डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Aug 1, 2010

दुधवा में शिकार बदस्तूर जारी है!

गंगेश उपाध्याय* दुधवा टाइगर रिजर्व बना शिकारियों का अड्डा:

लखीमपुर। दुधवा टाइगर रिजर्व शिकारियों का अड्डा बनता जा रहा है। 30 जुलाई  रात शिकारी बेधडक किशनपुर सेंक्चुरी में घुस गए। शिकारियों ने सेंक्चुरी इलाके के एक गन्ने के खेत में लोहे का कुडका लगाकर तेंदुए को फंसा दिया। गनीमत रही कि ग्रामीणों ने सुबह के समय तेंदुए को कुड़का में फंसा देखकर पार्क प्रशासन को खबर कर दी। सूचना के बावजूद पार्क प्रशासन और डब्ल्यूटीआई की टीम को तेंदुए को आजाद कराने में दोपहर डेढ बजे तक का समय लग गया।

जुलाई महीने में दक्षिण खीरी वन प्रभाग और उससे सटे किशनपुर इलाके में हर साल शिकारियों की सक्रियता बढ जाती है। 30 जुलाई की रात शिकारियों ने किशनपुर रेंज आफिस से महज 2 किमी. दूर गन्ने के खेत को चुना। रात में शिकारियों ने गन्ने के खेत में लोहे का कुडका लगा दिया। अलसुबह करीब पांच बजे गन्ने के खेत से तेंदुआ गुजरा और कुडके में उसका अगला पैर फंस गया। बताते हैं कि कुडके में फंसने के बाद तेंदुआ छटपटाता रहा, लेकिन पार्क के अफसर लम्बी तानकर सोए रहे।



नौ घंटे तक तड़पता रहा तेंदुआ
जंगल की आजाद वातावरण में घूमने वाला तेंदुआ नौ घंटे तक कुडके की कैद में रहा। ग्रामीणों ने जब उसे देखा तो सुबह के आठ बज चुके थे। कुछ देर बाद पहुंचे पार्क अफसरो और डब्ल्यूटीआई के विशेषज्ञों को उसे ट्रैंक्युलाइज करने में दोपहर के डेढ बज गए। तब तक उस असहनीय पीड़ा को झेलता रहा वह जीव!



खून से लथपथ था तेंदुआ

कु्ड़के में नौ घंटे फंसे रहने के कारण तेंदुए का पैर खून से बुरी तरह लथपथ हो गया था। पार्क अफसरों ने जब उसे आजाद कराया तो वह ठीक से चल भी नही पा रहा था। किसी तरह उसे पिजडे में कैद कर किशनपुर के रेस्ट हाउस में लाया गया। दुधवा के अफसरों का कहना है कि घाव पूरी तरह ठीक होने पर उसे फिर से किशनपुर के जंगलों में छोड दिया जाएगा।


शिकारियों ने खोली सुरक्षा की पोल

जब भी कभी सुरक्षा इंतजामों की बात आती है, तो दुधवा के अफसर चौकन्ने हो जाते हैं। दावे बड़े-बड़े किए जाते हैं। लेकिन 30 जुलाई की रात शिकारियों ने जिस तरह सुरक्षा इंतजामों को धता बताकर सुरक्षा में सेंध लगाई, उससे सहज ही वन्यजीवों और जंगलों के महफूज होने का अंदाजा लगाया जा सकता है। अभी छह-सात महीने पहले की ही बात है, शिकारियों ने पार्क से सटे उत्तर खीरी के परसपुर जंगल में बिजली के तारों से करंट देकर एक हष्ट-पुष्ट बाघ को मौत के घट उतार दिया था।



