डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 6, 2010

मानव व वन्य जीवों के मध्य चल रहे घमासान की एक कहानी !

 कतरनियाघाट वन्य जीव विहार, बहराइच, उत्तर प्रदेश, भारत:
संघर्षगाथा:
मानव व वन्य जीवों के मध्य संघर्ष पर एक विमर्श:

"विश्व प्रकृति निधि के परियोजना अधिकारी दबीर हसन से दुधवा लाइव की बातचीत के ये अंश कतरनियाघाट वाइल्ड लाइफ़ सेन्क्चुरी व इसके आस-पास हो रही घटनाओं पर आधारित है, कि आखिर क्यों रफ़्तार पकड़ रहा है वन्य जीवों और मानव के मध्य संघर्ष और इसके पीछे वो कौन सी वजहें हैं जो इस संघर्ष को बढ़ावा दे रही हैं, जो नतीजे सामने आयेंगे उनसे यकीनन आप सभी स्तब्ध रह जायेगें!"
 
फ़ोटो साभार: सीजर सेनगुप्त
कतरनियाघाट में लगातार बढ़ रही बाघों व मनुष्यों के मध्य लड़ाई अब चरम पर है, अभी  ३ अक्टूबर को कैलाशपुरी रोड पर स्थित गाँव नई बस्ती (वन-ग्राम) के १७-१८ वर्ष के लड़के जगमोहन पुत्र सुरेन्द्र को बाघ ने मार दिया, वह शाम के वक्त जंगल गया था। इससे पूर्व सितम्बर २०१० में विष्णु टांडा (जंगल के निकट रेवन्यू विलेज) गाँव के एक आदमी को बाघ ने मारा, और फ़रवरी २०१० में  एक लड़की बाघ का शिकार बनी।  ये तीनों घटनायें जंगल के भीतर हुई। आप को बताता चलूं कि कतरनियाघाट वाइल्डलाइफ़ सेन्क्चुरी के अन्तर्गत पाँच ग्राम-सभाये है, और इन ग्राम सभाओं में तीन हैमलेट्स (पुरवे) हैं, यानी कुल आठ गाँव हैं, और यहाँ के लोग जंगल की जमीन पर कब्जा रहने के लिए आमादा हैं!


इस वन्य जीव विहार की स्थापना १९७६ में किया गया, किन्तु बाद में इसे डिनोटीफ़ाई कर दिया गया, बहराइच जनपद के घने जंगलों का यह हिस्सा जहाँ वन्य जीवन की प्रचुरता है, डिनोटीफ़िकेशन के कारण फ़िर एक बार यह शिकारियों, लकड़कट्टों व अन्य अवैध व अनुचित गतिविधियों में लिप्त लोगों का अड्डा बन गया। 
१९८८ में यह क्षेत्र एक बार फ़िर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वन्य जीव विहार के रूप में प्रस्तावित किया गया। १९९० में भारत सरकार द्वारा भी इसे मन्जूरी व सहयोग प्राप्त हुआ, यही वह वक्त था जब इस प्राकृतिक स्वर्ग से तमाम नर्कीय कारकों का बोरिया-बिस्तर गोल होने वाला था! यानी गैर-वानिकी कार्य जैसे गिरवा नदी से पत्थरों का खदान आदि, साथ ही आजादी से पेड़ काटने वाले, जंगल की जमीन पर कब्जा करने वाले व शिकारियों के लिए यह अन्तिम वक्त आ गया था। पर साथ ही दूसरी तरफ़ एक आग लगने जा रही थी, जो आज भी धू-धू कर जल रही हैं, यह आग थी तमाम उन ग्रामीणों के सीने में जिन्हे जंगल से जलौनी लकड़ी, मवेशियों की गौड़िया, पौध-रोपड़ विधा के द्रोणाचार्यों यानी टाँगिया समुदाय, व जंगल में बसे गाँव के ग्रामीणों में जो तमाम जंगली स्रोतो पर वैध व अवैध तरीके से निर्भर थे। उन्हे ये लगने लगा कि अब उनकी बुनियादी जरूरतों पर प्रतिबन्ध लगाया जा रहा हैं!
आप को बताता चलूं की गिरवा व घाघरा नदियों के मध्य स्थित यह वन श्रंखला जो वन्य जीवों का स्वर्ग हैं, जैव-विवधिता के मामले में दुनिया के बेहतरीन स्थलों में से एक हैं, किन्तु भारत-नेपाल सीमा पर स्थिति यह जंगल भारत के मुख्य शहरों से दूर व सुगम मार्ग न होने की वजह से दुनिया  के लोगों के लिए अन्जाना रहा, और कमोवेश यह स्थिति अभी भी बरकार है। सबसे अहम बात ये है, कि यह वन्य क्षेत्र नेपाल के बरदिया नेशनल पार्क से खाता कॉरीडोर के माध्यम से जुड़ा हुआ हैं, इस कारण नेपाल के जंगलों व भारतीय जंगलों के वन्य-जीवों का आवागमन निर्बाध रूप से जारी है, जो हमारी जेनेटिक-विविधता को कायम रखने में मददगार है। यहाँ एक और खूबसूरत कहानी हैं, कि खाता कॉ्रीडोर के जंगल "कम्युनिटी फ़ॉरेस्ट" हैं जिन्हे वहाँ के सथानीय नागरिकों ने तैयार किया हैं, ये सुन्दर सबक हमारे भारतीय पॉलिशी मेकर्स को भी लेना चाहिए। 

