International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Aug 3, 2010

ऐसे तो दुधवा से विलुप्त हो जायेगा तेन्दुआ!

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र*
दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल किशनपुर वनरेंज जंगल के समीप शिकारियों के खुड़का में फंसे घायल तेंदुआ को आजाद कराने के बाद चंद घंटों में उपचार करके उसे उसी अवस्था में वनाधिकारियों ने रात के अंधेरे
में जंगल के भीतर छोड़ दिया है। इस घायल तेंदुआ को शिकारियों के लिए खोज निकालना मुश्किल भरा काम नहीं होगा। वनाधिकारियों ने अदूरदर्शिता पूर्ण कदम उठाकर तेंदुआ का जीवन सुरक्षित करने के बजाय उसके जीवन पर खतरा और ज्यादा बढ़ा दिया है । तेंदुआ का घायल अगला पंजा ठीक होने में कुछ तो समय लगेगा ही और शिकार के वक्त उसकी ताकत अगले दोनों पैरों होती हैं, वह तीन पैरों से कैसे शिकार करेगा? भूख शांत करने के लिए  घायल तेंदुआ आसान शिकार की तलाश में निकटवर्ती इंसानी बस्तियों में आकर मवेशी या मानव पर हमला करके नरभक्षी हो सकता है, या फिर वह स्वयं जिन शिकारियों के चुंगल से बचा है, उनका फिर से शिकार बन सकता है।
 
उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल किशनपुर वनपशु विहार के जंगल से सटे गन्ने के खेत में शिकारियों द्वारा बाघ के शिकार हेतु लगाए गए खुड़का में 31 जुलाई को एक चार वर्षीय तेंदुआ का अगला बायां पैर बुरी तरह से जकड़ गया था। डब्ल्यू0टी0आई0 के पशु चिकित्सक डा0 मुस्ताक आदि ने मसक्कत के बाद ट्रैकुलाइजर गन से उसे बेहोश किया और गंभीर रूप से घायल तेंदुआ को पिंजरा में कैद करके दुधवा ले आए थे। प्राथमिक उपचार के बाद दुधवा के आला अफसरों एवं डब्ल्यू0टी0आई0 की टीम के बीच घंटों हुई गुप्त मंत्रणा और वन विभाग के उच्चाधिकारियों के निर्देश पर मध्यरात्रि के बाद रात के अंधेरे में लगभग डेढ़ बजे किशनपुर ले गए और घायल तेंदुआ को खूंटा कुंआ के जंगल में छोड़ दिया। इस गुपचुप कार्यवाही से स्पष्ट हो जाता है, कि वनाधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन सही ढंग से करने के बजाय झंझट में न पड़ने और जवाबदेही से बचने के लिए घायल तेंदुआ को जंगल में छोड़कर कर्तव्य से इतिश्री करली। रात के अंधेरे में हुए इस खेल ने तेंदुआ के जीवन को और ज्यादा खतरे में डाल दिया है। लखनऊ प्राणी उद्यान के विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सक डा. उत्कर्ष शुक्ला का कहना है कि तेंदुआ का पैर ज्यादा घायल नहीं होगा तभी उसे छोड़ा गया होगा। वन्यजीवप्रेमी विकास पांडेय भी मानते हैं, कि वन विभाग के अधिकारियों द्वारा उठाया गया कदम जल्दबाजी भरा है, भले ही तेदुआ ठीकठाक था इसके बाद भी उसको जंगल में छोड़ने से पहले एकबार वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट से उसकी जांच अवश्य करानी चाहिए थी।
सृष्टि कंजरवेशन एण्ड वेलफेयर सोसाइटी के सेक्रेटरी डी0 प्रकाश का कहते हैं कि खुड़का इतने तेज प्रेसर से बंद होता है जिसमें हड्डी टूटने की सम्भावना अधिक रहती है ऐसे में घायल तेंदुआ के पैर का एक्सरे क्यों नहीं कराया गया ? यह बात अपनी जगह सही है कि वनपशु जख्मों को चाटकर ठीक कर लेते हैं और उनके घाव भी
प्राकृतिक रूप से जल्दी भर जाते हैं। किंतु अगर पंजे की हड्डी टूटी हुई तो बरसात का मौसम है जिसमें जख्मों के सड़ने की संभावना अधिक रहती है। ऐसी दशा में घायल तेंदुआ का उपचार अथवा परीक्षण लखनऊ प्राणी उद्यान के विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सक अथवा भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान इज्जतनगर बरेली के विशेषज्ञों की देखरेख में होना चाहिए था। 

