International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Nov 30, 2011

दुधवा के गैंडों पर मड़राता खतरा

लापरवाही की भेंट चढ़ा दुधवा का गैंडा
-डी0पी0 मिश्रा

पलियाकलां-खीरी। दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की एकमात्र अद्रितीय गैंडा पुनर्वास परियोजना के गैंडों का भविष्य सुरक्षित नहीं रह गया है इसका प्रमुख कारण है कि बीते दिवस गैंडा इकाई परिक्षेत्र में मरे गैंडा का शव एवं कंकाल पड़ा रहा उसे वनपशु खाते रहे उसकी भनक पार्क के कर्मचारियों को नहीं लग पाई यह अपने आप में ही विचारणीय प्रश्न है साथ ही गैंडों की मानीयटरिंग किए जाने का दावा भी खोखला साबित हो गया है। इस मामले को गंभीरता से लेकर प्रमुख वन संरक्षक (वंयजीव) ने कहा है कि जांच के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृतित न हो सके।
एक अप्रैल 1984 को दुधवा नेशनल पार्क में पूर्वजों की भूमि पर पुनर्वासित करने की विश्व में एक अनूठी गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की गई थी। डेढ़ दर्जन हाथियों के बदले में आसाम से लाए गए छह सदस्यीय गैंडा परिवार के साथ ही सन् 1985 में सोलह हाथियों के बदले नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से चार मादा गैंडों को लाया गया था। तमाम उतार-चढ़ाव के झझांवटों को झेलने के बाद दुधवा में गैंडा परिवार बढ़ता चला गया। पितामह बांके नामक गैंडा से शुरू हुई वंशवृद्वि अब चैथी पीढ़ी तक पहुंच गई है। वर्तमान में सात नर, 15 मादा एवं नौ बच्चे यानी 31 सदस्यीय गैंडा परिवार पर्यटकों को आकर्षण का केंद्र विंदु बना हुआ है अगर यहां बच्चों समेत युवा दस गैंडा असमय कालकवति न होते तो इनकी संख्या 40 हो सकती थी। गैंडा पुनर्वास परियोजना बनाने वालों ने यहां तीस गैंडो को बाहर से लाकर बसाने और उसके बाद फैंस हटाकर उनको खुले जंगल में छोड़ देने का सपना संजोया था। उनका यह उददेश्य तो पूरा नहीं हुआ। लेकिन पितामह गैंडा की बढ़ती संतानों के कारण योजना सफलता के पायदान पर चढ़ती जा रही है। एक ही पिता की संताने होने के कारण गैंडा परिवार पर अंतःप्रजनन यानी इनब्रीडिंग का खतरा मंडराने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे निपटने के लिए आवश्यक हो गया है कि गैंडो को बाहर से लाया जाए। इस विकट समस्या से छुटकारा पाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है वरन् यहां के गैंडों का ही भविष्य सुरक्षित रखने में पार्क प्रशासन असफल हो रहा है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि नेपाल में सोमवार को गैंडा सींग वरामद होने के बाद वहां से आई सूचना के बाद हरकत में आए पार्क प्रशासन ने दो मुलजिमों को पकड़ कर उनकी निशानदेही पर गैंडा इकाई परिक्षेत्र से एक गैंडा का शव कंकाल की दशा वाला बरामद किया जो करीव एक-डेढ़ माह पुराना है। बेस कैंप से एक-डेढ़ किमी की दुरी पर गैंडा शव पड़ा रहा उसे वनपशु खाते रहे उसकी भनक कर्मचारियो को नहीं लग पाई। इससे स्पष्ट हो जाता है कि गैंडों की मानीयटरिंग के नाम पर मात्र खानापूर्ति की जा रही है अगर प्रापर मानीयटरिंग हो रही होती यह जरूर पता लग जाता कि एक गैंडा गायव है। इस लापरवाही का नतीजा यह निकला कि शिकारी अपने मकसद में काम्याव हो गए और उसका सींग नेपाल तक पहुंचाने में भी सफल रहे जिसकी भनक पार्क प्रशासन को नहीं लग पाई। पार्क कर्मचारियों की इस लापरवाही एवं उदासीनता को  गंभीरता से लेकर प्रमुख वन संरक्षक  (वंयजीव) जेबी पटनायक ने कहा है कि जांच के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृतित न हो सके। देखना यह है कि इस वात पर कितना अमल किया जाता है या फिर दुधवा के गैंडा लापरवाही की भेंट चढ़ते रहेगें इस बात को आने वाला भविष्य तय करेगा। 


