डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 04, April 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

May 4, 2013

किंशुक कुसुम



पलाश के फूल 

संस्कृतियाँ अपने समय की प्रकृति का लेखा-जोखा होती है, और परंपराये उनकी वाहक ...पीढ़ी दर पीढी 
फिर भारतीय उप-महाद्वीप की गंगा-जमुना के मध्य विकसित हुई संस्कृतियाँ जिनमें जल-जंगल-जमीन की महत्वा को देवत्व प्रदान किया हमारे लोगों ने, हम वृक्षों, नदियों, पर्वतों और जंगलों को उनकी उपयोगिता के मुताल्लिक पूजा अर्चना करते आये और यही परंपरा भारत वर्ष में सदियों से मानव समाज में प्रवाहित हो रही है थोड़े बहुत बदलाव के साथ साथ ...हमारी तरबियत में ही शामिल है, की हम प्रकृति से जो कुछ प्राप्त करते है या धरती पर उस जीव या वनस्पति के वजूद की महत्वा को स्वीकारते है, इसके लिए उसे आदर के भाव से विभूषित करते है, फिर चाहे वह कोई जानवर हो,वृक्ष हो, नदी हो या पुष्प हो ...बात गुल की चली तो बता दूं , की "किसी फूल का खिलना ही इस बात का सूचक होता है की यहाँ जीवन पल्लवित हो रहा है" और फिर उस जीवन की खूबसूरती का अंदाजा, कि वह कितना सुन्दर होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है, कि आप कितना संवेदनशील है! जीवन के उद्भव के इस दृश्यनं की फेहरिस्त में आज पलाश के उस सुर्ख लाल पुष्प की बात करूंगा जो मानव ह्रदय को हमेशा पुलकित करता रहा है !

पलाश के फूल जिसे संस्कृत में किंशुक कुसुम कहते है, स्थानीय बोलियों में इसे टेसू, ढाक, झूला आदि के नाम से जानते है, भारतीय महाद्वीप की यह स्थानीय प्रजाति है, फेबियेसी कुल का यह वृक्ष  जिसे इसके पुष्पकी सुन्दरता के चलते नाम दिया गया ब्यूटिया मोनोस्पर्मा


पलाश से प्राप्त गोंद का इस्तेमाल डायरिया और पेचिंस जैसे रोगों में उपयोगी है, साथ ही इसकी फलियों के बीजों के तेल का प्रयोग एक्जीमा जैसे त्वचा रोगों पर किया जाता रहा है, पलाश की पत्तियों का रस चेहरे के मुहांसों, त्वचा के घावों पर लाभकारी है, पलाश के बीजों के तेल का इस्तेमाल जानवरों के घावों में पनपने वाले कीड़ो को मारने के लिए भी किया जाता है, पलाश के वे पत्ते जिन पर हम बचपन में मीठा बर्फ खाते थे या दावतों में इन पत्तों को जोड़ कर तस्तरियाँ बनाई जाती थी, जिनमे आने वाले मेहमानों को भोजन परोसा जाता था, के इस्तेमाल के अलावा महिलाओं के लिकोरिया रोग में इन पत्तों के रस का बहुत प्रभावी उपयोग है, लेकिन मौजूदा दौर में पेड़ पौधों से प्राप्त औषधियों के इस्तेमाल से हम महरूम हो गए है, या इनसे होने वाले लाभों से अनिभिज्ञ ! और शायद ये भी वृक्षों की प्रजातियों पर आये विलुप्ति के संकट का एक कारण है.  


पलाश को अग्नि देव का एक रूप माना गया और कहते है, की एक बार शिव-पार्वती की तखलिया में अग्निदेव के अचानक दस्तक देने के कारण पार्वती ने इन्हें शापित किया, और वे जड़ हो गए, तो यही है अग्निदेव का रूप फ्लेम आफ द फारेस्ट "जंगल की आग" !! पौराणिक महत्त्व में पलाश के पुष्प शिव पूजा में चढ़ाए जाते है साथ ही पलाश के वृक्ष से प्राप्त लकड़ी को बहुत ही पवित्र माना गया, जिस कारण इसे समिधा (हवंन में प्रयोग होने वाली लकड़ी) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ! एक और बात पलाश की लकड़ी पानी में नहीं सडती और इसी वजह से लोग कुए की जगत, जलाशयों में नहाने के लिए चौकी (अवध में प्रचलित शब्द कठठा ) और जल पिलाने के लिए बड़े चमचे का निर्माण पलाश की लकड़ी से ही किया करते थे  !


