विलासिता की पूर्व योजनायें हैं
-----राजकुमार महोबिया*
कँटीले तारों की फ़ेंसिंग
और डेढ़ मीटर गहरी ट्रेन्चलाइन के इस पार
आसमान की छत के नीचे
अभावों के जंगल में उगा
पलाश का अभागा पौधा
कातर दृष्टि से देखता है उस पार--
सुविधाओं की नर्सरी में
नर्म घास की छत के नीचे
प्लास्टिक की पन्नी में पलते
सागौन के रूट सूट को
--हरा होते
पलाश को पालती है
जेठ की चिलचिलाहट
मौसम का कर्कस पिता,
सागौन को सींचती, पालती
और दुलराती है--
नर्सरी की कामगार रेजा
-रेजा जो एक माँ है।
मुझे याद है, कि मेरे गाँव से सटा हुआ
हुआ करता था एक जंगल
या यह कि जंगल की ममता मयी
गोद में हुआ करता था मेरा गाँव
सरई, धवा, चार, जामुन, सेझ, साजा,
कारी, कसही, ह्ल्दू, पँदर, चिढ़्चिढ़ा,
भोथी, धनकट, गुंजा, पीपल, करंजी,
कहुआ, बजा, बरसज, सेमल, तेन्दू
महुआ, आँवला, घोटहर, मकोई और
करौंदे के साथ-साथ खूब हुआ करते थे
--पलाश--जंगल भर।
गाँव के गालों को चूमते और
स्नेह से स्पर्श करते
पेड़ नही थे ये- गाँव की छानी थे
छानी के मलगे थे
हल, पहटे और जुआँडी थे
घरों के किवाड़, काका की चारपाई के
पाए, पाटी और खुरे थे
चूल्हे की आँच थे,
स्वप्न नही- स्वप्नों का साक्षात्कार थे,
जंगल पिता थे- पालनहार-
जो चलाते थे हल, पहटे और
जिन्दा रखते थे हमारे चूल्हे।
पेड़ अब कलम कर दिए गये सारे
जो जंगल विभाग के कार्पोरेशन में पड़े है।
चट्टे बने- हरसूद के विस्थापितों की तरह
जंगल-----गाँव के पिता----
निर्जीव, नि:श्वास और उतान--
जामुन, सरई, धवा---और सारे पलाश
इनकी कब्रो पर रोप दिए गये हैं
सुविधावादी नर्सरी से आयातित सागौन
हमारे गाँव से सटे सारे जंगल में
सागौन ! सागौन नही हैं ये--
विलासिता की पूर्व योजनायें हैं
स्वप्न और लालसायें हैं
किन्तु हमारे गाँव की नही।
इनसे बनेंगे महंगे सोफ़े,
ड्रेसिंग और डायनिंग टेबिल
जिनमें खड़खड़ायेंगी--
काँच की तस्तरियां और चम्मचें
इनसे बनेंगे महल, हवेली, सरकारी इमारते
आलीशान दरवाजे, अंग्रेजी स्कूलों की डेस्क और बेन्च॥
गाँव का जंगल अब जंगल नही रहा
पूरे जंगल में रोप दिए गये है सोफ़े, अलमारी
और आलीशान दरवाजे-जो चिढ़ाते हैं--
और आलीशान दरवाजे-जो चिढ़ाते हैं--
हमारे गाँव के हल, पहट, छानी और किवाड़ को
दिखाते हैं अँगूठा-- गाँव के चूल्हों को
किन्तु सरकार की नज़र में
सागौन सरकारी हैं- चूल्हे नहीं॥
अब गाँव के जंगल में पल रहे सागौन
सक्षम नही कि खिले पलाश जैसे
इनमें कूकें हों कोयलों की और दे सकें
संदेशा, बंसत के आगमन का,
बंसत- बंसत नही लगता जबसे
कलम कर उसे भेज दिया गया है
सरकारी कार्पोरेशन में----
बंसत विस्थापित हैं॥
राजकुमार महोबिया (लेखक उमरिया, मध्यप्रदेश के निवासी है, पेशे से अध्यापक, शौक चित्रकारी, पर्यावरण सरंक्षण, अपने क्षेत्र में नारों की पेन्टिंग कर जल सरंक्षण के महत्व को बतलाने में सफ़ल भूमिका, वन्य जीव सरंक्षण के मसलों में जन-जागरूकता अभियानों की अगुवाई, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन, इनसे दूरभाष द्वारा 09893870190 पर संपर्क किया जा सकता हैं )









6 comments:
very good idea prince ji!
lovely article!!!
u should always write here !!
http://www.youtube.com/watch?v=JE0HKabZoEc
i wanna wish you all friends a peaceful yeaR
मेरे गाँव से सटा हुआ
हुआ करता था एक जंगल
या यह कि जंगल की ममता मयी
गोद में हुआ करता था मेरा गाँव.......
nice very nice.......
बहुत Badiya, मेरी शुभ कामना, दीवाली मुबारक हो
raajkumaar jee!! shukriya asaliyat ko itna dard aur gahare bhaavo ke saath bayaan karne k liye!!!! shubhkaamnaaein!!!!
मुझे याद है, कि मेरे गाँव से सटा हुआ
हुआ करता था एक जंगल
या यह कि जंगल की ममता मयी
गोद में हुआ करता था मेरा गाँव (सुंदर प्रस्तुती )
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