कतरनियाघाट के जंगल शामिल हुए "टाइगर प्रोजेक्ट" में:

इस वन्य क्षेत्र के लिए सबसे सुनहरा मौका था, १९९७ में इसका भारत सरकार द्वारा चलाये जा रहे "टाइगर प्रोजेक्ट" में शामिल किए जाना,  विश्व प्रकृति निधि ने भी १९९८ से इस वन्य जीव विहार को सहायता देना प्रारम्भ कर दिया। इस वक्त यह लखीमपुर स्थिति दुधवा टाइगर रिजर्व के कार्यालय से गवर्न होना शुरू हुआ, इस समय दुधवा के निदेशक वरिष्ठ आई एफ़ एस रूपक डे थे, कतरनियाघाट अब इनके प्रशासकीय कार्यों का एक अहम हिस्सा बन चुका था। इसी दौरान कतरनियाघाट जंगलों में स्थित "सेन्ट्रल स्टेट फ़ार्म" जिसे भारत की तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा स्थापित कराया गया था, वह दिन हम भारतीयों के दुर्भक्षिता के दिन थे और सरकारे तमाम वनों को काटकर या वनों के मध्य इस तरह के कृषि फ़ार्म स्थापित करने मे जुटी थी ताकि हिन्दुस्तानियों का पेट भरा जा सके, इन कृषि फ़ार्मों से कितने भारतवासी लाभान्वित हुए यह एक अलग मुद्दा है? या अफ़सर और शासन में बैठे लोगों के ही पेट भरते आये!...इस बात पर कभी और चर्चा......। इस फ़ार्म में जहाँ तमाम फ़सले उगाई जाती थी, एक ग्रासलैंड की शक्ल ले चुका था, आस-पास वन और मध्य में वन्य जीवों के लिए यह घास का मैदान एक उपयुक्त स्थल बन गया, शाकाहारी जीवों को स्वादिष्ट फ़सलों का भोजन, और शाकाहारी जीवों की उप्लब्धता के चलते बाघ व तेन्दुओं का इस जगह के प्रति आकर्षण बढ़ता चला गया। वन्य जीवन से होने वाले नुकसान से फ़ार्म के अधिकारी व कर्मचारी वन्य जीवों के शिकार की गतिविधियों में परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर शामिल हो गये! दुधवा के निदेशक रूपक डे के कार्यकाल में ही यहाँ एक पोचिंग का मामला उजागर हुआ, और इस तेज-तर्रार अधिकारी ने "सेन्ट्रल स्टेट फ़ार्म" के कर्मियों व अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करवाते हुए इसे सीज कर दिया। इसकी एक वजह और थी, श्रीमती गाँधी के कार्यकाल में आनन-फ़ानन में यह कृषि फ़ार्म उनके मौखिक आदेश पर स्थापित किया गया था! और इस फ़ार्म में कतरनियाघाट वन-प्रभाग का भी कुछ हिस्सा मौजूद था, लगभग ३५०० हेक्टेयर वन-भूमि  एक अतिक्रमण के तौर पर हैं।