दुधवा के नाम दर्ज है कीर्तिमान

पलियाकलां। पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा को 25 साल पहले एक अप्रैल 1984 को तराई क्षेत्र की जन्मभूमि पर उनको बसाया गया था। किसी वन्यजीव को पुनर्वासित करने का यह गौरवशाली इतिहास विश्व में केवल दुधवा नेशनल पार्क ने बनाया है। विश्व की यह एकमात्र ऐसी परियोजना है जिसमें 106 साल बाद गैडों को उनके पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित कराया गया है। गंगा के तराई क्षेत्र में सन् 1900 में गैंडा का आखिरी शिकार इतिहास में दर्ज है, इसके बाद गंगा के मैदानों से एक सींग वाला भारतीय गैंडा विलुप्त हो गया था।


भारतीय जंगलों में घूम रहे हैं नेपाली गैंडा
पलियाकला। दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किशनपुर वनपशु बिहार तथा नार्थ-खीरी वन प्रभाग की संपूर्णानगर बनरेंज के जंगल और उससे सटे खेतों में पिछले करीब एक साल से मादा गैंडा अपने एक बच्चे के साथ घूम रही है। इसके अलावा साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन के गोला के जंगलों में भी इस साल एक गैंडा देखा गया है। बन विभाग एवं पार्क प्रशासन इसकी सुरक्षा एवं निगरानी करने के बजाय यह कहकर अपना पल्लू झटक रहा है कि यह गैंडा नेपाल की शुक्लाफांटा सेंक्चुरी का है, जो पीलीभीत के लग्गा-भग्गा जंगल से होकर आया है और घूम-फिर कर वापस चला जाएगा।



कर्मचारियों के प्रशिक्षण की नही है व्यवस्था

पलियाकला। दुधवा के जंगलों में स्वच्छंद विचरण करने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार का जीवन हमेशा खतरों से घिरा रहता है, क्योंकि इनकी रखवाली व सुरक्षा में तैनात पार्ककर्मियों को निगरानी करना तो सिखाया जाता है किंतु बाहर भागे गैंडा को पकड़कर वापस लाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। इन अव्यवस्थाओं के कारण विगत एक दशक से तीन नर एवं दो मादा गैंडा उर्जाबाड़ के बाहर दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र की गेरुई नदी के किनारे तथा गुलरा क्षेत्र के खुले जंगल समेत निकटस्थ खेतों में विचरण करके फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहें हैं।



सुविधाएं के अभावों के बीच रहते हैं कर्मचारी

पलियाकला। गैंडा पुनर्वास परियोजना क्षेत्र में आवश्यक मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते इसमें की जाने वाली तैनाती को कर्मचारी कालापानी की सजा मानते है। इससे वे पूरी कार्य क्षमता से डयूटी को अंजाम न ही देते हैं जिससे गैंडा इकाई परिक्षेत्र की सुरक्षाा प्रभावित होती है। जिससे गैंडों के जीवन पर भारतीय ही नहीं वरन् नेपाली शिकारियों की कुदृष्टि का हर वक्त खतरा मंडराता रहता है। इससे निपटने के लिए यह आवश्यक हो गया है कि परियोजना से जुड़े कर्मचारियों कों आवश्यक सहूलियतें दी जांए साथ ही साघन एवं ससांधनों को बढ़ाया जाए।



