई गई संयुक्त समिति की सदस्य रह चुकी हैं। इनसे romasnb@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है)

Jul 15, 2011

बगुला भगत, अब भगत नही रहा !

बगुला अब भगत नही रहा !
दुधवा लाइव डेस्क*
इन्सानों ने या फ़िर प्रकृति? ने बगुला भगत की कहावत को भी झूठा साबित करने की कोशिश की। यहां दो तस्वीरे प्रस्तुत है जो मोहम्मदी जिला खीरी के वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र सतपाल सिंह ने खींची। यह जुवेनाइल कैटल इग्रेट (cattle egret ) है, प्रथम दृष्टया तो यह कौतूहल का विषय बना कि कैटल इग्रेट अपना सफ़ेद रंग छोड़ काले रंग में कैसे प्रगट हो गया। यह आनुवंशिक अनियमितता भी हो सकती है, और किसी मानव की शैतानी भी। अभी इसे लगातार देखा जा रहा है, यदि यह रंग से रंगा गया है तो कुछ महीनों में स्थिति स्पष्ट हो जायेगी, और यदि ऐसा नही है तो पक्षी विज्ञान में यह हलचल मचा देने वाला पूरी दुनिया में अब तक का पहला वाकया होगा।




दोनो तस्वीरें साभार: सतपाल सिंह

Jul 14, 2011

भ्रष्टाचार इनकी फ़ितरत में हैं!

दुधवा लाइव डेस्क*  ये पर्यावरण के दुश्मन है दोस्त नही....
जरा गौर फ़रमाइये बुन्देलखण्ड के इन हालातों पर.....
जनसूचना अधिकार 2005 के तहत अपर प्रमुख वन संरक्षक श्री मुहम्मद अहसन, उ0प्र0 शासन द्वारा प्राप्त आंकड़े एवं तथ्य
वर्ष 2000 से 2010 तक   
पिछले एक दशक में बुन्देलखण्ड के ऊपर 9 अरब रूपये खर्च किये गये। लेकिन लगाये गये वृक्षों को बचाया नहीं जा सका है। बांदा में 1.21 प्रतिशत महोबा में 5.45 प्रतिशत हमीरपुर में 3.6 प्रतिशत झांसी में 6.66 चित्रकूट में 21.8 प्रतिशत जालौन में 5.6 प्रतिशत वन क्षेत्र है जबकि राष्ट्रीय वननीति के तहत 33 प्रतिशत वन क्षेत्र अनिवार्य है। 
जनपद    प्राप्त धन बजट    व्यय बजट वर्षवार    पौधों की सिंचाई पर व्यय         काटे गये वृक्ष

