International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

May 26, 2015

Civet- A Beautiful Creature

            

                                                          

Delhi’s -CIVETS!

*Surya Prakash Ph.D.

 Alternatively called toddy cats, musang , bijjoo ,kasturi billi in Hindi but are not true cats though they have been placed in a family, Viverdae which is close to the cat family ,Felidae.  Word ‘civet’ is an Arabic term that means ‘scent’ or ‘aroma’    as these nocturnal arboreal animals possess scent gland which looks like testes in both the sexes hence named Civets.There are many species of civets worldwide but the two species which have comfortably adapted to the arid and semi arid habitats of NCR, avoiding the extreme deserts, are Common Palm Civet Paradoxurus hermaphroditus & Small Indian Civet      Viverricula indica. Both   the species can be seen in Delhi’s dry scrub forests, fruits orchids, public & personnel home gardens also around human dwellings within the city.  


Common Palm Civet’s body is covered with coarse, shaggy grayish color hair coat which has longitudinal stripes pattern on the back and spots on the flanks, shoulder and thighs ,where as Small Indian Civet has grayish brown fur, with lined and streaked flanks and cross bars on the neck. Both have very long tail which helps them in balancing while jumping from one tree to another. They are so well   adapted to Delhi’s climate that during extreme biting winter they put on shining fur coat to beat the cold and shed the same during summer with short sleek summer pelage.    Though both are omnivorous species and good tree climbers but prefer to forage on the ground for food as they have short legs, well cushioned, compact paws, sharp teeth necessary to hunt small birds, reptiles and small rodents like rats, squirrels, mice,    but are opportunistic too as they live inside drains or on roof top of outhouses and fruits orchids of human settlements hence don’t hesitate to steal the food from anywhere they get an opportunity (sometime back  a Common Palm Civet was rescued from the Parliament house in Delhi). Because of their stealing habits they steal the sweet sap called ‘Toddy’ from the pots which are tied on the trees to make sweet liquor they are named ‘toddy cats’. Palm civets reproduce throughout the year but it has been recorded that kittens are most often seen during winter from October to December. 

The female Asian palm civet usually gives birth to up to 4 young after a gestation period that lasts for nearly eight weeks. The babies are weaned by their mother until they are strong enough to fend for themselves.   


   

                                                                                                                                                                                                            
 Common Palm Civet is fond of ‘Palm Sap’ of palm tree so it doesn’t leave any opportunity to drink the nutritious palm sap during fruiting season in the nights. In south especially where there is coffee plantation they eat ‘coffee berries’. The fruits pulp is digested but the coffee beans are egested which is used to prepare the supposedly most expensive, fashionable and trendy coffee in the world called ‘Kopi Luwak’ particularly in Indonesia, hence civets are captured from the wild and fed coffee beans for mass-production of this blend of coffee the impact of the demand simply constitute a significant threat to the wild civet population.


The secretions of their scent glands are broadly resins, fatty acids, with volatile oils with free ammonia therefore it is used for various purposes in making perfumes & have some medicinal use as well that is why Small Indian Civet is also called ‘Kasturi Billi’  as it has scent gland .Civets can be easily tamed and hence kept as pet for its scent. In Assam they are killed for meat and skin. Their population is slowly plummeting everywhere because of habitat loss and civets are not welcomed by humans and farmers as they destroy and feed upon the fruits from the fruit orchids but still they play major role in seed dispersal specially that of coffee, cross pollination and controlling the rat swarms by eating them.
International Union of Conservation Network still considers them least concern even now but they are regularly hunted for bush meat & their scent glands the extracts of which is used for aphrodisiac use which is a myth and fur in many parts of the country. Also stray dogs have become very serious threat for their survival as they are killed by them because of sharing of the same habitat.


  *Surya Prakash, Ph.D.
( Zoology),Member- BNHS, IBCN, WWF 
Room # 001 C.I.F. School of Life Sciences
Jawaharlal Nehru University New Delhi 110067 INDIA 
Phone (Work) 26708767
email: jnu.surya@gmail.com


May 18, 2015

कन्हार बांध- मुन्सिफ का सच सुनहरी स्याही में छिप गया....


कनहर बांध के मामले में एन.जी.टी(हरित कोर्ट) द्वारा सरकार का पर्दाफाश लेकिन निर्णय विरोधाभासी

नये निर्माण पर रोक, नए सिरे से पर्यावरण - वन अनुमति आवश्यक
उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन
-रोमा

उ0प्र0 के सोनभद्र जिले में गैरकानूनी रूप से निर्मित कनहर बांध व अवैध तरीके से किए जा रहे भू-अधिग्रहण का मामला पिछले एक माह से गर्माया हुआ है। जिसमें अम्बेडकर जयंती के अवसर पर प्रर्दशन कर रहे आदिवासी आंदोलनकारी अकलू चेरो पर चलाई गई गोली उसके सीने से आर-पार हो गई व कई लोग घायल हो गए। इसके बाद फिर से 18 अप्रैल को आंदोलनकारियों से वार्ता करने के बजाय गोली व लाठी चार्ज करना एक शर्मनाक घटना के रूप में सामने आया है। जिससे आम समाज काफी आहत हुआ है। संविधान व लोकतंत्र को ताक पर रखकर सरकार व प्रशासन द्वारा इस घोटाली परियोजना में करोड़ों रूपये की बंदरबांट करने का खुला नजारा जो सबके सामने आया है, वो हमारे सामाजिक ताने बाने के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है, जिसमें निहित स्वार्थी और असामाजिक तत्व पूरे तंत्र पर हावी हो गए हैं।

कनहर बाॅध विरोधी आंदोलनकारियों का लगातार यही कहना था कि कनहर बांध का गैरकानूनी रूप से निर्माण किया जा रहा है, अब यह तथ्य नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल द्वारा 7 मई 2015 को दिये गये फैसले में भी माननीय न्यायालय ने साफ़ उजागर कर दिया है। जिन मांगों को लेकर 23 दिसम्बर 2014 से कनहर बांध से प्रभावित गांवों के दलित आदिवासी शांतिपूर्वक ढंग से प्रर्दशन कर रहे थे, आज वह सभी बातें हरित न्यायालय ने सही ठहराई हैं। हालांकि इसके बावज़ूद  केवल एक लाईन में न्यायालय ने सरकार को खुश करने के लिए मौजूदा काम को पूरा करने की बात कही है व नए निर्माण पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी है। जबकि हकीक़त ये है कि जो काम हो रहा है वही नया निर्माण है। इसलिए हरित न्यायालय के 50 पन्नों के इस फैसले में विश्लेषण और आखिर में दिए गए निर्देश में किसी भी प्रकार का तालमेल दिखाई नहीं देता है।

