International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jul 26, 2014

200 करोड के पौधे खा गया वन विभाग

जंगल दफ्तर ने लूटा जंगल
 
बांदा। बुंदेलखंड में हरियाली के नाम पर मानसून के साथ धन खूब बर्बाद किया गया। हर साल नए पेड़ लगाने के नाम पर वित्तीय वर्ष में लंबा बजट खर्च होता है। जिन स्थानों पर पौधे रोपित किए जाते है, गर्मी आते ही वहां मैदान नजर आता है। तमाम नौकरशाह हरियाली के इस खेल में हरे-भरे हो गए, लेकिन बुंदेलखंड के हिस्से सूखा और बियावान जंगल ही आए।
योजनाएं बनाकर धन को ठिकाने लगाने का काम कैसे किया जाता है, ये हुनर जंगल दफ्तर को बखूबी आता हैं। सरकारी तंत्र को चाहिए कि देश में भ्रष्टाचार की मंड़ी और अधिक मजबूत करने के लिए वन विभाग को अगवाई में रखे। अधिकारियों ने न सिर्फ पुराने गड्ढों में साल दर साल पौधों की बेड लगाई बल्कि कागजों में ही हरियाली ला दी। मानकों की बात करें तो राष्ट्रीय वन नीति के तहत 33 फीसदी वन क्षेत्र जिले के कुल भूमि पर मौजूद होना चाहिए। वित्तीय वर्ष 2014 में 29 लाख पौधे चित्रकूट धाम मंडल बांदा के चार जिलों में रोपित किए जाने हैं। तैयारी शुरू हो चुकी हैं। पुराने गड्ढों की घास हटाई जा रही है और 29 लाख के पौधों की खेप इन्हीं गड्ढों में फिर दफन किए जाएगें। 

वन विभाग के स्थानीय अधिकारियों से बात करो तो गोल-मोल जबाब मिलता है। बांदा वन प्रभाग के डीएफओ प्रमोद कुमार कहते हैं कि रोपित पौधों के बाद कितने पौधे जीवित रहते हैं यह कहना कठिन है! 

बांदा वन रेंज में यूं तो कई फारेस्ट रेंजर कार्यरत हैं, लेकिन इन सभी के सेनापति टीएन सिंह पूरे जिले की हरियाली को जिंदा रखने का भार उठाए हैं। यह और बात है कि वन विभाग की काॅलोनी में एयर कंडीशन हवा के बीच उन्हें घर बैठे ही सूखे बुंदेलखंड की शीतल हवा मिलती रहती है। आंकड़ों की बाजीगरी इस तरह की गई कि संख्या के आंगे जीरो बढ़ते रहे और हर साल का बजट मजबूत होता गया। 

- पेड़ों से वीरान हाईवे 
 
नेशनल हाईवे 76 जो अब 35 हो गया है बांदा-इलाहाबाद, बांदा-झांसी, बांदा-कानपुर में हजारों ब्रिटिश कालीन महुआ और नीम के पेड़ अब नेस्तानाबूत हैं। बांदा और हमीरपुर में वर्ष 2000 से 2010 तक 60917 पौधे जेसीबी मशीन से सड़क चैड़ीकरण के नाम पर उखाड़ दिए गए। इन पेड़ों के नीचे कभी आम राहगीर सुकून के दो पल गुजार लेता था। आज यही सड़क चटीयल कंक्रीट का हाईवे है। बुंदेलखंड में घटते हुए वन क्षेत्र की तस्दीक के लिए यह तस्वीर काफी है कि यहां बांदा में 1.21 फीसदी, महोबा 5.45, हमीरपुर 3.06, झांसी 6.66, चित्रकूट सर्वाधिक 21.08 और जालौन 5.06 फीसदी जंगल शेष है। 

