डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 24, 2010

हम दूसरों के कदमों पर कदम रखना कब छोड़ेगें!

Photo.1 footprints
धरती के सीने पर अरबों मानव पद चिन्ह:

सन १९८८ में गवर्निंग कौंसिल ऑफ़ द यूनाइटेड नेशंस पापुलेशन फंड (  UNFPA) ने ग्यारह जुलाई को विश्व जनसख्या दिवस मनाने का निर्णय लिया. आखिर यह दिन कितना महत्वपूर्ण है, जनसख्या के लिए! क्योंकि इस दिन तक आते आते लाखों वर्ष लगे मानव जाती को तब जाकर हमने एक अरब की सख्या को पार किया. यदि हम अपनी जाति की बढ़ती हुई आबादी जो अरब दर अरब दौड़ती ही जा रही है, बिना रुके! तो हम पाते हैं की आज से १२३ वर्ष पहले यानी १८७९ में हमारी सख्या दो अरब हो चुकी थी. ३३ वर्ष १९७४ में हम तीन अरब हो गए! और चौदह वर्ष पूर्व यानी १९८३ में हमारी तादाद बढ़कर चार अरब हो गयी. १३ वर्ष पहले १९८४ में हम पांच अरब और १९९९ आते आते हम ६ अरब तक पहुंच गए थे. यह जनसख्या वृद्धि की रफ़्तार कितनी घातक है! जिसकी कल्पना मात्र से ही मन में सिहरन होती है! आज हम मानव की कुल आबादी इस पृथ्वी पर यूनाइटेड स्टेट्स सेनसस ब्यूरो के मुताबिक़ ६,८५७,०००,००० है. सन २००९ में  यूनाइटेड नेशंस के मुताबिक़ सन २०११ आते आते हम ७,०००,०००,००० हो जायेगे. इस वक्त हम भारतीयों की ही तादाद दुनिया का १७.२६ % है तकरीबन १,१८३,४३०,००० से अधिक...जो हर पल बढ़ती जा रही है ......तेज रफ़्तार से....!!
इस तरह जनसख्या विस्फोट हमारे लिए अत्यंत घातक और जीवित रहने के लिए तमाम संघर्षों  को उत्पन्न करता है! इसलिए जनसख्या दिवस वह वाहन है! जिस पर सवार होकर हम दुनिया में लोगों को जागरूक कर सके और बता सके की जनसख्या हमारे पर्यावरण व् विकास को कितना अधिक प्रभावित करती है.
सन १७९८ में टी० आर० माल्थस ने अपने लेख "येसे आन पापुलेशन" में भविष्य में जनसख्या बढ़ जाने से होने वाली भयावह स्थितियों का वर्णन किया है. कि जनसख्या बढ़ने से किस तरह भोजन की कमी उत्पन्न होगी. किन्तु आज विज्ञान प्रौद्योगिकी ने (भोजन) अन्न उत्पादन में बढ़ोत्तरी करके हमें उस विकृत समस्या से थोड़ी राहत तो पहुंचा दी, किन्तु आने वाले समय में जनसख्या ऐसे ही रफ़्तार पकड़ती रही और हमने अपनी आवश्यकताओं पर अंकुश नहीं लगाया तो हमारे व् प्राप्य भोजन के मध्य उपजने वाला असुंतलन निश्चित ही अकाल की स्थित उत्पन्न कर देगा. 
हमें जमीन सिर्फ भोजन उत्पादन के लिए ही नहीं चाहिए. बल्कि चलने फिरने, सुविधाजनक आवासों में रहने आदि कार्यों के लिए भी चाहिए. हम जमीन से तेल, खनिज, अयस्क धातुए, जल जैसी महत्वपूर्ण चीजों का दोहन करते जा रहे हैं. ऊर्जा संबधी जरूरतों के लिए हम पूरी तरह से धरती से प्राप्त होने वाली गैस व् तेल पर ही निर्भर हैं. ताकि हम कारों व् अन्य वाहनों से इधर-उधर घूम फिर सके. विद्युत् ऊर्जा का इस्तेमाल हम प्रकाश, रेफ्रीजनेटर, एयर-कंडीशनर आदि में  अत्याधिक करते है.  लेकिन हमारी धरती के पास ऊर्जा के ये साधन सीमित ही हैं. 
"धरती का वह भाग जो प्रत्येक व्यक्ति को उसकी जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है. उस व्यक्ति का इकोलाजिकल फुटप्रिंट कहलाता है". इसके अपने मानक है, की व्यक्ति की जरूरतों के लिए कितनी जमीन चाहिए? 
  माई फुटप्रिंट नाम की संस्था पूरे विश्व में एक सर्वे करा रही है. जिसके आधार पर यह निर्धारित होगा- किस व्यक्ति की लाइफ स्टाइल के लिए कितनी धरतियो की आवश्यकता है! क्या एक ही धरती उसकी आवश्यकता के लिए काफी है! एक तरीका है जिससे हम अपने फुटप्रिंट के लिए आवश्यक जरूरतों को कम करके धरती की हमारे द्वारा इस्तेमाल होने वाली जमीन को कम कर सकते है. ताकि एक ही पृथ्वी से हमारा काम चल सके. इसके लिए कुछ आम बातों पर ध्यान देना होगा. जैसे बिजली का कम से कम उपयोग, ऊर्जा से चलने वाले उपकरण का कम से कम प्रयोग, किताबों का आदान प्रदान, खिलौनों से मिल के खेलना, कपड़ों का सामूहिक उपयोग, कागज़ का सही इस्तेमाल, साइकल पर व् पैदल घूमना, वृक्षा-रोपड़, जंगलों के सरंक्षण में अपनी भूमिका सुनिश्चित करना, जल का सही इस्तेमाल आदि. 
Photo.2 carbon footprint