इससे मौजूदा न्यायालीय व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा होता है कि क्या वास्तव में वह समाज के हितों की सुरक्षा के लिए अपनी पूरी जिम्मेदारी निभा रही है या फिर इस व्यवस्था व नवउदारवाद की पोषक बन उनकी सेवा कर रही है? यह एक गंभीर प्रश्न है। वैसे भी आज़ादी की लड़ाई में साम्राज्यवाद के खिलाफ शहीद होने वाले शहीद-ए-आज़म भगतसिंह को भी अभी तक कहां न्याय मिला सका है। जबकि प्राथमिकी में भगतसिंह का नाम ही नहीं था और उनको फांसी दे दी गई। इसलिए यह न्यायालीय व्यवस्था जो कि अंग्रेज़ों की देन है, भी उसी हद तक आगे जाएगी जहां तक सरकारों के हितों की रक्षा हो सके। इतिहास गवाह है कि जनआंदोलनों से ही सामाजिक बदलाव आए हैं, न कि कोर्ट के आर्डरों से। इसलिए 7 मई  2015 को हरित न्यायलय द्वारा दिए गये फैसले को जनता अपने हितों के आधार पर ही विश्लेषित करना होगा, चूंकि फैसले के इन 50 पन्नों में जज साहब द्वारा कनहर बांध परियोजना के आधार को ही उड़ा दिया है व तथ्यों के साथ बेनकाब किया है। लेकिन फिर भी जो जनता सड़क पर संवैधानिक एवं जनवादी दायरे के तहत इन तबाही लाने वाली परियोजनाओं के खिलाफ तमाम संघर्ष लड़ रही है, उनके लिए यह विश्लेषण ज़रूरी है, जो कि आगे आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। संघर्षशील जनता व उससे जुड़े हुए संगठन एवं प्र्रगतिशील ताकतों की यह जिम्मेदारी है, कि वे इस तरह के फैसलों का एक सही विश्लेषण करे और जनता के बीच में उसको रख कर एक बड़ा जनमत तैयार करें।

कनहर बांध निर्माण के खिलाफ यह याचिका ओ0डी सिंह व देबोदित्य सिन्हा द्वारा हरित न्यायालय में दिसम्बर 2014 को दायर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किए गए तथ्यों को न्यायालय ने सही करार दिया है। कनहर बांध परियोजना के लिए वनअनुमति नहीं है, कोर्ट द्वारा उ0प्र0 सरकार के इस झूठ को भी पूरी तरह से साबित कर दिया गया है। कोर्ट ने यह भी माना है कि परियोजना चालकों के पास न ही 2006 का पर्यावरण अनुमति पत्र है और न ही 1980 का वन अनुमति पत्र है।
कोर्ट ने इस तथ्य को भी स्थापित किया है कि सन् 2006 में व यहां तक कि 2014 में भी बांध परियोजना के काम की शुरूआत ही नहीं हुई थी, इसलिए ऐसे प्रोजेक्ट की शुरूआत बिना पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति व पर्यावरण प्रभाव आकलन के नोटिफिकेशन के हो ही नहीं सकती।

जिला सोनभद्र प्रशासन द्वारा लगातार यह कहा जा रहा था, कि बांध से प्रभावित होने वाले गांवों में आदिवासी नाममात्र की संख्या में हैं, इस तथ्य को भी कोर्ट द्वारा गलत ठहराया गया और कहा गया है कि ‘‘इस परियोजना से बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा जिसमें सबसे बड़ी संख्या आदिवासियों की है। 25 गांवों से लगभग 7500 परिवार विस्थापित होंगे जिनके पुनर्वास की योजना बनाने की आवश्यकता पड़ेगी’’।

हरित न्यायलय ने इस फैसले में सबसे गहरी चिंता पर्यावरण के संदर्भ में जताई है, जिसमें कहा गया है कि ‘‘कनहर नदी सोन नदी की एक मुख्य उपनदी है, जोकि गंगा नदी की मुख्य उपनदी है। सोन नदी के ऊपर कई रिहंद एवं बाणसागर जैसे बांधों के निर्माण व पानी की धारा में परिवर्तन के चलते सोन नदी के पानी का असतित्व भी आज काफी खतरे में है। जिसमें बड़े पैमाने पर मछली की कई प्रजातियां लुप्त हो गई हैं व विदेशी मछली प्रजातियों ने उनकी जगह ले ली है। इस निर्माण के कारण नदी के बहाव, गति, गहराई, नदी का तल, पारिस्थितिकी व मछली के प्राकृतिक वास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

न्यायालय ने बड़े पैमाने पर वनों के कटान पर भी ध्यान आकर्षित कराया है। कहा है कि आदिवासियों के तीखे विरोध के बावजूद इस परियोजना के लिए बहुत बड़ी संख्या में पेड़ों का कटान किया गया है, जो कि 1980 के वन संरक्षण कानून का सीधा उलंघन है। कनहर बांध का काम 1984 में रोक दिया गया था, लाखों पेड़ इस परियोजना की वजह से प्रभावित होने की कगार पर थे। जबकि रेणूकूट वनसंभाग जिले का ही नहीं बल्कि उ0प्र0 का सबसे घने वनों वाला इलाका है जहां  बड़ी तदाद् में बहुमूल्य औषधीय वनप्रजातियां पाई जाती हैं तथा आदिवासी पारम्परिक ज्ञान एवं सास्कृतिक धरोहर से भरपूर इस इलाके ने कई वैज्ञानिकों एवं अनुसंधानकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है। वनों के इस अंधाधुंध कटान से ना सिर्फ पूरे देश  में कार्बन को सोखने की क्षमता वाले वन  नष्ट हो जाएंगे, बल्कि ग्रीन हाउस गैसों के घातक उत्सर्जन जैसे मिथेन आदि भी पैदा होंगे। टी.एन. गोदाबर्मन केस का हवाला देते हुए कोर्ट इस मामले में संजीदा है, कि कोई भी विकास पर्यावरण के विकास के साथ तालमेल के साथ होना चाहिए न कि पर्यावरण के विनाश के मूल्य पर। पर्यावरण व वायुमंड़ल का खतरा संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लघंन है, जो कि प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है व जिस अधिकार को सुरक्षित रखने की ज़रूरत है। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा कि कनहर बांध परियोजना का सही मूल्य व लाभ का आंकलन होना चाहिए। परियोजना को 1984 में त्यागने के बाद क्षेत्र की जनसंख्या में काफी इजाफा हुआ है। स्कूलों, रोड, उद्योगों, कोयला खदानों का विकास हुआ है, जिसने पहले से ही पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी में काफी तनाव पैदा किया है।


कनहर बांध परियोजना में हो रहे पैसे के घोटाले को भी माननीय न्यायालय ने बेनकाब किया है, जिसमें बताया गया है कि ‘‘शुरूआत में परियोजना का कुल मूल्य आकलन 27.75 करोड़ किया गया, जिसको 1979 में अंतिम स्वीकृति देने तक उसका मूल्य 69.47 करोड़ हुआ। लेकिन केन्द्रीय जल आयोग की 106वीं बैठक में 14 अक्तूबर 2010 में इस परियोजना का मूल्य निर्धारण 652.59 करोड़ आंका गया। जो कि अब बढ़ कर 2259 करोड़ हो चुका है। अलग-अलग समय में परियोजना में बढ़ोत्तरी हुई, जिसके कारण बजट भी बढ़ता गया’’। ( उ0प्र सरकार एवं सोनभद्र प्रशासन द्वारा इसी पैसे की लूट के लिए जल्दी-जल्दी कुछ काम कर के दिखाया जा रहा है, जिसमें बड़े पैमाने पर स्थानीय असामाजिक तत्वों, दबंगों व दलालों का साथ लिया जा रहा है)

