International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger


Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jun 29, 2011



‘Passer Domesticus’, which is commonly known as ‘House Sparrow’ is naturally found in most of Asia, Europe & in the Mediterranean region. It is strongly associated with human habitations. Generally, the house sparrow is a chinky bird, typically about 16cm long. They are primarily seed eater though, they also consume small insects. They virtually eat anything in small quantities.

In my childhood, I grew up with varieties of birds in and around me. In our old house, we used to see too many sparrows. Then, I never noticed them minutely & I always ignored them as if, they are part of my life. I spent hours watching other birds from our garden side windows. At different time of the day, variety of birds used to come to our garden with their various activities.

Now years later, I can feel for those chinky tiny sparrows. In Romania, I can find them in & around me whole day long. Initially I used to wonder, how can these birds survive here in winter in such an extreme climate, when the temperature drop to -30 degrees?
Every morning before opening my eyes first, I like to hear chirping of sparrows. They are gregarious at all seasons. After a long & gloomy winter in Romania when spring comes, these social sparrows get back their cheerfulness. Trees start to bloom with new leaves on their branches & I can find the sparrows engaging in a number of social activities, such as dust & water bathing, social singing etc. I also find them carrying twigs, small straws on their beaks.

One day, I saw them mating on my balcony wall and kitchen window sill. I feel happy, thinking that within a few weeks I can see new born chicks on the branches of the trees. Female sparrows are usually smaller than males and younger birds are obviously even smaller. 

Males are larger during winter and females are larger during breeding season. Their nests are usually grouped together in clumps. The house sparrows are monogamous. Before the breeding season, unmated males take up a nesting site and call incessantly to attract females.

The house sparrow’s nesting sites are varied but it prefers the shelter of a hole. Nests are more frequently built in the eaves and other crevices of houses. Spring is the time for new born chicks & I can feel their joyfulness. They get rejuvenated since, it is time to breed, bring new lives in the world & gradually they get more busy.

I start giving them more grains on my balcony and watch them from inside the room. They are very small eaters. They eat few grains and fly away to the branches of the tree to rub their beak on the branches or on any hard surface. Whole day long, they chirp and jump from one branch to another, fly from my balcony to others’ windows. I can see their activities on the trees. One day, I saw a mother sparrow feeding her restless hungry chick. I heard the loud incessant chirping of the baby chick, walking restlessly on my balcony wall and watching all around. The mother sparrow came to feed the chick & disappeared to bring more food for her chick. 

In summer, when days are very long, I can hear their chirping from early in the morning at 4:30 A.M to late in the evening till 10 P.M. Gradually the days are going to get shorter. Leaves will start falling down. Long extreme cold winter will come. Tree branches will be bare without any leaves and full of snow. Sparrows will still sit there on the icy cool branches of the trees waiting for spring to come.

I cannot understand, when sparrows can survive in such freezing cold (up to -30 degree) during winter in Romania then, why I cannot find a single sparrow in Chennai or its suburbs or in many other parts in India?

Various causes I have found for the dramatic decrease in their population. Electromagnetic radiation mainly from mobile phones, shortage of nesting sites & diseases maybe the prime factors. Protecting insect habitats in farmlands and planting native plants in all cities may benefit the house sparrow & allow them to grow in population.

(Babia Pal  she is a teacher and an avid wildlife enthusiast, house wife and conservationist, She has lived and worked in New Delhi and Kolkata. Passionate about playing piano, driving and photography, she loves travelling, reading, writing and painting. She lives in Romania with her husband. She may be reached at

Jun 27, 2011

संवेदना की वापसी...

अपने घर की छत पर कुंडे में पानी भरते हुए सुचित सेठ
शाहजहांपुर के घूरनतलैया मोहल्ले के मकान नंबर : 54 की कहानी
हिन्दुस्तान ने सुधरवा दी पांच साल पुरानी एक गलती
-यहां एक मां देती आई थी चिड़ियों को हर रोज पानी और दाना
-5 साल पहले मां की मौत के बाद चिड़ियों को बंद हो गया दाना, पानी
-हिन्दुस्तान की अपील के बाद फिर मिलने लगा चिड़ियों को दाना-पानी

 दुधवा लाइव: शाहजहांपुर
आइए हमारे साथ चलिए शाहजहांपुर के घूरनतलैया के मकान नंबर 54 में। यहां छोटी सी एक बगिया है, पीपल का एक पेड़ लगा है। पेड़ की छांव इन दिनों गर्मी में बेहद राहत दे रही थी। इस घर में पूजा-पाठ करके हवाई चप्पल पहने सुचित सेठ बाहर आए। राम-राम हुई। इसके बाद उनसे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। बगिया के बारे में, पीपल के पेड़ के बारे में, मां के बारे में, चिड़ियों के बारे में।
खबर शुरू करने से पहले आपको बता दें कि सुचित सेठ शाहजहांपुर शहर के लोगों के लिए अनजाना नाम नहीं है। सुचित का फोन हिन्दुस्तान दफ्तर में खनखनाया। फोन रिसीव होते ही सुचित ने कहा कि हिन्दुस्तान ने आज हमें पांच साल पुरानी एक गलती का अहसास कराया है। उस गलती को आज मैंने सुधारा है।

