International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Dec 31, 2013

पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह की तृतीय पुण्यतिथि पर उन्हें नमन


टाइगर मैन बिली अर्जन सिंह की याद में .....

कुंवर अर्जन सिंह जिन्हें लोग टाइगर मैन की संज्ञा देते है इस गुजर रहे साल और आने वाले नए वर्ष के पहले रोज यानी एक जनवरी सन २०१४ को बिली अर्जन सिंह की तृतीय पुण्य तिथि है, नव वर्ष के प्रथम दिन सन २०१० में बिली अर्जन सिंह का देहावसान हुआ और इसी रोज से दुधवाकेजंगलों की निगेहबानी करने वाले व्यक्ति के साथ साथ वो कवायदे भी ख़त्म हो गयी जो इस भ्रष्ट व्यवस्था पर सवाल करती थी.

उन्हें याद करने का जो हमारा मंसूबा है, वह तभी पूरा हो सकता है जब उनके मकसदों को हम आगे बढाए और लोग जान सके की बाघ और जंगल का नाता क्या है, बिली ने कहा था की “बाघ नहीं रहेगा तो जंगल नहीं बचेंगे और जंगल बारिश लाते है बिना बारिश के, शुद्ध हवा के इंसान भी नहीं रह सकता, जैसे मुसलमान का अल्लाह है, ईसाई का गाड है, वैसे जंगल का भगवान् शेर है” 

बिली अर्जन सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत के सयुंक्त प्रांत के गोरखपुर में पंद्रह अगस्त सन १९१७ में हुआ, उस वक्त इनके पिता जसबीर सिंह ब्रिटिश भारत के एक बड़े अफसर के तौर पर वहां तैनात थे, सन १९२३ में बिली के पिता बलरामपुर स्टेट के कोर्ट आफ वार्ड नियुक्त किये गए, और यही से बिली के जंगलों से रिश्ते की शुरूवात हुई, बारह वर्ष की आयु में इन्होने एक तेंदुए का शिकार किया और चौदह वर्ष की आयु में बाघ का और यह सिलसिला अनवरत चलता रहा लखीमपुर खीरी के जंगलों की उस रात तक जब बिली ने एक तेंदुए का शिकार किया तभी एक दूसरा तेन्दुआ जीप की लाईट के सामने से गुजर कर मर चुके तेंदुए की तरफ जा रहा था एक तेंदुए की आँखों की चमक देखी और दूसरे की आँखों की बुझी हुई चमक से बिली आहात हुए और उस रोज उन्होंने प्रतिज्ञा ली की प्रकृति के इन खूबसूरत जीवों को जिनका निर्माण मैं नहीं कर सकता तो इन्हें मारने का मुझे कोइ हक़ नहीं है.

बिली को पंद्रह साल की उम्र में फिलैंडर स्मिथ कालेज नैनीताल भेजा गया, जहां जिम कार्बेट ने शिक्षा ग्रहण की थी, इसके बाद इलाहाबाद में इन्होने शिक्षा ली, इन्हें आक्सफोर्ड भेजने की जो तैयारी की गयी थी, विश्व युद्ध शुरू हो जाने के कारण वह योजना साकार रूप न ले सकी, बिली ने ब्रिटिश इन्डियन आर्मी में स्वैच्छिक सेवा के तौर पर भारती ले ली, वर्मा और ईराक तक बिली ने ब्रिटिश भारतीय फौजों के साथ काम किया, पिता की मृत्यु की सूचना मिलने पर वह ईराक से वापस आये और फिर खेती करने के इरादे से खीरी के जंगलों की तरफ रूख किया खीरी के जंगल इनके लिए कोइ अपरिचित जगह नहीं थी, क्योंकि यहाँ बिली कभी अपने मित्रों के साथ शिकार पर आया करते थे,