अफसर हो गए हैं गैर जिम्मेदार

खीरी जिले का जंगल महकमा हो या दुधवा टाइगर रिजर्व वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर अफसर गैर जिम्मेदार हो गए हैं। पिछले तीन सालों में एक बाघ और एक शावक परसपुर जंगल में, एक तेंदुआ दुधवा पार्क के सोठियाना रेंज में, एक तेंदुआ धौरहरा रेंज में मौत के गाल में समा चुके हैं। इसी तरह मैलानी रेंज के बांकेगंज नहर में एक बाघ का शव बरामद हो चुका है। वन्यजीवों की बडी संख्या में मौत अफसरों की गैर जिम्मेदारी की ही कहानी कह रहा है। ( Dudhwa is a heaven for poachers)


(गंगेश उपाध्याय* वाइल्ड लाइफ़ जर्नलिस्ट के तौर पर पिछले कई वर्षों से हिन्दुस्तान अखबार में लेखन, लखीमपुर खीरी में निवास, वन्य जीवन के महत्वपूर्ण मसलों पर तीक्ष्ण युवा तेवर! इनसे gangeshmedia@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

7 comments:

Dehaatkibaat said...

gangesh bhai bahut khub , hum swagat karte hai un sabka jo bejubano ki jubaan ban rahe hai , kal hi akhbaro me khabar ayi ki dudhwa ko tiger reserve ka darja mila aur aaj khabar ayi ki ek dendua shikariyon ke changul me,,,,,,
bhale aaj ek dendua bach gaya lekin in parishthitiyon ke liye jimmedaro ko sabak jarur mile,,,
isse kaam nahi chalne wala ki jahan tendua mila wo park area se 100 meter door hai, lekin apni jimmedariyo se mooh modne se kaam nahi chalne wala ,ye to us tendua ki kismat thi ki uski pukaar gaon ealo ne sun li , nahi to 4 dino me dudhwa ki ye dusri buri khabar hoti , abhi sumit ki moat ki charchaye thami nahi thi ek aur nayi charcha saamil ho jati jo vaakai durbhagya purna hoti,
jaise vanyajeev ke hatyaro ko saja milti hai waise hi iski dendua ko bachane ke liye khabar dene walo ko park prashasan protshahit kare,,,

कृष्ण मिश्र said...

अब हद हो चुकी है, और हम सरकारों की तमाम बे-नतीजा इन्तजामों को देख चुके है, टाइगर प्रोजेक्ट जैसी कवायदे...किन्तु इन सब के बावजूद बाघ, तेन्दुए कम होते जा रहे है, अब जरूरत है वन्य-जीवन के सरंक्षण पर संजीदा होकर सोचने और काम करने की। वन विभाग में वाइल्ड लाइफ़ विभाग की अलाहिदा शुरूवात की जाय। और ऐसे लोगों की भर्ती की जाय जो योग्य व तन्मयता से हमारी वन्य संपदा को बचाने में पूर्ण समर्पण के साथ काम कर सके। शिकारियों के साथ उसी क्रूरता से पेश आने के नियम स्थापित किए जाय जैसे वे इन बे-जुबानों के सथ करते हैं। क्योंकि मनुष्य एक धोखेबाज कौम है हमें यह नही भूलना चाहिए!....

sushant jha said...

fine article...dont kno when our govt and society will take notice of all these happenings...

RAVINDRA said...

Thanks, please keep writing about plight of wild animals and inefficiency or apathy of forest deptt.

RAVINDRA YADAV

Wildlife Warriors said...

Things wont change, Its easy to blame forest officials man....the amount of resources and expertise our forest rangers has, I think they doing excellent job...how about the NGOs they are using billions of dollars for conservation, how much of this really is being used for capacity building and providing technical support to forest officials....I think most of the NGOs funds are used for MAC BOOKS and BLACK BERRY....:)

अविनाश said...

like your ngo....only fake commentaries on internet for so-called conservation, garbed cloths, shoes and other electronics equipments from Gentlemen...hahahaha

Anonymous said...

My Dear Friend...I dont have any NGO...Thats my personnel blog which is inactive since long time.. I dont even work in India...but I worked in India for three years on wildlife enforcement with Special task Force and state forest department... I know the reality....wildlife warriors

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