International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jun 28, 2013

पेड़ों के स्पंदन







समझते हैं लोग क्या
पेड़ से
होने से,उसके न होने से
पेड़ का मतलब छाया,
हवा,लकड़ी,
हरियाली
पेड़ जब सनसनाते
सन्नाटे को तोड़ते
कभी खुद टूट जाते
तूफ़ान से लड़कर
देखते लोग पेड़ वे
आंधी में टूटे हुए
होते हैं कितने लाभदायक
नहीं टूटते तब
टूटने पर
आते हैं अनगिनत काम

घरद्वार, हलमूँठ और बैलगाड़ी
नाव घाट,मोटर,रेल,
बक्सा-संदूक,कुर्सी-मेज़
न जाने कहाँ-कहाँ
सोचते हैं क्या हम कभी ?
पेड़ों के स्पंदन
उनके जीवन और मृत्यु की बात
हरी-पीली पत्तियों एवं शिराओं में
बहते जीवन रस के बारे में
क्या आदमी के साथ
पेड़ों का संबंध
है मात्र पूजा और उपयोग का
प्रतीक होते हैं पेड़
सतत जीवंतता,उत्साह
और प्रेम के




शैलेन्द्र  चौहान 
shailendrachau@gmail.com

Jun 12, 2013

क्या इन बोनसाई बरगदों को जमीन मयस्सर होगी! हम इसी इंतज़ार में है

क्या ये विशाल बरगद ख़त्म हो जायेंगे? अगर ऐसा होगा तो वे परिंदे और वे जानवर जो आसरा लेते है इस विशाल वृक्ष में, उनकी मौजूदगी पर भी सवाल खडा हो जाएगा, साथ ही वो संस्कृति भी विलुप्त हो जायेगी जो बताती है हमें दरख्तों और परिंदों से हमारा रिश्ता, दरअसल ये सब एक दूसरे के पूरक है ,एक पर आया संकट सबके लिए मुश्किलात लेकर आयेगा....चलो फिर किसी पौधे को जमीन दी जाय ताकि एक दिन वह विशाल वृक्ष बन सके और उसके तले  लग सकें ये हमारे सांस्कृतिक मेले और चौपाले, बसेरा कर सके वो जीव जिनके ये घर है...बरगद जैसे दरख़्त....कृष्ण (माडरेटर) 

 "बरगद के वृक्ष कम है, भीड़ ज्यादा, तो बोनसाई की पूजा शुरू कर दी" जी हां यह कहना है, लखीमपुर खीरी के राजगढ़ मोहल्ले की रहने वाली अर्चना दीक्षित का, उनके इस कथन में ही छुपी है पर्यावरण की त्रासदी की पुख्ता वजह, जाहिर है की महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रत/पर्व में वट-सावित्री की यह पूजा बहुत प्रासंगिक है पूरे भारत वर्ष में, जहाँ  महिलाए बरगद के वृक्ष की पूजा करती है, अपने पतियों की आयु एवं स्वास्थ्य के लिए, इस व्रत को अवध में बरसाईतया बरसैताके नाम से भी पुकारा  जाता है,



कुछ दशक पहले की बात है, जब महिलायें बैलगाड़ियों पर सवार होकर कोसो दूर दो गावों के मध्य लगे किसी विशाल बरगद के वृक्ष की पूजा करने जाती थी, यह एक तरह का  सांस्कृतिक मेला था, और आस-पास की महिलाओं का आपस में संपर्क का एक मौक़ा भी, दरअसल वट सावित्री पूजा में हर एक बरगद को नहीं पूजा सकता, उस बरगद का विधि-विधान से जनेऊ हुआ हो और फिर किसी बगीचे या कुएं से विवाह कराया गया हो तभी वह बरगद पूजने योग्य माना जाता है वट सावित्री की पूजा में. किन्तु अब बदलाव और आधुनिक शैली के जीवनचर्या में महिलाओं ने बोनसाई बरगद को विकल्प मानकर पूजना शुरू कर दिया. इसके कई कारण है ख़त्म होते बरगद और जो मौजूद है उनका हिन्दू रीति से उन वृक्षों का संस्कार न होना. बरगद की डाल पूजने से बोनसाई की पूजा करने के इस चलन में वे विशाल बरगद के वृक्ष जिन पर सैकड़ों पक्षी व् जीव जंतु अपना बसेरा करते थे, आप्रसंगिक हो गए है. 

