डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Dec 30, 2010

दुधवा में मुसलसल शिकार होते तेन्दुए और बाघ..

क्या तराई से विलुप्त हो जायेगा तेन्दुआ

क्रूरता की सभी हदे पार करते हुए मानव इन खूबसूरत वन्य जीवों का शिकार करता जा रहा है, और इन्तजामियां पूरी तरह से नाकाम होकर अपना दामन बचाने की कोशिश में जुटा हुआ है, बजाए इसके कि उसे इन जीवों की सुरक्षा में जुटना चाहिए !.. दुधवा टाइगर रिजर्व के अन्तर्गत किशनपुर वन्य जीव विहार में लगातार हो रहे वन्य जीवों के शिकार की एक ह्रदय विदीर्ण कर देने वाली घटना पर मैलानी-किशनपुर से सुनील निगम क रिपोर्ट... 

सुनीन निगम (मैलानी-खीरी) दुधवा नेशनल पार्क की किशनपुर सैंक्चुरी में एक लैपर्ड की हत्या ने फिर दुलर्भ वन्य पशुओं की सुरक्षा की पोल खोलकर रख दी है। यह घटना अम्बरगढ़ बीट में कटैया गाँव से चन्द दूरी पर अजांम दी गई है।

सूत्र बताते हैं कि गाँव वालों ने जंगली बेलों पर लपेटे गये महीन तार में उलझकर हुई है। बताया जाता है कि यह लेपर्ड पिछले कई दिनों से इस क्षेत्र में घूम रहा था। संभवतः शिकारियों की नजर इस लेपर्ड पर लगी हुई थी। और मौका पाते ही इस दुलर्भ वन्य प्राणी का शिकार कर डाला। अपनी नाकामी को छिपाने के लिए पार्क प्रशासन में भरसक कोशिश की, लेकिन मीडिया की नजरों से छिपाने की भरसक कोशिश की लेकिन असफल रहे। अब अपनी गर्दन बचाने के लिए पार्क अधिकारी यह बता रहे हैं कि यह लेपर्ड वृक्ष की लताओं में उलझकर मौत का शिकार हुआ है। लेकिन अत्यन्त फुर्तीले और अपनी आवाज से लंगूर बन्दर को पेड़ से गिरा लेने वाला लेपर्ड मात्र बेलों में उलझकर मौत का शिकार हो जायेगा, बिल्कुल हास्यपद ही है। माना कि अगर इसकी मृत्यु स्वाभाविक तौर पर हुई भी तो शव को पोस्टमार्टम के लिए आर.वी. आई. ले जाते वक्त गोपनीयता क्यों बरती जा रही थी?




आपको बता दें कि यह वही लेपर्ड है जो कि 31 जुलाई-10 को महराजनगर गाँव के समीप शिकारियों द्वारा लगाये गये खुड़के में फँसकर घायल हो गया था। जिसे पार्क कर्मियों और डब्लु. टी. आई. की टीम ने मुक्त कराया था। लेकिन उसे पूर्ण स्वस्थ हुए ही जंगल में उसकी किस्मत पर छोड़ दिया था। इससे ही पता चलता है कि दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन कितना सजग है।

फिलवक्त किशनपुर रेन्ज के अधिकारी अपनी गर्दन बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

(सुनील निगम दैनिक जागरण अखबार में मैलानी से संवाददाता है, वन्य-जीवन पर लेखन में विशेष अभिरूचि, इनसे suniljagran100@gmail.com पर संपर्कक र सकते हैं।)

2 comments:

अविनाश said...

कितना तड़पा होगा यह जानवर, कितनी मुश्किल ने इसकी जान ने इसकी जान छोड़ी होगी, फ़िर भी प्रशासन नही जान पाया, जो सेखी बघारता है अपनी ताकत की, इस सरकारी ताकत के पीछे कमजोर, भ्रष्ट और निकर्मण्य लोग भर्ती है क्या !

RAVINDRA said...

Forest Officer of Kishanpur Sanctuary should understand that people are not fool who will agree with their fake stories.

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