9 अक्टूबर 2006
बकौल सुचित : मेरी मां शशि सेठ जीजीआईसी में टीचर थीं। रोज का नियम था उनका...पूजा करने के बाद वह छत पर जाती थीं... एक हाथ में पानी का जग और दूसरे हाथ की मुटठी में चावल के दाने रहते थे। छत पर जाकर वह कुंडे में पानी भरती थीं और चावल के दानों को बिखरा देती थीं। उनके इस नियम को मैं बचपन से देखता था। रिटायरमेंट के बाद आठ अक्टूबर 2006 को उनका देहावसान हो गया। बकौल सुचित, मां की मौत के बाद नौ अक्टूबर 2006 से हम सब मां के नियम को बढ़ा नहीं सके। चिड़ियों को दाना और पानी बंद हो गया।

9 मई 2011
सुचित के घर नौ मई 2011 को सुबह हिन्दुस्तान अखबार पहुंचा। पहले पन्ने पर पहली ही खबर... तपती धरती, प्यासे पक्षी, आगे आएं, कुंडे लगाएं...सुचित ने इस समाचार को पढ़ा और पढ़ने के बाद याद आई मां। वह मां जिसकी गोद में वह खेले, जिसका प्यार और दुलार जैसे उन्हें मिला, वैसे ही चिड़ियों को भी मिला था। फिर हुआ गलती का अहसास...गलती यह कि मां थीं तो वह चिड़ियों को दाना और पानी देती थीं। आंखें भर आईं, यह सोच कर मां ने बेटे के रूप में उन्हें पाला और बेटियों के रूप में चिड़ियों को। इस नाते चिड़ियां तो उनकी बहन हुईं। ऐसी गर्मी में कैसे रह पाती होगी मेरी बहन यानी चिड़ियां। उन्होंने पूजा की और भगवान के सामने सकंल्प कि आज से मैं चिड़ियों को हर रोज दाना और पानी दूंगा।

फ्लैश बैक : 1892
शाहजहांपुर शहर में उस वक्त प्रताप नारायण सेठ को कौन नहीं जानता था। खासे पैसे वाले थे। घूरनतलैया में उन्होंने मकान बनवाया था। मकान की छतें धन्नियों पर टिकी थीं। उनके तीन बेटे सुचित, मुदित, पंकज हुए। धीरे-धीरे सब बढें, पढ़े और अपने काम धंधे में लग गए। मकान भी प्रताप नारायण सेठ और शशि सेठ की काया की तरह कमजोर होने लगा। धन्नियों में दीमक लग गई। धीरे-धीरे मकान की छत सीमेंटेड हो गईं। अब केवल पूजा का कमरा ही है, जिसकी छत अभी धन्नी पर टिकी है। तब मकान में ताखे भी थे, अब नहीं। चिड़िया तब भी आती थी, अब भी। तब उन्हें दाना-पानी मिलता था।

हिन्दुस्तान को सलाम
सुचित ने हिन्दुस्तान को सलाम भेजा है। उन्होंने कहा कि लोगों को उनके सामाजिक सरोकारों को याद दिलाने के लिए जो बीड़ा हिन्दुस्तान ने उठाया है, वह बेहद सराहनीय है। हिन्दुस्तान तो एक ऐसा अखबार है, जो खबरें ही नहीं छापता, बल्कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को याद दिलाता है। बोले, मैं हिन्दुस्तान के माध्यम से लोगों से अपील करता हूं कि वह भी अपने घरों में कुंडे रखें और चिड़ियों को दाना दें। उनकी इस मुहिम में उनका कक्षा तीन में पढ़ने वाला भतीजा माधव सेठ भी शामिल है।

 ( विवेक सेंगर, लेखक हिन्दुस्तान शाहजहांपुर के ब्यूरो चीफ हैं, सामाजिक सरोकारों पर पैनी नज़र, संवेदनशील लेखन, विभिन्न प्रतिष्ठित अखबारों में उप-संपादक/ब्यूरो प्रमुख के तौर पर कार्यानुभव, इनसे पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

Jun 26, 2011

चौराहे पर ठाढ किसनऊ देखई चारिउवार..देश का कौनु है जिम्मेवार !

किसान के घर की दशा- फोटो: आशीष सागर

ग्रेट गैंबलर की इतनी दुर्दशा, कौन है जिम्मेदार
 यह लेख शाहजहांपुर के कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक के०एम० सिंह से वरिष्ठ पत्रकार विवेक सेंगर से हुई बात-चीत पर  आधारित हैं।

