डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Aug 2, 2010

क्या बीमार व बूढ़े जीवों को दया मृत्यु देना उचित होगा?

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* मानवीय संवेदनाओं के लोप ने ली एक हाथी की जान:

उत्तर प्रदेश के एकमात्र विश्व विख्यात दुधवा नेशनल पार्क में अपने साथी हाथियों की कृपा पर घिसट घिसट कर जीवन का अंतिम चरण गुजारने वाले गजराज सुमित पर इंसानों को रहम नहीं आया लेकिन भगवान ने इसकी लाचारी और बेवशी पर ‘दया दृष्टि‘ डालकर उसे अपने पास बुला लिया।
लेकिन सुमित की मौत ने एक बार फिर सूबे के वन विभाग की नौकरशाही की कार्यप्रणाली को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह बात इससे भी प्रमाणित हो जाती है कि राजकीय सेवा से रिटायर हुए हाथी सुमित के अंधेपन को उसके भाग्य की नियति मानकर सूबे के आला अफसरों ने उस पर खर्च होने वाला वजट साथ में नहीं भेजा और दुधवा पार्क प्रशासन ने जरूरत होते हुए भी विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों से उसका उपचार कराने की जहमत तक नहीं उठायी।

लखनउ प्राणी उद्यान में जवानी के 27 साल गुजारने वाले गजराज सुमित को बुढ़ापे में जब वह अंधा होकर लाचार हो गया तब उसे राजकीय सेवा से रिटायर करके दुधवा नेशनल पार्क इस प्रत्याशा में भेज दिया गया कि वह जंगल के प्राकृतिक वातावरण में रहकर अपना बाकी का जीवन आराम से गुजार देगा। वनाधिकारियों की यह मंशा तो ठीक थी, परंतु उन्होंने उसकी अन्य बीमारियों को नजरंदाज किया ही, साथ में उस पर होने वाले खर्च का बजट नहीं भेजा। जिसका परिणाम यह निकला कि पहले से उसके शरीर में मौजूद रही बीमारियां अपना दायरा बढ़ाती चली गई, जिससे सुमित और भी लाचार एवं वेबश होता चला गया। इसके बाद भी सुमित का उपचार किसी भी विशेषज्ञ पशु चिकित्सक से नहीं कराया गया ? यह बात स्वयं में वनाधिकारियों की कार्यप्रणाली को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देती है। इसके अतिरिक्त वनाधिकारियों की लापरवाही का एक नमूना यह भी है, कि सुमित को यहां भेज तो दिया गया किंतु साथ में कोई भी रिकार्ड नहीं भेजा गया। जिससे यह पता लग सके कि सुमित को क्या-क्या परेशानियां थी अथवा वह किस बीमारी से ग्रस्त था। पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों की मानी जाए तो सुमित काफी समय से बीमार था और उसका सही एवं समुचित उपचार न होने के कारण शरीर के अंदरूनी अंगों ने शिथिल होकर धीरे-धीरे अपना काम करना बंद कर दिया और हृदय स्पंदन रुक जाने से उसकी मौत हो गई।
दुधवा नेशनल पार्क में समुचित देखभाल न होने से दिनों-दिन जीर्ण-शीर्ण दशा में पहुंचने वाले सुमित की लाचारी एवं वेबशी को देखकर जिल्लतभरी जिन्दगी से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से सृष्टि कंजरवेशन एण्ड वेलफेयर सोसाइटी उ0प्र0 के सेक्रेटरी डी0 प्रकाश ने देश के राष्ट्पति तथा सूबे के प्रमुख वन संरक्षक वंयजीव को पत्र भेजकर उसे ‘दया मृत्यु‘ दिए जाने की मांग की थी।
वाइल्ड लाइफ की दुनिया में यह अपने आप में पहला मौका था जब किसी वनपशु के लिए उसे जलालत भरी जिंदगी से मोक्ष दिलाने के लिए ‘दया मृत्यु‘ की मांग की गई थी। लेकिन यह सुमित के भाग्य की विडंबना ही कही जाएगी कि सूबे के नौकरशाहों ने उसपर न अपनी नजरें इनायत की, और न ही उसके उपचार की कोई समुचित व्यवस्था। सृष्टि कंजरवेशन एण्ड वेलफेयर सोसाइटी के सेक्रेटरी डी0 प्रकाश तल्खी से कहते हैं कि सुमित को अन्धा तो कुदरत ने किया लेकिन उसे लाचार और वेबश वनाधिकारियों की उदासीनता और लापरवाहियों ने कर दिया। अगर वनाधिकारी अपनी जुम्मेदारियों का निर्वाहन निष्ठा और पूरी ईमानदारी से करते तो शायद सुमित को असमय होने वाली मौत से बचाया जा सकता था।