क्या इन बोनसाई बरगदों को जमीन मयस्सर होगी! हम इसी इंतज़ार में है. (DudhwaLive Desk)




शादाब रज़ा हिन्दुस्तान दैनिक में प्रेस फोटोग्राफर हैं. पत्रकारिता से गहरा नाता, लखीमपुर खीरी की संस्कृतियों, पर्यावरण और जंगलों की बेहतरीन तस्वीरनिगारी, लखीमपुर में निवास, इनसे shadabrazarepoter@gmail.com संपर्क किया जा सकता है.



 (सभी तस्वीरें: शादाब रज़ा)











Jun 9, 2013

बोलती कहानी "वो पुलिया वाली बरगदिया"

अब सुनिए उस " वो पुलिया वाली बरगदिया" की कहानी अर्चना चावजी की ज़ुबानी...

जी हाँ कृष्ण कुमार मिश्र का यह संस्मरण जिसे अर्चना चावजी ने अपनी आवाज दी है







 











 अर्चना चावजी पेशे से अध्यापन कार्य से जुडी है. ब्लॉग-जगत में इनका एक खासा स्थान है, पाडकास्टिंग विधा में कुछ बेहतर करने की कोशिश, साहित्य की नगरी इंदौर मध्यप्रदेश में निवास, इनका ब्लॉग है "मेरे मन की". इनसे archanachaoji@gmail.com पर संपर्क कर सकते है 






* DudhwLive Desk 

Jun 8, 2013

वो पुलिया वाली बरगदिया

वो पुलिया वाली बरगदिया 

आज वट-सावित्री की पूजा है। सोचा दरख्तों से इंसान के इन जज्बाती  रिश्तों पर कुछ कहूं, जो कहानी कहते है हमारी बुनियाद की, परंपराओं की, और उधेड़ते है अतीत की उन सिलवटों को जो वक्त की मुसलसल रफ़्तार में पीछे रह गयी , बात बरगद की हो रही है तो बताऊ की मैं इस दरख़्त से वाकिफ हुआ अपने बचपन के उस गाँव से जिसे मैनहन के नाम से पुकारा जाता है, इस जान-पहचान के सिलसिले में दो बड़े किस्से है, पहला है, वो पुलिया वाली बरगदिया ....जी यही नाम था  जब पिता जी को देर हो जाती कस्बे से घर आने में तो दादी यही कहती थी जाओ कोई देखकर आओ वो पुलिया वाली बरगदिया तक।।।हाँ मेरे बाबा भी यही कहते थे की चिंता मत करो वो पुलिया वाली बरगदिया तक आ गएँ होगे ..बस आते ही होगे अभी। और जब मैं बाजार जाता अपने बाबा की उंगली पकड् कर या उनके कन्धों पर बैठकर तब भी वो पुलिया वाली बरगदिया मिलती हमें रास्ते में और हम उसी की छाया में सुस्ताते। वैसे किसी छोटी चीज को स्त्रीलिंग में उच्चारित करना बड़ी सामान्य बात है हमारे यहाँ फिर चाहे वो छोटी पहाड़ी (पहाड़ ) हो या वृक्ष बरगदिया (बरगद)! (फ़ेमनिस्ट क्षमा करे...वैसे दुलार में भी चीजों को स्त्रीलिंग बना दिया जाता है) खैर बरगदिया के बड़े किस्से थे, कभी डाकुओं की मौजूदगी के अड्डे के रूप में, तो कभी भूत-प्रेतों के  उस बरगदिया पर निवास करने की कहानी,,,,,,पर हमारे गाँव के  लोगों को उस बरगदिया से दो-चार होना पडता था रोज, राह वही थी कस्बे की,,,,मैं उम्र में जब बडा हुआ तो क़स्बे के स्कूल में दाखिला दिलाया गया, फिर  क्या था मैं भी दो-चार होने लगा रोज उस पुलिया वाली बरगदिया से, दोपहर की तपती धूप में हम मुसाफिरों का वही तो आसरा थी, एक पूरे रास्ते भर में, हमारे गाँव मैनहन से मितौली के मध्य नहर की पगडंडी पर वह अकेला दरख़्त था। 