दुनिया का सबसे बड़ा जुंआरी किसान है। ताश के पत्ते खेलते वक्त तो कोई न कोई एक जुंआरी जीतता है, लेकिन किसान हर बार हार जाता है...फिर भी वह हर बार अपना सबकुछ दांव पर लगाता है। वह गिरता है और उठ कर फिर से चलने लगता है। इसी में किसान की पूरी जिंदगी गुजर जाती है।
किसान के खून पसीने की कमाई पर हर कोई डाका डालने पर जुटा हुआ है। खेत किसान का, उसमें बोई जाने वाली फसल की लागत किसान की, लेकिन उसका मुनाफा लेते हैं बिचौलिए। खेत की जुताई करने के लिए ट्रैक्टर की जरूरत पड़ती है, तो किसान को डीजल भी शुद्ध नहीं मिलता है। इसके बाद बीज बोता है, उसकी भी कोई गारंटी नहीं, उसे शुद्ध प्रजाति ही मिल जाए। खाद लेने जाता है तो वहां भी निर्धारित मूल्य से ज्यादा देने पड़ जाते हैं। खाद असली मिल जाए यह भी बहुत बड़ी बात है। सिंचाई कई दौर में होती है, इसी दौरान डीजल के दामों में बढ़ोतरी भी हो जाती है। इस दौरान किसान को ऊपर वाले की मार झेलनी पड़ती है। बाढ़, ओलावृष्टि से अगर बचकर फसल पक गई तो तमाम हिस्सेदार आ जाते हैं। गेहूं, धान, गन्ना की प्रमुख फसल का मुनाफा बिचौलिए ही ले जाते हैं, किसान मूल लागत बचा ले, यही बहुत है। किसान जब धान की फसल काटता है तो उससे नमी का पैसा काट लिया जाता है, लेकिन जब रबी की फसलें काटता है तो उस समय फसलों के दानों में लगभग आठ से नौ प्रतिशत नमी होती है, जबकि मूल्य निर्धारण 12 प्रतिशत नमी पर किया जाता हैं, इस सूख का पैसा किसानों को आज तक कोई नहीं देता है।

कौन है जिम्मेदार
किसान की फसल को हर वक्त खतरा रहता है। कहीं बाढ़ का, कहीं ओलावृष्टि का, कहीं आग का। ऐसे में वक्त में भी किसान यह जानने की कोशिश नहीं करता है कि आखिर वह अपनी फसल की सुरक्षा के लिए क्या उपाय करे। दरअसल, बड़े और पढ़े-लिखे किसान तो अपनी फसलों को बीमा करा लेते हैं, लेकिन छोटे या मझोले किसानों को इसकी जानकारी ही नहीं रहती है। फसल बर्बाद होती है तो किसान कर्ज लेता है, जमीन गिरवी रख देता है, एक दिन वहीं किसान जो जमीनदार था, भूमिहीन हो जाता है। फिर वह शासन और प्रशासन को अपनी बर्बादी के लिए जिम्मेदार ठहराने लगता है।

बीमा के बाद भी दिक्कत
वैसे तो बहुत ही कम किसान अपनी फसल का बीमा कराते हैं, अगर उनकी फसल दैवीय आपदा की भेंट चढ़ जाती है तो उसका क्लेम लेना भी आसान नहीं होता है, क्योंकि उसकी प्रक्रिया इतनी जटिल है। क्लेम करते वक्त नुकसान हुई फसल का सर्वे होता है, जिसको किसान समय से करा नहीं पाता है और किसान को क्लेम नहीं मिल पाता है। यानी सुरक्षा के उपाय करने के बाद भी वह अपनी थोड़ी सी चूक से फसल का मुआवजा पाने से रह जाता है।

प्रचार-प्रसार की कमी
कहीं न कहीं तो सिस्टम में खोट है। कृषि प्रधान देश, कृषि प्रधान प्रदेश और कृषि प्रधान बरेली मंडल और कृषि प्रधान जिला होने के बाद भी यहां का किसान जागरूक नहीं है। वह खेती जैसा व्यवसाय तो करता है, लेकिन उसकी नई टेक्नालाजी के बारे में जानना नहीं चाहता है या उसे बताया नहीं जा रहा है। होता यह है कि किसानों को जानकारी देने के लिए कृषि गोष्ठी आयोजित की जाती हैं, लेकिन इन गोष्ठियों में केवल किसान ही नहीं होता है, बाकी सब होते हैं। किसानों को जागरूक करने के नाम पर एनजीओ केवल अपनी जेब गरम कर रहे हैं, इसको देखने वाला कोई नहीं है। एनजीओ जब भी कोई कार्यक्रम करते हैं, उसमें घुमाफिरा कर हमेशा दिखने वाले चेहरे नजर आते हैं। मंडल और जिला स्तर के सरकारी अधिकारी भी इन गोष्ठियों में जाने से कतराते हैं, उनकी दिलचस्पी केवल बजट में ही रहती है, किसानों में नहीं।

सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर सबसे बड़ी कोशिश होनी चाहिए किसानों को जोड़ने की। गोष्ठी में किसान ही पहुंचें, दुकानदार नहीं। किसान को मुनाफा लेने के लिए खुद ही जागरूक होना होगा, किसी की राह देखने की जरूरत नहीं है। अब कोई भी किसान की मदद नहीं करना चाहता है, उसे लूटना चाहता है। इस लूटपाट बचने को खुद शिक्षित बने, बच्चों को पढ़ाएं, उनहें मिड डे मील और वजीफा पर न छोड़ें। नई तकनीकी के बारे में जाने और उसे अपनाएं भी।

डा. केएम सिंह शाहजहांपुर के कृषि विज्ञान केंद्र में बतौर शस्य वैज्ञानिक तैनात हैं। यह जिला फिरोजाबाद के रहने वाले हैं। इनकी शिक्षा आरवीएस कालेज आगरा और पंतनगर में हुई है। इन्होंने मेडिशनल क्राप पर पीएचडी और धान की विभिन्न पद्धतियों पर फेलोशिप किया है। गन्ना उत्पादन में डेवलपमेंट मैनेजर के रूप में शाहजहांपुर में कार्य किया है। साथ ही पंजाब में डीएससीएच गु्रप में डेवलपमेंट आफिसर रहे हैं।

