International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

May 30, 2013

मगर मैं आदमी हूँ वही सदियों पुराना ...

Photo Courtesy: deskarati.com
प्रकृति और जीवन 

आदमी की कहानी: मगर मैं आदमी हूँ वही सदियों पुराना ...


जैसे जैसे  लोग इस पृथ्वी पर फैलते गए उसी प्रकार पृथ्वी के साथ मानव के संबंधों की बहुत परिष्कृत व्यवस्था बनती गयी. विख्यात नवजाति विज्ञानी लेविन और चेबोक्सारोव  के सुझाव अनुसार इन व्यवस्थाओं को जीवन-यापन या जीवन निर्वाह की संस्कृति कहना चाहिए. इसकी परिभाषा उन्होंने इस प्रकार दी है,

“किसी ठोस प्राकृतिक परस्थितियों में बसे जनगण के सामाजिक-आर्थिक विकास के निश्चित स्तर पर उनके जीवन निर्वाह और संस्कृति की जो विशेषताएँ उस जनगण के लिए लाक्षणिक होती हैं, उन विशेषताओं को ऐतिहासिक तौर पर अस्तित्व में आई समग्रता के जीवन-निर्वाह की संस्कृति-प्रारूप कहा जाता है. निश्चित भूगोलिक परस्थितियों से जुड़े जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की धारणा विज्ञान के लिए बहुत लाभप्रद सिद्ध हुई हैं. इसके परिणामस्वरूप जनगण की संस्कृति में समानताओं और विभिन्नताओं के अनेक प्रश्नों के उत्तरों की खोज संभव हुई.हैं.”

लेविन और चेबोक्सारोव इसी बात पर जोर देते हैं. उन्होंने अपने प्रस्तावित रूपों को मात्र जीवन-यापन प्रारूप ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक जीवन-यापन प्रारूप कहा है. ऐसा कहना अकारण नहीं है. बात यह है कि जीवन-यापन संबंधी कार्यकलापों की दिशा और भूगोलिक परिवेश बहुत हद तक जनगण की भौतिक संस्कृति की विशेषता – पद्धतियों और आवासों के प्रारूप, परिवहन साधन, भोजन और गृह-गृहस्ती का सामान, वेशभूषा आदि निर्धारित करते हैं. नवजाति विज्ञानिकों ने विश्व में कई दर्जन जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की गणना की है. इनकी सही सही गिनती बताना कठिन है क्योंकि अलग-अलग विज्ञानी अपने सिद्धांतों के लिए अलग-अलग वर्गीकरण का वैज्ञानिक आधार तैयार करते हैं. इसलिए भिन्न-भिन्न प्रकार के आंकडों की प्रस्तुति होती है. लोग कहाँ-कहाँ नहीं रहते ? उत्तरी ध्रुव प्रदेश में और उष्ण कटिबद्ध में, तिब्बत के पर्वतों में और एशिया , ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के रेगिस्तानों में! संसार के कोने-कोने में लोग बसे हुए हैं. कडाके की ठण्ड और झुलसा देने वाली गर्मी में भी! खतरनाक हिंसक जानवरों के बावजूद वे हर जगह रहने में सफल हुए हैं क्योंकि वे वहां की भूगोलिक परस्थितियों के अनुरूप संस्कृति या दूसरी प्रकृति का निर्माण करने में सफल हुए हैं.

एस्किमो लोगों के जीवन को लें. उनका जीवन कितना कठिन हैं. वहां ऐसा कुछ नहीं है कि वहां बहुत ज्यादा वनस्पति हो या उनके लिए बहुत ज्यादा वृक्षों या खाने-पीने का चुनाव करने की सहूलियत हो. उनका प्राकृतिक क्षेत्र अनेक महीनों की सर्दी और कई महीने लंबी रात – छः महीनों की रात और कहीं-कहीं तो आठ से दस महीनों की भी रात है. चारों तरफ बर्फ ही बर्फ ! निसंदेह कनाडा के प्रसिद्ध  नवजाति विज्ञानी और अनुसंधानकर्त्ता फारली मोइक का यह कहना दरुस्त है कि उत्तरी ध्रुव प्रदेश बर्फ द्वारा जमीं हुई नदियों और हिमकवच से जकड़ी हुई झीलों का ही नहीं बल्कि सजीव नदियों का भी जगत है जहाँ गर्मियों में नीला गगन झांकता है, जहाँ तटों पर फूलों का कालीन बिछता है और जहाँ पर हरी-भरी विशाल चरागाहें भी हैं. उत्तर ध्रुव प्रदेश एक विशाल भूखंड है जहाँ जबरदस्त गर्मी भी होती और भयानक ठण्ड भी. यहाँ लोग शिकारी और मछली पकड़ने वाले बनकर ही अपने अस्तित्व को बनाये रख सकते थे.

उपरोक्त जानकारी हासिल करने से  हमारा आशय क्या है? हमें बताया जाता है कि मूलरूप से हम शाकाहारी हैं. हमें फलां खुराक खाने और फलां खुराक न खाने के सुझाव दिए जाते हैं. हमें बताया जाता है कि फलां खुराक ही हमारे लिए परमात्मा द्वारा निर्धारित की गयी है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. जब तक मनुष्य स्वयं उत्पादन की क्रिया में शामिल नहीं  हुआ तब तक उसे  अपनी खुराक के लिए उस इलाके की परस्थितियों और उपलब्धता पर निर्भर रहना पड़ता था.

उत्तरी ध्रुव के मूल निवासी तरह-तरह के मकान बनाते थे. कुछ जनजातियाँ उत्तरी अमेरिका के तटों पर तहखाने रुपी मकान बनाते थे. जमीन में गढा खोदकर पत्थर की दीवारें खड़ी की जाती थीं जो जमीन से थोडी ऊपर की ओर उभरी होती थीं. इन्हें छत से ढांप दिया जाता था. मकान के अन्दर पहुँचने के लिए गहरी सुरंगों से होते हुए जाया जा सकता था. इन सुरंगों की दीवारें भी पत्थरों की बनी होती थीं जिनके ऊपर भी पत्थरों के छत होती थीं. अलास्का में इस प्रकार के मकानों में पत्थर के स्थान पर लकड़ी के तख्ते इस्तेमाल किये जाते थे. बहुत ही संकरी सुरंग द्वारा इसके अंदर प्रवेश किया जा सकता था. ऐसा दुश्मनों और जंगली जानवरों से बचाव हेतू किया जाता था. लेकिन अगर न पत्थर हो और न ही लकड़ी, तब क्या किया जाये? इस स्थिति में लोग मकान बनाने हेतू बर्फ का प्रयोग करते थे. आज भी ग्रीनलैंड के मैदानों में एस्किमों लोग अपने प्रसिद्ध मकान इग्लू बनाने के लिए बर्फ का प्रयोग करते हैं. एस्किमों राज-मिस्त्रियों की मुहारत हैरानकुन है. बर्फ की सीलियों को काटकर  इस प्रकार रखा जाता है कि एक गोल गुबंद खडा हो जाता है. इन बर्फ की दीवारों को मजबूत करने के लिए इस गुबंद के अन्दर एक दिया जो सील मछली की चर्बी से जल रहा होता है, ले जाया जाता है. इसकी गर्मी से बर्फ की दीवारों की अन्दर की ओर की कुछ बर्फ पिघल जाती है और दीवारों से थोडा-थोडा पानी सरकाना शुरू हो जाता है. इसके बाद ठंडी हवा को अन्दर प्रवेश करने दिया जाता है जिससे यह पानी जम जाता है और सीलियाँ आपस में मजबूती से जुड़ जाती हैं और इनके बीच का खालीपन ख़त्म हो जाता है. इसके पश्चात कुछ ही घंटों और दिनों में इग्लू की दीवारें बहुत मजबूत हो जाती हैं क्योंकि इनपर बर्फ का जमना जारी रहता है. इग्लू में प्रवेश करने का ढंग बहुत अजीब है. यह अकेला ऐसा मकान है जिसमें बर्फ की ही बनी हुई लम्बी सुरंग द्वारा फर्श से (दीवार में दरवाजा नहीं रखा जाता) प्रवेश किया जाता है.

संसार के दूसरे मकानों के मुकाबले इग्लू को आरामदायक कतई नहीं कहा जा सकता. इसकी ऊंचाई लगभग दो मीटर और व्यास तीन-चार मीटर होता है. इस थोडी सी जगह में भी दो परिवार रहते हैं. अगर चाहें तो इग्लू को बड़ा भी बनाया जा सकता है. अपनी सभाए आयोजित करने के लिए एस्किमों लोग बारह-बारह मीटर व्यास के इग्लू भी बनाते हैं. वहां मकान सामग्री बर्फ है जिसकी कोई कमीं नहीं है. लेकिन समस्या यह है कि मकान को गरमाने के लिए सील की चर्बी के दीये और मानवी शरीर से निकलने वाली गर्मी की आवश्यकता होती है. इसलिए स्वाभाविक है कि मकान जितना छोटा होगा उतना गर्म भी आसानी से होगा. इसमें गर्मी में भी रहा जा सकता है. यह सर्दी से ही नहीं गर्मी से भी बचाव करता है. वैसे तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश में गर्मी की ऋतु बहुत छोटी होती है और गर्मीं की इस ऋतू में भी वहां कोई विशेष गर्मीं नहीं होती. गर्मियों में इग्लू में प्रवेश करने के लिए फर्श के साथ दीवार में सुराख़ किया जाता है. बर्फ की दीवारें रोशनी को अन्दर जाने देती हैं. इसमें खिड़कियाँ भी रखी जा सकती हैं. दीवारों में सुराख़ किया जाता है और बर्फ की पतली और पारदर्शक पर्त लगा दी जाती है. आमतौर पर ऐसा किया भी जाता है. ऐसा लगता है कि यूरोप के मकानों की बनवाट के बारे में जानकारी होने के पश्चात एस्किमों लोगों ने इस प्रकार की खिड़कियाँ लगाने के प्रयोग करने शुरू कर दिए थे. पहले ऐसा नहीं था.