उल्लेखनीय है कि लखनऊ प्राणी उद्यान में गजराज सुमित को लगभग 32 साल पहले राजाजी नेशनल पार्क से बाल्यावस्था में पकड़कर लाया गया था। ट़ेनिंग पूरी करने के बाद राजकीय सेवा में रहकर सुमित ने 27 साल तक प्राणी उद्यान में आने वाले पर्यटकों को घुमा-फिराकर उनका भरपूर मनोरंजन किया, साथ ही सैकड़ों शादी-बारातों में शामिल होकर लोगों की शानो-शौकत का गवाह बनकर उनके दरवाजे की शोभा बढ़ाई। यद्यपि अपनी जवानी के दिनों में करीब दस साल पहले सुमित जब मदमस्त हुआ था तब उसके कोप का शिकार बनकर महावत कमाल ने अपनी पसलियां तुड़वायी थीं। गुजरती उमर के साथ बुढ़ापे की डगर पर चल चुके सुमित की आखों की रोशनी कम हुई, तो राजकीय सेवा से रिटायर करके उसे अज्ञातवास में रखा गया। लेकिन जब वह आंखों से अन्धा और बीमारी से ग्रस्त होकर इंसान की दया का मोहताज हो गया तो दो मई 2010 को सूबे के आलाअफसरों ने सुमित को दुधवा नेशनल पार्क में भेजवा तो दिया था, परंतु उस पर होने वाले खर्च का बजट नहीं भेजा और न ही उसकी देखभाल के लिए दुधवा में महावत की व्यवस्था की गई। पार्क प्रशासन ने भी सुमित की देखभाल एक चाराकटर के हवाले करने के साथ ही यहां रहने वाले दूसरे हाथियों द्वारा लाए जाने वाले
चारा से उसका गुजारा करने की व्यवस्था करके कर्तब्य से इतिश्री करली। जिससे सुमित को समय से न खाना मिला और न पानी। इसका परिणाम यह निकला कि पुरानी बीमारियों का दायरा बढ़ता चला गया और कमजोरी की छाया ने ग्रहण लगाकर उसे एक दिन बिठा दिया। इसके बाद सुमित जब भी खड़ा हुआ तो उसे चैन पुलिंग का सहारा देकर अन्य हाथियों ने ही खड़ा किया।

हाथियों की दया पर मोहताजी का जीवन गुजारने वाले सुमित का कृषकाय शरीर इस उठा-बैठक में जख्मों से भर गया था। बावजूद इसके दुधवा पार्क के वनाधिकारियों ने सुमित का किसी विशेषज्ञ पशु चिकित्सक से उपचार कराना तो दूर रहा उसका परीक्षण कराने तक की जहमत नहीं उठाई। आखिर जीवन के 87 दिन दुधवा में ब्यतीत करके सुमित इस दुनिया से अलविदा कहकर चिरनिंद्रा में सो गया। पीछे रह गईं हैं केवल उसकी यादों के रूप में दुधवा के म्यूजियम में रखे दो विशालकाय दांत।

सवाल यह है कि जब सुमित बीमार था तो दुधवा पार्क में रखने के बजाय उसे भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान इज्जतनगर-बरेली क्यों नहीं भेजा गया? यह सही है कि दुधवा पार्क में प्राकृतिक वातावरण है किंतु यहां के पालतू हाथियों को भी जंगल में खुला छोड़ने के बजाय जंजीरों में बांधकर रखा जाता है। इससे जो स्थिति सुमित की लखनउ प्राणी उद्यान में थी वही यहां बनकर रह गई, फिर सुमित को दुधवा भेजने का औचित्य ही क्या था? और अगर दुधवा भेज भी दिया गया तो उसके रहने,  खाने व देखभाल तथा उपचार की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं की गई? सबसे अहम बात यह भी है कि सुमित के साथ ही उसपर खर्च होने वाले धन का वजट क्यों नहीं भेजा गया? इस तरह के कुछ ऐसे और भी सवाल हैं जिहोंने सुमित की मौत के बाद यूपी की नौकरशाही की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। 

गौरतलब है कि विलुप्तप्राय वन्यजीवों के संरक्षण और सवंर्द्धन के उद्देश्य से सन् 1977 में दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना की गयी थी। दुधवा को विश्व की एकमात्र ‘गैंडा पुनर्वास परियोजना‘ भी संचालित करने का गौरव भी हासिल है साथ में यहां चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर के कारण दुधवा का महत्व और भी बढ़ जाता है। विशालकाय वनक्षेत्र और मध्य से निकली है रेल लाइन। इसके कारण अक्सर होने वाली दुर्घटनाओं में वन्यजीवों के साथ बाघ के अतिरिक्त क्षेत्र की सत्ता को लेकर होने वाले खूनी संघर्ष में भी गैंडा घायल होते रहते हैं, उनके उपचार की कोई व्यवस्था न होने से वे असमय कालकवलित हो जाते हैं। दुलर्भ प्रजाति के वन्यजीवों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान इज्जतनगर-बरेली भेजना पड़ता है। इस कार्य में आने वाली दिक्कतों और होने वाली परेशानियों के बाद भी दुधवा में न पशु चिकित्सक का पद स्वीकृत किया गया और न ही आज तक महती जरूरत होते हुए भी वैकल्पिक रूप में पशु चिकित्सक ही नियुक्त किया गया है। वन विभाग के उच्चाधिकारियों की दुधवा के वन्यजीव-जन्तुओं के प्रति इसी प्रकार उदासीनता और लापरवाही बरती जाती रही तो दुधवा नेशनल पार्क के पालतू हाथी हो या फिर दुलर्भ प्रजाति के वन्यजीव वह भी सुमित की तरह अकाल मौत मरकर इतिहास के पननों में सिमटते चले जाएगें।

(लेखक वाइल्ड लाइफर एवं पत्रकार है।, खीरी जनपद के पलिया में निवास। वन्य जीवन के सरंक्षण व संवर्धन में पिछले दो दशकों से प्रयासरत। इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)
 









1 comments:

mohd.roshan said...

mohd.roshan
mohd_roshan1979@yahoo.com

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