Jun 19, 2011

Towards Community conservation

Community Involvement
Bustard Conservation

Critically Endangered Great Indian Bustard (Ardeotis nigriceps) is highly dependent on traditional farming and traditional practices of grassland management. Habitat loss and habitat alterations are major threats identified for its decline and maintenance of its mosaic habitat is crucial for long term survival of the species. Local community plays a key role in maintaining bustard’s habitat. In an order to initiate the dialogues and to understand the issues related with community involvement in bustard conservation, Pune wildlife division and GIB Foundation (Pune) organized two events at Bustard sanctuary Maharashtra. Local people and other stakeholders expressed their views on various aspects related to community and bustard conservation. During group discussion various solutions were suggested. This report summarizes and interprets the issues and topics expressed during these events. Proposed recommendations and derived conclusions are issue specific and are restricted to the bustard sanctuary, Maharashtra.

First event
A community level meeting was organized on 21 st March 2011, which included villagers from Nannaj, Mardi, Akolekati, Karamba which surrounds core areas where bustards are still seen.

Second event

A one day workshop on ecology and conservation of Great Indian Bustard was organized on 22nd March 2011 in an order to update knowledge in forest department staff and to involve people related to acquisition of 434 ha land and those living around core areas.

First event on 21st March was a huge gathering attended by almost 600 villagers and village heads. Villagers and their representatives expressed views with respect to hardships caused because of Bustard sanctuary and involvement of community in Bustard conservation.

All the staff of bustard sanctuary, Villagers living around core areas, agriculture officer from Solapur participated in one day workshop 22nd March2011. Four topics were allotted for group discussion. All participants were involved in group discussions for topics on prevention of grassland fire, impact of grazing and prevention of overgrazing, organic farming, community benefits and traditional farming.

Organizers, experts, government and non-government institutions, organizations and stakeholders participated in both events:
1. Villagers from Nannaj, Akolekati, Karamba and Mardi
2. Conservator of Forests (Wildlife) Pune
3. Assistant conservator of forests, Bustard sanctuary, Pune
4. Mr Jagdish Patil (Collector Solapur)
5. Dr Pramod Patil (GIB Foundation)
6. Prant officer, Solapur
7. Tahsildar, North Solapur
8. Dr Shamita Kumar ( BVIEER, Pune)
9. Mr Sujit Narawade (BNHS, Mumbai)
10. RFO bustard sanctuary, Nannaj ( Solapur)
11. RFO bustard sanctuary, Karmala (Solapur)
12. RFO Blackbuck Sanctuary, Rehkuri (Ahmednagar)
13. Village head ( Sarpanch) Nannaj village
14. Village head ( Sarpanch) Akolekati village
15. Village head (Sarpanch) Karamba village
16. Village head ( Sarpanch) Mardi village
17. Agricultural officer, North Solapur
18. Representatives of shepherd community

Issues and Problems expressed by local people:

A) Bustard conservation

1. People are aware that bustard is threatened bird and they are still proud of Great Indian Bustard and are ready to come forward for its conservation.

2. Great Indian bustard is directly no harm to anyone.

3. Old people still remember interactions with late Dr Salim Ali and people have always supported bustard conservation.

4. Villagers from Mardi wants that name of Mardi should also come in light as they are equally involved in bustard conservation along with village Nannaj.

5. There is need for community development project around bustard sanctuary.

6. School children are unaware of Bustards and there is need of awareness on bustards at school level.

7. Bustard awareness can be achieved through documentary film which is a strong communication medium.

8. Local village support groups can help in preventing fire before it occurs and they can help in mitigation measures.

9. There is no enough water for bustards and other wildlife inside protected area.

B) Shirapur canal issue

There is misinterpretation that forest department have blocked the canal work deliberately to trouble local people.

There is no employment in the region and because of lack of water, agriculture is not so productive. Canal will bring a rare opportunity for development of farmers in the region.
There is growing oppose to sanctuary and bustard conservation because of canal issue.

C) Rationalization of bustard sanctuary and hardship to locals

1. People are suffering for more than 20 years and it is because of irrational size of sanctuary.

2. There are many rumors with respect to land acquisition and translocation and displacement of villages.

3. People cannot invest into land and it is the only asset they are having.

4. As far as habitat is concerned many areas have been irreversibly changed and needs immediate denotification from sanctuary.

5. There is immediate need of rationalization of bustard sanctuary.

D) Damage to livestock and crop

1. Wolves are causing loss of livestock and are considered as enemy.

2. Blackbucks are causing damage to crops.

3. Compensation procedures for crop damage are very lengthy and painful and it needs involvement of many officers of various line depts. at a time.

4. There is need for permanent solution to crop raiding by blackbuck.

5. Blackbucks and erratic rains are causing trouble to farmers and irrigation canal is vital issue for survival of farmers.

6. Crop protection zone needs to be experimented in an order to protect crop from damage by blackbuck.

7. Alternate fodder plots can be tried to restrict the blackbucks from going into private farms.

E) Land acquisition

1. Many among the owners of proposed 434ha land are ready to give their lands for forming core breeding area

2. People want that land acquisition should take place as early as possible and rate paid should be equal to that paid during land acquisition for Solapur airport.