जब  इम्तिहान  होते तो रोज हम सभी बच्चे उस पुलिया वाली बरगदिया की झूलती डालों में लटक जाते और उसे चूमते यह हम बच्चों की आस्था का विषय था उस दरख़्त के लिए, वक्त गुजरता गया, हम हर रोज कुछ देर उसी बरगदिया की सरपरस्ती में सूरज की तपिश से महफूज रहते, उस बरगदिया के नीचे एक अधेड़ आदमी हमें रोज मिलता हाथ में हसिया या खुरपा या फिर बांका लिए (ये सभी औजार कृषि के लिए प्रयुक्त होते है), दरअसल यह दरख़्त जिस खेत के किनारे था, वह व्यक्ति उस खेत का मालिक था और इस बरगदिया का भी, तालीम के सफ़र में हमें गाँव से शहर आना हुआ, मगर शहर से गाँव जाने पर रास्ते में उस जगह से ही निकलना होता, बचपन की कोमल स्मृतियाँ  घुमड़  जाती उस बरगदिया को देखकर,,,,,,,कई वर्षों बाद मैं गुजर रहा था उसी राह पर तो उस दरख़्त की छाँव में बैठ गया और तभी वह आदमी भी अचानक खेत से आकर मेरे पास बैठ गया, जो कभी रोज मिलता था हमें, पर कुछ बोलता नहीं था तब,,, पर आज वह बोला "भैया यहि पुलियाक़ि आगे देखौ एक पीपल का पेड लगाई दिहे हन, कुछ सालन मा बड़ो हुई जाई, तौ लोगन का छाही मिलत रही, तब तक यह बरगदिया रहै न रहै, बुढ़ाई गयी है" 

मैं अभिभूत हो गया उस व्यक्ति के इस कथन से और कार्य से, मैं लगातार गाँव पहुंचता रहा उसी रास्ते, तब तक वह बरगदिया और वह निरंतर बढता पीपल का वृक्ष मुझे मिलता रहा और उन दोनो दरख्तों के साथ साथ वह आदमी भी मुझे याद आता रहा,,,,,जो आज भी विस्मृत नहीं हुआ है मेरे मन से,,,,,,,उसकी सोच ने मेरे बाल मन को बहुत प्रभावित किया था, अपने तमाम संस्कारों की फेहरिस्त में उस व्यक्ति का संस्कार भी अंकित हो गया मेरे मन में हमेशा के लिए ,,,,,,,,,,,अब राह बदल गयी, उस नहर की की पगडंडी के बजाए  हम ग्रामीण तारकोल से बनी सड़क पर गुजरने लगे जो नहर से उत्तर काफी दूर है, सोचता हूँ की उन दोनों से मिल आऊँ नहर वाली पगडंडीके रास्ते से उस पुलिया वाली बरगदिया और उस जवान पीपल से, पर कही मन में डर है, कि क्या मुझे वो दोनों वही पर मिलेगे? कही उस व्यक्ति की बात सही हुई तो,,,,,की बरगदिया बूढ़ी हो चली है, इस लिए नया पीपल का वृक्ष लगा दिया है कुछ दूर पर पुलिया के पार ताकि राहगीरों को छाया मिलती रहे, पता नहीं कब बरगदिया…। 

एक बात और इसी बरगद ने मुझे धरती के समानांतर फैलाव का सबक सिखाया बजाए इसके कि मैं अपनी जड़ों से दूर धरती के लम्बवत बढ़ता चला जाऊं उस निर्वात में, अपने लोगों से दूर, जहां सिर्फ खुद का कथित आभास व् दिवास्वप्न हो, यथार्थ से अलाहिदा ! 