सदियों पहले इग्लू किस प्रकार के रहे होंगे, यह कोई भी नहीं बता सकता. इन मकानों की आयु ज्यादा लंबी नहीं होती. इसलिए इन मकानों की खोज पुरातत्वविदों को निराश ही करती है. हाँ, हम इतना जरूर जानते हैं कि इग्लू में बसने वाले लोगों की सभ्यता के तत्त्व मौजूद हैं. यहाँ खिड़कियों में समुद्री जीवों की पारदर्शक अंतड़ियों का प्रयोग किया जाता था. घर के अन्दर चारों तरफ समूर वाले जानवरों की खालें टंगी होती थीं. परंतु यहाँ भी ग्रीनलैंड की भांति सारा फर्नीचर बर्फ का ही होता था जो चमड़े और समूर से ढंका होता था. सारा फर्नीचर बर्फ के बेंचों के रूप में होता था जिनपर लोग बैठते, खाना खाते और आराम करते थे. वैसे औजारों और हथियारों के लिए इग्लू की काख में बर्फ की छोटी-छोटी कोठियां भी बनाई जाती थीं.  जमीन में गढा खोदकर उसमें खाने-पीने की वस्तुएं भी रखी जाती थीं. बेरन जलडमरू के मध्य तटों पर रहनेवाले एलउत लोग व्हेल मछली की पसलियों को जमीन में गाड़कर और उनपर सुखी घास बिछाकर घर बनाते थे. बाद में व्हेल मछलियों की हड्डियों के स्थान पर समुद्र में आनेवाले वृक्षों के तनों का प्रयोग होने लगा. ये मकान ग्रीनलैंड के इग्लू मकानों से कहीं अधिक बड़े होते थे. इन मकानों का क्षेत्रफल सौ वर्ग मीटर से भी अधिक हो सकता था. पर बड़े मकानों में लोग और भी अधिक तंगी का शिकार होते थे. इस प्रकार के मकानों में लगभग पचास परिवार अपने-अपने रहने का हिस्सा टाट द्वारा बाँट लेते थे.

उपरोक्त सभी कौमें उस जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूप का उदाहरण हैं जिसमे प्राकृतिक संपत्ति को मात्र हस्तगत किया जाता है. यहाँ कोई उत्पादन नहीं किया जाता. यह भी उस उपकरण की प्रतिनिधि है जिसको समुद्री जीवों के उत्तर ध्रुवीय शिकारी कहा जाता है. एस्किमों, तिप्ता, एलउत आदि का शिकार बहुत विभिन्नता लिए हुए नहीं है. व्हेल, सील, वालरस, सफ़ेद रींछ आदि का ही शिकार किया जाता है. इनका शिकार आसानी से किया जा सकता है क्योंकि एक या दो प्रकार के जीवों के शिकार के लिए बहुत अधिक मुहारत की आवश्यकता नहीं पड़ती. पत्थर, हड्डी, व्हेल के बालों और समुद्र में बहकर आनेवाली लकड़ी से कई तरह के औजार – लड़ाई के और गृह-गृहस्ती में काम आनेवाले  – बनाये जाते थे. लकड़ी के ढांचे और खालों को तानकर बनायीं गयी इनकी नावें हलकी फुलकी होती थीं. व्हेल के शिकार के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जाने के लिए बनी इन नोकाओं में एक सौ से भी अधिक व्यक्ति बैठ सकते थे.

उत्तर ध्रुवीय निवासी लोगों के वस्त्र गर्म और आरामदायक होते थे. अन्तरिक्ष में जानेवाले लोगों के वस्त्र इन्हीं लोगों के वस्त्रों की नक़ल अनुसार बने हुए हैं. यूरोपीय लोगों का कोट पैंट भी किसी हद तक इन लोगों के वस्त्रों के आधार पर बनाया गया है. उत्तर ध्रुवीय प्रदेश और शीतोष्ण और उष्ण कटिबद्ध प्रदेश , जहाँ-जहाँ पर लोगों ने ख़ास किस्म का शिकार अपना लिया – फंदे, जाल, धनुष और बर्छिया बना ली और बंजारे  शिकारी और कंदमूल इकठ्ठा करनेवालों के स्थान पर लम्बे समय के लिए रहने के लिए बस्तियों का निर्माण कर लिया गया – वे वहां के स्थाई निवासी बन गए और उन्होंने औजारों और आहार के भण्डारण के तरीकों को खोज निकला. दूसरे शब्दों में, जहाँ हस्तगतकरण पर आधारित जीवन पद्धति ने उत्तम रूप धारण कर लिया वहां बहुविधि-भौतिक-आत्मिक संस्कृति का निर्माण हुआ और जटिल संरचनाएं प्रकट हो गयीं.



 कई धार्मिक लोग कहते हैं कि जिसे चोंच मिली है उसे चुगा भी मिलेगा, परमात्मा पत्थरों में भी कीडों को देता है, उबलते पानी में भी जीव मिलेगा. जबकि सभ्यता और सस्कृति का इतिहास इससे उल्ट खून-पसीने से लबरेज है. हमारे बड़े-बूढेरे कंदमूल इकठ्ठा करते थे और शिकार किया करते थे. हाथ में लाठियाँ लिए वे वनों, मैदानों, तपते रेगिस्तानों में घूमते रहते थे. उन्हें खाए जा सकने वाले फलों, सब्जियों और कन्दमूलों की हजारों किस्मों के गुण और लक्षणों का पता था. अब हम उनके नाम और पहचान से अनभिज्ञ हैं. शिकारी अपने शिकार की आदतों के जानकर थे.

२० सदी के एक प्रसिद्द नरविज्ञानी लुई स्विकी अफ्रीकनों की परंपरागत शिकार विधियों का निरक्षण करते हुए इस नतीजे पर पहुंची कि खरगोश को पकड़ना कोई मुश्किल कार्य नहीं है. हमारे यहाँ भी अगर हम खरगोश पकड़ने वालों से बात करें तो  हमें पता चल जाता है कि दिन के समय खरगोश जिस रास्ते से होकर गुजरता है, उसी रास्ते से ही वापस आता है. ख़रगोश और अन्य जंगली जानवरों को जिन्दा रहने के लिए भोजन बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है. उन्हें अपनी उर्जा को बचाकर रखना होता है. निश्चित मार्गो पर चलकर ही वे ऐसा कर सकते हैं. शिकारियों को बस उनके रास्ते में बैठना या जाल अथवा शिकंजा लगाना होता है. लुई स्विकी लिखती हैं कि खरगोश शिकारी को देखते ही दौड़ना शुरू कर देता है. खरगोश की यह खासियत है कि मुड़ते समय वह अपने कानों को पीछे पीठ के साथ सटा लेता है. शिकारी समझ जाते हैं कि यह अब बाएं या दायें मुडेगा. मान लीजिये शिकारी दायीं और भाग रहा है और उसका अनुमान सही रहता है तो शिकार सीधा उसकी झोली में आ गिरेगा. अगर वह बायीं और भी मुडेगा तो वह पास की किसी झाडी में छुपेगा. खरगोश यह जानता है कि उसकी चमडी का रंग उसे छुपाने में मदद करेगा. लेकिन मानव की आँखे तो सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज को देखने के योग्य है. मानव बेशक तेज नहीं दौड़ सकता लेकिन बुद्धिमान होने के कारण उसे जानवरों की आदतों के बारे में पता है. मनुष्य के शरीर का गठन इस प्रकार का है कि शिकार के दौरान वह बाखूबी अपने ज्ञान का उपयोग कर सकता है.

शिकार के समय प्राचीन मानव ही नहीं बल्कि आज के मनुष्य भी बड़ी सहनशीलता का सबूत देते हैं. जैसे पानी में कांटा डालकर लम्बे समय तक मछली के फंसने का इंतजार करना. इसी प्रकार शिकार करते समय वे अपने कुत्तों के पीछे मीलों दूर तक निकल जाते हैं. मैक्सिको के तारामोरा इंडियन हिरणों का तब तक पीछा करते हैं जबतक वे थककर निढाल नहीं हो जाते. वे दो-दो, तीन-तीन दिनतक जानवरों का पीछा करते रहते हैं. रास्ते के हर छोटे टुकड़े पर हिरण मानव को आसानी से पीछे छोड़ देता है. पर मानव उसके पैरों के चिह्नों की खोज जारी रखता है. खोज बताती है कि यह मानव नहीं बल्कि हिरण ही होता है जो मानव से पहले थकता है. अगर शिकारी पशुओं के रास्ते जानता है या उसे विश्वास है कि पशु अपने प्राणों की रक्षा करते हुए वक्र रेखा में दौड़ता जायेगा तो शिकारी अपनी उर्जा और ताकत बचाते हुए सीधा उसके पास , अनुमानित स्थान पर पहुँच जाता है.

शिकारी और कंदमूल के संग्रहकर्त्ता उद्यमी और जिज्ञासू लोग थे. पशु-पक्षी और वनस्पतियों के बारे, अपने चौगिरदे और संसारव्यापी  घटनाओं के बारे, हर नई जानकारी उनके ज्ञान और अनुभव को बढाती रही. इस काल के दौरान मानव प्रकृति से उसकी देन लेता रहा और साथ-साथ प्रकृति की नई-नई देनों को लेने की तरकीब सीखता गया. शिकारी और संग्रहकर्त्ता उन हालातों में जीने के अनुकूल सिद्ध हुए. वे पृथ्वी के बड़े भूभाग पर बस गए. ऐसा उस समय से बहुत पहले हुआ जब उनके पूर्वजों ने धरती में पहले बीजों की बुआई की और अपने मित्र और सेवकों की खोज की. पर्वतों के उस पार क्या है? अनजान झील,  बड़ी नदी के उस पार क्या है?  ये सदैव उनकी जिज्ञासा का केंद्र रही हैं. प्राचीन काल से रहस्य मानव को भयभीत ही नहीं करता रहा बल्कि आकर्षित भी करता रहा है. और मानव की ज्ञान की प्यास आज भी शांत नहीं हुई है.

