International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Oct 9, 2013

मैक्सिको से आयी प्रेमलता !

मैक्सिकन वाइन

एक फूल जो डायबिटीज जैसी बीमारी में फायदेमंद है.

कोरल वाइन: जिसे क्वींस क्राउन या लव वाइन भी कहते है, एक मैक्सिकन लता है, जो अपने गुलाबी फूलों के लिए जानी जाती है, यह सुर्ख गुलाबी सुन्दर पुष्प गुच्छ ही कारण बने, इस प्रजाति के फैलाव का, इंसान के प्रकृति की इस सुन्दर आभा को इंसानी दिमाग की रूमानियत ने इसे धरती के तमाम भागों में खिलने का मौक़ा दिया, और अब इस प्रजाति ने लोगों के बगीचों से बाहर निकल कर अपनी खुद की जमीन तैयार कर ली, इन खिले हुए फूलों का नज़ारा गाहे-बगाहे आप सड़क के किनारों, नदियों के आस-पास, और पारती पडी भूमियों पर उग आये झुरमुटों में भी देख सकते है, यह कुछ इस तरह से है की जैसे इंसान अपने शौक के लिए तमाम जीव-जंतुओं को दुनिया के कई हिस्सों से लाकर पालता है और गुलामों की तरह उस जीव या वनस्पति पर अपना एकाधिकार कायम करता है, ताकि अपने ही समाज में वो इन अजब चीजों का प्रदर्शन कर खुद को अव्वल साबित कर सके, पर प्रकृति तो स्वतंत्र और स्वछंद होती है और उसमे इतनी कूबत भी होती है की वह किसी भी परिस्थित में कही भी जीवन को जीवंत बना ले, प्रकृति कभी कैद में नहीं रह सकती, उसमें मौजूद सभी जीवधारियों में अपने जीव-द्रव्य के विस्तार की अकूत ताकत होती है, इसका उदाहरण है रईसजादों द्वारा लाये गए विदेशी प्रजाति के कुत्ते और बगीचों के लिए विदेशी नस्ल के पौधे!

 आज वे विदेशी कुत्तों और विदेशी पौधों की तमाम प्रजातियाँ सड़कों पर और सड़कों के किनारे आप सब से बावस्ता हो जायेंगी! प्रकृति का यही गुण उसे सर्वव्यापी बनाता है कठिन से कठिन हालात में भी. कुछ ऐसी ही कहानी रही है इस फूल की, यह मैक्सिको देश की प्रजाति भारत में किसी शौक़ीन अफसर या राजा-महराजा के द्वारा लाई गयी होगी और इस खूबसूरती ने बगीचों की चारदीवारियों को तोड़ कर आजाद धरती को अपना आशियाना बना लिया, और इन विदेशी प्रजातियों ने महलों की कैद से अलाहिदा जब खुद की जमीन तलाशी तो इन्हें विदेशी आक्रामक प्रजातियों के अमले में दर्ज किया जाने लगा, भला धरती भी कही भेद करती है तेरे मेरे में, और न ही उसके लिए ये भौगोलिक रेखाएं मायने रखती है, जिसे इंसानों ने खींचा. जिस प्रजाति को धरती ने अपना लिया हो फिर वह काहे की विदेशी या देशी! धरती के आगोश में सभी बराबर है बस उन प्रजातियों में कूबत हो अपनी जगह में मुस्तकिल होने की.   

जब पहली बार २२ मई २०१३ को इन गुलाबी पुष्पों को देखा लखनऊ के काल्विन तालूकेदार्स कालेज के कैम्पस के किनारे एक झुरमुट में तमाम प्रजातियों की हरियाली के मध्य गुलाबी फूलों की मालाओं की लडियां, तो कौतूहल बस इसे सेलफोन कैमरे में कैद कर लिया की चलो इत्मीनान से इस फूल से जान पहचान की जायेगी.

