International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Mar 21, 2010

"गौरैया बचाओं जन-अभियान" मना रहा है, "गौरैया वर्ष"


डेस्क* दुधवा लाइव की पहल पर तराई में चलाये जा रहे "गौरैया बचाओं जन-अभियान" के तहत कन्हैया उच्चत्त्तर माध्यमिक विद्यालय बेहजम में एक विशाल सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें ६०० विद्यार्थियों ने सहभागिता की। तराई में विश्व गौरैया दिवस के प्रणेता कृष्ण कुमार मिश्र विद्यालय में बच्चों को संबोधित करते हुए कहाँ, कि हम गौरैया ही नही बचा रहे, बल्कि उस परिवेश में पाई जाने वाली पूरी की पूरी जैव-विविधिता  को बचाने की शुरूवात कर रहे है, क्योंकि जो पर्यावरण गौरैया के लिए अनुकूल होगा, तो जाहिर है, उसमे तमाम पक्षियों, सुन्दर तितिलियों और कीटों की सख्या में वृद्धि होगी। गौरैया मिशन के पीछे यह बड़ा मकसद है- हमारे रिहाइशी इलाकों की जैव-विविधिता को बचाना, क्योंकि तमाम मानव-जनित कारणों से यह जीव हमारे आस-पास से विलुप्त हो रहें हैं।
कृष्ण कुमार मिश्र ने सन २०१० को "गौरैया वर्ष" घोषित किया है, और पूरे वर्ष गाँवों, और शहरों मे अभियान चलाकर लोगों को घर-द्वार में अन्न बिखराने व जल भरे बर्तन को छतों पर रखने का संदेश दिया जायेगा। साथ ही घर की दीवारों व छज्जों आदि पर लकड़ी व गत्ते के बक्शे लटकाये जायेंगे ताकि यह चिड़िया अपने घोषलें बना सके।
हम गौरैया के साथ-साथ उस संस्कृति को बचाना चाहते है, जो हमारे लोक-जीवन में विद्यमान रही है और उन शब्दों को भी जो इन पक्षियों से संबधित है। "गौरैया विलुप्ति का मुख्य कारण है, उनकी सन्तति के लिए भोजन की।
अनुपलब्धता" जहरीले रसायनों के अन्धाधुन्ध प्रयोग से हमारे आस-पास के पेड़-पौधों पर लगने वाले कीड़े-मकोड़े विलुप्त हो गये, जबकि यही पक्षी इन्ही कीटों से अपने बच्चों का पेट भरते थे, कोमल चूजे सख्त व खुरदरे बीज नही खा सकते, उनका मुख्य भोजन होता है, मुलायम कीड़ा जिन्हे अपनी चोंच में लाकर गौरैया अपने बच्चे को खिलाती थी, किन्तु अब न तो घरों के आस-पास फ़ुलवारी होती है और न ही खरपतवार जहाँ यह भोजन इन्हे प्राप्त हो, हाँ यदि फ़ुलवाड़ी के नाम पर विदेशी प्रजाति के कुछ पौधे होते भी है, तो उनमे कीट-नाशकों का इतना इस्तेमाल किया जाता है, कि कोई कीट लग ही नही पाता। देखिए कितनी सुन्दर व्यवस्था प्रकृति ने की थी, पौधों पर लगने वाले कीटों का नियन्त्रण पक्षी करते थे। लेकिन हमने यह वैलेन्स बिगाड़ दिया!
कार्यक्रम में यह भी निर्णय लिया गया है, कि हम बच्चों को विभिन्न माध्यमों से प्रकृति के प्रति संवेदन शील बनायें। 
डा० सत्येन्द्र दुबे ने बड़ी मार्मिक घटना का जिक्र करते हुए कहाँ, कि अब तो किताबों में एन फ़ार नेस्ट न होकर एन फ़ार नोज लिखा होता है, क्योंकि नेस्ट नदारद हो गये हमारे बीच से, हम जब पढ़ा करते थे तो एन फ़ार नेस्ट
ही पढ़ाया जाता था। कुल मिलाकर बदलते पर्यावरण में शब्द और सरोकार भी बदल रहे है। चीजे अपनी प्रासिंगकता खो रही हैं। सामाजिक कार्यकर्ता रामेन्द्र जनवार ने लोक-जीवन में जुड़ी गौरैया का मार्मिक बाते बताई।

कार्यक्रम के अध्यक्ष पूर्व ब्लाक प्रमुख अनिल वर्मा ने अपनी नानी की स्मृतियों को ताजा करते हुए बताया कि उनकी नानी बरसात में चिड़ियों के लिए विशेष कर अनाज आँगन में बिखेरती थी, बरसात में न तो खलिहान होते है, और न ही अन्न घरों में बाहर रखा होता है, इस लिए इन पक्षियों को भोजन नही मिल पाता। नानी का सन्देश यकीनन इस गौरैया  के लिए जरूरी है...............
कार्यक्रम के व्यवस्थापक आयुश श्रीवास्तव ने बच्चों को पर्यावरण सरंक्षण के महत्व बतलाये, और बच्चों को गौरैया के प्रति अनाज के दाने और पानी रखने की प्रेरणा दी।

प्राचार्य अतुल जायसवाल व विज्ञान  शिक्षक आफ़ताब ने गौरैया दिवस पर चिड़ियों के बारे में जानकारी दे।
दुधवा लाइव बेबसाइट द्वारा विद्यालयों में नेचर कैम्प का अयोजन करने की बात कही।

फ़ोटो साभार: अब्दुल सलीम, बिजुआ, खीरी

1 comment:

  1. हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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