पशुचिकित्सक की नियुक्ति है जरूरी

पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क में प्रोजेक्ट टाइगर तथा गैंडा पुनर्वास परियोजना जैसी अति महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षी योजनाएं चल रही हैं। इसके बाद भी पार्क स्थापना के 34 साल बीत जाने के बााद भी विशेषज्ञ पशुचिकित्सक की नियुक्ति शासन द्वारा नहीं कर सका है। जबकि पूर्व के सालों में उपचार के अभाव में हाथी उसके बच्चे, गैंडों के बच्चे असमय मौत का शिकार बन चुके हैं। आए दिन नर गैंडो के बीच होने वाले प्रणय द्वन्द-युद्ध में गैंडों के घायल होने की घटनाएं होती रहती हैं। बिगत साल नर गैडों की ‘मीयटिंग फाइट’ में घायल हुई एक मादा गैंडा की उपचार के अभाव में असमय मौत हो चुकी है। दुर्घटना में घायल होने उनके उपचार के लिए अथवा असमय मरने वाले वनपशु के शव के पोस्टमार्टम के लिए लखनउ, कानपुर, बरेली से डाक्टरों को बुलाना पड़ता है। जिससे दिक्कतें होती हैं एवं अधिक धन भी व्यय होता है। ऐसी दशा में दुधवा में विशेषज्ञ पशुचिकित्सक की नियुक्ति जरूरी मानी जा रही  है।

यहां तो उल्लुओं को ही उल्लू बनाया जा रहा है !

Juvenile- Barn Owl


अफ़्रीकन उल्लुओं की आमद ?
स्वर्ण पक्षी

अभी हाल में एक दैनिक ने उल्लुओं पर एक अलबेली खबर छापी, अविश्वसनीय व चौकाने वाली...उत्तर प्रदेश के तराई जनपद लखीमपुर खीरी के एक गांव में अफ़्रीकन उल्लुओं की मौजूदगी, मजे की बात यह हुई कि वन विभाग के कर्मचारी व आला अफ़सरान भी ...अफ़्रीकन उल्लुओं की मौजूदगी पर दबी जबान में हामी भरी और यह एलान कर दिया कि यह प्रजाति भारत में मौजूद किसी भी उल्लू प्रजाति से मेल नही खाती !

वैसे आप को पता होगा भारत में उल्लुओं की कतई कमी नही, मैं अगर अपनी बात कहूं तो गाहे-बगाहे मेरी उल्लुओं से भेट होती रहती है, मैने उल्लू बनते हुए भी देखा है और खुद भी उल्लू बना हूं ! अभी अभी हाल में मै उल्लू बनकर ? कही से अपने गृह जनपद पहुंचा ही था कि अखबार में छपी खबर "अफ़्रीकन उल्लू" सुर्खियों में थी ...तमाम अनदेखी-अनजानी प्रकृति की कृतियों पर जब शोर मचता है तो मुझे जरूर याद किया जाता है, लोगों के इसी खलूस की वजह से मैं उनकी उम्मीदों की खातिर उस अनदेखी-अनजानी कृति का ब्योरा खोजनें में अपने को मसगूल करता हूं ताकि उनकी अपेक्षाओं को पूरा कर सकूं और करता भी हूं। 

इस वाकये को सुनकर भी मैं उस जगह पर पहुंचा जो मेरे निवास से लगभग ७० किलोमीटर की दूरी पर है--सिंगाही कस्बे से ६ किलोमीटर दूर मोतीपुर गांव, जहां ये खूबसूरत उल्लूओं की मौजूदगी है, वहां पहुंच कर देखा तो उल्लुओं के चार बच्चे एक अधूरे पड़े मकान की टांड़ पर दुबके हुए थे। इनके माता पिता शायद भोजन की तलाश या लोगों की भीड़भाड़ की वजह से यहां से नदारत थे, गांव वालों के मुताबिक ये रात में वापस आ जाते है अपने बच्चों के पास। कुछ तस्वीरे लेने के बाद लोगों से जब गुफ़्तगूं की तो पता चला कि लोगो की सुगबुगाहट जब वन-अधिकारियों तक पहुंची की अजीब किस्म के उल्लू यहां पर है, तो आनन-फ़ानन  में वन-कर्मी वहां पहुंचे, उल्लुओं की किस्म न पहचान पाने पर वे इन बच्चों को उठाकर ले गये और कम्प्यूटर टेबल पर रखकर गूगल के सहारे से इन्हे पहचानने की कोशिश की पर विफ़ल रहे और कह दिया कि ये भारत के उल्लुओं की किस्म नही है, अपनी ही ? यहां की उल्लू प्रजाति को न पहचान पाना बड़ी चौकाने वाली बात है ! और इसे विदेशी बता दिया ! उल्लू तो उल्लू है किस्म से क्या फ़र्क फ़िर वह देशी हो या विदेशी ? खैर....ये तो उल्लुओं को उल्लू बनाने जैसी बात है, या फ़िर खुद उल्लू बनने की !