हरित न्यायालय के फैसले को पढ़ कर मालूम हुआ कि उ0प्र0 सरकार एवं सिंचाई विभाग ने कोर्ट को गुमराह करने के लिए कितने गलत तथ्यों को उपलब्ध कराया है। उ0प्र0 सरकार ने कोर्ट को बताया कि कनहर परियोजना 1979 में असतित्व में आई व पर्यावरण अनुमति 1980 में प्राप्त की गई तथा 1982 में ही 2422.593 एकड़ वनभूमि को राज्यपाल के आदेश के तहत सिंचाई विभाग को हस्तांतरित कर दी गई थी। उ0प्र0 सरकार का कहना है कि पर्यावरण मंत्रालय तो 1985 में असतित्व में आया, लेकिन उससे पहले ही वनभूमि के हस्तांतरण के लिए मुवाअज़ा भी दे दिया गया है और परियोजना को 1980 में शुरू कर दिया गया। इसलिए उ0प्र0 सरकार व सिंचाई विभाग का मानना है कि 2006 के पर्यावरण कानून के तहत अब बांध निर्माण के लिए उन्हें किसी पर्यावरण अनुमति की ज़रूरत नहीं है और जहां तक वन अनुमति का सवाल है, इस के रिकार्ड उपलब्ध नहीं हंै, क्योंकि यह 30 साल पुरानी बात है। इस परियोजना के तहत पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ व झारखंड के भी गांव प्रभावित होने वाले हंै, जिसके बारे में भी उ0प्र0 सरकार द्वारा यह झूठ पेश किया गया कि दोनों राज्यों से बांध निर्माण की सहमति प्राप्त कर ली गई है। सरकार द्वारा यह तथ्य दिए गए हैं कि दुद्धी एवं राबर्टस्गंज इलाके सूखाग्रस्त इलाके हैं, इसलिए इस परियोजना की जरूरत है। (जबकि इस क्षेत्र में बहुचर्चित रिहंद बांध एक वृहद सिंचाई परियोजना का बांध है, लेकिन आज उस बांध को सिंचाई के लिए उपयोग न करके उर्जा संयत्रों के लिए उपयोग किया जा रहा है।) जो गांव डूबान में आऐंगे उनकी पूरी सूची उपलब्ध नहीं कराई गई व परिवारों की सूची भी गलत उपलब्ध कराई गई है जोकि नए आकलन, डिज़ाईन व बजट के हिसाब से नहीं है। उ0प्र0 सरकार का यह बयान था कि 1980 से काम ज़ारी है व जो काम हो रहे हैं, उसकी एक लम्बी सूची कोर्ट को उपलब्ध कराई गई।  लेकिन कोर्ट ने माना कि उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर यह बिल्कुल साफ है कि फंड की कमी की वजह से व केन्द्रीय जल आयोग की अनुमति न मिलने की वजह से परियोजना का काम बंद कर दिया गया, जोकि लम्बे समय तक यानि  2014 तक चालू नहीं किया गया। वहीं यह सच भी सामने आया कि झारखंड व छत्तीसगढ़ राज्यों की सहमति भी 8 अप्रैल 2002 व 9 जुलाई 2010 में ही प्राप्त की गई थी, इससे पहले नहीं।

उ0प्र0 सरकार एवं सिंचाई विभाग द्वारा इस जनहित याचिका को यह कह कर खारिज करने की भी अपील की गई कि वादी द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक और रिट दायर की है। लेकिन कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि हरित न्यायालय में दायर याचिका का दायरा पर्यावरण कानूनों से सम्बन्धित है व इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर मामला भू अधिग्रहण से सम्बन्धित है, यह दोनों मामले अलग हंै, इसलिए हरित न्यायालय में वादी द्वारा दायर याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने इस बात का भी पर्दाफाश किया कि अभी तक परियोजना प्रस्तावक व उ0प्र0 सरकार ने 1980 की वनअनुमति को हरित न्यायालय के सामने पेश ही नहीं किया है। और कहा कि केवल राज्यपाल द्वारा उस समय 2422.593 एकड़ वनभूमि को गैर वन कार्यों के लिए हस्तांतरित करने के आदेश वन संरक्षण कानून की धारा 2 के तहत वनअनुमति नहीं माना जाएगा। वनभूमि को हस्तांतरित करने से जुड़े केन्द्रीय सरकार द्वारा स्वीकृत किसी भी अनुमति पत्र का रिकार्ड भी अभी तक न्यायालय के सामने नहीं आया है।

माननीय न्यायालय ने इस तथ्य पर गौर कराया कि 1986 में पर्यावरण संरक्षण कानून के पारित किए जाने के बाद पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 1994 में एक नोटिस ज़ारी किया गया, जिसमें यह स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि कोई भी व्यक्ति किसी भी परियोजना को देश के किसी कोने में भी स्थापित करना चाहते हैं या फिर किसी भी उद्योग का  विस्तार या आधुनिकीकरण करना चाहते हैं, तो उन्हें पर्यावरण की अनुमति के लिए नया आवेदन करना होगा। इस नोटिस की अनुसूचि न0 1 में जल उर्जा, बड़ी सिंचाई परियोजनाऐं तथा अन्य बाढ़ नियंत्रण करने वाली परियोजनाऐं शामिल होंगी। मौज़ूदा कनहर बांध के संदर्भ में भी परियोजना प्रस्तावक को 1994 के नोटिफिकेशन के तहत पर्यावरण अनुमति का आवेदन करना चाहिए था, जो कि उन्होंने नहीं किया है। परियोजना के लिए 33 वर्ष पुराना पर्यावरण अनुमति पत्र पर्यावरण की दृष्टि से मान्य नहीं है। इस दौरान पर्यावरण के सवाल पर समय के साथ काफी सोच में बदलाव आया है। इन सब बातों का परखना किसी भी परियोजना के लिए बेहद जरूरी है। तत्पश्चात 2006 में भी पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पर्यावरण आकलन सम्बन्धित नोटिफिकेशन दिया गया, जिसमें अनुसूचि न0 1 में आने वाली परियोजनाओं के लिए यह निर्देश ज़ारी किए गए कि जिन परियोजनाओं में कार्य शुरू नहीं हुआ है उन्हें 2006 के नोटिफिकेशन के तहत भी पर्यावरण अनुमति लेना आवश्यक है, चाहे उनके पास पहले से ही एन0ओ0सी हो तब भी। कोर्ट ने यहां एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि ‘‘कनहर बांध के संदर्भ में यह पाया गया कि यह परियोजना अभी स्थापित ही नहीं थी, परियोजना का वास्तिवक स्थल पर मौजूद होना जरूरी है। यह परियोजना न ही 1994, 2006 व यहां तक कि 2014 में भी चालू नहीं थी, इसलिए इस परियोजना के लिए पर्यावरण सम्बन्धित काननूों का पालन आवश्यक है।