अज्ञात और अनजान खतरों से टक्कर लेने वाले लोग हर युग में पैदा हुए हैं. परंतु इन मतवाले लोगों की खोजों को बढाचढा कर नहीं देखना चाहिए. लोगों को नगरों, पर्वतों, सागरों नदियों से पार लेजाने वाली शक्ति यात्रा का चाव नहीं बल्कि उनकी मजबूरी, उनकी जरूरत थी. यूरोप के निवासी बर्फ नदियों के दक्षिणी किनारे पर रहने वाले पशुओं का शिकार करने के लिए वैसे-वैसे ही पीछे चलते रहे जैसे-जैसे नदिया पीछे उत्तर की ओर खिसकती गयी और जानवर पीछे हटते गए. वे अब उन वनों में नहीं रह सकते थे जहाँ पशु-पक्षियों की संख्या कम हो गयी थी. उदाहरण के लिए सूखे के कारण शिकार की संख्या में कमी हो गयी. अपने इलाके में आहार की पूर्ति कम हो गयी. लोगों का एक दल अलग होकर अपने लिए एक नया आवास ढूँढने के लिए निकल पड़ा. या ऐसा हुआ कि बस्ती में कहीं ओर से कुछ नए लोग आ गए. उन्हें भूख ने अपने इलाके से खदेड़ दिया था. उन्होंने यहाँ इस नए इलाके को अपने लिए ठीक समझा. उनकी संख्या और ताकत यहाँ के मूल निवासियों से अधिक थी. इस स्थिति में  मूल निवासियों के लिए मारे जाने या उस इलाके को  छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था.

अमेरिकन इतिहासकार बी. हार्पर ने ऑचएलैउत और मैक्सिकन और उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले एक्सिमों लोगों की जीवन पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन किया है. तुले सभ्यता के एक्सिमों लोगों ने चार सौ वर्षों के दौरान अलास्का से ग्रीनलैंड तक पांच हजार किलोमीटर की दूरी तय की. प्रति वर्ष साढे बारह किलोमीटर. इसके विपरीत द्वीपों पर बसने वाले लोगों की प्रवास की गति कम थी. इस अंतर के पीछे क्या कारण है? एलैउत  लोग उपजाऊ भूमिपर बसे हुए होने के कारण लम्बे समय तक उसी स्थान पर बसे रहते थे जबकि उस स्थान पर जहाँ ज्यादा भ्रमण प्रकट होता है उस बारे में बी. हार्पर लिखते हैं कि यह निरक्षण नई बस्तियों के बसाए जाने से भी संबंधित हो सकता है. अमेरिकी इंडियनों के बूढेरों ने महाद्वीपों पर भू-स्थल के रास्ते प्रवेश किया. यह एक जीव-जंतु रहित मरूस्थलीय इलाका था. वे इसे जल्दी से जल्दी पार कर देना चाहते थे जबकि इसके विपरीत एलैउत लोगों को रास्ते में समृद्ध समुद्रीय परिवेश मिला. इससे नई दुनिया की ओर प्रस्थान करने की उनकी रफ्तार में कमी आई.

कभी तेज तो कभी धीमे, कभी पैदल तो कभी तैरकर या नावों की मदद से, अपने सफ़र को जारी रखते हुए, मनुष्य दक्षिणी ध्रुव के अलावा संसार के हर भू.भाग पर पहुँच गया. आदिम युग के कंदमूल इकठ्ठा करने वाले और शिकारी लोगों को कई बार लंबे समय तक भूखा रहना पड़ता था. धीरे-धीरे अपने अनुभव के द्वारा मानव ने सीखा कि जो कुछ भी सामने आता है, उसे खाना ठीक नहीं है. बल्कि कुछ विशेष पक्षियों और मछलियों का शिकार ही ठीक है. आज से कई दस हजार वर्षों पहले एशिया और यूरोप के मैदान और कटेशिया और उत्तरी अफ्रीका के निवासियों की उदर-पूर्ति शिकार द्वारा ही होती थी. क्रीमिया के पत्थर युग से पूर्व की अनेक हड्डियों के नमूने प्राप्त हुए हैं. इनकी गिनती से पता चला कि ६८.५ प्रतिशत हड्डियाँ जंगली गधों, घोडों और जैबरे आदि की थीं. सौंची नगर के नज़दीक हुई खुदाई और खोज से पता चलता है कि कई दस हजार वर्षों पूर्व जहाँ बसने वाले लोग विशेषकर बैल का मांस खाते थे जबकि मध्य एशिया के लोगों का  प्रमुख आहार भैंसे का मांस था.

एक लाख वर्ष पूर्व विशेषीकरण और  हथियारों के विकास ने लोगों की शिकार करने की दक्षता के लिए बेहतर उपाय निकालने में मदद की. शिकार करने के कुछ दुखदायी नतीजे भी निकले. प्राचीन गुफाओं के अध्ययन से पता चलता है कि वहां पर रहने वाले जीवों की कई प्रजातियाँ बिलकुल विलुप्त हो गयी क्योंकि अपने पेट की आग भूझाने के लिए मानव इन्हें पूरी तरह से चट कर गए. पुरातत्त्वविदों के अनुसार ५० व्यक्तियों के एक समूह को ६०० ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति के हिसाब से एक वर्ष के लिए ११ टन मांस की जरूरत पड़ती थी. मैन्मथन के शिकार के साथ १०० वर्गकिलोमीटर के क्षेत्र में लगभग डेढ टन मांस ही मिलता था. इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चो समेत एक ५० व्यक्तियों के समूह को सात-आठ सौ वर्ग किलोमीटर तक के शेत्र में शिकार करना पड़ता था. इस उदाहरण से स्पष्ट है कि साढे पांच हजार वर्गकिलोमीटर के विशाल भू-भाग पर केवल तीस-पैंतीस हजार लोग ही गुजर-बसर कर सकते थे. 

आदिकाल में प्रकृति पर मनुष्य की निर्भरता आवश्यक और स्वाभाविक ही थी परन्तु आज के युग में प्रकृति संसाधनों का अंधाधुन्द  दोहन, विशेषकर  विकसित देशों द्वारा इस पृथ्वी को  विनाश की ओर धकेल रहा है. अतः हमें अत्यंत सावधान रहने की जरूरत है.
शैलेन्द्र चौहान (कविता और आलोचना के क्षेत्र में बेहतरीन लेखन, अभी तक कई कविता व् कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके है, समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन, इनका उपन्यास "पाँव जमीन पर" (२०१०) बहुत चर्चित रहा, एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में उप-महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत, राजस्थान की राजधानी जयपुर में निवास, इनसे shailendrachauhan@hotmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )

May 11, 2013

जहां नदियाँ काली हो गयी हैं...

                       

योजनाओं के नाम पर छला गया बुंदेलखंड 
बुंदेलखंड से आशीष सागर की रिपोर्ट 

बुंदेलखंड में गहराते जल संकट के कारण और निवारण का समाधान ढूंढने को प्रयासरत वर्तमान व पिछली सरकार वैसे तो काफी माथापच्ची करती रहीं हैं, लेकिन सरकारी तंत्र के द्वारा किए गए प्रयास कभी पैकेज तो कभी आपदा कोष तक ही सिमट कर रह गए हैं। हर बार बुंदेलखंड योजनाओं के नाम पर छला गया और उसके हिस्से आया तो बस ऊपर से नीचे तक योजना में बेतहाशा सड़ाध मारता भ्रष्टाचार।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 5 अप्रैल 2013 को नगर विकास मंत्री आजम खान, सिंचाई एवं लोक निर्माण विभाग मंत्री शिवपाल सिंह यादव, मुख्य सचिव जावेद उस्मानी और बुंदेलखंड पेयजल एक्पर्ट कमेटी के 6 सदस्यों की उपस्थिति में बुंदेलखंड जल पैकेज के नाम पर 1755 करोड़ रुपए पेयजल समस्या के समाधान करने के लिए दिए जाने की घोषणा की थी। उन्होंने सातों जनपदों के अधिकारियों से दूरगामी और तात्कालिक निदान वाली ऐसी योजनाएं बनाने के लिए निदेर्शित किया था जिससे कि परंपरागत पेयजल स्रोत्रों को बहाल किया जा सके। इस कड़ी में झांसी के वेतवा नदी बैराज पर 500 करोड़, बुंदेलखंड के नगरी क्षेत्रों के पेयजल समस्या पर 1080 करोड़ और बांदा, झांसी, महोबा सहित तीन जिलों के 16 तालाबों के पुनर्निर्माण के लिए 105 करोड़ रुपए खर्च किए जाने की योजना को कागजी रूप में अमलीजामा पहनाना था।


बांदा की पेयजल समस्या को हल करने के लिए बाघेन नदी पर 50 करोड़ की लागत से वियर बनाने के अतिरिक्त छाबी तालाब के लिए 54 लाख, महोबा के कीरत सागर के लिए 24 करोड़, रैपुरा बांध के लिए 58 करोड़, उरवारा तालाब के लिए 30 करोड़, कुल पहाड़ के लिए 20 करोड़ की कार्ययोजना जल संस्थान द्वारा प्रस्तुत की गई थी। लेकिन मई माह में मुर्दो को भी गर्म कर देने वाली तपिश में हालात यह हैं कि सात जिलों की बरसाती नदियां सूखने की कगार पर हैं। इस बार केन प्रदूषण के चलते पहली बार काली पड़ गई है। तकरीबन अधिकतर तालाबों, नहरों में धूल उड़ने लगी है पर मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के किए गए 1755 करोड़ के वादे अभी तक धरातल पर नहीं उतर पाए हैं। बानगी के लिए जिलाधिकारी बांदा जीएस नवीन कुमार के भागीरथ प्रयास से ग्राम पंचायत दुर्गापुर का आदर्श तालाब, सदर तहसील बांदा में प्राचीन नवाब टैंक तालाब के समीप नवीन सरोबर, छाबी तालाब और बाबू साहब तालाब में जोर-जुगाड़ से शुरू किए गए सफाई और खुदाई कार्य भी बजट के अभाव में ठंडे बस्ते में चले गए हैं। उनका कहना है कि शासन से अभी तक जल पैकेज के धनराशि का आवंटन नहीं किया गया है। आखिर कब तक नगर पालिका और दूसरे विभागों से लगाई गई जेसीबी मशीने तालाबों की खुदाई का कार्य कर सकती हैं।

इधर सामाजिक कार्यकर्ता और तालाबों से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे लोगों का कहना है कि आधे-अधूरे जल प्रबंधन कार्य योजना को नियोजित करने से बेहतर है कि प्रशासनिक स्तर पर मनरेगा, जल निगम द्वारा तालाबों के संरक्षण में जो कार्य अब तक किए गए हैं उनका समीक्षात्मक मूल्यांकन करते हुए विचार किया जाए कि क्या वास्तव में मनरेगा योजना से बनाए गए ग्रामीण स्तर के तालाब बुंदेलखंड के किसानों व आम जनता को पेयजल और सिंचाई का जल सुलभ कराने में सहायक हुए हैं या नहीं। कहीं न कहीं तकनीकी अभाव, कार्य योजना का सही तरीके से अनुश्रवण/ मानीटरिंग न करना भी इन तालाबों की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।