Barn Owl (Tyto alba stertens)  

दरसल इस उल्लूं को अंग्रेजी में बार्न आउल और वैज्ञानिक भाषा में टायटो अल्बा कहते है, यह एक बहुत ही खूबसूरत परिन्दा है, इसकी सूरत दिल-नुमा होने की वजह से इसे मोहब्बत का प्रतीक माना जाता है, और इस दिल-नुमा चेहरे के मध्य एक दरार टूटे हुए दिल्/धंसे हुए तीर की शक्ल अख्तियार करती है, इसके पंख सोने-चादीं की तरह चमक लिए हुए तमाम धब्बों से सजे हुए होते है, इसका अगला हिस्सा सफ़ेद रंग का होता है। 

वैसे इनकी सुन्दर व अदभुत बनावट की वजह से इन्हे तमाम नामों से जाना जाता है, चर्च आउल, केव आउल, डेथ आउल, स्टोन आउल, हिस्सिंग आउल, सिल्वर आउल, डेमन आउल, व्हाइट आउल इत्यादि, पर मैं इसे स्वर्णिम उल्लू यानि गोल्डेन आउल कहना ज्यादा पसन्द करूंगा। 

उल्लुओं की यह प्रजाति का प्राकृतिक वितरण लगभग पूरी दुनिया में है सिर्फ़ रेगिस्तानी इलाको एंव ध्रुवीय क्षेत्रों में इनकी नामौजूदगी होती है। एशिया, अफ़्रीका, एवं अमेरिका में इसकी तमाम उप-जातियां मौजूद है।

इनका आकार ३५ से.मी. से ४० से.मी. तक पंख फ़ैलाने पर इनका आकार ८५ से.मी. से ९४ से. मी. तक हो सकता है, इनका वजन तकरीबन ३००-३५० ग्राम तक हो सकता है, इनका प्रजनन काल स्थान व भोजन की उपलब्धता के हिसाब से बदलता रहता है..जैसे भारत के उत्तर प्रदेश की तराई में इन्होंने नवम्बर के महीनें में प्रजनन की शुरूवात की। मादा ४-६ अण्डे तक देती है और इनका अण्डे सेने का वक्त तकरीबन एक महीना तक होता है, इनके बच्चे ६०-७० दिनों में उड़ने लायक हो जाते है।

इनमें सुनने की अदभुत क्षमता होती है, इनकी आंखों के समीप कानों के छिद्र मौजूद होते है, और शिकार के वक्त ये शिकार आवाज को सुनकर उसे पकड़ने की माद्दा रखते है, इनके चेहरे की बनावट जो गोल-डिस्क की तरह होती है, शिकार की आवाज को रोककर कानों पहुंचाने में मदद करती है।

इनके शिकार करने में इनकी गोल-मटोल बटन की तरह आंखे महत्वपूर्ण किरदार अदा करती है, इन आखों की स्थिति दूरबीन की तरह होती है, याने बराबर में, इसी वजह से यह पक्षी अपने शिकार को दोनों आंखों से एक साथ देख सकता है, साथ ही यह अपने चेहरे को ३६० डिग्री पर घुमाने पाने की काबिलियत रखता है, जो शिकार को बचकर निकलने नही देती ।