Recommendations for further actions

Based on issues and problems expressed by people and discussions with experts involved in the process, following recommendations for further action are extremely necessary.

1) Acquisition of proposed 434 ha land

Acquisition of proposed 434 ha land for developing core breeding area for bustards needs to be done immediately

After the spread of irrigation facilities it will become impossible to acquire land in near future or there will be demand of more money for the same land.

As suggested by collector solapur Mr. Jagdish Patil there is availability of land under Ujani project in the same tahsil i.e. North Solapur; and so compensation of land for acquired land is another option available that needs to be evaluated for acquisition of 434 ha land, provided that equal amount land is compensated for acquired land.

Till the process of land acquisition is started or completed, 434 ha land (and adjoining areas) can be protected from movement of people and grazing pressure on rental basis i.e by paying some rent for restriction of grazing from July to November for minimum five consecutive years. This has been done successfully by GIB Foundation and Pune wildlife division for private land patch adjoining Mardi 100 ha plot over last few years.

Before going for this option on large scale, substitute for grazing (such as some other grazing land or supporting stall feeding) for existing livestock of land owners needs to be established and implemented on the experimental basis in the initial stage.

2) Shirapur canal
Command area of Shirapur canal for grasslands and farmlands of Nannaj and adjoining villages needs to be studied and its impact on bustards future survival with respect to change in land use practices and spread of cash crop needs to be evaluated.
Obliterating Shirapur canal could turn detrimental for bustard conservation so its clearance needs to be supported at every possible level.
To bring down protest and oppose against forest department and bustard conservation and to spread awareness regarding legal procedures and role of Central Empowered Committee in clearance of Shirapur canal immediate village level meetings and discussions needs to be conducted.
In an order to look for the option of restriction to non-permeable, non-desired crops such as sugar cane meetings with irrigation department need to be conducted as early as possible.
Methodology of crop restriction needs to be evaluated not only at the policy making level but also at the implementation level and there is need to define the responsibility on the concerned authority.

3) Awareness

District level awareness program for bustard conservation needs to be started in an order to reduce the rumors related to relocation of villages.

There is immense need of awareness films for bustard conservation in Marathi. These can be screened in every village especially during Gramsabha (Village meet) or weekly bazaar days.

Special bustard awareness campaign for School children needs to be run in whole Solapur district with active involvement of educational system.

4) Protected area and conservation issues

Waterholes need to be maintained at least for summer and winter season inside the protected areas.

Need of constructing few more waterholes inside protected area.

Regular patrolling especially during night could is effective against grassland fires and poaching. Staffing is poor and more lower cadre staff need to be posted in the sanctuary
Local people support groups can be found to prevent illegal burning of grasslands and to keep track of poachers.

Local farmers can be allowed to take the grass from the protected area after January once the breeding season is over.

To prevent massive scale damage in grassland burning the width of fire line can be increased and criss-cross fire lines could be a better solution.

Trace passing and illegal grazing can be effectively managed by TCM and there is need of more and complete TCM for all boundaries of core area.

(Trench cum Mound). TCM needs to be strengthened by planting Agave (Ghaypat) on the top of mound.

Display boards for “No Grazing area” could certainly repel people from entering protected areas.

5) Crop raiding and compensation issues

Maintenance of grasslands is important to prevent crop raiding by blackbuck.
Creation of crop protection zone by using certain grass species such as “ Yashwant grass” (etc.)needs to be tried.

Current protocol of crop damage reporting involves many officers together on the spot of damage and is always not possible. It is also a time consuming procedure it forces the people to stay away from compensation procedure. There is immediate need to change the protocol to make it more flexible and less time consuming.
There is need of maintaining more waterholes inside protected area in order to prevent the movement of blackbucks in search of water outside the protected area.

6) Community benefits, Traditional and organic farming

Community development projects need to be implemented at certain villages at least around core areas.

A small scale project needs to be funded to interested persons to take initiative for bio-pesticides production and utilization.

Exotic plants such as Glyricidia till the time they are removed can be used as green manure.
Organic farming is in a boom and there is need of linking up market with the farmers in an order to promote organic farming.
Solapur is famous for grapes. Organic grapes is a new trend where they could get double benefit as it will also support bustard conservation.
Awareness regarding certifying the agricultural products as organic farm product needs to be done so that more and more farmers can be involved into it.
Need of building up bridge between traditional farming expert and farmers can be fulfilled by conducting regular workshops for farmers on various topics related to traditional and organic farming. There should be active involvement of agricultural department in this.
Grass from the protected areas can be allowed to cut and can be distributed to poor families in the village, it will serve the purpose of habitat management too.
Crow (both Common Crow and Large-billed Crow) is growing threat to bustard’s egg and egg predation by crow has been reported before. All the villages around core areas form constant source of crows into the core breeding areas. These villages specially Nannaj and Mardi are as good as dump grounds. Village cleanup programs with support from district administration could serve community health as well as bustard conservation.