यह पालीगोनैसी परिवार से है जिसका वैज्ञानिक नाम एंटीगोनन लेप्टोपस है, यह मैक्सिको की एक लता है जो अब उष्ण-कटिबंधीय देशों में अपनी ख़ूबसूरती बिखेर रही है, भारत में भी इसने अपनी जमीन तलाश ली है, और तमाम पहले से मौजूद वनस्पतियों के बीच घुल मिल गयी है. इस फूल की कहानी भी फूलों के शौक़ीन लंबरदारों के बगीचों की कैद से बाहर आने की है, और अब यह वनस्पति अपना फैलाव खुली जमीनों पर कर चुकी है, 

इस प्रेम लता की खासियत यह है की यह अन्य प्रजातियों के मध्य कमजोर मिट्टी में भी उग जाने की क्षमता रखती है, इसके मुलायम तने से निकली छल्लेदार प्रतानें इसे झाड़ियों दरख्तों और दीवारों पर ऊचाई तक ले जाती है जहां इसे पर्याप्त मात्रा में सूरज की रोशनी हासिल हो सके, इसके फूलों की सूरत जितनी ख़ूबसूरत है उससे कही ज्यादा इसकी शीरत! 

लव वाइन या प्रेम लता के फूलों में डायबिटीज जैसी बीमारी को ठीक करने के तत्व मौजूद है, अभी तक इसके फूलों को खाने के तौर पर विभिन्न देशों में उपयोग में लाया जाता रहा है, पास्ता में इन फूलो का विशेष महत्त्व है, साथ ही इसके बीजों को भून कर उनके छिलके उतार कर खाने में प्रयुक्त होता है, और इसकी जड़ और पत्तियों का प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता रहा, प्रेम लता की जड़ के रस का इस्तेमाल दर्द निवारक व् सूजन दूर करने में व् पत्तियों का  रस खांसी, फ़्लू और सूजन दूर करने में किया जाता है,

लव वाइन के पुष्पों की सुन्दरता के साथ साथ इस वनस्पति के औषधीय गुण हमारे लिए अत्यधिक उपयोगी है, बशर्ते हम इस वनस्पति को अपने आस-पास उगने का मौक़ा दे और इसे सरंक्षण प्रदान करे बजाए इसके की इसे  विदेशी आक्रामक प्रजाति मानकर इसकी खूबियों को नकार दे.

उत्तर भारत में इस सुन्दर फूलों वाली वनस्पति को लखनऊ के काल्विन तालूकेदार्स कालेज की चारदीवारी के बाहर प्राकृतिक तौर पर उगा हुआ देखा है, इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय पार्कों, उद्यानों, जंगलों व् गाँव देहात में इसे नहीं देखा गया, मायने साफ़ है की सजावटी फूलों के तौर पर लाई गयी इस प्रजाति की अपनी जमीन तैयार करने की अभी शुरूवात भर है.

तो चलिए फिर इन फूलों से दोस्ती की जाए !


कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com

(आजकल फूलों से दोस्ती की जा रही है)














Oct 2, 2013

रस्सियों वाला जंगली पौधा !


रस्सी वाला जंगली पौधा- यूरेना लोबाटा 
(एक खूबसूरत फूल की कहानी)

फूल इंसानी चेहरों की तरह होते हैं, बस शक्लें पहचानने का हुनर हो तो इन फूलों को देखकर बताया जा सकता है की ये पौधा किस प्रजाति का है, किस परिवार से ताल्लुक रखता है, और इसका नाम क्या है! फूल सुन्दर ही होते हैं, जाहिर है इंसानी चेहरे भी इन फूलों की तरह ही है जो सुन्दर ही होते है फिर वह चाहे अफ्रीकी हो, अमरीकी हो या भारतीय बस नजरिया खूबसूरत हो, फूलों को देखने की तरह का! तो फूलों के चेहरों की किताब पढने और उन्हें समझने की इस फेहरिस्त में एक नए फूल से परिचित कराता हूँ आप सभी को, ये नन्हा सा गुलाबी फूल मेरे घर के पास के उस खुले मैदान में खिला, इसकी आमद उन तमाम प्रजातियों के मध्य अभी नयी है, ये नया सदस्य मेरी निगाह में और उत्तर भारत की तराई जनपदों में अभी भी यह प्रजाति वन्य जीवन से सम्बन्धित सरकारी विभागों में भी दर्ज नहीं है, नतीजतन इसकी पहचान और इसकी खूबियों से परिचय करना मुझे और अच्छा लगा, एक नई जानपहचान ! 