ये सामन्यत: रात में ही भोजन की तलाश में निकलते है, क्यों कि रात के शान्त वातावरण में इनकी सुनने की दक्षता बढ जाती है, और रात में  देख पाने की क्षमता के कारण शिकार को आसानी से हासिल करते है। इनका मुख्य भोजन स्तनधारी जीव होते है, मुख्य रूप से चूहे । प्रजनन काल में यह कभी कभी दिन में भी शिकार करते है।
बिना आहट किए उड़ने की क्षमता, तेज नज़र और सुनने की अदभुत ताकत इन्हे बेहतरीन शिकारी होने की काबिलियत देता है।

बार्न आउल जंगलों के किनारे, घास के मैदानों, नये वृक्षारोपड़ में, मानव आबादी के आस-पास अपना आवास बनाते है। 

वैज्ञानिक संगठनों का सरंक्षण व पापुलेशन का निर्धारण इस प्रजाति के सन्दर्भ में चाहे जो हो पर मौजूदा परिस्थिति में यह प्रजाति खतरे में है, भारत के गांवों में या अन्य वन क्षेत्रों में यह सामन्य तौर पर दिखाई नही देते और हमारी नई पीढी इस स्वर्णिम परिन्दे से अपरिचित है। वजह है आवासों का नष्ट होना और अन्धाधुन्ध कीटनाशकों के प्रयोग से कृषि क्षेत्रों व उनके आस-पास के इलाकों में स्तनधारी जीवों जैसे चूहे आदि की कमी जो इनका मुख्य भोजन है। खेती के बदलते स्वरूप नें इस पक्षी का ही नही वरन हमारे गांवों की पूरी जैव-विविधता को ही उलट-पुलट दिया है, और इन हालातों में कोई भी जीव अपना जीवन चक्र पूरा कर पाने में अक्षम है। नतीजतन अनगिनत प्रजातियां इन स्थानों से या तो विलुप्त हो गई या पलायन गर गयी।






  • संपादक की कलम से ! 
  • कृष्ण कुमार मिश्र









दुधवा के सरंक्षित क्षेत्र में हुआ गैंडे का शिकार ?

दुधवा के राइनो क्षेत्र में  मिला मादा गैंडा का शव
मानीटरिंग का दावा खोखला गैंडो का जीवन असुरक्षित  
दुधवा से डी पी मिश्र की रिपोर्ट 
दुधवा नेशनल पार्क इतिहास में पहली बार सोनारीपुर वनक्षेत्र में एक मादा गैंडा के शव का क्षत विक्षत कंकाल पाया गया है जिसका सींग गायब मिला है। अनुमान लगाया जा रहा है कि गैंडा का शिकार करके सींग गायब किया। गायब कर उसे शिकारियों ने नेपाली तस्करों को बेंच दिया जिसकी नेपाल में बरामदगी हो चुकी है। सूचना पर दुधवा प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंच गए हैं। पशु चिकित्सकों द्वारा किए जाने वाले पोस्टमार्टम के बाद ही मौत के कारणों का पता लग पाएगा। दुधवा की टीम ने नेपाल वन विभाग द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर बसंतापुर कलां गांव से दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है।