बंुदेलखंड में पेयजल समस्या के निदान के लिए समस्या के मूल में जाकर उसका स्थायी समाधान के उपाय किए जाए और उसके लिए कार्य योजना जमींनी स्तर पर तैयार की जाए न कि समस्या का प्राथमिक उपचार करके उसे भविष्य में पुनः उत्पन्न करने हेतु आधे-अधूरे किए गए कार्यो से छोड़ दिया जाए।

पानी के परिदृष्य पर एक नजर - बुंदेलखंड क्षेत्र में देश की औसत वर्षा से तीन चैथाई वर्षा ही होती है। अकेले बांदा जनपद में ही आबादी के मुताबिक प्रति व्यक्ति 40 एमएलडी पानी की आवश्यकता है। वर्षा का 65 प्रतिशत जल आम तौर पर बहकर व्यर्थ चला जाता है। निरंतर भूजल स्तर नीचे जाने से जल संचयन, तालाबों की दुर्दशा के परिणाम स्वरूप अगले बीस वर्षो में यहां के 80 प्रतिशत परंपरागत जल स्रोत्र सूख जाएंगे ऐसी संभावनाएं हैं।

बांदा सहित अन्य जिलों में 224627 हेक्टेयर मीटर है। इसमें से 102952 हेक्टेयर मीटर जल दोहन किया जा रहा है। शहरी घरों में स्थापित निजी हैंडपंप की गहराई एक दशक में भूमिगत जल निकालने के लिए अब 110-180 फीट होना आम बात है जो पूर्व में 40 से 60 फीट होती थी। कम वर्षा वाले साल में हालात और बिगड़ जाते हैं। भूभाग की इस प्राकृतिक विडंबना को देखते हुए ही चंदेल काल, 900 से 1200 ईसवीं के दौरान यहां बडे़ पैमाने पर तालाबों का निर्माण कराया गया। बानगी के रूप में तालाबों की अमूल्य निधि को चित्रकूट मंडल के रसिन गांव से समझा जा सकता है जहां पर कभी 80 कुएं और 84 तालाब हुआ करते थे, लेकिन आज मनुष्य के अदूरदर्शी कार्यो से यह कुएं और तालाब बदहाल हैं।

यदि छोटे-बडे़ सभी तालाबों और जलाशयों को जोड़ा जाए तो सात जिलों में 20,000 से अधिक तालाब हैं। 24 फरवरी 2006 को टी ़जार्ज जोसेफ सदस्य राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश द्वारा प्रेषित समस्त जिलाधिकारियों को कार्यालय पत्र में माननीय उच्च न्यायालय के आदेश 25 फरवरी 2005 के तत्क्रम में जारी शासनादेश दिनांक 29 नवंबर 2005 के अनुसार बांदा में तालाबों की संख्या 4572 और क्षेत्रफल 1549.223 हे. आंकी गई थी जबकि वर्तमान में यह संख्या 4540 और उनमें 1537.122 हे. क्षेत्रफल है। खतौनी में आई कमी की संख्या 32 तथा क्षेत्रफल 12.101 हे. अंकित की गई है जिसमें कि अवैध कब्जों की संख्या 6 व क्षेत्रफल 3.342 हे. दर्शाया गया है।

शासनादेश 29 नवंबर 2005 राजस्व परिषद पत्र संख्या 7635/जी0-5-9डी/2005 दिनांक 20 दिसंबर 2005 का संदर्भ देकर प्रदेश के प्रत्येक ग्राम के वन, तालाब , झीलों , कुओं वाटर रिजवायर, जल प्रणाली एवं नदियों के तल आदि की भूमि के संदर्भ में निहित होने के उल्लेख 1 जुलाई 1952 के राजस्व अभिलेख के आधार पर जांच करने तथा हिंचलाल तिवारी बनाम कमलादेवी के बाद माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश 25 फरवरी 2005 के क्रम में शासन तथा परिषद द्वारा स्थलीय सत्यापन के लिए तहसील स्तर पर कमेटी गठन के निर्देश दिए गए थे। इसके अलावा उच्च न्यायालय इलाहाबाद के जनहित याचिका में पारित आदेश प्रेम सिंह बनाम यूपी स्टेट याचिका संख्या 63380/2012 में भी यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ग्राम सभाओं की भूमि पर तालाब/पोखर/चारागाह एवं कब्रिस्तान पर अवैध कब्जा/अतिक्रमण को हटाने के संबंध में प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग उ.प्र. शासन की अध्यक्षता में बहुसदस्यीय समिति का गठन किया गया है जिला स्तर पर गठित इस समिति के अध्यक्ष प्रत्येक जिले के जिलाधिकारी नामित हैं एवं जिला, मंडल के समस्त ग्राम सभाओं के अवैध कब्जा और अतिक्रमण की शिकायतें प्राप्त कर समयबद्ध रूप से जांच की कार्यवाही सुनिश्चित कर की गई कार्यवाही की प्रगति आख्या मंडलायुक्त के माध्यम से राजस्व परिषद को पाक्षिक रूप से उपलब्ध कराना भी इंगित किया गया है। बावजूद इसके  ज्यादातर जिलों में तालाबों का हाल जिला प्रशासन की नाक के तले बद से बदतर स्थिति में है।

ये घटनाक्रम कुछ यूं ही है जैसे कि लोकशाही में न्यायालय के हस्तक्षेप से विधिक आदेश और की गई टिप्पणियां महज सरकारी फाइलों में नियमावली/ सरकुर्लर तक ही सीमित रह गई हों। बुंदेलखंड में छोटी नदियों और नालों की अच्छी खासी संख्या रही है। मौजूदा जलतंत्र से यह स्पष्ट होता है कि पिछले 1000 साल के दर्ज इतिहास में बुंदेलखंड ने इन नदी नालों के पानी को तालाब में जमा करने का हुनर कामयाबी से दुनिया को दिखाया। इसके साथ ही बरसात के पानी को सीधे भी तालाबों में जमा किया गया। जिलों के गजेटियर्स में दर्ज इतिहास के मुताबिक यह तालाब पीने, स्नान, सिंचाई, भूजल स्तर को बेहतर बनाए रखने के अलग-अलग मान्यताओं के परिपे्रक्ष्य से बनाए गए थे। इन तालाबों का कैचमेंट ऐरिया, डूब क्षेत्र व कमांड ऐरिया इतना व्यापक था कि वर्ष भर पेयजल आम आदमी को उपलब्ध हो जाता था।

बुंदेलों में पानी को संजोने का हुनर ऐसा था कि कई तालाब सिर्फ सुंदरता और गर्मी के दिनों में शहर का तापमान नियंत्रित करने के लिए बनाए गए थे। लेकिन आज बुंदेलखंड की राष्टृीय पहचान जलहीन इलाके की बन गई है। इसका सीधा मतलब है कि पानी संचयन के नए तरीके कारगर ढंग से नहीं अपनाए गए और पुराने तरीकों को नष्ट होने दिया गया। इस विसंगति को दूर करना पेय जल उपलब्धता के रास्ते की पहली जरुरत है।
बुंदेलखंड क्षेत्र के सभी सात जिलों बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, झांसी, ललितपुर,  और जालौन में एक साथ अमल में लाए जाने योग्य सुझाव-

1- संबंधित नगर निकाय से उसके क्षेत्र में आने वाले प्रमुख तालाबों और झीलों की सूची मांगी जाए। इस सूची में यह जानकारी शामिल रहे कि किन जलाशयों पर अतिक्रमण या अवैध कब्जा किया गया है या उनके तटबंध जान बूझकर तोडे गए हैं। जलाशयों को पानी उपलब्ध कराने वाले नालों को किसी तरह से अवरूद्ध तो नहीं किया गया है। जलाशयों की जलसंग्रहण क्षमता में पिछले 20 साल में क्या कमी आई है और उसे पुराने स्तर पर ले जाने के लिए किस तरह की पहल की जरुरत है। तालाबों को जीवित करने से शहर के भूजल स्तर को गिरने से बचाया जा सकता है, साथ ही कस्बों की प्राकृतिक सुंदरता भी बची रहेगी।

2- क्षेत्र के ज्यादातर शहरों में वहां से गुजरने वाली नदियों या स्थानीय तालाबों में शहरी अपशिष्ट ले जाने वाले नालों का पानी सीधे गिर रहा है। इस तरह के नालों पर वाटर टीटमेंट प्लांट बनाने की पहल शुरू की जाए। ऐसी पहल किए बिना, स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना तकरीबन नामुमकिन है।

3- शहर में बनने वाले किसी भी नए आवासीय, वाणिज्यिक, औद्योगिक, सरकारी या अन्य किसी भी तरह के भवन में वाटर रीचार्ज सुविधा लगाना अनिवार्य किया जाए। इसके साथ ही नई काॅलोनियों में घरों की संख्या के अनुपात में सामूहिक वाटर रिचार्ज सुविधा लगाना अनिवार्य किया जाए। ऐसा करने से भूजल स्तर को मौजूदा स्तर पर या इससे बेहतर स्तर तक लाने में मदद मिलेगी।

4- ज्यादातर कस्बों में पाइप के जरिए पानी की सप्लाई या तो किसी बांध या फिर बडे तालाब से पानी उठाकर की जा रही है। बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले क्षेत्र में कई ऐसे बांध हैं जहां पूरा पानी न भरने का एक कारण यह भी है कि मध्य प्रदेश के इलाके में नदियों पर बंधिया डाल दी गई हैं। इसके अलावा भी वर्षा और गैर वर्षा वाले मौसम में पानी का सही ढंग से बंटवारा करने की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में उप्र और मध्य प्रदेश के  सभी 13 जिलों को मिलाकर बुंदेलखंड जल नियामक प्राधिकरण बनाया जाए ताकि विवादों का निराकरण और जल का तर्कसंगत बंटवारा हो सके। ललितपुर जिला इसकी सबसे बडी मिसाल है जहां सात प्रमुख बांध होने के बावजूद गर्मी के मौसम में जिला मुख्यालय में पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पाता।