 एक बार फ़िर बदहाली की राह पर:

सन २००० में कतरनियाघाट वन्य जीव विहार एक बार फ़िर बदहाली के रास्ते पर ला दिया गया, जब इसे दुधवा टाइगर रिजर्व से हटाकर "गोण्डा-ईस्ट वृत्त" (कतरनियाघाट, सुहेलवा, व सोहागीबरूवा वन्य जीवविहार) से जोड़ दिया गया। टाइगर रिजर्व से अलाहिदा होते ह भारत सरकार से इसे वो अनुदान व सहूलियते मिलना बन्द हो गयी, जिनके चलते यहाँ वन्य जीवन को सुरक्षा व सवर्धन प्राप्त हुआ था। सन २००३ में इसे दुधवा टाइगर रिजर्व का दोबारा हिस्सा बना दिया गया। किन्तु इन तीन वर्षॊं में इस सुन्दर वन की जितनी दुर्दर्शा हो सकती थी हुई।    
सन २००१ से २००४ तक इस वन्य जीव विहार में वन-संपदा छिन्न भिन्न की जाती रही। सन २००५ में आई एफ़ एस रमेश पाण्डेय की तैनाती के बाद इस जंगल में वन्य जीवन को सरंक्षण, वन-कर्मियों एंव ग्रामणों को वन्य जीवन का महत्व समझ आने लगा। आई एफ़ एस रमेश पाण्डेय द्वारा आधुनिक शैली में वन कर्मियों को  प्रशिक्षण व ग्रामीणों में जैव-विवधिता के महत्व प्रति जागरूकता अभियान चलाये गये, जिसमें कतरनियाघाट वेलफ़ेयर सोसाईटी का बेहतर सहयोग मिलता रहा।  

शिकारियों का पर्दाफ़ास:

२००१ व २००५ तक कतरनिया घाट के वनों व आस-पास के क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रकाश में नही आया, सन २००१ में एक व्यक्ति को जंगल के भीतर बाघ ने मारा, २००४ में कोई घटना नही हुई। किन्तु २००५ से यह ग्राफ़ बढ़ने लगा, नतीजा साफ़ था, कि इस वन क्षेत्र में बाघों व तेन्दुओं को उचित सरक्षण प्राप्त हो रहा था, और उनकी सख्या में वृद्धि भी, साथ ही वन के अन्दर मनुष्य की अविध गतिविधि पर भी पूर्ण प्रतिबन्ध लग चुका था, लिहाजा झुझलाये ग्रामीण आये दिन वन-विभाग से टकराव की स्थिति उत्पन्न कर रहे थे।
२००५ में प्रभागीय वनाधिकारी रमेश पाण्डेय द्वारा बाघ की पोचिंग का एक महत्व पूर्ण मामला प्रकाश में लाया गया, इस गिरोह में स्थानीय व बाहरी लोग शामिल थे, जिन्होंने यह कबूला, कि वह कई वर्षों से यहाँ बाघों व तेन्दुओं का शिकार करते आये हैं, जिनमें जंगल में मौजूद गौड़िया( पालतू मवेशियों का स्थान जहाँ तालाब या नदी के किनारे कुछ पेह्सेवर मवेशी पालक अपना अड्डा बना कर झोपड़ी आदि में रहते हैं) और इन गौड़ियों के मालिक भी शामिल थे, क्योंकि बाघ व तेन्दुओं से इनके मवेशियों को खतरा बना रहता था एंव आये दिन इनके मवेशियों को बाघ मार दिया करते थे, नतीजतन ये बाघों के शत्रु बन चुके थे! 

