डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 11, 2010

बाढ़ में जानवर हुए बेहाल

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* बाढ़ ने चौपट किया पशुपालन कारोबार

 उत्तर प्रदेश की उफनाई नदियों ने अपनी बाढ़ के कहर का आतंक उन जिलों में फैलाया जहां के लोग पानी की विनाशलीला को टीवी पर देखते थे या फिर अखबारों में पढ़ते थे। इस साल पूरे देश में जहां जीवनदायनी कही जाने वाली नदियों के पानी ने भारी तबाही मचाकर नया इतिहास रच दिया है। वहीं यूपी में तीन दर्जन जिलों के छह हजार के उपर गांवों में निवास करने वाली लगभग चार लाख की आबादी विभिन्न नदियों की बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित हुई है। तथा चार सौ पचास लोगों की मौत भी हो चुकी है। जबकि अभी भी सूबे के पश्चिमी जिलों में जल ही जीवन कहे जाने वाले पानी का आतंक कायम है। इससे अन्नदाता कहे जाने वाला गांव का किसान बाढ़ की त्रासदी से बर्वादी की कगार पर पहुंच गया है।

Photo Courtesy: Louis Copt (www.kgs.ku.edu)
नदियों में उफान आने के कारण ग्रामीणांचल में रहने वाले किसानों की अर्थव्यवस्था को दुरूस्त रखने का एकमात्र साधन कृषि उपज पूरी तरह बाढ़ की भेंट तो चढ़ ही गयी है उपर से पशुपालन कारोबार भी पूरी तरह चौपट हुआ है। बाढ़ से न जाने कितने निरीह पालतू पशु असमय काल के गाल में समा गये क्योंकि मानव ने तो अपने बचाव के प्रयास कर लिये किन्तु दरवाजे पर बंधे पालतू पशुओं को कहां ले जाये। इस कारण से भीषण बाढ़ की बिनाशलीला ने कृषि के साथ ही पशुपालन के जरिए किसानों को आर्थिक सहारा प्रदान करने वाले दूध के कारोबार को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। एकदम से नदियों की बाढ़ का पानी बढ़ने से ग्रामीण परिवार के साथ पलायन कर ऊंचे स्थान पर पहुंच गये। जहां तक सम्भव हो सका तो पालतू पशुओं की उचित व्यवस्था भी अवश्य की। किन्तु पशुपालकों के सामने सबसे कठिन समस्या आड़े आई कि पशुओं को ले कहां जाया जाए? पशुओं को न तो छत पर ही नहीं चढ़ाया जा सकता था और न ही इतना समय था कि उनको सुरक्षित जगहों तक पहुंचाया जा सके। बाढ़ की आपाधापी में पशुओं का चारा यानी भूसा आदि को सुरक्षित रखने का समय भी पशुपालकों को नहीं मिला। इस कारण से घरों और झोपड़ियों में रखा गया भूसा आदि भी बाढ़ के पानी से भीग चुका है।

उफनाई नदियों के पानी से भयभीत ग्रामीणजन अपनी जान बचाने की मुसीबत में कई-कई दिनों तक घरों की छतों पर  फंसे रहे, तो पशुओं को दाना-पानी कौन दे? इस कारण सैंकड़ों मवेशी कई दिनों तक भंूखे-प्यासे तब तक खूंटे पर बंधे रहे जब तक बाढ़ की भयावह दशा नहीं हुई। लेकिन पानी का आतंक जैसे ही बिकराल स्थिति में पहुंचा तो सैंकड़ों पालतू पशु अपनी जीवन रक्षा में खूंटे तोड़कर इधर-उधर भाग गए। जिसमें से सैकड़ों भैंसें एवं गायें जो अपने को बाढ़ से नहीं बचा पाये वह नदियों की तेज धार में बहकर न जाने कहां चले गए, और इसमें से भी तमाम पालतू पशु असमय काल के गाल में समा गए। बाढ़ के प्रकोप और भूख से लड़कर जो पालतू पशु जीत भी गये हैं, अब उनके सामने चारा की समस्या मुंह फैलाये खड़ी है। क्योंकि ग्रामीणांचल के क्षेत्रों में कहीं भी पशुओं के लिए चारा नहीं बचा है और न ही उनके चरने के लिए उचित स्थान ही रह गया है। बाढ़ की भीषण त्रासदी झेल रहे किसानों की आर्थिक स्थिति भी इतनी कमजोर हो चुकी है जिसमें उनके लिए अपना पेट भरना ही दुरूह कार्य बन गया है। ऐसे में पशुओं को बाजार से खरीदकर चारा खिला सके यह बात वह सपने में भी नहीं सोंच सकते हैं। इससे भी अलग हटकर देखा जाये तो जहां कहीं भी कुछ उंची जगहों पर घास आदि का चारा बचा भी है तो वह बाढ़ के पानी के साथ आई गंदगी, मिट्टी व अन्य विषैले पदार्थों से विषैला होकर पशुओं के खाने योग्य नहीं रह गया है।

बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में पशुओं के चारे की विकट समस्या उत्पन्न होने से पशुपालकों के समक्ष गंभीर चुनौती उत्पन्न हो गयी है। क्योंकि भूंखे-प्यासे व्यक्ति को तो इंसानियत के नाते पास-पड़ोसी एवं भाई-बंद भी सहारा दे देते हैं, किन्तु पशुओं का पेट भरने के लिए चारा कोई नहीं देता है। इस विषम स्थिति में पशुपालकों की मजबूरी के कारण उनका पशुधन भूख से बेवश होकर बाढ़ खत्म होने के बाद भी दम तोड़ने पर मजबूर हो रहा है। दूसरी तरफ बाढ़ घटने के बाद पशुओं में प्रदूषित पानी से विषाणु जनित तमाम प्रकार की संक्रामक बीमारियां भी तेजी से पांव पसारने लगी हैं। जिनका उपचार कराना भी पशु-स्वामियों के समक्ष एक विकट चुनौती भरा कार्य बन गया है। पशुओं की दवाई तो ऐन-केन-प्रकारेण करवा ही ली जायेगी। किन्तु केवल दवा से पशुओं का पेट भरने वाला नहीं है। पशुओं का पेट भरने के लिये आवश्यक तो है चारा। जिसके अभाव में आगे भी न जाने कितने पालतू पशु अकाल मौत का शिकार बन जाएगें। जिससे सैकड़ों किसान अपने प्रमुख पशुधन से विहीन हो जाएगें। इस तरह उनके दूध का कारोबार करने वाले किसानों का एक यह भी कमाई का जरिया समाप्त हो जाएगा। किसानों की आर्थिक स्थिति को कृषि उपज व पशुपालन कारोबार मजबूती प्रदान करता है साथ ही ग्रामीणांचल के यह दोनों व्यवसाय भारतीय अर्थव्यवस्था की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान भी रखते हैं। लेकिन इस साल की भीषण बाढ़ द्वारा मचाई गई बर्वादी और विनाशलीला के कहर ने कृषि उपजों के साथ पशुपालन कारोबार को लगभग पूरी तरह से तबाही की कगार पर खड़ा कर दिया है। इसका निकट भविष्य में दुष्प्रभाव यह भी पड़ेगा कि पशुपालन में कमी आने के कारण दूध उत्पादन के भी प्रभावित होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। जिसके कारण खासकर शहरवासियों को दूध की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा। जबकि दूध की कमी और उसकी बढ़ती मांग का फायदा उठाने के लिए सिनथेटिक दूध का अवैध कारोबार करने वाले लोग भी सक्रिय हो जाएगें। इनसे निपटने के लिए समय रहते शासन-प्रशासन द्वारा मुकम्मल व्यवस्थाएं न की गई तो मानव का जीवन भी खतरे में पड़ सकता है।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार है, लखीमपुर खीरी जनपद के पलिया कस्बे में निवास, वन्य जीवन पर लेखन व उनके सरंक्षण में प्रयासरत हैं। इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता हैं।)




1 comments:

अरुणेश दवे said...

जब मनुष्य इतिहास और नदियो के जलभराव क्षेत्र को नजरान्दाज कर ऐसे क्षेत्रो मे बस जाता है तब इस विनाशलीला का सामना तो महज वक्त की बात होती है आधुनिक युग मे तो इस विनाश को बहुत हद तक सीमित कर लिया गया है पहले तो पूरी की पूरी सभ्यताए ही विलुप्त हो जाती थी ।

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