 (,,,,,अभी इतना ही दूसरी कहानी दूसरी क़िस्त में)

कृष्ण कुमार मिश्र
ग्राम- मैनहन पोस्ट- ओदारा
जिला -खीरी 
09451925997


ये जंगल तो हमारे मायका हैं


चित्र साभार: अनुपम मिश्र
 दरख्तों से वो मोहब्बत जो रूहानी थी .....
गौरा देवी और उनका वो जनांदोलन जिसे हम चिपको के नाम से जानते है ।


‘चिपको मूवमेंट मेमोरियल फाउंडेशन’ ने विश्व पर्यावरण दिवस पर चिपको आंदोलन को राष्ट्रीय वन और पर्यावरण रक्षा आंदोलन का दर्जा देने की मांग की है। साथ ही आंदोलन की प्रणेता स्व. गौरा देवी को भारत रत्न और इस दौरान जेल गए आंदोलनकारियों को स्वतंत्रता सेनानियों की भांति पुरस्कृत करने की भी मांग की है। यह मांग कतई  अनुचित भी नहीं है। समाज में चेतना जागृत करने वाले समाज सेवियों और आन्दोलन कर्ताओं का उचित सम्मान होना ही चाहिए। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि आज चिपको आन्दोलन की प्रतिछवियां तक शेष नहीं हैं।.....
 उत्तराखंड में ही वनों का जबरदस्त विनाश हो रहा है। पेड़ कट रहे हैं पर कोई भी सक्रिय और ध्यान खींचने वाला आन्दोलन अब वहां नहीं है। 1925 में चमोली जिले के लाता गांव के एक मरछिया परिवार में  नारायण सिंह के घर में इनका जन्म हुआ था। गौरा देवी ने कक्षा पांच तक की शिक्षा भी ग्रहण की थी, जो बाद में उनके अदम्य साहस और उच्च विचारों का सम्बल बनी। मात्र ११ साल की उम्र में इनका विवाह रैंणी गांव के मेहरबान सिंह से हुआ, रैंणी भोटिया (तोलछा) का स्थायी आवासीय गांव था, ये लोग अपनी गुजर-बसर के लिये पशुपालन, ऊनी कारोबार और खेती-बाड़ी किया करते थे। जब गौरा देवी 22 साल की थीं और एकमात्र छोटा बेटा चन्द्रसिंह लगभग ढाई साल का, तब उनके पति का देहान्त हो गया। जनजातीय समाज में भी विधवा को कितनी ही विडम्बनाओं में जीना पड़ता है। गौरा देवी ने भी संकट झेले। गौरा देवी ने ससुराल में रह्कर छोटे बच्चे की परवरिश, वृद्ध सास-ससुर की सेवा और खेती-बाड़ी, कारोबार के लिये अत्यन्त कष्टों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपने पुत्र को स्वालम्बी बनाया, उन दिनों भारत-तिब्बत व्यापार हुआ करता था, गौरा देवी ने उसके जरिये भी अपनी आजीविका का निर्वाह किया।
 १९६२ के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बन्द हो गया तो चन्द्र सिंह ने ठेकेदारी, ऊनी कारोबार और मजदूरी द्वारा आजीविका चलाई, इससे गौरा देवी आश्वस्त हुई और खाली समय में वह गांव के लोगों के सुख-दुःख में सहभागी होने लगीं। हल जोतने के लिए किसी और पुरुष की खुशामद से लेकर नन्हें बेटे और बूढ़े सास-ससुर की देख-रेख तक हर काम उन्हें करना होता था। फिर सास-ससुर भी चल बसे। गौरा माँ ने बेटे चन्द्र सिंह को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना दिया। इस समय तक तिब्बत व्यापार बन्द हो चुका था। जोशीमठ से आगे सड़क आने लगी थी। सेना तथा भारत तिब्बत सीमा पुलिस का यहां आगमन हो गया था। स्थानीय अर्थ व्यवस्था का पारम्परिक ताना बाना तो ध्वस्त हो ही गया था, कम शिक्षा के कारण आरक्षण का लाभ भी नहीं मिल पा रहा था। चन्द्रसिंह ने खेती, ऊनी कारोबार, मजदूरी और छोटी-मोटी ठेकेदारी के जरिये अपना जीवन संघर्ष जारी रखा। इसी बीच गौरा देवी की बहू भी आ गई और फिर नाती-पोते हो गये। परिवार से बाहर गाँव के कामों में शिरकत का मौका जब भी मिला उसे उन्होंने निभाया। बाद में महिला मंगल दल की अध्यक्षा भी वे बनीं। 