डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 02, February 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Apr 26, 2015

एक फूल की दास्ताँ जो बतलाती है इंसान के बिसरे हुए कल को

 
Pulicaria dysenterica? 

तराई में उगा है यह बिलायती फूल 
कामन फ्लीबेन नाम है इस खूबसूरत फूल का 
उजड़ी धरती और रिसती हुई नदी की कहानी भी बयान कर रहा है यह फूल 
भारतीय मुद्रा के पचीस पैसे के आकार का है यह पुष्प !

*कृष्ण कुमार मिश्र 

उत्तर भारत के तराई जनपद खीरी की एक नदी “पिरई” और उसके दक्षिण में बसा एक गाँव “मैनहन”, बस यहीं  की यह दास्ताँ है जो एक फूल से बावस्ता है, दरअसल कभी यह नदी यहाँ के शाखू, महुआ, पलाश आदि के जंगलों और घास के बड़े बड़े मैदानों से होकर गुजरती थी, भौगोलिक दृष्टिकोण से नदी की धारा अभी भी अपने हजारों वर्ष वाले रास्ते पर मुस्तकिल है, परन्तु अब यह नदी बहती नहीं रिसती है, वजह जाहिर है कि जंगलों और मैदानों से जो बरसाती पानी एकत्र होता था वह इस नदी को पोषित करता था, किन्तु इसके आस-पास के जंगल और घास के मैदान उजड़ चुके है, यहाँ अब सिर्फ इंसानी बस्तियां और उनके खेत है, जिनमे अब पारंपरिक खेती और असली  बीज नदारद है, सिर्फ गन्ना गेहूं और धान के संकर बीजों की खेती ही बची हुई है वह भी तमाम रासायनिक खादों और पेस्टीसाइड के बलबूते पर.

.उत्तर भारत में पहली बार रिकार्ड की गयी यह वनस्पति 

.जहां इस खूबसूरत फूल से मेरी पहली मुलाक़ात हुई वह जगह नदी के उत्तरी छोर पर है, इस उजाड़ बंजर जमीन पर अब कुछ किसान खेती करने लगे है, फिर भी जमीन की तासीर अभी भी अम्लीय है, इस उजड़ी हुई धरती पर यह फूल कैसे खिला यह कहानी दिलचस्प है, इस फूल का योरोप से एशिया तक का सफ़र इंसानी सभ्यताओं और उपनिवेशों के इतिहास से जुडा हुआ है?,

 संभव हो चिड़ियों की हजारों मील की लम्बी यात्राओं में भी राज हो इस फूल के कास्मोपोलिटन होने का , सदियों पुरानी यात्रा हो इस फूल की धरती के महाद्वीपों पर ! खैर इस वनस्पति का बीज मैनहन की धरती पर कैसे पल्लवित हुआ और इसकी खासियतें क्या है यह बयान करना जरूरी है, इस वनस्पति को “पुलीकेरिया डिसेंटेंरिका” वैज्ञानिक नाम मिला तकरीबन दो सौ पचास वर्ष पूर्व, हालांकि कार्ल लीनियस ने इसका पहला नाम इन्युला डिसेंटेंरिका रखा था, जो बाद में बदला गया, पुलीकेरिया के ग्रीक में मायने होते है “यह गुण” और डिसेंटेंरिका इसके पेचिस में उपयोगी होने के कारण कहा गया, दुनिया की एक बड़ी वनस्पति परिवार एस्टेरेसी कुल का यह पौधा है, इस कुल में सूरजमुखी जैसी सर्वविदित प्रजाति भी आती है, और जरबेरा जैसे जीनस भी जिनमें तमाम खूबसूरत पुष्पों की प्रजातियाँ सम्मलित हैं, इस एस्टेरेसी कुल के सभी फूलों की खासियत यह है, कि जिन्हें हम एक पुष्प कह कर पुकारते है दरअसल उसमें सैकड़ों पुष्प होते है, यह एक सयुंक्त पुष्पों का गुच्छा होता है जो देखने में एक पुष्प सा प्रतीत होता है, और इसके सैकड़ों पुष्प निषेचन के पश्चात सैकड़ों बीज बनाते है, इसमें नर व् मादा पुष्प एक साथ होते है, इस फूल के परिवार की एक और अहम् बात है कि यह विषम परिस्थितियों में भी अपने वजूद को बरकरार रख सकता है हालांकि यह गुण प्रकृति ने सभी जीवों को दिया है, इस कुल की प्रजातियों में उपापचय क्रियाओं में शर्करा के एक बहुलक जिसे “फ्रैक्टान” कहते है, में ऊर्जा सरंक्षित रखने की काबिलियत होती है, और यह क्षमता सूरजमुखी आदि के अतिरिक्त गेंहूं और तमाम घासों में भी पाई जाती है, 


