डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 23, 2010

इस लड़ाई का सिला भुगत रहे हैं-वन और वन्य जीव!

जवान
कथित वर्ग संघर्ष और महात्वाकांक्षाओं ने वनों और वन्य-जीवों को दरकिनार किया:
सलवा जुडुम जिसका शाब्दिक अर्थ शुद्धता अभियान है -एक ऐसा आन्दोलन है जिसमे सरकार की काफ़ी मेहनत और आशायें जुडी थी । इस अभियान को सफ़ल बनाने के लिये इससे जुड़े हुए नेताओं ने और बस्तर की  जनता के एक धड़े ने बड़ी कुर्बानिया दी हैं । इससे जुड़े लोगों ने जान की और जीविका की कीमत पर इसमे भाग लिया । इतिहास मे कम ही ऐसे मौके आये है जिसमे निज जीवन को दांव पर रखकर लोगो ने किसी आन्दोलन मे हिस्सा लिया हो ऐसे मे यह बात अचंभित करती है कि सलवा जुडुम से सुदूर वनांचल के लोग इस तरह जुड गये ।
 
इन्ही सब बातो का कारण जानने के लिये मैने पिछले कुछ सालो मे बस्तर की अनेक यात्राए की और जो कुछ मैने अपने चश्मे से देखा वह ना केवल दुखद था बल्की आश्चर्य जनक भी लगता है कि कैसे लोगो को आपस मे शत्रुता करने मे समय नही लगता।
 
सन 1985 के करीब जब नक्सलवादी या जनता सरकार के लोग जब बस्तर मे सक्रिय हुये तब कि स्थितिया कुछ इस तरह थी कि आदिवासी गांवों मे छोटे मोटे मनमुटाओं को छोड कर आपस में एकता थी । गांव  के मुखिया का निर्णय सर्वमान्य होता था, जिस पार्टी ने बकरा शराब कि दावत देकर कसम ले ली पूरे गांव का एकतरफ़ा वोट उसी को मिलता था।
 
लेकिन हर सामाजिक व्यवस्था की तरह इसमे भी कमियां थी। आदिवासियों की कुछ उपजातियां जो मुख्यधारा से जुड़ चुकी थी, वे तुलनात्मक रूप से संपन्न हो चुकी थी । और वे उपजातियां जैसे मुरिया और माड़िया जो अपनी मूल प्रवत्ति का जीवन जी रही थी। वे खेती पर ज्यादा निर्भर ना होने के कारण अपनी जमीनो का ज्यादातर हिस्सा बेच चुके थे  ।  वनो के राष्ट्रीयकरण के बाद चूंकि सरकार ने प्राकृतिक वनों को सागौन साल और नीलगिरी के वनों मे बदल दिया था ।अत: इन आदिवासियों के भोजन स्त्रोत बन्द हो गये उपर से बचे खुचे वनोपज को लेने के लिये भी वन कर्मचारियो की सहमती आवश्यक हो गयी । इन सब कारणो से आदिवासियो का एक बडा तबका खेतिहर मजदूर बनने के लिये विवश हो गया ।
 
इसी समय जनताना सरकार यानी नक्सलवदियो क आगमन हुआ उन्होने शस्त्रो के बल पर मुख्यतः तीन काम किये पहला गांव की भूमिं को समान आकार मे बांटना दूसरा वनभूमि को साफ़ कर उसको बांटना  और तीसरा आदिवासियों को शासकीय कर्मचारियो से भयमुक्त करना । काम आसान था और शासन और व्यापारियो को भूमिं में दबे खनिजों की जानकारी नही थी। वनों को पहले ही काटकर प्लांटेशन में बदला जा चुका था इसलिये सबने निगाहें तो पहले ही फ़ेरी हुई थी ।
 
लेकिन अचानक इस तरह के परिवर्तन से स्थानीय समाज बट गया । एक तरफ़ वे लोग थे जिनसे जमीने और संपत्ति छीन ली गयी थी और दूसरी तरफ़ वे जिन्होंने जमीनें पायी थी और तो और नक्सलवादियों ने वहां पर अपना शासन स्थापित कर लिया और लगान और अन्य तरह के कर और चन्दा वसूल करना भी प्रारम्भ कर दिया । व्यापारी बिना चंदा दिये हाट बाजारों में नही जा सकते थे और वनोपज के व्यापारी यदि चंदा नही देते तो उनकी ट्रकें जला दी जाती ।
जलाया गया घर

 
कुछ समय समय पश्चात सरकार अचानक प्रकट हुई और क्यो प्रकट हुई यह शोध का विषय है  । कई लोगों का मत है कि उद्योगपतियो को वहां की भूमि में गड़े खनिजो के बारे मे मालूम पड गया और कई लोगों का कहना है, कि भाई अब सरकार का हाथ आम आदमी तक पहुंचना चाहता था।
 
सलवा
खैर मै थिंकटैंक तो नही हू पर इतना जरूर समझा कि दैवयोग से सरकार को बस्तर की जनता का ख्याल आ गया और सरकार के उच्च कोटी के अधिकारियों ने जब देखा कि डन्डा हिलाते पुलिस वालों से स्थिति में नियंत्रण नही हो पा रहा है, तब उन्होने उस वर्ग पर नजर दौडाई जिसका सब कुछ इन तथाकथित साम्यवादियों ने छीन लिया था बस क्या था एक गाव मे सदियों से रह रहे लोगों के बीच लाइन खिच गई।
 