जसबीर नगर से टाइगर हैवन तक का सफ़र 
सन १९४५ में वो खीरी आये और पलिया के निकट जमीन लेकर खेती करने लगे, इस जगह का नाम इन्होने अपने पिता के नाम पर रखा. एक बार भगवान् पियारी(हथिनी) पर सवार होकर बिली नार्थ खीरी के जंगलों में भ्रमण पर निकली तो सुहेली और नेवरा के मध्य जो स्थान दिखा उसकी रमणीयता ने बिली को प्रभावित किया. यह बात है सन १९४९ की और यही वह जगह थी जहां विश्व प्रसिद्द टाइगर हैवन का प्रादुर्भाव होना था! 
जंगल के मध्य इस जगह को बिली ने अपनी रिहाइश बनाई जो बाद में बाघों और तेंदुओं का घर बना. सन १९७१ में टाइगर हैवन  में दो नए मेहमान आये एक था प्रिंस जो तेंदुआ था और दूसरी थी एली एक कुतिया, यहीं से बिली अर्जन सिंह के प्रयोग की शुरूवात हुई की पालतू जानवरों को जंगल में दुबारा प्राकृतिक व् स्वछंद जीवन जीने के लिए ट्रेंड किया जाए, बाघ और तेंदुओं जैसे शिकारी जानवरों के साथ यह प्रयोग कितने खतरनाक और रोमांचित कर देने वाले थे. 

श्रीमती इंदिरा गांधी और कुंवर अर्जन सिंह 
श्रीमती इंदिरा गांधी के सौजन्य से बिली को दो तेंदुए भेंट के तौर पर मिले जूलियट और हैरियट बिली ने इनके नाम शेक्सपीयर के नाटक के पात्रों पर रखे, इन दोनों तेंदुओं को जंगल में वापस भेजने की बिली की कोशिश कुछ कारणों से आंशिक तौर पर सफलता मिली, हैरियट ने तो बच्चे भी दिए और वह भी जंगल में बिली के घर से दूर, यानी जहां वह पली बड़ी उस जगह को छोड़कर अपने प्राकृतिक आवास में चली गयी, लेकिन उसका व्यवहार अजीब था एक दिन वह अपने बच्चों के साथ टाइगर हैवन वापस आयी, अपने चिरपरिचित स्थान पर, बिली ने फिर उसे सुहेली के पार घने जंगलों में वापस भेजा. इन घटनाओं पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी जो बहुत विख्यात हुई इस फिल्म का नाम था “द लियोपर्ड कैन नाट चेंज्ड इट्स स्पाट्स”. सन १९७६ में इंग्लैण्ड के चिड़ियाघर से एक बाघिन के शावक को लाने की इजाजत मिली बिली अर्जन सिंह और यह वही बाघिन थी जो तारा के नाम से विख्यात हुई पूरी दुनिया में एवं डा. रामलखन सिंह की किताबों में कुख्यात हुई एक आदमखोर के तौर पर!
   

तारा-एक बाघिन 
बिली अर्जन सिंह जिस तारा को  सन १९७६ में इंग्लैण्ड के टाईक्रास जू से लाये थे, उसका नाम जेन था, वह एक रायल बंगाल टाइगर और साईबेरियन टाइगर का क्रास थी, जब इस बात की पुष्टि हुई तो अर्जन सिंह पर दुधवा के बंगाल टाइगर में  साइबेरियन जीन वाली तारा के जरिये आनुवांशिक प्रदूषण फैलाने का आरोप लगा. 

बिली ने तारा को टाइगर हैवन के प्राकृतिक जंगली माहौल में प्रशिक्षित करना शुरू किया, तारा बड़ी होती गयी, और बिली के अनुशासन की अनदेखी करने लगी, बिली यही तो चाहते थे की तारा अपने जंगली शिकारी स्वभाव को अपना ले, और यही हुआ एक दिन तारा दुधवा के बाघ के साथ चली गयी, बिली के लिए यह वैसे ही था जैसे एक पिता के लिए बेटी का ससुराल जाना, खुशी और गम दोनों एक साथ उपजते है तब! और बेटियां कहा रुकती है हमेशा अपने घर में! 

तारा ने कुछ महीनों बाद दो बच्चों को जन्म दिया, बिली लगातार तारा पर नज़र रखने की कोशिश करते की उनकी पाली हुई यह बाघिन दुधवा के जंगलों के खूंखार बाघों के बीच सुरक्षित है की नहीं, और तारा भी गाहे बगाहे अपने बचपन के घर टाइगर हैवन आ जाती....पर यह आने जाने का सिलसिला बहुत दिनों तक नहीं चला, तारा पूर्ण रूप से दुधवा के जंगल में अपनी जगह बना चुकी थी, तभी जंगल में मानव भक्षण की घटनाएं तेज हो गयी और आरोप तारा के सर लगाए जाने लगे. बिली के प्रयोग को यह सबसे बड़ा धक्का था, कई मानव मौतों के बाद तारा को मारने का  सरकारी फरमान जारी हुआ, और एक बाघिन मारी भी गयी जिसे तारा बताया गया? सच्चाई अभी भी समय के गर्भ में है! मानव भक्षण के दौरान कई टाइगर मार दिए गए अब चाहे वह मानव भक्षी हो या फिर न हो.

