डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 26, 2014

200 करोड के पौधे खा गया वन विभाग

जंगल दफ्तर ने लूटा जंगल
 
बांदा। बुंदेलखंड में हरियाली के नाम पर मानसून के साथ धन खूब बर्बाद किया गया। हर साल नए पेड़ लगाने के नाम पर वित्तीय वर्ष में लंबा बजट खर्च होता है। जिन स्थानों पर पौधे रोपित किए जाते है, गर्मी आते ही वहां मैदान नजर आता है। तमाम नौकरशाह हरियाली के इस खेल में हरे-भरे हो गए, लेकिन बुंदेलखंड के हिस्से सूखा और बियावान जंगल ही आए।
योजनाएं बनाकर धन को ठिकाने लगाने का काम कैसे किया जाता है, ये हुनर जंगल दफ्तर को बखूबी आता हैं। सरकारी तंत्र को चाहिए कि देश में भ्रष्टाचार की मंड़ी और अधिक मजबूत करने के लिए वन विभाग को अगवाई में रखे। अधिकारियों ने न सिर्फ पुराने गड्ढों में साल दर साल पौधों की बेड लगाई बल्कि कागजों में ही हरियाली ला दी। मानकों की बात करें तो राष्ट्रीय वन नीति के तहत 33 फीसदी वन क्षेत्र जिले के कुल भूमि पर मौजूद होना चाहिए। वित्तीय वर्ष 2014 में 29 लाख पौधे चित्रकूट धाम मंडल बांदा के चार जिलों में रोपित किए जाने हैं। तैयारी शुरू हो चुकी हैं। पुराने गड्ढों की घास हटाई जा रही है और 29 लाख के पौधों की खेप इन्हीं गड्ढों में फिर दफन किए जाएगें। 

वन विभाग के स्थानीय अधिकारियों से बात करो तो गोल-मोल जबाब मिलता है। बांदा वन प्रभाग के डीएफओ प्रमोद कुमार कहते हैं कि रोपित पौधों के बाद कितने पौधे जीवित रहते हैं यह कहना कठिन है! 

बांदा वन रेंज में यूं तो कई फारेस्ट रेंजर कार्यरत हैं, लेकिन इन सभी के सेनापति टीएन सिंह पूरे जिले की हरियाली को जिंदा रखने का भार उठाए हैं। यह और बात है कि वन विभाग की काॅलोनी में एयर कंडीशन हवा के बीच उन्हें घर बैठे ही सूखे बुंदेलखंड की शीतल हवा मिलती रहती है। आंकड़ों की बाजीगरी इस तरह की गई कि संख्या के आंगे जीरो बढ़ते रहे और हर साल का बजट मजबूत होता गया। 

- पेड़ों से वीरान हाईवे 
 
नेशनल हाईवे 76 जो अब 35 हो गया है बांदा-इलाहाबाद, बांदा-झांसी, बांदा-कानपुर में हजारों ब्रिटिश कालीन महुआ और नीम के पेड़ अब नेस्तानाबूत हैं। बांदा और हमीरपुर में वर्ष 2000 से 2010 तक 60917 पौधे जेसीबी मशीन से सड़क चैड़ीकरण के नाम पर उखाड़ दिए गए। इन पेड़ों के नीचे कभी आम राहगीर सुकून के दो पल गुजार लेता था। आज यही सड़क चटीयल कंक्रीट का हाईवे है। बुंदेलखंड में घटते हुए वन क्षेत्र की तस्दीक के लिए यह तस्वीर काफी है कि यहां बांदा में 1.21 फीसदी, महोबा 5.45, हमीरपुर 3.06, झांसी 6.66, चित्रकूट सर्वाधिक 21.08 और जालौन 5.06 फीसदी जंगल शेष है। 