Irrational distribution and size of the Bustard sanctuary is the major culprit for the suffering of both community and wildlife. It has created anti-bustard environment in the region. Despite of hardship and suffering, local community is still ready to give hand of support in bustard conservation. There is still hope to involve community in the long term conservation picture. Unless and until community benefits are secured bustard conservation cannot be ensured in long run. Hunger for land is showing its impact on land acquisition process and under the pressure of land mafia it will be highly impossible to secure bustard habitat in future. Formation of core breeding areas in other parts of sanctuary, rationalization of sanctuary, scientific habitat management practices, community development project, regular conversations and discussions with local people, less painful and fast compensation procedures, strengthening of lower cadre staff, effective measures of habitat protection during breeding season, population monitoring and satellite tracking for bustards along with intensive ground surveys and district level awareness program are some of the immediate actions necessary. Demand driven incentive based community involved conservation is the effective strategy for bustards and grassland ecosystem in the region.

A Report on
Community Meeting and Workshop
held at Bustard Sanctuary, Maharashtra (IBA)

Compiled by
Dr. Pramod Patil
Phone: 9960680000
GIB (Grasslands Indians Bustards) Foundation

Jun 18, 2011

ब्रह्माण्ड में कुछ हुआ है?...

एक खगोलीय घटना-
कृष्ण कुमार मिश्र

१५-१६ जून सन २०११ ई० को एक बेहतरीन खगोलीय घटना का आप सब की तरह मैं भी गवाह बना..यह घटना जब अपने आप को दोहरायेगी तो हम इस स्वरूप? में नही होगें...क्योंकि वक्त वापस लौट कर आता है...इसी लिए इतिहास अपने को दोहराता है, परिस्थितियां और पात्र बदलते हैं!...हम भी शायद बदले हुए हो !  किन्तु इन तस्वीरों के जरिए लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश से यह चन्द्र ग्रहण की घटना कही न कहीं संकलित रहेगी...इसी विश्वास के साथ यह चित्र-माला आप सब के लिए प्रस्तुत है !
अब ये खगोलीय घटना 131 वर्ष बाद अपने आप को दोहरायेगी....
सभी तस्वीरें लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश भारत से ली गयी हैं, इस स्थान की समुन्द्र तल से ऊंचाई 147 मीटर हैं 
  • Latitude : 27.6 to 28.6 (North)
  • Longitude : 80.34 to 81.30 (East)

All images on this web page Copyright © 2011, Krishna Kumar Mishra.  All Rights Reserved.  Contact and Image Use Information at

Jun 12, 2011

जंगल और जंगलवासी बने एक-दूजे के दुश्मन- अस्पष्ट कानून है जिम्मेदार !

 दुधवा टाइगर रिजर्व में थारू महिलाओं ने की घुसपैठ-
दर्जनों डनलप जलौनी लकड़ी व घास जंगल से बाहर ले गयी और सरकारी अमला मुहं ताकता रहा !

जिनका सदियों का नाता था जंगल से आज वह टूट चुका है, कारण हैं सरकारी फ़रमान जो सिर्फ़ सरकारी फ़ायदों के लिए होते है जनता के लाभ वाले मुखौटे के साथ-

दुधवा से देवेंद्र पंकाश की रिपोर्ट-
केन्द्र सरकार के वनाधिकार कानून को हथियार बनाकर आदिवासी जनजाति थारूक्षेत्र की सैकड़ों महिलाओं ने दुधवा नेशनल पार्क के जंगल में धावा बोल दिया और दर्जनों डनलप यानी भैंसा गाडि़यों में गिरी पड़ी जलौनी लकड़ी जबरन भरकर घर ले आई। सूचना पर दलबल सहित पहुंचे एसडीएम, सीओ तथा पार्क अधिकारी मौके पर मूक दर्शक यूं बने रहे क्योंकि महिलाओं से निपटने के लिए उनके पास न कोई योजना थी और न उपाय। थारूक्षेत्र की महिलाओं के इस कदम से भविष्य में पार्क प्रशासन तथा थारूओं के बीच टकराव की नयी पृष्ठभूमि तैयार हो गई।

भारत-नेपाल सीमावर्ती दुधवा नेशनल पार्क के वनागोश में आबाद आदिवासी जनजाति थारूओं की पंद्रह ग्राम पंचायतों को राजस्व ग्राम का दर्जा हासिल है परन्तु दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के बाद से थारूओं को जंगल से मिलने वाली सुविधाओं पर प्रतिबंध लगा दिया था। यहां तक दुधवा में प्रोजेक्ट टाइगर लागू होने के बाद से कोर एरिया विगत 2006 में केन्द्र सरकार ने अनुसूचित जनजाति एवं परम्परागत वन निवासी अधिनियम यानी वनाधिकार कानून को लागू कर दिया। वन क्षेत्र में आबाद ग्राम सूरमा तथा गोलबोझी के निवासियों को विगत माह मार्च में घर तथा कृषि जमीन के अधिकार पत्र तो प्रशासन ने थारूओं को सौंप दिए परन्तु वनाधिकार कानून के मुताबिक थारूओं को वन उपज का सामूहिक अधिकार नहीं मिल सका है। हालांकि वन कर्मचारी निज स्वार्थ में वह सभी कार्य करा रहे हैं जो प्रतिबंधित है। इसके चलते थारूओं में भारी रोष फैल गया है। आखिर आज थारूओं के परिवारों की महिलाओं के गुस्से का लावा उबाल बनकर फूट पड़ा।