दुधवा में तारा की संतति 

खैर बिली साहब मुझसे अंत तक कहते रहे की तारा दुधवा के जंगलों में अपनी कई पीढ़ियों को जन्म देने के बाद प्राकृतिक मौत को प्राप्त हुई.
अभी हाल में दुधवा से बाघों के डी एन ए  सैम्पल लिए गए और उनकी जांच की गयी, जिसमे दुधवा के बाघों में साइबेरियन जीन की पुष्टि हुई?, इनका चेहरा बड़ा, चौड़ी धारियां और शरीर पर ज्यादा सफेदी अपेक्षाकृत बंगाल टाइगर के .....व्यवहारिक तौर पर बिली को जो सफलता मिली अपने प्रयोगों में वह वैज्ञानिक तौर पर भी लगभग पुष्ट हो गयी है, इसी के साथ बिली अर्जन सिंह दुनिया के पहले व्यक्ति हो गए जिन्हों ने बाघों के पुनर्वासन के कार्यक्रम में सफलता पाई.

जब राजकुमारी अमृतकौर ने अर्जन सिंह को बिली कहा...

  अर्जन सिंह  का नाम बिली उनकी बुआ राजकुमारी अमृतकौर का दिया हुआ है, राजकुमारी अमृत कौर महात्मा गांधी की निकटस्थ और आजाद भारत की प्रथम महिला स्वास्थ्य मंत्री बनी, बिली ब्रिटिश भारत की बड़ी रियासत कपूरथला से ताल्लुक रखते है, इनके दादा राजा हरनाम सिंह और परदादा राजा रंधीर सिंह थे.
सन १९२४ में बिली का परिवार नैनीताल गया छुट्टिया मनाने और ये लोग बलरामपुर रियासत के स्टैनली हाल में ठहरे, जहां बिली ने पहली बार जिम कार्बेट को देखा, बिली के प्रेरणा स्रोतों में जिम कार्बेट के अलावा ऍफ़ डब्ल्यू चैम्पियन रहे जो एक वन अधिकारी थे, उनकी किताब “विद अ कैमरा इन टाइगर र्लैंड एंड द जंगल इन सन लाईट एंड शैडो” ने बहुत प्रभावित किया बिली को.


एक मुलाक़ात के दौरान बिली अर्जन सिंह ने मुझसे कहा की तुम तो लिखते हो, ये लिखो की उनके पिता जसबीर सिंह  ब्रिटिश भारत में पहले भारतीय डिप्युटी कमिश्नर थे लखनऊ में, इस बात को आज पहली बार मैं लिख रहा एक बेहतरीन उद्दरण के साथ, एक किताब है “द मेन हू रूल्ड इंडिया” इसके दुसरे खंड में एक फिलिप नाम के अंग्रेज ने कहा है की जसबीर सिंह मेरे पहले डिपुटी  कमिश्नर थे, वो एक फिलासफर, और अच्छे इंसान थे सन १९४५ में उनकी मृत्यु हो जाने पर मुझे ऐसा लगा की मैंने अपने पिता को खो दिया.

पद्मश्री से पद्मभूषण 

बिली साहब को सन १९७५ में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया, सन १९७६ में विश्व प्रकृति निधि द्वारा गोल्ड मैडल दिया गया, सन २००४ में बाघ सरक्षण में उनकी महत्त्व पूर्ण भूमिका होने के कारण वन्य जीवन के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला जे. पाल गेटी अवार्ड मिला. सन २००६ में बिली अर्जन सिंह पद्मभूषण सम्मान से भारत सरकार ने नवाजा, इसी वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार में मुलायम सिंह ने बिली को यश भारती से भी सम्मानित किया. वन्य जीव सरंक्षण में कुंवर् अर्जन सिंह को मिले पुरस्कारों की फेहरिस्त इतनी लम्बी है की कहा जाता है की वन्य जीवन में काम करने वाले बिली ऐसे व्यक्ति है पूरी दुनिया में की इनसे ज्यादा पुरस्कार किसी को नहीं मिले अब तक! 