मौजूदा परियोजना कनहर के बारे में कोर्ट द्वारा यह अहम तथ्य पाया गया कि यह परियोजना एक बेहद ही वृहद परियोजना है, जिसका असर बडे़ पैमाने पर तीन राज्यों उ0प्र0, झारखंड एवं छत्तीसगढ़ में पड़ने वाला है। प्रोजेक्ट के तहत कई सुरंगे, सड़क व पुल का भी निर्माण करना है। स्थिति जो भी हो लेकिन जो भी दस्तावेज़ उ0प्र0 सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं, उससे यह साफ पता चलता है कि परियोजना का एक बहुत बड़े हिस्से का काम अभी पूर्ण करना बाकी है। जो फोटो प्रतिवादी द्वारा कोर्ट को उपलब्ध कराए गए हैं, उससे भी साबित होता है कि काम की शुरूआत हाल ही में की गई व अभी परियोजना पूर्ण होने के कहीं भी नज़दीक नहीं है। परियोजना प्रस्ताव की वकालत व उपलब्ध दस्तावेज़ो से यह साफ पता चलता है कि बांध निर्माण कार्य व अन्य कार्य 1994 से पहले शुरू ही नहीं हुए थे। जहां तक परियोजना का सवाल है इस के कार्य, डिज़ाईन, तकनीकी मापदण्ड व विस्तार एवं बजट में पूरा बदलाव आ चुका है तथा 2010 तक तीनों राज्यों की सहमति भी नहीं बनी थी व न ही केन्द्रीय जल आयोग ने इन संशोधित मापदण्डों के आधार पर प्रोजक्ट को स्वीकृति दी थी।

कोर्ट ने यह सवाल भी उठाए कि राज्यपाल द्वारा दुद्धी वनप्रभाग का 2422.593 एकड़ वनभूमि के हस्तांतरण के बावजू़द भी उसके एवज में वनविभाग द्वारा वृक्षारोपण का कार्य नहीं किया गया। रेणूकूट वनप्रभाग के डी0एफ0ओ द्वारा यह जानकारी दी गई की अभी तक 666 हैक्टेअर पर वृक्षारोपण किया गया व सड़क के किनारे 80 कि0मी तक किया गया है। वनविभाग के अधिकारी इस बात पर खामोश हैं कि बाकि का वृक्षारोपण कब और कहां पूरा किया जाएगा, ना ही उन्होंने यह बताया है कि जो वृक्षारोपण किया है, उसमें से कितने पेड़ जीवित हैं व उनकी मौजू़दा स्थिति क्या है। कोर्ट ने यह कहा है कि वानिकीकरण प्रोजेक्ट की प्रगति के साथ ज़ारी रखा जा सकता है। पर्यावरण के विकास के लिए इन शर्तों का पालन निहायत ज़रूरी है, चूंकि अब तक यह पेड़ पूरी तरह से विकसित हो जाते।

न्यायालय द्वारा इस बात पर भी गौर कराया गया है कि जिला सोनभद्र में बड़े पैमाने पर ओद्यौगिक विकास के चलते न ही लेागों का स्वास्थ बेहतर हुआ है एवं न ही समृद्धि आई है। अभी तक इस क्षेत्र की स्थिति काफी पिछड़ी हुई है। किसी भी परियोजना का ध्येय होना चाहिए कि वह लोगों को जीवन जीने की बेहतर सुविधाएं एवं बेहतर पर्यावरणीय सुविधाएं प्रदान करे। यह एक विरोधाभास है कि सोनभद्र उ0प्र0 के उद्योगों के क्षेत्र में एक सबसे बड़ा विकसित जिला है, जिसे उर्जा की राजधानी कहा गया है, लेकिन यही जिला सबसे पिछड़े जिले के रूप में भी जाना जाता है। इसी जिले में प्रदेश का सबसे ज्यादा वनक्षेत्र है। सोनभद्र में अकेले ही 38 प्रतिशत वन है जबकि पूरे प्रदेश में केवल 6 प्रतिशत ही वन है। इस क्षेत्र में जो औद्योगिक विकास पिछले 30 से 40 वर्षो में किया गया है, उससे पर्यावरण को काफी आघात पहुंचा है। पानी व हवा का प्रदूषण मानकों के स्तर से कई गुणा बढ़ गया है। खादानों के कारण बड़े पैमाने पर कचरे ने पर्यावरण पर काफी दष्ुप्रभाव डाले हैं, जो कि खाद्यान्न पर बुरा असर पैदा कर रहे हैं। इससे मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है, नदियों का पानी प्रदूषित हो रहा है व खेती लायक भूमि पर न घुलने वाले धातुओं की मात्रा बढ़ती जा रही है। कई संस्थानों की रिपोर्ट में इस क्षेत्र के पानी में मरकरी, आरसिनिक व फ्लोराईड की भारी मात्रा पाई गई है। व सिंगरौली क्षेत्र को 1991 में ही सबसे प्रदूषित व संवेदनशील इलाका करार दिया गया है। मध्यप्रदेश व उ0प्र0 सरकार को इस प्रदुषण को नियंत्रित करने के लिए एक एक्शन योजना बनानी थी। इस स्थिति को देखते हुए भारत सरकार द्वारा 2010 में इस क्षेत्र में नये उद्योगों को स्थापित करने के लिए प्रतिबंध लगाया गया है। इस लिए 1980 के पर्यावरण अनुमति के कोई मायने नहीं हैं जो कि मौजूदा पर्यावरणीय स्थिति के बढ़े हुए संकट के देखते हुए नये आकलन की मांग कर रहा है।

लेकिन पर्यावरण के प्रति इतनी चिंताए व्यक्त करते हुए भी आखिर में कोर्ट द्वारा फैसले में जो निर्देश दिया गया है, वह इन चिंताओं से तालमेल नहीं खाता। कोर्ट द्वारा आखिर में बांध बनाने में खर्च हुए पैसे का जिक्र किया गया है, जिसके आगे पर्यावरण अनुमति की बात भी बौनी हो गई है व वहां यह चिंता व्यक्त की गई है कि कनहर परियोजना जो कि 27 करोड़ की थी, वह बढ़ कर 2252 करोड़ की हो गई है, मौजूदा काम रोकने से सार्वजनिक पूंजी का नुकसान होगा, इसलिए मौजूदा काम को ज़ारी रखा जाए। (जबकि यह पूरा काम ही नया निर्माण है फिर तो इसे रोके जाने के निर्देश दिए जाने चाहिए थे)। कोर्ट का यह निर्देश इस मायने में भी विवादास्पद है कि, 24 दिसम्बर 2014 की सुनवाई में कोर्ट ने सरकार द्वारा वन अनुमति पत्र न प्रस्तुत करने पर निर्माण कार्य पर रोक लगा दी थी व पेड़ों के कटान पर भी रोक लगाई थी, जबकि उस समय कुछ निर्माण शुरू ही हुआ था। लेकिन इसके बावजू़द भी काम ज़ारी रहा और पेड़ों का कटान भी हुआ। न्यायालीय व्यवस्था को मानते हुए कनहर नदी के आसपास के सुन्दरी, भीसुर, कोरची के ग्रामीणों द्वारा कोर्ट के इसी आर्डर को लागू करने के लिए 23 दिसम्बर 2014 को धरना शुरू किया गया था व 14 अप्रैल को इसी आर्डर एवं तिरंगा झंडे के साथ लोगों द्वारा काम शुरू करने के खिलाफ शांतिपूर्वक तरीके से विरोध जताया था। ऐसे में जनता द्वारा दायर याचिका की सुनवाई न होना भी राजसत्ता एवं उसके दमन तंत्र को ही मजबूत करता हैै।