- पौधे लगाए नहीं काट दिए हजारों
 
बंुदेलखंड में इस अवधि में 31056 हरे पेड़ सिर्फ घरों में काट दिए गए। इसमें 24500 आम के पेड़ तथा 6556 अन्य पेड़ शामिल हैं। वन संरक्षण अधिनियम 1976 के मुताबिक एक गृह स्वामी को पेड़ काटने पर वन विभाग के समक्ष 15 दिन के अंदर 2 पेड़ लगाने का शपथ पत्र देना होता है। पेड़ काटने से पहले जमानत राशि जमा करनी होती है और अनुमति मिलने के बाद ही सेक्टर रेंजर की उपस्थिति में वह घरों में लगे कीमती पेड़ मसलन सागौन, महुआ, नीम, शीशम, चिरौल, कैथा, जामुन, रीठा, कटहल, पीपल, सेमल, अर्जुन, खैर, शमी, आॅवला, शहजन, गूलर, कंजी आदि के पेड़ काट सकता है। ललितपुर जिले को छोड़कर बुंदेलखंड के अन्य 6 जनपद शपथ पत्र देने और जमानत राशि के मामले में शिफर रहे। 

- कहां गए 200 करोड़ के पौधे
 
बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, ललितपुर और झांसी में वित्तीय वर्ष 2005-06 से मार्च 2010-11 तक वन विभाग ने जंगल आबाद करने के नाम पर 20027.326 लाख रूपए खर्च कर दिए इन रुपयों से 15.91 करोड़ पौधे लगाने का दावा किया गया। जिन स्थानों पर पौधे लगाए गए उनके नाम बताने पर वन विभाग को पसीना आ जाता है। पौधों की जगह मैदान है मगर जंगल दफ्तर का हाजमा बड़ा दुरूस्त है। बांदा में 2011-12 में 157300 पौधे तथा 2012-13 में 239075 पौधे लगाए गए। हकीकत तो यह है कि जिन गड्ढों में पौधे लगे उनके आस-पास पशु पक्षी भी नहीं जाते हैं धूप की तपिश के चलते। स्रोत- सूचना अधिकार से प्राप्त 

- पेड़ों के रखरखाव के लिए बनी हैं समितियां 
 
बुंदेलखंड के सभी जनपदों में ग्राम वन समिति बनाई गई है। जिसमें उसी ग्राम पंचायत के 6 से 7 सदस्य महिला और पुरूष को लगे हुए पौधों के देख-रेख की जिम्मेवारी वन विभाग ने दे रखी है। इसके लिए इन्हें बकायदा मानदेय भी दिया जाता है। मगर बुंदेलखंड में वन विभाग के अंदर सभी जनपदों में फारेस्ट रेंजर टीएन सिंह एंड कंपनी जैसे बहुसंख्यक मोटी चमड़ी के सिपाही तैनात हैं। जिनकी तर्ज पर ये ग्राम वन समितियां भी लगाए गए पौधों से खिलवाड़ करती हैं। बानगी के तौर पर शासनादेश संख्या 328/14.05.2011 वन अनुभाग 5 26 अप्रैल 2011 के अनुसार बुंदेलखंड एवं विध्यांचल क्षेत्र में 2011-12 में 2.50 करोड़ पौधरोपण का विशेष अभियान चलाया गया था। इसी प्रकार वर्ष 2010 में मनरेगा योजना से 7 जनपदों में विशेष वृक्षारोपण अभियान के तहत 10 करोड़ पौधे लगाए गए। इनकी देखरेख के लिए उत्तर प्रदेश के तत्तकालीन सचिव मनोज कुमार सिंह ने शासनादेश संख्या 7605/38-7-10-120 एसआरडी/10टीसी-1 के क्रम में 10 लाख वंचित परिवार -100 दिन का रोजगार कार्यक्रम चलाया था। इसके लिए नोडल एजेंसी का चयन किया गया जिसमें सचिव ग्राम्य विकास अध्यक्ष, आयुक्त ग्राम्य विकास सदस्य, निदेशक गिरि इस्टीट्यूट लखनऊ, निदेशक अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट सदस्य, अपर आयुक्त मनरेगा, सदस्य सचिव, उपायुक्त मनरेगा सदस्य नियुक्त किए गए थे। इन दस करोड़ पौधों का अकेंक्षण का मूल्यांकन थर्ड पार्टी से भी कराया गया। प्रदेश की 74 वंचित वर्ग की जातियों को इन पौधों से मनरेगा योजना से मजदूरी भुगतान की गई। तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री बसपा सरकार ने अपनी अगवाई में इस नोडल एजेंसी का चयन किया और बुंदेलखंड व विध्यांचल पर्वत की तलहटी में हरियाली के नाम पर करोड़ों रुपयों का बंदरबांट कर दिया गया। स्वंयसेवी संस्थाओं से लेकर प्रदेश के आलाधिकारियों यथा तत्कालीन अपर आयुक्त चंद्रपाल अरुण ग्राम्य विकास विभाग की पांचों उंगलियां भ्रष्टाचार मंे डूबी रहीं और आज तक मामला फाइलों में बंद है। 