1972 में गौरा देवी रैणी महिला मंगल दल की अध्यक्षा बनीं। नवम्बर 1973 में और उसके बाद गोविंद सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट, वासवानन्द नौटियाल, हयात सिंह तथा कई दर्जन छात्र उस क्षेत्र में आये। रैणी तथा आस-पास के गाँवों में अनेक सभाएँ हुई। जनवरी 1974 में रैंणी जंगल के 2451 पेड़ों की निलामी की बोली देहरादून में लगने वाली थी। मण्डल और फाटा की सफलता ने आन्दोलनकारियों में आत्म-विश्वास बढ़ाया था। वहाँ अपनी बात रखने की कोशिश में गये चंडी प्रसाद भट्ट अन्त में ठेकेदार के मुन्शी से कह आये कि अपने ठेकेदार को बता देना कि उसे चिपको आन्दोलन का मुकाबला करना पड़ेगा। उधर गोविन्द सिंह रावत ने ‘आ गया है लाल निशान, ठेकेदारो सावधान’ पर्चा क्षेत्र में स्वयं जाकर बाँटा। अन्ततः मण्डल और फाटा की तरह रैंणी में भी प्रतिरोध का नया रूप प्रकट हुआ।
 चिपको आंदोलन, जिसने विश्वव्यापी पटल पर धूम मचाई, पर्वतीय लोगों की मंशा और इच्छाशक्ति का आयाम बना, विश्व के लोगों ने अनुसरण किया, लेकिन अपने ही लोगों ने भुला दिया। एक क्रांतिकारी घटना, जिसकी याद में देश भर में चरचा, गोष्ठिïयां और सम्मेलन आयोजित होने चाहिए थे, अफसोस! किसी को सुध तक नहीं रही। 'पहले हमें काटो, फिर जंगल ’ के नारे के साथ 26 मार्च, 1974 को शुरू हुआ यह आंदोलन उस वक्त जनमानस की आवाज बन गया था।
  1974 में शुरु हुये विश्व विख्यात की जननी, प्रणेता गौरा देवी की, जो चिपको वूमन  के नाम से मशहूर हैं। इसी बीच अलकनन्दा में १९७० में प्रलंयकारी बाढ़ आई, जिससे यहां के लोगों में बाढ़ के कारण और उसके उपाय के प्रति जागरुकता बनी और इस कार्य के लिये प्रख्यात पर्यावरणविद श्री चण्डी प्रसा भट्ट ने पहल की। भारत-चीन युद्ध के बाद भारत सरकार को चमोली की सुध आई और यहां पर सैनिकों के लिये सुगम मार्ग बनाने के लिये पेड़ों का कटान शुरु हुआ। जिससे बाढ़ से प्रभावित लोगों में संवेदनशील पहाड़ों के प्रति चेतना जागी। इसी चेतना का प्रतिफल था, हर गांव में महिला मंगल दलों  की स्थापना, गौरा देवी को रैंणी गांव की महिला मंगल दल का अध्यक्ष चुना गया। गौरा देवी पेड़ों के कटान को रोकने के साथ ही वृक्षारोपण के कार्यों में भी संलग्न रहीं, उन्होंने ऐसे कई कार्यक्रमों का नेतृत्व किया। आकाशवाणी नजीबाबाद के ग्रामीण कार्यक्रमों की सलाहकार समिति की भी वह सदस्य थी। सीमित ग्रामीण दायरे में जीवन यापन करने के बावजूद भी वह दूर की समझ रखती थीं। उनके विचार जनहितकारी थे जिसमें पर्यावरण की रक्षा का भाव निहित था, नारी उत्थान और सामाजिक जागरण के प्रति उनकी विशेष रुचि थी।  गौरा देवी जंगलों से अपना रिश्ता बताते हुये कहतीं थीं कि “जंगल हमारे मैत (मायका) हैं”।