इसके एक तरफ़ वो थे जिनसे नक्सलवादियों ने बिना परिणाम की चिंता किये जमीनें और संपत्त्ति हथिया ली थी। दूसरी ओर वे जिनको जमीनों और सम्पत्ति में हिस्सा मिला था । बस क्या था वर्ग विभाजन हो गया लाइन खिंच गई और फ़िर बस्तर मे आप या तो सलवा जुडूम में थे या फ़िर आप नक्सलवादी  बीच मे नो मैन्स लैन्ड खाली था  । कीमत जान की हो या जीविका की लडाई आर पार की थी। और अस्तित्व की भी! ये लडाई ऐसी है, जिसमें दोनों पक्ष रोटी बेटी का भी सम्मान नही करते  । सामने वाले पक्ष का 15 साल का लडका भी पकड़ मे आये तो मारना ही इलाज है और यदि महिला मिल जाये तो बलात्कार ही उपाय है ।
 
अब नक्सलवाद और सलवा जुडूम से उपर उठ गयी इस लडाई मे शत्रुता निजी हो चुकी है  । आपके हाथ आया तो पुलिस का मुखबिर बता के मार डाला और उनके हाथ आया तो नक्सलवादी बना के जेल भेज दिया यह लडाई वर्ग संघर्ष बन गयी है ।
 
नक्सलवादियों की बात तो छोडियें बड़े-बड़े लोग जो आज कामरेड बने शान से घूमते है, वे भी एक तरह से एक ऐसी स्थिती के जिम्मेदार है, जिसके सामने तो नरेन्द्र मोदी भी भारत रत्न के हकदार नजर आते है । सरकार की तो बात करना ही बेकार है । 15 सालो तक नक्सलवादी अपनी मनमानी करते रहे और इनके कानों मे जूं तक नही रेंगीं । नेता तो एक कदम आगे बढ़ गये इन्होने तो चुनावों की सेटिंग तक कर डाली । जब गीदम थाना नक्सली लूट रहे थे तब वे नारा लगा रहे थे कि डरने की क्या बात है मुख्यमंत्री अजीत जोगी हमारे साथ है । अब उन्ही हथियारों से जब हमारे जवान मारे जा रहे है तो हम उसे कायरता पूर्ण हमला कहते है ।
 
और उससे भी बुरी बात यह है कि सलवा जुडूम से जुडॆ हुये हजारों परिवार आज शिविरों में शरणार्थी जीवन जी रहे है । जहां एक अमीर के घर के विवाह आयोजन मे भी अव्यवस्था हो जाती है । वहां अपने घर और जमीन से विस्थापित इन हजारो लोगों का जीवन किस प्रकार निर्वाह हो रहा होगा । वह भी तब जब इन शिविरो की व्यवस्था हमारे तथाकथित ईमानदार कुशल और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों के हाथ में है ।हालात ऐसे हैं कि इन शिविरों से ( जिन पर नक्सलवादी मनचाही तिथि और समय पर हमला करते है ) 1 किलोमीटर दूर जाना भी खतरे से खाली नही ।
 
खैर कारण जो भी हो बस्तर मे वर्ग विभाजन हो चुका है और दुखद बात तो यह है कि ये विभाजन अमीरों और गरीबों के बीच नही हुआ है, बल्कि बहुत गरीब और कम गरीबों के बीच हुआ है ।  नक्सलवाद का खात्मा भले ही हो जाये पर आदिवासियो मे आई इस दरार को भरने मे दशकों लग जायेंगे । और इससे भी दुखद बात यह है कि यह विभाजन ऐसे तबके में संपत्ति को लेकर हुआ है ! जिसमें जब तक हमने उसके मूल परिवेश से छेड़छाड़ नही की थी तब तक संपत्ति के स्वामित्व का कोई भाव ही नही था। यहां तक कि बस्तर के अनेकों गांवों के कोइ नाम ही नही है । उन्हे P.V. के बाद नंबर देकर सरकार ने नामांकित किया है । वह तो हमने वनों का मूल स्वरूप नष्ट  करके आदिवासियों और वन्यप्राणियों  को उस  मोड़ पर ला कर खड़ा  कर दिया है जहां से बदहाली के अलावा कोई रास्ता बचा नही है ।
अरुणेश सी दवे*  (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

3 comments:

sushant jha said...

good post

naveen singh said...

naveensenator@gmail.com
i read the previous post n dis post abt naxals in chhatisgarh.There is a common impression that intelectual class of the country supports naxals if not openly atleast tacitly.Its a reality n there is a logic behind this reality. Even i have developed some soft corner for naxals. by this i dont mean that i support their way of reacting.I dont say that violence done is justified. wat i feel is that intelectual class is also "unsatified" wid the governing class(politicians & beaurocrates) of the nation.On every front we find that things are being spoiled and marred by these parasites(politicians).this intelectual class just feel helpless wen it sees that these politicians dont leav any chance of corruption & oppertunism.Frustration has developed because of this helplessness n the support for naxals is the result of this frustration.These same politician are now developing different means to "contain" naxals and iam sure that in dis process naxlas n common man is going to lose again. common man in the form of jawans & govt employees...and this result is now visible nowdays wen we hear abt the loss of lives in confrontation with naxals.

Ratish said...

When principles are diluted and moral fabric is broken we have seen in history that many chapters of barbaric actions become acceptable.
But as human beings we never learn from our mistakes. So keep on repeating the same mistakes in different form call it might, greed, insensitivity or cowardliness we will always have our excuses.
Awareness is never enough, but awareness is essential for things to change.
Keep it up.

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