- बेमानी हो गए 55 ड्राई चेक डैम
वन विभाग ने किए गए पौधरोपण को बचाने और पहाड़ों से बहकर आने वाले बारिश के पानी को रोकने के लिए 55 ड्राई चेक डैम अकेले बांदा जनपद में बनाए। यह संख्या 7 जनपदों में करीब 385 के करीब या उससे अधिक है। ड्राई चेक डैम ऐसे स्थानों में बनाए गए जहां आम आदमी पड़ताल भी न कर सके। बांदा जिले के फतेहगंज क्षेत्र में कोल्हुआ के जंगल, सढ़ा ग्राम पंचायत के आनंदपुर नजरे व मध्यप्रदेश की सीमा से लगे विध्यांचल की तलहटी में ड्राई चेक डैम तैयार किए गए। तकनीकी आधार पर और गुणवत्ता के नाम पर मजाक करते हुए अकेले बांदा जनपद के ये 55 डैम न तो पशुओं को पानी दे सके और न ही नवजात पौधों को हरियाली। इसी इलाके के ग्राम आनंदपुर में 19 जून 2013 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथों 50 एकड़ भूमि पर वन विभाग ने हरित पट्टिका अभियान से वृहद पौधरोपण अभियान का पत्थर लगवाया था। एक साल बाद विध्यांचल के किनारे बसे इस गांव में न तो हरित पट्टिका का नामों-निशान है और न ही पौधों की बेड़। हां मुख्यमंत्री के नाम का बड़ा सा पत्थर कटीले तारों की गिरफ्त में गांव वालों को मुंह चिढ़ाता है। इस गांव के बाशिंदे चंद्रपाल कोरी ने बताया कि वन विभाग के कर्मचारी खुद ही बीस-बीस किलो तार लगाई गई बेड़ में बेच लिए हैं। 

गर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लाइन सफारी की तरह बुंदेलखंड के बीहड़ में वास्तव में ईको टूरिज्म का विकास करना चाहते हैं तो यहां विलुप्त होते वन्य जीवों को संरक्षण प्रदान करने के लिए इन जंगलों का बचाना बेहद लाजमी है। जरूरी यह है कि पिछले एक दशक मंे लगाए गए पौधों की सीबीआई जांच करा ली जाए तो कितने सफेदपोश अधिकारी बेपर्दा होंगे यह देखने वाली बात होगी। 



- आशीष सागर दीक्षित (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन्य जीवन के सरंक्षण में महती भूमिका, जल व् पर्यावरण के लिए सूचना के अधिकार को अस्त्र बनाकर बुंदेलखंड में हुई तमाम सरकारी बेईमानियों को उजाकर कर चुके है, बांदा में निवास इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.)


Jul 24, 2014

आओ विगन बने....