सीमावर्ती नेपाल के कैलाली जिला वन विभाग ने सोमवार को धनगढ़ी शहर से तीन तस्करों को पकड़ कर उनके पास से गैंडा का सींग बरामद किया था। तस्करों ने पूछताछ में पलिया थाना के ग्राम बसंतापुर के दो व्यक्तियों से सींग हासिल करना स्वीकार किया था। इसकी सूचना आते ही दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन में हड़कंप मच गया। नेपाल वन अधिकारियों से संपर्क कर उनके द्वारा दी गई सूचना पर दुधवा की टीम ने ग्राम बसंतापुर कलां निवासी कुलदीप एवं सुरेश को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के दौरान उनके द्वारा सींग काटने की बात स्वीकार की गई साथ ही उनकी निशानदेही पर लगभग बीस दिन पुराना मादा गैंडा के शव का क्षत विक्षत कंकाल बरामद कर लिया गया। मादा गैंडा का शव दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर वनरेंज के बेसकैंप के उत्तर पूर्व दिशा में लगभग एक डेढ़ किमी दूर राइनो इलाका में बरामद हुआ है। यह वन क्षेत्र ऊर्जाबाड़ से संरक्षित गैंडा पुर्नवास परियोजना के तहत शामिल है। लगभग पंद्रह वर्षीय मादा गैंडा का शव करीब बीस दिनों तक जंगल में पड़ा रहा लेकिन इसकी भनक रेंज अथवा बेस कैंप के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को नहीं लग सकी। इस स्थिति ने यह पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि दुधवा प्रशासन द्वारा गैँडों की प्रतिदिन मानीटरिंग किए जाने का दावा पूरी तरह से खोखला है एवं कार्य मात्र खानापूर्ति के लिए कागजों पर ही चल रहे हैं। इससे दुधवा के गैंडों का जीवन असुरक्षित है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। गैंडा का शव मिलने की सूचना पर दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड निदेशक शैलेष प्रसाद, उपनिदेशक गणेश भट्ट, वार्डन ईश्वर दयाल, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के समन्वयक डा0 मुदित गुप्ता आदि वनाधिकारी मौके पर पहुंच गए और घटनास्थल का निरीक्षण किया। शव का पोस्टमार्टम पशु चिकित्साधिकारियों द्वारा किए जाने के बाद ही मौत के सही कारणों का पता लग पाएगा।

Nov 29, 2011

नेपाल में गैंडा सींग बरामद, तीन अपराधी गिरफ्तार

ये खतरे की घंटी है दुधवा के गैंडो के लिए.. 
डी पी मिश्र की रिपोर्ट --
सीमावती नेपाल के कैलाली जिला वन अधिकारियों ने गैंडा की सींग बरामद कर तीन मुलजिमों को गिरफ्तार किया है। पूछताछ के दौरान मुलजिमों ने स्वीकार किया है यह सींग दुधवा नेशनल पार्क के समीपवर्ती ग्राम बसंतापुर के एक इंडियन व्यक्ति से लिया है। इस खुलाशा से मामला काफी संगीन एवं सनसनीखेज इस कारण हो गया है कि दुधवा में गैंडा स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं।

लखीमपुर खीरी जिला के सीमावर्ती गौरीफंटा क्षेत्र से जुड़े नेपाल के जिला कैलाली के वन विभाग के डीएफओ राजेन्द्र भण्डारी ने मुखबिर की सूचना पर दलबल के साथ छापा मारकर गैंडा की सींग बरामद किया है। इसके साथ ही कैलाली जिला मुख्यालय धनगढ़ी निवासी मोहम्मद वसी सिद्दीकी (32), विनोद बिष्ट (28), लक्ष्मी चंद्र (40) को गिरफ्तार किया गया है।
 लगभग 850 ग्राम वजन वाले बरामद हुआ गैंडा ताजा बताया जा रहा है। पूछताछ में मुलजिमों ने बताया कि यह सींग इंडिया के जिला खीरी के थाना पलियाकलां क्षेत्र के ग्राम बसंतापुर के व्यक्ति से मिला है। डीएफओ के अनुसार मामले की छानबीन चल रही है। मालूम हो कि दुधवा नेशनल पार्क के समीप आबाद ग्राम बसंतापुर के व्यक्ति का नाम आने से मामला काफी संगीन एवं सनसनीखेज हो गया है। इसका मुख्य कारण है कि दुधवा नेशनल पार्क के सोनारीपुर वनक्षेत्र में गैंडा पुर्नवास परियोजना चल रही है इसमें इकतीस सदस्यीय गैंडा परिवार जंगल में स्वच्छंद विचरण कर रहा है। खास बात यह भी है कि बसंतापुर ग्राम से गैंडा परिक्षेत्र में आसानी से पहुंचा जा सकता है। ऐसी स्थिति में कहीं गैंडा का शिकार यहां तो नहीं किया गया है इस बात पर संदेह होना लाजिमी है। हालांकि नेपाल के जिला कैलाली की सीमा से सटे कंचनपुर जिला में शुक्लाफांटा सेंचुरी तथा वर्दिया जिला के राष्ट्रीय उद्यान में भी गैंडा पाए जाते हैं। बरामद गैंडा सींग कहां से और कैसे लाया गया इस बात का पूरा खुलाशा गहन जांच पड़ताल के बाद ही हो पाएगा।

Nov 28, 2011

यह उड़ने वाली हरियाली...

