डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Nov 30, 2011

यहां तो उल्लुओं को ही उल्लू बनाया जा रहा है !

Juvenile- Barn Owl


अफ़्रीकन उल्लुओं की आमद ?
स्वर्ण पक्षी

अभी हाल में एक दैनिक ने उल्लुओं पर एक अलबेली खबर छापी, अविश्वसनीय व चौकाने वाली...उत्तर प्रदेश के तराई जनपद लखीमपुर खीरी के एक गांव में अफ़्रीकन उल्लुओं की मौजूदगी, मजे की बात यह हुई कि वन विभाग के कर्मचारी व आला अफ़सरान भी ...अफ़्रीकन उल्लुओं की मौजूदगी पर दबी जबान में हामी भरी और यह एलान कर दिया कि यह प्रजाति भारत में मौजूद किसी भी उल्लू प्रजाति से मेल नही खाती !

वैसे आप को पता होगा भारत में उल्लुओं की कतई कमी नही, मैं अगर अपनी बात कहूं तो गाहे-बगाहे मेरी उल्लुओं से भेट होती रहती है, मैने उल्लू बनते हुए भी देखा है और खुद भी उल्लू बना हूं ! अभी अभी हाल में मै उल्लू बनकर ? कही से अपने गृह जनपद पहुंचा ही था कि अखबार में छपी खबर "अफ़्रीकन उल्लू" सुर्खियों में थी ...तमाम अनदेखी-अनजानी प्रकृति की कृतियों पर जब शोर मचता है तो मुझे जरूर याद किया जाता है, लोगों के इसी खलूस की वजह से मैं उनकी उम्मीदों की खातिर उस अनदेखी-अनजानी कृति का ब्योरा खोजनें में अपने को मसगूल करता हूं ताकि उनकी अपेक्षाओं को पूरा कर सकूं और करता भी हूं। 

इस वाकये को सुनकर भी मैं उस जगह पर पहुंचा जो मेरे निवास से लगभग ७० किलोमीटर की दूरी पर है--सिंगाही कस्बे से ६ किलोमीटर दूर मोतीपुर गांव, जहां ये खूबसूरत उल्लूओं की मौजूदगी है, वहां पहुंच कर देखा तो उल्लुओं के चार बच्चे एक अधूरे पड़े मकान की टांड़ पर दुबके हुए थे। इनके माता पिता शायद भोजन की तलाश या लोगों की भीड़भाड़ की वजह से यहां से नदारत थे, गांव वालों के मुताबिक ये रात में वापस आ जाते है अपने बच्चों के पास। कुछ तस्वीरे लेने के बाद लोगों से जब गुफ़्तगूं की तो पता चला कि लोगो की सुगबुगाहट जब वन-अधिकारियों तक पहुंची की अजीब किस्म के उल्लू यहां पर है, तो आनन-फ़ानन  में वन-कर्मी वहां पहुंचे, उल्लुओं की किस्म न पहचान पाने पर वे इन बच्चों को उठाकर ले गये और कम्प्यूटर टेबल पर रखकर गूगल के सहारे से इन्हे पहचानने की कोशिश की पर विफ़ल रहे और कह दिया कि ये भारत के उल्लुओं की किस्म नही है, अपनी ही ? यहां की उल्लू प्रजाति को न पहचान पाना बड़ी चौकाने वाली बात है ! और इसे विदेशी बता दिया ! उल्लू तो उल्लू है किस्म से क्या फ़र्क फ़िर वह देशी हो या विदेशी ? खैर....ये तो उल्लुओं को उल्लू बनाने जैसी बात है, या फ़िर खुद उल्लू बनने की !



Barn Owl (Tyto alba stertens)  

दरसल इस उल्लूं को अंग्रेजी में बार्न आउल और वैज्ञानिक भाषा में टायटो अल्बा कहते है, यह एक बहुत ही खूबसूरत परिन्दा है, इसकी सूरत दिल-नुमा होने की वजह से इसे मोहब्बत का प्रतीक माना जाता है, और इस दिल-नुमा चेहरे के मध्य एक दरार टूटे हुए दिल्/धंसे हुए तीर की शक्ल अख्तियार करती है, इसके पंख सोने-चादीं की तरह चमक लिए हुए तमाम धब्बों से सजे हुए होते है, इसका अगला हिस्सा सफ़ेद रंग का होता है। 

वैसे इनकी सुन्दर व अदभुत बनावट की वजह से इन्हे तमाम नामों से जाना जाता है, चर्च आउल, केव आउल, डेथ आउल, स्टोन आउल, हिस्सिंग आउल, सिल्वर आउल, डेमन आउल, व्हाइट आउल इत्यादि, पर मैं इसे स्वर्णिम उल्लू यानि गोल्डेन आउल कहना ज्यादा पसन्द करूंगा। 