नया निर्माण रूके, पर्यावरण एवं वन आकलन के सभी पैमाने पूरी तरह से लागू हों, इसके लिए न्यायालय ने एक उच्च स्तरीय सरकारी कमेटी का गठन तो जरूर किया है। लेकिन इस कमेटी में किसी भी विशेषज्ञ एवं विशेषज्ञ संस्थान, जनसंगठनों को शामिल न किया जाना एक बड़ी व गम्भीर  चिंता का विषय है। इसकी निगरानी कौन करेगा कि नया निर्माण नहीं होगा या फिर सभी शर्तों की देख-रेख होगी, इस सदंर्भ में किसी प्रकार के निर्देश नहींे हैं। मौजूदा परिस्थिति में जिस तरह से सोनभद्र प्रशासन, पुलिस प्रशासन व उ0प्र0 सरकार स्थानीय माफिया व गुंडातत्वों का खुला इस्तेमाल करके लोगों पर अमानवीय दमन का रास्ता अपना रही है, ऐसे में इस घोटाली परियोजना पर कौन निगरानी रखेगा? आखिर कौन है जो बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा? यह सवाल बना हुआ है।

यहां तक कि क्षेत्र में वनाधिकार काननू 2006 लागू है, उसका भी पालन नहीं हुआ। ग्रामसभा से इस कानून के तहत अभी तक अनुमति का प्रस्ताव तक भेजा नहीं गया है। अभी तो इससे भी बड़ा मस्अला भूमि अधिग्रहण की सही प्रक्रिया को लेकर अटका हुआ है। संसद द्वारा पारित 2013 का कानून लागू ही नहीं हुआ व उसके ऊपर 2015 का भू-अध्यादेश लाया जा रहा है, जोकि 2013 के कानून के कई प्रावधानों के विपरीत है। कनहर बांध से प्रभावित पांच ग्राम पंचायतों ने माननीय उच्च न्यायालय मे 2013 के भूअधिग्रहण कानून की धारा 24 उपधारा 2 के तहत एक याचिका भी दायर की हुई है, जिसके तहत यह प्रावधान है कि अगर उक्त किसी परियोजना के लिए भू अधिग्रहण किया गया व उक्त भूमि पांच साल के अंदर उस परियोजना के लिए इस्तेमाल नहीं की गई तो वह भूमि भू स्वामियों के कब्ज़े में वापिस चली जाएगी। भू-अभिलेखों में भी अभी तक ग्राम समाज व बसासत की भूमि ग्रामीणों के खाते में ही दर्ज है जो कि अधिग्रहित नहीं है। ऐसे में आखिर उ0प्र0 सरकार क्यों इन कानूनी प्रावधानों को अनदेखा कर जबरदस्ती ऐसी परियोजना का निर्माण करा रही है, जोकि गैर संवैधानिक है और पर्यावरण के लिए बेहद ही खतरनाक है। खासतौर पर ऐसे समय में जब नेपाल में लगातार आ रहे भूकंप के झटके व उन झटकों को उ0प्र0 व आसपास के इलाकों में असर हो रहे हों।

ऐसे में संवैधानिक अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत इस देश के नागरिकों को जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है, उनकी सुरक्षा की क्या गांरटी है? देखने में आ रहा है जीवन जीने के अधिकार की सुरक्षा न सरकार दे पा रही है, न न्यायालय दे पा रहे हैं, न राजनैतिक दल इस मामले में लोगों की मदद कर पा रहे हैं। मीडिया भी जनपक्षीय आधार से कोसों दूर है व कारपोरेट लाबी के साथ खड़ा है। चार दिन आपसी प्रतिस्पर्धा में कुछ ठीक-ठाक लिखने वाले मीडियाकर्मी भी पांचवे दिन इसी दमनकारी व्यवस्था को मदद करने वाली निराशाजनक रिपोर्टस् ही लिखने लगते हैं। ऐसी स्थिति में लोगों के पास जनवादी संघर्ष के अलावा कोई और दूसरा रास्ता नहीं बचा है, जिसका दमन भी उतनी ही तेज़ी से हो रहा है। हांलाकि एक बार फिर इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है व आज़ादी के समय में जिस तरह से भूमि के मुद्दे ने अंग्रेज़ो की जड़े हिला कर उन्हें खदेड़ा था, उसी तरह आज देश में भी यह मुददा भूमिहीन किसानों, ग़रीब दलित आदिवासी व महिला किसानों, खेतीहर मज़दूर का एक राष्ट्रीय मुददा है। यह मुद्दा आने वाले समय में देश की राजनीति का तख्ता पलट सकता है। अफसोस यह है कि माननीय जज साहब ने अंतिम फैसले में देश में मची इस हलचल को संज्ञान में न लेकर निहित स्वार्थांे, पर्यावरण का ह्रास करने वाले असामाजिक तत्वों के लालची मनसूबों को मजबूत किया है व आम संघर्षशील जनता के मनोबल को कमज़ोर करने की काशिश की है। यहां तक कि इसी दौरान छतीसगढ़ सरकार ने भी 22 अप्रैल 2015 को उ0प्र0 सरकार को काम रोकने का पत्र भेजा इस तथ्य को भी कोर्ट द्वारा संज्ञान में नहीं लिया गया। लेकिन इस प्रजातांत्रिक देश में जनवादी मूल्यों की ताकत को भी कम कर के आंकना व नज़रअंदाज़ करना एक बड़ी भूल होगी। निश्चित ही इन निहित स्वार्थी ताक़तों के ऊपर संघर्षशील जनता की जीत कायम होगी व इस संघर्ष पर लाल परचम जरूर फहराया जाएगा।

मरहूम शायर हरजीत ने सही कहा है -

मुन्सिफ का सच सुनहरी स्याही में छिप गया
वैसे  वो  जानता  है   ख़तावार  कौन  है


नोट: कनहर बांध में हुए गोलीकांड व अन्याय को लेकर अभी तक किसी भी मुख्य राजनैतिक पार्टी ने एक भी बयान नहीं दिया है और न ही लोगों पर हुए दमन की निंदा की है। स्थानीय स्तर पर दुद्धी में कांग्रेस, सपा व छतीसगढ़ के भाजपा के पूर्व विधायकों एवं मौजूदा विधायकों, दबंग व दलाल प्रशासन के साथ मिल कर इस पैसे की लूट में शामिल हैं। 


रोमा (सामाजिक कार्यकर्ता, जल जंगल जमीन के लिए संघर्षरत, राबर्ट्सगंज में निवास, इनसे romasnb@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

May 17, 2015

बाघिन पन्ना 234 का हुआ रेडियो कॉलर


कितना उचित है जंगली जानवरों के गले में रेडियो कॉलर पहना देना ?....