इस फूल वाली वनस्पति की पत्तियां व् तना रोयेंदार होते है, एक या दो फिट तक यह वनस्पति बढ़ती है, और खीरी जनपद में अप्रैल से जुलाई तक इस प्रजाति में पुष्पन होता है, तना तांबे की तरह लाल, पुष्प पीतवर्ण, पत्तिया रोमिल, जड़े दूर तक फ़ैलने की क्षमता रखती है, आम तौर पर नदियों व् तालाबों के किनारे, सड़को के आस-पास इस प्रजाति का उग आना सामान्य है, और यह वनस्पति थोड़ी बहुत क्षारीय जमीन में भी उग आने की कूबत रखती है, दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव को छोड़कर इस प्रजाति ने योरोप के अलावा एशिया, अफ्रीका और अमेरिकी महाद्वीप में में भी अपना अस्तित्व बनाया. 

औषधीय गुणों से युक्त है यह वनस्पति

पुलीकेरिया डिसेंटेंरिका जिसे अंग्रेजी में “कामन फ्लीबेन” कहते है, इस नाम के पीछे की कहानी यह है, कि सदियों पहले जब हमारे पूर्वजों ने आग में इस प्रजाति के सूखे पौधों को डाला तो उस धुंए से वहां के वातावरण से मख्खियाँ व् कीट-पतंगे गायब हो गए, इसके इस विषाक्त गुण के कारण इसे यह नाम दिया गया, कहते है एक रूसी जनरल जब परसिया पर आक्रमण करने जा रहा था तो राह में उसे डिसेंट्री हुई और वहां के स्थानीय लोगों ने कामन फ्लीबेन के रस से उसे ठीक कर दिया, यह बात उस जनरल ने कार्ल लीनियस को खुद बताई, और इस प्रजाति के अद्भुत गुण को लीनियस ने अपने जर्नल्स में लिख लिया, यही वह औषधीय गुण जिसने इस प्रजाति को डिसेंटेंरिका नाम दिया, दुनिया के तमाम हिस्सों में इस वनस्पति का उपयोग अल्सर, त्वचा रोग और घावों के उपचार के लिए किया जाता है, 




अब सवाल यह है की यह कामन फ्लीबेन योरोप से भारत और भारत के इस गाँव तक कैसे पहुंचा, वनस्पति विज्ञान के जर्नल्स में बहुत कम जिक्र है इस प्रजाति का, पुलिकेरिया जीनस के अंतर्गत आने वाली कुछ प्रजातियों का जिक्र ब्रिटिश भारत के बंगाल में पाए जाने का जिक्र हुआ है, कुछ अंग्रेज वैज्ञानिकों द्वारा, किन्तु उत्तर भारत में यह प्रजाति अभी भी दर्ज नहीं है,