5- प्राप्त शिकायतों के आधार पर पीने के पानी की पाइप लाइन की मौजूदा हालत की जांच करा ली जाए और जरुरत के मुताबिक इसकी मरम्मत या नई पाइप लाइन डाली जाए। गर्मी के मौसम में मउरानीपुर शहर में पाइप लाइन से पीले रंग का पानी आने की शिकायत आम है। यह काम बडे खर्च का जरुर लग सकता है लेकिन गंदे पानी से होने वाली बीमारियों के इलाज पर हर साल खर्च होने वाली रकम के सामने यह कुछ भी नहीं है।

6- बुंदेलखंड में पूर्व में भी वाटर हारवेस्टिंग और वाटर शेड मैनेजमेंट के कार्य किए गए हैं। लेकिन इस बारे में कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई कि इन प्रयासों की सफलता की दर क्या रही। एक अध्ययन कराके इनकी सफलता और टिकाउपन की रिपोर्ट तैयार की जाए, पिछले अनुभवों के परिणाम से भविष्य में शुरु की जाने वाली जल संचयन योजनाओं को प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी। इस कार्य के लिए जल निगम सिंचाई विभाग और मृदा संरक्षण विभाग में समन्वय की आवश्यकता होगी।

7- बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के साथ ही बुंदेलखंड के तालाबों के जीवंत दस्तावेजीकरण की भी सख्त आवश्यकता है। 1000 साल पुराने ये तालाब विश्व धरोहर होने के नाते अपने बारे में एक प्रामाणिक ग्रंथ के हकदार तो हैं ही, जो इन पर आज तक नहीं लिखा गया। ऐसी शोध परियोजना शुरु की जानी चाहिए जिसमें प्रमुख तालाबों जलाशयों का इतिहास, उनमें इस्तेमाल की गई तकनीक, उनके रखरखाव के तरीके, समाज और सभ्यता के विकास में इन जलाशयों की भूमिका का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जा सके। यहां बताना प्रासंगिक होगा कि चंदेल कालीन तालाबों की इंजीनियरिंग तमिलनाडु के प्राचीन तालाबों से मेल खाती है और श्रंखलाबद्ध तालाबों राजस्थान के उदयपुर और चित्तौड के श्रंखलाबद्ध झीलों से समानता है। इस तरह की पुस्तक विश्व पटल पर बुंदेलखंड की नई छवि पेश करने में सहायक होगी। यदि शासन चाहे और आवश्यक वित्तीय मदद मुहैया कराए तो विषेशज्ञ दल के सदस्यों को इस परियोजना का हिस्सा बनने में बहुत प्रसन्नता होगी।

जिलेवार तुरंत अमल में लाई जाने योग्य परियोजनाएं -
बांदा - बांदा सदर में ही 11 में से छह तालाबों का अतिक्रमण तुरंत हटवाया जाए और इनका जीर्णोद्धार हो। इन जल इकाईयों में क्रमश नबाब टैंक जो नबाब अली बहादुर ने बनवाया था, वार्ड नंबर 11 में स्थित छाबी तालाब सेठ छविलाल अग्रवाल द्वारा सन 1960 के आसपास बनवाया था इसका रकबा करीब 7 दशक पूर्व 50 बीघा अर्थात 8.90 हेक्टेयर करीब 22 एकड़ क्षेत्रफल में महज अतिक्रमण के कारण 22 बीघा ही यह तालाब शेष बचा है। प्रागी तालाब सेठ प्रागीदास गहोई ने बनवाया, कंधरदास तालाब को स्थानीय कंधरदास व्यक्ति ने बनवाया, साहब तालाब - कंपनीबाग ब्रिटिश कालीन निर्माणकार्य है। इन जल इकाईयों के संरक्षण, संुदरीकरण की महती आवश्यकता है। इनके अतिरिक्त डिग्गी तालाब निकट रेलवे स्टेशन बांदा, लाल डिग्गी तालाब, परशुराम तालाब, हरदौल तलैया, बाबूराव गोरे तालाब, सेढू तलैया जल इकाईयां पूरी तरह से अवैध अतिक्रमण, रिहायसी मकानों की चपेट में मिट रहे हैं। 

चित्रकूट -  पवित्र मंदाकिनी नदी में गिर रहे सभी नालों पर ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाएं। चित्रकूट शहर आधा उत्तर प्रदेश और आधा मध्य प्रदेश में है। मध्य प्रदेश के इलाके में नदी का पानी आज भी पीने लायक है जबकि उप्र में इसकी गुणवत्ता गिरी है। इसका प्रमुख कारण मंदाकिनी को आरोग्य धाम से लेकर रामघाट तक जगह-जगह होटलों, दुकानदारों, समाजसेवियों ने निजी स्वार्थ हित बांध रखा है। नदी को जीवित करना ऐतिहासिक काम साबित होगा क्योंकि यह धार्मिक रुप से अति महत्वपूर्ण है। वाल्मीकि रामायण को आधार मानें तो भगवान राम 12 साल चित्रकूट में ही रहे। कर्वी-चित्रकूट नगर के प्रमुख तालाबों में 300 वर्ष पूर्व बनवाए गए विनायकराव पेशवा का गणेश बाग जो पुरातत्व के संरक्षण में है, गोल तालाब, दुर्गा तालाब, कोठी तालाब अतिक्रमण की मार झेल रहे हैं जिन्हें बचाया जाना नितांत आवश्यक है।

महोबा- मदन सागर:- जल संचय क्षेत्र 95 मिलियन घन फीट, क्षेत्रफल 2.3 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल हेक्टेयर, नहरों की संख्या 2 है।

कीरत सागर:- जल संचय क्षेत्र 56 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 1.5 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 95 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 2 है।

दशरापुर जलाशय:- जल संचय क्षेत्र 66 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 7.5 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 297.80 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 3 है।

कल्याण सागर:- जल संचय क्षेत्र 18 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 1.4 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 150 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 2 है।

बीजानगर जलाशय:- जल संचय क्षेत्र 246 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 3.7 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 233 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 3 है।

रैपुरा जलाशय:- जल संचय क्षेत्र 254 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 10.5 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 298 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 3 है।

बेलाताल:- जल संचय क्षेत्र 739 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 30.07 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 926 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 18 है।

कुल पहाड़ जलाशय:- जल संचय क्षेत्र 98 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 3.6 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 256 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 2 है।

कमालपुरा जलाशय:- जल संचय क्षेत्र 177 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 6.7 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 205 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 2 है।

रहिल्य सागर:- जल संचय क्षेत्र 21 मिलियन घन फीट, तालाब का क्षेत्रफल 2.4 वर्गमील और इसका क्षेत्रफल 150 हेक्टेयर, नहरों की संख्या 3 है। इन बड़े जलाशयों के अतिरिक्त महोबा में टीकामउ, सलारपुर जैसे बड़े जलाशय अपने अस्तित्व का संघर्ष कर रहे हैं।

हमीरपुर:- हमीरपुर शहर में सर्वाधिक तालाब राठ तहसील के अर्तगत हैं। अन्य जिलों तरह यहां भी प्राचीन तालाबों में शहरी अतिक्रमण ने तालाबों से सुलभ होने वाली पेयजल व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर रखा है। उदारणार्थ राठ तहसील के सागर तालाब का कुल क्षेत्रफल लगभग 3 बीघा के आसपास है। इस तालाब के क्षेत्र में बनाए गए आवास का सीवर युक्त गंदा पानी सीधे सागर तालाब में प्रवाहित किया जाता है जिसने इस तालाब के स्वच्छता एवं रख-रखाव के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। इस जैसे राठ तहसील के अन्य तालाबों को भी बचाए जाने की आवश्यकता है।

 झांसी:- झांसी शहर में लक्ष्मी तालाब का पुनुरुद्धार कराया जाए। मउरानीपुर में सुखनई नदी और बाजपेयी तालाब का पुनुरुद्धार हो।

ल्लितपुर: - ललितपुर शहर में सुमेरा तालाब का जीणोद्धार और सुंदरीकरण किया जाए। तालबेहट के बडे तालाब का सुंदरीकरण किया जाए।

मऊरानीपुर:-
1- मऊरानीपुर, झांसी में शहर के बीच से बहने वाली सुखनई नदी को पुनर्जीवित करना, घाटों का निर्माण कराना और सुंदरीकरण करना:

अ- नदी के समांतर सीवेज पाइप लाइन का निर्माण करना ताकि शहर का गंदा पानी नदी में ना गिर सके।

ब- शहर से नदी में गिरने वाले नालों पर सीवेज ट्ीटमेंट प्लांट बनाए जाएं ताकि गंदा पानी नदी में न गिरे।

स- नदी पर चार जगह सीढ़ीदार घाटों का निर्माण कराया जाए ताकि जब नदी साफ हो चुके तो इसका सार्वजनिक उपयोग हो सके।

द- इतने प्रयासों के बाद स्वच्छ नदी के कुछ हिस्सों को पिकनिक स्थल की तरह विकसित किया जा सकेगा जहां नौकाबिहार और आप-पास हरियाली स्थापित की जा सकेगी।

इस संबंध में मऊरानीपुर नगर पालिका ने पूर्व में भी प्रस्ताव तैयार कर शाषन को भेजे हैं, उनका अवलोकन किया जा सकता है।

2 - मऊरानीपुर शहर में प्राचीन बाजपेयी तालाब स्थित है। इस तालाब का आर्किटेक्चर इस तरह डिजाइन किया गया था कि इससे एक छोटी नहर सी निकाली गई। इसका पानी कई जगह साफ होता है और यहां इस तरह की घास उगी है जो पानी को साफ करने में सहायक होती है। इस छोटी नहर पर आगे हांथा, एक तरह का पुराना स्वीमिंग पूल बना है। कोई 15 साल पहले तक यह जीवंत और सक्रिय जल संरचना थी जो अब तबाह हो चुकी है। ऐसे में तालाब का गहरीकरण, तलबंध का निर्माण और अतिक्रमण हटाकर तालाब को बचाया जा सकता है। साथ ही हांथा के वाटर चैनल के बुनियादी ढांचा को दुरुस्त कर इसे फिर से वह तरण ताल बनाया जा सकता है, जहां बच्चे वैसे ही तैर सकें जैसे उनके पिताजी की पीढी के लोग अपने बचपन में तैरते थे।