 शाकाहार ही मानवता का चरम बिंदु है 

आओ हम सब विगन बने ताकि वसुंधरा हरी भरी बनी रह सके. पशुओं का मांस और उससे बने उत्पादों का बहिष्कार करे, क्योंकि जिस क्रूरता से छोटे छोटे दबड़ों में इन पशुओं को पाला जाता है वह सब देखकर परतंत्रता की पराकाष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता, प्रकृति में उत्पन्न ये जीव जो खुले आसमान में उड़ते है, हरी भरी धरती में कुलांचें भरते है, सरोवरों में तैरते है अपने अपने कुटुंब के साथ, उनकी खरीद फरोक्त कर एक छोटी व् गंदी जगह पर रखना और दवाओं के साथ उन्हें भोजन देना जिससे उनमे मांस में बढ़ोत्तरी हो सके, कितना नैतिक है, इसे जरूर महसूस करिएगा, जीव ह्त्या न करे इस बात के लिए हम संवेदनशील है किन्तु मांस खाने के लिए जो जीव क़त्ल किए जा रहे है उनके लिए नहीं..आखिर ऐसा क्यों?

धरती सबकी है सबका इस पर बराबर का अख्तियार है, और प्रकृति में संतुलन भी तभी बरकरार रहेगा जब प्रकृति में मौजूद हर जीव को उसकी प्राकृतिक जगह पर प्राकृतिक तौर पर रहने दिया जाएगा, हर जीव की पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी अपनी सह्भाकिता है जो संतुलन के लिए आवश्यक है.

ह्रदय के भावों को स्वछंद छोड़ दे ताकि वे सवेद्नाओं को आपके भीतर आने दे और स्थिर रहने में मदद करे, यकीन मानिए इन लाखों करोड़ों जीवों को बंधक बनाकर जो क़त्ल किया जा रहा है उनकी चीत्कार आप को झकझोर देगी और आप फिर कभी इन बेजुबान जानवरों की लाशों की कब्रगाह अपने पेट में नहीं बनायेंगे...

सिर्फ अनुरोध है की शाकाहार ही मानवता का चरम बिंदु है आइये चले उस और कुछ कदम राह खूबसूरत लगेगी....

कृष्ण कुमार मिश्र
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इस वीडियो को अवश्य देखिये थोड़ा वक्त निकाल कर....
वीडियो साभार: मीटफ्रीइंडिया.काम 




Jul 22, 2014

उथली होती नदियाँ और डूबती धरती !


फिर खीरी के जंगलों में बाढ़ की दस्तक....

शारदा और घाघरा नदी ने लिया रौद्र रूप, सुहेली भी उफनाई....

ये मंजर है लखीमपुर खीरी के दुधवा नेशनल पार्क के बाहरी इलाकों का, ये रिहाइशी इलाके जलमग्न हो गए है और सड़के सिर्फ मानचित्रों पर दिखाई देती है, असल में गायब है, भारत के उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद का नाम दुनिया में शाखू के जंगलों और यहाँ के बाघों के लिए मशहूर है, ये वन्य संपदा हजारों सालों से हिमालय की तलहटी में फल फूल रही है, पर अब ये मंजर ये बयान कर रहा है, की ये जानवर और वनस्पतियाँ खतरे में है, जब तकनीकी दिमाग वाला इंसान इस बाढ़ की चपेट में है और साल दर साल वह अपने घर और संपत्ति को खो देता है, उसे सड़क भी मुहैया नहीं होती बसर करने के लिए, और सरकारे सिर्फ बाढ़ योजनाओं पर करोड़ों का घालमेल कर चुप बैठ जाती है अगले साल के इन्तजार में, की कब बाढ़ आये और कब पैसा पानी की तरह बहाया जाए अपने अपने घरों में !! अब ऐसे हालातों में उन जीवों की स्थिति क्या होती है, जो प्रकृति के नियमों के मुताबिक़ चलते आये है सदियों से, उन्हें हर उन विपरीत परिस्थितियों से दो चार हो लेने की कूबत रही है जो प्राकृतिक आपदाओं के रूप में आती है, पर इंसानी करतूतों की वजह से इन महा प्रलयों से निपटने की कूबत उनमे नहीं है, जाहिर है इन तमाम जानवरों और वनस्पतियों की प्रजातियाँ इस भयंकर बाढ़ की चपेट में आकर अपना स्थानीय वजूद खो देती है, या किसी दूसरी जगह पर विस्थापित होने की कोशिश करती है जहां इंसान पहले से इनकी ताक में बैठा है इन्हें नष्ट करने के लिए, जानवरों का शिकार वनस्पतियों को उगने से पहले ही कृषि भूमि पर हल चला देता है या परती पडी भूमियों पर कंक्रीट का जंगल तैयार कर देता है, इन प्रजातियों के सुरक्षित रहने की उन सारी संभावनाओं को उजाड़ता हुआ मनुष्य खुद इस प्रलय की गोद में बैठा है.