   बांदा       8751300                     8751300                                 नहीं किया                 3534 वृक्ष
    चित्रकूट    पांच करोड़ सात लाख    पांच करोड़ सात लाख         25.3 लाख           महुआ, आम, शीशम आदि
    हमीरपुर    153.18 लाख                  153.18 लाख                     1.42 लाख                  57338 वृक्ष
    महोबा    -    -    -    -
    मथुरा      एक लाख                              एक लाख                         नहीं किया                 30750 वृक्ष
    भदोही    506.12 लाख                          55.30 लाख                      9.43 लाख                 24541 वृक्ष
    मैनपुरी    37.41 लाख                           36.45 लाख       (2010 से मार्च 2011) कुल 96 लाख       7164 वृक्ष                                                                                                       
विशेष-
जनपद बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा, मथुरा, भदोही, मैनपुरी में प्रादेशिक@राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे लगाये गये वृक्ष एवं काटे गये वृक्षों में बताये गये आंकड़े सन्देहास्पद हैं। वहीं महोबा जनपद में सूचना ही नहीं दी है। बुन्देलखण्ड के चित्रकूट धाम मण्डल वाले चार जनपदों में वर्ष 2000 से 2010 तक राजमार्गों के किनारे किये गये वृक्षारोपण में कुल 9 अरब रूपये खर्च किये जा चुके हैं और प्रशासन का दावा है कि 52 प्रतिशत वृक्षों को सुरक्षित रखा गया है। कुल प्राप्त बजट का 25 प्रतिशत सिंचाई पर व्यय होता है। स्वैच्छिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के मुताबिक वर्ष 2008-2009 में मनरेगा योजना के विशेष वृक्षारोपण अभियान में दस करोड़ पौधे बुन्देलखण्ड के सात जनपदों में लगाये गये थे। उन्हें भी बचाया नहीं जा सका और फौरी तौर पर जांच पड़ताल करें तो राजमार्गों के किनारे खर्च किये गये 9 अरब रूपये भी प्रशासनिक आंकड़ों के सिवा कुछ नहीं है। वर्ष 1887 से 2009 तक 17 सूखे और 2007 से वर्ष जून 2011 तक 9 मर्तबा बुन्देलखण्ड की धरती अलग-अलग जगहांे पर 350 मीटर से 700 फिट लम्बी फट चुकी है। जिसे भूगर्भ वैज्ञानिक और पर्यावरण कार्यकर्ता लगातार सूखा, जंगलों के विनाश और जलदोहन की वजह से जमीन के अन्दर आये ‘गैप’ को बता रहे हैं। वहीं ग्रेनाइट उद्योग से खनन माफियाओं द्वारा खदानों से पम्पिग सेट लगाकर जमीन का पानी बाहर फेंकने से भी जमीन फटने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। 



कुल्हाड़ों ने की हरियाली की हत्या !
 १-  पिछले एक दशक में राष्ट्रीय@प्रादेशिक राजमार्गों के वृक्षारोपण पर खर्च हुऐ 9 अरब।
 २-  राष्ट्रीय वन नीति के मुताबिक 33 प्रतिशत वन क्षेत्र अनिवार्य जबकि बांदा में है 1.21 प्रतिशत वन क्षेत्र।
  ३- वर्ष 2008-09 में मनरेगा से लगाये गये थे दस करोड़ पौधे 


 उत्तर प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1976 के अन्तर्गत जनपदों में वृक्ष स्वामी को अनुमति के उपरान्त काटे गये वृक्ष के स्थान पर दो पौधे रोपित करने का प्रमाण पत्र 15 दिवस में प्रभागी वन अधिकारी को जमानत राशि वापस लेने के लिये दाखिल करना पड़ता है। अन्यथा की स्थिति में उसकी जमानत जब्त हो जाती है। हाईकोर्ट लखनऊ की खण्डपीठ ने एक अहम आदेश में प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय@प्रादेशिक राजमार्गों के किनारे काटे गये और उनकी जगह लगाये गये वृक्षों का ब्यौरा 18 जून 2010 को प्रमुख सचिव वन संरक्षक से तलब करते हुए यह भी पूंछा था कि राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण के लिये राज्य सरकार के पास क्या प्रस्ताव है ? न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह व योगेन्द्र कुमार संगल की ग्रीष्म अवकाशकालीन खण्डपीठ ने लखनऊ की एक संस्था द्वारा दाखिल पी.आई.एल. पर यह सवाल याची की उस प्रार्थना पर किया था जिसमें उसने काटे गये पेड़ों के स्थान पर उसी प्रजाति के वृक्ष लगाने की याचिका में मांग की थी।

    बुन्देलखण्ड के पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर ने मुख्य वन संरक्षक उत्तर प्रदेश शासन से प्रमुख पांच बिन्दुओं की सूचना सहित मान्0 हाईकोर्ट के उक्त आदेश की प्रति भी दिनांक 03.09.2010 को मांगी थी। प्रदेश के 72 जिलों में से 8 जनपदों की सूचना उन्हें 9 माह बाद प्रदान की गयी जिसमें की बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर से जो आंकड़े प्राप्त हुये हैं वह न सिर्फ चैंकाने वाले हैं बल्कि राष्ट्रीय वन नीति और वन विभाग की कार्य प्रणाली पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हैं। दी गयी सूचना के मुताबिक बुन्देलखण्ड में वर्ष 2000 से 2010 तक राष्ट्रीय@प्रादेशिक राज मार्गों के किनारे किये गये वृक्षारोपण में 9 अरब रूपये खर्च किये जा चुके हैं। वन विभाग लगाये गये वृक्षों में से 52 प्रतिशत वृक्षों को बचाने का दावा भी करता है।