केन्द्र सरकार के वनाधिकार कानून को हथियार बनाकर थारूक्षेत्र के ग्राम सौनहा, देवराही, मसानखंभ, जयनगर आदि ग्रामों की सैकड़ों महिलाएं एकजुट हो गई और दुधवा नेशनल पार्क के देवराही जंगल में घुस गयी। धावा बोलकर जंगल में थारूओं की घुसने की सूचना से पार्क प्रशासन में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में दुधवा वार्डन ईश्वर दयाल आसपास के रेंजरों सहित भारी संख्या में पार्क कर्मचारियों को लेकर वहां पहुंच गए। उधर एसडीएम सीपी तिवारी, सीओ विवेक चंद्रा, तहसीलदार अशोक सिंह भी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए। सरकारी अमले को जमा होता देख उग्र थारू महिलाओं ने तीखा विरोध जताया और कहा कि हम लोग जंगल से वही जलौनी लकड़ी लाएंगे जो गिरी पड़ी है और सड़ जाती है। महिलाओं के विकराल रूप के आगे पूरा प्रशासनिक अमला मूक दर्शक बना रहा किसी की भी हिम्मत नहीं पड़ी कि वह थारू महिलाओं कों जंगल में घुसने से रोक सके। कुछेक घंटों के भीतर जंगल में घुसी सैकड़ों महिलाएं दर्जनों डनलप यानी भैंसा गाडि़यों में भरकर लाई गई जलौनी लकड़ी लेकर घर चली गई इसपर प्रशासनिक अमला भी धीरे-धीरे वापस आ गया।

पलियाकलां-खीरी। वनाधिकार कानून में सामुदायिक अधिकारों के तहत वन उपज का लाभ थारूओं को दिए जाने का प्राविधान किया गया है लेकिन प्रशासन थारू गांवों के निवासियों के सामुदायिक अधिकार दावा फार्म नहीं भरा रहा है। इससे थारूओं में भारी रोष फैल गया है। थारू महिलाओं के जंगल में जबरन घुसने की हुई घटना से अब यह लगने लगा है कि यदि शासन प्रशासन अथवा वन विभाग ने समय रहते सामुदायिक अधिकार थारूओं को नहीं दिए तो भविष्य में टकराव हो सकता है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। एसडीएम सीपी तिवारी का कहना है कि जब तक सामुदायिक अधिकारों से संबंधित कोई शासनादेश जारी नहीं हो जाता है इससे पूर्व थारूओं द्वारा उठाया गया कदम गैर कानूनी है। श्री तिवारी ने यह भी कहा है कि ग्रामीणों में जागरूकता के लिए वनाधिकार आदि से संबंधित गांव-गांव शिविर लगाकर उनको प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र  (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एडवोकेट है)

Jun 3, 2011

बुंदेलखण्ड का जल संकट - मामला इंतजामियां का हैं

बुंदेलखण्ड का जल संकट- जिसे खुद पैदा किया है ईंतंजामियां ने और उसके निगेहबान कार्पोरेट माफ़िया ने! .....
 पानी की त्रासदी- मरते किसान और जानवर

सूखे में किसान और आत्महत्या
    कर्ज की आड़ में कुकृत्यों पर पर्दा
   आत्महत्या पर लगी है मुआवजे की राख
   तंगहाली और फांकाकशी से दूर है मीडिया की नजर

वर्ष 2003 से 24 अगस्त 2006 तक बुन्देलखण्ड में कुल मिलाकर 1040 आत्महत्याये बतौर केस दर्ज हुयी हैं। जिनमें कि 12 दहेज, 459 पारिवारिक तनाव, 86 व्यक्तिगत कारण, 371 अन्य अज्ञात कारण और 122 आत्महत्यायें कर्ज-भुखमरी के चलते बुन्देलखण्ड में आत्महत्या की तस्वीर में दिखाई देती हैं। गौर से देखिये इस खबर को जिसे पढ़कर इंसानी रूहत में सिरहन न उठे तो खबर का मसाला ही कम दिखाई पड़ेगा। जनपद बांदा के ब्लाक बदौसा में बीते 18.05.2011 को तंगहाली से परेशान एक और किसान जीवन की बाजी हार गया, 38 वर्षीय कर्जदार किसान ने खुद को जिन्दा फूंक डाला। यह खबर बुन्देलखण्ड के हर एक दैनिक समाचार पत्र की सुर्खियां हैं। कस्बा निवासी युवा किसान प्रमोद तिवारी ने वर्ष 2005 में अतर्रा स्थित भारतीय स्टेट बैंक कृषि विकास शाखा से ट्रैक्टर लिया था। जिसका खाता नम्बर 11628887623 है। एक भी किस्त अदायगी न करने के चलते बैंक की तरफ से गत शनिवार तीस दिन के अन्दर मूलधन और ब्याज बैंक में जमा नहीं करने पर गिरफ्तारी और कुर्की का वारन्ट जारी कर दिया जायेगा। ऐसा बैंक प्रबन्धक के हाथों से लिखी कर्ज की राशि लगभग 2,46,221/- रूपये अंकित है। आनन फानन में हुयी इस आत्महत्या के बाद पारिवारिक जनों ने जनपद बांदा में पोस्टमार्टम के लिये किसान की लाश को लाये। रात 8ः30 बजे तक किसान के बड़े भाई और स्वैच्छिक संगठन किसान विकास क्षेत्रीय समिति, बदौसा संचालक वन्दना तिवारी, संरक्षक अरूण तिवारी मीडिया कर्मियों को बताते रहे कि छोटे भाई की मौत शराब की लत के कारण हुयी है। आये दिन घर में पत्नी गीता से मारपीट करना और पारिवारिक तनाव के कारण अवसाद ग्रसित होने से उन्होने इस घटना को अन्जाम दिया है। लाश के पोस्टमार्टम हो जाने तक खबर का रूख शराब की लत में युवक की मौत रहा लेकिन जैसे ही पारिवारिक जन कस्बा बदौसा पहुंचे तो इस घटना को कर्जदार किसान के रूप में तंगहाली और गरीबी से आजिज आत्महत्या का रूप दे दिया गया।