 


तराई के जनपदों में जब हिमालय से उतरती हुई तेज जलधाराएं जिन्हें राह में पड़ने वाले जंगल पोखर व् परती भूमियाँ अपने आगोश में लेकर शांत करती थी तो ये जलधाराए हमारी नदियों के मुहाने की मर्यादाओं का पालन करते हुए अविरल बहती थी ..कल कल की मंद ध्वनि  के साथ ! किन्तु पहाड़ों से लेकर समतल इलाकों में मौजूद जंगलों का  बेजा कटान तालाबों और स्थानीय छोटी नदियों का विनाश इन जलधाराओं की गति बढाता गया और साथ ही इनकी राहों में सिल्ट (गाद) जमा करता गया, ये सिल्ट घास के मैदानों और जंगलों को ख़त्म कर कृषि भूमि में तब्दील कर देने से पानी के साथ रेत और मिट्टी का बहाव नदियों की राहों में जमा होने लगा नतीजतन नदियाँ अपनी मर्यादाओं को लांघ हमारे शहर घर और सड़क तक आ पहुँची, कोइ है जो समझ सकता है इनका दर्द, और दूर कर सकता है इनकी राहों में पडी उस सिल्ट को, ताकि इनके राहों की गहराई इन्हें अपने में समाये हुए रख सके और इनकी अविरल धारा बंगाल की खाड़ी से समंदर के हवाले हो सके.....

वनों को फिर विकसित करे, घास के मैदानों को दोबारा अस्तित्व में लाया जाए,  तालाबों को और उनकी गहराई को भी सुनाश्चित करे, और जो छोटी छोटी नदियाँ हमारे गाँवों से होकर गुजराती है, इन विशाल नदियों की सहायक होती है उनके अस्तित्व को बचा ले, यह जरूरी है धरती के लिए और इस पर बसने वाले जीवों के लिए .याद रहे .इंसान भी उनमे से एक है अलाहिदा नहीं!


और यह सब  किसी एक कार्ययोजना बना देने से नहीं होने वाला और न ही अरबों कागज़ के नोट खर्च कर देने से हो सकेगा. ये हो सकता है जब समूचा मानव समुदाय अपनी मर्यादा में रहना सीख जाए फिर से सदियों पहले वाला मनुष्य जिसे प्रकृति का सम्मान करना आता हो ....हम अपनी मर्यादा न लांघे तो यकीन मानिए  ये नदियाँ कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघेगी.




 

सम्पादक की कलम से ....
कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com 

Jul 12, 2014

मैं हैरान हूं, परेशान हूं मैं गोमती हूं




० एक नदी की व्यथा कथा

हरिओम त्रिवेदी*

पुवायां। मैं गोमती हूं। कुछ लोग मुझे आदिगंगा के नाम से भी पुकारते हैं।  इंद्र ने एक बार गौतम ऋषि का रूप धर कर उनकी पत्नी अहिल्या से छल किया था। कुपित गौतम ऋषि ने इंद्र और अहिल्या को श्राप दे दिया था। काफी अनुनय, विनय करने पर गौतम ऋषि ने श्राप मुक्ति के लिए इंद्र को मेरे तटों पर १००१ स्थानों पर शिवलिंग स्थापित कर तपस्या करने को कहा था। इंद्र ने मेरे तटों पर शिवलिंगों की स्थापना कर तपस्या की तब कहीं जाकर उनको ऋषि के श्राप से मुक्ति मिल सकी। इंद्र को श्राप से मुक्ति मिल गई लेकिन मैं आज प्रदूषण, जलीय जीवों की हत्या, तटों पर की जा रही खेती से इस कदर घायल और व्याकुल हूं कि आज मुझे भी किसी भागीरथ की दरकार है। 