जब इस फूल को पहली बार देखा तो लगा अरे! यह तो गुलहड की हूबहू छोटी प्रतिकृति है, बस यही वजह रही इससे पूरी तरह बावस्ता हो जाने की, जाहिर था यह गुलहड जैसा है तो मालवेसी कुल से ताल्लुक रखता होगा.  इसका अंगरेजी नाम है "सीजरवीड" महान सीजर पर इसका नाम क्यों पडा यह बात अभी तक पुख्ता नहीं है, जबकि यह रोमन राजाओं से बिलकुल कोई सम्बन्ध नहीं रखता. 

वैसे तो बनस्पति विज्ञान में इसका नाम "यूरेना लोबाटा" है और इसकी उत्पत्ति का स्थल एशिया ही बताया गया है, किन्तु यह प्रजाति जंगलो, नदियों के किनारों, नम भूमियों आदि में स्वत: उगती है, वैसे तो यह दुनिया में उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों में गोलार्ध के दोनों हिस्सों में पाया जाता है. इसकी खेती ब्राजील, कांगो व् अफ्रीका के कुछ स्थानों में की गयी, वजह थी इससे निकालने वाला खूबसूरत सफ़ेद रंग वाला व् मजबूत रेशा जो रस्सी, कपडे बनाने में इस्तेमाल होता है. इससे ये रेशा बिलकुल उसी तरह निकालते है, जैसे भारतीय किसान सनई और पटसन से रेशे निकालते है, फूल खिल जाने पर इन पौधों को काट लिया जाता है, फिर किसी तालाब में पानी में डुबोकर रखा जाता है ताकि इन पौधों में सडन शुरू हो जाए, फिर कुछ दिनों बाद इन्हें पानी से निकालकर पौधों के तने से रेशे निकाल लिए जाते है, जिनसे रस्सियाँ बनाई जाती है, और रेशे उतारा हुआ तना जो सफ़ेद रंग का होता है, उसे सुखा कर जलौनी लकड़ी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

यहाँ गौरतलब यह है की अब उत्तर भारत में न तो सनई-पटसन बोया जाता है, और न ही प्राकृतिक रूप में उगा यह यूरेना लोबाटा से रेशे निकाल कर रस्सियाँ बनाई जाती है, प्लास्टिक ने इस प्राकृतिक काटन की जगह ले ली, नतीजतन गाँवों में रस्सियाँ बनाने का चलन ख़त्म हो गया और साथ ही ख़त्म हो गयी वह विधा और देशी औजार जिससे बड़े-बूढ़े रस्सियाँ बटा(बनाना) करते थे. और इन सूत(काटन) की रस्सियों का ख़त्म होना हमारे पालतू जानवरों, बैल, गाय, भैस आदि के लिए एक अंतहीन पीडादायक सजा बन गयी, क्योंकि इन जानवरों की नकेल अब इस मुलायम सुतली के बजाए प्लास्टिक की रस्सियों की डाली जाती है, जिसकी खुरदरी रगड़ इनके कोमल अंग को रोज घायल करती है.




यूरेना लोबाटा जंगली माहौल में कई वर्षों तक पुष्पित होता रहता है, जब इसकी खेती की जाती है तो रेशों के लिए इसे एक वर्ष में ही काट लिया जाता है, यह ऊंचाई में ५ से ७ फीट तक लंबा होता है इसके तने से तमाम शाखाएं निकलती है. इसके गुलाबी पुष्प जिसमे गुलहड की भाति पांच दल होते है और उसी तरह का परागकणों से लदा पुंकेसर. इसे उगने के लिए धूप, गर्म मौसम व् नम भूमियाँ चाहिए, भारत की तराई में यह जुलाई-अगस्त में उगता है और सितम्बर के महीने में इसमें पुष्प आने लगते है, अक्टूबर के अंत तक इसके कांटेदार फल पककर जमीन में गिरते है और इनके करीब से गुजरने वाले जीव-जन्तुओं में यह फल चिपक जाते है जो इस प्रजाति को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते है, यही जरिया है इस प्रजाति का अपने बीजों के प्रकीर्णन का.