.आसमानी हरियाली की एक कथा-

तोतो की कहानी

...यूँ तो हम लौट रहे थे राजस्थान की राजधानी जयपुर से जहां की शहरी आबादी के मध्य भी हाउस क्रो (सफ़ेद गले वाला कौआ) और पी-काक यानि मोर के दर्शन राज-मार्गों पर भी हो रहे थे, भरतपुर वन्य जीव विहार भी अभी भी प्रवासी पक्षियों के इन्तजार में था, अब तलक वो विदेशी मेहमानों ने यहां दस्तक नही दी थी..शायद पानी की कमी इसका बड़ा कारण था ! केवलादेव में फ़लों वाले वृक्ष और झाड़ियां यहां तमाम स्थानीय पक्षी प्रजातियों को आश्रय दिए हुए है...घाना की यही विशेषता रंग-बिरंगी चिड़ियों को यहां बसेरा लेने के लिए आकर्षित करती है! मोटे तौर पर यहां पेन्टेड स्टार्क का प्रजनन चल रहा था, मोर अपने बच्चों के साथ वन्य जीव विहार में घूम रहे थे, और तोते बड़े मजे से कौआ-गोड़ी का मजा ले रहे थे...कौआ गोड़ी लाल रंग का एक फ़ल होता है...अम्मा ऎसा बताती है, ये स्थानीय शब्द है अवध का इस फ़ल का...!..हां बात तोतो की है यानि उस अदभुत आसमानी हरियाली की......



भरतपुर मथुरा मार्ग पर एक नदी पर बने ब्रिटिश-भारत के पुल के निकट एक विशाल वृक्ष जिस पर मड़राती हरियाली नें मुझे आकर्षित किया और वही मैं ठहर गया कुछ घंटों के लिए...उस पेड़ के ट्री-होल में तोतों ने घोसला बनाया था, और बारी-बारी से नर-मादा अपने बच्चों को चूंगा देने के लिए आते उनके उर्ध्वाधर होकर वृक्ष के तने पर रुके रहना उनके पंजों की बनावट का नतीजा था। अपनी संतति को सेने की यह आतुरता जो प्रकृति से मिली है हर जीव को उसने मुझे आकर्षित किया नतीजतन उन उड़ने वाली हरियाली की तमाम तस्वीरों के साथ उनका ब्योरा यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

Rose-ringed Parakeet (Psittacula krameri) तोतो की यह प्रजाति अभी भी सामन्यत: दिखाई देती है, इस पक्षी में नर के गले में एक लाल रंग के छल्ले जैसा निशान होता है, और इसकी तमाम सहोदर प्रजातियां जब कम हो रही है तब भी यह अपने को इस प्रतिकूल वातावरण में अपने को बचा पाने में कुछ कुछ सक्षम प्रतीत होता है। इसी प्रजाति की यह सभी तस्वीरे है, और इन्ही जनाब ने जगह जगह मुझे अपने दीदार कराये।


सामन्यता तोतो को सिटेसेन्ज (Psittacines) पक्षी कहते है, इनकी लगभग ३७२ किस्में है, ७८ जेनरा के अन्तर्गत, आर्डर Psittaciformes. ये मुख्यता उष्णकटिबंधीय प्रदेश एंव उपोष्णकटिबंधीय (मकर रेखा तथा कर्क रेखा से लगे हुए क्षेत्र) में पाये जाते है, यह आर्डर तीन परिवारों में विभक्त किया गया है-Psittacidae (true parrots), Cacatuidae (Cockatoos), एंव Strigopidae (newzealand parrots)- इनका वितरण Pantropical यानि ट्रापिक्स के दोनो तरफ़ है, अफ़्रीका, एशिया, और अमेरिका ।