    गौरतलब है कि बुन्देलखण्ड लगातार सूखे और जलसंकट से टूट रहा है। जहां 2003 से वर्ष 2007 तक यहां भीषण आकाल और किसान आत्म हत्याओं का दौर अभियान के रूप में चला वहीं वर्ष 2007 के बाद गाहे-बगाहे ही गरीबी और भुखमरी से कुछ किसानों ने जीवन लीला को समाप्त कर लिया। आज बुन्देलखण्ड का तकरीबन प्रत्येक किसान फिर चाहें वह हासिये पर खड़ा गांव का आम किसान हो या फिर ग्रामीण तबके और शहरी परिवेश से जुड़ा दादू और दबंग किसान। कमोवेश दोनो ही स्थितियों में हर किसान क्रेडिट कार्ड के नाम पर बैंक का कर्जदार है। चूंकि प्रशासन की नीतियां और सरकार की विकास योजनाओं मंे इतनी खामियां हैं कि उन्होने किसान के आन्दोलन, उसकी परिस्थितियों का राजनीतिकरण कर दिया है। उन्होने यह एहसास कराया है कि किसान खुद कुछ भी तय नहीं कर सकता न तो अपनी जमीन पर फसल, न ही बीज और न ही पानी इन तीनों चीजों पर सरकारी मिशनरी का मालिकाना हक है। रासायनिक बीजों से लेकर मौसमी फसल तक का आंकलन अब कृषि वैज्ञानिक और सरकार की नीतियां करती हैं। खैरात के नाम पर जो कुछ मिल जाये। वह किसान की किस्मत है। ऐसे हालात में कुछ किसान बुन्देलखण्ड ही नहीं पूरे देश में ऐसे हैं जो कर्ज की आड़ में अपने कुकृत्यों पर न सिर्फ पर्दा डालने का काम करते हैं बल्कि समाज के लोग उनकी आत्म हत्याओं को मुआवजे की राख में लपेटकर बैंक और बदहाल बुन्देलखण्ड की तस्वीर को एक साथ जोड़ने का भी बखूबी षड्यन्त्र रचते हैं।

    इस आपाधापी की स्थिति में लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ मीडिया की नजर आखिर क्यों नहीं जमीन से जुड़े उस किसान की तरफ जाती है जो वास्तव मे साल दर साल सूखे और जलसंकट से त्रस्त होकर पलायन और कर्ज का हिस्सेदार बनता है। कुछ ऐसा ही बानगी के रूप में महोबा जनपद के डढ़हत माफ गांव के बासिन्दों के साथ हो रहा है जहां 250 कुएं पूरी तरह सूख चुके हैं। कुशवाहा बिरादरी के इस गांव का मूल पेशा बागबानी था। लेकिन महोबा के सूखे पान के मानिन्द में खुशहाल किसानों की खेती को भी बंजर कर दिया। आज इस गांव में एक दो नहीं सैकड़ों ऐसे परिवार हैं जो भिण्ड, मुरैना, गुजरात में ईंट भट्टों की मजदूरी के लिये परिवार सहित पलायन कर गये। बुन्देलखण्ड के सूखे वाले सर्वाधिक हिस्से में महोबा जनपद आता है और वहां किसानों की आत्म हत्यायें भी बांदा व चित्रकूट की अपेक्षा अधिक हुयी हैं। बुन्देलखण्ड के मध्य प्रदेश का हिस्सा उत्तर प्रदेश के हिस्से से अधिक सूखा ग्रस्त है। छतरपुर जनपद के बड़ा मल्हरा ब्लाक के अंधियारी गांव में जलस्तर 1500 फिट पर है। लेकिन किसी किसान ने उस गांव में आत्म हत्या नहीं की। ऐसा ही राजस्थान राज्य की स्थिति है जहां वर्ष के 4 माह ही हरियाली रहती है। रोजगार की तलाश में वहां के हजारों परिवार पूरे देश मे पलायन करते हैं। हताशा और निराशा के परिणाम को जानकर उन्होने आत्महत्या नहीं की। मगर उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड वाले हिस्से में आज हर आत्महत्या को कर्जदार किसान के रूप में जोड़ा जा रहा है। ऐसे में उन मौतों पर मीडिया का पर्दा पड़ जाता है जो वास्तव में तंगहाली और गरीबी की वजह से आत्महत्या करते हैं।

आशीष सागर
प्रवास, बुन्देलखण्ड


आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था