- पौधे लगाए नहीं काट दिए हजारों
 
बंुदेलखंड में इस अवधि में 31056 हरे पेड़ सिर्फ घरों में काट दिए गए। इसमें 24500 आम के पेड़ तथा 6556 अन्य पेड़ शामिल हैं। वन संरक्षण अधिनियम 1976 के मुताबिक एक गृह स्वामी को पेड़ काटने पर वन विभाग के समक्ष 15 दिन के अंदर 2 पेड़ लगाने का शपथ पत्र देना होता है। पेड़ काटने से पहले जमानत राशि जमा करनी होती है और अनुमति मिलने के बाद ही सेक्टर रेंजर की उपस्थिति में वह घरों में लगे कीमती पेड़ मसलन सागौन, महुआ, नीम, शीशम, चिरौल, कैथा, जामुन, रीठा, कटहल, पीपल, सेमल, अर्जुन, खैर, शमी, आॅवला, शहजन, गूलर, कंजी आदि के पेड़ काट सकता है। ललितपुर जिले को छोड़कर बुंदेलखंड के अन्य 6 जनपद शपथ पत्र देने और जमानत राशि के मामले में शिफर रहे। 

- कहां गए 200 करोड़ के पौधे
 
बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, ललितपुर और झांसी में वित्तीय वर्ष 2005-06 से मार्च 2010-11 तक वन विभाग ने जंगल आबाद करने के नाम पर 20027.326 लाख रूपए खर्च कर दिए इन रुपयों से 15.91 करोड़ पौधे लगाने का दावा किया गया। जिन स्थानों पर पौधे लगाए गए उनके नाम बताने पर वन विभाग को पसीना आ जाता है। पौधों की जगह मैदान है मगर जंगल दफ्तर का हाजमा बड़ा दुरूस्त है। बांदा में 2011-12 में 157300 पौधे तथा 2012-13 में 239075 पौधे लगाए गए। हकीकत तो यह है कि जिन गड्ढों में पौधे लगे उनके आस-पास पशु पक्षी भी नहीं जाते हैं धूप की तपिश के चलते। स्रोत- सूचना अधिकार से प्राप्त 

- पेड़ों के रखरखाव के लिए बनी हैं समितियां 
 
बुंदेलखंड के सभी जनपदों में ग्राम वन समिति बनाई गई है। जिसमें उसी ग्राम पंचायत के 6 से 7 सदस्य महिला और पुरूष को लगे हुए पौधों के देख-रेख की जिम्मेवारी वन विभाग ने दे रखी है। इसके लिए इन्हें बकायदा मानदेय भी दिया जाता है। मगर बुंदेलखंड में वन विभाग के अंदर सभी जनपदों में फारेस्ट रेंजर टीएन सिंह एंड कंपनी जैसे बहुसंख्यक मोटी चमड़ी के सिपाही तैनात हैं। जिनकी तर्ज पर ये ग्राम वन समितियां भी लगाए गए पौधों से खिलवाड़ करती हैं। बानगी के तौर पर शासनादेश संख्या 328/14.05.2011 वन अनुभाग 5 26 अप्रैल 2011 के अनुसार बुंदेलखंड एवं विध्यांचल क्षेत्र में 2011-12 में 2.50 करोड़ पौधरोपण का विशेष अभियान चलाया गया था। इसी प्रकार वर्ष 2010 में मनरेगा योजना से 7 जनपदों में विशेष वृक्षारोपण अभियान के तहत 10 करोड़ पौधे लगाए गए। इनकी देखरेख के लिए उत्तर प्रदेश के तत्तकालीन सचिव मनोज कुमार सिंह ने शासनादेश संख्या 7605/38-7-10-120 एसआरडी/10टीसी-1 के क्रम में 10 लाख वंचित परिवार -100 दिन का रोजगार कार्यक्रम चलाया था। इसके लिए नोडल एजेंसी का चयन किया गया जिसमें सचिव ग्राम्य विकास अध्यक्ष, आयुक्त ग्राम्य विकास सदस्य, निदेशक गिरि इस्टीट्यूट लखनऊ, निदेशक अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट सदस्य, अपर आयुक्त मनरेगा, सदस्य सचिव, उपायुक्त मनरेगा सदस्य नियुक्त किए गए थे। इन दस करोड़ पौधों का अकेंक्षण का मूल्यांकन थर्ड पार्टी से भी कराया गया। प्रदेश की 74 वंचित वर्ग की जातियों को इन पौधों से मनरेगा योजना से मजदूरी भुगतान की गई। तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री बसपा सरकार ने अपनी अगवाई में इस नोडल एजेंसी का चयन किया और बुंदेलखंड व विध्यांचल पर्वत की तलहटी में हरियाली के नाम पर करोड़ों रुपयों का बंदरबांट कर दिया गया। स्वंयसेवी संस्थाओं से लेकर प्रदेश के आलाधिकारियों यथा तत्कालीन अपर आयुक्त चंद्रपाल अरुण ग्राम्य विकास विभाग की पांचों उंगलियां भ्रष्टाचार मंे डूबी रहीं और आज तक मामला फाइलों में बंद है। 