घुमन्तू जातिया भी शामिल हैं बाघ के शिकार में:
इस घटना में कतरनियाघाट वन्य क्षेत्र में जगह-जगह कैम्प कर रहे कंजड़ भी शामिल थे, जो दिन में रस्सी, फ़ूलमाला,भैसें, मुर्गा  बेचते, रात में बाघों का शिकार करते, इनके घर की महिलाए गाँवों में नाचगाना जैसे मनोरंजक कार्य भी करती थी। इनके पास से आइरन ट्रैप (खुड़के) आदि बरामद हुए।


सन २००५ से २००८-९ तक कतरनियाघाट में अवैध कटान, शिकार, व अतिक्रमण का ग्राफ़ एकदम नीचे आ गया था। किन्तु बाघ व मनुष्य के बीच संघर्ष में इजाफ़ा हो गया, अब आप स्वयं अन्दाजा लगा सकते हैं कि इस संघर्ष के मु्ख्य कारण क्या हैं! 

विस्थापन का खौफ़ और राजनीति:

कतर्नियाघाट अब क्रिटिकल टाइगर हैविटेट के तौर पर जाना जा रहा है, इस वजह से यहाँ मौजूद वन-ग्रामों में प्रत्येक परिवार को दस लाख रूपये मुवाबजा देकर पुनर्स्थापित करने की योजना बनाई जा रही हैं, और यह खबर जंगल में आग की तरह फ़ैली! लोग इसे राजनैतिक रूप देने की कोशिश में भी लगे हुए हैं, और ग्रामीणों को भड़काया जा रहा हैं।
गिरवा नदी के पार स्थित भरतपुर गाँव मे २०-२५ हाथियों के झुण्ड जो नेपाल से आते है, उनके कारण भी ग्रामीणों में आक्रोश व्याप्त हैं.......

दैवीय आपदा बनाम आदमखोरी:

दैवी आपदा में दी जाने वाली छति पूर्ति के मुकाबले बाघ द्वारा मारे गये व्यक्तियों को दिया जाने वाला मुवाबज़ा बहुत कम है, यह भी एक अहम मुद्दा है, जिस कारण जंगल के आस-पास रहने वाले लोग वन-विभाग के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं, वन-विभाग के वाहनों को छति पहुंचाना, कुल्हाड़ी, कांता-बल्लम, और बन्दूकों के साथ वन विभाग से मोर्चा लेने की भी कोशिशे होती है, राजनीति से प्रेरित धरना-प्रदर्शन आदि भी अंजाम दिए जाते हैं।
किसी दैवीय आपदा, जैसे आगजनी, बाढ़, आकाशीय विद्युत, आदि से मृत व्यक्ति को सरकार तीन दिन के भीतर उप-जिलाधिकारी द्वारा तुरन्त १०,०००० रुपये मृत व्यक्ति के घर वालों को दे दिए जाते है, बाकी औपचारिकता बाद में पूरी की जाती हैं।
वही यदि किसी व्यक्ति की जान बाघ द्वारा ली जाती है, तो ५०,००० रुपये का प्राविधान है, जो तमाम औपचारिकताओं के बाद छ: महीने बाद दिया जाता है। बाघ द्वारा प्रभावित ग्रामीणों की माँग है, कि बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है, और सरकार करोड़ों रूपये उसके सरंक्षण पर दे रही है, तो मानव-वन्य-जीव संघर्ष को रोकने के लिए यह क्षतिपूर्ति पाँच लाख रूपये होनी चाहिए।
कतरनियाघाट में विश्व प्रकृति निधि भारत के परियोजना अधिकारी दबीर हसन कहते हैं कि आये दिन बाघ-तेन्दुआ द्वारा वन-ग्रामों व जंगल के आस-पास स्थिति गाँवों से गाय, बकरी, भैंस व बैल मार दिए जाते हैं। वन-विभाग बकरी के बाघ या तेन्दुआ द्वारा मारने पर १९० रूपये मुवाबजा देता है, जबकि बाजार में एक बकरी की मौजूदा कीमत २००० से ३००० रूपये है। और हाँ ये मुवाबजा इतनी अधिक औपचारिकता के बाद चेक व ड्राफ़्ट के रूप में दिया जाता है, कि बकरी पालक गरीब ग्रामीण उन ड्राफ़्टव  चेक को झुझलाहट व बेबसी के चलते फ़ाड़ कर फ़ेक देता हैं, क्योंकि उस चेक को रेन्ज अधिकारी द्वारा चिन्हित करवा कर बैंक में खाता खुलवाना पड़ता है, जिसके लिए पूरे पाँच सौ रुपयों की आवशयकता होती है, जिसका इन्तजाम करना उस ग्रामीण के लिए कठिन होता हैं।
मुवाबजे में तब्दीली:

अभी तक बाघ या तेन्दुए द्वारा मारे गये व्यक्ति कों मुवाबजे के तौर पर विश्व प्रकृति निधि तत्काल ५००० रूपये व घायल वय्क्ति को २०००-३००० रूपये क व्यवस्था करती थी। किन्तु अब यह व्यवस्था "टाइगर कन्जर्वेशन सोसाइटी" द्वारा की जा रही है, और क्षति्पूर्ति की धनराशि मारे गये व्यक्ति के परिवार को ५००० से बढ़ाकर १००००  रूपये कर दी गयी है, और घायल व्यक्ति को ५००० रूपये।

वाइल्ड-लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया:

मानव व वन्य-जीवों के मध्य संघर्ष रोकने के लिए यह संस्था पाँच वर्षीय कार्यक्रम के साथ कथित तौर पर यहँ काम कर रही है, अभी तक उनके द्वारा कौन से कार्य किए गये हैं, जो इस भयावहता को रोक पाये या कम कर सके यह किसी को मालूम नही। बताया जा रहा है, कि संस्था ट्रंकुलाइजेन, कैमरा ट्रैपिंग, आदि-आदि की ट्रेनिंग, देंगी, चलो यदि हमारे इस जंगल के सभी बाघ और तेन्दुओं को सुलाने व फ़ूटू खींचने  से यह संघर्ष खत्म हो जाता है तो वही सही। 

वन्य जीवन व मानव के बीच टकराव के सामन्य व पूर्व-विदित कारण:

१- जंगल में बाघ व तेन्दुओं के भोजन(शिकार) की कमी।
२- हैविटेट का लगातार दोहन व विनाश।
३- मनुष्य की आबादी की जंगलों पर निर्भरता।
३-सरंक्षित क्षेत्रों में मनुष्य की घुसपैठ।
४-वन्य जीवन के प्रति जागरूकता का अभाव।
५- वन-विभाग में अभी भी वन्य जीवन के प्रति समुचित अध्ययन व संसाधनों का अभाव।
६- शाकाहारी जीवों का शिकार जो बाघ, तेन्दुआ या अन्य माँसाहारी जानवरों का भोजन हैं।
७- ब्रिटिश ईंडिया एंव स्वतन्त्र भारत में वास्तविक वनों को नष्ट कर, उनकी जगह पर शाखू या सागौन के वृक्षों का रोपण, जिससे जंगल में विविधता समाप्त हो गयी।
८- ग्रास-लैंड पर कृषि-कार्यों के लिए अतिक्रमण या सरकारों द्वारा लोगों को जमीन का आंवटन।