उल्लुओं की यह प्रजाति का प्राकृतिक वितरण लगभग पूरी दुनिया में है सिर्फ़ रेगिस्तानी इलाको एंव ध्रुवीय क्षेत्रों में इनकी नामौजूदगी होती है। एशिया, अफ़्रीका, एवं अमेरिका में इसकी तमाम उप-जातियां मौजूद है।

इनका आकार ३५ से.मी. से ४० से.मी. तक पंख फ़ैलाने पर इनका आकार ८५ से.मी. से ९४ से. मी. तक हो सकता है, इनका वजन तकरीबन ३००-३५० ग्राम तक हो सकता है, इनका प्रजनन काल स्थान व भोजन की उपलब्धता के हिसाब से बदलता रहता है..जैसे भारत के उत्तर प्रदेश की तराई में इन्होंने नवम्बर के महीनें में प्रजनन की शुरूवात की। मादा ४-६ अण्डे तक देती है और इनका अण्डे सेने का वक्त तकरीबन एक महीना तक होता है, इनके बच्चे ६०-७० दिनों में उड़ने लायक हो जाते है।

इनमें सुनने की अदभुत क्षमता होती है, इनकी आंखों के समीप कानों के छिद्र मौजूद होते है, और शिकार के वक्त ये शिकार आवाज को सुनकर उसे पकड़ने की माद्दा रखते है, इनके चेहरे की बनावट जो गोल-डिस्क की तरह होती है, शिकार की आवाज को रोककर कानों पहुंचाने में मदद करती है।

इनके शिकार करने में इनकी गोल-मटोल बटन की तरह आंखे महत्वपूर्ण किरदार अदा करती है, इन आखों की स्थिति दूरबीन की तरह होती है, याने बराबर में, इसी वजह से यह पक्षी अपने शिकार को दोनों आंखों से एक साथ देख सकता है, साथ ही यह अपने चेहरे को ३६० डिग्री पर घुमाने पाने की काबिलियत रखता है, जो शिकार को बचकर निकलने नही देती ।

ये सामन्यत: रात में ही भोजन की तलाश में निकलते है, क्यों कि रात के शान्त वातावरण में इनकी सुनने की दक्षता बढ जाती है, और रात में  देख पाने की क्षमता के कारण शिकार को आसानी से हासिल करते है। इनका मुख्य भोजन स्तनधारी जीव होते है, मुख्य रूप से चूहे । प्रजनन काल में यह कभी कभी दिन में भी शिकार करते है।
बिना आहट किए उड़ने की क्षमता, तेज नज़र और सुनने की अदभुत ताकत इन्हे बेहतरीन शिकारी होने की काबिलियत देता है।

बार्न आउल जंगलों के किनारे, घास के मैदानों, नये वृक्षारोपड़ में, मानव आबादी के आस-पास अपना आवास बनाते है। 

वैज्ञानिक संगठनों का सरंक्षण व पापुलेशन का निर्धारण इस प्रजाति के सन्दर्भ में चाहे जो हो पर मौजूदा परिस्थिति में यह प्रजाति खतरे में है, भारत के गांवों में या अन्य वन क्षेत्रों में यह सामन्य तौर पर दिखाई नही देते और हमारी नई पीढी इस स्वर्णिम परिन्दे से अपरिचित है। वजह है आवासों का नष्ट होना और अन्धाधुन्ध कीटनाशकों के प्रयोग से कृषि क्षेत्रों व उनके आस-पास के इलाकों में स्तनधारी जीवों जैसे चूहे आदि की कमी जो इनका मुख्य भोजन है। खेती के बदलते स्वरूप नें इस पक्षी का ही नही वरन हमारे गांवों की पूरी जैव-विविधता को ही उलट-पुलट दिया है, और इन हालातों में कोई भी जीव अपना जीवन चक्र पूरा कर पाने में अक्षम है। नतीजतन अनगिनत प्रजातियां इन स्थानों से या तो विलुप्त हो गई या पलायन गर गयी।






  • संपादक की कलम से ! 
  • कृष्ण कुमार मिश्र









3 comments:

Anonymous said...

This is really the amazing story .Thanks to you resolve the misunderstanding of this owl otherwise people make difficult their life to watch think of an african owl.Keep it up and good luck for the dudhwalive.com FROM URUJ SHAHID

आशीष तिवारी said...

भाई बहुत अच्छी जानकारी दी. आपका प्रयास अतुलनीय है. मैं आपका मुरीद हुआ.

अमृत पाल सिंघ 'अमृत' said...

आपकी लिखने की प्रतिभा का कायल हुआ... इस लेख के लिए धन्यवाद.

आपका,

एक पंजाबी उल्लू...
अमृत पाल सिंघ 'अमृत'

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विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
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देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

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