कॉलरिंग के दौरान बेहोशी के समय की गई कृत्रिम बारिश


दो वर्ष की यह अर्ध वयस्क बाघिन टी - 2 की संतान
पन्ना, 16 मई - 
 
म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों का कुनबा निरन्तर बढ़ रहा है.  बाघ पुर्नस्थाना योजना के तहत पन्ना लाई गई संस्थापक बाघिनों द्वारा जन्में शावकों में पांच मादा शावक हैं, जिन्होंने पन्ना टाइगर रिजर्व में अपनी जगह बना ली है. इन्ही मादा शावकों में से एक पन्ना - 234 को सफलता पूर्वक रेडियो कॉलर पहनाया गया है. दो वर्ष की यह अर्ध वयस्क बाघिन बाघ पुर्नस्थापना योजना की सफलतम रानी कही जाने वाली बाघिन टी - 2 की संतान है. 

उल्लेखनीय है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघ पुर्नस्थापना योजना शुरू होने पर मार्च 2009 में कान्हा टाइगर रिजर्व से बाघिन टी - 2 को पन्ना लाया गया था, जो यहां के लिए वरदान साबित हुई. रानी बनकर आई कान्हा की इस बाघिन ने पन्ना टाइगर रिजर्व को बाघों से आबाद करने में अहम भूमिका का निर्वहन किया. मौजूदा समय पन्ना में जन्मे बाघों का जो कुनबा है, उसका एक तिहाई कुनबा इसी बाघिन टी - 2 का है, यही वजह है कि इस बाघिन को बाघ पुर्नस्थापना योजना की सफलतम रानी कहा जाता है. क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व आर.श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि टी - 2 के तीसरे संतान की चौथी अर्ध वयस्क बाघिन पन्ना - 234 का पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में शुक्रवार को सफलता पूर्वक बेहोश करते हुए रेडिया कॉलर किया गया. रेडिया कॉलर हो जाने से अब इस अर्ध वयस्क बाघिन की गतिविधि व विचरण पर सुगमता से नजर रखी जा सकेगी. 

रेडियो कॉलरिंग के दौरान की जा रही कृत्रिम बारिश का दृश्य तथा कॉलरिंग के बाद विश्राम करती बाघिन


क्षेत्र संचालक श्री मूर्ति ने बताया कि पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना के द्वितीय चरण में अब सिर्फ बाघिनों का अनुश्रवण किया जाना है. पिछले चरण में नर बाघों का भी अनुश्रवण किया जाता रहा है, लेकिन अब यहां बाघों की संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि वे पन्ना टाइगर रिजर्व की सीमा को लांघकर पूरे बुन्देलखण्ड व विन्ध्य क्षेत्र के जंगल में स्वच्छन्द रूप से विचरण कर रहे हैं. वंश वृद्धि के लिए तैयार हो चुकी बाघिन पन्ना - 234 की सतत निगरानी के लिए उसे रेडियो कॉलर किया गया है, यह कार्यक्रम क्षेत्र संचालक के नेतृत्व में पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. संजीव कुमार गुप्ता के तकनीकी मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ. गर्मी और तपिश को दृष्टिगत रखते हुए रेडिया कॉलरिंग के दौरान बाघिन के बेहोश होने पर पानी के टैंकर से कृत्रिम बारिश भी की गई ताकि तापमान को नियंत्रित रखा जा सके. मालुम हो कि बाघों की रेडियो कॉलरिंग, अनुश्रवण व प्रबंधन के कार्य में पन्ना टाइगर रिजर्व ने जो मुकाम हासिल किया है उससे यहां की ख्याति पूरी दुनिया में बढ़ी है. पूरी दुनिया से लोग पन्ना टाइगर रिजर्व की कामयाबी को देखने समझने और अध्ययन करने यहां आ रहे हैं. 


अरुण सिंह 
पन्ना टाइगर रिजर्व 
मध्य प्रदेश 
भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com

May 16, 2015

खीरी जिले में बढ़ रहा है काले हिरणों का कुनबा



जिले की हरदोई, शाहजहांपुर सीमा पर दिखे कई झुंड

पिछले दस साल में संख्या बढ़कर करीब ५०० पहुंची

अशोक निगम

लखीमपुर खीरी। जिले में काले हिरन का कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। आम तौर से शुष्क जलवायु में पाए जाने वाले काले हिरनों को खीरी जिले की नम जलवायु रास आने लगी है। दस साल पहले यहां इक्का-दुक्का दिखने वाले काले हिरनों की संख्या अब बढ़कर ५०० के करीब पहुंच गई है। इससे वन्यजीव प्रेमी काफी उत्साहित हैं। 

जिले के उचौलिया क्षेत्र में जहां लखीमपुर खीरी जिले की सीमा हरदोई और शाहजहांपुर से मिलती है वहां  सहजना, पनाहपुर और रंजीतपुर गांवों के आस पास ७० से ८० काले हिरनों के कई झाुंड इन दिनों आसानी से देखे जा सकते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यहां काले हिरनों की आबादी पिछले दस साल के अंदर काफी बढ़ी है।
डीएफओ साउथ नीरज कुमार ने बताया मंगलवार को उचौलिया क्षेत्र में भ्रमण के दौरान उन्हें अलग-अलग जगहों पर काले हिरन के दो झाुंड दिखाई दिए। दोनों झाुंडों में ७० से ८० तक हिरन थे। ग्रामीणों के मुताबिक इतने ही बड़े यहां करीब पांच झाुंड हैं। उन्होंने बताया कि खीरी कस्बे और लगुचा के आस पास भी काले हिरन अक्सर मिल जाते हैं लेकिन वहां इनकी संख्या कम है।


ग्रामीणों ने डीएफओ को बताया खीरी जिले की सीमा पर हरदोई जिले के एक किसान ने करीब दस साल पहले हिरनों का एक जोड़ा पाल रखा था। उससे करीब आधा दर्जन बच्चे हुए जिन्हें किसान ने खुला छोड़ दिया। उनसे यहां काले हिरनों की आबादी बढऩा शुरू हुई। अनुकूल प्राकृतिक जलवायु, प्राकृतिक आवास, भोजन मिलने से अब तक इनकी आबादी बढ़कर करीब ५०० हो गई है।

किशनपुर में सांभर की आबादी बढ़ी

किशनपुर में हिरन की सांभर प्रजाति की संख्या में भी इजाफा दर्ज किया गया है। पिछले दिनों प्रदेश के वनमंत्री महफूज किदवई को किशनपुर सेक्चुरी में भ्रमण के दौरान बड़ी संख्या में सांभर दिखाई दिए। दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक वीके सिंह ने भी सांभर की आबादी बढऩे की पुष्टि की है। सांभर बाघ का पसंदीदा भोजन है। वयस्क सांभर का वजन करीब ढाई सौ किलो होता है।






काला हिरन (ब्लेक बक) शेड्यूल-एक का प्राणी है। यह जंगलों के बजाय मैदानों और शुष्क जलवायु में रहना पसंद करता है। दक्षिण खीरी वन प्रभाग में इनकी आबादी में उत्साहजनक बढ़ोत्तरी हुई है। वन विभाग ने इनकी सुरक्षा के लिए निगरानी बढ़ा दी है।

