डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 9, 2010

तराई की नदियों में डॉल्फ़िन

भास्कर मणि दीक्षित* Ganges River Dolphins (Platanista gangetica) (सोस/सूस)
तराई की नदियों में डॉल्फ़िन:
इस सुन्दर जीव का किया जा रहा है शिकार:
खतरे में हैं डॉल्फ़िन- नदियों में बहाया जा रहा है, खुलेआम औद्योगिक कचरा
शारदा और घाघरा नदियों में बहुतायात में हैं गैन्गेटिक डॉल्फ़िन

Photo courtesy: arkive.com © Toby Sinclair
किसी भी नदी में डॉल्फिन का होना उसकी स्वस्थ्य ईको सिस्टम को दर्शाता है। क्योकि नदी की डाल्फिन उस नदी के खाद्य श्रखंला के सबसे ऊपर की कड़ी होने के कारण बेहतर जैव-विविधता को दर्शाती है। गैन्गेटिक डाल्फ़िन उन चार फ़्रेसवाटर डाल्फ़िन में से एक है, जो पूरी दुनिया में पाई जाती है। हमारे देश में ये गंगा और ब्रह्मपुत्र और उनसे जुड़ी नदियों में पायी जाती है। सन 2000-2001 में विश्व प्रकृति निधि (WWF) के एक सर्वे के अनुसार पूरे भारत वर्ष में करीब 2000 गैन्गेटिक डॉल्फ़िन थीं, जिनमे से गंगा नदी में 35, यमुना में 47, चम्बल में 78, कोशी (नेपाल) में 87 औरैर घाघरा नदी में 295 थीं।

गैन्गेटिक डॉल्फ़िन 5 से 8 फीट तक लम्बी होती है, और उसका वजन करीब 90 से 100 किलो तक होता है। इसका मुँह लम्बा होता है, पंख(डैने) बड़े और इनका शरीर कंधे और सीने से चौड़ा होता है। इनके लम्बें और पतलें मुँह के ऊपर और नीचे दोनो जबड़ो में 28.28 तीखे और घुमावदार दाँत होते है। इन्हे हर 30 से 50 सेकेन्डस मे साँस लेने के लिये पानी में ऊपर आना पड़ता है। स्तनपाई जीव होने के कारण ये अन्डे न दे कर सीधे बच्चे ही देते है। मनुष्य की तरह ही 9 महीने पूरे होने पर ही इनके बच्चे जन्म लेते है। जन्म के समय ये बच्चे करीब 65 सेमी0 के होते है। ये अपने बच्चे को अपना ही दूध पिलाती हैं और इनका स्तन इनके मलद्वार के करीब ही होता है।

ये करीब 6 से 7 वर्ष मे व्यस्क हो जाते है और करीब 35 वर्ष की आयु तक जीवित रहते है। ये लगभग अन्धे होते है और अपनी इन्ही कमजोर आँखों की रोशनी के कारण ये समुद्री डाल्फिन की तरह से प्रशिक्षित नही किये जा सकते हैं इसलिये बहुत समय तक इन्हें किसी तालाब में नही रखा जा सकता अगर रखे गये तो ये मर जायेंगें। आखों की रोशनी न होने की वजह से इन्होने अपने सुनने की क्षमता को बहुत बढ़ा लिया है जिससे ये सुन कर शिकार करती हैं और इन्ही घ्वनि से पूरे नदी में घूमती भी है। ये 2,00,000 Hz अल्ट्रा सोनिक आवाज़ निकाल और सुन सकती है जब कि मनुष्य के सुनने की कुल क्षमता केवल 18,000 Hz ही है।

ये काफी अच्छे तैराक होने के साथ साथ काफी फुर्तीले भी होते है, जिससे अपने सुनने की क्षमता से और अपने पूँछ और डैने की मदद से मैले और धुधले पानी में आसानी से तैर लेते है। गैन्गेटिक डॉल्फ़िन पूरे भारत में सभी नदियों में पाई जाती है। इनको गहरे पानी में रहना ज्यादा पसन्द है, लेकिन बाँढ के दिनों में ये बाँढ के पानी के साथ नदी की गहराई से बाहर आ जाती हैं। इनको 8 से 33 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान वाले पानी में रहना पसन्द है।