इन्डियन वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य होने के साथ साथ अर्जन सिंह दुधवा के अवैतनिक वन्य जीव प्रतिपालक रहे जीवन पर्यंत, नार्थ खीरी के विशाल जंगलों को दुधवा राष्ट्रीय उद्यान बनवाने का श्रेय बिली अर्जन सिंह को है, नतीजतन तराई के जंगलों में बाग़ तेंदुओं के अतरिक्त जीव जंतुओं की अनगिनित प्रजातियां सरक्षित हो सकी.

सन २०१० के पहले दिन कुंवर अर्जन सिंह का देहावसान उनके जसबीर नगर के निवास पर हुआ, बाघों का रखवाला और जंगल की निगहबानी करने वाला चला गया, पर अपने बहुत सारे अनुभव हमें दे गए बिली साहब उनके बनायी हुई डगर जो जंगल और उनमे रहने वाले बाघों के सरक्षण की तरफ जाती है उस डगर पर हमारी उगली पकड़कर हमें खडा भी कर दिया है उन्होंने अब हमारी जिम्मेदारी है की उनके सपनो को हम पूरा करे ताकि तराई के जंगलों में बाघ तेंदुए और जंगल सभी कुछ महफूज रह सके.


कुंवर अर्जन सिंह ने अपने वन्य जीवन के अनुभवों को लिखा वो तमाम किताबों के रूप में हमारे बीच मौजूद है. 
तारा ए  टाइग्रेस 
एली एंड द बिग कैट 
प्रिंस आफ कैटस 
टाइगर टाइगर! 
टाइगर हैवन
द लीजेंड आफ द मैनईटर   
ए टाइगर स्टोरी 
वाचिंग इंडियाज वाइल्डलाइफ़ 

बिली अर्जन सिंह पर लिखी गयी कुछ प्रसिद्द किताबें 
आनरेरी टाइगर 
टाइगर वाला 
टाइगर आफ दुधवा 

बिली अर्जन सिंह के बाघों एव तेंदुओं के साथ किए गए प्रयोगों पर बनी फ़िल्में 
टाइगर टाइगर 
द लेपर्ड कैन नाट चेंज्ड इट्स स्पाट्स 
फायर इन थाइन आईज  



सम्पादक की कलम से !

      







कृष्ण कुमार मिश्र 
(editor.dudhwalive@gmail.com)




Dec 20, 2013

आखिरकार.. मानव जंगलों में भागकर अपनी जान बचा रहा था !

Photo Courtesy: NASA

प्रकृति के विनाश की पुरजोर कोशिशो में  लगा मानव और इन भयावह हालातों पर वेदनाओं की बेहतरीन अभिव्यक्ति की राम सिंह यादव ने अपनी कलम से..... कुछ इस तरह की हम जिस बुनियाद पर कायम है उसे ही नस्तेनाबूत किए जा रहे है !।. संपादक 
*********

अरे ओ, कलम के देवताओं
सुना है तुम इतिहास लिखते हो ?
वर्तमान को शिक्षा देते हुए
भविष्य का आईना दिखाते हो ?

क्या यह हकीकत है
कि तुम वो देवता हो, जो दुनिया बचाते हो ?

हाँ शायद ये सच है
पालने से लेकर मृत्यु शैयया पर लेटा-मानव
तुम्हारी लिखी इबारतों का
अनुसरण करता है।
तुम्हारी लिखी धुरी पर
उसका चक्र पूरा होता है।।

तुम लिखते हो,
भगवान का स्वरूप ऐसा है........
वो मान लेता है।।
तुम लिखते हो,
मुजफ्फर नगर दंगा इसने कराया
पांच सौ कोस दूर बैठा अनजान मानव,,,,,,,,
विरोधी सम्प्रदाय वालों को मारने लगता है। 

  
तुम लिखते हो,
विकास का स्वरूप ऐसा है
चैड़ी सड़कें, गगनचुंबी अट्टालिकाएं,
सीमेन्ट और डामर से पटे ऊसर मैदान......
रोशनी से नहाते शहर.......
आह व्यावसायिक मानव का, खूबसूरत और नयनाभिराम सपना.......।।।।


पर क्या तुमने लिखा........
भूमिजल खत्म होने का मुख्य कारण ??
क्या तुम लिखोगे ?
दस मंजिल ऊपर रहने वाला
कृत्रिम बिजली खत्म होने पर
दो सौ फीट गहरा पानी कैसे पीयेगा ??