आज पूरे भारत देश की सोचनीय स्थिति है। सब जगह सुनियोजित तरीके से जंगलों का विनाश किया जा रहा है और सरकार की भी उसमे मौन और कहीं मुखर सहमति है। आदिवासी क्षेत्र इसके निशाने पर हैं और उनके पुनर्वास तथा जीवन यापन, रोजगार की बाबत सोचने की किसी को फुरसत नहीं है। गौरा देवी का असली और सच्चा  सम्मान तो उनके द्वारा चलाये गए अभियान को आगे ले जाने, जन जन का आन्दोलन बनाने एवं समृद्ध और सक्रिय करने में है ‘चिपको मूवमेंट मेमोरियल फाउंडेशन’ को यह भी सोचना चाहिए।


शैलेन्द्र चौहान
संपर्क : पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद – 201014, email-shailendrachauhan@hotmail.com

Jun 5, 2013

लुटती नदियाँ और लुटते जंगल-बुंदेलखंड की यही कहानी !


मानवाधिकारों को ताक पर रखकर पर्यावरण की अनदेखी

प्रदेश में अवैध खनन पर रोक लगाने को लेकर जहां-तहां सुप्रीम कोर्ट एवं उच्च न्यायालय इलाहाबाद की चैखटें  सामाजिक कार्यकर्ता खटखटाते रहते हैं। सरकार भले ही अपने राजस्व की दुहाई देकर ब-हलफ न्यायमूर्ति बनकर बैठे न्यायधीशों के समक्ष झूठे और बे-बुनियादी जबाब देकर पल्ला झाड लेती है, लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि सूबे की सरकार समाजवादी हो या पूर्व की सरकारें वे पर्यावरण संरक्षण को लेकर तनिक भी संजीदा नहीं है।

बुंदेलखंड को खनिज संपदाओं के दोहन की बानगी के रूप में देखना प्रासांगिक होगा वो भी तब जबकि एक सूखाग्रस्त इलाके में प्रकृति की उथल-पुथल से जुझते बाशिंदे संसाधनों को बचाने की गुहार करते हो। मालूम रहे कि जब सरकार पहरेदार और ठेकेदार माफिया बन जाए तो अवैध खनन को रोकना किसी भी कानून के नियमों के बस में नहीं है। बुंदेलखंड के बांदा जनपद का हाल यूं ही है जहां नदियों का सीना चीरकर बेखौफ खनन माफिया बालू व मौरम का उत्खनन कर रहे हैं। उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दाखिल जनहित याचिका 6798/2011 के आदेश व सुप्रीम कोर्ट के 27 फरवरी 2012, हाईकोर्ट इलाहाबाद के एक और अन्य आदेश 1 अक्टूबर 2012 पर गौर करें तो बिना पर्यावरण सहमति प्रमाण पत्र के खनन गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है। यहां तक की ईंट-भट्ठों की मिट्टी खुदाई पर भी आदेश के अनुपालन में पर्यावरण एनओसी के बगैर 2 मीटर से अधिक गहराई पर खनन पूरी तरह वर्जित है। बावजूद इसके कानून को अपनी पाजेब बनाकर क्या बालू माफिया और क्या ईंट-भट्ठों के मालिक बेधड़क पर्यावरण की अस्मिता को चुनौती देते नजर आते है।

उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व आयुक्त एवं प्रमुख सचिव अखंड प्रताप सिंह ने 30 जनवरी 2001 को प्रशासनिक स्तर पर सभी आयुक्तों व जिलाधिकारियों को पत्र जारी करते हुए कहा था कि शासकीय विभाग, सार्वजनिक उपक्रम, स्थानीय निकाय, विकास प्राधिकरण, निजी कंपनी व स्वयं व्यक्ति भारी मात्रा में अवैध खनन करके पर्यावरण को क्षति पहुंचा रहे हैं। सीएजी की रिपोर्ट 2011 के मुताबिक बुंदेलखंड में खनिज संपदा से 510 करोड़ रुपए राजस्व की प्राप्ति होती है, लेकिन वर्ष 2011 में 258 करोड़ रुपए की रायल्टी सीधे तौर पर माफियाओं व गुंडा टैक्स का हिस्सा बनकर रह गई। 



बांदा जिले के नरैनी क्षेत्र में मध्य प्रदेश की सीमा से लगे हुए नदी घाट मसलन नसेनी, पुकारी, नरसिंहपुर, पैगंबरपुर, परेई घाट में बालू पोकलैड-लिफ्टर मशीनों से निकालकर एमपी की बालू और यूपी का रवन्ना चलाने का काम भी किया जाता है। खनन का यह काला कारोबार सरकार से लेकर दबंग ठेकेदार तक जग-जाहिर है। वन विभाग के आलाधिकारी विभागीय खानापूर्ति करके एनओसी जारी करते हैं, जबकि ऐसे नदी क्षे़त्रों में खनन प्रक्रिया प्रतिबंधित है जो घाट वन क्षे़त्र में आते हैं। बांदा जिले के राजघाट व हरदौली घाट में तो नदी की धारा को बांधकर बालू का उत्खनन किया जा रहा है और स्थानीय जिला प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगती हैं। इन बालू खदानों में काम करने वाले मजदूर मध्य प्रदेश के सतना, पन्ना, भिंड, मुरैना से गरीबी और मुफलिसी के चलते रोजगार की तलाश में पलायन करके आते हैं। आठ घंटे लगातार नदी की धारा में खड़े होकर मजदूरी करने के बाद उन्हें दो वक्त की रोटी और 2 सौ रुपए दिहाड़ी मजदूरी दी जाती है। सारे मानवाधिकार आयोग, मानवाधिकार कार्यकर्ता इन तथ्यों से गाहे-बगाहे वाकिफ भी रहते है मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे यह सोंचकर शायद वे भी इन बेबस कामगारों को उनके हालत पर छोड़ने के लिए मजबूर है। पर्यावरण के साथ एक सूखा जनित क्षे़त्र में नदियों के साथ यह प्राकृतिक दुराचार मानवीय संवेदना को तार-तार करने का प्रमाण है। तो क्या हुआ कि हम वर्ष के एक दिन वैश्विक स्तर पर विश्व पर्यावरण दिवस मनाकर अपनी रस्म अदायगी पूरी कर देगे। नदियां और जंगल लुटते रहेगे उसी तरह जैसे कि लुटते है लोकशाही में आम आदमी के नैतिक अधिकार। 
   