इसके फूलों के खिलने का समय भी बड़ा अद्भुत है, सूरज के निकलने से पहले भोर में ही यह फूल खिलते है और ज्यों ही सूरज आसमान पर चढ़ कर अपनी किरणे बिखेरना शुरू करता है, यूरेना लोबाटा अपने पुष्पों को ढकने की ताकीद कर देता है, और दोपहर होने से पहले इसके पुष्पों के पुष्प दल बंद हो जाते है, मानों अपने नाजुक अंगों को धूप से बचाने की कवायद हो यह. यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है, की इन फूलों की खूबसूरती वही निहार सकता है जो सूरज के आने के साथ ही जग जाए, और इन फूलों का रस वही जीव ले सकता है जो सुबह सुबह सक्रीय होता हो, खिले हुए फूलों की यह बहुत अल्प अवधि ! शायद प्रकृति का इस में भी कोइ राज हो.

यूरेना लोबाटा का एक हम शक्ल भाई भी है फ्लोरिडा में बस फर्क इतना है की इसका पुष्प कुछ बड़ा होता है जिसे सीशोर मेलो कहते है. वैसे आप को बता दूं की भारत में किसानों द्वारा उगाया जाने वाला पटसन भी इसी परिवार से सम्बन्ध रखता है यानी माल्वेसी कुल से. पटसन के पुष्प जिन्हें बचपन में मैंने अपने खेतों में देखा वह बिलकुल यूरेना लोबाटा की तरह ही थे बस आकार में वह काफी बड़े थे.

यूरेना लोबाटा काटन के अतिरिक्त तमाम औषधीय गुणों से भरा हुआ है, इसकी जड़ व् पत्तियां कई बीमारियों को दूर करने में कारगर है, और दुनिया के तमाम देशों में इसका पारम्परिक इस्तेमाल होता है, इसकी जड़ व् पत्तियों का चूर्ण डायबिटीज, पेट की बीमारियों, दर्द निवारक के तौर पर प्रयोग में लाई जाती है, जड़ व् पत्तियों से बनी पुल्टिस का प्रयोग सूजन कम करने में भी किया जाता है. इसकी पत्तियों व् जड़ से बने काढ़े का इस्तेमाल बुखार, पेट दर्द, मलेरिया, गनोरिया आदि में करते है, सर्प दंश में भी और घाव हो जाने पर यूरेना लोबाटा की पत्तियों और जड़ की पुल्टिस का इस्तेमाल कई देशों में किया जाता है.

तो फिर इतनी खासियतों वाले इस पौधे को आप भी खोजे कही अपने आस-पास शायद गुलाबी फूलों से लदा यह पौधा कही दिख जाए. 

अपने आस-पास की प्रकृति में मौजूद जीवों से जान-पहचान बढ़ाना बहुत प्राचीन सिलसिला रहा है इंसानी दिमाग का और उसने प्रकृति के इन तमाम रहस्यों को इन्ही पेड़-पौधों और जंतुओं से सीखा है, आज बहुत से  कलुषित इंसानी मसले इतना पैबस्त हो गए है इंसान के दिमाग में की उसे फुर्सत ही नहीं है इस प्रकृति को निहारने की नतीजतन वह वंचित हो रहा है प्रकृति में मौजूद आनंद और सुख से.

यह लेख डेली न्यूज एक्टीविस्ट (लखनऊ) अखबार में दिनांक ४ अक्टूबर २०१३ को सम्पादकीय पृष्ठ पर रस्सी वाला जंगली पौधा- यूरेना लोबाटा शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ है, 
(अपडेट : ४ अक्टूबर २०१३ )

कृष्ण कुमार मिश्र  
(आजकल फूलों से दोस्ती की जा रही है)
krishna.manhan@gmail.com






 

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