दुधवा लाइव डाट काम के संस्थापक वाइल्ड लाइफर के0के0 मिश्र बताते हैं, कि तेंदुआ की असली ताकत अगले पैरों में होती है जिससे वह रफ्तार भी बढ़ाता है और शिकार पर प्रहार भी करता है। ऐसे में घायल तीन पैर वाला तेंदुआ स्वाभाविक शिकार करने में जब असमर्थ होगा तो वह आसान शिकार के लिए इंसानी बस्ती में आ सकता है। श्री मिश्र कहते हैं कि यह बात भी अपनी जगह सही है, कि घायल बाघ और तेंदुआ आसान शिकार मानकर पालतू पशु अथवा मानव पर हमला करते हैं। ऐसे में एक पैर से घायल तीन पैर वाला तेंदुआ आसान शिकार की तलाश में निकटवर्ती गावों में आकर मवेशियों अथवा मानव पर हमला कर सकता है, या फिर जिन शिकारियों के चुंगल से एकबार भाग्य ने बचा लिया है वही शिकारी उसे ढूंढ़ कर उसका फिर शिकार कर सकतें हैं इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
 
उल्लेखनीय है कि घायल तेंदुआ को उपचार या परीक्षण के लिए लखनऊ या बरेली क्यों नहीं ले जाया गया? और ऐसी भी क्या जल्दी थी कि पूर्ण स्वस्थ्य हुए तेंदुए को कुछेक घंटों के साधारण इलाज के बाद तुरत-फुरत रात के अंधेरे में क्यों जंगल में छोड़ दिया गया? इसके अतिरिक्त घायल तेंदुआ की निगरानी की क्या व्यवस्था की गई है? वन विभाग के अधिकारी इन प्रश्नों का जवाब देने में अब कन्नी काट रहे हैं। किशनपुर वनपशु विहार का वनक्षेत्र पूर्व से ही शिकारियों के लिए आकर्षण का केन्द्र इसलिए रहा है क्योंकि इसके आसपास कई बस्तियां हैं जिनमें इनको रहने की जगह और ग्रामीणों का सहयोग आसानी से मिल जाता है। साथ ही यह वनक्षेत्र नार्थ-खीरी फारेस्ट डिवीजन से सटा और जिला पीलीभीत के जंगलों के निकट है। भौगोलिक परिस्थितियों का फायदा उठाकर शिकारी आसानी से वन्यजीवों को मारते ही हैं साथ में बाघ और तेंदुआ का शिकार करने में भी परहेज नहीं करते  हैं। इस घटना से पहले करीब चार वर्ष पूर्व किशनपुर परिक्षेत्र में सक्रिय रहे शिकारियों द्वारा बाघ का शिकार करने का खुलाशा हुआ था। तीन साल पहले नार्थ-खीरी फारेस्ट डिवीजन क्षेत्र के ग्राम कापटांडा में नरभक्षी हुए एक बाघ को गोली से मारा गया था। दो वर्ष पूर्व नरभक्षी घोषित बाघ को पिंजरे में कैद करके लखनऊ प्राणी उद्यान भेजा गया था। इसके अतिरिक्त किशनपुर से सटे जिला पीलीभीत के ग्राम नहरोसा से बावरिया गिरोह की सक्रिय महिला सदस्य लाजो को गिरफ्तार करके जेल भेजा जा चुका है। इसके बाद भी वन विभाग वन्यजीवों की सुरक्षा में लापरवाही बरत रहा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि शिकारियों ने आसानी से खुड़का लगाया और उसमें विलुप्तप्राय वंयजीवों की सूची के सेड्यूल ‘वन‘ श्रेणी के तेंदुआ को फांस भी लिया था। इसकी भनक वनकर्मियों को नहीं लग पाई थी, ग्रामीणों की सूचना पर घायल तेंदुआ की फिलहाल जान जरूर बच गई। इस घटना ने यह पूरी तरह से साबित कर दिया है कि दुधवा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा वन्यप्राणियों की सुरक्षा में लापरवाही बरती जा रही है। और यही स्थिति आगे भी रही तो क्षेत्र में सक्रिय शिकारी गिरोहों के सदस्य दुधवा टाइगर रिजर्व को भी सारिस्का और पन्ना टाइगर रिजर्व की तरह बाघ बिहीन बना देगें। इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। 

(लेखक वाइल्ड लाइफर एवं पत्रकार है।, खीरी जनपद के पलिया में निवास। वन्य जीवन के सरंक्षण व संवर्धन में पिछले दो दशकों से प्रयासरत। इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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