योरोप से एशिया तक का सफ़र इस फूल के साथ 

 कुल मिलाकर तराई में यह पौधा कैसे पहुंचा इस रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश है, योरोप से नील नदी तक फिर गंगा के मैदानों से होकर तराई की इस छोटी नदी के किनारे खिला यह पुष्प अपनी खिलखिलाहट में वह रहस्य छुपाये हुए है, जो सैकड़ों वर्ष की लम्बी दास्ताँ कहते है, अंग्रेजों के उपनिवेश काल के दौरान यह पुष्प योरोप से अफ्रीका होता हुआ एशिया में दाखिल हुआ, चाहे इसके बीज अनजाने में जहाज में दाखिल हुए हो या इसे साज सज्जा वाले पुष्प के तौर पर अंग्रेज अफसरों ने स्वयं इसे धरती के विभिन्न भागों में रोपित किया हो, चूंकि भारत के प्राचीन आयुर्वेद में इस प्रजाति का जिक्र नहीं है, तो संभव है की यह प्रजाति ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ साथ उत्तर भारत की तराई में दाखिल हुई हो, अंग्रेज अफसरों की पत्नियों का प्रकृति प्रेम खासतौर से तितलियों और फूलों के प्रति, पूरी दुनिया में जाहिर है, वे अपने उपनिवेश वाले देशों से न जाने कितनी वनस्पतियों और तितलियों की प्रजातियाँ इकठ्ठा कर इंग्लैण्ड ले गयी जो आज भी वहां के म्यूजियम्स में मौजूद है, कई गवर्नर जनरल्स की मेमसाहिबों ने तो न जाने कितनी पेंटिंग्स बनाई जंगली पुष्पों और तितलियों की जो बाद में कई किताबों का हिस्सा बनी.... !
  



चूंकि पुलीकेरिया जीनस की प्रजातियों पर भारत में बहुत कम अध्ययन हुआ है, इस लिए अभी भी ये खूबसूरत फूल वाली वनस्पति लोगों की नज़र में कम ही आ पाई है, इनकी कितनी हाइब्रिड प्रजातियाँ हैं यह भी कहना मुश्किल है, जाहिर है इस जीनस की प्रजातियों की पहचान में त्रुटियाँ संभव है, किन्तु भारत में पुलीकेरिया फोलिओसा, पुलीकेरिया वुलगैरिस, पुलीकेरिया विघटियाना आदि पर कुछ जानकारी मौजूद है. विभिन्न देशों की रेड डाटा बुक में इन प्रजातियों को सरंक्षण की जरूरत वाली प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है, कुछ तो खतरे में पड़ी प्रजाति के तौर पर भी दर्ज की गयी है, इस पीतवर्ण पुष्प वाली वनस्पति में जो गुण छुपे हैं मानवता ने जानकारी के आधार पर उसके लाभ भी लिए हैं, जरूरत है तो बस इतना जानने की कि प्रकृति में यदि कोई नुक्सान पहुंचाने वाली चीज मौजूद है तो उसका इलाज भी इसी प्रकृति में है,  बस नजरिया चाहिए, ताकि आप उसे खोज सके. 


इस कहानी में जो सबसे रोचक बात है वह है इसके इस कुछ कुछ अम्लीय जमीन पर उगने की, क्योंकि जिस जमीन पर इंसानी बसाहट होती है उस जमीन की उपजाऊँ शक्ति क्षीण हो जाती है, और मिट्टी अम्लीय या क्षारीय, और जब वह इंसानी बसाहट वहां से ख़त्म होती है किसी कारण बस जैसे भयानक बीमारी या कोई अन्य मानव जनित कारण तो ऐसी जमीनों में अक्सर खजूर जैसे दरख़्त उग आते है, ये निशानी होती है कि इस जगह पर इंसान कभी रहा है, परशपुर के उजड़ने और यहाँ की जमीन पर ऐसी कई प्रजातियों का उगना जो बंजर जमीनों में भी अपना अस्तित्व बरकरार रख सके, यह रहस्य उस फूल की यहाँ मौजूदगी से जाहिर हो जाता है. 