- बेमानी हो गए 55 ड्राई चेक डैम
वन विभाग ने किए गए पौधरोपण को बचाने और पहाड़ों से बहकर आने वाले बारिश के पानी को रोकने के लिए 55 ड्राई चेक डैम अकेले बांदा जनपद में बनाए। यह संख्या 7 जनपदों में करीब 385 के करीब या उससे अधिक है। ड्राई चेक डैम ऐसे स्थानों में बनाए गए जहां आम आदमी पड़ताल भी न कर सके। बांदा जिले के फतेहगंज क्षेत्र में कोल्हुआ के जंगल, सढ़ा ग्राम पंचायत के आनंदपुर नजरे व मध्यप्रदेश की सीमा से लगे विध्यांचल की तलहटी में ड्राई चेक डैम तैयार किए गए। तकनीकी आधार पर और गुणवत्ता के नाम पर मजाक करते हुए अकेले बांदा जनपद के ये 55 डैम न तो पशुओं को पानी दे सके और न ही नवजात पौधों को हरियाली। इसी इलाके के ग्राम आनंदपुर में 19 जून 2013 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथों 50 एकड़ भूमि पर वन विभाग ने हरित पट्टिका अभियान से वृहद पौधरोपण अभियान का पत्थर लगवाया था। एक साल बाद विध्यांचल के किनारे बसे इस गांव में न तो हरित पट्टिका का नामों-निशान है और न ही पौधों की बेड़। हां मुख्यमंत्री के नाम का बड़ा सा पत्थर कटीले तारों की गिरफ्त में गांव वालों को मुंह चिढ़ाता है। इस गांव के बाशिंदे चंद्रपाल कोरी ने बताया कि वन विभाग के कर्मचारी खुद ही बीस-बीस किलो तार लगाई गई बेड़ में बेच लिए हैं। 

गर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लाइन सफारी की तरह बुंदेलखंड के बीहड़ में वास्तव में ईको टूरिज्म का विकास करना चाहते हैं तो यहां विलुप्त होते वन्य जीवों को संरक्षण प्रदान करने के लिए इन जंगलों का बचाना बेहद लाजमी है। जरूरी यह है कि पिछले एक दशक मंे लगाए गए पौधों की सीबीआई जांच करा ली जाए तो कितने सफेदपोश अधिकारी बेपर्दा होंगे यह देखने वाली बात होगी। 



- आशीष सागर दीक्षित (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन्य जीवन के सरंक्षण में महती भूमिका, जल व् पर्यावरण के लिए सूचना के अधिकार को अस्त्र बनाकर बुंदेलखंड में हुई तमाम सरकारी बेईमानियों को उजाकर कर चुके है, बांदा में निवास इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.)


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