  

क्या तुमने लिखा,
झूठे विज्ञापनों के दम पर
क्षणिक स्वच्छता दिखाने वाले............
लाइफबाय, लक्स, हार्पिक, विम, रिन,
लइजाल, क्लीनिक प्लस वगैरह वगैरह ने.......
नालियों और नदियों का क्या हश्र किया ????

अब इस पानी में कोई 
मछली नही है
जो मच्छरों के लार्वा को खा सके
और मानव को डेंगू से बचा सके..........

अब इस रासायनिक जल में मरे हुये
असंख्य जीवों से उत्पन्न.....
मानव कवलित करने वाली
मीथेन आदि गैसो का साम्राज्य है ।।




क्या तुमने लिखा,,,,,,
उत्तराखण्ड त्रासदी के जिम्मेदार
मानव निर्मित सैकड़ों बांध........ 
जो असंख्य लहलहाते पेड़ों को 
काट कर हो रहे थे...........
हास्यास्पद था देखना
काल का ग्रास बना मानव......
जंगलों मे भागकर
जान बचा रहा था ।।।


क्या तुमने लिखा ?
जापान का अंजाम देख कर भी
लालची नेताओं द्वारा एटमी करार का महिमा मंडन.........
किस भविश्य को परिलक्षित कर रहा है ????

   


क्या तुमने लिखा ???
सद्दाम से लेकर लादेन तक ??
सीरिया, इराक, अफगानिस्तान,
रूस, जापान, ईरान, लीबिया, वियतनाम,
कोरिया या पाकिस्तान........
इन बिके पत्रकारों के दिखाते झूठ पर ????


क्या तुमने लिखा ???
सभ्यताओं को नष्ट करना
और उसके पीछे छिपा
साम्राज्यवाद का लक्ष्य ???

क्या तुमने लिखा ???
एटम बम, जैविक-रासायनिक हथियार,
ड्रोन इत्यादि का प्रयोग किसने किया ??

   

क्या तुमने लिखा ???
किसने हथियारों की होड़ बढाई ??
किसने अंतरिक्ष से लेकर अंटार्टिका तक
पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद किया ??
किसने पेप्सी जैसे पेयों से
बच्चों तक को कैंसर बांटे ???

अब तो हद हो चुकी......
तुम्हारी लेखनी की अब जरूरत नही........
मानव दूसरी प्रकृति बना रहा.......
हार्प प्रोग्राम से हैयान तो शुरूआत मात्र थी......

     

मानव का अनंतमि लालच.......
स्वयं मानव सम्यता के लिये,
दो गज जमीन पर खत्म होने जा रहा।।

   

क्या तुम लिख सकोगे ??????
प्रकृति के विरूद्ध अजेय सम्यताएं............
आज समंदर की गहराईयों
या परतों में दबी कहानियां सुना रही हैं।।।।।।। 
वन क्रान्ति-जन क्रान्ति 
**********

लेखक: राम सिंह यादव 
संपर्क: yadav.rsingh@gmail.com 

Dec 6, 2013

दुधवा नेशनल पार्क में बाघ ने गैंडा बच्चे को मौत के घाट उतारा

Image Courtesy:  greater one-horned rhino with baby via Shutterstock & planetsave.com

विश्व की इकलौती है दुधवा गैंडा पुनर्वास परियोजना

-दुधवा नेशनल पार्क से डीपी मिश्र

लखीमपुर-खीरी। यूपी के मात्र दुधवा नॅशनल पार्क के सोनारीपुर वनरेंज के ककराहा जंगल में बाघ ने चौदह माह के गैंडा बच्चे को मार डाला है। इस सूचना से पार्क प्रशासन में हड़कम्प मच गया है। मौके पर पहुंचे डिप्टी डायरेक्टर ने घटना स्थल का निरीक्षण किया। तीन डाक्टरों के पैनल ने शव  का पोस्टमार्टम किया है। इसके बाद शव  को दफन कर दिया गया। इस घटना से दुधवा के 32 सदस्यीय गैंडा परिवार की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है।