  
ग़दर की कहानी भी कहता है यह फूल 

तकरीबन १५० वर्ष पूर्व यहाँ एक गाँव हुआ करता था जिसका नाम था “परशपुर” और यह एक विशेष तरह के लोगों का था जो यहाँ के स्थानीय राजा द्वारा बसाया गया था, ये लोग थे ढाल तलवार भाला और फ़ौज में इस्तेमाल होने वाली तमाम चीजों को बनाने वाले कारीगर, १८५७ की क्रान्ति से पहले जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध का ऐनक्सेशन शुरू किया तो यहाँ के राजाओं और जागीरदारों की संपत्ति हथियार और फ़ौज का सारा विवरण कंपनी सरकार ने माँगा यह दौर था क्रान्ति से ठीक एक वर्ष पूर्व का, यानि सन १८५६ ईस्वी, लोगों में एक बुरी खबर दौड़ गयी कि अब यह सब ब्योरा कंपनी सरकार लेकर हमारी संपत्ति हमारे हथियार और हमारी फ़ौज पर अप्रत्यक्ष रूप से कब्जा कर लेगी, और यही होने वाला भी था,

 १८५७ की क्रान्ति में उत्तर भारतीय राज्यों का ऐनक्सेशन एक विशेष कारण था जिसे इतिहासकारों ने नज़रअंदाज किया है, खैर जब ग़दर का वक्त आया, अवध के लोगों में अपनी परतंत्रता को लेकर जो रोष था वह फूट पड़ा और मैनहन-मितौली के राजा ने विद्रोह कर दिया, अंग्रेजों ने इनका अपने संस्मरणों में कुख्यात राजा के तौर पर जिक्र किया, यह ग़दर की कहानी बड़ी रोमांचित करती है इस क्षेत्र के लोगों को और वे तमाम किस्से आज भी जनमानस में कहे और सुने जाते है, पर यह किस्सा कभी और !


 हाँ तो जब ग़दर हुआ राजा ख़त्म हो गए जो अंग्रेजो से मिल गए उन्हें नाम का राजा बनाया गया खिताब देकर, राजाओं के हथियार और फौजें या तो नष्ट कर दी गयी या जो बची उन्हें कंपनी सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया, और इस तरह फ़ौज में तलवार ढाल और भाला जैसे हथियारों की जगह अब बारूद उगलने वाले हथियारों ने ले ली....बस यही कहानी थी कि जहां अब यह फूल खिलखिला रहा है वहाँ बसा वह परशपुर गाँव ख़त्म हो गया, क्योंकि अब उन पारंपरिक हथियारों का दौर कंपनी सरकार ने ख़त्म कर दिया था और जो ये कारीगरों के गाँव  राजा के गुजारे पर बसे हुए थे, उजाड़ हो गए और यहाँ खिल गया यह बिलायती फूल जो उस अतीत की कहानी कह रहा है, कहते है जीवन अपनी राह तलाश ही लेता है, प्रकृति देश प्रदेश की लकीरें नहीं खींचती, जिसे धरती ने अपना लिया उसके लिए क्या योरोप क्या एशिया और क्या भारत आखिर इस एक धरती का जीवन भी एक ही है बस प्रजातियाँ रंग रूप अलाहिदा है, यहाँ कुछ भी इतर नहीं.....! 




"हम बात करेंगे गैरों की और अपनी कहानी कह देंगे"

*कृष्ण कुमार मिश्र 
 संस्थापक संपादक -दुधवा लाइव पत्रिका
email: krishna.manhan@gmail.com


  

1 comments:

rupal ajabe said...

कृष्णकुमार जी, हर बार की तरह इस बार भी बहुत शुक्रिया इस फूल की दास्ताँ को बख़ूबी बयाँ करने के लिए. केवल दास्ताँ ही नहीं महत्वपूर्ण बातें, जानकारी भी हासिल होती है जो हमारे देखने के नज़रिये में भी इज़ाफा करती है. नजाने कितने ही फूल, पेड़-पौधे, जीव-जंतु हमारे सामने से गुज़रते हैं; पर कभी ग़ौर नहीं करते हम कि कौन कहाँ से चला और कहाँ ख़त्म हुआ!!...तभी आपके लेख किस्सों के ज़रिये ये सब बताते हैं...ध्यानाकर्षित करवाते हैं!!...रुचिकर तरीक़े से लिखी गई दास्ताँ ने निश्चय ही जानकारी बढ़ाई. बहुत धन्यवाद.शुभकामनाओं सहित......!!....

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