नीरज कुमार, डीएफओ साउथ खीरी।
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अशोक निगम (वरिष्ठ पत्रकार, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, अमरउजाला जैसे पत्रों से जुड़े रहें है, कई दशकों से  खीरी जनपद की एतिहासिक धरोहरों, पर्यावरण और जंगलों पर लेखन, इन्टेक संस्था के सह-सयोंजक, लखीमपुर में निवास, इनसे ashoknigamau@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )

May 14, 2015

हथिनी मोहनकली ने दिया मादा बच्चे को जन्म




इस मादा बच्चे का नाम रखा गया पूर्णिमा
पन्ना टाइगर रिजर्व में अब हाथियों की संख्या हुई चौदह 

पन्ना, 12 मई - 

बाघों से आबाद हो चुके म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व में वन्य प्रांणियों के साथ - साथ वनराज और गजरात के कुनबे में भी वृद्धि हो रही है. पन्ना टाइगर रिजर्व की 16 वर्षीय युवा हथिनी मोहनकली ने एक स्वस्थ और खूबसूरत मादा बच्चे को जन्म दिया है. पार्क प्रबंधन ने इस नवजात मादा बच्चे का नाम पूर्णिमा रखा है. क्यों कि इसका जन्म बुद्ध पूर्णिमा के दिन हुआ है. इस नन्हें मेहमान के आगमन से अब पन्ना टाइगर रिजर्व में हाथियों की संख्या बढक़र चौदह हो गई है.

क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व आर.श्रीनिवास मूर्ति ने आज बताया कि हथिनी मोहनकली ने विगत 4 मई को सुबह 4.10 बजे हांथी कैम्प हिनौता में मादा बच्चे को जन्म दिया था. जन्म के समय हांथी के इस बच्चे का वजन 95 किग्रा. था, वर्तमान में मां व बच्चा दोनों ही पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं. हथिनी मोहनकली की यह दूसरी संतान है, इसके पूर्व इस हथिनी ने पन्ना टाइगर रिजर्व में ही मादा शिशु वन्या को जन्म दिया था, जो अब साढ़े चार वर्ष की हो चुकी है. वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. संजीव गुप्ता ने बताया कि नये मेहमान पूर्णिमा के आगमन से यहां हाथियों के कुनबे में आठ वर्ष से कम आयु के बच्चों की संख्या 6 हो गई है. इस कुनबे में सबसे बड़ी चैन कली 8 वर्ष, वन्या साढ़े चार वर्ष, अनन्ती 4 वर्ष, कृष्णकली ढाई वर्ष, प्रहलाद 2 वर्ष तथा पूर्णिमा 9 दिन की शामिल है. पूर्णिमा के जन्म से हांथी कैम्प हिनौता का आकर्षण बढ़ गया है. पन्ना टाइगर रिजर्व के भ्रमण में आने वाले सैलानी हथिनी मोहनकली के इस नन्हें शिशु को देखने बड़ी संख्या में प्रतिदिन हांथी कैम्प पहुंच रहे हैं.

अरुण सिंह 
पन्ना- मध्य प्रदेश 
aruninfo.singh08@gmail.com

Pesticides are killing birds



Bill deformities in urban birds caused by pesticides...
Effect of pesticides on urban birds

Strides towards extirpation..........?

The blue rock pigeon (Columba livia Gmelin) is mostly seen in semi-domesticated condition, living as commensal of man. This semi-feral stock has become thoroughly used to the din and bustles of urban life; and is now well established in most Indian towns. Grain warehouses, railway stations, old or deserted buildings are their favourite haunts. Their food is cereal, pulses, groundnuts etc. Besides air and water pollution in our overcrowded towns the food grains are badly contaminated due to pesticides used in the stores. All this has started exhibiting its impact through the ailments of these birds. This should be taken warning signals for extirpation of these birds; and in the long run it is not going to spare the human population. “Better late than never”, we should stop using chemical pesticides and adapt to herbal options. 


Ajeet Kumar Shaah     
(The Author is a nature photographer in Lakhimpur-Kheri, Uttar Pradesh, India, He may be reached at ajeetkshaah@gmail.com)

May 10, 2015

गंगा हुई काली, डाल्फिन पर मंड़राया खतरा

 
ब्रजघाट में जलस्तर कम होने के बाद स्नानघाट के पास हुई गंगा काली



-जल स्तर कम होने से काली हो गई गंगा
-पीने क्या नहाने योग्य भी नहीं रहा गंगाजल
-बीओडी की मात्रा बढ़ने से डॉल्फिन पर संकट

हापुड़। मुलित त्यागी

केंद्रीय मंत्री उमा भारती के दौरे के बाद ही गंगा का जल स्तर इतना कम हो गया कि ब्रजघाट में स्नानघाट के पास गंगाजल बुरी तरह काला हो गया है। गंगा जल में बदूब आने से घाट पर श्रद्धालु नहीं रुक पा रहे है। कम जलस्तर होने से गंगा में पड़ रहे कारखानों व सीवर के पानी की पोल खुलकर सामने आ गई है। गंगाजल काला पड़ने से रामसर साइट में जलीय जीव जंतु के जीवन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

चार दिन पहले भारत सरकार की केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने गढ़-ब्रजघाट में पहुंचकर गंगा को देखने के लिए पूठ तक का दौरा किया। जिसमें उन्होंने तीन हजार गंगा सैनिक बनाने का दावा किया और गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का आश्वासन दोहराया। परंतु उनके जाने के बाद ही गंगा का जल स्तर इतना कं हुआ कि ब्रजघाट तीर्थनगरी में गंगाजल काला पड़ गया है। यहां तक कि गंगावासी प्रदर्शन कर रहे हैं परंतु शुक्रवार को तो गंगाजल से बदबू आने लगी है। गंगा जल प्रदूषित होने के कारण दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा समेत अन्य प्रदेशों से आ रहे श्रद्धालु गंगे स्नान करने से कतरा रहे हैं।

-आज तक नहीं हुई सफाई--
प्रधानमंत्री ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए दावा किया है। जिसमें केन्द्रीय मंत्री उमा भारती भी गंगा के लिए काम कर रही है। इसके अलावा पूर्व की केन्द्र सरकार ने भी गंगा की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए। परंतु गंगा मंदिर के पुरोहित संतोष कौशिक, पुरोहित देवेन्द्र राय गौतम, चित्रलोकी प्रसाद शर्मा, विनोद शर्मा गुरुजी, लज्जा राम शर्मा आदि का कहना है कि उनकी याद में कभी गंगा में सफाई नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि सीवर का पानी भी गंगा में जा रहा है जबकि बिजनौर से नरौरा के बीच फैक्ट्रियों का पानी गंगा में गिर रहा है।

-पीने नहीं नहाने लायक भी नहीं गंगाजल--
पर्यावरण विद्ध डॉक्टर अब्बास का दावा है कि ब्रजघाट में स्नानघाट के पास गंगाजल बुरी तरह काला हो चुका है। जिसमें बीओडी, सीओडी और टीएसएस काफी बढ़ गया है जबकि पीएच और डीओ घट गया है। उन्होंने दावा किया गंगा किनारे ब्रजघाट में पीने नहीं बल्कि नहाने योग्य भी गंगाजल नहीं है। उन्होंने बताया कि दिन प्रतिदिन गंगा में हरी शैवाल घट रही है परंतु नीली शैवाल बढ़ रही है जो जल प्रदूषण दयोतक है।