आशीष सागर दीक्षित (लेखक सदस्य विशेषज्ञ समिति, बुंदेलखंड जल पैकेज, बुंदेलखंड में सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर पिछले एक दशक से सक्रिय है, सूचना के अधिकार के क़ानून के प्रयोग व् प्रसार में विशेष योगदान, जल, जंगल जमीन के महत्त्व को उजागर करते इनके तमाम लेख प्रकाशित होते रहते है, बाँदा में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते है )


May 10, 2013

जर्मनी में दुधवा लाइव ने जीता खिताब "द बॉब्स "




डायचे वेले जर्मनी द्वारा "द बॉब्स " पुरस्कारों की श्रंखला में हिन्दी में "अनुशरण करने लायक बेहतरीन व्यक्ति" की श्रेणी में दुधवा लाइव अव्वल:


दुनिया के बड़े मीडिया संस्थानों में एक डायचे वेले जर्मनी द्वारा विश्व भर की तमाम भाषाओं में उत्कृष्ट लेखन के लिए "द बॉब्स "पुरस्कारों की शुरूवात सन २००४ में की, इस सिलसिले में सन २०१३ में १४ भाषाओं को शामिल किया गया.  इन भाषाओं में विभिन्न जमीनी मसायल पर काम करने वाले लोगों के वेबसाईट/ब्लॉग्स/ अन्य सोशल मीडिया जो बेहतरीन सूचनाओं के प्रसार में अपने सहयोग दे रहे है, उनके नामांकन डायचे वेले द्वारा तय जूरी के माध्यम से हुआ. अंतिम चरण में जूरी व् वोटों के जरिये विजेताओं की घोषणा की गयी. इस बार "द बॉब्स" पुरस्कारों के लिए १४ भाषाओं में ४२०० वेबसाईट/ब्लॉग्स नामांकित हुए, जिनमें अंतिम चरण में ३६५ वेबसाईट/ब्लाग्स का नामांकन जूरी के जरिये किया गया. तमाम मुद्दों पर चलाये जा रहे दिलचस्प अभियानों वाली ४० वेबसाईट व् ब्लाग्स को जूरी व् वोटों के आधार पर विजेता बनाया गया. इन पुरस्कारों को ३५ श्रेणियों में विभाजित किया गया. सबसे खूबसूरत बात ये कि हिन्दी को द बॉब्स पुरस्कारों के लिए इस वर्ष २०१३ में पहली बार शामिल किया गया.


दुनिया की १४ भाषाओं के सभी विजेताओं की सूची देखने के लिए यहाँ क्लिक करे!


आखिरकार इंटरनेट मीडिया का आस्कर कहे जाने वाले डायचे वेले द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" के जरिये जर्मनी में अपनी हिन्दी हुई सम्मानित.

दुधवा लाइव को मिले इस सम्मान के हक़दार वो सभी मित्र, लेखक व् पाठक है, जिन्होंने पर्यावरण सरंक्षण में चलाई गयी हमारी मुहिमों में हमारे साथ-साथ रहे. सभी को आभार!

शुक्रिया डायचे वेले, हमारी हिन्दी और हमारी आवाज को सम्मानित करने के लिए, वह आवाज जो प्रकृति के लिए है.

इसे भी देखे यहाँ क्लिक करे.


दुधवा लाइव डेस्क

May 7, 2013

Green Giants Profit From the Planet's Destruction

Author and activist Naomi Klein. (photo: CharlieRose.com)

By Naomi Klein, Guardian UK

03 May 13

    A new movement has erupted demanding divestment from fossil fuel polluters - and Big Green is in their sights


he movement demanding that public interest institutions divest their holdings from fossil fuels is on a serious roll. Chapters have opened up in more than 100 US cities and states as well as on more than 300 campuses, where students are holding protests, debates and sit-ins to pressure their to rid their endowments of oil, gas and coal holdings. And under the "Fossil Free UK" banner, the movement is now crossing the Atlantic, with a major push planned by People & Planet for this summer. Some schools, including University College London, have decided not to wait and already have active divestment campaigns.

Though officially launched just six months ago, the movement can already claim some provisional victories: four US colleges have announced their intention to divest their endowments from fossil fuel stocks and bonds and, in late April, 10 US cities made similar commitments, including San Francisco (Seattle came on board months ago).

There are still all kinds of details to work out to toughen up these pledges, but the speed with which this idea has spread makes it clear that there was some serious pent-up demand. To quote the mission statement of the Fossil Free movement: "If it is wrong to wreck the climate, then it is wrong to profit from that wreckage. We believe that educational and religious institutions, city and state governments, and other institutions that serve the public good should divest from fossil fuels." I am proud to have been part of the group at 350.org that worked with students and other partners to develop the Fossil Free campaign. But I now realise that an important target is missing from the list: the environmental organisations themselves.

You can understand the oversight. Green groups raise mountains of cash every year on the promise that the funds will be spent on work that is attempting to prevent catastrophic global warming. Fossil fuel companies, on the other hand, are doing everything in their power to make the catastrophic inevitable. According to the UK's Carbon Tracker Initiative (on whose impeccable research the divestment movement is based), the fossil fuel sector holds five times more carbon in its reserves than can be burned while still leaving us a good shot of limiting warming to 2C. One would assume that green groups would want to make absolutely sure that the money they have raised in the name of saving the planet is not being invested in the companies whose business model requires cooking said planet, and which have been sabotaging all attempts at serious climate action for more than two decades. But in some cases at least, that was a false assumption.

Maybe that shouldn't come as a complete surprise, since some of the most powerful and wealthiest environmental organisations have long behaved as if they had a stake in the oil and gas industry. They led the climate movement down various dead ends: carbon trading, carbon offsets, natural gas as a "bridge fuel" - what these policies all held in common is that they created the illusion of progress while allowing the fossil fuel companies to keep mining, drilling and fracking with abandon. We always knew that the groups pushing hardest for these false solutions took donations from, and formed corporate partnerships with, the big emitters. But this was explained away as an attempt at constructive engagement - using the power of the market to fix market failures.

Now it turns out that some of these groups are literally part-owners of the industry causing the crisis they are purportedly trying to solve. And the money the green groups have to play with is serious. The Nature Conservancy, for instance, has $1.4bn (£900m) in publicly traded securities, and boasts that its piggybank is "among the 100 largest endowments in the country". The Wildlife Conservation Society has a $377m endowment, while the endowment of the World Wildlife Fund-US is worth $195m.

Let me be absolutely clear: plenty of green groups have managed to avoid this mess. Greenpeace, 350.org, Friends of the Earth, Rainforest Action Network, and a host of smaller organisations such as Oil Change International and the Climate Reality Project don't have endowments and don't invest in the stock market. They also either don't take corporate donations or place such onerous restrictions on them that extractive industries are easily ruled out. Some of these groups own a few fossil fuel stocks, but only so that they can make trouble at shareholder meetings.

The Natural Resources Defense Council is halfway there. It has a $118m endowment and, according to its accounting team, for direct investments "we specifically screen out extractive industries, fossil fuels, and other areas of the energy sector". However, the NRDC continues to hold stocks in mutual funds and other mixed assets that do not screen for fossil fuels. (The Fossil Free campaign is calling on institutions to "divest from direct ownership and any commingled funds that include fossil fuel public equities and corporate bonds within 5 years".)

Purists will point out that no big green group is clean, since virtually every one takes money from foundations built on fossil fuel empires - foundations that continue to invest their endowments in fossil fuels today. It's a fair point. Consider the largest foundation of them all: the Bill & Melinda Gates Foundation. As of December 2012, it had at least $958.6m - nearly a billion dollars - invested in just two oil giants: ExxonMobil and BP. The hypocrisy is staggering: a top priority of the Gates Foundation has been supporting malaria research, a disease intimately linked to climate. Mosquitoes and malaria parasites both thrive in warmer weather, and they are getting more and more of it. Does it really make sense to fight malaria while fuelling one of the reasons it may be spreading more ferociously in some areas?

Clearly not. And it makes even less sense to raise money in the name of fighting climate change, only to invest that money in, say, ExxonMobil stocks. Yet that is precisely what some groups appear to be doing. Conservation International, notorious for its partnerships with oil companies and other bad actors (the CEO of Northrop Grumman is on its board, for God's sake), has close to $22m invested in publicly traded securities and, according to a spokesperson, "we do not have any explicit policy prohibiting investment in energy companies".

The same goes for Ocean Conservancy, which has $14.4m invested in publicly traded securities, including hundreds of thousands in "energy", "materials" and "utilities" holdings. A spokesperson confirmed in writing that the organisation does "not have an environmental or social screen investment policy". Neither organisation would divulge how much of its holdings were in fossil fuel companies or release a list of its investments. But according to Dan Apfel, executive director of the Responsible Endowments Coalition, unless an institution specifically directs its investment managers not to invest in fossil fuels, it will almost certainly hold some stock, simply because those stocks (including coal-burning utilities) make up about 13% of the US market, according to one standard index. "All investors are basically invested in fossil fuels," says Apfel. "You can't be an investor that is not invested in fossil fuels, unless you've actually worked very hard to ensure that you're not."

Another group that appears very far from divesting is the Wildlife Conservation Society. Its financial statement for fiscal year 2012 describes a subcategory of investments that includes "energy, mining, oil drilling, and agricultural businesses". How much of WCS's $377m endowment is being held in energy and drilling companies? It failed to provide that information despite repeated requests.

The WWF-US told me that it doesn't invest directly in corporations - but it refused to answer questions about whether it applies environmental screens to its very sizable mixed-asset funds. The National Wildlife Federation Endowment used to apply environmental screens for its $25.7m of investments in publicly traded securities, but now, according to a spokesperson, it tells its investment managers to "look for best-in-class companies who were implementing conservation, environmental and sustainable practices". In other words, not a fossil fuel divestment policy. Meanwhile, the Nature Conservancy - the richest of all the green groups - has at least $22.8m invested in the energy sector, according to its 2012 financial statements. Along with WCS, TNC completely refused to answer any of my questions or provide any further details about its holdings or policies.

It would be a little surprising if TNC didn't invest in fossil fuels, given its various other entanglements with the sector. A small sample: in 2010, the Washington Post reported that TNC "has accepted nearly $10m in cash and land contributions from BP and affiliated corporations"; it counts BP, Chevron, ExxonMobil and Shell among the members of its Business Council; Jim Rogers, CEO of Duke Energy, one of the largest US coal-burning utilities, sits on its board of directors; and it runs various conservation projects claiming to "offset" the carbon emissions of oil, gas and coal companies.