    गौरतलब है कि वन विभागों द्वारा वर्षभर अन्य योजनाओं, प्रशासनिक मदों से कराये जा रहे वृक्षारोपण अभियान की बजट राशि 9 अरब रूपये से अलग है। एक बानगी के तौर पर वर्ष 2008-09 में मनरेगा योजना के विशेष वृक्षारोपण अभियान के तहत बुन्देलखण्ड के सात जनपदों में 10 करोड़ पौधे लगाये जाने के बाद तत्कालीन प्रदेश ग्राम विकास आयुक्त मनोज कुमार की सामाजिक अंकेक्षण टीम में अपर आयुक्त चन्द्रपाल अरूण के साथ पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर भी बुन्देलखण्ड के जनपद झांसी और ललितपुर के वन क्षेत्रों में सोशल आडिट के लिये गये थे। ललितपुर के विभागीय वनाधिकारी श्री संजय श्रीवास्तव के ऊपर उस दौरान ग्रामीणों ने हरे वृक्षों को तालाब में फेंके जाने के अलावा मजदूरी हड़प करने के गम्भीर आरोप लगाये थे। मौके पर की गयी जांच में सत्तर हजार पौधों की जगह पैंतीस हजार पौधे पाये गये थे जिसे बाद में अधिकारियों की आन्तरिक सांठ-गांठ के चलते सत्यापित रिपोर्ट पर शासन को गुमराह करने के लिये फेर बदल किया गया। सर्वाधिक सूखा, जल आपदा, जंगलों के विनाश और साल दर साल किसान आत्महत्याओं के दौर से बुन्देलखण्ड लगातार अन्तर्मुखी अकाल की तरफ जा रहा है। जिसे प्रशासन मानने को तैयार नहीं है। वन विभाग ने बीते वर्षों में जो पौधे कभी यहां के रहवासियों और आदिवासियों के लिये आजीविका का साधन हुआ करते थे उनमें शामिल महुआ, आम के ब्रिटिश कालीन वृक्षों को कुल्हाड़ों और जे0सी0बी0 मशीन की दबिस में उखाड़ कर फ़ेंक दिया है। यह सब विकास की सड़क को दुरूस्त करने तथा फोर लैन सड़कों के निर्माण के लिये किया गया। क्या विनाश की शर्त पर तय किया गया विकास बुन्देलखण्ड के मौजूदा हालातों के अनुरूप है ? जहां बांदा में 33 प्रतिशत के मुकाबले 1.21 प्रतिशत वन क्षेत्र शेष बचा है। यद्यपि बुन्देलखण्ड के किसानों को जमीन, जंगल और जल के स्थायी साधन उपलब्ध होते तो कमोवेश उनकी रफ्तार आत्महत्या की तरफ नहीं होती। लेकिन विकास के मानिंद में डूब चुकी सरकार और सत्ता शासित लोग जनमंच को वोटों की राजनीति का ही अखाड़ा मानते हैं। तयशुदा है कि खत्म होते जा रहे हरे वृक्ष बुन्देलखण्ड की जलवायु परिवर्तन और भीषण आकाल का प्रमुख कारण है जिन पर समय रहते अमल किया जाना और उनके स्थायी समाधानों की तस्दीक करना भी राज्य और केन्द्र सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही है। 

आकड़े साभार- आशीष सागर, पर्यावरण कार्यकर्ता- बुन्देलखण्ड

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