इनका मुख्य भोजन मछलियों के साथ साथ मेंढक, कछुवें और जलीय पक्षियों के बच्चें आदि है लेकिन अपने लम्बे मुँह और डैनों की मदद से ये नदी के अन्दर की मिट्टी को खोद कर उसमें से भी अपने लिये भोजन ढूढ लेती है।

पहले तो ये काफी बड़ी समूहों मे दिखाई पड़ती थी लेकिन अब तो 1 से 3 के समूह में भी दिखती है। ये ज्यादातर दो नदियों के मिलान पर, मनुष्यों की आबादी के निकट के नदियों में या फिर नदी के शान्त और धीमी बहाव वाले स्थान में दिखती है।
इस समय Ganges River Dolphins बहुत बड़े संकट में है। इनकी संख्या में प्रति वर्ष 10% की दर से गिरावट हो रही है। माँस और तेल के लिये इनका शिकार होता है। केवल गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में ही इनका प्रति वर्ष 100 की संख्या में शिकार हो रहा है।

इनकी संख्या में निरन्तर गिरावट का सबसे मुख्य कारण वन्य जीव संरक्षण के कार्य में लगे लोगों का इनके प्रति उदासीनता ही है। इसके अलावा नदी में जगह जगह बाँधों का बनना, इनके रहने के स्थान की कमी होना, नदियों के पास रहने वाले लोगों का इनके संरक्षण में सहयोग न देना है। आम लोगो में संरक्षण के प्रति जागरूकता की कमी के कारण ही इनको संकटग्रस्त जानवरों की श्रेणी में ला कर खड़ा कर दिया है।

IUCN  ने इनको 1996 में ही संकटग्रस्त करार किया था और भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार इनको सेड्यूल 1 की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन आज भी इस प्राणी के बारे में लोगों को बहुत ही कम जानकारी है। लोगों में जानकारी का इतना अभाव है, कि वे ये भी नही जानते कि समुदुद्र के अलावा नदियों में  भी डाल्फिन होती हैं। ऐसे हालात में सबसे पहले लोगगों तक इस जीव के बारे में सही जानकारी पहुंचाना यानी कि लोगों  को जागरूक करना जरूरी है।


भास्कर मणि दीक्षित (लेखक वन्य जीव सरंक्षण व उनके अध्ययन में  "तराई एन्वाइरनमेन्टल फ़ाउन्डेशन गोन्डा" द्वारा बेहतर सामूहिक प्रयास कर रहे हैं। गोण्डा जनपद में निवास, इनसे   bdixit63@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

5 comments:

अविनाश said...

डाल्फ़िन पर लिखा यह लेख ज्ञानपर्क है, किन्तु आप ने अपने इलाके में मौजूद डाल्फ़िन की स्थिति पर कोई चर्चा नही की, सिर्फ़ किताबी बाते ही लिखी है, ये तो कोई भी नेट से अनुवाद कर लिख सकता है।

bhasu said...

आप सही कह रहे है अविनाश जी, किन्तु ये भी उतना ही सच है की इन्टरनेट के जरिये से महत्वपूर्ण जानकारियों को संकलित करना और अपनी राष्ट्रभाषा में उसे लोगों तक पहुचना भी एक महत्वपूर्ण कार्य है. ये एक ज्ञानवर्धक लेख है जिसे दुधवा लाइव में स्थान मिलाना ही चाहिए.

Anonymous said...

Bhasker
Very good attempt!!! The major scientific impasse in our country is due to lack of scientific information being available in native language. Your effort is in the right direction to bridge the gap. Please post more.

अरुणेश दवे said...

@अविनाश जी कोई भी लेखक किसी भी लेख मे या कहानी मे जॊ भी लिखता है वह सब बाते वह किसी से सुन कर और अधिकांशतः पढ कर ही अपने अनुसार अपने शब्दो मे बयान करता है । जहा तक मेरा अनुमान है आपने भी अपने जन्म के पश्चात चीजे दुसरो से सीखी ही हॊंगी । इस तरह किसी लेखक कॊ खासकर जब वह पर्यावरण जैसे अछूते विषय मे काम करने का प्रयास कर रहा हो उसे हतॊत्साहित करना अनुचित है

bhasu said...

Thanks Arunesh Ji.
Thanks for supporting me about my writeup and my comments also. i appreciate your feelings about the writing work of all of us. I am totally agree with you.
Bhasker Dixit

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