दुधवा नेशनल पार्क के सोनारीपुर वनरेंज के तहत 27 वर्गकिमी के जंगल में सौरउर्जा से संरक्षित इलाका में विश्व की एकमात्र गैंडा पुनर्वास परियोजना चल रही है। इसमें 33 सदस्यीय गैंडा परिवार स्वछंद कर रहा है। बीते दिवस बाघ ने मादा गैंडा ‘सदा‘ के चैदह माह के फीमेल बच्चे पर हमला करके उसे मौत के घाट उतार दिया। हाथी से गैंडों की मानीटरिंग में जंगल गई टीम को गैंडा के बच्चे का क्षत बिछत षव ककराहा के जंगल में पड़ा दिखाई दिया। बाघ द्वारा गैंडा के बच्चे का षिकार किए जाने की मिली सूचना पर पार्क प्रषासन में हड़कम्प मच गया। दुधवा नॅशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर बीके सिंह, बेलरायां वार्डन एके श्रीवास्तव, सोनारीपुर रेंजर एमके शुक्ला आदि मौके पर पहुंच गए और घटना स्थल का निरीक्षण किया। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के गैंडा विशेषज्ञ रूचिर की देखरेख में डब्ल्यूटीआई के डाक्टर सौरभ सिंघई, डाक्टर नेहा सिंघई और राजकीय पषु चिकित्साधिकारी डाक्टर राजेष निगम ने क्षत बिछत गैंडा के बच्चे के षव का पोस्टमार्टम किया। डाक्टरों की टीम ने बच्चे की उम्र लगभग चैदह माह बताई है। बाद में वार्डन एके श्रीवास्तव ने अपनी देखरेख में षव को दफन करा दिया। 

इससे पहले इसी साल 9 जनवरी को बाघ ने ककराहा क्षेत्र के जंगल में मादा गैंडा पावित्री के एक माह के बच्चे को मार डाला था। और 29 जनवरी को दुसाहसी बाघ ने फिर से मादा गैंडा पावित्री पर हमला करके मौत के घाट उतार दिया था। जबकि इससे पहले 10 दिसम्बर 2012 में बाघ ने दीपा नामक मादा गैंडा पर हमला करके उसे बुरी तरह से घायल कर दिया था। बाघ द्वारा गैंडों पर किए जाने वाले ताबड़तोड़ हमलों के कारण गैंडों के लिए अब संरक्षित जंगल उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया है, साथ ही गैंडा परिवार की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। दुधवा नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर बीके सिंह ने बताया कि इस घटना का गंभीरता से गैंडों को सुरक्षा बढ़ा दी गई है साथ ही स्टाफ को सतर्कता बरतने और लगातार निगरानी करने के आदेश दिए गए हैं।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
dpmishra7@gmail.com

Dec 5, 2013

ग्रामीणों ने महान जंगल पर जताया अपना अधिकार


अमिलिया निवासियों ने सामुदायिक वनाधिकार को पाने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की