पलाश के इस फूल से मेरा गहरा नाता है, बचपन से ही इस पुष्प से मैं परिचित होता आया हूँ, इसके दो कारण थे, एक तो मेरे गाँव के चारों तरफ पलाश के जंगल हुआ करते थे, जो मेरे बचपन के समय तक अपने वजूद को कुछ कुछ बचा पाए थे, दूसरी पुख्ता वजह थी मेरी अम्मा द्वारा जगन्नाथ जी की वह पूजा जो चैत की आमवस्या के पहले सोमवार से शुरू होकर दूसरे सोमवार तक समाप्त होती थी, आठ दिन की इस पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में भी आठ का आंकड़ा था, और इस आकडे में पलाश के आठ पुष्प सबसे महत्वपूर्ण है, साथ ही आठ गेहूं की बालियाँ, आठ आम के बौर में लगी हुयी अमिया (कच्चा छोटा आम), कुसुम ? आदि ! ख़ास बात ये की ये पूजा सामग्री में प्रयुक्त होने वाली वनस्पति आठ दिनों तक खराब नहीं होती थी ..पलाश के पुष्प,कच्चे आम, गेहूं की बालियाँ, कुसुम (बर्रेय) का पुष्प जो बहुत दिनों रखा जा सकता है

 गौरतलब है, की इस पूजा के वक्त का निर्धारण ऐसा है, की इसी समय आम में बौर आता है, गेहूं की बालिया पकती है, और पलाश खिलते है ! कितना सुन्दर सयोंग व्  संबध है प्रकृति के चक्र के साथ हमारी परंपराओं का!

दरअसल प्रत्येक वर्ष मार्च-अप्रैल के महीने में जब विक्रम संवत के अनुसार चैत की आमवस्या का पहला सोमवार आता तो मैं निकल पड़ता पलाश के फूलों की तलाश में ...यह सिलसिला मुसलसल आज भी कायम है! बस कसक ये है, की पलाश के जंगल नष्ट हो चुके है, इक्का-दुक्का पलाश के झुरुमुट या तन्हा दरख्त मौजूद है, और अफ़सोस ये की परती भूमियों पर जहां इनके कुछ निशानात बाकी है, उन पर अतिक्रमण जारी है, रफ्ता रफ्ता यह प्रजाति जिसे वृक्ष बनने में कई दशक लगते है, ख़त्म होने को है, न तो वन-विभाग कोई कदम उठा रहा है, और न ही वो जिम्मेवार लोग और संस्थाएं जो दम भरते है पर्यावरण सरंक्षण का ! 

एक बात और पलाश के पुष्प की शक्ल तोते की लाल चोच से इस कदर मिलती है, की इसे पैरट ट्री भी कहते है, चूंकि बात चली है, तोतों की तो बता दूं तराई का खीरी जनपद अपने जंगलों , नदियों के साथ साथ तोतो की तमाम रंग-बिरंगी प्रजातियों के लिए जाना जाता रहा है, इसका उल्लेख ब्रिटिश भारत के गजेटियर में मिलता है, और अभी पिछले दशकों तक हर शाम हज़ारों के झुण्ड में तोतो को अपने आशियानों तक लौटते हुए देखना  एक सुहाना दृश्य होता था, जब आसमान हरा हो जाया करता था. जानते है, आप इस पलाश से तोतो का बहुत गहरा रिश्ता है, ये पलाश के बूढ़े वृक्ष अपनी खोहो में तोतो को आशियाना देते रहे है, जहां इनकी नस्लें पनपती रही..पर अब अनियोजित विकास की भेट चढ़ते ये वृक्ष अपने साथ साथ तमाम प्रजातियों के खत्म  होने का सबब बन जायेंगे, और हम आप देखते रहेंगे  वही ...."धाक के तीन पात" ....!





कृष्ण कुमार मिश्र
editor.dudhwalive@gmail.com



1 comments:

rupal ajabe said...

bahut hi sundar jaankaari di hai is lekh k madhyam se aapne krishnakumar ji...sach mein hum in tesu k phoolon ko yoon hi hamesha dekha karte hein jangal mein yahaan wahaan jab koi aur phool humein nhi dikhaai deta par hum yahi samajhna nhi chahte ki jis prakriti ko hum ujadane chale hein vikaas k naam par usi ne humein palaa posa aur sambhala hai abhi tak!!...shayad is tarah k lekhon ke dwara kuchh to achchha hum soch sakein!! bahut shukriya...shubhkaamnaaein!!..

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