The divestment question is taking these groups off guard because for decades they were able to make these kinds of deals with polluters and barely raise an eyebrow. But now, it appears, people are fed up with being told that the best way to fight climate change is to change their light bulbs and buy carbon offsets while leaving the big polluters undisturbed. And they are raring to take the fight directly to the industry most responsible for the climate crisis.

Hannah Jones, one of the student divestment movement organisers, told me: "Just as our college and university boards are failing us by not actively confronting the forces responsible for climate change, so are the big corporate green groups. They have failed us by trying to preserve pristine pockets of the world while refusing to take on the powerful interests that are making the entire world unliveable for everyone." But, she added, "students now know what communities facing extraction have known for decades: that this is a fight about power and money, and everyone - even the big green groups - is going to have to decide whether they are with us, or with the forces wrecking the planet."

It doesn't seem like too much to ask. I mean, if the city of Seattle is divesting, shouldn't WWF do the same? Shouldn't environmental organisations be more concerned about the human and ecological risks posed by fossil fuel companies than they are by some imagined risks to their stock portfolios? Which raises another question: what are these groups doing hoarding so much money in the first place? If they believe their own scientists, this is the crucial decade to turn things around on climate. Is TNC planning to build a billion-dollar ark?

Some groups, thankfully, are rising to the challenge. A small but growing movement inside the funder world is pushing the big liberal foundations to get their investments in line with their stated missions - which means no more fossil fuels. It's time for foundations to "own what you own", says Ellen Dorsey, executive director of the Wallace Global Fund. According to Dorsey, her foundation, which has been a major funder of the coal divestment campaign, is now "99% fossil free and will be completely divested by 2014".

But convincing the biggest foundations to divest will be slow, and the green groups - which are at least theoretically accountable to their members - should surely lead the way. Some are starting to do just that. The Sierra Club, for instance, now has a clear policy against investing in, or taking money from, fossil fuel companies (it once didn't, which caused major controversy in the past). This is good news for the Sierra Club's $15m in investments in publicly traded securities. However, its affiliated organisation, the Sierra Club Foundation, has a much bigger portfolio - with $61.7m invested - and it is still in the process of drafting a full divestment policy, according to Sierra Club's executive director, Michael Brune. He stressed that "we are fully confident that we can get as good if not better returns from the emerging clean energy economy than we can from investing in the dirty fuels from the past".

For a long time, forming partnerships with polluters was how the green groups proved they were serious. But the young people demanding divestment - as well as the grassroots groups fighting fossil fuels wherever they are mined, drilled, fracked, burned, piped or shipped - have a different definition of seriousness. They are serious about winning. And the message to Big Green is clear: cut your ties with the fossils, or become one yourself.


Courtesy:  http://www.guardian.co.uk
First published in The Nation; www.naomiklein.org

पर्यावरण की नज़र से एक दु:स्वप्न है गुजरात ! मोदी वालों !

    
शेर का सवाल और गुजराती अस्मिता -
गीर के शेरों का विवाद यह बताता है, कि देश में पर्यावरण जैसे मुद्दे पर भी भावनाओं को भड़काने की राजनीति हो सकती है !
   

     गुजरात के मुख्यमंत्री की वेबसाइट बताती है कि ‘वह पर्यावरण संरक्षण के मामले में बहुत संवेदनशील हैं। पर्यावरण और प्रकृति का संरक्षण शताब्दियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। वह हमेशा प्रकृति माता के साथ सामंजस्य बनाकर उसे नुकसान पहुंचाये बिना जीने के हिमायती हैं।’ जमीनी सच्चाइयां इससे ज्यादा जटिल चित्र खींचती हैं। सन 2009 में नरेंद्र मोदी के सात साल तक मुख्यमंत्री रह चुकने के बाद पर्यावरणविद एस फैजी ने गुजरात की यात्रा की और उन्होंने पाया कि गुजरात ‘पर्यावरण की नजर से एक दु:स्वप्न’ है। पिछले वर्षों में गुजरात में हजारों वर्ग किलोमीटर प्राकृतिक जंगल नष्ट कर दिया गया है। खनन की वजह से पक्षी और वन्यजीव अभयारण्य का अतिक्रमण हो रहा है। जमीन में लवण की मात्रा बढ़ रही है और नरेंद्र मोदी की सरकार ने दुनिया के सबसे बड़े जहाजों के कबाड़खाने अलंग को सुधारने की कोई कोशिश नहीं की। व्यावसायिक हितों को साधने के लिए खनन की वजह से जमीन, समुद्र और समुद्र तट प्रदूषण के शिकार हो गये हैं। औद्योगिक प्रदूषण की वजह से वडोदरा जिले के बहुत बड़े क्षेत्र में भूमिगत जल इस्तेमाल के लायक नहीं रह गया है और उपजाऊ जमीन बंजर हो गयी है।

नरेंद्र मोदी के पर्यावरण संबंधी दावे दो ताजा घटनाओं से और ज्यादा समझ में आते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के उद्योगपति मित्रों में गौतम अडाणी खास हैं। अडाणी समूह पिछले डेढ़ दशक में खूब फला-फूला है। पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेषज्ञ समिति ने पाया है कि मुंद्रा में अडाणी के बंदरगाह में कानूनी प्रावधानों और पर्यावरण के मापदंडों का उल्लंघन हुआ है। दलदली जंगलों के विनाश और समुद्री पर्यावरण के प्रदूषण की वजह से स्थानीय मछुआरे दरिद्रता की हालत में पहुंच गये हैं। विशेषज्ञ समिति ने अडाणी समूह पर 200 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने की सिफारिश की है। जिस समिति ने यह जांच की थी, उसमें जानकार और निष्पक्ष विशेषज्ञ थे। भारत के समूचे पश्चिमी किनारे पर उद्योगपतियों और उनके मित्र राजनेताओं के गठजोड़ ने किसानों और मछुआरों को जमीन और समुद्र से खदेड़ दिया है, इससे पर्यावरण के विनाश के साथ सामाजिक असंतोष भी पैदा हुआ है। अच्छा हो अगर पर्यावरण मंत्रालय महाराष्ट्र में ऐसी गड़बड़ियों की जांच करने के लिए एक समिति बनाये।

अडाणी के बारे में फैसला गुजरात के मुख्यमंत्री पर अप्रत्यक्ष चोट थी। नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा और उनके अहंकार पर सीधी चोट सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले से हुई है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने खतरे में पड़ी एशियाई शेरों की प्रजाति के लिए एक और अभयारण्य की तजवीज की है। भारत के कई जाने-माने वन्यजीव विशेषज्ञों का यह प्रस्ताव था कि शेरों के लिए बेहतर होगा कि वे गुजरात के गीर जंगलों तक सीमित न रहें। राष्ट्रीय वन्यजीव एक्शन प्लान के तहत शेरों के लिए एक दूसरा घर खोजने को प्राथमिकता दी गयी। यह इसलिए जरूरी है कि किसी रोग या भूकंप या जंगल में आग जैसी प्राकृतिक आपदा की वजह से एक ही जगह रह रहे शेर हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो सकते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने बताया कि 1994 में सेरनगेटी में एक वायरस की वजह से एक हजार से भी ज्यादा शेर मारे गये थे।

इतिहासकार दिव्यभानु सिंह और महेश रंगराजन ने एशियाई बब्बर शेरों के अतीत और वर्तमान का गहराई से अध्ययन किया है। उनका अध्ययन बताता है कि यह प्रजाति किसी वक्त मध्य और उत्तर भारत के बड़े इलाकों में पायी जाती थी, लेकिन शताब्दियों तक खेती के विकास और महाराजा व नवाबों के शिकार की वजह से शेरों की संख्या घटती चली गयी। 19वीं के शताब्दी के अंत तक एशियाई शेर सिर्फ गीर के जंगलों में बचे थे, जो उस जमाने में जूनागढ़ रियासत का हिस्सा थे।

यहां भी उनका भविष्य सुरक्षित नहीं था, क्योंकि कई अंग्रेज अफसर अपने घर टांगने के लिए शेर का सिर चाहते थे। उन्हें किसी तरह जूनागढ़ के नवाब ने रोके रखा, जिनकी मदद लॉर्ड कजर्न ने की। लार्ड कजर्न ऐसे वायसराय थे, जो प्रकृति के संरक्षण का महत्व समझते थे। जब कजर्न ने शेर के शिकार का आमंत्रण ठुकरा दिया, तो नवाब उनका उदाहरण देकर बाकी लोगों से भी शेरों को बचा लिया। बब्बर शेर इस तरह एक मुस्लिम नवाब और अंग्रेज साम्राज्यवादी की वजह से बच गये, लेकिन उनका भविष्य फिर भी खतरे में था। 1980 के दशक से ही वैज्ञानिक दूसरे जंगलों की तलाश में लग गये थे, जहां बब्बर शेरों को रखा जा सके, ताकि उनके बचने के मौके बढ़ जाएं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञों ने मध्य प्रदेश के कूनो अभयारण्य को इसके लिए सबसे उपयुक्त पाया। वहां पर बहुत जगह है और शेरों के भोजन के लिए जानवरों की कमी भी नहीं है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और इस कार्य में उसने गुजरात सरकार से सहयोग मांगा। लेकिन गुजरात इस बात के लिए राजी नहीं हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया। जब अदालत में मामला चल रहा था, तभी नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक घोषणा की कि गुजरात के शेर गुजरात को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।

तब भी नहीं, जब एक समान विचारधारा वाली भाजपाई मध्य प्रदेश सरकार उनसे आग्रह कर रही हो। मार्च 2012 में जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले को सुन रहा था, तब नरेंद्र मोदी ने विधानसभा का सत्र छोड़कर राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठकों में हिस्सा लिया, जिसमें गुजरात का पक्ष तैयार किया गया। अदालत में अपना पक्ष रखते हुए गुजरात सरकार ने पहले शेरों के स्थानांतरण के वैज्ञानिक सबूतों को गलत सिद्ध करने की कोशिश की, लेकिन न्यायाधीश इससे सहमत नहीं हुए, क्योंकि ज्यादातर वन्यजीव विशेषज्ञ स्थानांतरण के पक्ष में थे। तब गुजरात सरकार ने अपने तर्क बदल दिये और कहा कि मुद्दा वैज्ञानिक तर्कों के परे है। बब्बर शेर गुजरातियों के परिवार और समाज का हिस्सा हैं, जब परिवार का मामला हो, तो कोई तर्क नहीं चलता। 15 अप्रैल, 2013 को अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने गुजरात सरकार के तमाम तर्क खारिज कर दिये और यह आदेश दिया कि छह महीने में शेरों को गीर के जंगलों से कूनों में स्थानांतरित कर दिया जाए।