मेरी यात्रा पीलीभीत जनपद के माधौटांडा कसबे के पास (गोमत ताल) फुलहर झील से शुरू होती है। पीलीभीत में उद्गम स्थल के अलावा त्रिवेणी बाबा आश्रम, इकोत्तरनाथ, शाहजहांपुर में सुनासिरनाथ (बंडा), बजरिया घाट, पन्नघाट, मंशाराम बाबा, भंजई घाट, मंझरिया घाट, लखीमपुर में सिरसाघाट, टेढ़ेनाथ बाबा, मढिय़ा घाट, हरदोई में धोबियाघाट, प्राकृतिक जलस्रोत, हत्याहरण, नल दमयंती स्थल, सीतापुर में नैमिषारण्य, चक्रतीर्थ, ललिता देवी, अठासी कोस परिक्रमा, दधीचि आश्रम, मनोपूर्णा जल प्रपात, लखनऊ में चंद्रिका देवी मंदिर, कौडिन्य घाट, मनकामेश्वर मंदिर, संकटमोचन हनुमान मंदिर, बाराबंकी में महदेवा घाट, टीकाराम बाबा, सुल्तानपुर में सीताकुंड तीर्थ, धोपाप, प्रतापगढ़ में ढकवा घाट, जौनपुर में जमदग्नि आश्रम, वाराणसी में गोमती गंगा मिलन स्थल, मार्कडेश्वर नाथ आदि आश्रम और तट हैं। मुझे सदानीरा बनाने में पीलीभीत में वर्षाती नाला, शाहजहांपुर में  झुकना, भैंसी, तरेउना, लखीमपुर में छोहा, अंधराछोहा, सीतापुर में कठिना, सरायन, गोन, लखनऊ में कुकरैल, अकरद्दी, बाराबंकी में रेठ, कल्याणी, सुल्तानपुर में कादूनाला, जौनपुर में सई नदी का योगदान रहता है। ९६० किमी का सफर तय कर बनारस गाजीपुर के बीच मार्कण्डेय आश्रम के पास मैं गंगा मैया की गोद में विश्राम लेती हूं।

पीलीभीत से मार्कंडेय आश्रम तक के सफर में तमाम लोग मेरे कई रूप देखते हैं लेकिन मैं अपने ममतामयी मन से सभी का कल्याण करने की भावना लेकर निरंतर चलती रहती हूं। कहा गया है कि 'वृक्ष कबहुं नहिं फल भखै नदी न संचय नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीरÓ। अब साधु को अपनी पीड़ा किसी से कहने की क्या जरूरत है लेकिन आज मेरा मन आपसे अपनी पीड़ा कहने का हो रहा है। इस पीड़ा के पीछे मानव के साथ ही जीव जंतुओं और पेड़ पौधों का भला छिपा हुआ है। इस कारण मुझे उम्मीद है कि आप मेरी पीड़ा को पढ़ेंगे, समझेंगे और इस पर ध्यान भी देंगे। 