माई फुटप्रिंट के सवालों का जवाब देने के बाद जो निष्कर्ष सामने आये वह चौकाने वाले है! कि मुझे स्वंय एक से ज्यादा धरती की आवश्यकता है, जबकि मैं माध्यम वर्ग से ताल्लुक रखता हूं. ज़रा सोचिए उन लोगों को कितने धरती जैसे ग्रह चाहिए जो तमाम  संसाधनों का इस्तेमाल करते है.  संसाधनों के उपयोग में मितव्यता बरत कर हम अपनी धरती का बोझ कम कर सकते है. 
महात्मा गांधी के शब्दों में धरती हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, पर लालच को नहीं !
सबसे गंभीर मुद्दा यह की की मानव से पहले इस धरती पर आयी असख्य प्रजातियां इस पृथ्वी पर रहती आयी है. खासबात है की उन्होंने इस जमीन से उतना ही लिया जितनी उन्हें जरूरत है. आदम के पसरते हुए पैर जो इस धरती को काली छाया से घेरते जा रहे है! ऐसे में क्या किसी और प्रजाति के लिए जगह बच पायेगी.....यदि नहीं तो क्या मानव अकेले इस ग्रह पर अपनी प्रजाति को बचाए रख सकता है!......क्या हम दूसरों के फुटप्रिंट के लिए जगह छोड़ रहे है!.....ये मानव द्वारा दूसरों के फुटप्रिंट पर अतिक्रमण हैं.....एक तरह की ज्यादती...!!!



कृष्ण कुमार मिश्र ( लेखक वन्य जीवन व् पर्यावरण सरंक्षण के गंभीर मुद्दों को समाज की मुख्य धारा में लाकर राजनैतिक आंदोलनों  की तरह  जन-अभियान में तब्दील करने के लिए  प्रयासरत है. अपने आस-पास के पर्यावरण को निहारने व् समझने की कोशिश! प्रकृति में सीखे गए प्रत्येक पाठ को सबके साथ जबरियन बांटते रहना   ...समंदर में कंकड़ फेकते रहने की पुरानी आदत...! लखीमपुर खीरी में निवास. संपर्क: dudhwajungles@gmail.com )



Photo.1 Credit: charitygiftcertificates dot org
Photo.2 Credit: pastymuncher dot co dot uk

2 comments:

Anonymous said...

हम सभी को इस प्रश्न का जवाब खोजना होगा वरना हम अपने पूर्वजो से प्राप्त धरोहर को अपने वंशजो को हस्तांतरित नही कर पायेंगे ।

Dr. shyam gupta said...

बरगद,ताल,कुआ मिटे,मिटी नीम की छांह .
इस विकास की राह में, उज़डा सारा गांव ..

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