इस मुद्दे पर मोदी का विरोध क्षेत्रीय अस्मिता का आह्वान करने के उनके पुराने तरीके का उदाहरण है। लेकिन इससे जो उन्माद फैलता है, वह नियंत्रण से बाहर सकता है। अभी-अभी बब्बर शेरों के एक विशेषज्ञ रवि चेल्लम को गुजरात वन विभाग ने गीर से जाने के लिए कहा, ताकि उनका सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ सक्रिय आंदोलनकर्ताओं से सामना न हो जाए। गुजरात की कई गैर-सरकारी संस्थाएं शेरों के स्थानांतरण के खिलाफ सक्रिय हो गयी हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि वह उन्हें तुरंत रोके, ताकि सुप्रीम कोर्ट का विवेकपूर्ण, तार्किक और वैज्ञानिक आदेश लागू हो सके।

                                                                                                                                                                                                                                                                         सौजन्‍य: दैनिक हिंदुस्‍तान



रामचंद्र गुहा प्रसिद्द इतिहासकार हैं।  अखबारों  एवं  पत्रिकाओं में एतिहासिक व् सामाजिक मुद्दों पर निरंतर   लेखन, कई विश्व प्रसिद्द पुस्तकों के लेखक रामचंद्र  गुहा  द्वारा  सन २००७ में लिखी उनकी किताब इंडिया आफ्टर गांधी को अपार लोकप्रियता मिली। इस किताब को हिंदी में पेंग्विन ने प्रकाशित किया है, जिसका अनुवाद मधुबनी बिहार के पत्रकार/लेखक सुशांत झा ने किया है। रामचंद्र गुहा से ramachandraguha@yahoo.in पर एवं  सुशांत झा से jhasushant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। इस लेख को मोहल्ला लाइव पर भी पढ सकते है । 

May 4, 2013

किंशुक कुसुम



पलाश के फूल 

संस्कृतियाँ अपने समय की प्रकृति का लेखा-जोखा होती है, और परंपराये उनकी वाहक ...पीढ़ी दर पीढी 
फिर भारतीय उप-महाद्वीप की गंगा-जमुना के मध्य विकसित हुई संस्कृतियाँ जिनमें जल-जंगल-जमीन की महत्वा को देवत्व प्रदान किया हमारे लोगों ने, हम वृक्षों, नदियों, पर्वतों और जंगलों को उनकी उपयोगिता के मुताल्लिक पूजा अर्चना करते आये और यही परंपरा भारत वर्ष में सदियों से मानव समाज में प्रवाहित हो रही है थोड़े बहुत बदलाव के साथ साथ ...हमारी तरबियत में ही शामिल है, की हम प्रकृति से जो कुछ प्राप्त करते है या धरती पर उस जीव या वनस्पति के वजूद की महत्वा को स्वीकारते है, इसके लिए उसे आदर के भाव से विभूषित करते है, फिर चाहे वह कोई जानवर हो,वृक्ष हो, नदी हो या पुष्प हो ...बात गुल की चली तो बता दूं , की "किसी फूल का खिलना ही इस बात का सूचक होता है की यहाँ जीवन पल्लवित हो रहा है" और फिर उस जीवन की खूबसूरती का अंदाजा, कि वह कितना सुन्दर होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है, कि आप कितना संवेदनशील है! जीवन के उद्भव के इस दृश्यनं की फेहरिस्त में आज पलाश के उस सुर्ख लाल पुष्प की बात करूंगा जो मानव ह्रदय को हमेशा पुलकित करता रहा है !

पलाश के फूल जिसे संस्कृत में किंशुक कुसुम कहते है, स्थानीय बोलियों में इसे टेसू, ढाक, झूला आदि के नाम से जानते है, भारतीय महाद्वीप की यह स्थानीय प्रजाति है, फेबियेसी कुल का यह वृक्ष  जिसे इसके पुष्पकी सुन्दरता के चलते नाम दिया गया ब्यूटिया मोनोस्पर्मा


पलाश से प्राप्त गोंद का इस्तेमाल डायरिया और पेचिंस जैसे रोगों में उपयोगी है, साथ ही इसकी फलियों के बीजों के तेल का प्रयोग एक्जीमा जैसे त्वचा रोगों पर किया जाता रहा है, पलाश की पत्तियों का रस चेहरे के मुहांसों, त्वचा के घावों पर लाभकारी है, पलाश के बीजों के तेल का इस्तेमाल जानवरों के घावों में पनपने वाले कीड़ो को मारने के लिए भी किया जाता है, पलाश के वे पत्ते जिन पर हम बचपन में मीठा बर्फ खाते थे या दावतों में इन पत्तों को जोड़ कर तस्तरियाँ बनाई जाती थी, जिनमे आने वाले मेहमानों को भोजन परोसा जाता था, के इस्तेमाल के अलावा महिलाओं के लिकोरिया रोग में इन पत्तों के रस का बहुत प्रभावी उपयोग है, लेकिन मौजूदा दौर में पेड़ पौधों से प्राप्त औषधियों के इस्तेमाल से हम महरूम हो गए है, या इनसे होने वाले लाभों से अनिभिज्ञ ! और शायद ये भी वृक्षों की प्रजातियों पर आये विलुप्ति के संकट का एक कारण है.  


पलाश को अग्नि देव का एक रूप माना गया और कहते है, की एक बार शिव-पार्वती की तखलिया में अग्निदेव के अचानक दस्तक देने के कारण पार्वती ने इन्हें शापित किया, और वे जड़ हो गए, तो यही है अग्निदेव का रूप फ्लेम आफ द फारेस्ट "जंगल की आग" !! पौराणिक महत्त्व में पलाश के पुष्प शिव पूजा में चढ़ाए जाते है साथ ही पलाश के वृक्ष से प्राप्त लकड़ी को बहुत ही पवित्र माना गया, जिस कारण इसे समिधा (हवंन में प्रयोग होने वाली लकड़ी) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ! एक और बात पलाश की लकड़ी पानी में नहीं सडती और इसी वजह से लोग कुए की जगत, जलाशयों में नहाने के लिए चौकी (अवध में प्रचलित शब्द कठठा ) और जल पिलाने के लिए बड़े चमचे का निर्माण पलाश की लकड़ी से ही किया करते थे  !


पलाश के इस फूल से मेरा गहरा नाता है, बचपन से ही इस पुष्प से मैं परिचित होता आया हूँ, इसके दो कारण थे, एक तो मेरे गाँव के चारों तरफ पलाश के जंगल हुआ करते थे, जो मेरे बचपन के समय तक अपने वजूद को कुछ कुछ बचा पाए थे, दूसरी पुख्ता वजह थी मेरी अम्मा द्वारा जगन्नाथ जी की वह पूजा जो चैत की आमवस्या के पहले सोमवार से शुरू होकर दूसरे सोमवार तक समाप्त होती थी, आठ दिन की इस पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में भी आठ का आंकड़ा था, और इस आकडे में पलाश के आठ पुष्प सबसे महत्वपूर्ण है, साथ ही आठ गेहूं की बालियाँ, आठ आम के बौर में लगी हुयी अमिया (कच्चा छोटा आम), कुसुम ? आदि ! ख़ास बात ये की ये पूजा सामग्री में प्रयुक्त होने वाली वनस्पति आठ दिनों तक खराब नहीं होती थी ..पलाश के पुष्प,कच्चे आम, गेहूं की बालियाँ, कुसुम (बर्रेय) का पुष्प जो बहुत दिनों रखा जा सकता है

 गौरतलब है, की इस पूजा के वक्त का निर्धारण ऐसा है, की इसी समय आम में बौर आता है, गेहूं की बालिया पकती है, और पलाश खिलते है ! कितना सुन्दर सयोंग व्  संबध है प्रकृति के चक्र के साथ हमारी परंपराओं का!

दरअसल प्रत्येक वर्ष मार्च-अप्रैल के महीने में जब विक्रम संवत के अनुसार चैत की आमवस्या का पहला सोमवार आता तो मैं निकल पड़ता पलाश के फूलों की तलाश में ...यह सिलसिला मुसलसल आज भी कायम है! बस कसक ये है, की पलाश के जंगल नष्ट हो चुके है, इक्का-दुक्का पलाश के झुरुमुट या तन्हा दरख्त मौजूद है, और अफ़सोस ये की परती भूमियों पर जहां इनके कुछ निशानात बाकी है, उन पर अतिक्रमण जारी है, रफ्ता रफ्ता यह प्रजाति जिसे वृक्ष बनने में कई दशक लगते है, ख़त्म होने को है, न तो वन-विभाग कोई कदम उठा रहा है, और न ही वो जिम्मेवार लोग और संस्थाएं जो दम भरते है पर्यावरण सरंक्षण का ! 

एक बात और पलाश के पुष्प की शक्ल तोते की लाल चोच से इस कदर मिलती है, की इसे पैरट ट्री भी कहते है, चूंकि बात चली है, तोतों की तो बता दूं तराई का खीरी जनपद अपने जंगलों , नदियों के साथ साथ तोतो की तमाम रंग-बिरंगी प्रजातियों के लिए जाना जाता रहा है, इसका उल्लेख ब्रिटिश भारत के गजेटियर में मिलता है, और अभी पिछले दशकों तक हर शाम हज़ारों के झुण्ड में तोतो को अपने आशियानों तक लौटते हुए देखना  एक सुहाना दृश्य होता था, जब आसमान हरा हो जाया करता था. जानते है, आप इस पलाश से तोतो का बहुत गहरा रिश्ता है, ये पलाश के बूढ़े वृक्ष अपनी खोहो में तोतो को आशियाना देते रहे है, जहां इनकी नस्लें पनपती रही..पर अब अनियोजित विकास की भेट चढ़ते ये वृक्ष अपने साथ साथ तमाम प्रजातियों के खत्म  होने का सबब बन जायेंगे, और हम आप देखते रहेंगे  वही ...."धाक के तीन पात" ....!





कृष्ण कुमार मिश्र
editor.dudhwalive@gmail.com



विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था