झुकावदार चोच, मजबूत टांगे, व पंजे, नाखून (जाइगोडेक्टाइली- यानि २-३ आगे- २ पीछे की तरफ़ जो इन्हे किसी भी वृक्ष की टहनी पर मजबूती से रुके रहने में मदद करते है), ये विभिन्न रंगों से सजे हुए होते है, इनके आकार में लैंगिक असमानता ज्यादा नही होती, सभी तोते वृक्षों की खोह (holes) में घोसले बनाते है। और अण्डे देते है।

यह काफ़ी बुद्धिमान पक्षी है, और इन्सान की आवाज की नकल करने में माहिर, हर परिस्थिति में जीवन याप्न की क्षमता, बस मनुष्य की आवाज की नकल बना लेने की दक्षता ने इसके व्यापार को बढावा दिया और यह आसमानी हरियाली पिजड़ों में कैद की जाने लगी। इसका आहार मुख्यता, पुष्प, फ़ल, बीज या वृक्षों के अन्य हिस्से है।

तोतों की घटती आबादी अवैध व्यापार तो है ही, साथ ही उनके प्राकृतिक आवासों के नष्ट हो जाने से इस खूबसूरत प्रजाति पर संकट आ गया है, अब न तो विशाल वृक्ष बचे है जिनकी खोहों में ये परिन्दे अपने घोसले बनाये और न ही फ़लदार वृक्ष जिससे ये अपना और अपनी सन्तति का पोषण कर सके, अब सरकारे भी सड़क के किनारे एसे वृक्षों और झाड़ियों का रोपड़ कर रही है, जिनमें न तो फ़ल आते है और न ही उनमें पक्षियों के बसेरा करने लायक जगह होती है, यहां आप को बताना चाहूंगा कि ब्रिटिश भारत में सड़कों के किनारे, नीम, जामुन, पाकड़, बरगद, आम, व पीपल जैसे विशाल वृक्षों का रोपड़ कराया जाता था, जो आज भी कही कही मौजूद है, यदि आप इसका सुन्दर नमूना देखना चाहे तो पीलीभीत से बरेली मार्ग पर सड़क के दोनों तरफ़ पाकड़ जैसे विशाल वृक्ष मौजूद है जिनके असख्य फ़लों पर तमाम पक्षी प्रजातियां अपना पोषण करती है, और शाखाओं की खोहों में अनगिनत जीव बसेरा करते है।


लखीमपुर खीरी के तराई जनपद में मैं बचपन में सांझ के वक्त जब छत पर होता तो आसमान की तरफ़ सिर उठाने पर हजारों की तादाद में तोते अपने रैन-बसेरों की तरफ़ जाते दिखाई देते है, और आज एक भी तोता सांझ को आसमान से नदारद है क्यों...नष्ट कर दिए गये आवास और इनके भोजन की वजह से यह एक सवाल है जो सिर्फ़ तोतों के लिए नही तमाम पक्षी प्रजातियों के लिए जो अपना जीवन-चक्र चलाने की जद्दोजहद में है।

खीरी जनपद की बात चली तो एक और गौर तलब बात है कि यहां पलाश के तमाम बड़े जंगल हुआ करते थे , और ये भूमियां या परती भूमि के अन्तर्गत आती थी या फ़िर ग्राम-सभाओं की जमीन....यहां अवैध पट्टे व मानव आबादी की बसाहट ने इन पलाश के बनों को नष्ट कर दिया, पलाश के बूढ़े वृक्षों में तमाम खोहे हो जाते है और यही खोहे इन तोतो या अन्य पक्षी प्रजातियों को घोसले बनाने और अपनी सन्तति को आगे बढाने में मदद करती थी।...किन्तु अब ऎसा कुछ नही बचा न ही खूबसूरत पलाश और न ही ये तोते...और न ही वह सुन्दर जुगलबन्दी...लाल और हरे रंग की !




कृष्ण कुमार मिश्र ( बस यूं ही घूमते रहना और प्रकृति की सुन्दरता और अदभुत अभिव्यक्तियों के साथ साथ प्रकृति की ही एक रचना यानि मनुष्य की मनोदशाओं का असफ़ल? अध्ययन करना... मुझसे सम्पर्क करे krishna.manhan@gmail.com पर !)

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था