International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Mar 21, 2011

यहाँ भी हैं परिन्दों को दाना-पानी देने का दस्तूर...

....जीवों के प्रति यह सौहार्दपूर्ण बरताव बता रहा कि इन्सानियत जिन्दाबाद !!
विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च के उपलक्ष्य में पक्षी प्रेम की एक मिसाल...
कहते हैं कि परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है, पर लखीमपुर-खीरी जिले के निघासन नाम के छोटे से कस्बे के कई लोग अभी भी प्रकृति और इसके बनाए जीवों के प्रति अपने दायित्वों को समझते हैं। तभी तो यहां चिड़ियों को भोर उठते ही दाना चुगाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसकी शुरूआत कब हुई, यह कोई नहीं जानता और न जानना चाहता है। इन लोगों को केवल यह मालूम है कि उनके पिता या बाबा के जमाने से सुबह होते ही चिड़ियों को दाना खिलाने का  पुण्य का यह काम होता चला आ रहा है। पहले उन्होंने इसको एक ड्यूटी समझकर करना शुरू किया था लेकिन अब उनको मजा आने लगा है। वजह यह है कि इस जमाने में जब मनुष्य एक-दूसरे पर यकीन करने से परहेज करता है तब सैकड़ों पक्षी इन दाना डालने वालों के इंतजार में न केवल सुबह से ही उनके दरवाजे पर मंडराने लगते हैं बल्कि इन लोगों के ऊपर तक बैठकर दाना चुगने में भी नहीं हिचकते।

इन लोगों में शामिल हैं निघासन के संदीप बाथम। यह युवा मिठाई व्यवसायी सुबह करीब छह बजे अपनी दुकान खोलने के बाद सबसे पहले नमकपारे, नमकीन, जलेबी या ऐसी ही अन्य बची हुई चीजें एक थैली में लेकर दुकान के बाहर खड़ा हो जाता है। इनके चारों तरफ चिड़ियों, कौओं और अन्य पक्षियों का झुंड मंडराने लगता है। दाना नीचे फेंकते ही पक्षियों के झुंड यहां उतरने लगते हैं। यह पक्षी संदीप के पास तक बैठकर दाना चुग लेते हैं। यही नहीं पक्षी उनकी आवाज तक पहचानते हैं।

यही करते हैं यहां के होटल मालिक मनोज गुप्ता। वह अपना होटल खोलने के बाद शाम का बची चीजें चिड़ियों को खिलाने के लिए एक थाल में लेकर खड़े हो जाते हैं। उनके आसपास भी चिड़ियों का झुंड इकट्ठा हो जाता है। सुबह होते ही पूरा चौराहा चिड़ियों की चहचहाहट से भर उठता है। हालांकि इन लोगों को अफसोस है कि अब  सिलगुटिया और कौओं की बहुतायत है। छोटी सी गौरैया के बहुत मुश्किल से और कभी-कभार ही दर्शन हो पाते हैं।

इस कस्बे में पक्षियों को दाना डालने की यह प्रथा कोई नई नहीं है। करीब पचास सालों से यहां के कई लोग इस कर्तव्य का निर्वहन करते चले आ रहे थे। पुण्य का काम समझकर करने वालों में यहां के व्यापारी स्व0 पं0 बनवारी लाल चौबिया, स्व0 हृदय नारायण शर्मा और स्व0 रामऔतार शर्मा शामिल थे। इन लोगों की कई सालों पहले मृत्यु हो चुकी है। लेकिन इनमें से बनवारी लाल चौबिया के पुत्र राधेश्याम चौबिया और रामऔतार शर्मा के बेटे हरीशंकर शर्मा अब भी अपने पिता के इस पुनीत काम को करते चले आ रहे हैं। सुबह होते ही यह लोग अपनी छतों या छप्परों पर रोटी आदि के छोटे-छोटे टुकड़े करके डाल देते हैं। इनको चुगने के लिए सैकड़ों पक्षी यहां इकट्ठे हो जाते हैं। हम पक्षी प्रेमी उनके बिना किसी पारितोषिक या प्रशंसा की इच्छा के लगातार किए जा रहे इस पावन काम और उनकी भावना को प्रणाम करते हैं।

 सुबोध पाण्डेय ( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एंव पत्रकार हैं, पेशे से कानून के पैरोकार हैं, जिला खीरी  की तहसील निघासन में निवास,  मौजूदा वक्त में हिन्दुस्तान दैनिक में निघासन तहसील के संवाददाता हैं। इनसे pandey.subodhlmp@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं)


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