-जलीय जीव जंतु समेत डॉल्फिन पर खतरा--
सर्वेयर  सचिव श्वाति का कहना है कि गंगा में घड़ियाल, कछुवा छोड़े जा रहे हैं जबकि बिजनौर से नरौरा के बीच डॉल्फिन की संख्या 55 है। उन्होंने कहा कि गंगा किनारे तीन बड़े प्रदूषण हो रहे हैं। जिसमें पालेज से गंगाजल में कैमिकल पहुंच रहा है तो सीवर और कारखानों से गंगा पानी गंगा में जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण ज्यादा बढ़ने से जलीय जीव जंतु के जीवन पर संकट उत्पन्न हो रहा है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ अपना काम कर रही है परंतु सरकार को गंगा को प्रदूषण मुक्त कराना पड़ेगा अन्यथा जलीय जीव जंतु समाप्त हो जाएंगे।

-जल स्तर हो गया कम--
पाहड़ों पर बारिश होने के बाद जहां गंगा में जल स्तर बढ़ा वहीं पिछले चार दिन में काफी जल स्तर घट गया है। बाढ़ नियंत्रण आयोग के सूत्रों को मुताबिक गंगा में वर्तमान में 9 से दस हजार क्यूसेक पानी बह रहा है। जबकि गंगा का जल स्तर कम से कम समुन्द्र तल से 195 मीटर रहना चाहिए।
-डॉल्फिन कैसे करेगी प्रजनन--
डॉक्टर अब्बास का कहना है कि डॉल्फिन 15 से 20 फुट गहरे जल में बच्चे नहीं देती है। इससे कम जलस्तर होने पर बच्चे का पालन पोषण करने में भी मादा डॉल्फिन असफल रहती है। उन्होंने कहा टिहरी बांध से पानी छोड़ देना चाहिए वरना डॉल्फिन के जीवन पर संकट आ जाएगा।


मुलित त्यागी 
वरिष्ठ पत्रकार  
mulit.tyagi@livehindustan.com

May 8, 2015

बुंदेलखंड में किसानों की मौत का सिलसिला जारी....




बाँदा / बुंदेलखंड 7 मई 2015 -    
                      
' गृहमंत्री के जाने के सातवें दिन की किसान ने आत्महत्या ' 
 
गृहमंत्री ने इसी गाँव का गत सप्ताह एक मई को किया था दौरा.
 
बाँदा की किसान महापंचायत में कहा था आपका कर्जा माफ़ नही कर सकते,सबका करना पड़ेगा !
 
जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर ग्रामीणों ने किया हाइवे जाम.


 
जिलाधिकारी बाँदा सुरेश कुमार प्रथम ने दिखलाया सामंती चेहरा,मृतक किसान परिवार,ग्रामीणों,किसान प्रतिनिधियों से किया मिलने से इंकार,कहा कि ...' मेरे पास और भी बहुत काम है,समय नही है ' ! एक के बाद एक गत तीन माह से गिर रही किसानो की लाशो पर एक और कड़ी जुड़ गई आज गाँव महोखर में.
जिला कलेक्टर ने ढाई घंटे तक किसान की लाश को,उसके पीड़ित परिवार को और सैकड़ो ग्रामीणों को इंतजार करवाया और लाख जिरह करने के बाद दो मिनट के लिए नही आये l ..सुरेश कुमार प्रथम ने सबको अपने ठेंगे में लिया जबकि खुद की धर्मपत्नी डाक्टर विमलेश राठौर के माध्यम से लगाये गए बाँदा में आर्ट आफ लिविंग के कैम्प में आला अधिकारी के साथ समय निकालकर करते है शिरकत ताकि भीड़ जुट सके ! अमानवीयता की सीमा से परे जाकर उपजिलाधिकारी सदर बाँदा प्रह्लाद सिंह, दरोगा - सिपाही और लेखपाल बने तमाशाई नही आई किसी को किसान आत्महत्या पर संवेदना ....कहते कि डीएम साहेब 5 मिनट के लिए आ जाइये ! ये बीस लाख की आबादी के आप प्रसाशनिक मुखिया है ! ....अगर इतने ही व्यस्त है तो फिर सपा विधायको के बेटो के विवाह समारोह, नेताओ के जलसे में क्यों चले जाते हो ? 


 
आज बाँदा जिले के गाँव महोखर में किसान विजय बहादुर सिंह ( उम्र 60 वर्ष ) ने सुबह 9 से दस के मध्य अपने गृह निवास के समीप बने पुराने अटारीनुमा दो मंजिला पुराने घर में फांसी लगाके जीवन लीला खत्म कर ली. किसान के एक बेटा था,बेटियों का ब्याह हो चुका था,बेटे से तीन सायानी बेटियां क्रमशा काजल,सोना और दीपा है. जिसमे काजल के लिए बीते दो दिन लड़का देखकर आये थे. दहेज़ की बढ़ती मांग और गत 6 मई को खेत में चना कतरा कर आने के बाद उन्होंने बात नही की. आज सुबह ये कदम उठ गया. इस मृतक किसान के 23 बीघा कृषि जमीन थी. किसान क्रेडिट कार्ड पर 3 लाख रूपये खुद पर कर्ज और तीन लाख बेटे कुलदीप सिंह पर कर्जा था. मौके पर बाँदा के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह,मै खुद,कैप्टन सूर्य प्रकाश मिश्र,बलराम तिवारी,बैजनाथ सिंह पहुंचे. किसानो को संवेदित कर वहां आये उप जिलाधिकारी सदर से किसान प्रेम सिंह ने कहा कि ये आखरी किसान आत्महत्या हो ! इसका समाधान खोजिये ! सरकारी खैरात से इसका निपटारा नही होगा. सबने एक सुर में जिलाधिकारी बाँदा को आने का निवेदन किया लेकिन अपने कुर्सी के मद में चूर जिलाधिकारी नही आये l 



 
बाद में आये कांग्रेसी विधायक तिंदवारी दलजीत सिंह ने आशा अनुकूल साथ नही दिया और हम सब अपनी लड़ाई हार गए किसान का अंतिम संस्कार बिना जिलाधिकारी के आये हुआ. मगर ये सवाल है उस लोक तन्त्र पर जो किसानो का पैदा किया खाता है, जिसके बच्चे - पत्नी हम जनता के धन / टैक्स से पलते है, ये सवाल है उन खद्दर वाले नेताओ,गृह मंत्री - प्रधानमंत्री और समाजवादी मुख्यमंत्री से जिन्होने इस साल को ' किसान वर्ष ' घोषित किया है ...कि क्या ये साल किसानो की तेरहीं का वर्ष है जिसमे आप के घड़ियाली दावे हजारो परिवारों को अनाथ कर रहे है. ....शर्म हमें नही आती ! 

-आशीष सागर (सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार व् पर्यावरणीय मसलों पर आंदोलनी अभिव्यक्ति, प्रवासनामा पत्रिका के संपादक, बांदा में निवास, इनसे ashish.sagar@bundelkhand.in पर संपर्क कर सकते हैं)




विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था