 आशीष सागर 
ashish.sagar@bundelkhand.in

उदयपुर राजस्थान में तालाबों को बचाने की मुहिम

पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर नागरिक संवाद


उदयपुर, 4 जून।  विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर उदयपुर के नागरिको ने संकल्प लिया की वे झीलों के मूल स्वरुप को बहाल करने ,उन्हें प्रदुषण ,अतिक्रमण मुक्त करने .आयड नदी को सुधारने में हर संभव नागरिक प्रयास करेंगे।झीलों,छोटे तालाबो व आयद नदी को सुधारने में सहभागी प्रशाशनिक अधिकारियों ,जिम्मेदार अफसरों व राजनीतिज्ञों का साथ देंगे,लेकिन गड़बड़ियो के जिम्मेदारो को आइना भी दिखाएँगे।

पिछोला झील किनारे माजी के मंदिर द्वार पर डॉ मोहन सिंह मेहता मेमोरियल,झील संरक्षण समिति,झील हितेषी मंच, चांदपोल नागरिक समिति वनश्री विकास परिषद्,कृति सेवा संस्थान,पर्यावरण शिक्षा समन्वय समिति, पहल संस्थान  ,गाँधी स्मृति मंदिर,समिधा संस्थान के सयुक्त तत्वाधान में हुए नागरिक संवाद में जागरूक नागरिको ने झीलों,तालाबो,पहाडो,बाग़ बगिचोकी दुर्दशा पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

संवाद में डॉ तेज राजदान व अनिल मेहता ने कहा कि झीलों तालाबो को छोटा करने के प्रयासों के पीछे गहरा भ्रष्टाचार व षड्यंत्र है,झीलों के किनारे जैव विविधता के पोषक है,अतः इन्हें बचाना जरुरी है।

नन्द किशोर शर्मा व तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि एन एल सी पी के लगभग साठ करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद पानी की गुणवत्ता में कोई सुधर नहीं आना चित जनक है ,योजना के क्रियांन्वयन में लगी एजेंसियो को इस तथ्य को नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहिए।

हांजी सदार मोहम्मद व  स्वामी सगरानंद सरस्वती ने कहा की झीलों तालाबो में कचरा गन्दगी विशर्जन  करनेवालों को नागरिक और शासन मिलकर रोक सकते है।

चन्द्र गुप्त सिंह चौहान व इंदु शेखर व्यास ने कहा की झीलों में पड़ी सीवरेज लाइन को बहार निकालना जरुरी है।उन्होंने स्थानीय लोगो से अपनी भूमिका और अधिक बढ़ने का आग्रह किया।प्रकाश तिवारी व सत्यपाल सिंह डोडियार ने कहा की गुलाब बाग़ को व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र नहीं बनाने दिया जायेगा।गुलाब बाग़ पर्यावरण व  जैव विविधता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

कमलेश पुरोहित और हाजी नूर मोहम्मद ने कहा की कुम्हारिया तालाब को कचरे मलबे से मुक्त करना अति आवश्यक है।कुम्हारिया तलब भी हमारी ऐतिहासिक धरोहर है।पी  एस चोहान व मनीष पालीवाल ने  सीवरेज से भू जल प्रदूषित होने का मुद्दा उठाया। नितेश सिंह ने पोलिथिन पर प्रभावी नियंत्रण की मांग की। सुशिल दशोरा ने कहा की बढ़ता लालच ही झीलों को बर्बाद कर रहा है।

झूठन नहीं छोड़ने का संकल्प
संवाद के पश्चात उपस्थित नागरिको ने संकल्प लिया की वे झूठन नहीं छोड़ेंगे।देश की एक बड़ी आबादी अन्न व खाद्यांह की कमी से जूझ रही है वाही अन्न का व्यर्थ करना पर्यावर पर भी खतरा है।

अनिल मेहता 
09414168945                                                                          
 नन्द किशोर शर्मा
09414160960
                                                                                                 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था