सिंगरौली5 अगस्त 2013। महान जंगल पर अपने अधिकार के लिए आंदोलनरत स्थानीय लोगों ने अपने संघर्ष को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए महान जंगल पर वनाधिकार कानून 2006 के तहत अधिकार लेने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। ग्राम स्तरीय वन अधिकार समिति अमिलिया ने उप-खंड स्तरीय समिति तथा अनुविभागीय अधिकारी वनाधिकार समिति सिंगरौली से वनाधिकार कानून के तहत महान जंगल के बारे में जानकारी और दस्तावेजों की मांग की है।
वन अधिकार समिति अमिलिया के अध्यक्ष हरदयाल सिंह ने इस संबंध में अनुविभागीय अधिकारी वनाधिकार समिति सिंगरौली के पास आवेदन देकर वन अधिकार अधिनियम 2 के नियम 12(4) के अनुसार जानकारीअभिलेख एवं दस्तावेज की अधिप्रमाणित प्रति के लिए अनुरोध किया है। 
अमिलिया ग्राम वनाधिकार समिति ने उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति को लिखे पत्र में मांग की है कि उन्हें वे कागज मुहैया कराये जायें जो उनका महान जंगल पर निर्भरता को साबित करता हो तथा जिससे उन्हें वनाधिकार कानून को हासिल करने में मदद मिले।
ग्राम वनाधिकार समिति के इस कदम से महान जंगल क्षेत्र में कोयला खदान आवंटन के दूसरे चरण की पर्यावरण मंजूरी के लिए प्रयासरत राज्य सरकार व महान कोल लिमिटेड को झटका लगा है। इस कोयला खदान के आने से अमिलिया सहित 14 गांवों के लोगों की जीविका खतरे में पड़ जायेगी।
महान संघर्ष समिति की सदस्य तथा ग्रीनपीस की सीनियर अभियानकर्ता प्रिया पिल्लई सामुदायिक वनाधिकार के दावे के लिए शुरू की गयी कानूनी प्रक्रिया को अमिलिया के गांव वालों के संघर्षों की जीत बताती हैं। वे कहती हैं कि ग्रामीण सामुदायिक वनाधिकार की पहचान के लिए दावा कर सकते हैं। पहली चरण के अंतर्गत ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति द्वारा उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति से संबंधित कागजात की मांग की गई हैजिसमें सभी तरह के ऐतिहासिक दस्तावेज होते हैं जिससे उनके दावे को साबित करने में मदद मिलती है
सामुदायिक वनाधिकार दावे की प्रक्रिया
ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति द्वारा  उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति को वनाधिकार कानून के तहत जंगल का नक्शानिस्तार पत्र और वन संसाधन की योजना से जुड़े अन्य दस्तावेजों की मांग से संबंधित पत्र  भेजा गया है। उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति द्वारा सारी सूचनाओं के मुहैया करा देने के बाद ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति अमिलिया जरुरी कागजातों के साथ  सामुदायिक वनाधिकार दावे के लिए फॉर्म भरेगी। इसके बाद फॉर्म को ग्राम सभा द्वारा जांची जाएगी। जांच के बाद फॉर्म को उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति को सौंप दिया जाएगा और फिर अंत में फॉर्म जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाले जिला स्तरीय समिति में भेजा जाएगा। जिला स्तरीय समिति सामुदायिक वनाधिकार के दावे को स्वीकार कर अमिलिया ग्राम सभा को इस संबंध में पत्र प्रदान करेगी।
    वनाधिकार समिति अमिलिया के अध्यक्ष हरदयाल सिंह उम्मीद जताते हैं कि उप-खंड स्तरीय वनाधिकार समिति जल्द ही सारे कागजात को मुहैया करा देगी जिससे सामुदायिक वनाधिकार दावे की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। वे कहते हैं कि ये दस्तावेज हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इससे हमें अपने महान जंगल पर सामुदायिक अधिकार के दावे को मजबूती प्रदान होगी। मेरा पूरा गांव महान जंगल पर निर्भर है जिसे कोयला खदान के लिए देना प्रस्तावित है। महान संघर्ष समिति मेरे गांव में वनाधिकार कानून को लागू करवाने के लिए प्रयासरत है
हरदयाल सिंह महान संघर्ष समिति के सदस्य भी हैं। महान संघर्ष समिति ने मांग की है कि जल्द से जल्द सारे दस्तावेज मुहैया कराये जायें जिससे वनाधिकार कानून के उल्लंघन को रोका जा सके।

(पृष्ठभूमि)
महान जंगल
प्राचीन साल जंगल वाला महान के क्षेत्र को कोयला खदान के लिए देना प्रस्तावित है। इस कोयला खदान को पहले चरण का निकास मिल चुका है लेकिन दूसरे चरण के निकास के लिए पर्यावरण व वन मंत्रालय ने 36 शर्तों को भी जोड़ा है। इन शर्तों में वनाधिकार कानून 2006 को लागू करवाना भी है। महान जंगल पर 14 गांव प्रत्यक्ष तथा करीब 62 गांव अप्रत्यक्ष रुप से जीविका के लिए निर्भर हैं। महान में कोयला खदान के आवंटन का मतलब होगा इस क्षेत्र में प्रस्तावित छत्रसालअमिलिया नोर्थ आदि कोल ब्लॉक के लिए दरवाजा खोलनाजिससे क्षेत्र के लगभग सभी जंगल तहस-नहस हो जायेंगे।

महान संघर्ष समिति
महान जंगल पर जीवोकोपार्जन के लिए निर्भर पांच गांवों (अमिलिया, बंधोराबुधेरसुहिरा तथा बरवांटोला) के ग्रामीणों ने महान कोल लिमिटेड (एस्सार व हिंडाल्को का संयुक्त उपक्रम) को प्रस्तावित कोयला खदान का विरोध तथा अपने वन अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक संघर्ष करने के लिए महान संघर्ष समिति का गठन किया है। अब समिति वनाधिकार कानून 2006 के तहत जंगल पर अपना अधिकार पाने के लिए प्रयासरत है।

 अविनाश कुमार, ग्रीनपीस 
avinash.kumar@greenpeace.org 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था