ऐसे तमाम कारण है जो इन जीवों का रूख मानव आबादी की तरफ़ करते हैं।

पर हमारी चर्चा में जो मसले हमारे सामने आये वो चौकाने वाले हैं कतरनियाघाट में बाघ और तेन्दुओं द्वारा की जा रही गतिविधियों में मनुष्य की एक बड़ी चाल है, और उसकी करतूतों की विफ़लता, और इसी कारण आज यहाँ का माहौल आक्रोशपूर्ण है, किसी खिसियायी बिल्ली की तरह!
आज यहाँ बाघ और तेन्दुओं का शिकार न कर पाने, जंगल की जमीन पर अतिक्रमण न कर पाने, व जंगली संशाधनों का दोहन न कर पाने क वजह से लोगों मे वन-विभाग के प्रति आक्रोश व्याप्त है, अब अपने इन शैतानी गतिविधियों की तबाही को ये लोग सीधे जाहिर नही कर सकते, नतीजतन, ये राजनीति का सहारा लेकर वन-विभाग के विरोध में खड़े होते हैं, ग्रामीणों को भड़काते है, और अफ़सरों के वाहनों को क्षति पहुंचाई जा रही हैं, इस संघर्ष के पीछे वही चेहरे छुपे हुए हैं जो अपनी गलत गतिविधियों को अन्जाम नही दे पा रहें।
आज कतरनियाघाट में सरंक्षण को महत्व मिलने से बाघ व तेन्दुओं की तादाद बढ़ी है, और जंगल में उन्हे भोजन न मिल पाने की कारण वह गाँवों के आस-पास आ जाते हैं। जहाँ हर वक्त मनुष्य जंगलों के भीतर अपनी घुसपैठ जारी किए हुए है, अन्तत: संघर्ष स्वभाविक हो जाता हैं।
कतरनियाघाट वन्य जीव विहार के अन्दर ही विछिया रेलवे स्टेशन, बसड्डा, बाजार व अवैध रिहाईशी अतिक्रमण मौजूद है, इस वजह से हजारों लोगों की अवाजाही निरन्तर इस वन-क्षेत्र की भीतर होती रहती है, यह एक बड़ा कारण हैं, वन्य जीवों की असुरक्षा का।

इस सुरम्य वन के प्रति सरकारी अमले का पूर्ण समर्पण, पुख्ता योजनायें, और आम-जनमानस का सहयोग, जब तक प्राप्त नही होगा तब तक हमारे वनों के प्राणी चैन से नही रह पायेंगें।



दबीर हसन विश्व प्रकृति निधि के कतरनियाघाट वन्य जीव विहार में परियोजना अधिकारी के तौर पर विगत दस वर्षों से कार्यरत हैं, पूर्व में कतरनियाघाट वेलफ़ेयर सोसाइटी  से जुड़े रहे  यह संस्था यहाँ के वन्य जीवन के सरंक्षण व संवर्धन में अपनी विशेष भूमिका रखती हैं। साथ ही सामाजिक कार्यों में अभिरूचि। इनसे dabeer_hasan001@yahoo.in या 09450257709 पर संपर्क कर सकते हैं।

2 comments:

marie muller said...

yea..
WONDERFUL ARTICLE HASSAN DEBIR JI!
GREAT WORK U ARE DOING!!!


tiger basics survival kit...
works by instinct..hunting.breeding..
they dont need governemt to provide houses.education....to tell them where to live...where not to go!!!
they scratch trees to show other tigers..THIS TERRITORY IS MINE !!
..simply like that...
but not good enought..humans are there..
some cannot read these signs...

TIGERS
feel hungry...only....
go and search food.!!!!
ops,,its a human..they dont care ....THEY WANNA ONLY EAT...

its only flesh and bones...and they will not sell the skin...


they dont need education to know rights and duties...to demand....
they just live...
humans need 9 months to born..and some WILL live all life and will never KNOW..
what it means to be human...

Anonymous said...

pryai dabeer hasan ji
nameshkar
aapka prayas sarahniyai hai , chahai jo bhi ho jai aapko upni rastriyai dharohar ko sanrakhchit kerna hi aapka derm hona chahiyai, hum apnai parivar kai saath keterniya ghaat kai nishangada gest house kai jo romanchak anubhav lai ker vapas aayai hai vo hum aur hamara parivar es janm mai nahi bhool payaiga aur hum chahtai ki hindustan kai log yai janai ki hum log abhi bhi vanyajivan mai kafi samridha hai aur ham sab ko mil ker esai surakhshit kernai ka pryas jivanparyant kerna chahiyai.
danyavad
ajai srivastava
indrapuram, gaziabad

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