मैं धीरे -धीरे बहती हुई पर्यावरण की रक्षा के लिए अहम पेड़ पौधों को सिंचित करती हूं। खेतों को पानी देती हूं और लगतार बहते हुए निरंतर आगे बढऩे का संदेश देती हूं। मैं बताती हूं कि गति से ही जीवन का श्रंगार है, मेरे पैरों में दीवार ना बांधो। मैं कहती हंू कि रास्ते कितने भी मुश्किल क्यों न हों वह हासिल जरूर होते हैं। मैं यह भी संदेश देती हूं कि सब कुछ सहकर भी आगे बढऩे को ही धार कहते हैं। मैं बताती हूं कि सीमाएं कुछ भी नहीं होती। यह कैसे तोड़ी जाती हैं और तोड़कर फिर कैसे जोड़ी जाती हैं। युवाओं को मेरा संदेश होता है कि अपना पथ अपने आप चुनना चाहिए। अपनी रफ्तार, अपनी कश्ती और अपनी पतवार से आगे बढ़ा जा सकता है। सागर के घर पहुंचकर मैं थोड़ा रूकती हूं, सुस्ताती हूं, स्थिरता का सुख लेती हूं, इसकी तह तक जाती हूं। इसके बाद सूर्य की किरणों से गर्मी लेकर बादलों का रूप धर फिर से परोपकार के लिए मैदान में आ जाती हूं। 

अपनी कहानी सुनाते हुए अब मेरा मन बेहद आहत हो चला है। कारण यह है कि मेरा भविष्य मुझे चिंता में डाल रहा है। जिस मनुष्य के लिए मैं इतना सब करती हूं वह थोड़े लालच में मेरे घर आंगन में रहने वाले जीवों की हत्या कर रहे हैं। इससे मुझमें गंदगी बढ़ती जा रही है। मेरे तट तक अतिक्रमण कर लिया गया है। खेतों में डाली जाने वाली जहरीली दवाओं का असर है कि मेरे घर में रहने वाले जंतु मरते जा रहे हैं। तटों के पेड़ पौधे बेरहमी से काटे जा रहे हैं। मैं उनकी करूण पुकार सुनकर भी कुछ नहीं कर पाती हूं। लोग घरों में हवन आदि कराने के बाद राख, कागज, सूखे फूल आदि मेरे ऊपर फेंक देते हैं। लोग मुझे मां कहते हैं, क्या कोई अपनी मां के ऊपर भी गंदगी फेंकता है। इस गंदगी में मेरा दम घुटने लगा है। जहरीले पानी और कचरे से मेरे घर के जीव मर रहे हैं इससे घर में गंदगी बढ़ती जा रही है। पीलीभीत में जहां से मैं निकलती हूं वहां से शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई में कई जगह मुझे बांध दिया गया है। अब भला मां को बांधने से कैसे कल्याण हो सकता है लेकिन यह बात कोई समझता ही नहीं है। लखनऊ, सुल्तानपुर, जौनपुर से लेकर वाराणसी तक मेरी धार चलती रहती है लेकिन इसमें कारखानों का इतना गंदा पानी मिल चुका होता है कि मेरा अमृत समान पानी जहर बन चुका होता है। तटों तक खेती के कारण जहरीली दवाओं का असर मेरे नस-नस में भर चुका है। ऐसे में मैं जीवनदायिनी कैसे रह पाउंगी। तटों और जंगलों के पेड़ काटने से बारिश नहीं होगी तो मुझमें पानी कहां से आएंगा, खेतों की सिंचाई कैसे होगी?  मैं जो सोंच रही हूं, जिस कारण छटपटा रही हूं आप वह क्यों नहीं सोंचते? कब सोचेंगे जब मेरी मौत हो जाएगी, फिर सोंचने से क्या होगा? क्या कोई भागीरथ नहीं है जो मुझे प्रदूषण, जहरीली खेती की दवाओं, कारखानों के गंदे पानी से बचा सके। क्या कोई ऐसा नहीं है जो मेरे पैरों में बेड़ी डालने वालों को रोक सके। मैं गोमती अपने भागीरथ के इंतजार में हूं।  कब पूरी होगी मेरी प्रतीक्षा..... 

*हरिओम त्रिवेदी
मो. रायटोला, कसबा खुटार जिला - शाहजहांपुर
 
hariomreporter1@gmail.com
मो. 9473972828, 9935986765

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था